रविवार, 19 सितंबर 2010

बाबरी मस्जिद विवाद- स्व.राजीव गांधी और लालकृष्ण आडवाणी का हिन्दू खेल

    उल्लेनीय है लालकृष्ण आडवाणीजी ने बेल्जियम के विद्वान की पुस्तक के अलावा एक और पुस्तक जारी की थी ‘‘हिंदू मंदिर: उनका क्या हुआ ’’ इसमें अरूण शौरी, हर्ष नारायण, जय दुबासी, राम स्वरूप तथा सीताराम गोयल आदि के लेहैं। गोयल के लेमें 2000 मुस्लिम इमारतों की सूची है। ये वे इमारतें हैं जो मंदिरों को तोड़कर बनाई गई थीं। अब आडवाणी तय करें कि वे किस पुस्तक को अपने प्रमाण के लिए इस्तेमाल करना चाहेंगे? क्योंकि ऐतिहासिक, साहित्यिक, पुरातात्विक प्रमाण उनके साथ नहीं हैं। यहां तक कि विदेशी बेल्जियम विद्वान भी उनके मूल लक्ष्य को पूरा नहीं करता।
इस समूचे प्रकरण में विहिप एवं भाजपा ने डा.एस.सी.गुप्ता के इतिहास लेक को खूब अपने पक्ष में उछाला है, इन्हीं महाशय ने 23 दिसंबर 1989 को गुंटूर आंध्र प्रदेश में कहा था कि राममंदिर मस्जिद के सामने वाले हिस्से में स्थित 'चबूतरे' पर था। क्या इतिहासकार महोदय बताएंगे कि गुंटूर के बयान में एक वर्ष में ऐसा कौन सा ऐतिहासिक साक्ष्य जुड़ गया, जिसके कारण वे अचानक नए ऐतिहासिक साक्ष्य लेकर अवतरित हुए हैं।
      असल में, उस समय एक नई कोशिश चल रही थी। भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी ने उस समय प्रस्ताव दिया था। संघ परिवार उसी प्रस्ताव की ओर आंखें लगाए बैठा है। स्व.राजीव गांधी ने 1 दिसंबर 1990 के अपने प्रस्ताव में कहा था कि एक जांच कमीशन बनाया जाए जो यह पता करे कि क्या राममंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी इसके लिए पांच कार्यरत सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों का कमीशन बनाया जाए जिनका चयन मुख्य न्यायाधीश करेंगे। तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.चंद्रशेर ने भी इस फॉर्मूले को लागू करने का मन बना लिया था । उस समय वामपंथी दलों खासकर माकपा के वरिष्ठ नेता हरिकिशन सिंह सुरजीत के दबाब के कारण यह प्रस्ताव लागू नहीं हो पाया था।  
      संघ परिवार और कांग्रेस के लोग अंदर -अंदर फिर से इस प्रस्ताव की दिशा में काम कर रहे हैं। धर्मनिरपेक्ष ताकतों को केन्द्र सरकार पर निगरानी रखनी चाहिए जिससे वह ऐसा कोई भी प्रस्ताव लागू न कर सके जो भारत धर्मनिरपेक्ष चरित्र को कलुषित करे। वस्तुत: यह प्रस्ताव ही बेमानी है। इस प्रक्रिया में हिंदू तत्ववादियों के हाथों मस्जिद की जमीन सौंपे जाने की आशाएं हैं।
     बाबर ने मंदिर तोड़ा था या नहीं, किसी और ने तोड़ा था या नहीं, क्या इसका फैसला हो जाने भर से भारतीय दंड संहिता एवं पुरातत्व संरक्षण कानून के प्राचीन इमारतों से संबंधित सभी कानूनी प्रावधानों को क्या कोई भी सरकार एक ही झटके में बदल सकती है ?  अगर ऐसा होता है तो धर्मनिरपेक्ष संविधान एवं कानून की समूची प्रकृति ही बदलनी होगी।
     स्व. राजीव गांधी का फॉर्मूला वस्तुत: धर्मनिरपेक्ष कानून की प्रकृति को ही तोड़ देगा। अपने प्रधानमंत्री काल में स्व.चंद्रशेर जी ने स्व.राजीव गांधी के प्रस्ताव का खुला समर्खन किया था। यह प्रस्तान अभी भी पुराने अखबारों और राजनीतिक दलों की फाइलों में हैं।
      उल्लेखनीय है जनता पार्टी के अध्यक्ष के नाते स्व.चंद्रशेर ने 9 नवंबर 1987 को कहा था कि बाबरी मस्जिद के सवाल पर इतिहास का दुरूपयोग किया जा रहा है। मंदिर का ताला खोलकर बड़ी भूल की गई है, अमृतसर का ब्लूस्टार ऑपरेशन ही पर्याप्त था, इसे राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के संदर्भ में दोहराया नहीं जाना चाहिए। आप जानते हैं कि मस्जिद पांच सौ वर्षों से है, क्या तुम इतिहास की पुनर्रचना करोगे? (द टेलीग्राफ, 11 नवंबर 1987)
उम्मीद है कि बाबरी मस्जिद प्रकरण के बहाने स्व.राजीव गांधी के प्रस्ताव का उनकी पत्नी सोनिया गांधी और उनका बेटा राहुल गांधी अनुकरण नहीं करेंगे और दुबारा इतिहास रचना नहीं होने देंगे! और न ही किसी भी किस्म का सांप्रदायिक शक्तियों की ओर समर्पण करेंगे। देश का प्रधानमंत्री होने के नाते वह राष्ट्रीय एकता परिषद् के उस प्रस्ताव से बंधे हैं, जिसमें बाबरी मस्जिद विवाद पर आम राय कायम हुई थी, सिर्फ भाजपा इसके खिलाफ थी, देश की शांतिप्रिय जनता इस विवाद का सर्वमान्य समाधान चाहती है, पर शांति एवं सद्भाव के साथ, न कि सांप्रदायिक तुष्टीकरण के माध्यम से।
संघ परिवार और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कई बार कहा है कि जिस तरह सोमनाथ मंदिर बनाकर पटेल ने राष्ट्रीय गौरव बढ़ाया, उसी तरह अयोध्या का राम मंदिर बनाकर पुन: राष्ट्रीय गौरव बढ़ाया जाना चाहिए।
      इस संदर्भ में पहली बात तो यह है कि सोमनाथ मंदिर का निर्माण किसी अन्य देवस्थान या इमारत को गिराकर या स्थानांतरित करके नहीं किया गया। वहां खाली जमीन थी तथा सरकार ने मंदिर बनाने का फैसला किया था। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री एन.वी.गाडगिल ने अपनी पुस्तक गवर्नमेंट फ्रॉम इनसाइड में लिखा है कि 'सरदार पटेल और मैं जूनागढ़ गए थे और वह प्राचीन जगह देखी जहां कभी प्राचीन मंदिर था।' हमने यह फैसला किया कि 'इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया जाए।'
आडवाणी का तर्क कि पटेल ने सोमनाथ बनाया। मैं (आडवाणी) अयोध्या मंदिर बनाऊंगा, हास्यास्पद ही नहीं, पटेल का अनादर भी है। सरदार बल्लभभाई पटेल ने 9 जनवरी 1950 को गोविंदबल्लभ पंत को लिखे पत्र में अयोध्या विवाद पर कहा था, 'अगर हम इस मुद्दे का किसी गुट को लाभ उठाने देते हैं तो यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा।' वे कहते हैं, 'इस तरह के विवादों को ताकत के जरिए हल करने का कोई सवाल ही नहीं उठता है। अगर ऐसा हाता है तो कानून तथा व्यवस्था के बलों को हर कीमत पर शांति बनाए रनी होगी। अगर शांतिपूर्ण तथा समझाने-बुझाने के तरीकों का इस्तेमाल किया जाना है तो आक्रमण या जोर-जबर्दस्ती के रूख पर आधारित किसी भी एकतरफा कार्रवाई को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। इसीलिए, यह मेरा पक्का विश्वास है कि इस सिलसिले को इस प्रकार ज्वलंत मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए।' यानी पटेल शांतिपूर्ण समाधान चाहते थे, जोर-जबरर्दस्ती के विरोधी थे, इसे ज्वलंत मुद्दा नहीं बनाना चाहते थे, इसके विपरीत पटेल के नए भक्त आडवाणीजी जोर-जर्बदस्ती से हिंसा के जरिए एवं ज्वलंत मुद्दा बनाकर इसे हल करना चाहते हैं। क्या अब भी पटेल और आडवाणी को एक स्तर पर रखा जा सकता है?





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