शनिवार, 3 मई 2014

बहुलतावाद 'इवेंट' नहीं है नामवरजी !



हिन्दी आलोचना इनदिनों गंभीर संकट से गुजर रही है। विधा के रुप में देखने की बजाय इवेंट के रुप में समीक्षा लिखी जा रही है। आलोचना इवेंट नहीं है।वह समाचार भी नहीं है।आलोचना महिमा मंडन या महोत्सव भी नहीं है कि आलोचक को नायक के रुप में पेश किया जाय। लेकिन फिलहाल आलोचना में यह खेल खूब चल रहा है। आलोचना की धुरी है अवधारणा । लेकिन अधिकांश आलोचकों ने अवधारणा में सोचना और लिखना बंद कर दिया है अथवा आलोचना से तदर्थ रिश्ता बना लिया है। फलतः आलोचना में विभ्रमों की बाढ़ आ गयी है। आत्मज्ञान और कॉमनसेंस के आधार पर ज्यादा लिखा जा रहा है । इस प्रवृति को विश्लेषित करने के मेरे सामने दो अवधारणाएं हैं 'वर्गसंघर्ष' और 'बहुलतावाद' ।

सन् 2001 में नामवर सिंह ने कहा 'कभी-कभी बड़े आलोचक भी आत्मरति के शिकार हो जाते हैं और उनके भी कई अन्धबिन्दु होते हैं।डॉ.रामविलास शर्मा ने सुमित्रानन्दन पन्त पर जो लिखा, वह 'आत्मरति' ही था। इसी प्रकार कार्ल मार्क्स के लिए ' वर्ग संघर्ष' एक ऐसा अंधबिन्दु है ,जिससे परे वे कुछ और देख ही नहीं सके। दुर्भाग्यवश भारत में कई मार्क्सवादियों ने भी उनके 'अन्धबिन्दु' को ज्यों का त्यों उठा लिया। वे मजदूर के शोर में किसान को और वर्ग के शोर में जाति और वर्ण को भूल गए।'
सवाल यह उठता है क्या मार्क्स के यहां 'वर्गसंघर्ष' 'आत्मरति ' या अंधबिन्दु है ? यह सच है हिन्दी आलोचना ने और खासकर प्रगतिशील आलोचना ने जाति और वर्ण के सवाल की घनघोर उपेक्षा की है। दलितों के लेखन की उपेक्षा की है।
लेकिन 'वर्गसंघर्ष' की अवधारणा को समीक्षा में स्थापित करने में एक जमाने में आलोचकों को अतिरिक्त जोर देना पड़ा। उनके लिए यह धारणा नई थी और समीक्षा में इसको कोई मानता नहीं था। मुश्किल यह है कि समीक्षकों ने 'वर्ग संघर्ष' की धारणा को राजनीतिक अर्थशास्त्र को समझे बिना इस्तेमाल किया। जबकि राजनीतिक अर्थशास्त्र के बिना 'वर्ग' और 'वर्गसंघर्ष' को समझा नहीं जा सकता।
मार्क्स के यहां यह 'अंधबिन्दु' नहीं है। इंग्लैंड में किस तरह का पूंजीवादी समाज विकसित हो रहा था और औद्योगिक सभ्यता में किस तरह के अन्तर्विरोध पैदा हो रहे थे उनकी मीमांसा करते हुए वर्ग की अवधारणा सामने आती है। कम्युनिस्ट घोषणापत्र का आरंभ ही वर्गसंघर्ष की धारणा से होता है।
मार्क्स वर्ग और वर्गसंघर्ष के परे किसी भी समाज को नहीं देखते। वर्गों के आगमन के साथ ही वर्गसंघर्ष पैदा होता है ।वर्गीयचेतना का उदय होता है। मार्क्स के लिए 'वर्गसंघर्ष' की धारणा मात्र भाषायी पदबंध नहीं है जिसे मनमाने ढ़ंग से बदला जाय या तोड़मरोड़ कर पेश कर दिया जाय। उनके लिए यह दृष्टिकोण का अंग है। वर्गसंघर्ष की धारणा के बिना मार्क्सवादी विश्वदृष्टिकोण नहीं बनता ।यह सामाजिक परिवर्तन के नियमों का पता करने की कुंजी है।
वर्गीयसमाज है तो वर्गसंघर्ष भी होगा। एक मार्क्सवादी की यह जिम्मेदारी है कि वर्गसंघर्ष के रूपों ,देशज विशिष्टताओं और जटिलताओं की खोज करे। यह दुर्भाग्य की बात है हिन्दी समीक्षा में वर्गसंघर्ष की धारणा का कई समीक्षकों ने यांत्रिक रूप में और बिना समझे इस्तेमाल किया है। जबकि मार्क्स-एंगेल्स के लिए यह एक क्रिएटिव धारणा है वे इसे लेकर किसी भी किस्म की अंतिम राय नहीं देते। यह शोषक-शोषित का संघर्ष मात्र नहीं है बल्कि उसके अनेक आयाम हैं। यह बंद धारणा नहीं है ,बल्कि खुली धारणा है।कालांतर में इससे जुड़े नए रुपों का जन्म हुआ। वर्गसंघर्ष और वर्ग की धारणा में भी बदलाव आया।
दूसरी बात यह है अर्थशास्त्र, राजनीति,दर्शन और कलाओं में वर्गसंघर्ष और वर्गसंबंधों की प्रकृति एक जैसी अभिव्यक्त नहीं होती,मसले भी एक जैसे नहीं होते। नामवर सिंह ने कहा है साहित्य में हाशिया बहुत महत्वपूर्ण होता है। यह बात वर्गसंघर्ष की धारणा पर भी लागू होती है। मार्क्स ने जब वर्गसंघर्ष की धारणा का प्रतिपादन किया था तो उस समय यह हाशिए पर थी ,आज भी हाशिए पर है।
नामवर सिंह अधिकांश समय सिर्फ सवाल उठाते हैं। किसी भी समस्या पर ठहरकर विचार नहीं करते। घटनाओं,वस्तुओं,कृति,कृतिकार आदि के प्रति उनकी चलताऊ टिप्पणियां समीक्षा को हल्का बनाती हैं। इससे 'आलोचना' का 'समाचार' में रुपान्तरण हुआ है। आलोचना सनसनीखेज खबर बनी है। अब लोग आलोचना नहीं पढ़ते बल्कि नामवर ने क्या कहा,यह देखते हैं। इससे आलोचना का खबर में रुपान्तरण हुआ है।
आलोचक का काम सनसनी पैदा करना नहीं है। हिन्दी समीक्षा में 'वर्ग' और 'वर्गसंघर्ष' की अवधारणा का जिन आलोचकों ने जमकर इस्तेमाल किया है वे भारतीय पूंजीवाद की मीमांसा के प्रति उदासीन रहे हैं और कम्युनिस्ट पार्टी के बयानों से ही पूंजीवाद की समझ बनाते रहे हैं। लंबे समय तक कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं की भी भारतीय पूंजीवाद को लेकर कोई सुसंगत समझ नहीं थी। खासकर सन् 1947 के पहले तो एकदम सुसंगत समझ नहीं थी ।आजादी के बाद भी सन् 1970 के बाद ही कुछ गंभीर काम हुआ ।
प्रगतिशील आलोचकों ने अपनी पहल पर न तो कभी पूंजीवाद को जानने की कोशिश की और नहीं कभी राजनीतिक अर्थशास्त्र के साथ वर्गसंघर्ष की धारणा के सर्जनात्मक संबंध को भारत के संदर्भ में विश्लेषित किया । वे सरलीकरणों का इस्तेमाल करते रहे हैं। मसलन्, पूंजीवाद लुटेरी व्यवस्था है । फलतः शोषण, उत्पीडन, असमानता आदि के अलावा वे किसी और चीज को देख ही नहीं पाए। वे पूंजीवाद पर एकायामी नजरिए से विचार करते हैं । जबकि सच यह है पूंजीवाद एक समग्र व्यवस्था है और उसके पास समाज,संस्कृति,राजनीति, जीवनशैली आदि के बारे में गतिशील और रुढ़िबद्धताहीन नजरिया है। इसे संशय और अविश्वास के आधार पर नहीं समझा जा सकता । इकहरे ढ़ंग से या अछूतभाव से पूंजीवाद को समझना मुश्किल है। पूंजीवाद को समझने के लिए सरलीकरणों से बचने की जरुरत है।जो लोग सरलीकरणों में लिख रहे हैं वे ही इसे लेकर संशय और अविश्वास के शिकार भी हैं। संशय और अविश्वास का भाव हमेशा अज्ञान या पल्लवग्राही ज्ञान से पैदा होता है। हिन्दी आलोचक इनदिनों पल्लवग्राही ज्ञान से काम चला रहे हैं। बिना सोचे समझे अधकचरे ढ़ंग से अवधाणाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं इससे आलोचना की व्यापक क्षति हुई है। इस संवृत्ति को समझने के लिए एक और उदाहरण देखें।
नामवर सिंह ने लिखा है “ बहुलतावाद सेक्युलर होने की गारंटी नहीं है।इस बहुलतावाद में जातियों और सम्प्रदायों का पदानुक्रम था तथा हर युग में विशेषाधिकार सम्पन्न एक धर्म और सम्प्रदाय का वर्चस्व था। लेकिन बहुलतावाद के बिना सेक्युलर होना संभव नहीं है।”
नामवर सिंह की बहुलतावाद को लेकर बुनियादी समझ ठीक नहीं है। वे बहुलतावाद को सामाजिक संरचनाओं के संदर्भ में देख रहे हैं। यदि बहुलतावाद को सामाजिक संरचनाओं के संदर्भ में देखेंगे तो समाजवाद के बाद भी जातियां रहेंगी और उनके बीच में अंतर भी रहेगा।पदानुक्रम भी रहेगा। इसके अलावा नए किस्म का विशेषाधिकार संपन्नवर्ग के रूप में कम्युनिस्ट पार्टी रहेगी।ऐसा सोवियत संघ में रहा है। रूसी जाति का वर्चस्व वहां सबसे बड़ी इल्लत थी।
भारत में बहुलतावाद सिर्फ जातियों के स्तर पर ही नहीं है बल्कि धर्म ,राजनीति और संस्कृति के स्तर पर भी है। समाज में यह संभव नहीं है कि सामाजिक संरचनाओं में बहुलतावाद हो और कला,राजनीति,धर्म,दर्शन में न हो। सोवियत संघ के पराभव के अनेक कारणों में से एक बड़ा कारण है विचार,राजनीति और कलाओं में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा बहुलतावाद का खात्मा। वे समाज में बहुलतावाद मानने को तैयार थे लेकिन जीवन के अन्य क्षेत्रों में नहीं । फलतः सोवियत संघ बिखर गया।
बहुलतावाद को मानने का अर्थ है समाज से लेकर कलाओं तक इसकी भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करना। हमारे देश में बहुलताबाद हर स्तर पर है लेकिन इसे नए सिरे परिभाषित करने की जरूरत है। संविधान निर्माताओं ने आज से 65 साल पहले बहुलतावाद को भारत की विविधता को परिभाषित करते हुए खोला था।इधर के सालों में बहुलतावाद को लेकर अनेक किस्म के नए सोच भी सामने आए हैं। इनमें नामवर सिंह की भी एक राय है जो एकदम अवैज्ञानिक है। नामवर सिंह की समझ में कई बुनियादी गड़बड़ियां हैं ,वे मानते हैं “बहुलतावाद सेक्युलर होने की गारंटी नहीं है।”
असल में सार्वजनिक जीवन में सेक्युलर सभी धर्मों को समानता का दर्जा देता है । धार्मिक कामकाज में राज्य हस्तक्षेप नहीं करता । राजनीति में धर्म को हस्तक्षेप नहीं करने देता। ठीक बहुलतावाद यही काम करता है वह विभिन्न संस्कृतियों को स्वायत्त सांस्कृतिक परिवेश प्रदान करता है,सांस्कृतिक विकल्पों के लिए स्थान देता है। विभिन्न मान्यताओं और नीतियों को समान स्थान देता है। इच्छानुसार संगठन बनाने की स्वतंत्रता की गारंटी करता है। नागरिक को विकल्प चुनने का मौका देता है। विविध किस्म के अनुभव देता है।
भारत में बहुलतावाद का आधार है उदार पूंजीवाद। इसमें पदानुक्रम और भेदभाव रहेगा । इसके कारण बहुलतावाद में भी भेदभाव ,शोषण , असमानता है। बहुलतावाद की खूबी है कि इसमें आप पुराने और नए ढ़ंग से एक साथ सोच सकते हैं और जी सकते हैं।मसलन् ऐसे लोग भी रहेंगे जो जाति मानते हैं और ऐसे लोग भी रहेंगे जो जाति नहीं मानते। नयी और पुरानी संरचनाओं में अन्तर्विरोध बना रहेगा। इससे मुक्ति संभव नहीं है क्योंकि उदार पूंजीवाद ने हमारे देश में पर्सुएशन के आधार पर अन्तर्विरोधों को हल करने का मार्ग अपनाया है। इस नजरिए से देखें तो भारतीय बहुलतावाद का पश्चिमी बहुलतावाद से गहरा अंतर है। इसी तरह जाति के सवालों को भी पर्सुएशन और समानता के आधार पर हल करने के प्रयास होते रहे हैं।इसीलिए जाति के प्रति नए पुराने दोनों ही रुप सक्रिय हैं।
बहुलतावाद की पश्चिम में धुरी है नए का दबाव और सत्ता की नए के प्रति पक्षधरता।इसके विपरीत भारत में बहुलतावाद की धुरी में दबाव जैसा तत्व नहीं है। यहां पर पर्सुएसन से काम लेते हैं। मसलन् यहां पर अधिकांश लोग आज भी जाति को मानते हैं ,समाज में छोटा तबका है जो जाति को नहीं मानता। संविधान में इन दोनों के लिए स्थान है और पर्सुएशन के आधार पर जाति उन्मूलन के प्रयास किए जा रहे हैं। बहुलतावाद के प्रति दबाव की बजाय पर्सुएशन पर जोर देना वस्तुतःलोकतांत्रिक भाव है।आप भगवान और विज्ञान दोनों को एक साथ मान सकते हैं और ये दोनों समाज में एक साथ रह सकते हैं। समाज में खाप पंचायतें और पंचायतें एक साथ रह सकती हैं। विभिन्न नागरिकों को समान अधिकार हैं,साथ ही अनेक समुदायों के निजी अधिकारों को भी संविधान संरक्षण देता है और उनमें हस्तक्षेप नहीं करता।
सामाजिक समूहों की निजता और सामूहिकता के बीच में पर्सुएशन के आधार पर संतुलन बनाने पर जोर है। विभिन्न जातियों को अपनी मान्यताओं, रीति-रिवाजों, मूल्यों आदि को बरकरार रखने का हक है। संविधान उनसे वंचित नहीं करता। इस समूची प्रक्रिया में उदारतावादी पूंजीवादी मूल्यों का धीमी गति से प्रचार –प्रसार हुआ है । धीमी गति और प्रच्छन्न तरीकों से वैचारिक, सांस्कृतिक और जीवनशैलियों को बदला गया है। मसलन् स्त्रियों के पहनावे में आए रेडीकल परिवर्तनों को देखें।बिना किसी राजाज्ञा के सभी औरतों के वस्त्रों का रुपान्तरण हुआ है,इस रुपान्तरण में विज्ञापन की पर्सुएशन कला की केन्द्रीय भूमिका है।
बहुलतावाद को पूंजीवादी गतिशीलता तब मिलती है जब वह जाति ,संस्कृति या धर्म की सीमाओं का अतिक्रमण करता है। यह अतिक्रमण विभिन्न कारणों से संभव है। कभी यह अतिक्रमण स्वतः होता है,कभी परिस्थितियां अतिक्रमण करने को मजबूर करती हैं ,कभी राज्य की नीतियों के कारण होता है और कभी जीवनशैली में आए बदलाव के कारण होता है। बहुलतावाद को यदि जड़ या स्थिर केटेगरी मानेंगे तो स्थितियां समझ में नहीं आएंगी।
मसलन् धर्म में मौजूद वैविध्य और उसकी सामाजिक भूमिका में भी बदलाव आया है। धर्म को संविधान के पैरामीटर के दायरे में रहकर काम करना होता है।जातियों को भी संविधान की लक्ष्मण रेखा माननी होती है।पूर्व-आधुनिक व्यवस्थाओं में बहुलतावाद था लेकिन उसका नियामक और नियमित करने वाला साझा आधार नहीं था। पूंजीवादी उत्पादन संबंधों और पूंजीवादी राज्य व्यवस्था आने के साथ संविधान के पैरामीटर के आधार पर बहुलतावाद को व्याख्यायित किया गया।
संविधान ने समानता और व्यक्ति की स्वतंत्रता को आधार बनाकर बहुलतावाद और धर्मनिरपेक्षता दोनों की व्याख्या की है और इन दोनों को लोकतंत्र का अपरिहार्य अंग माना है। आधुनिक पूंजीवादी राज्य के उदय के पहले भी धार्मिक-सांस्कृतिक और सामाजिक बहुलतावाद था लेकिन उसको कभी व्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता के आधार नहीं देखा गया। व्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता के आधार पर देखने की परंपरा पूंजीवादी राज्य व्यवस्था के आगमन के साथ आरंभ हुई।
इस प्रसंग में समाजवाद की भी मुश्किलें सामने आई हैं। वहां समानता तो है लेकिन व्यक्ति स्वतंत्रता नहीं है। फलतः बहुलतावाद को समाजवाद में सत्ता के दमन और दबाव का सामना करना पड़ा।
बहुलतावाद और धर्मनिरपेक्षता के लिए समानता ही काफी नहीं है बल्कि व्यक्ति की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी भी चाहिए। धर्मनिरपेक्षता यदि इन दोनों के बिना होगी तो उसके अधिनायकवाद या सर्वसत्तावाद में तब्दील हो जाने की संभावनाएं हैं। धर्मनिरपेक्षता को प्रभावी होना है तो उसे व्यक्ति की स्वतंत्रता ,समानता और अभिव्यक्ति की आजादी को आधार बनाना होगा। खाली समानता और न्याय के आधार पर परिभाषित धर्मनिरपेक्षता वस्तुतः अधिनायकवादी धर्मनिरपेक्ष राज्य को जन्म देती है।यही वजह है कि आपातकाल में भारत के संविधान के आमुख में धर्मनिरपेक्ष और समाजवाद पदबंध जोडे गए। यह वह दौर था जब राजनीतिक बहुलतावाद को अस्वीकार किया गया।
समाज में सामाजिक-धार्मिक-सांस्कृतिक बहुलतावाद रहे इसके लिए यह जरूरी है कि राजनीतिक बहुलतावाद भी रहे। समानता और न्याय पर आधारित धर्मनिरपेक्षता में राजनीतिक बहुलतावाद के खत्म कर दिए जाने की संभावनाएं हैं। आपातकालीन भारतीय अनुभव और समाजवादी देशों का अनुभव इस धारणा को पुष्ट करता है। अतःधर्मनिरपेक्षता के लिए समानता और न्याय ही काफी नहीं है इसके साथ व्यक्ति की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी भी जरूरी है। इससे राजनीतिक बहुलतावाद और लोकतंत्र को बचाए रखने में मदद मिलती है, पर्सुएशन से दिल जीतने वाली नीति के लिए भी वातावरण बनाने में मदद मिलती है।
समाजवाद ,सर्वसत्तावाद या अधिनायकवादी शासन व्यवस्थाएं धर्मनिरपेक्षता को तो मानती हैं लेकिन व्यक्ति की स्वतंत्रता ,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पर्सुएशन की नीति को नहीं मानते। दबाब और वर्चस्व की नीति बहुलतावाद का निषेध है। उदार पूंजीवाद में पर्सुएशन एक बड़ा उपकरण है जिसके जरिए आधुनिकीकरण की प्रक्रिया संपन्न होती है। बहुलतावाद को उन समाजों में क्षति पहुँची है जहां दबाव की राजनीति रही है।
भारत का संविधान सभी जातियों और धर्मों के मानने वालों की प्राइवेसी मानता है और निजी संस्कारों की सुरक्षा की गारंटी देता है । संविधान में विभिन्न समुदायों के निजी कानूनों को भी मान्यता दी गयी है।
सरकार निजी मान्यताओं, मूल्यों और संस्कारों में तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकती जब तक कोई शिकायत न करे।शिकायत करने पर समस्या का समाधान संविधान सम्मत आधार पर होता है। यहां तक कि सरकार पुरानी सड़ी-गली रीतियों और रिवाजों के मामले में भी हस्तक्षेप नहीं कर सकती। पूंजीवादी राज्य का यह लिबरल रूप समाज के तानेबाने को पर्सुएशन के आधार पर बदलने में विश्वास करता है। राज्य चाहे तो जबर्दस्ती कर सकता है लेकिन उससे राज्य का लिबरल ढांचा बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। यहां तक कि सड़ी गली मान्यताओं और कुरीतियों के खिलाफ जन आक्रोश जब व्यक्त होता है या उनके खिलाफ कोई नागरिक शिकायत करता है तो राज्य सक्रिय होता है।
नामवर सिंह जिस आधार पर सेक्युलरिज्म को परिभाषित करते हैं उनको यही लगता है कि अभी भारतीय समाज में सेक्युलरिज्म को 'वर्क-आउट' करना बाकी है। सच यह है भारतीय संदर्भों में धर्मनिरपेक्षता संवैधानिक तौर पर परिभाषित है और राज्य कमोवेश उसका पालन कर रहा है। लेकिन राजनीतिकदलों के आचरण में इसका अभाव है।
नामवर सिंह की यह चिन्ता जायज है कि “केवल राज्य के सेक्युलर होने से हमारा काम नहीं चल सकता,समाज को सेक्युलर होना पड़ेगा।” सवाल यह है इसके लिए क्या करें ? इसकी कोई परिकल्पना नामवर सिंह नहीं देते।
सवाल यह है धर्मनिरपेक्ष समाज की परिकल्पना क्या है ? क्या मानवाधिकारों को दरकिनार करके धर्मनिरपेक्ष समाज संभव है ?मानवाधिकारों की चेतना और उनके आधार पर विभिन्न स्तरों पर संगठनों का निर्माण ही धर्मनिरपेक्ष समाज को पुख्ता बना सकता है। हमें शीतयुद्ध और समाजवाद के नजरिए से बाहर निकलकर धर्मनिरपेक्षता,वर्गसंघर्ष और बहुलतावाद के बारे में सोचना चाहिए।


















1 टिप्पणी:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन 'OPEN' और 'CLOSE' - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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