रविवार, 6 मार्च 2011

आलोचक हैं आलोचना नदारत


आज आलोचक हैं किंतु आलोचना नदारत है। अध्यक्षता करने वाले उद्धाटन करने वाले विद्वान हैं किंतु चीजों को उद्धाटित करने वाले विचारों का दूर-दूर तक पता नहीं है। कहने के लिए आलोचना के नाम पर टनों लिखा जा रहा है किंतु आलोचकीय विचार और आलोचना पध्दति का अभी तक निर्माण नहीं कर पाए। आलोचना का यह शून्य आखिरकार कब और क्यों पैदा हुआ ?

आलोचना शून्य तब पैदा होता है जब आलोचक ग्रहण करना बंद कर देता है। सामाजिक संरचनाओं पर से उसकी पकड़ छूट जाती है। हिन्दी आलोचक की मुश्किलें यहीं से शुरू होती हैं। उसे मालूम ही नहीं है कि स्वातंत्र्योत्तर समाज का ढांचा किन आधारों पर टिका है। वह सीधे कृति के संदर्भ से शुरू होता है और संदर्भ के जरिए अभीप्सित व्याख्या पेश करता है। यह आलोचना नहीं है बल्कि छात्रोपयोगी व्याख्या है,इसे ही वह अपने आलोचकीय कर्म की इतिश्री मानता है।

साहित्य शिक्षा की मांग और पूर्ति का बहुत गहरा संबंध हिन्दी आलोचना से है। हिन्दी आलोचना का सारा दारोमदार शिक्षा की जरूरतों की पूर्त्ति से जुड़ा है। आलोचना का काम शिक्षा की जरूरतें पूरी करना नहीं है। हिन्दी में रामचन्द्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी,नंददुलारे बाजपेयी, रामविलास शर्मा से लेकर आज तक के नवोदित आलोचकों तक में अधिकांश आलोचना किताबें शिक्षा की मांग- पूर्ति के सिद्धान्त के अनुसार लिखी गयी हैं।आलोचना को हमने गैसपेपर का परिष्कृत रूप दे दिया है। आलोचना की दूसरी मुश्किल यह है कि उसके पास इच्छित समाज, इच्छित अवधारणा ,इच्छित लक्ष्य और इच्छित प्रभाव का बना -बनाया ढांचा उपलब्ध है। आलोचना ने अभी तक आलोचक की इच्छा के दायरे के बाहर जाकर सोचा ही नहीं है। आलोचक का अपनी इच्छा के दायरे में बंद होकर सोचना इस बात का प्रतीक है कि आलोचक कुछ भी नया अथवा मौलिक लिखना नहीं चाहता। तयशुदा के दायरे के बाहर निकलना नहीं चाहता।

आलोचना की तीसरी बुनियादी मुश्किल है कि उसने सार्वजनिक और निजी को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में नए सिरे से कभी परिभाषित ही नहीं किया। सार्वजनिक और निजी परिवेश के सवालों को लेकर उसने कोई बहस नहीं की। आधुनिक आलोचना के नाम पर हमने जितना आत्मसात् किया है उससे कई गुना ज्यादा बहिष्कृत है। आलोचना में बहिष्कार के तत्व का फिनोमिना के तौर पर विकास हुआ है। बहिष्कार का तत्व आधुनिकता का अंश है इसे आधुनिक समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। बहिष्कार के आधार पर हमने पहले मार्क्सवाद को आधार बनाया और मार्क्सवाद के आधार पर गैर मार्क्सवादी दृष्टियों का बहिष्कार किया, उनके प्रति घृणा का प्रचार किया और अंत में मार्क्सवाद से भी दामन छुड़ा लिया। प्रगतिवाद में जो मार्क्सवादी थे एक अर्सा बाद उन्होंने आलोचना में मार्क्सवाद को तिलांजलि दे दी।

हमारी आलोचना का मूलाधार अनालोचनात्मक है। इसे व्याख्यानों और कक्षा में शिक्षकों के व्याख्यानों के जरिए प्रचार-प्रसार मिला है। अनालोचनात्मक पद्धति का मूलाधार है भाषण। हिन्दी में भाषण ही आलोचना है और आलोचना ही भाषण है। हिन्दी आलोचक इस अर्थ में आदर्श है कि उसके लेखन और वाचन में अंतर नहीं है। वह जो लिखता है वही बोलता है। बाद में साक्षात्कार को ही आलोचना बना लिया। जबकि भाषणकला, साक्षात्कार और आलोचना में बुनियादी विधागत अंतर है। साहित्य के मूल्यांकन के आधार के तौर पर जब भाषण को विकसित किया गया तो हम यह भूल गए कि इससे साहित्य की अवधारणा और भूमिका भी बदल जाएगी। आलोचना की भूमिका भी बदल जाएगी। अब साहित्य सबके लिए खुला होगा। साहित्य अब व्याख्या के लिए खुला होगा।

लोकतंत्र में साहित्य का दायरा बदलता है,नये विधारूप दाखिल होते हैं। साहित्य अब आनंद और उपभोग का हिस्सा बन जाता है। अब साहित्य स्वनिर्भर है। इसके कारण आलोचना में जिस तरह के 'तनाव' और 'एम्बीगुटी' होती है वह गायब है। अब लेखक की पूर्व पाठीय मंशाएं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। उनके आधार पर ही कृति की वाचिक व्याख्याएं हो रही है। इसके कारण साहित्य में निहित 'तनाव' और 'एम्बीगुटी' का लोप हो गया है।साहित्य के 'तनाव' और 'एम्बीगुटी' की व्याख्याएं ही थीं जिनके आधार पर साहित्य समृद्ध हुआ ,आलोचना समृद्ध हुई । अब साहित्य को 'मंशा के छद्म' के आधार पर विश्लेषित किया जा रहा है। हमने आलोचना के मानकों के आधार पर साहित्यिक कृतियों और कृतिकारों का मूल्यांकन करने की बजाय लेखक की मंशा के आधार पर मूल्यांकन पर ध्यान ज्यादा दिया है।

आजादी के बाद साहित्य और दर्शन के बीच संवाद,संपर्क और विनिमय बंद हो गया है। अब साहित्य का राजनीतिक आंदोलनों से आदान प्रदान,संपर्क और संवाद ज्यादा होता है। राजनीतिक तात्कालिकता और साहित्यिक विमर्शों के बीच गहरा अन्तस्संबंध है। शीतयुद्ध,नेहरूयुग,अंग्रेजी हटाओ-हिन्दी लाओ,आपात्काल, लोकतंत्र ,स्त्री आंदोलन, दलित आंदोलन के साथ अन्तस्संबंधों को रेखांकित करते हुए आलोचना विकसित हुई है। इस क्रम में साहित्य की आलोचना कम और राजनीतिक संवृत्तियों और आंदोलनों की व्याख्या ज्यादा हुई है। इसके कारण आलोचना का अवमूल्यन हुआ है।

इसी क्रम में आलोचकों ने साहित्य और आंदोलन के अन्तस्संबंध का सरलीकृत फार्मूला बना लिया है। तात्कालिक राजनीतिक कार्यभारों को साहित्य के कार्यभार बना दिया है। तात्कालिक राजनीतिक कार्यभारों के आधार पर ही साहित्य की व्याख्या और पुनर्व्याख्या हो रही है। साहित्य में 'खोज' और 'मूल्यांकन' के काम की जगह 'प्रयोजनमूलक साहित्य' 'प्रयोजनमूलक हिन्दी' और 'प्रयोजनमूलक आलोचना' का पठन-पाठन और लेखन हो रहा है।

अब साहित्य की शिक्षा का लक्ष्य है प्रतियोगिता परीक्षाओं में पास होने में मदद करना। फैलोशिप प्राप्त करने में मदद करना। साहित्य के अध्ययन -अध्यापन का लक्ष्य आलोचनात्मक विवेक अथवा आलोचनात्मक मूल्यांकन का नजरिया पैदा करना नहीं है। फलत: हमारे विद्यार्थी अच्छे नम्बरों से पास हो जाते हैं,स्कॉलरशिप पा जाते हैं, नौकरी पा जाते हैं किंतु साहित्यिक विचारों और अवधारणाओं से अनभिज्ञ होते हैं।साहित्य की आलोचनात्मक जांच-पड़ताल तकरीबन बंद है। फलत: पाठ के प्रासंगिक अर्थ की व्याख्या का लोप हो गया है। अब विद्यार्थी को रेडीमेड उत्तर और व्याख्याओं को पढ़ाने पर ज्यादा जोर है। रेडीमेड उत्तर इस युग का साहित्यिक अधिनायकवाद है। इसने साहित्य के विकास और आलोचनात्मक प्रसार को बाधित किया है। इसने पाठ के अर्थ को सीमित किया है। पाठ के साथ जुड़े सामयिक राजनीतिक एटीट्यूट और अर्थभेदों के अध्ययन और मूल्यांकन को पढ़ने-पढ़ाने की पध्दति का लोप हुआ है। अब अच्छा शिक्षक वही है जो पाठ के स्थिर अर्थ को पढ़ा दे। इसने साहित्य की व्याख्या में आने वाले भेदों को खत्म कर दिया है।

आधुनिक आलोचक भगवान के तंत्र और तर्कशास्त्र से मुक्त है। मध्यकाल में किसी भी चीज के घटित होने के लिए भगवान को जिम्मेदार ठहराया गया, किंतु आधुनिककाल में भगवान की जगह 'कारण' को बिठा दिया गया। अब प्रत्येक घटना,साहित्यरूप,आंदोलन , व्यक्ति,अस्मिता आदि के 'कारण' की खोज पर जोर दिया गया। मध्यकाल को जानने अथवा समझने का अर्थ था मध्यकाल के कारणों को जानना। 'कारण' समाज में था किंतु समाज को खोले बिना हमने कारण के प्रयोग की कला विकसित कर ली। यह मूलत: संस्कृत काव्यशास्त्र की कला है। मध्यकालीन कला है। इसका दुष्परिणाम यह निकला कि साहित्य और आलोचना में अध्यात्मवाद की जड़ें बरकरार रहीं। साहित्यकारों के जीवन में ईश्वर की सत्ता बनी रही। लेखकों में अध्यात्मवाद का विकास हुआ। साहित्यकार का धर्मभीरू भाव बना रहा। स्वातंत्र्योत्तर आधुनिक आलोचना ने लेखक के धर्मभीरू और अध्यात्मवादी तंत्र को कभी निशाना नहीं बनाया।

आज जब हम आलोचना और साहित्य के बारे में बातें कर रहे हैं तो मूल परिदृश्य बदल चुका है। विगत साठ सालों में अनेक बदलाव आए हैं। नए बदलाव ये हैं,पहला, आज व्यापक स्तर पर हिन्दी साहित्य का पठन-पाठन हो रहा है। पठन-पाठन में शिक्षा संस्थानों की बड़ी भूमिका है। संस्थानों के कारण ही हिन्दी की अस्मिता,पहचान और अनुशासन के रूप में भूमिका तय हुई है। आज हिन्दी को लेकर कोई भी विवाद उठता है तो सिर्फ साहित्यिक अथवा प्रोफेशनल विवाद नहीं होता। बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विवाद बन जाता है। इस तरह के विवाद सार्वजनिक तौर पर ध्यान आकर्षित करते हैं।दूसरा, हिन्दी साहित्य में कालविभाजन का अंत हो गया है। अब साहित्य में सामाजिक,लिंगीय और एथनिक आधारों के आधारों पर वर्गीकरण किए जा रहे हैं। अब किसी प्रवृत्ति विशेष का वर्चस्व नहीं रहा। तीसरा ,साहित्य और साहित्यकार अब बाजार और सत्ता के मूल्यांकन के आधार पर पहचाना जाता है। इसका साहित्य विमर्शों पर भी असर पड़ा है। फलत: आत्मगत मूल्यांकन ज्यादा हुआ है अकादमिक मूल्यांकन कम हुआ है। जो लेखक बाजार और सत्ता के गलियारों में सफल है वही अकादमिक जगत में भी सफल है।चौथा , पेशेवर नजरिए से साहित्य का मूल्यांकन कम हुआ है। साहित्य सैद्धान्तिकी के वैविध्यपूर्ण प्रयोगों की तरफ ध्यान ही नहीं दे पाए हैं। फलतःपेशेवर आलोचना का अभाव अभी भी बना हुआ है । हमारे यहां पेशेवर लेखक हैं किंतु पेशेवर आलोचक नहीं हैं। ऐसी आलोचना नहीं है जिसमें अकादमिक अनुशासन हो।

हिन्दी साहित्यालोचना में मीडिया में व्यक्त नए मूल्यों और मान्यताओं के प्रति संदेह,हिकारत और अस्वीकार का भाव बार-बार व्यक्त हुआ है। इसका आदर्श नमूना है परिवार के विखंडन खासकर संयुक्त परिवार के टूटने पर असंतोष का इजहार। एकल परिवार को अधिकांश आलोचकों के द्वारा सकारात्मक नजरिए से न देख पाना। सार्वजनिक और निजी जीवन में 'तर्क' की बजाय 'अतर्क' के प्रति समर्पण और महिमामंडन। आजादी के बाद की आलोचना की केन्द्रीय कमजोरी है कल्याणकारी राज्य की सही समझ का अभाव। सार्वजनिक और निजी के रूपान्तरण की प्रक्रियाओं का अज्ञान। सच यह है कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य की सांस्कृतिक भूमिका के बारे में हमने कभी विचार नहीं किया गया। उलटे कल्याणकारी राज्य का महिमामंडन किया है अथवा खारिज किया है।

'प्रशंसा' और 'खारिज करना' ये दोनों ही अतिवादी नजरिए की देन हैं। इनका सही समझ के साथ कोई संबंध नहीं है। कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य का अर्थ सब्सीडी, राहत उपायों अथवा सार्वजनिक क्षेत्र के कारखानों का निर्माण करना ही नहीं है। अपितु कल्याणकारी राज्य आंतरिक गुलामी भी पैदा करता है। कल्याणकारी राज्य ने दो बड़े क्षेत्रों के चित्रण पर जोर दिया पहला-परिवार,इसमें भी मध्यवर्गीय परिवार पर जोर रहा है, चित्रण का दूसरा क्षेत्र है राजसत्ता और बाजार। स्वातंत्र्योत्तर अधिकांश साहित्य इन दो क्षेत्रों का ही चित्रण करता है।

कल्याणकारी राज्य साहित्य को 'सैलीब्रिटी', प्रदर्शन, नजारे, तमाशे,बहस आदि की केटेगरी में पहुँचा देता है, कृति और साहित्यकार को सैलीबरेटी बना देता है। अब साहित्य और साहित्यकार के प्रदर्शन और सार्वजनिक वक्तव्य का महत्व होता है किंतु उसका कोई असर नहीं होता।लेखक के बयान अथवा कृति को साहित्येतिहास का हिस्सा माना जाता है। लेकिन उसका सामाजिक -राजनीतिक तौर पर गंभीर असर नहीं होता, लेखक की जनप्रियता बढ़ जाती है। किंतु सामाजिक संरचनाओं पर उसका प्रभाव नहीं होता। साहित्य और लेखक अप्रभावी घटक बनकर रह जाता है। लिखे का सामाजिक रूपान्तरण नहीं हो पाता। इस प्रक्रिया में कल्याणकारी राज्य आलोचक को बंधुआ बना लेता है। आप लिखे पर बहस कर सकते हैं किंतु भौतिक,सामाजिक और सांस्कृतिक शक्ति के रूप में उसे रूपान्तरित नहीं कर सकते। अब साहित्य और साहित्यकार दिखाऊ माल बनकर रह जाते हैं। अब साहित्यालोचना उपयोगिता के नजरिए से लिखी जाती है,आलोचकगण सामयिक मंचीय जरूरतों के लिहाज से बयान देते हैं। यह एक तरह का साहित्यिक प्रमोशन है। साहित्य प्रमोशन और तद्जनित आलोचना का मासकल्चर के प्रसार के साथ गहरा संबंध है। मासकल्चर का प्रसार जितना होगा साहित्य में प्रायोजित आलोचना का उतना ही प्रचार होगा। प्रायोजित आलोचना मासकल्चर की संतान है।







2 टिप्‍पणियां:

  1. हिन्दी आलोचना भी सामंतवादी सोच का शिकार रही है। सामंत को जो पसन्द है वही उसके लगुवे भगुवे पसन्द करते है।जो सामंत खारिज कर देता है वो सभी उसके चेले खारिज करते चले जाते हैं। बडे आलोचक बडे प्रापर्टी डीलर की तरह व्यवहार करते हैं।साहित्य मे आज बडी किताब वही है /बडा लेखक वही समझा जाता है जिसको लेकर कुछ तथाकथित आलोचको ने टिप्पणी की हो,यही तो सामंतवादी सोच है।

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  2. आज की आलोचना का आधार गुट पर आधारित होता है- अर्श पर चढाओ या फ़र्श पर गिराओ :)

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