सोमवार, 2 मई 2016

भगतसिंह को आतंकवादी-क्रांतिकारी किसने कहा ॽ

         जिस देश में मूर्ख मंत्री हो उस देश की भगवान भी रक्षा नहीं कर सकते ! मूर्ख मंत्री अपने को ज्ञानी की तरह पेश कर रहे हैं,ज्ञानियों को वे अज्ञानी करार दे रहे हैं।इसे कहते हैं बुद्धिजीवी विरोधी माहौल।हाल में भगतसिंह के मामले में जिस तरह का आचरण केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने किया है उसकी मिसाल भारत में मिलनी मुश्किल है।ईरानी के भक्त कमाल के ´अक्लमंद´ हैं जो बिना पढ़े ही हल्ला करने लगते हैं ! कहने को ये सब टैक्नोसेवी हैं लेकिन अक्ल से एकदम पैदल ! बेबकूफी और संचार क्रांति का विरल सह-संबंध इन दिनों हम भारत में देख रहे हैं ! वे हल्ला कर रहे हैं इतिहासकार विपन चन्द्रा ने भगतसिंह को ´आतंकवादी क्रांतिकारी´क्यों लिखाॽ कभी ठीक से इतिहास पढ लिया होता तो इस सवाल का उत्तर भी मिल जाता !

भारत में क्रांतिकारी आंदोलन के प्रवर्तकों में से एक थे डा.भूपेन्द्रनाथ दत्त ,उनकी एक किताब है ´अप्रकशित राजनीतिक इतिहास,(नवभारत पब्लिशर्स,कलकत्ता 1953) ।यह पूरी किताब क्रांतिकारियों के कारनामों से भरी है।इस किताब की भूमिका में उन्होंने लिखा है ´ क्रांतिकारियों का वास्तविक कार्य,जिसे ´आतंकवाद´कहा जाता है,आंदोलन का बाह्य प्रकाश मात्र था।पराधीनता की ग्लानि जब जब असह्य हो उठी,तब तब सभी देशों में देशप्रेम का प्रकाश आतंकवाद के रूप में दीख पड़ा।आतंकवाद जन-आंदोलन नहीं, बल्कि निष्फल प्राणों का कूड़ा-करकट जलाकर देशप्रेम की आग प्रज्वलित करने का प्रतीक है।´

स्वाधीनता संग्राम के दौरान आतंकवाद के बारे में डा.भूपेन्द्रनाथ दत्त के उपरोक्त कथन के जरिए उसके चरित्र,प्रकृति और उत्पत्ति के बारे में सरल ढ़ंग से समझ सकते हैं। अब हमसे यह न पूछो कि भूपेन्द्र दत्त कौन हैं ॽ इंटरनेट पर जाओ पता चल जाएगा ! स्वामी विवेकानंद के पास जाओ पता चल जाएगा ! उस जमाने में रूसी आतंकवाद से भारत के क्रांतिकारी किस तरह प्रभावित थे,इस पर उस दौर में ´मॉडर्न रिव्यू´ने लिखा ´हमारे सबसे बड़े रेडीकल राज्य सचिव को अवश्य ही बम फेंकनेवाला पैदा करने के अद्वितीय कृतित्व का श्रेय मिलना चाहिए।बंगाल में आतंकवाद के अंतिम कारण को सरकार की सोलहों आने स्वार्थी,स्वेच्छाचारी और अत्याचारी नीतियों में खोजना होगा। उसे खोजना होगा उस घृणापूर्ण और अपमानजनक तरीके में जिसे अधिकांश सरकारी और गैरसरकारी एंग्लो-इंडियनों ने बंगालियों के प्रति मंतव्य प्रकट करने और उनसे व्यवहार करने में अपनाया है।उन्होंने बंगालियों की भावनाओं को बूटों तले रौंदा है और उनके तथ्यों तथा आंकड़ों द्वारा समर्थित सबसे बड़े और सबसे तर्कसंगत आवेदनों पर जरा भी कान नहीं दिया। भावना और तरीकों में प्रशासन के रूसीकरण ने जनता के एक छोटे से हिस्से को रूसी आतंकवाद के तरीकों को अपनाने को बाध्य कर दिया है।´



भारत में आतंकवादी क्रांतिकारी´ आंदोलन की परंपरा बहुत पुरानी है।इसे आजकल के आतंकियों के साथ एकमेक नहीं करना चाहिए।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन सत्यजीत रे और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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