सोमवार, 23 नवंबर 2015

लोकतंत्र का अनंत और भाषिकचेतना



लोकतंत्र के बारे में छात्रों से जब भी बात होती है तो यह भाषा सुनने को मिलती है। “मैं तो चुनाव के समय राजनीतिक बहस सुनता हूँ”,”मैं कभी राजनीति में सक्रिय रुप से शामिल नहीं हुआ”,”मैंने कभी सक्रिय रुप से किसी भी मसले पर सार्वजनिक तौर पर पक्ष-विपक्ष में बहस में भाग नहीं लिया ”, “मैं खबरें सुनता हूँ लेकिन उन पर ध्यान नहीं देता,” “अपनी दैनंदिन समस्याओं से ही मुक्ति नहीं मिलती,राजनीति पर कब बात करूँ”, “मैं वोट देता हूँ,लेकिन सक्रिय राजनीति में कभी भाग नहीं लेता,”, “ मैं वोट देता हूँ,थोड़ा बहुत काम कर देता हूँ,इससे ज्यादा मेरी राजनीति में दिलचस्पी नहीं है,”, मैंने मतदान के दिन वोट दिया है लेकिन मेरी राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है”, यानी लोकतंत्र में निरपेक्ष या साधुभाव से भाग लेने वालों की यह मनोदशा अपने-आप में बहुत कुछ कह देती है । छात्रों का एक बड़ा वर्ग लोकतंत्र का मतलब वोट देना ही समझता है। यह सीमित लोकतंत्र की समझ है। हम इस तरह की मनोदशा के मित्रों से कहना चाहेंगे कि आप इस सीमा के बाहर निकलें और किसी अंतर्राष्ट्रीय-राष्ट्रीय मसले पर नियमित वाद-विवाद-संवाद जरुर करें। यह काम करने से आपको लोकतंत्र का भिन्न रुप नजर आएगा।लोकतंत्र वोट डालना भर नहीं है , वह ज्ञानकांड भी है। इनमें से कई छात्र तो यह भी कहते मिले कि हम तो चुनाव के समय ही राजनीति पर ध्यान देते हैं ,क्योंकि वोट देने जाना होता है,सवाल यह है इस तरह के युवाओं को इस दायरे के बाहर कैसे लाया जाय ।

हमारे शिक्षकों के पास लोकतांत्रिक अकादमिक अनुभव की कमी है फलतः उनके मन में अनेक किस्म के सेंसर या भय काम करते रहते हैं।वे विवादास्पद चीजें पढ़ाने से डरते हैं,वे डरते हैं कि कहीं लेबल चस्पां न कर दिया जाय, लेकिन हमें इस सबसे डरना नहीं चाहिए,हमें डरकर विवादास्पद विषय उठाने से डरना नहीं चाहिए। हम यदि चाहते हैं कि अधिकांश छात्र सक्रिय रुप से राजनीति में भाग लें तो हमें विवादास्पद विषयों को नियमित उठाना चाहिए। इससे विवाद होगा,छात्रों की शिरकत बढ़ेगी। साथ ही सामाजिक –न्याय के लक्ष्य को अपने नजरिए के केन्द्र में रखना चाहिए। हम यह भी देखें कि हमने लोकतंत्र का जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में विकास किस रुप में किया है ? उस विकास का स्वरुप और सीमाएं क्या हैं।यह बात हमेशा ध्यान रहे कि लोकतंत्र असीम है,उसकी कोई सीमा नहीं है। इस क्रम में हमें लोकतंत्र की अवधारणात्मक समझ को भी बहस के केन्द्र रखना चाहिए। सामान्य तौर पर आम लोगों की लोकतंत्र के बारे में समझ क्या है ,नमूने देखें- “लोकतंत्र यानी स्वतंत्रता या आजादी”, “चुनने का अधिकार” , “हम लोकतांत्रिक समाज में रहते हैं,हमें पसंदीदा व्यक्ति को चुनने के बहाने अपनी राय जाहिर करने का हक है”, “हम उन सभी मसलों पर वोट करते हैं जो हमारे सामाजिक सरोकारों और आस्थाओं की अभिव्यंजना करते हैं”, लोकतंत्र की इस तरह की जनप्रिय समझ दरशाती है कि लोकतंत्र को हम अभी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं।

इसी तरह लोकतंत्र पर बातें करते समय “अदर” या अन्य या हाशिए के लोगों का ख्याल रखा जाना चाहिए। हम”अदर” को जितना बेहतर ढ़ंग से जानेंगे उतनी ही गहरी हमारी लोकतांत्रिक समझ बनेगी। “अदर” के प्रति हमारा अज्ञान इन दिनों चरम पर है जिसे हम हमेशा छिपाते हैं। इसने यह स्थिति पैदा की है कि हम अन्य से नफरत करने लगे हैं या फिर उसके मसलों को लेकर गंभीर नहीं हैं,उनकी उपेक्षा करते हैं। हाल में पैदा हुआ आरक्षण विरोध इस दृष्टि की ताजा अभिव्यंजना है। हमें ध्यान रखना होगा कि “स्वतंत्रता” और “लोकतंत्र” पर बातें करते समय “अदर” का ज्ञान,उसके प्रति प्रतिबद्धता का होना जरुरी है।

इन दिनों हम कह रहे हैं कि “राष्ट्रभक्ति” पर बहस हो,या “राष्ट्रभक्ति” दिखाओ, लेकिन जब आप बहस करेंगे तो आपको “राष्ट्रद्रोह” पर भी बहस करनी होगी। यह संभव ही नहीं है कि देभक्ति पर बहस हो लेकिन देशद्रोह पर बहस न हो, ये दोनों एक ही साथ बहस के केन्द्र में आएंगे,इन दिनों संघी बटुक कह रहे हैं जो देशभक्त नहीं है वह राष्ट्रद्रोही है।जो कि एकदम गलत है।

लोकतंत्र की बुनियादी शिक्षा चार बुनियादी तत्वों से जुड़ी है। ये हैं-1.नागरिकचेतना का ज्ञान, 2.नागरिकचेतना के ज्ञानात्मक उपकरणों की समझ,3.नागरिक जीवन में हर स्तर पर कौशलपूर्ण शिरकत,4.नागरिकता के प्रति समर्पणभाव। इनमें से ज्योंही किसी भी एक चीज से जुडेंगे दूसरी चीज अपने आप खुलने लगेगी।एक शिक्षक की यह जिम्मेदारी है कि वह अपने कौशल का इस्तेमाल करके इन चारों चीजों को खोले। इन चीजों को खोलते समय विवादास्पद सवाल भी आएंगे,उन सवालों को बड़े ही कौशल के साथ हल करना चाहिए। इसीलिए कहा गया है कि लोकतंत्र तो कौशल,ज्ञान,एटीट्यूट और एक्शन इन सबके संतुलन की मांग करता है।



लोकतंत्र के प्रसंग में बहुलतावाद को विगत 65 सालों में विभिन्न रुपों में पेश किया गया है।पंडित नेहरु से लेकर मोदी तक सभी बहुलतावाद की बातें कर रहे हैं। सच यह है सर्वसत्तावादी राजनीति के लिए बहुलतावाद भाषिक उपकरण से अधिक महत्व नहीं रखता। ये नेतागण कभी बहुलतावाद को आचार-व्यवहार में लागू नहीं करते,संस्कार में शामिल नहीं करते और यथार्थ से जोड़कर नहीं देखते। पंडित नेहरु की बहुलतावाद की समझ का ही यह दुष्परिणाम या खोखलापन है कि सच्चर कमीशन को बताना पड़ा कि मुसलमानों की देश में किस तरह की दुर्दशापूर्ण स्थिति है, यही हाल औरतों का भी है। यह कैसा बहुलतावाद है जो हिंसक-उत्पीडक है।हाशिए के लोगों को हाशिए के बाहर निकलने ही नहीं देता। पीएम मोदी की भी मूलतःवही स्थिति है। उनके लिए बहुलतावाद या भारत की विविधता भाषिक अलंकारमात्र है। उनके आचरण,उनके दल (संघ) के आचरण और उनकी नीतियों का बहुलतावाद के साथ तीन-तेरह का संबंध है। इसलिए लोकतंत्र में बहुलतावाद पर जब भी बातें हों तो बहुलताओं का सम्मान मात्र न करें,उसके आगे निकलें और देखें कि बहुलतावाद के विकास के लिए हमारे पास कौन सी नीतियां और योजनाएं हैं।

1 टिप्पणी:

  1. सर, जब राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता पार्टी के कामकाज से नाखुश रहते हैं। 'पैराशूट' से उतरने वाले प्रत्याशियों को देखकर कार्यकर्ता तक राजनीति में कम रूचि लेने लगे हैं। जिन्हें राजनीतिक का अनुभव है। ऐसे में कैसे छात्रों को राजनीति से जोड़ा जाए जबकि छात्र सोशल मीडिया पर ही देश के बारे में बड़ी बड़ी बातें करके 'लोकतंत्र' और 'राजनीति' करते और समझते हैं।

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