मंगलवार, 7 सितंबर 2010

उपभोक्तावाद,सट्टा और फिदेल कास्त्रो

      उपभोक्ता समाज के तेजी से विकास ने प्रकृति और पर्यावरण के विनाश की ओर से हमारा ध्यान हटा दिया है। उपभोग की संस्कृति की जो अंधी दौड़ आरंभ हुई है उसमें हमारे समस्त पर्यावरण का संतुलन ही बिगाड़ दिया है। उपभोक्तावाद को विस्तार देने और चरमोत्कर्ष तक पहुँचाने में विश्व व्यापार संगठन,आईएमएफ,विश्व बैंक और उसके तहत आए आर्थिक कायदों और नीतियों की केन्द्रीय भूमिका है। इसने नए किस्म की दासता और नृशंस शोषण को जन्म दिया है।
    फिदेल कास्त्रो ने इस प्रसंग में लिखा है ‘‘ विकसित देश और उनके उपभोक्ता समाज पर्यावरण के तेजी से हो रहे निरंतर विनाश के लिए जिम्मेदार हैं। उन्होंने विजयों और उपनिवेशीकरण तथा नृशंस शोषण और आज की तीसरी दुनिया के देशों में जन्मे करोड़ों लोगों के उन्मूलन का लाभ उठाया। उन्होंने ही दुनिया और उसके बाजारों के बंटवारे के लिए लड़े गए नृशंस तथा तबाही मचा देने वाले दोनों विश्व युध्दों के बाद लादी गई आर्थिक व्यवस्था का फायदा उठाया। उन्हें ही अमरीका और उसके साथियों को ब्रेटन-वुड्स में दिए गए विशेषाधिकारों तथा केवल उनके लिए और उनके द्वारा बनाए गए आई एम एफ और अन्य अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों का लाभ मिला है।’’
    आज सारी दुनिया के सामने गंभीर समस्याएं हैं लेकिन विकसित देश उनकी तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं। फिदेल ने लिखा है  ‘‘दुनिया के अमीर तथा फिजूलखर्च लोगों के पास ही तकनीकी और वित्तीय संसाधन हैं। वे ही मानव जाति को उसका हक लौटा सकते हैं। आधिपत्यवादी महाशक्ति को चाहिए कि वह अफ्रीकी-अमरीकियों, प्रतिबंधों के साथ जी रहे मूल अमरीकियों तथा कैरीबियाई प्रवासियों और गरीब राष्ट्रों के अन्य लोगों चाहे वे नीग्रो हों अथवा पीले या अश्वेत को विशेष ऋण लौटाए। ये लोग कटु भेदभाव और नफरत का शिकार रहे हैं।’’
     ‘‘हमारे गोलार्द्ध में देशी समुदायों की दुर्दशा को समाप्त करने का अब समय आ गया है। उनमें आई जागृति तथा उनके संघर्षों और उनके खिलाफ किए गए अपराधों की भयावहता को पूरी दुनिया द्वारा माने जाने के बाद अब ऐसा करना जरूरी हो गया है।
दुनिया को इस त्रासदी से बचाने के लिए पर्याप्त धन है। विनाश तथा मौत लाने वाली हथियारों की होड़ और हथियारों की तिजारत वास्तव में बंद हो।’’
      उपभोक्तावाद की अशांत भूख को पैदा करने में विज्ञापनों की बड़ी भूमिका है। जिस समय सारे देश में गरीबी का ताण्डव चल रहा हो वैसे में टीवी पर्दे पर मैकडोनाल्ड के विज्ञापन या ऐसे ही विज्ञापनों का अहर्निश प्रसारण गरीबों के दिल में ईर्ष्या पैदा करता है। साथ ही विज्ञापनों से विभिन्न संस्कृतियों के अस्तित्व पर खतरा पैदा हुआ है। इस समस्या पर राय जाहिर करते हुए फिदेल कास्त्रो ने लिखा है-
     ‘‘वाणिज्यिक विज्ञापनों पर एक खरब अमरीकी डालर खर्च होते हैं। इनसे झूठे भ्रम और पूरी न की जा सकने वाली उपभोक्ता आदतें पैदा होती हैं। साथ ही इनसे राष्ट्रीय संस्कृतियों और पहचानों को नष्ट कर देने वाला जहर फैलता है। इस रकम का बड़ा हिस्सा विकास पर खर्च हो। सकल राष्ट्रीय उत्पादन का छोटा सा 0.7 प्रतिशत हिस्सा शासकीय विकास सहायता के रूप में देने का वायदा किया गया है। यह सहायता वास्तव में दी जाए।’’
   इधर के 30-35 सालों में सत्ताबाजार में तेजी आयी है और ज्यादा से ज्यादा लोग सट्टेबाजी में शामिल हो रहे हैं। सट्टाबाजार के विकास ने कालेधन के सर्कुलेशन के बढ़ा दिया है। बड़ी मात्रा में काला धन बाजार में उथल-पुथल पैदा कर रहा है। इससे मध्यवर्ग की पामाली बढ़ी है। कर्जे बढ़े हैं। हमारे यहां सट्टेबाजी पर सही कर लगाया जाना चाहिए। जैसा कि नोबल पुरस्कार विजेता जेम्स तोबिन ने सुझाव दिया है वर्तमान सट्टा कारोबार पर उचित और कारगर कर लगाया जाए।
समाजवादियों-कम्युनिस्टों पर बार-बार यह दबाब पैदा किया गया कि वे अपने विचारों को बदलें । फलतःअनेक मार्क्सवादियों ने अपने विचारों को बदल लिया और इसका यह दुष्परिणाम निकला कि आज सारी दुनिया में मार्क्सवादी हाशिए पर चले गए। उन्हें यह भरोसा दिलाया गया था कि वे अपने विचार और दल को बदल देंगे तो वे आगे चले जाएंगे लेकिन हुआ एकदम उल्टा। फिदेल कास्त्रो पर भी यह दबाब था। उन्होंने इस दबाब के आगे झुकने से इंकार किया।
    इस प्रसंग में फिदेल ने कहा ‘‘मेरा मानना है कि हम जितनी साफगोई के साथ सत्य को रखेंगे, उसको माने जाने तथा उसका सम्मान करने की उतनी ही अधिक संभावनाएं होंगी। हम कई शताब्दियों तक छलावे में जी चुके हैं। मेरे पास वास्तविकताओं पर आधारित तीन छोटे सवाल और हैं जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। पूंजीवादी, विकसित और धनी देश पूंजीवाद और दुनिया पर थोपी गई एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था से उपजी साम्राज्यवादी प्रणाली के हिस्सेदार हैं जो स्वार्थ के दर्शन तथा लोगों, राष्ट्रों और राष्ट्र समूहों के बीच वहशी प्रतिस्पर्धा पर आधारित है और जो भाईचारे तथा ईमानदार अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के प्रति पूरी तरह से उदासीन है। वे उपभोक्ता समाजों के भ्रामक और गैर जिम्मेदाराना वातावरण में जीते हैं। इस प्रकार यदि हम इस व्यवस्था में उनके विश्वास तथा उनके सर्वाधिक गंभीर राजनीतिज्ञों के विश्वासों की ओर ध्यान न दें तो भी मुझे यकीन नहीं होता कि वे आज की दुनिया की गंभीर समस्याओं को समझेंगे, ऐसी दुनिया जिसमें असंगत और असमान विकास हुआ है और जिस पर अंधे कानूनों तथा लगातार प्रबल और अनियंत्रणीय होते जा रहे अंतर्राष्ट्रीय निगमों की महाशक्ति और हितों का शासन है।’’
‘‘क्या वे दुनिया भर में अव्यवस्था और बगावत को समझेंगे ? यदि वे ऐसा करना भी चाहें तो क्या वे नस्लवाद, प्रजाति भेदभाव, विदेशी द्वेष तथा इन पर आधारित और इनसे जुड़े अन्य मसलों का अंत करेंगे।’’
‘‘मेरे विचार से हम जबर्दस्त आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विश्व संकट के कगार पर हैं। हमें इन वास्तविकताओं के प्रति जागरूकता पैदा करनी चाहिए। इसके बाद विकास अपने आप होगा। इतिहास ने हमें दिखाया है कि संकट से ही बड़े समाधान निकलते हैं। जीवन और न्याय के लिए लोगों का अधिकार हजारों रूपों में खुद को निश्चित रूप से स्थापित करेगा।’’




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