मंगलवार, 9 जून 2015

ग़ज़ल के रुपान्तरण की प्रक्रिया


आधुनिककाल आने के बाद ग़ज़ल का रुप वही नहीं रह गया जो उसके पहले था। खासतौर पर उपन्यास विधा और अखबारों के उदय और प्रसार  ने ग़ज़ल के विधागत चरित्र को सीधे प्रभावित किया। प्रेस और उपन्यास ने आधुनिककाल में यथार्थवादी नजरिए ,विस्तीर्ण भाव से लिखने और समसामयिकता को साहित्य-सृजन का अनिवार्य अंग बनाया। इससे लेखक,लेखन और समाज के बीच में नए किस्म के रिश्ते, नए किस्म के लेखकीय संस्कारों की शुरुआत हुई। यही वजह थी कि गालिब को यह कहना पड़ा 'कुछ और चाहिए वुसअत मेरे बयाँ के लिए'
      गालिब पहले बड़े शायर हैं जिन्होंने ग़ज़ल को नई जिन्दगी दी,नए विषयों और नए नजरिए की ओर मोड़ा।ग़ज़ल को दैनन्दिन जीवन की घटनाओं और सामयिक राजनीतिक घटनाओं से जोड़ा। पहलीबार ग़ज़ल को आंदोलन और राजनीति से सीधे जोड़ने की परंपरा आरंभ हुई। गालिब ने जो सिलसिला आरंभ किया उसे पं.वृजनारायण चकबस्त ने नई बुलंदियों पर पहुँचाया। देशभक्ति और राजनीतिक आंदोलनों से ग़ज़ल को सीधे जोड़ा।
     उल्लेखनीय है ग़ज़ल लिखने वाले शायरों में कई विचारधाराओं के मानने वाले लोग थे।ग़ज़ल एक ही विचारधारा के दायरे में नहीं रही है। इसमें दलीय पक्षधरता भी रही है। नये और पुराने के बीच में वैचारिक और सर्जनात्मक जंग भी रही है।  लोग कहते हैं ग़ज़ल सूत्र है,नज्म भाष्य है।ग़ज़ल संकेत है,नज्म स्वीकृति।नज्म काव्य है,ग़ज़ल सूक्ति है। नज़्मों में समसामयिक घटनाओं और रीतिरिवाजों के बारे में जमकर लिखा गया। इससे नज़्म और राजनीति, नज़्म और आंदोलन,नज़्म और समसामयिकता का नया अंतस्संबंध सामने आया। खासकर राजनीतिक विषयों पर लिखी नज़्में  खूब जनप्रिय हुईं। इस तरह की रचनाओं का तात्कालिक असर खूब होता था,लेकिन तात्कालिक जरुरत खत्म होते ही ये बेकार हो जाती हैं, यह सिलसिला आज भी बरकरार है।
      नज़्म से विचारधारात्मक प्रौपेगैण्डा में बहुत मदद मिली।  आशय यह कि प्रचार खत्म तो नज़्म भी खत्म। इसके विपरीत ग़ज़ल में विधा के तौर पर दीर्घजीवी भाव रहा है। मजेदार बात है उर्दू के तमाम बड़े शायरों ने नज़्म और ग़ज़ल दोनों लिखी हैं। वे इन दोनों ही रुपों का समय देखकर इस्तेमाल करते थे। तमाम प्रगतिशील शायरों की जनप्रियता में नज़्म की भी  भूमिका रही है।
    ग़ज़ल में अप्रत्यक्ष और संकेतात्मक शैली प्रमुख रही है। एक शायर ने लिखा भी है कि ग़ज़लका वार पत्थरकी तरह सीधे न होकर दुशालेमें लिपटा हुआ होता है। ग़ज़ल में कहना है तो उसकी सीमाओं में रहकर ही कह सकते हैं । मसलन्, दानीसे शायर 'अदम' कह रहा है-
' शिकन न डाल जबींपर शराब देते हुए।
यह मुसकराती हुई चीज़ मुसकराके पिला।।'
अब यदि कोई कमअक्ल इसे मयखाने के लिए लिखी शायरी समझे तो हम क्या करें! इसीलिए कहा गया है  ग़ज़ल को जानने के लिए गहरे साहित्यबोध की जरुरत होती है। उसे साहित्यिक कॉमनसेंस या यांत्रिक ढ़ंग से नहीं समझा जा सकता।
मसलन्, व्यवस्था परिवर्तन के सवाल पर आनंदनारायण मुल्ला का यह शेर देखें-
'' निजामे-मैकदा साक़ी! बदलनेकी जरुरत है।
 हजारों हैं सफें जिनमें , न मैं आई, न जाम आया।। ''
ढोंगी और नेताओं पर 'मीर' ने लिखा-
    '' मसजिदमें इमाम आज हुआ,आके वहाँसे।
     कल तक तो यही 'मीर' ख़राबत नशीं था।।'
चेतावनी के प्रसंग में 'मीर' का शानदार शेर पढ़ें-
  '' ऐ वोह कोई जो आज पिये है शराबे-ऐश।
   ख़ातिरमें रखियो कलके भी रंजो-ख़ुमारको।।''

कहने का आशय यह कि ग़ज़लगो शायर हर बात इशारेमें और परदेमें बयान करता है। यही वजह है कि कभी वह विश्ववेदनाको अपनी वेदना बनाकर ग़मे-जानाँके परदे में पेश करता है। मसलन्, '' जो ग़म हुआ,उसे ग़मे –जानाँ बना लिया।।''      

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन दर्द पर जीत की मुस्कान और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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