सोमवार, 9 जून 2014

माकपा की इमेज दांव पर

          माकपा इस समय सबसे गहरे संकट में है। जिस तरह का संकट फिलहाल माकपा के सामने है वैसा उसने पहले कभी महसूस नहीं किया। खासकर प्रकाश कारात को महासचिव बनाए जाने के बाद से माकपा को आम जनता में साख के संकट से गुजरना पड़ रहा है। माकपा की साख में बट्टा लगा है और उसके लिए माकपा सामूहिक तौर पर जिम्मेदार है।

माकपा के साधारण सदस्यों को आज जितनी जिल्लत आम लोगों में झेलनी पड़ रही है उतनी पहले कभी नहीं झेलनी पड़ी । माकपा पर पहले कईबार राजनीतिक हमले हुए हैं लेकिन एक संघर्षशील दल के रुप में उसकी साख बनी रही। लेकिन प्रकाश कारात की लीडरशिप में माकपा की संघर्षशील दल की इमेज पूरी तरह खत्म हो गयी है। यह संयोग है कि यूपीए-1 सरकार के अंतिम साल में कांग्रेस के साथ जो मुठभेड़ हुई उसमें माकपा को मनमोहन सिंह पूरी तरह बर्बाद करने में सफल रहे।

एक जमाना था माकपा को मजदूरों-किसानों की जंगजू पार्टी के रुप में लोग जानते थे लेकिन इनदिनों उसकी यह इमेज गायब हो चुकी है। त्रासद बात यह है कि माकपा का नेतृत्व इस चीज से वाकिफ होते हुए भी कोई सटीक कदम नहीं उठा पा रहा है। बार बार स्टीरियोटाइप बातें मीटिंगों में कही जा रही हैं, रिव्यू में कही जा रही हैं। माकपा जिस संकट में है उसमें पार्टी की स्टीरियोटाइप बातें मदद नहीं करेंगी और नहीं स्टीरियोटाइप लोग ही मदद कर पाएंगे। माकपा के सामने आज इमेज का संकट है,साख का संकट है।

माकपा की इमेज को हाल के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा झटका इस बात से लगा है कि इस पार्टी के समर्थकों का एक हिस्सा खुलेआम मोदीलहर की भेंट चढ़ चुका है और अभी जो समर्थक हैं वे भविष्य में पार्टी के साथ रहेंगे इस पर भी संदेह है।

माकपा की इमेज को जो संकट पैदा हुआ है उसका प्रधान कारण है माकपा नेतृत्व का नयी पूंजीवादी वास्तविकताओं के अनुरुप वैकल्पिक यथार्थवादी लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली का विकास न कर पाना। साथ ही व्यवहारवादी राजनीति में प्रभावशाली न हो पाना।

माकपा के नेतृत्व को सोचना होगा कि नयी पार्टी कैसे बनाएं। माकपा का अभी जो ढ़ांचा है वह एकसिरे से अप्रासंगिक हो चुका है। उसमें कोई पारदर्शिता नहीं है। पार्टी के नाम पर बंद कोठरियां हैं जिनमें बैठकर पार्टी कैडर और नेता काम करते हैं। पार्टी कैसे खुले में काम करे और पार्टी सदस्य किस तरह खुलेरुप में आम जनता में काम करें,बोलें,रीयलटाइम में हस्तक्षेप करें,कैसे आम लोगों से लिबरल धरातल पर मिलें और संवाद करें,किस तरह पार्टी सदस्य और नेता अपने को लोकतांत्रिक बनाएं आदि समस्याओं पर खुले में बहस चलानी होगी। माकपा को एक क्रांतिकारी और लिबरल दोनों के बीच में संतुलन से काम करने की आदत डालनी होगी। कार्यक्रम क्रांतिकारी हो, लेकिन आचार-व्यवहार और संवाद लिबरल हो। लक्ष्य क्रांति हो लेकिन लिबरल मार्ग पर चलकर किस तरह आम जनता का दिल जीतें,सदस्यों,पूर्व सदस्यों और गैर पार्टी जनता से कैसे संबंध बनाएं इस पर पुराने फ्रेमवर्क के बाहर निकलना होगा।

माकपा का पुराना फ्रेमवर्क कंजरवेटिव है। अनुदार है। इसमें संवाद,विवाद एकतरफा होता है। इसमें नेता कहते हैं और कार्यकर्ता अनुकरण करते हैं। नेता सोचते हैं और जनता दर्शक रहती है,कैडर गूंगा अनुयायी होता है। इंटरनेट युग में इस तरह का इकतरफा ढांचा पार्टी को संवादहीन मशीन बना देता है। पार्टी मेम्बर रोबोट की तरह काम करते हैं,रोबोट की तरह बोलते हैं और रोबोट की तरह दैनंदिन जीवन में आम लोगों से व्यवहार करते हैं। पश्चिम बंगाल में तो 34 साल के वाम शासन में स्थितियां बेहद त्रासद और पीडादायक दशा में पहुँच गयी थीं।

माकपा के अनुदार ढांचे के कारण पश्चिम बंगाल में चमचे और दलालवर्ग की पार्टी में हैसियत बढ़ गयी, पार्टी का विभिन्न स्तरों पर अपराधीकरण हुआ।समूचा पार्टी तंत्र कमोबेश इनलोगों के हाथों बंधक है।

पार्टी की सारी सद-इच्छाएं बेकार हैं यदि वह पार्टी का आंतरिक और बाहरी तंत्र नहीं बदलती। माकपा के पार्टी तंत्र में नेता के अलावा सब चुप रहते हैं। नेता की मनोदशा पूरी तरह अ-लोकतांत्रिक रही है। नेता किसी भी स्तर पर लोकतंत्र का सम्मान नहीं करते और न लोकतांत्रिक नजरिए को सम्मान की नजर से देखते हैं। इसका सीधे असर यह हुआ कि आम जनता में जहां पर माकपा का असर रहा है वहां पर भी कंजरवेटिव तत्व या असामाजिक तत्व बेहद ताकतवर बन गए और अब वे और भी ज्यादा अनुदारवाद और अपराधीकरण की मांग करने लगे या और भी ज्यादा अनुदारदलों और अपराधी तत्वों की ओर जा रहे हैं।

ध्यान रहे लोकतंत्र में कंजरवेटिव भावबोध का जितना प्रचार करेंगे अनुदारवाद बढ़ेगा। आमलोगों को लिबरल बनाना हमारा लक्ष्य होना चाहिए। लेकिन माकपा ने क्रांति और पार्टी के नाम पर जो ढ़ांचा और व्यवहार आम जनता में विकसित किया उसने उदारवाद की बजाय अनुदारवाद को ज्यादा पुख्ता बनाया। हमारे इर्दगिर्द जो अनुदारवादी लहर दक्षिणपंथ के नाम पर दिखाई दे रही है उसे निर्मित करने में माकपा के अनुदारवादी रवैय्ये की भी भूमिका रही है। वामपंथी अनुदारवाद की कमजोरी है वह दक्षिणपंथी अनुदारवाद की लहर के सामने टिक नहीं पाता।

माकपा सुधरे इसकी पहली शर्त है कि वह सभी किस्म के अनुदारवाद के खिलाफ पार्टी के अंदर और बाहर जमकर संघर्ष करे। नेताओं-कैडर आदि को खुलकर बोलने, संवाद करने और लोकतंत्र का सम्मान करने की शिक्षा दे। लोकतंत्र का सम्मान और लोकतांत्रिक आचरण को विकसित किए बिना यह संभव नहीं है।

इंटरनेट युग में माकपा ने यदि जल्द ही अपने को पुराने फ्रेमवर्क से बाहर नहीं निकाला तो उसके सामने अप्रासंगिकता का खतरा पैदा हो जाएगा। लोकसभा चुनाव परिणाम बताते हैं कि केरल और पश्चिम बंगाल में माकपा का जनाधार तेजी से खिसक रहा है और उसके वोटर भाजपा की ओर भाग रहे हैं। जनता जब एकबार साथ छोड़ देती है तो वापस विश्वास जीतना कठिन होता है। यही वजह है कि समूचे उत्तर भारत में माकपा नदारत है। उत्तरभारत में माकपा या वाम के केन्द्र खत्म हो गए हैं। अब केरल-पश्चिम बंगाल की बारी है।



1 टिप्पणी:

  1. कुछ समय पहले सुना था कि वामपंथी वेदों में समाजवाद और साम्‍यवाद की जड़ें खोज रहे हैं, तब लगा कि अब वामपंथ में थोथे या कहें आधे अधूरे मार्क्‍सवाद के इतर कुछ ताजा बयार आएगी, लेकिन चुनाव तक देखा कि वही ढाक के तीन पात ही रहे...


    दस सालों के महाघटिया शासन के बाद क्रांति होनी थी, लेकिन अरविंद केजरीवाल की नंगई और भाजपा के स्‍मार्ट प्रचारतंत्र ने क्रांति का गला घोंट दिया।

    आखिरकार लोगों ने अधकचरे वामपंथ की तुलना में फ्यूडल दिखाई देने वाले मोदी का चुनाव करने में समझदारी समझी...


    अब भी नहीं सुधरे तो भारत में वामपंथ हास्‍य और इतिहास बोध बनकर रह जाएगा...


    आपके लेख से बहुत हद तक सहमत हूं।

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