सोमवार, 29 सितंबर 2014

मेडिसन स्क्वेयर के चाक्षुष आनंद की मोदीधुन


        मोदी के भाषणों की सबसे बड़ी विशेषता है मेनीपुलेशन। मेनीपुलेशन के बिना वे भाषण नहीं देते। उनके भाषण की दूसरी विशेषता है फुटपाथशैली। इन दोनों शैलियों का मेडिसन स्केवयर गार्डन में दिए गए भाषण में उन्होंने जमकर इस्तेमाल किया।मसलन् मोदी ने कहा गांधीजी को 'आज़ादी' और 'सफ़ाई' ये दो चीज़ें पसंद थीं। सच यह है गांधीजी को आजादी और साम्प्रदायिक सद्भाव पसंद था। स्वच्छता उनकी राजनीतिक जंग का अंग ही नहीं था। अस्पृश्यता निवारण उनके लक्ष्यों में से एक जरुर था। सवाल यह है मोदीजी यह सब बताना भूल गए अथवा उनकी संघ बुद्धि ने बताने नहीं दिया ?
    मोदी का अपने हर अभियान में महात्मा गांधी का इस्तेमाल बताता है कि आनेवाले दिनों में महात्मा गांधी के विचारों का वे जमकर दुरुपयोग करेंगे । इतिहासकारों की यह जिम्मेदारी है कि इस मामले में सजगता दिखाएं। मोदी जिस तरह विचारधाराहीन महात्मा गांधी पेश कर रहे हैं,इसका इस्तेमाल कर रहे हैं वह भारत के लिए चिंता की बात है। मसलन् महात्मा गांधी का भारत आना,किसी आप्रवासी का भारत आना मात्र नहीं था,जैसाकि मोदी ने पेश किया।वे देश को साम्राज्यवाद की दासता से मुक्त कराने के लक्ष्य के लिए आए थे। मोदी की इतिहासबुद्धि किस तरह कचड़े से भरी है इसका यह नमूनामात्र है। भारत के प्रधानमंत्री का राष्ट्रपिता के विचारों का इस तरह का दुरुपयोग और उनके विचारों को तोड़-मरोड़कर पेश करना भारत की विश्व में इमेज को गिराने वाला है। इससे यह भी संदेश गया है कि मोदी ने महात्मा गांधी को न तो पढ़ा है और न सही रुप में समझा है। मीडिया के उन्मादी प्रचार अभियान के आड़ में भारत के राजनीतिक विचारों और लक्ष्यों के साथ किस तरह का मेनीपुलेशन चल रहा है उसकी ओर नजर रखने की जरुरत है। इसी प्रसंग में एक और उदाहरण लें,मोदी ने कहा मैं बहुत खुश होऊँगा यदि रोज एक कानून खारिज करके निकाला जाय़ । नव्य आर्थिक उदारीकरण की यह मूल मांग है कानूनों को धता बताओ।कानूनहीन लूट की व्यवस्था स्थापित करो। मनमोहन सिंह ने अपने तरीके से इस दिशा में बहुत कुछ ऐसा किया है जिसको 'क्रोनी कैपीटलिज्म'' के नाम से हम सब जानते हैं। कानूनहीन सरकार के फैसले कैसे होते हैं उसका आदर्श नमूना है कोयलाकांड! मोदी कानून निकालो का नारा देकर अपने विलायती आकाओं को खुश करने के साथ देशी आकाओं को भी खुश करने की कोशिश कर रहे थे,लेकिन कोयला खान आवंटन ने कानूनहीन शासन की पोल खोलकर रख दी है।
    कहने का अर्थ है मोदी अपने उन्मादी भाव में जो कुछ बोलते हैं उसका लक्ष्य सिस्टम बनाना नहीं है बल्कि उसका लक्ष्य है सिस्टम को तोड़ना। सिस्टम बनाने में समय लगता है तोड़ने में समय नहीं लगता। नव्य आर्थिक उदारीकरण की जन्मभूमि अमेरिका में 'कानून निकालो' का नारा ओबामा और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को खुश कर सकता है लेकिन हिन्दुस्तान की संघर्षशील जनता इस मनमानी की कभी इजाजत नहीं दे सकती। कानूनहीन शासन की मांग बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पुरानी मांग है। लेकिन देशभक्त जनता कानून का शासन,कानूनी व्यापार,कानूनी उद्योग आदि चाहती है।
     मोदी को मेडिसन स्क्वेयर में जो लोग बैठकर सुन रहे थे, वे मूलतःअमेरिकी नागरिक हैं।ये वे लोग हैं जो भारत से लाभ लेना चाहते हैं लेकिन भारत को इनसे कोई बड़ा लाभ अभी तक नहीं मिला है। ये वे लोग हैं जो वहां जाकर बस गए हैं।जलसे,मेले,इवेंट आदि इनकी दैनंदिन जिंदगी का अंग है। इनमें से अधिकांश देश के प्रति उत्सवधर्मीभाव रखते हैं। इस आयोजन के दौरान वे आनंद-उन्माद और कैमराभाव में डूबे हुए थे। उनके लिए न तो अमेरिका राष्ट्रगान और न भारतीय राष्ट्रगान अर्थपूर्ण था क्योंकि ऑडिएंस में सब अपने आनंद भाव की बार बार अभिव्यक्ति कर रहे थे। वे यह तक नहीं जानते कि राष्ट्रीय गान के समय किस मुद्रा में अपने भावों को प्रदर्शित करें। दर्शकों की इस तरह की उदासीनता से यह संदेश भी गया है आप्रवासी भारतीय अपने को राष्ट्रीयगान की गरिमा के अनुकूल भी अभी शिक्षित नहीं कर पाए हैं।उनकी फूहड़ता का आलम यह था कि राष्ट्रगान के बाद वे तालियां बजा रहे थे। मोदी को इस तरह की जनता में मजा आता है और यही फूहड़ जनता हर हर मोदी में मगन है।  
     मोदी की फुटपाथी विक्रयशैली के लिए देश और उसके लोग माल हैं। देश बिकाऊ है। मोदी ने जिन तीन चीजों को भारत की शक्ति के रुप में पेश किया वह उनके फुटपाथी नजरिए को दरशाता है । मोदी के अनुसार भारत के पास ३ चीज़ें हैं ,ये हैं- १. लोकतंत्र, २. डेमोग्राफिक डिवीडेंट ३.डिमांड ,ये तीनों शक्तियाँ आज कहीं नहीं है। भारत को इस तरह माल में रुपान्तरित करके पेश करना भारत का अपमान है।भारत सप्लायर देश नहीं है। हमें भारत को सप्लायर देश की मानसिकता से बाहर निकालना होगा। सप्लायर देश की बजाय उत्पादक देश के रुप में इमेज पेश करनी चाहिए। मोदी भूल गए कि चीन की आबादी भारत से ज्यादा है और ये तीनों चीजें वहां पर भी हैं लेकिन वे अपने देश की छवि सप्लायर के रुप में पेश नहीं करते। श्रमिक सप्लायर की दृष्टि देशज दृष्टि नहीं है। मोदी यह ध्यान रखें  सस्ता श्रम और सस्ता श्रमिक लोकतंत्र को पुख्ता नहीं बनाते। लोकतंत्र पुख्ता तब बनता है जब श्रमिकों को बेहतर पगार मिले।सस्ता श्रम और सस्ता श्रमिक देश में तानाशाही को पुख्ता बनाते हैं। यह सच है  मेडिसन स्क्वेयर में अनेक सेनेटर आए और यह उनकी भारत के प्रति गहरी मित्रता की निशानी है।लेकिन इस कार्यक्रम के आयोजकों ने मंचपर प्रस्तुत विभिन्न कार्यक्रमों में सिर्फ भारत का ही झ़डा फहराया ,कायदे से दोनों देशों के झ़डे रहते तो अच्छा होता।इससे अंध राष्ट्रवादी भावों को अभिव्यक्ति मिली।इसी अंध राष्ट्रवादी भावबोध का परिणाम था कि आजतक टीवी चैनल के राजदीप सरदेसाई पर कुछ उन्मादियों के हमला करके उनकी जुबान बंद करने की कोशिश की।
     मोदी के मेडिसन स्क्वेयर इवेंट का अमेरिकी नीति पर कोई असर नहीं पड़ेगा।इसका प्रधान कारण है कि अमेरिकी प्रशासन नियोजित इवेंट,नियोजित मीडिया उन्माद और नियोजित भीड़ की राजनीति का अभ्यस्त है। वे जानते हैं कि इसमें स्वतःस्फूर्त कुछ भी नहीं है। भुगतान के आधार पर जुटायी जनता और राजनीति का क्षणिक चाक्षुष आनंद होता है।इससे ज्यादा उसकी अहमियत नहीं होती।





2 टिप्‍पणियां:

  1. माननिये जगदीस्वर जी,
    सादर नमन.
    आदरनिये प्रधानमंत्री श्री मोदी जी के अमेरिका दौरा और उनके द्वारा मेडिसिन स्क्वायर पर दिए गए भाषण के सन्दर्भ में आपके विचारो से सहमत नहीं हुआ जा सकता हे. अपने बताया कि मोदी जी की भाषा फुटपाथ शैली की थी. जिसे आप फुटपाथ शैली कह रहे हे वह सच्चे इंसान के दिल से निकली सच्ची बातें हे जो लोगो की दिलो को छूती हे. झूठ की खेती बार-बार नहीं हो सकती हे, सच्चाई ही टिकती हे. नेपाल, भूटान, जापान, भारत, अब अमेरिकी जनता सब मोदी की बातो के दीवाने हो रहे हे. सार्क, ब्रिक्स, यु.यन.ओ. सभी जगह मोदी जी और भारत का सम्मान हो रहा हे, मोदी जी की वाहवाही हो रही हे, तो यो ही नहीं. सब बेकार, बेबकूफ या ख़रीदे हुए नहीं हे.
    आपका कहना हे कि मोदी जी मैनीपुलेशन करते हे और गांधी जी के नाम का दुरुपयोग कर रहे हे. जब कि सच्चाई ये हे कि आज तक इस देश में गांधी जी के नाम का दुरुपयोग किया जाता रहा. नेहरू जी ने 'गांधी' जी का दुरुपयोग कर प्रधानमंत्री बन गए. 15 में से 12 प्राविन्स सरदार पटेल जी के साथ थे, जबकि 3 प्रोविंस तथस्ट. किसी ने भी नेहरू जी को समर्थन नहीं दिया था. 'गांधी' नाम का 'दुरुपयोग' कर ही नेहरू प्रधानमंत्री बने. इसके बाद बर्षो तक कांग्रेसी 'गांधी' जी का दुरुपयोग कर सत्ता सुख भोगते रहे और उसके बदले देश को चीनी अपमान, कश्मीर का दर्द के साथ भ्रष्टाचार, आतंकवाद और परिवारवाद दिया हे. पहली बार प्रधानमंत्री जी 'गांधी' जी के नाम का सदुपयोग देश कि भलाई के लिए कर रहे हे. जहाँ तक 'मेनिपुलेशन' की बात हे तो क्या आप ये कहना चाहते हे कि गांधी जी स्वच्छता पसंद नहीं करते थे? गांधी जी ने अनेक बातें कही होगी, लेकिन उनके 'स्वच्छता और भारत आने का सदुपयोग कर मोदी जी देश को स्वच्छ व् स्वस्थ बनाना चाहते हे, विदेश गए भारतीयों को पुनः अपने देश से जोड़ना चाहते हे तो उसमे गलत क्या हे? देश स्वच्छ हो, स्वस्थ हो, ब्रेन ड्रेन वापस आ जाये, टूरिज्म बढे, लोगो कि आमदनी बढे, देश का विकास हो, तो गलत क्या हे? पुरे विश्व में भारत कि ब्रांडिंग हो रही हे, तो गलत क्या हे?
    आपका एक और आरोप हे कि मोदी जी कानून हटाना चाहते हे. जो कानून 100 वर्षो से भी अधिक पुरानी हे, जिसकी उपयोगिता आज के समय में समाप्त हो चुकी हे, जो केवल कानून की किताबो को मोटी बना रही हे, उसे हटाने में दिक्कत क्या हे? महाशय, विरोध केवल विरोध के लिए नहीं होनी चाहिए. 'परिवर्तन प्रकृति का नियम हे'. फिर ये कानून तो मनुष्य द्वारा ही बनाये गए हे. मोदी जी नए भारत के लिए नया सिस्टम बना रहे हे, जो भारत को स्वच्छ, स्वस्थ, समृद्ध व् सम्मानित बनाये. उसके लिए पुराने, सड़े-गले व् बेकार कानून अवं सिस्टम में बदलाव कर रहे तो गलत क्या हे? अंग्रेजो द्वारा बनाये गए कानूनो के प्रति आपका मोह मुझे आश्चर्यचकित करता हे.
    आपने देश को बिकाऊ बनाने की बात कही हे. देश अब तक कच्चे माल और लोगो का सप्लायर रहा हे. हम निर्यातक बन कर रह गए हे. पहली बार प्रधानमंत्री ने मेक इन इंडिया का नारा देकर उत्पादक देश कि श्रेणी में भारत को खरा करने का प्रयास किया हे. जिसे देश में करोड़ों लोगो को रोजगार मिलेगा और अरबो डालरों का विदेशी मुद्रा का बचत होगा. देश उन्नति करेगा. जहाँ तक चीन की बात हे, तो आप ने सही नहीं लिखा हे. चीनी ये काम पहले कर चुके हे. और अब फिर भारत के मेक इन इंडिया के तर्ज पर मेक इन चीन की बात कर रहे हे. समाचार पत्रो के द्वारा ये बातें आपके सज्ञान में आई होगी.
    आपके पोस्ट की अंधविरोध की पराकाष्ठा देखिये की लोगो द्वारा भारतीय झंडा फहराने पर भी एतराज हे. अमेरिकी झंडा नहीं फहराने पर आपत्ति हे, जबकि ऐसी आपत्ति तो ओबामा जी को भी नहीं हुई.
    राजदीप सरदेसाई किस तरह के पत्रकार हे ये सभी जानते हे. इसका इतिहास सभी को पता हे. रहा वर्तमान की बात तो लोगो से विदेशी धरती पर अपशब्द और हाथापाई की शुरुआत उसने ही की थी. उसकी विडियो अब आम लोगो तक पहुँच चूकी हे. आप से अनुरोध की एकबार पूरा विडियो जरूर देख ले. राजदीप की सच्चाई का पता चल जायेगा. पूरा देश आज उसपर थू-थू कर रहा हे.
    आदरनिये जगदीश्वर जी, में जनता हूँ की आप जैसे विद्वान के ये विचार नहीं होने चाहिए. इतना अंधविरोध, जो ज्ञान के दीपक को बुझा दे, आखिर क्यों? पहली बार चीन से आयात होने वाले फटाके पर प्रतिबन्ध, पहली बार पाकिस्तान ने अपनी गलती मानी, पहली बार भारत के विरोध को मान कर चीनी सेना वापस गयी, शांतिपूर्वक पश्चिम एशिया के देशों में फंसे लोगो को वापस भारत लाया गया, अधिकारीगण समय पर काम पर आ रहे हे. कोई प्रधानमंत्री ये नहीं कर सका था. आशा हे आप अपने विचारो पर पुनर्विचार करेंगे. जय हिन्द.

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