गुरुवार, 10 मार्च 2011

महिलाओं का बहुआयामी संघर्ष- (1)- माकपा सांसद वृंदा कारात

(इस साल सारी दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है,समूचे साल हम अपने ब्लॉग पर महिलाओं के संघर्षों और समस्याओं पर विभिन्न क्षेत्र के विचारकों और स्त्रीवादियों के आलेख उपलब्ध कराएंगे, इस कड़ी में भारत के महिला आंदोलन की गंभीर मीमांसा करते हुए का.वृंदा कारात के लेख को उनकी किताब से साभार किश्तों में छाप रहे हैं,यह लेख महिला आंदोलन की समीक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है)  
    स्वतंत्रता संघर्ष की कुठाली में भारतीय नारी आंदोलन का जन्म हुआ था। इसीलिए प्रारंभ से ही दूसरे नारी आंदोलनों के विपरीत, खास तौर पर पश्चिम में समकालीन नारी मुक्ति संघर्षों के विपरीत, जिनके सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में स्त्री-पुरुष संबंधों को संबोधित करने के मुख्य उद्देश्य की तलाश समाप्त हो जाती थी, हमारा (भारतीय) आंदोलन एक सीमित लैंगिक ढांचे से परे अधिक श्रेष्ठ हो आगे बढ़ पाया। भारतीय नारी आंदोलन की चेतना के साथ औपनिवेशिक सत्ता से स्वाधीनता और मुक्ति के सवाल बड़ी जटिलता के साथ उलझे हुए थे। स्त्रियों की वह चेतना जो न केवल पुरुषों से संबंधित थी अपितु पूरे विश्व से उसकी चेतना की डोर बंधी थी। यह अहसास कि मुक्ति के लिए सभी संघर्ष अविभाज्य हैं, समानता के लिए वैश्विक संघर्ष में हमारे आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है।
अखिल भारतीय महिला कांग्रेस पहला अखिल भारतीय महिला संगठन था। उसका चरित्र उसको स्पष्ट रूप से स्वतंत्रता संघर्ष की मुख्य धारा से एकरूप करता था। बुर्जुआ उदारवादी और वामपंथी दोनों ही अखिल भारतीय महिला कांग्रेस में साथ ही आ जुड़े थे। इसका गठन 1920 में महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन को जन-जन तक लोकप्रिय बनाने के आह्वानों के साथ खड़ा हो गया। महात्मा गांधी का यह आह्वान संघर्ष को उसकी ऊंची जाति और अभिजात्य वर्ग की जकड़ से अलग करने के लिए किया गया था। अत: अखिल भारतीय महिला कांग्रेस, और जो उससे जुड़े हुए थे, ने न केवल स्त्रियों के अधिकार और सम्मान की लड़ाई में एक अहम मुकाम हासिल किया अपितु इस दायित्व को स्पष्ट तौर पर देश के स्वतंत्रता आंदोलन में एक इकाई के रूप में स्थापित कर दिया। यही वह वास्तविक शक्ति थी जो नारी आंदोलन ने अपने जन्म के समय अर्जित की जो आंदोलन के हृदय स्थल में अभी तक संजो कर रखी गई है। यह एक ऐसी परंपरा है जो आंदोलन के खास स्वरूप में इस प्रकार गतिमान है कि उसके मार्ग में आने वाले उतार-चढ़ावों में आजतक उसका मार्गदर्शन कर रही है।
58 साल पहले पूरे राष्ट्रीय आंदोलन के इतर सांप्रदायिकता और बंटवारे के साथ जो मिला वह एक ऐसी विशिष्ट स्थिति थी जो नारी आंदोलन के लिए चिंता का विषय थी। आजादी के साथ हिंसा का एक बहुत बड़ा ज्वार भी आया था। महिला संगठनों को सबसे पहला सामना हिंसा, सांप्रदायिकता और धार्मिक समुदायों के आधार पर बंटी पीड़ित महिलाओं से करना था। हिंदू और मुसलिम दोनों ही महिलाएं सांप्रदायिक लोगों की ज्यादतियों की सीधी शिकार हुई थीं। सरकारी साहित्य में इन आघातों को थोड़ी ही आवाज मिली है। शायद वह इसलिए कि त्रासदी का विस्तार इतना बड़ा था कि जो महिलाएं हिंसा का शिकार हुई थीं उनका सारा ध्यान अपनी बिखरी जिंदगियों के कोनों को समेटने में और उन्हें फिर से जोड़ने में लगा था। पंजाब, दिल्ली और बंगाल में महिलाओं के साथ काम कर रहे कार्यकर्ताओं का इस स्थिति से आमना-सामना हुआ। एक बार फिर से स्पष्ट था कि नारी आंदोलन को महिलाओं पर पड़े सांप्रदायिकता के विशेष प्रभाव को समझते हुए एक व्यापक राजनीतिक संघर्ष के बीच काम करना होगा।
मोटे तौर पर इसी समय के आसपास एक बहुत ही बड़ी महत्वपूर्ण धारा नारी आंदोलन में उभरकर आई। अफसोस की बात है कि इस विषय के अकादमिक अध्ययनों में इसे वह पहचान नहीं मिली जिसकी वह हकदार थी। वाम-रेडिकल प्रवृत्ति गरीब औरतों के बीच काम करने से आकार ले पाई थी। सूखे से निबटने के लिए जिस प्रकार की जबरदस्ती महिलाओं के साथ की जा रही थी उसे देखकर ऐसी बहुत सी महिलाएं जो पहले अखिल भारतीय महिला कांग्रेस में थीं वे नारी आत्म रक्षा समिति (एनएआरएस) में शामिल होने के लिए प्रेरित हुईं। यह आंदोलन तेजी से बढ़ा और उसने संगठित वाम से बहुत ही परिपक्व संगठनात्मक संबंध विकसित किए। नारी आत्म रक्षा समिति के सदस्यों ने ऐतिहासिक तेभागा संघर्ष का समर्थन किया और उसमें भाग भी लिया। देश के अन्य स्थानों पर वाम राजनीतिक झुकाव के साथ महिलाएं कामकाजी वर्ग और तेलंगाना के संघर्ष जैसे क्रांतिकारी किसान संघर्षों में शामिल थीं। तेलंगाना वाम के लिए एक बहुत ही प्रभावशाली सीखने वाला अनुभव साबित हुआ, जिसने यह दरशाया कि महिलाएं संघर्ष कर सकती हैं।
महिलाओं के बहुआयामी संघर्ष नेराष्ट्रीय विकास के संबंध में, राजनीति के संबंध में और उनकी खुद की जिंदगियों और परिवारों के संबंध मेंआजादी के बाद भारतीय नारी आंदोलन को एक आकार दिया। आजादी के बाद बुर्जुआ-उदार विचारधारा वालों में से अधिकतर का यह विश्वास था कि एक बार स्वतंत्रता मिल जाए तो सत्ता का नया ढांचा महिलाओं की समस्याओं को हल करने के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करेगा। अत: आवश्यकता थी स्त्री का व्यवस्था में ही प्रतिनिधित्व करने की और साथ ही उनकी चिंताओं को उचित रूप से स्पष्ट किया जाता, तब उसके बाद उनकी मांगों को पूरा किया जाता। बुर्जुआ-उदार महिला आंदोलन जो कि तब जाहिर है सैध्दांतिक रूप से कांग्रेस से जुड़ा हुआ था, महिलाओं के लिए बराबरी का मौका चाहता था, उन्हें इस खेल से कोई आपत्ति नहीं थी।
आजाद भारत के वजूद में आने के छह साल में ही यह आत्मसंतोष चकनाचूर हो गया। शायद यह विडंबना ही है कि महिला आंदोलन को अपनी सबसे बड़ी चिंता के रूप में सांप्रदायिकता और कट्टर पंथ से किसी और से काफी पहले ही उलझना पड़ा। महिला आंदोलन को कोड बिल और हिंदू पर्सनल ला सुधार के मामले में तुरंत की सभी दलों में मौजूद हिंदू अंधराष्ट्रवादियों के रूप में मौजूद बहुसंख्यक कट्टरपंथ से भिड़ना पड़ा। जिन महिलाओं ने कट्टरपंथियों के विरुध्द युध्द किया उन्होंने इस जंग में एक असाधारण साहस का परिचय दिया। वामपंथ में रेणु चक्रवर्ती, अहिल्या रांगनेकर और कई अन्य महिलाएं और अखिल भारतीय महिला कांग्रेस से कमलादेवी चट्टोपाध्याय, पद्मजा नायडू और अन्य कई महिलाएं जहां तक महिलाओं का सवाल है नेहरूवादी परियोजना के प्रतीक चिह्न थे। इन्हें मजबूरन इस प्रक्रियावादी हिंदू दक्षिणपंथ के मध्ययुगीन चेहरे से दो-दो हाथ करने पड़े जिसके सुधार विरोधी पक्ष को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद का समर्थन प्राप्त था।
इन महिलाओं की निंदा की गई। इन्हें गाली दी गई। यह दिलचस्प है कि सती विरोधी और बाद में हुए अन्य नारी आंदोलनों में हमारे खिलाफ इस्तेमाल किए गए विशेषणों की ये महिलाएं पहली शिकार थीं। जिन शब्दों का इस्तेमाल किया गया उनमें से चंद थे 'पाश्चात्य', 'भारतीय परंपरा से दूर', 'झूठे धर्मनिरपेक्षतावादी'। इन बहसों में जो मुहावरा इस्तेमाल नहीं हुआ वह है 'बालकटी' (परकटी)। सालों के संघर्ष के बाद भारतीय नारी आंदोलन ने आंशिक विजय हासिल की है। फिर भी, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय राज्य और बुर्जुआ राजनीति का असली चेहरा सबके सामने बेपरदा हो गया है।
कुछ भी हो 1960 में ही यह तीखा संघर्ष हलका पड़ गया था। वह एक ऐसा समय था जिसका चेहरा-मोहरा युध्दों और सभी जन आंदोलनों से बना था, इस संकट की स्थिति में, पीछे हटना और आत्मविश्लेषी बन गया। इस दौर में अखिल भारतीय महिला कांग्रेस अपना सारा ध्यान कल्याण और सामाजिक कार्यों पर केंद्रित करते हुए अपनी राह चल पड़ा। वामपंथ अपनी परंपरा के अनुरूप भूमिका अदा करते हुए अपने आधार को बढ़ाने और मौजूदा प्रभाव वाले क्षेत्रों को संगठित करने में लगा हुआ था। 1970 तक वामपंथी नारी आंदोलन महिलाओं के काम और कार्यस्थल पर समानता के मुद्दे पर श्रमिक संगठनों को प्रभावित करने की स्थिति में था। 1970 का दौर पारंपरिक उद्योगों, खासकर कपड़ा और जूट में एक बहुत बड़ी छंटनी का साक्षी रहा है। वामपंथ में महिला संगठन इस स्थिति को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित थे, क्योंकि यह स्पष्ट था कि महिलाएं काम पर बहुत ही मुश्किल से रखी जाती थीं पर सबसे पहले बहुत आसानी से निकाल दी जाती थीं।
वामपंथ में महिलाओं को 1970 के दौरान कम से कम कुछ तो बड़ी सफलताएं मिली थीं : समान काम के लिए समान वेतन के महत्वपूर्ण कानूनों को पास कराने में उन्होंने योगदान दिया पर शायद बहुत ही संकेतात्मक तरीके से। हालांकि ऐसे कोई भी संयुक्त संघर्ष नहीं हुए जिनमें सभी प्रकार के महिला संगठन शामिल हों। शायद यह कुछ लोगों में एक व्यापक भ्रम के कारण था कि कदाचित एक महिला प्रधानमंत्री महिलाओं की स्थिति को सही मायने में बेहतर करने की दिशा में ज्यादा कार्य कर सके। ऐसा कुछ नहीं हुआ। बुर्जुआ-उदारवादी महिला संगठनों और वामपंथी महिला संगठनों के बीच मतभेद और गहरा गए। यह स्पष्ट है कि दरार पुराने सैध्दांतिक मुद्दों पर नहीं चटकी थी अपितु उसका ताल्लुक वास्तविक महिला के रोजमर्रा के जीवन से तत्काल बहुत ही निराशाजनक तरीके से था। अन्य कई संघर्षों की तरह भारतीय नारी आंदोलन के इतिहास के लिए भी आपातकाल एक विभाजक साबित हुई। 1975 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष की की गई घोषणा के जवाब में सरकार द्वारा प्रस्तुत भारत में महिलाओं की स्थिति रिपोर्ट इसका एक कारण था। यह कहना पड़ेगा कि भारतीय नारी आंदोलन को प्रख्यात अंतर्राष्ट्रीय महिला आंदोलनों से फायदा हुआ, क्योंकि लैंगिक मुद्दों पर इनका अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं पर बड़ा प्रभाव था। भारत में हम भाग्यशाली थे कि भारतीय महिला की स्थिति रिपोर्ट, जो कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के लिए जारी की गई थी, महिलाओं की एक ऐसी समिति ने तैयार की थी जिसकी सत्यनिष्ठा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता था। इसका जो परिणाम निकला था वह एक प्रारंभिक दस्तावेज था, जिसको जांचने के लिए वह सभी स्थितियां सामने रख दी गईं जिनमें आजादी के बाद महिलाओं को फायदा और नुकसान हुआ।
आपातकाल के खिलाफ संघर्ष के दौरान कई नए महिला संगठन उभरकर सामने आए, जिन्होंने पहले से ही स्थापित महिला संगठनों की राजनीति को नकार दिया और पश्चिम में महिला संगठनों ने जो विचार सामने रखे थे उनकी ओर रुख किया। 1970 के दशक के दौरान अकादमिक विमर्श और विश्वविद्यालयों में युवा महिलाओं में लिंग संबंधी मुद्दों को काफी महत्व मिला। उदाहरण के लिए, यहां तक कि दिल्ली के कम रेडिकल माने जाने वाले कॉलेजों में 'मिश फ्रेशर' प्रतियोगिताओं के खिलाफ प्रदर्शन हुआ। यदि आपातकाल के कारण यह तय था कि इन प्रवृत्तियों का कोई परिणाम नहीं निकल सकता था, ये संगठन लोकतंत्र के लिए चल रहे आंदोलन का एक हिस्सा बनकर फूटे और बाद में स्वायत्त समूहों के रूप में उभरे। अब भारतीय महिलाओं के आंदोलन में तीन तरह की प्रवृत्तियां थीं बुर्जुआ उदारवादी, वामपंथी और स्वायत्त समूह। जल्दी ही एक चौथा भी उभर कर सामने आयागैरसरकारी संगठन, जो कि महिलाओं को सेवाएं और एवं सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए समर्पित था और जिनको महिलाओं को लाभ पहुंचाने के लिए जन राजनीति को एक साधन मानना स्वीकार नहीं था।
शुरुआती दौर में इन नई प्रवृत्तियों ने भारतीय नारी आंदोलन की परंपराओं को पूरी तरह से अनदेखा किया और उनकी अवमानना की और उनकी राजनीति संकीर्ण लिंग (जेंडर) राजनीति के इर्द-गिर्द आकार लेने लगी। पुराने महिला संगठनों की जो आलोचना की गई उसके केंद्र में यह बात थी कि महिला की परिवार में भूमिका और उसके बाद खुद के लिए निजी जगह को इन संगठनों द्वारा पूर्ण रूप से नजरअंदाज किया गया था। इस तर्क में कुछ दम तो था। महिलाओं के आंदोलन के विकास की राह मेंइसमें मैं वामपंथी महिलाओं के आंदोलन को शामिल करती हूंएक असमान और उत्पीड़ित पारिवारिक परिस्थितियों में एक महिला की भूमिका पर बहुत ध्यान नहीं दिया गया था। यह बात विवाद के परे थी कि इस सवाल का समाधान ढूंढ़ना जरूरी था। पर इससे कैसे निबटा जाए यह एक गंभीर बहस का मुद्दा बना।
                                                                                        (क्रमशः)
(भारतीय नारीःमुक्ति और संघर्ष,वृंदा कारात,अनुवाद-उषा चौहान,ग्रंथ शिल्पी,नई दिल्ली से साभार)

1 टिप्पणी:

  1. बेहतरीन आलेख साझा करने के लिय बहुत धन्यवाद. कई नये बिन्दुओं पर सोचने को बाध्य किया इस लेख ने.

    उत्तर देंहटाएं

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...