रविवार, 28 मार्च 2010

फिल्मी संस्कृति की प्रमुख चुनौतियां- 3-

     मासकल्चर के उत्पादन का सबसे बड़ा कारखाना है सिनेमा। सिनेमा का संस्कृति के उत्पादन से कम और मासकल्चर के उत्पादन से ज्यादा संबंध है। भारत में सिनेमा निर्माण के 5 केन्द्र है,ये हैं-मुम्बई,मद्रास,हैदराबाद,कोलकाता और बैंगलौर। ये पांचों केन्द्र धीरे-धीरे माध्यम साम्राज्यवाद के दायरे में कैद होते चले जा रहे हैं। हाल ही में जारी ‘माई नेम इज खान’फिल्म की सफलता और इसके पहले की सफल फिल्मों और फिल्म उद्योग में देशी-विदेशी इजारेदार और बहुराष्ट्रीय पूंजी के निवेश और निरंतर फैलते साम्राज्य को ध्यान से देखें तो हमें फिल्म उद्योग में आ रहे परिवर्तनों और संकट का सही ढ़ंग से आभास मिल सकता है।
    एक जमाना था हिन्दी सिनेमा में पूंजी निवेश देशी था,इसमें वैध-अवैध दोनों ही किस्म का पैसा लगा था। यह सारा पैसा गैरइजारेदार घरानों का था। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे लुंपन पूंजीपति या समानान्तर अर्थव्यवस्था कहते हैं या ब्लैकमनी भी कहते हैं। आज यह स्थिति नहीं है। आज सिनेमा उद्योग में अनिल अम्बानी से लेकर रुपक मडरॉक का पैसा लगा है। यह मूलत:ग्लोबलाइजेशन की विश्वव्यापी प्रक्रिया का हिस्सा है। देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों का फिल्म उद्योग में पूंजी निवेश भारतीय सिनेमा उद्योग की प्रकृति में आ रहे मूलगामी परिवर्तनों का द्योतक है।
        कारपोरेट घराने फिल्म निर्माण के साथ सिनेमाघरों की खरीद पर भी जोर दे रहे हैं। इस ग्रुप ने विदेशों में भी सिनेमाघर खरीदने पर जोर दिया है।अमेरिका,ब्रिटेन आदि देशों में इस ग्रुप ने कई सिनेमाघर खरीदे हैं। इसके अलावा स्पिलवर्ग की कंपनी ‘ड़्रीमवर्क’ के साथ समझौता किया है जिसके अनुसार अंबानी ग्रुप 825 मिलियन डॉलर निवेश करेगा। इससे स्पिलवर्ग 6 फिल्में बनाएंगे। अनिल अंबानी की कंपनी ने 2009-10 में 350 करोड़ रुपये फिल्म निर्माण पर खर्च करने का फैसला किया था। इसके तहत 15 फिल्में बननी थीं, जिनमें 8 हिंदी और बाकी क्षेत्रीय भाषाओं  -जैसे तमिल, भोजपुरी, बांग्ला,मलयालम,पंजाबी - की फिल्में बननी थी।
         विश्व विख्यात अमेरिकी वित्तीय संस्था जेपी मॉर्गन ने पीवीआर पिक्चर में 60 करोड़ रुपये निवेश करने का फैसला लिया है। भारत सरकार ने 250 करोड़ रुपये निवेश करने का फैसला लिया है। यह पैसा मूलतः एनीमेशन फिल्मों के निर्माण,गेमिंग और विजुअल प्रभाव के म्यूजियम के निर्माण पर खर्च किया जाएगा।   
     भारतीय रिजर्ब बैंक ने भी बैंकों से फिल्म निर्माण के लिए कर्ज मुहैय्या कराने का प्रावधान किया है,मजेदार बात यह है कि रिजर्ब बैंक ने कर्ज के नियम कारपोरेट घरानों के फिल्म उद्योग में आने के पहले नहीं बनाए। बैंकों में एक्सिम बैंक सबसे ज्यादा कर्जा दे रही है। इसके अलावा बीमा कंपनियां भी फिल्मों का बीमा कर रही हैं। इससे फिल्मों का सही समय पर निर्माण करने में मदद मिल रही है। साथ शेयर और बॉण्ड के जरिए भी फिल्म निर्माण के लिए बाजार से पैसा उठाया जा रहा है। इस तरह से पैसा जुगाड़ करने वाली कई वित्तीय संस्थाएं सामने आ गयी हैं। कहने का मतलब यह है कि हिन्दी सिनेमा का अर्थशास्त्र बुनियादी तौर पर बदल गया है। यह लुंपन अर्थशास्त्र से कारपोरेट पूंजी के राजनीतिक अर्थशास्त्र में रुपान्तरण की बेला है। इसका फिल्म के दर्शक,कहानी, नायक- नायिका और समाज के प्रति बदले नए नव्य-उदारतावादी ग्लोबल सरोकारों के साथ गहरा संबंध है।    
    भारत का फिल्म उद्योग बहुभाषी है। भारत की 20 भाषाओं में प्रतिवर्ष 1000 से ज्यादा फिल्में रिलीज होती हैं, सालाना इससे ज्यादा फिल्में तैयार होती हैं। भाषायी फिल्में अपने ही राज्यों में सीमित प्रचार-प्रसार पाती हैं, एकमात्र हिन्दी सिनेमा है जो गैर हिन्दी राज्यों और विदेशों में भी अपना प्रसार करने में सफल रहा है। इसके अलावा हॉलीवुड की फिल्मों का नव्य-उदारीकरण के दौर में व्यापक बाजार टेलीविजन से लेकर सिनेमा हॉल तक तैयार हुआ है।
     सारी दुनिया में 10 करोड़ लोग प्रति सप्ताह 13,000 सिनेमाघरों में मुम्बई सिनेमा देखते हैं।उल्लेखनीय है बॉम्बे को मुंबई नाम 1995 में दिया गया। फिक्की और केपीएमजी के द्वारा तैयार रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि बॉक्स ऑफिस और सिनेमा से होने वाली अन्य किस्म की आमदनी में बहुत ज्यादा उछाल आने की संभावना नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार सन् 2009 में फिल्म उद्योग 2.2 बिलियन डॉलर (109.2 करोड़ रुपये) का कारोबार करेगा। केबल और सैटेलाइट पर फिल्मों की बिक्री में भी गिरावट आएगी। इसके बावजूद फिल्म उद्योग की सालाना विकासदर सन् 2013 तक 9.1प्रतिशत रहने की संभावना है। इसका अधिकतम व्यापार 3.4 बिलियन डॉलर (168-6बिलियन रुपये) तक जाने की संभावना है। भारत में इस समय 50 से बड़ी फिल्म निर्माता कंपनियां हैं।
    फिल्म निर्माण के बारे में यह मिथ है कि बड़े बजट की फिल्म ज्यादा कारोबार करती है, यह सच नहीं है, बड़े बजट और बड़े स्टार की फिल्मों की फ्लॉप दर ड्यादा है। कम बजट और बड़े स्टार के बिना बनने वाली फिल्मों का सफलता दर बेहतर रही है।
    फिल्म उद्योंग में देशी-विदेशी इजारेदार घरानों के पूंजी निवेश के बाद भारतीय सिनेमा का चरित्र पूरी तरह बदल गया है। इसी तरह आइनॉक्स वगैरह में तैयार हुए नए टाइप के सिनेमाघरों में बड़ी पूंजी का निवेश हुआ है। पहलीबार फिल्म उद्योग का समग्रता में बड़ी पूंजी के पैराडाइम में रुपान्तरण हुआ है। नव्य-उदारीकरण के पहले तक भारतीय सिनेमा गैर कारपोरेट-लंपट पूंजी के खेल में फंसा हुआ था, फलत: सिनेमा तकनीक का विकास नहीं हो पाया, कारपोरेट पूंजी के पैराडाइम में जाने के कारण फिल्म निर्माण की उच्च तकनीक और हॉलीवुड के हुनरमंद निर्देशकों का भी उसे तजुर्बा हासिल होता। विचारणीय सवाल यह है कि भारतीय बैंकों ने फिल्म उद्योग की तरफ नव्य-उदारतावाद के पहले रुख क्यों नहीं किया ?
   एक अन्य फिनोमिना यह भी है कि हॉलीवुड में पूंजी का अभाव है, इसके कारण भी हॉलीवुड के निर्माता भारतीय पूंजी और मध्य-पूर्व के तेल उत्पादक देशों की ओर भाग रहे हैं। मध्य-पूर्व और भारत के बड़ी पूंजी के खिलाड़ी जिस गति से मीडिया उद्योग में पूंजी निवेश कर रहे हैं उससे माध्यमों की दुनिया में तीसरी दुनिया का वर्चस्व बढ़ेगा। हॉलीबुड कमजोर होगा और मीडिया मुगलों के कारोबार पर भी असर होगा, यह असर विश्वव्यापी होगा। बुनियादी तौर पर इससे माध्यम साम्राज्यवाद से तीसरी दुनिया के मीडिया अन्तर्विरोध तेज होंगे।          
      फिल्म उद्योग अब इजारेदार पूंजी के पैराडाइम में दाखिल हो चुका है। खासकर 1995-96 के बाद से इस दिशा में प्रयास तेज हुए हैं। अब तक का फिल्म उद्योग का सारा विमर्श ‘लुंपन पूंजी’ पर चल रहा था,भूमंडलीकरण के बाद देशी-विदेशी इजारेदार पूंजी का प्रवेश हुआ है। इस प्रक्रिया का आरंभ नरसिंहाराव के शासनकाल में हुआ था। उस समय हॉलीवुड की फिल्मों के अबाध प्रवेश की अनुमति दी गयी,बाद में प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश की अनुमति दी गयी।
    आमतौर पर पहले फिल्म उद्योग में भारत के पूंजीपतिवर्ग की कोई दिलचस्पी नहीं थी, किंतु दूरसंचार और इलैक्ट्रोनिक मीडिया को निजी क्षेत्र के लिए खोल देने के कारण इजारेदार पूंजी का मीडिया और दूरसंचार के क्षेत्र में जबर्दस्त निवेश हुआ है। इससे भारत का कई स्तरों पर सांस्कृतिक- राजनीतिक नुकसान हुआ है। मीडिया में इजारेदाराना केन्द्रीयकरण बढ़ा है। यह सारा खेल ज्यादा चैनल,ज्यादा खबरें,ज्यादा अभिव्यक्ति की आजादी, ज्यादा मनोरंजन के नाम पर हुआ है। हमें ठंड़े दिमाग से सोचना चाहिए कि क्या हमें इनमें से कोई भी चीज ज्यादा मिली है ? ज्यादा पाने के चक्कर में हम मीडिया के बुनियादी सवालों से कोसों दूर चले गए हैं। हमने अपनी सांस्कृतिक संप्रभुता को दांव पर लगा दिया है।
    आज हम खुश हैं कि ‘माई नेम इज खान’ ने बड़ा कारोबार किया, लेकिन हम भूल गए कि मुंबईया सिनेमा को इस प्रक्रिया में हमने हॉलीवुड के हवाले कर दिया है। आज हम मुंबईया सिनेमा की स्वायत्तता पर खतरे के बादल मंडराते नजर आ रहे हैं। भारत की फिल्में फ्लॉप हो रही हैं और हॉलीवुड की हिन्दी फिल्में भारत और भारत के बाहर हिट हो रही हैं।जो बाजार कल तक भारतीय सिनेमा के पास था उसे हॉलीवुड उठाकर लिए जा रहा है। यह प्रक्रिया दो तरह से चल रही है,एक तरफ भारतीय पूंजीपति हॉलीवुड में पैसा लगा रहा है दूसरी ओर हॉलीवुड कंपनियां सिनेमा निर्माण के क्षेत्र में आ रही हैं, सिनेमा थियेटरों को खरीद रही हैं। इस पूरी प्रक्रिया के क्या परिणाम निकलेंगे और किस तरह के अन्तर्विरोध पैदा हो रहे हैं इस पर वाम और दक्षिण दोनों ही चुप्पी लगाए बैठे हैं। मुंबईया सिनेमा में हॉलीवुड का दखल  बढ़ना हमारे सिनेमा उद्योग के भविष्य पर सवालिया निशान लगाता है। यह मूलतः सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की दिशा में लंबी छलांग है।   
     






1 टिप्पणी:

  1. माई नेम इज़ खान तो सुपर फ्लॉप रही. आप इसे सफल बता रहे हैं. दरअसल फ़ॉक्स इंटरटेनमेंट ने फिल्म के अधिकार तिगुनी कीमत में खरीद लिए थे, और फिल्म को हित कराने के लिए अपनी सारी मीडिया ताकत झोंक दी. फिर भी फिल्म रिलीज़ के तीन दिनों के अन्दर ही दर्शकों की कमी के कारण फ्लॉप मान ली गई.

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