रविवार, 14 अगस्त 2016

जीवन में माधुर्य की तलाश में-

              मैं पेशे से प्रोफेसर हूँ,कलकत्ता विश्वविद्यालय में पढाता हूं,कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट में हमारा विश्वविद्यालय है,यह मेरे घर से मुश्किल से पांच किलोमीटर दूर है।मैं अपने घर से कुछ दूर पैदल चलकर काकुरगाछी चौराहे तक जाता हूँ,वहां से शेयर का ऑटो लेता हूँ और फूलबागान उतरता हूँ फिर फूलबागान से कॉलेज स्ट्रीट बाटा के लिए ऑटो लेता हूँ,वहां उतरकर एक फर्लांग के करीब पैदल चलकर विश्वविद्यालय पहुँचता हूँ।मात्र 30 रूपये में आना जाना।कभी कभार टैक्सी से जाताहूँ। आमतौर पर सामान्य अवस्था में मात्र 20 मिनट में मैं विश्वविद्यालय पहुँच जाता हूँ।इसके बाद बमुश्किल पांच-दस मिनट शिक्षक मित्रों से गप होती है और उसके बाद कक्षा में और वहां मुझे दो पूीरियड पढ़ाने होते हैं,कभी एमए,कभी एमफिल और कभी पीएचडी की कक्षा में भी जाना होता है।लेकिन कुल मिलाकर दो घंटे की नौकरी है लेकिन इन दो घंटों के लिए घर पर मेहनत बहुत करनी पड़ती है।पहले समय बहुत खर्च होता था इधर कम,लेकिन कोई नई रिसर्च या नई किताब सामने आती है तो तैयारी में समय बहुत लगता है।

इस समूची प्रक्रिया में किताबें मेरी सबसे बड़ी मित्र हैं।वे मुझे सभी किस्म की तकलीफों से दूर रखने में मदद करती हैं।मान-अपमान के कष्ट से मुक्त करने का काम करती हैं।कमीने किस्म के लोगों की संगत और प्रतिक्रियाओं से मुक्त रखने का काम करती हैं।मुझे कभी -कभी लगता है किताबें न हों तो बुद्धिमान लोग अकालग्रस्त होकर मर जाएं।किताबें हमारे समाज की वह भूख मिटाती हैं जिसे आप अन्य तरीकों से नहीं मिटा सकते।

मेरी तमाम कठिनाईयों में किताबों ने सबसे ज्यादा मदद की है,आप यह भी कह सकते हैं कि मैं कायर हूँ इसलिए किताबों में सिर गढ़ाए बैठा रहता हूँ।लेकिन यह हकीकत है किताबें न होतीं तो जालिम लोग जीने न देते।मैं बार बार जालिमों से कहता हूं तुम अपना काम करो ,हम अपना काम करते हैं,देखते हैं समाज में कौन सी चीज बचती है,जालिमाना हरकतें या किताबों के पाठक-लेखक।

मैंने काफी गणित लगाया और पाया कि मुझे विश्वविद्यालय में पूरे महिने में मात्र 24घंटे से ज्यादा का काम नहीं है।इसलिए बाकी समय मैंने किताबों के हवाले कर दिया।मेरे कोलकता में बहुत कम मित्र हैं। उनकी संख्या न बताऊं तो ही अच्छा है।लेकिन हजारों लोग मुझे जानते हैं,मैं आमतौर पर आवारागर्दी नहीं करता,हां कभी कभी माल में जाकर नेत्रसुख जरूर लेता हूँ।आईसक्रीम खा लेता हूँ,कभी सिनेमा देख लेता हूँ,चाय पी लेता हूँ।लेकिन यह भी बहुत कम।

लेकिन बाजार में चलते लोग,बंगलाभाषा बोलते लोग,खासकर बंगाली औरतों की भाषा मुझे बहुत अच्छी लगती है।वे आमतौर बहुत सुंदर भाषा में बोलती हैं,वह माधुर्य हिन्दीभाषी औरतों में कम है।

आप मुझे कुछ भी कह सकते हैं,जेएनयूवाले -मथुरावाले पंडितजी कहते हैं,कुछ लोग कॉमरेड कहते हैं,कुछ मानते हैं मैं मोदी का भक्त हूँ,कुछ का मानना है मैं मार्क्सवादी हूँ,कुछ देवीवाले के नाम से जानते हैं,कुछ भाईसाहब कहकर काम चला लेते,छात्र-छात्राओं के लिए जेसी हूँ,कुछ प्यार करते हैं तो कुछ बेइंतिहा नफरत करते हैं। कुछ मेरी किताबें पढ़ते हैं,खरीदते हैं,कुछ हैं जो किताबों को नफरतभरी निगाहों से देखते हैं।कुछ का मानना है मेरा लेखन कचरा है,कुछ को काम का लगता है।

कुछ की नजर में मैं बहुत खराब इंसान हूँ,कहने का आशय यह कि मेरे अंदर इंसान के अच्छे-बुरे दोनों ही किस्म के गुण हैं।मैं अनेकबार झूठ भी बोलता हूँ,मंदिर जाता हूँ लेकिन भगवान को नहीं मानता ,भगवान के नाम पर चढावा पाता हूँ लेकिन मैं कभी किसी का अपमान नहीं करता,गाली भी देता हूँ,लेकिन गालियों को नापसंद करता हूँ।शराब नहीं पीता लेकिन पीने वालों से मित्रता रखता हूं,पीने को बुरा नहीं मानता,मांसहारी नहीं हूँ लेकिन मांसाहारी मित्रों के साथ बैठकर खाना खाता हूँ।मैं पैदाइशी हिन्दू हूँ लेकिन हिन्दुओं के कोई गुण-अवगुण मेरे अंदर नहीं हैं।

घंटों सोचता रहता हूँ,समाज की समस्याओं से परेशान रहता हूँ,उन पर अपने विचार जाहिर करता रहता हूं,लेकिन अपनी निजी समस्याएं कभी सार्वजनिक नहीं करता,दुख अपने अंदर रखता हूँ,मुझे गम खाने की आदत है।सपने देखकर गुजारा करता हूँ।हकीकत से डरता हूँ।हकीकत हमेशा खौफनाक नजर आती है।अकेले में रोता हूँ,केले-अमरूद-पपीता आदि खाता हूँ,कम अक्ली पर गुस्सा आता है,अक्लवालों पर फिदा रहता हूँ.शिक्षित हूँ,लेकिन बीच-बीच में झुंझला जाता हूँ.सरकार और नेताओं से कभी डर नहीं लगता,लेकिन सामान्य सी गलती करके डरने लगता हूँ।मजदूर और किसान और उनकी राजनीति अच्छी लगती है,इंकलाबी जोश अच्छा लगता है लेकिन भजनों में रस पाता हूँ।पता नहीं मैं ऐसा क्यों हूं ?



मेरे अनेक मित्र सलाह देते हैं मैं सब कुछ फेसबुक पर न लिखा करूँ। लोग तुम्हारे विचार चुरा लेते हैं और तुम्हारा जिक्र तक नहीं करते,मैं हंसता हूूं और कहता हूूं विचार ही तो चुरा रहे हैं,चुराने दो समाज के काम आएंगे,हमारा मकसद भी तो यही है कि हमारे विचार ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचें।एक दूसरे मित्र ने कहा इतना कैसे लिख लेते हो भाई, मैंने कहां बस कम्प्यूटर खोला,बटन दबाया और विचार चालू।मित्र बोला यार हम भी कम्प्यूटर खोलते हैं,फेसबुक पर जाते हैं लेकिन दिमाग में विचार ही नहीं आते,तुम इतना जल्दी कैसे लिख लेते हो,मैंने कहा विचार तो मेरे जेब में सब समय पड़े रहते हैं।मंटोकी भाषा में कहूूँ कि मैं फेसबुक पर अपनी ही जेब काटता रहता हूँ।अपनी जेब काटता हूूँ और फेसबुक मित्रों के हवाले कर देता हूँ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...