मंगलवार, 2 मार्च 2010

संघ जानता है पश्चिम बंगाल और गुजरात का अंतर-1-

नरेन्द्र मोदी पर हाल ही में मैंने जो लेख लिखे हैं उन पर टिप्पणी करते हुए हमारे अनेक पाठक दोस्तों ने मांग की है कि मैं पश्चिम बंगाल के बारे में विस्तार से क्यों नहीं लिखता ? वे यह भी मांग कर रहे हैं कि मेरा वाम के साथ कनेक्शन है इसलिए वाम की आलोचना नहीं लिखता। इनमें से कोई भी बात सच नहीं है। प्रमाण मेरे पास नहीं बाजार में हैं, मैंने वाम की गलतियों पर सबसे तेज लिखा है लेकिन वाम अगर सही काम कर रहा है तो बेवजह आलोचना नहीं की है। मैं अपने जागरुक पाठक दोस्तों से वायदा करता हूँ कि आपको विस्तार के साथ बंगाल के सच से भी अवगत कराऊँगा। यहां सिर्फ बंगाल और गुजरात के अंतर पर प्रतिवाद की संस्कृति के संदर्भ में रोशनी ड़ाल रहा हूँ। बंगाल में ऐसे बुद्धिजीवी भी हैं जो बंगाल और गुजरात की मोदी और बुद्धदेव की नंदीग्राम की बर्बर घटना के बाद तुलना कर रहे हैं।
      जो लोग गुजरात के साथ पश्चिम बंगाल की तुलना कर रहे हैं,मोदी के साथ बुद्धदेव की तुलना कर रहे हैं वे थोड़ा गंभीरता के साथ सोचें कि क्या गुजरात में एक भी विशाल बौद्धिक प्रतिवाद विगत पांच सालों में हो पाया है जैसा नंदीग्राम अथवा तसलीमा के मसले पर पश्चिम बंगाल में हुआ है। कम से कम पश्चिम बंगाल में सांस्कृतिक संरचनाएं अभी भ्रष्ट नहीं हुई हैं। गुजरात में विगत पांच सालों में ''पांच करोड़ गुजरातियों की अस्मिता'' ने समस्त बौद्धिक ऊर्जा और गरिमा को नष्ट कर दिया है। गुजरात में कहीं पर भी व्यापक बौद्धिक प्रतिरोध नजर नहीं आता। लोग डरे हैं। शक्तिहीन हैं। प्रतिवाद करने में असमर्थ हैं। प्रतिवाद करने वालों को उत्पीड़ित किया जाता है। आज गुजरात में सांस्कृतिक प्रतिवाद संगठित करने का सामान्य माहौल नहीं है।
    ध्यान रहे सांस्कृतिक और बौद्धिक सर्जना और प्रतिवाद का माहौल जब एक बार नष्ट कर दिया जाता है तो उसे दुबारा निर्मित करने में बहुत परिश्रम लगता है। गुजरात की उपलब्धि मोदी की सरकार नहीं है, सरकारें तो आती-जाती रहती हैं। गुजरात के दंगे भी उतने परेशान नहीं करते जितना यह बात परेशान करने वाली है कि गुजरात में संस्कृति,कला,साहित्य आदि किसी भी किस्म के बौध्दिक प्रतिरोध और सर्जना की अभिव्यक्ति संभव नहीं है। लेखकों,कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों को परेशान किया जा रहा है, विस्थापित किया जा रहा है, सृजन से रोका जा रहा है। यह सारा संवैधानिक तौर पर चुनी सरकार के बैनर तले हो रहा है। इसे ही वास्तव अर्थों में फासीवाद कहते हैं। सवाल किया जाना चाहिए सभ्यता,संस्कृति,कला आदि को पूरी तरह नष्ट करके किस तरह की गुजराती अस्मिता मोदी और संघ परिवार निर्मित करना चाहता है ? क्या अस्मिता के लिए संस्कृति जरूरत नहीं है ? जी हां, वास्तविकता यही है कि इन दिनों जो लोग अथवा संगठन अस्मिता के नगाड़े बजा रहे हैं उन्हें सिर्फ अस्मिता के कोलाहल,हंगामे और सत्ता पसंद है, उन्हें संस्कृति पसंद नहीं है। वे आए दिन जरा-जरा सी बातों,नामसूचक शब्दों,जातिसूचक शब्दों पर इस कदर अपने भाव व्यक्त करते हैं कि उन्हें प्रेमचंद,एमएफ हुसैन ,नामवरसिंह, माधुरी दीक्षित,आमिरखान जैसे व्यक्तित्वों का अपमान करने में शर्म नहीं आती। अस्मिता की राजनीति आज स्वार्थ, उपयोगितावाद, कैरियरिज्म और संस्कृतिविहीनता के पथ पर चल पड़ी है। इसने सर्वसत्तावादी राजनीति का दामन पकड़ लिया है। सर्वसत्तावाद और फासीवाद एक-दूसरे के साथ भारत में अन्तर्क्रियाएं कर रहे हैं और संस्कृति पर हमले कर रहे हैं। सर्वसत्तावाद के हमलों को संस्कृतिकर्मियों ने समाजवादी समाजों में भी झेला है और फासीवाद के दौर में भी झेला है।
मोदी का गुजराती अस्मिता का नारा फासीवादी नारा है। यह प्रत्यक्ष हिंसाचार की संस्कृति और राजनीति का नारा है। मीडिया को घटिया चीजों से प्यार होता है और वह उनके उत्पादन और पुनर्रूत्पादन में अहर्निश व्यस्त रहता है। मीडिया को अपनी रेटिंग की चिन्ता होती है। उसे विवेक, संस्कृति, समाज आदि किसी की भी चिन्ता नहीं होती। यदि रेटिंग में छलांग मोदी के बहाने लग सकती है तो मोदी को उछालो और यदि गुजराती अस्मिता के बहाने लग सकती है तो उसे उछालो।

मीडिया की रेटिंग हमेशा सबसे घटिया किस्म की चीजों अथवा सास्कृतिक गंदगी के प्रदर्शन पर बढ़ती है। सांस्कृतिक गंदगी सबका ध्यान खींचती है और मोदी हमारी सांस्कृतिक- राजनीतिक गंदगी का चमकता सितारा है। ऐसे ही अनेक नायक मीडिया के पास हैं जो समय-समय पर पर्दे पर आते रहते हैं। दर्शकों को वे चीजें और बातें ज्यादा ज्यादा आकर्षित करती हैं जिन्हें समझने के लिए बुद्धि खर्च न करनी पड़े। जिनकी देखभाल न करनी पड़े। हमें वे ही चीजें देखने में अच्छी लगती हैं जिन्हें देखकर थोड़ा सा मजा आ जाए और बात खत्म। क्षणिक आनंद हमारा मूल लक्ष्य है। इस क्षणिक आनंद वाली मानसिकता ने हमारी राजनीति को भी घेर लिया है। राजनीति में जो चल रहा है उसके प्रति भी हमारा क्षणिक सरोकार है। चुनाव हुए हम भूल गए। घटना हुई हम भूल गए। वोट डाला और भूल गए। क्षणिक अनुभूति वस्तुत: खोखली अनुभूति होती है।
  
सवाल उठता है क्या ''पांच करोड़ की गुजराती अस्मिता'' जैसी कोई चीज है ? असल में ऐसी कोई वास्तविकता नहीं है।  फिर मोदी को सफलता क्यों मिली कि लोग उसके इस नारे में विश्वास करने लगे ? इस प्रसंग में यह तथ्य ध्यान में रखें कि मौजूदा दौर शब्दों का अपने यथार्थ से संबंध कट चुका है। आज सभी किस्म की धारणाएं और अवधारणाएं सामान्यीकरण और सरलीकरण के जरिए पहुँच रही हैं। इसके कारण वास्तव का हमारी जिन्दगी से अहसास ही खत्म हो गया है, हम जिसका अहसास करते हैं वह वास्तव नहीं कृत्रिम होता है। कृत्रिम भावनाओं,कृत्रिम धारणाओं और कृत्रिम राजनीति को देखते-देखते हम इस कदर अभ्यस्त हो गए हैं कि असली क्या है इसे भूल गए हैं। हमारे इर्द-गिर्द कृत्रिम का ही अनुकरण हो रहा है। संघ परिवार की अस्मिता की राजनीति कृत्रिम राजनीति है,उसका देश और गुजरात की वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है।


                 



4 टिप्‍पणियां:

  1. इस आलोचना में बहुत दम है। अब बंगाल की परिस्थितियों पर आप के विश्लेषण की प्रतीक्षा रहेगी।

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  2. पश्चिम बंगाल और गुजरात में सिर्फ एक बात का अन्तर है - पिछले पचास वर्षों में बंगाल लगातार पिछड़ता गया है और गुजरात लगातार आगे बढ़ता गया है। बाकी अन्तर तो सब आपके बनाये हुए हैं।

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  3. माओ की सांस्कृतिक क्रांति के बारे में फिर आप क्या कहेंगे? लाखों विचारकों को खोज खोज कर मार डाला गया था. क्या किसी भी कम्युनिस्ट देश में विचारों की आज़ादी रही है? अगर पश्चिम बंगाल की बात करें तो अगर आप वाम रुझान के आलोचक हैं तो आपका बंगाल में कोई स्थान नहीं है, एक आलोचक को बंगाल में रहने की पहली शर्त है की वह कम्युनिस्म से सहनुभुक्ति रखे. मार्क्सवाद से नहीं तो लेलिनवाद से सही, या माओवाद या नक्सली किसी एक वाम विचारधारा से आपकी सहमती आवश्यक है. विचारों की आज़ादी तो पशिम बंगाल में भी नहीं है. हर्ष मंदार और तीस्ता सेतलवाड गुजरात में नहीं तो और कहाँ रहते हैं?

    मुझे समझ नहीं आता की इतने प्राकृतिक संसाधनों, सबसे स्थिर सरकार के होते हुए भी बंगाल पिछले ६० सालों में केवल पिछड़ा ही क्यों है? क्यों वह आज सबसे गरीब राज्यों में शुमार है? जबकी केंद्र में भी समाजवाद से सहानुभूति रखने वाली कांग्रेस ही अमूमन काबिज़ रही है. सबसे बड़ी बात की बंगाल का शैक्षिक स्तर बाकि भारत से कितना आगे है? जबकि गुजरात आज देश के सबसे ज्यादा शिक्षित प्रदेशों में से एक है.

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