शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

दो पड़ोसियों की लाइफलाइन है दोस्ती


 कल भारत-पाक के बीच विदेश सचिव स्तर की बातचीत खत्म हुई तो मीडियावाले विवाद खोज रहे थे, पंगे वाले सवाल उठा रहे थे। बातचीत को व्यर्थ बता रहे थे। प्रेस काँफ्रेस में भारत की विदेश सचिव निरुपमा राव शांतभाव से पत्रकारों के सवालों के जबाव दे रही थीं,राव की बॉडी लैंग्वेज में जो स्वाभाविकता और सहजता थी वह तारीफ के काबिल है।
   कूटनीति की भाषा शरीर की भावभंगिमा के जरिए बहुत कुछ कह देती है। निरुपमा राव की भावभंगिमा ने मीडिया की सनसनी को ठंड़े बस्ते में ड़ाल दिया है। दोनों पड़ोसी देशों में बातें हों यह सभी चाहते हैं,खासकर इन देशों की जनता यही चाहती है।
   विदेश सचिव स्तर की बातचीत के ठीक पहले पूना में ब्लास्ट हुआ जिसमें अनेक लोग मारे गए। आतंकी नहीं चाहते कि भारत-पाक में दोस्ती और संवाद बने। दोनों देशों के संबंध ज्यों ही सामान्य होने शुरु होते हैं कोई न कोई हंगामा खड़ा कर दिया जाता है। मीडिया इस प्रक्रिया में आग में घी का काम करता रहा है। मीडिया और दोस्ती विरोधी देशी ताकतों को( ऐसी ताकतें दोनों देशों में हैं)  यह बात पसंद नहीं है कि भारत-पाक में दोस्ती बनी रहे।
  कायदे से देखा जाए तो इसबार की बैठक सार्थक रही है। लंबे अंतराल के बाद यह बैठक हो पायी है। इस तरह की बैठकें ज्यादा होनी चाहिए । राष्ट्रों की समस्याएं कूटनीतिक वार्ताओं से हल होती है, पंगों से नहीं,घृणा से नहीं। भारत ने पाक को 3 दस्तावेज सौंपे हैं जिनमें पाक से चलने वाली आतंकी गतिविधियों का कच्चा चिट्ठा है और भारत ने इन तीनों दस्तावेजों पर कार्यवाही की मांग की है।

हमें यह ध्यान रखना होगा कि पाक में आईएसआई जैसा खतरनाक खुफिया संगठन है जो अमेरिकी गुप्तचर संस्था के साथ मिलकर काम करता रहा है। भारत और पाकिस्तान में आतंकी ग्रुपों को वह मदद करता रहा है और आज भी कर रहा है। कुछ अर्सा पहले तक अमेरिकी नागरिक रिचर्ड हेडली जैसे जासूस भारत में आतंकियों के लिए काम करते रहे हैं, हमारी सरकार अभी तक अमेरिकी प्रशासन के साथ गरमी के साथ हेडली जैसे खतरनाक व्यक्तियों के बारे में बात नहीं कर पायी है। हेडली को लेकर अमेरिका के प्रति संघ परिवार भी चुप है ,यह चुप्पी बड़ी अर्थपूर्ण है, भारत को अमेरिका को साफ कहना चाहिए कि हेडली को वह हमें सौंपे, हम पाक से आतंकियों को सौंपने की मांग कर रहे हैं, लेकिन अमेरिका से हेडली को सौपने की मांग क्यों नहीं करते ? क्या बात है कि आतंकियों के साथ अमेरिकी जासूसी संस्थाओं के संबंध हमें दिखाई नहीं दे रहे। हेडली के मामले में अमेरिकी विदेश विभाग भी फंसा हुआ है,हेडली को अमेरिका ने क्यों भेजा यह अभी भी रहस्य बना हुआ है। हिन्दी में कहावत है चोर को न मारो चोर की मईया को मारो। आतंक की गंगा अमेरिका से आ रही है। यह बात मीडिया वाले भी नहीं बताते और नहीं अमेरिका से ही हेडली को भारत को सौंपने की मांग करते हैं। इसी को कहते हैं मीडिया की अमेरिकी भक्ति और पाक द्वेष।
    भारतीय उपमहाद्वीप में अमेरिका सबसे बड़ा खतरा है न कि पाकिस्तान। आतंकी नरक में पाक को डुबोने वाला अमेरिका है और आतंकवाद के बहाने पाक को अमेरिका हजम कर जाना चाहता है, यदि ऐसा होता है तो भारत के लिए खतरा और भी बढ़ जाएगा। पाक को दोस्ती के मार्ग पर लाना हमारी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। भारत-पाक दोस्ती बनी रहे इससे इस क्षेत्र की जनता को लाभ होगा। जबकि अमेरिकी शस्त्र उद्योग नहीं चाहता कि भारत-पाक में दोस्ती बनी रहे,शस्त्र उद्योग के विचारक और दलाल बार बार मीडिया में आ रहे हैं और वे उन्हीं बातों पर जोर दे रहे हैं जिससे भारत-पाक में और भी कटुता पैदा हो । हमें भारत-पाक में दोस्ती के बिंदुओं को सामने लाना होगा और यही अमेरिकी शस्त्र उद्योग को करारा प्रत्युत्तर होगा। भारत­­ -पाक एक-दूसरे की लाइफलाइन हैं। किसी अवस्था में यह लाइन बंद नहीं होनी चाहिए।   


1 टिप्पणी:

  1. कुछ अर्सा पहले तक अमेरिकी नागरिक रिचर्ड हेडली जैसे जासूस भारत में आतंकियों के लिए काम करते रहे हैं, हमारी सरकार अभी तक अमेरिकी प्रशासन के साथ गरमी के साथ हेडली जैसे खतरनाक व्यक्तियों के बारे में बात नहीं कर पायी है। हेडली को लेकर अमेरिका के प्रति संघ परिवार भी चुप है

    प्रोफ़ेसर साहब आप ड्राफ्ट फ़ाइनल करने से पहले अपने तथ्यों को दुरुस्त कर लेते तो अच्छा होता. पहली बात तो यह की पहले पक्का कर लें की उस तथाकथित 'अमेरिकी' जेहादी का नाम रिचर्ड हेडली ही है.

    जहाँ तक मेरी जानकारी है उसका नाम 'डेविड कोलमैन हैडली' है.

    डेविड कोलमैन हैडली एक पाकिस्तान में जन्मा पाकिस्तानी मूल का ही आतंकवादी है, जिसके पिता ने एक अमेरिकी महिला से विवाह किया था. जिसका असली नाम 'दावूद गिलानी' है. वह लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा हुआ है, जिसने कुछ सालों पहले अमेरिका में रहते हुए पहचान छिपाने के लिए अपना नाम दावूद गिलानी से बदलकर 'डेविड कोलमैन हैडली' रख लिया था.

    अमेरिकी सरकार उसे कभी भी भारत को नहीं सौंपने वाली भले ही उसका हाथ भारत में हुई आतंकी घटनाओं में रहा हो, इसके कई कारण है. पहला की अमेरिका को इस बात की तह तक जाना है की आखिर किसने और क्यों उसका सहयोग किया? क्या अमेरिकी तंत्र में कुछ ऐसे लोग घुस चुके हैं जो आतंकियों से सहयोग करते हैं? या उसने किन्ही लूपहोल्स का फायदा उठाया? उससे होने वाली विस्तृत पूछताछ से अमेरिका को न केवल अंदरूनी जेहादी नेटवर्क बल्कि वैश्विक आतंकवाद, और विभिन्न आतंकी नेटवर्कों (लश्कर, अलकायदा, अबूसैयाफ, सिमी, मुजाहिद्दीन वगैरह) के बीच तालमेल के बारे में भी अहम् सुराग मिल सकेंगे. दावूद गिलानी का खाड़ी देशों में भी काफी आना जाना था.

    दूसरा यह की हो सकता है अमेरिका को उससे आतंकियों के भावी एजेंडे और योजनाओं के बारे में नहीं जानकारियां मिल सकें.

    तीसरा की उससे यह जानकारी भी मिल सकेगी की उसकी तरह और कितने और अन्डरकवर जेहादी अमेरिका और यूरोप में रह रहे हैं.

    चौथा की दावूद गिलानी एक बड़ा जेहादी एजेंट है, वह अवश्य यह जानकारी रखता होगा की ज्ञात स्त्रोतों के आलावा जेहादी गुट कहाँ कहाँ फंडिंग और आर्थिक मदद जुटाने लगे हैं.

    पांचवा की क्या जेहादियों के तार फंडिंग के लिए वैश्विक ड्रग ट्रैफिकिंग से जुड़े हैं? अगर हां तो इनकी कार्यप्रणाली क्या है, और इनके ड्रग नेटवर्क में क्या दक्षिण अमेरिकी माफिया भी शामिल है?

    छठा की क्या जेहादी नाभिकीय सामग्री और टेक्नोलोजी की तस्करी में शामिल हैं? कितने आतंकी संगठनों की परमाणु हथियारों तक पहुँच बन चुकी है?

    इन सभी और इनके साथ कई और संभावनाओं और आशंकाओं का उत्तर पाने के लिए अमेरिका दावूद गिलानी को अपनी हिरासत में ही रखना चाहेगा. भारत तो ऐसा सोफ्ट स्टेट है की वह अजहर मसूद जैसों को यूँ ही राजनैतिक दबाव में छोड़ देता है, अफज़ल गुरु को दशक भर से हिरासत में रखा हुआ है पर कितनी जानकारी उससे उगलवाई जा सकी वह वही जाने, कसाब को तो अब माफ़ कर देने की मांग तक उठ रही है. क्या अमेरिका की नज़र में भारत इस लायक है की उसे 'रिचर्ड हैडली' जैसा प्रमुख आतंकवादी सौंपा जाए. और क्या वह इन जेहादियों से अमरीका से बेहतर ढंग से जानकारी ले सकता है?

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    आपके इस आलेख से पता चलता है आपकी जेहाद की रिसर्च मीडिया की भ्रामक रिपोर्टिंग तक सीमित है. मीडिया पर सीधा दबाव है की वह दावूद गिलानी का असली नाम प्रसारित करने से बचे, और उसके विशुद्ध अमेरिकी-ईसाई होने का भ्रम बनाए रखे. पर इससे सच्चाई नहीं बदल जाती. गुज़ारिश है की टीवी थोडा कम देखें, और गंभीर स्त्रोतों से जानकारी लें. और अपने आलेखों के साथ उद्धरण एवं सन्दर्भ अवश्य दें.

    गलती आपकी भी नहीं है, नेट की गति से लिखने में कभी कभी रिसर्च और क्वालिटी से समझौता करना पड़ता है. और मीडिया तो हिंदी भाषियों को हद दर्जे का मुर्ख समझता ही है, आप इंटरनेटी हिंदी के पाठक को भी उतना ही मूर्ख समझते हैं की वह आपके गलत तथ्यों और कोंस्पिरेसी थ्योरी पर यूँ ही भरोसा कर लेगा.

    मैं अपनी संगठित धर्म विरोधी मानसिकता और नास्तिकता और संघ की उलझी विचारधारा के कारण संघ से सहानुभूति नहीं रखता. पर यह तो हद है की आप संघ जैसे सीमित संगठन को ग्लोबल जेहादी और आतंकवादी नेटवर्क के समकक्ष रख रहे हैं. शायद संघ के तार ग्लोबल ड्रग माफिया से जुड़े हों, या हो सकता है की संघियों की पहुँच एटमी हथियारों तक हो. या अज्ञात स्त्रोतों से मिली फंडिंग के माध्यम से हथियार खरीदते हों. अगर संघ इतनी बड़ी आतंकवादी ताकत है तो आप इसपर तुरंत सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से प्रतिबन्ध लगवाएं. यूएन से इसे ब्लैकलिस्ट करने कहें.

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