सोमवार, 20 जून 2011

सांस्कृतिक पराधीनता और हिन्दी संस्थान


इन दिनों हिन्दी हम हिन्दी वाले हिन्दी की सेवा नहीं कर रहे ।मालिकों की सेवा कर रहे हैं। विश्वविद्यालय-कॉलेज में पढ़ाने वाले या केन्द्र सरकार के संस्थानों के हिन्दी अधिकारी इस भ्रम में हैं कि वे हिन्दी की सेवा कर रहे हैं, असल में वे मालिकों की सेवा कर रहे हैं और उनकी सेवा के लिए सुंदर सेवक तैयार कर रहे हैं। हिन्दी को मालिकों की भाषा मालिकों ने नहीं हम बुद्धिजीवियों-हिन्दीसेवियों ने बनाया है।  
रघुवीर सहाय ने एक कविता में लिखा है, "वही लड़ेगा अब भाषा का युद्ध/जो सिर्फ अपनी भाषा में बोलेगा/ मालिक की भाषा का एक शब्द भी नहीं/चाहे वह शास्त्रार्थ न करे जीतेगा/बल्कि शास्त्रार्थ वह नहीं करेगा/वह क्या करेगा अपने गूँगे गुस्से को वह /कैसे कहेगा ? तुमको शक है /गुस्सा करना ही/गुस्से की एक अभिव्यक्ति जानते हो तुम/वह और खोज रहा है/ तुम जानते नहीं।"यानी मालिक की भाषा से बचने का कोई शास्त्र है हमारे पास ?हम क्यों और कब से मालिक की भाषा बोल रहे हैं ? हिन्दी को मालिक की दासी कैसे बनाया गया ? अरबो-खरबों रूपये खर्च करने बाबजूद हिन्दी आज भी पिछड़ी क्यों है ? इत्यादि सवालों पर गंभीरता के साथ विचार करने री जरूरत है।
हिन्दी पर केन्द्र सरकार करोड़ों रूपये सालाना खर्च करती है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान,केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय और वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय से लेकर देश के विभिन्न विश्वविद्यालय और कॉलेजों में चल रहे हिन्दी विभागों के अकादमिक उत्पादन पर नजर डाली जाए तो बहुत ही असंतोषजनक तस्वीर सामने आती है। हिन्दी के समस्त कार्य व्यापार से जुड़े लोग हिन्दी के पठन-पाठन और अनुसंधान को यह मानकर करते हैं कि वे राष्ट्रभाषा का विकास कर रहे हैं और इस नाते हिन्दी तो सबकी है और उसे सबको सीखना चाहिए और हमें सिखाना चाहिए।
     हिन्दी शिक्षक कक्षाओं में हिन्दी को एक नेचुरल भाषा के रूप में पढ़ाते हैं। वे हिन्दी के उद्भव और विकास को गैसपेपर मार्काशैली में पढ़ाते हैं और उसके विकास के पीछे निहित ऐतिहासिकता की हत्या कर देते हैं। वे चाहते हैं हिन्दी भारत की सार्वभौम भाषा बन जाए। इसके विकास और प्रसार के लिए वे शुद्ध व्यवहारमूलक तर्कों का इस्तेमाल करते हैं और उसके पीछे निहित ऐतिहासिकता को छिपाते हैं। वे उसे महाभाषा के रूप में भी प्रचारित करते हैं। सच यह है  मध्यकाल में हिन्दी कभी भी सत्ता और न्याय की भाषा नहीं रही और आज भी नहीं है। आज भी सरकार और अदालत के सभी दस्तावेज हिन्दी में नहीं अंग्रेजी में तैयार किए जाते हैं।
     इसके अलावा मध्यकाल से लेकर आधुनिककाल तक के जितने भी बड़े दार्शनिक विमर्श हैं उनमें में से कोई भी हिन्दी में नहीं हुआ। ऐसी अवस्था में हिन्दी को भारत की स्वाभाविक राष्ट्रभाषा के रूप में प्रचारित-प्रसारित करना पाखंड है। देश की स्वाभाविक भाषा वो है जिसमें न्यायपालिका और सत्ता बातें करते हैं। दर्शन का विमर्श जिसमें तैयार होता है। हमारे भाषाविज्ञानी तरह-तरह से हिन्दी के उत्थान-पतन की गाथाएं बताते हैं लेकिन किसी ने भी इस पहलू को ध्यान में नहीं रखा कि भाषा के राष्ट्रीय भाषा बनने में कौन से पक्ष प्रधान होते हैं। वे मात्र साहित्य जगत के भाषिक प्रयोगों को केन्द्र में रखकर बातें करते हैं।
     वे कभी भाषा पर सत्ता,दर्शन,शास्त्रीय विमर्श और न्यायव्यवस्था की भाषा के संदर्भ में बात नहीं करते। इसके बिना भाषा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य नहीं बनता। मुश्किल यह है कि विमर्श जिस भाषा में हो रहा है और साहित्य जिस भाषा में लिखा जा रहा है उनमें किसी भी किस्म का आदान-प्रदान है कि नहीं ? विमर्श को सामाजिक-सांस्थानिक मानकर व्यक्ति के हवाले कर दिया गया और साहित्य को समाज के हवाले करके हमने विमर्श और भाषा के बीच में पैदा हुए अन्तर्विरोध की सृष्टि कर दी।
      हाल के वर्षों में हिन्दी के प्रतिष्ठित आलोचकों ने विमर्श पदबंध को उत्तर आधुनिक मानकर जिस तरह की खिल्लियां उड़ायी हैं उससे यही पता चलता है कि हिन्दी में भाषा और विमर्श में वे अतराल मानकर चल रहे थे। हिन्दी में जिसे आलोचना कहते हैं यह आधुनिक विधा है। मध्यकाल में हिन्दी में कोई आलोचना या विमर्श नहीं है। भाषाविज्ञानी और आलोचकों ने हिन्दी भाषा पर पाठकेन्द्रित होकर लिखा। विमर्श केन्द्रित होकर कुछ भी नहीं लिखा। भाषा के वाचिक और साहित्यिक प्रयोगों का विवेचन किया। वे इन रूपों के प्रभाव या रूपान्तरण की चर्चा कम करते हैं।  वे हिन्दी और अन्य भाषाओं के विकास को रेखांकित करते हैं। इस प्रक्रिया में भाषा स्वयं में एक संरचना और सिस्टम बनती चली गयी। उसके नियम बने। नियमों के आधार पर ही फैसले लिए गए। ऐसी अवस्था में भाषा में कोई भी बदलाव लाने के लिए नियमों में बदलाव जरूरी है ,नियमों में बदलाव के जरिए हम भाषा  और सिस्टम के संबंधों में भी बदलाव कर सकते हैं।
   मजेदार बात यह है कि हिन्दी भाषा को आधुनिककाल आते ही सभी रंगत के विचारक-समाज सुधारक और साहित्यकार राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते थे। इस चक्कर में अन्य भाषाओं और बोलियों के प्रति समानता के भाव को तिलांजलि देदी गयी और हिन्दी को विशेषाधिकार देने पर जोर दिया गया। हिन्दी की महत्ता,सत्ता और परंपरा पर अतिरिक्त बल देने के कारण भाषाविज्ञानियों और आलोचकों ने भाषा और विमर्श के क्षेत्र में जांच के काम को तिलांजलि दे दी। वे वहां सत्य की खोज में जुट गए। जबकि आलोचना का यह काम नहीं है कि वह सत्य खोजे या दावे के साथ बताए। आलोचना का काम हैं जांच करना।
     आधुनिक काल आने के साथ जगदीशचन्द्र बसु,सत्येन्द्र बसु आदि की विज्ञान रचनाएं बांग्लाभाषा में आईं। गिरीन्द्रशेखर बसु ने मनोविज्ञान पर काम किया. ये लोग अपने क्षेत्र के महारथी थे। गिरीन्द्रशेखर बसु की रचनाओं से फ्रॉयड ने बहुत कुछ सीखा और मनोशास्त्र की अनेक धारणाएं बनायीं और गिरीन्द्रशेखर बसु के योगदान को माना, फ्रॉयड का उनसे नियमित पत्र-व्यवहार भी होता था। यही स्थिति अन्य वैज्ञानिकों की थी वे भी अपनी मौलिक खोजों को पहले अपनी भाषा में लेकर आए। इससे बांग्ला भाषा में विमर्श का वातावरण बना।
     लेकिन हिन्दी में ऐसा अभी तक नहीं हो पाया है। दर्शन,विज्ञान,राजनीतिशास्त्र आदि में आज भी हिन्दी कम्युनिकेशन की भाषा नहीं बन पाई है। आज भी इन क्षेत्रों में पढ़ने-पढ़ाने के लिए अंग्रेजी की मदद लेनी होती है लेकिन हम मुगालते में हैं कि हिन्दी राष्ट्रभाषा है ,राष्ट्रीय विमर्श की भाषा है।
      सच यह है हिन्दी में एक भी ऐसा विमर्श नहीं हुआ जिसने भारत या उसके बाहर प्रभाव छोड़ा हो। जबकि संस्कृतभाषा के साथ ऐसा नहीं है। बांग्लाभाषा के साथ ऐसा नहीं है। संस्कृत के साहित्य,न्याय-दर्शन,नीतिशास्त्र,काव्यशास्त्र,नाट्यशास्त्र आदि तमाम क्षेत्रों का आज भी सारी दुनिया में अध्ययन-अध्यापन होता है। क्योंकि संस्कृत सिर्फ साहित्य की भाषा नहीं थी,वह विज्ञान,गणित,दर्शन,न्याय,कामशास्त्र आदि जटिततम विषयों के विमर्श की भाषा भी थी ।
      हिन्दी की स्थिति इसकी तुलना में बेहद खराब है। हिन्दी ने अपने को साहित्य, बातचीत,सरकारी कामकाज की भाषा और मीडिया की भाषा तक सीमित रखा है। इससे हिन्दी का रुका है। हिन्दी अभी तक विचार,विज्ञान,तकनीक आदि की भाषा क्यों नहीं बन पायी है ? हमारे हिन्दी संस्थानों की इसमें बड़ी भूमिका है। हिन्दी के बुद्धिजीवियों की ,खासकर प्रोफेसरों की बड़ी भूमिका है।
    हिन्दी के प्रोफेसरों और हिन्दी ऑफीसरों ने जो संसार रचा है वह भाषा का सीमित संसार है। हिन्दीवाले को हिन्दी के विकास के नाम पर कुछ भी करना होता है तो वे सेमीनार करते हैं और स्वयं मंच पर बैठ जाते हैं। यानी हिन्दी बुनियादी तौर पर सेल्फ -प्रमोशन स्कीम का हिस्सा है। निजी उत्थान और निजी महिमा को वे राष्ट्रीय उत्थान और हिन्दी महिमा समझते हैं। जबकि इसका हिन्दी विकास से कोई संबंध नहीं है।
हिन्दी आलोचकों-प्रोफेसरों और साहित्यकारों को साहित्य और कम्युनिकेशन माध्यमों में हिन्दी की सत्ता का विस्तार खूब आनंदित करता है। जबकि इस विस्तार से भाषा समृद्ध नहीं होती। पता करें कि मासमीडिया और सूचना तंत्र के व्यापक विकास के बाबजूद हिन्दी कितनी समृद्ध हुई है ? सच यह है कि हिन्दी के अनेक बड़े अखबार अभिव्यक्ति के लिए अंग्रेजी पदबंधों के अनिवार्य प्रयोग पर बल दे रहे हैं। हिन्दी की दयनीय अवस्था का अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि केन्द्र सरकार की कोई भी नीति या पत्र पहले हिन्दी में नहीं लिखा जाता। सारे सरकारी तंत्र के संप्रेषण की भाषा अंग्रेजी है। रघुवीर सहाय की कविता है 'हिन्दी '- ' पुरस्कारों के नाम हिंदी में हैं/ हथियारों के अंग्रेज़ी में /युद्ध की भाषा अंग्रेजी है /विजय की हिन्दी।"एक अन्य कविता में रघुवीर सहाय ने लिखा है, "अँग्रेजों ने अँग्रेजी पढ़ाकर प्रजा बनाई/ अँग्रेजी पढ़ाकर अब हम प्रजा को राजा बना रहे हैं।"
   आधुनिककाल में हिन्दी के विकास का जो रास्ता हमने चुना है वह बाजार , महानगर,विश्वविद्यालय और कम्युनिकेशन मीडियम केन्द्रित है। इन चारों का हमारे देश आर्थिक विकास के मॉडल से गहरा संबंध है। इसमें बुनियादी चीज है हिन्दी की "शर्तयुक्त परिस्थिति"। यह "शर्तयुक्त परिस्थिति" क्या है ? मसलन्, केन्द्र सरकार के ऑफिस में हिन्दी में काम करना होगा इसके लिए हिन्दी अधिकारी,हिन्दी टाइपिस्ट आदि रखो। काम नहीं करना है तो कोई जरूरत नहीं है। चूंकि हिन्दी राजकाज की भाषा या राष्ट्रभाषा है तो हिन्दी के विभाग तो होने चाहिए। ये "शर्तयुक्त परिस्थिति" अपने आपमें पराधीनता की द्योतक हैं। यानी शर्तयुक्त परिस्थिति को सांस्कृतिक पराधीनता कहते हैं। इसमें काम करने वाले के सामने दो ही संभावनाएं बचती हैं ,प्रथम, परिस्थिति के अंतर्गत स्पष्ट विकल्पों में चयन,दूसरा, इस शर्तयुक्त परिस्थितियों को बदलकर कार्य की अन्य संभावनाओं की खोज करना। हिन्दीवालों ने पहली स्थिति में अपने को ढ़ाल लिया है,इसका दुष्परिणाम है कि हिन्दी आज जनता की कम सरकार भाषा के रूप में ज्यादा जानी जाती है। इसी स्थिति को ध्यान में रखकर रघुवीर सहाय ने एक बड़ी ही शानदार कविता लिखी है 'हिन्दी'- लिखा,
"हम लड़ रहे थे/समाज को बदलने के लिए एक भाषा का युद्ध/ पर हिन्दी का प्रश्न अब हिन्दी /का प्रश्न नहीं रह गया/हम हार चुके हैं/अच्छे सैनिक/अपनी हार पहचान/अब वह सवाल जिसे भाषा की लड़ाई हम कहते थे/ इस तरह पूछः/हम सब जिनकी ख़ातिर लड़ते थे/ क्या हम वही थे ?/या उनके विरोधियों के हम दलाल थे/- सहृदय उपकारी शिक्षित दलाल ?/आज़ादी के मालिक जो हैं ग़ुलाम हैं/उनके गुलाम हैं जो वे आज़ाद नहीं/हिन्दी है मालिक की/तब आजादी के लिए लड़ने की भाषा फिर क्या होगी ?/ हिन्दी की माँग/ अब दलालों की अपने दास-मालिकों से/एक माँग है/बेहतर बर्ताव की/अधिकार की नहीं/वे हिन्दी का प्रयोग अंग्रेजी की जगह/करते हैं/जबकि तथ्य यह है कि अंग्रेजी का प्रयोग/उनके मालिक हिन्दी की जगह करते हैं/दोनों में यह रिश्ता तय हो गया है/जो इस पाखण्ड को मिटाएगा/हिन्दी की दासता मिटाएगा
/वह जन वही होगा जो हिन्दी बोलकर/रख देगा हिरदै निरक्षर का खोलकर।"






2 टिप्‍पणियां:

  1. महोदय, सरकारी सेवक का महातम्य वरिष्ठ और बलिष्ठ की श्रेणी में आता है। इन दिनों हिन्दी भाषा को ले कर ‘उत्थान’, ‘विकास’ और ‘समृद्धि’ का मंगलाचरण जबर्दस्त है। किंतु ये सरकारी हिन्दीसेवी मंगलाचरण के बाद के हिन्दी-भविष्य और हिन्दी-धर्म से भिज्ञ नहीं हैं। ऐसे लोग हिन्दी को सार्वभौम बनाने की बात नहीं सोचते हैं। यह अवश्य है कि अपनी लोकप्रियता को भुनाने खातिर ‘स्पेस’(सेमिनार, आयोजन, कार्यक्रम) जरूर ढूंढते हैं। ऐसे अवसरों पर सामान्य जानकार ऊब और कुढ़न के बीच पवरते हुए आसानी से दिख जाएंगे।

    आपके इस सुचिन्तित आलेख में आपकी गैसपेपर मार्काशैली में अध्यापन वाली बात सही है। जिस शर्तयुक्त परिस्थिति को आप सांस्कृतिक पराधीनता कह रहे हैं, वे उसी के रक्तबीज हैं। पढ़ाते तो ‘पराधीन सपनेहँु सुख नाहीं’ है; लेकिन खुद उसी के गिरफ़्त में हैं। संस्कृत के सन्दर्भ में आपके कथन समीचीन हैं। ज्ञानबोध के स्तर पर यदि संस्कृत भाषा हाथ से छूटी तो हिन्दुस्तानी संस्कृति छूट जाने का भय गहरा होता है। हिन्दी से ऐसे डर जे़हन में नहीं उपजते हैं। दरअसल, हिन्दी को सांविधानिक रूप से प्रत्यारोपित किया जाना इस भाषा के स्वाभाविक और इच्छित विकास में सबसे बड़ा अवरोधक है। आज हमने जो ‘मॉडल’ हिन्दी के लिए चुना है उसकी वजह से हिन्दी के समकक्ष भाषाओं और क्षेत्रीय बोलियों का अहित सर्वाधिक हुआ है। वे अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ रही हैं। मेरे खुद के परिवार में एक माँ बची हैं जो ‘भोजपूरी’ ही बोलती हैं। बाकी बुद्धिजीवी जन तो हिन्दी की ही छतरी ढो रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. चंद्रकांत त्रिपाठी27 जून 2011 को 9:25 am

    हिन्दी के विकास पर जो बन्दर बाँट चल रही है, उसने तो हिन्दी के इन कर्णधारों की अय्याशी का इंतजाम करवाया ही है। साथ में हिन्दी का भी बेड़ा गर्क किया है। इस अय्याशी और हिंदी के चीर हरण का ताज़ा उदाहरण केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा में इन दिनों चल रहा है। यहाँ विदेशी कोर्स की किताबों के संपादन के नाम पर संस्थान के प्रोफेसर देश के विभिन्न शहरों में हनीमून मनाने जा रहे हैं। पहला हनीमून शिलाँग में मना और अब हैदराबाद में अय्याशी का घिनौना नाच संस्थान के कुछ नामचीन प्रोफेसरों द्वारा किया जा गया है। ये बात और है कि इन पुस्तकों के संपादन के लिए सभी विशेषज्ञ दिल्ली के ही रहने वाले हैं। दिल्ली में संस्थान का अपना विशाल भवन है। पूरा भवन ए.सी है। पर यह संपादक यहाँ काम करने के लिए तैयार नहीं है।
    कारण: इस प्रकार है:
    १. दिल्ली में संस्थान के अंदर संपादन के नाम पर सरकारी खर्चे पर शराब नहीं पी जा सकती।
    २. दिल्ली में संपादन के नाम पर ५ सितारा होटल में परस्त्रियों के साथ हमबिस्तर नहीं हो सकते।
    ३. दिल्ली में कार्यक्रम होने पर टी.ए. डीए के नाम पर मोटी रकम नहीं बटोरी जा सकती।
    और आखिर में इस संपादक मंडल में संस्थान के कुख्यात हवाईयात्राखोर शामिल हैं (मुफ्त हवाईयात्रा दिखी नहीं कि टूट पड़े)
    धन्य हों ये विशेषज्ञ जिन्होंने अपनी अय्याशी का ऐसा नायाब तरीका निकाला।
    इन सब का जनहित में पर्दाफाश होना चाहिए।

    उत्तर देंहटाएं

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...