रविवार, 26 जून 2011

'नए तुलसीदास' और साहित्य पतन


हिन्दी का नया ठाट नये जनसंपर्क अधिकारी या 'नए तुलसीदास' रच रहे हैं, इनके पास मीठी भाषा,मधुर सपने, पद, हैसियत,पैसा आदि सब है। इनके नेता से लेकर प्रोफेसरों तक संपर्क-संबंध हैं।इन्हें सत्तातंत्र की बारीक रीति-नीति का ज्ञान है। 'नए तुलसीदास' ने इस युग में 'पद' को महान बनाया है। जितनी बड़ी कुर्सी ,साहित्य और हिन्दी अकादमिक जगत में उतना ही बड़ा स्थान। इन दिनों लिखने-पढ़ने से साहित्य का ओहदा तय नहीं हो रहा । उल्लेखनीय है साहित्य में नया तत्व दाखिल हुआ है कनेक्टविटी का। साहित्य में कनेक्टविटी जितनी अच्छी उसका उतना ही नाम। यह सूचनायुग का सीधा असर है। हिन्दी का प्रत्येक ख्यातिलब्ध लेखक इस आधार पर खा -कमा रहा है। आज से कुछ साल पहले एक ख्यातिलब्ध लेखक को मात्र एक साल में 10 से ज्यादा पुरस्कार मिले। ज्ञानपीठ को छोड़कर ये जनाब सभी पुरस्कार पाने में सफल रहे, अब वे सिर्फ ज्ञानपीठ और नोबुल पुरस्कार का ही इंतजार कर रहे हैं। साहित्य में कृति,कृतिकार और पाठक के बीच में पाठ सेतु का काम करता था। लेकिन आज पाठ गौण है,लिखा हुआ गौण है। कनेक्टविटी बड़ी चीज है।
     कॉलेज-विश्वविद्यालयों में हिन्दी के ऐसे शिक्षकों की पीढ़ी पैदा हुई है जो जानते हैं देश में किस विश्वविद्यालय में क्या हो रहा है? कौन प्रोफेसर क्या कर रहा है ? किसके अंदर कितने लोग पीएचडी कर रहे हैं ? हिन्दी विभाग में कितने लोग हैं ? किसका किससे पंगा है ? किससे मधुर संबंध हैं ? नामवर सिंह के यहां कौन आता-जाता है ? अशोक बाजपेयी इस समय कहां पर हैं ? हिन्दी में कहां नियुक्तियां हो रही हैं और वहां किसकी संभावना है ? कौन एक्सपर्ट हैं ? किसके जरिए काम कराया जा सकता है? आदि । हिन्दी में कुछ भी लिखे-पढ़े बिना मात्र इनके साथ संपर्क के जरिए हिन्दी जगत की सारी जानकारी  प्राप्त कर सकते हैं। ये लोग असल में हिन्दी के नए पीआरओ यानी  'नए तुलसीदास' हैं। ये इस युग के प्रभावशाली प्रचारक हैं। ये जिसके पीछे लग जाएं उसका जीवन संवारने या तबाह करने की क्षमता रखते हैं। ये लोग आमतौर पर अफवाहों से काम चलाते हैं और कनेक्टविटी पर टिके हैं। ये लेखक के भ्रम में जीते हैं।
     आपको सारे देश में अपनी हवा बनानी है,शहर में हवा बनानी है ,इन  लेखकों से मिलें ,वे पलक झपकते ही महान बना देंगे। कोलकाता से लेकर दिल्ली तक,पटना से लेकर काशी तक इन लोगों की कई टीमें सक्रिय हैं। इनकी कनेक्टविटी में जो है वह अक्लमंद है,बुद्धिजीवी है,श्रेष्ठ शिक्षक है, इसके जो बाहर है वो कूड़ा है। कचरा है। घटिया है।
   'नए तुलसीदास' का मानना है साहित्य और शिक्षा में टिकना है तो साहित्य के पठन-पाठन से ज्यादा कनेक्टविटी पर ध्यान दो,कनेक्टविटी पर निवेश करो। कौन नौकरी दिला सकता है उसे पकड़ो,उससे येन-केन-प्रकारेण सामंजस्य बिठाओ। समाजशास्त्र की भाषा में इसे 'सामंजस्यपूर्ण व्यक्ति' कहते हैं। यह ऐसा व्यक्ति है जो अपने हितों के विस्तार के लिए तरह-तरह की सेवाएं हासिल करने या देने में विश्वास करता है। चंदे के कूपन देने से लेकर फर्श बिछाने, हॉल सजाने, गोष्ठियों में आने-जाने,इनके लिए चंदा देने, और गुलदस्ता देने आदि को ही ये 'साहित्य सृजन' कहते हैं। मूलतःयह ऐसा व्यक्ति है जिसके पास हिन्दी की डिग्रियां तो हैं,पद भी है, लेकिन इसे शिक्षित आदमी नहीं कह सकते। यह न तो कुछ लिख रहा है, और नहीं  नया जानने समझने की कोशिश कर रहा है। इसके ज्ञान की सीमा है। यह पाठ्यक्रम  से ज्यादा नहीं जानता। उसे नए पुराने किसी भी किस्म के पाठ्यक्रम से इतर ज्ञान से कोई लेना -देना नहीं है। अधिक से अधिक वह उतना जान लेता है जिससे वह अपनी दैनंदिन अकादमिक जरूरतों की पूर्ति कर सके।
   'नए तुलसीदास' का हिन्दी के अकादमिक जगत में दबदबा है। ये लोग उन्नति के कलात्मक गुणों में माहिर हैं। ये लोग अच्छे नम्बर ,प्रथमश्रेणी ,नियुक्ति,पद-पुरस्कार-सम्मान दिलाने में माहिर हैं। इससे साहित्य समृद्ध नहीं होता। हिन्दी समृद्ध नहीं होती ,बल्कि पीआरओ संस्कृति समृद्ध होती है। कायदे से किसी भी विवेकवान मनुष्य को इनसे घृणा होगी,लेकिन हिन्दी में इस संस्कृति के पुजारियों को श्रद्धा-सम्मान से देखा जाता है। 
    'नए तुलसीदास' की संस्कृति अनपढ़ की संस्कृति है, वे कक्षा में जो पढ़ाते हैं अथवा पाठ्यक्रम में जो है,अथवा हिन्दी में जो थोड़ा-बहुत समाचारपत्रों में लिखा जा रहा है उसके अलावा कुछ नहीं जानते। सवाल उठता है हिन्दी के कॉलेज-विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों को मोटी पगार मिलती है। वे इस पगार के बदले समाज को क्या दे रहे हैं ? क्या लिख-पढ़ रहे हैं ? हिन्दी में यह पतन क्यों हुआ ? वे न्यूनतम ज्ञान को महाज्ञान क्यों समझ रहे हैं ? 
     मसलन् 'नए तुलसीदास' को यह तो मालूम है रामचन्द्र शुक्ल ने क्या लिखा है। लेकिन वो देरिदा-फ्रेडरिक जेम्सन के बारे में कुछ भी नहीं जानता, वह यह तो जानता है प्रेमचंद ने गोदान लिखा था लेकिन अन्य भाषा के साहित्य और कला रूपों से एकदम अनभिज्ञ है। कोलकाता में अधिकांश हिन्दी शिक्षकों-विद्यार्थियों ने कोलकाता के हिन्दी-बांग्ला रंगमंच के नाटक नहीं देखे। ये लोग कभी बांग्ला का सिनेमा नहीं देखते। ज्यादातर को बांग्ला साहित्य कला-संस्कृति में चल रही चर्चाओं का कोई ज्ञान नहीं है।विदेशी भाषा के साहित्य और उसके विवादों से तो इनका दूर दूर तक कोई संबंध नहीं है। यही दशा दिल्ली -काशी-इलाहाबाद और लखनऊ की है। कहने का अर्थ यह है हिन्दीवाला बंद गली के आखिरी मकान में रहता है। इसमें किसी भी किस्म की बाहरी हवा,विचार,साहित्य,स्वस्थ मूल्य आदि नहीं आ रहे। कोई ऐसा उपाय किया जाए जिससे यह बंद मकान खुल जाए ।
       'नए तुलसीदास' ने किताबों की महत्ता खत्म कर दी है। ये खुद किताब नहीं खरीदते और खरीदने कि लिए प्रेरित भी नहीं करते। आप किसी भी शहर में जाइए और किताबवाले से पूछिए कॉलेज-विश्वविद्यालय के कितने प्रोफेसर हैं जो आपके यहां किताब खरीदने आते हैं तो एक ही जबाब मिलेगा ,गिनती के दो-चार। जबकि बंगाली समाज में ऐसा नहीं है। हिन्दी के 'नए तुलसीदास' अपनी अकादमिक गुणवत्ता पर भी ध्यान नहीं देते। एकबार जब कोई शिक्षक बन जाता है तो वह कैसा पढ़ा रहा है ? उसके पढ़ाने की क्वालिटी क्या है ? गुणवत्तापूर्ण पढ़ाता है या नहीं ? इन सब पर ध्यान नहीं दिया जाता। आज तक किसी शिक्षक को खराब पढ़ाने के कारण नौकरी से नहीं निकाला गया। बल्कि देखने में यह आया है कि जो जितना ज्यादा खराब पढ़ाता है उसकी कनेक्टिविटी उतनी ही ठीक  है।
     हिन्दी के 'नए तुलसीदास' न तो किताब खरीदते हैं और नहीं पत्रिकाएं खरीदते हैं। ये लोग साल में लाखों रूपया पगार पाते हैं और साल में एक भी किताब नहीं खरीदते। जो थोड़ी-बहुत किताबें इनके घरों में मिलेंगी वे किसी न किसी जुगाड़ की देन है। हमें गंभीरता से सोचना चाहिए जो कक्षा में क्वालिटी बनाए रखने में असमर्थ हैं ,साहित्य में क्वालिटी बनाए रखने में असफल हैं, उन्हें क्या नौकरी का हक है ? साहित्यकार कहलाने का हक है ? मसलन् कोई मजदूर यदि घटिया क्वालिटी का सामान बनाता है तो उसे मालिक काम से निकाल देता है,बाजार में घटिया क्वालिटी का माल हम नहीं खरीदते। लेकिन हिन्दी शिक्षण और साहित्य सृजन में ऐसा नहीं हो रहा,हम घटिया क्वालिटी के शिक्षक - साहित्यकार-लेखक के दीवाने हैं। हमने आज तक सेमीनारों में घटिया भाषण देने वाले की मीडिया या सेमीनार में आलोचना नहीं देखी। हमें देखना चाहिए क्या एक प्रोफेसर-लेखक अपने काम को ईमानदारी  से करता है? आखिर इस समस्या का समाधान क्या है ? प्रोफेसर और लेखक में अपने पेशे के प्रति कुर्बानी,मेहनत , नए विचारों और व्यापक सामाजिक यथार्थ को जानने की जितनी ज्यादा भूख होगी,वह उतना ही सुंदर लिख पाएगा।पढ़ा पाएगा।
    लेकिन 'नए तुलसीदास' ने ज्ञान के प्रति आकर्षण पैदा करने की बजाय धनलोलुपता बढ़ायी है। वे अपने काम के प्रति बेवफा हैं। वे पदोन्नति,सरकारी पद, सलेक्शन कमेटी आदि के चक्करों में सारी जिंदगी खत्म कर देते हैं। वे जिस समय रिटायर होते हैं उनके पास एक सुंदर घर,मोटा सा बैंक बैलेंस, कुछ भक्त और खोखली प्रसिद्धि के अलावा कुछ नहीं होता। यह नोटिस करने लायक बात है कि एक प्रोफेसर 20-30साल काम करने के बाद समाज को एक अच्छी किताब तक लिखकर नहीं दे जाता। अधिकांश शिक्षक बिना लिखे ही रिटायर कर जाते हैं। स्मरण के लायक कोई किताब तक समाज को नहीं देकर जाते । लेकिन उनका नाम बड़ा होता है,चर्चे बड़े होते हैं,भक्त बहुत होते हैं।
       गंभीर साहित्य और गंभीर शिक्षण सामाजिक न्यूजरील की तरह नहीं है। गंभीर शिक्षण और साहित्य के सृजन में कठोर परिश्रम और काफी समय लगता है। एक प्रोफेसर या साहित्यकार रातों-रात किसी चुगद किस्म के प्रशंसक आलोचक या उपकुलपति की प्रशंसा से तैयार  नहीं होता। उसे तैयार होने में दसियों वर्ष लगते हैं,बेशुमार मेहनत के बाद वह तैयार होता है। साहित्यकार या एक अच्छा शिक्षक बनने का कोई शार्टकट रास्ता नहीं है। शार्टकट रास्ता बुद्धिहीन तलाश करते हैं।बुद्धिमान बनने के लिए लंबी कठिन साधना की जरूरत होती है।
    'नए  तुलसीदास ' साहित्यिक प्रेरणाओं से कोसों दूर हैं। उनके ऊपर लोगों की निर्मम आलोचना का कोई असर नहीं होता। उन्हें कोई कुछ नहीं कहता। वे अपने को हिन्दी का योद्धा समझते हैं और समाज में हिन्दी योद्धा की तरह विचरण करते हैं। ये लोग जब किसी कार्यक्रम में जाते हैं या उसका आयोजन करते हैं,सिर्फ उसी समय इनकी सर्जना के दर्शन होते हैं,बाकी समय ये सर्जनात्मक अवकाश पर रहते हैं। मसलन वे जब किसी गोष्ठी या समारोह या मेले का आयोजन करते हैं तो उस समारोह के  अलावा कभी सर्जनात्मक भाव में नजर नहीं आते,इन समारोहों में भी उनके सर्जनात्मकभाव की इमेज कम और साहित्य प्रबंधकर्ता की इमेज ज्यादा उभरती है। इन कार्यक्रमों से साहित्य के नायकों का मान-सम्मान नहीं बढ़ता बल्कि प्रबंधकों का मान बढ़ता है। इस तरह के आयोजनों के जरिए साहित्य का कम्युनिकेशन नहीं होता बल्कि साहित्य संप्रेषण बाधित होता है। वे साहित्य,साहित्यकार और संस्कृति को चीजों में बदल देते हैं। प्रमोशन की वस्तु बना देते हैं। संप्रेषण को वस्तुओं में बदलना बेहद खतरनाक काम है। साहित्य के आयोजन जब शोहरत पाने,पदोन्नति पाने,नौकरी पाने,अंक बढ़ाने, प्रथमश्रेणी दिलाने आदि में जब बदल जाते हैं तो साहित्य वस्तु में बदल जाता है और ऐसी अवस्था में साहित्य, सामाजिक परिवर्तन की बजाय सामाजिक उत्पीड़न का काम करने लगता है। वे आयोजनों में साहसपूर्ण संवाद नहीं करते,नए विचारों का जोखिम नहीं उठाते,साहित्य में सहभागिता पैदा नहीं करते। बल्कि वे साहित्य आयोजन कुछ पाने के लिए करते हैं। देने के लिए नहीं करते। साहित्य कभी आयोजनों से प्रसार नहीं पाता। साहित्य का विकास होता है लेखकीय आचरण पर सख्ती से अमल करने से। साहित्य को अभिजनों और सत्ता के खिलाफ प्रतिवादी बनाने से।साहित्य का झूठी प्रशंसा से विकास नहीं होता। साहित्य में खोखले शब्द थोपे जाने से भी साहित्य की उन्नति नहीं होती।





8 टिप्‍पणियां:

  1. सब कहे से सहमति मगर इन पाजियों को तुलसीदास का संबोधन दिया जाय व्यंग और व्यंजना में भी इससे घोर असहमति...

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  2. आपने सोलह आने सच कहा है।

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  3. हिन्दी के इन जनसंपर्क अधिकारियों को तुलसीदास आप किस अर्थ में कह रहें हैं वह समझ में नही आ रहा है ? तुलसीदास से इनकी तुलना - हजम नही हो रहा है

    आप स्वयं अध्यापक होकर बार बार अध्यापकों को छोटा करके क्यों दिखाते हैं ?

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  4. हिन्दी के अध्यापकों में यह नया फिनोमिना और उसका हिन्दी शिक्षकों द्वारा अनुकरण उनको छोटा बना रहा है। वे 'नए तुलसीदास' इस अर्थ में हैं कि वे 'जनप्रिय' हैं। अध्यापकों की बुराईयों का आलोचनात्मक विश्लेषण करना बेहद जरूरी है।

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  5. आप कोलकाता के कॉनसेस कीपर हैं। आपकी जय हो।जबकि ज्यादातर लोगों का मत है कि आप स्वयं अध्यापक होकर ऐसा कर रहे हैं। अरे भाई खुद अध्यापक हैं,तभी तो ज्यादा परेशान हूँ।ज्यादा शर्मसार हूँ। वरना फिर घोषित करना होगा कि अध्यापक भी एक "वर्ग" है। अकेला ,विशिष्ट और निराला।
    विजय शर्मा

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  6. मैं सी एस सी के से सहमत हूं। नई पीढ़ी में इस संक्रामक रोग को फैलाने का काम भी सफलता के शॉर्टकट के प्रेरक बनकर ये लोग करते हैं। अगर दृढ़ता न हो तो इनसे बचने का उपाय नही। ये अपनी सफलताओं से कई बार पढ़ने-लिखनेवाले लोगों को हतोत्साहित करते हैं।एक पवित्र प्रार्थना की तरह इनकी चमक से नज़र धुंधली न हो,ये कामना करनी होगी।

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