गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

श्रेष्ठताः विभ्रम या नरक


           ( हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर)
      राजकिशोर जी का वर्धा की कवि चतुष्टयी संगोष्ठी पर आलेख देखकर यह तो पता चल गया कि हिन्दी साहित्य में श्रेष्ठता और श्रेष्ठत्व के भूखों का अभी भी अकाल नहीं पड़ा है । (http://mohallalive.com ) इससे यह भी पता चला कि हिन्दी में आधुनिकतावाद बचा है। यह सिद्ध होता है कि हिन्दी के नामी-गिरामी लोगों पर नागार्जुन-शमशेर-केदार की तुलना में अज्ञेय का गहरा असर है। वर्धा का वातावरण जैसाकि राजकिशोर जी ने लिखा है श्रेष्ठतामय था। यह अज्ञेय की जीत है।
     महात्मा गांधी विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय संगोष्ठी की खबर है कि वहां श्रेष्ठों का संगम हुआ था और श्रेष्ठों को ‘‘ सूर्य की रश्मियों का पूरा स्पेक्ट्रम’’ कहा है राजकिशोरजी ने। इससे कम से कम अज्ञेय की आत्मा को शांति जरूर मिलेगी। हिन्दी में श्रेष्ठता के लेखक के रूप मे अज्ञेय विख्यात हैं। पता नहीं नामवरजी को कैसा लग रहा होगा जब कोई वरिष्ठ पत्रकार और ऐसा पत्रकार जिसके समाजवादी विवेक का हिन्दी जगत लोहा मानता हो। ऐसा पत्रकार जिसने सारी जिंदगी श्रेष्ठों और श्रेष्ठियों के खिलाफ लिखा हो,उसके लेखन में श्रेष्ठता का जयगान नामवरजी को कैसा लग रहा होगा ?
    मैं जहां तक नामवरजी को जानता हूँ वे श्रेष्ठता से नफरत करते हैं, वे महानता से भी घृणा करते हैं। यह बात दीगर है कि उनके भक्त उन्हें कुछ भी बनाने पर तुले हैं। राजकिशोरजी ने लिखा है मैंने ‘‘पहली बार लक्ष्य किया कि श्रेष्ठता के संपर्क में आने पर हम कैसे अचानक थोड़ा ऊपर उठा अनुभव करने लगते हैं।’’
  अरे भाई हिन्दी के प्रोफेसरों को काहे को पोदीना के पेड़ पर चढ़ाए दे रहे हैं। वे अगर श्रेष्ठ होते तो हिन्दी के प्रोफेसर नहीं होते कुछ और होते। हिन्दी के प्रोफेसरों के बारे में मुक्तिबोध ने लिखा था -''बटनहोल में प्रति‍नि‍धि पुष्‍प लगाए एक प्रोफ़ेसर साहि‍त्‍यि‍क से रास्‍ते में मुलाकात होने पर पता चला कि हि‍न्‍दी का हर प्रोफेसर साहि‍त्‍यि‍क होता है। पने इस अनुसन्‍धान पर मैं मन ही मन बड़ा खुश हुआ। खुश होने का पहला कारण था अध्‍यापक महोदय का पेशेवर सैद्धान्‍ति‍क आत्‍मवि‍श्‍वास। ऐसा आत्‍मवि‍श्‍वास महान् बुद्धि‍मानों का तेजस्‍वी लक्षण है या महान् मूर्खों का दैदीप्‍यमान प्रतीक ! मैं नि‍श्‍चय नहीं कर सका कि वे सज्‍जन बुद्धि‍मान हैं या मूर्ख ! अनुमान है कि वे बुद्धि‍मान तो नहीं, धूर्त और मूर्ख दोनों एक साथ हैं।' मेरे ख्याल से हिन्दी प्रोफेसरों के बारे में मुक्तिबोध सटीक बात कह रहे हैं।  
    श्रेष्ठता सामाजिक जीवन का सबसे बड़ा विभ्रम है,छल है। इसके प्रभाव के कारण यथार्थ नजर नहीं आता। यही वजह है श्रेष्टों का संसार वास्तव संसार से कटा होता है। 

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