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रविवार, 20 जून 2010

पोर्नोग्राफी पर महिला संगठनों की चुप्पी क्यों ?


                हाल ही में दिल्ली में एक महिला ने अपने पति के खिलाफ पुलिस में जबर्दस्ती ग्रुप सेक्स की शिकायत की और बताया कि उसके साथ यह नारकीय काण्ड 4 साल से चल रहा था। ग्रुप सेक्स का यह पहला सार्वजनिक मामला है। ग्रुप सेक्स की कुसंस्कृति का इंटरनेट पर दिखाए जा रहे ग्रुप सेक्स के चित्रों के साथ गहरा संबंध है। इंटरनेट ऐसी अवांछित आपराधिक क्रीडाओं के लिए प्रेरित कर रहा है। इस घटना ने समाज में आ रहे सेक्स के अस्वाभाविक रूपों के दुष्प्रभाव की ओर ध्यान खींचा है। हमें इस प्रवृत्ति से सावधान होना चाहिए।
     उल्लेखनीय है इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी का धंधा जमकर चल रहा है। लेकिन भारत के महिला और राजनीतिक संगठन सोए हुए हैं। मैं लगातार महिला संगठनों के प्रकाशनों और आंदोलन की खबरों को दैनिक अखबारों में पढ़ता रहता हूँ लेकिन अभी तक कहीं पर भी ऐसी खबर देखने में नहीं आयी है कि महिला संगठनों ने इंटरनेट के जरिए चल रहे पोर्न के धंधे पर कुछ भी बोला हो। इसका यह अर्थ नहीं है कि महिला संगठनों का पोर्नोग्राफी को समर्थन है।
       लेकिन वास्तविकता यह है कि महिला संगठनों को पोर्न के इंटरनेट प्रसारण का विरोध करते सड़कों पर या इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनी के दरवाजे पर नहीं देखा गया। पोर्नोग्राफी के मामले पर महिला संगठनों की चुप्पी चिन्ता की चीज है।
           महिला संगठनों को बताना चाहिए कि क्या पोर्न महिलाओं और समाज के लिए घातक है ? क्या पोर्न के प्रसारण से महिलाओं पर हमले बढ़े हैं ? क्या पोर्न से वैवाहिक संबंधों में दरार आती है ? क्या पोर्न के प्रभाववश समाज में अस्वाभाविक सेक्स का रूझान बढ़ा है ? क्या पोर्न का बच्चों पर बुरा असर पड़ रहा है ? क्या पोर्न महज मनोरंजन है ? क्या पोर्न पर भारत में पाबंदी लगाना सही होगा ? क्या भारत सरकार और कारपोरेट घरानों को पोर्न का धंधा करने की इजाजत देनी चाहिए ? महिला और राजनीतिक संगठनों ने पोर्नोग्राफी के खिलाफ चुप्पी क्यों साधी हुई है ? आखिरकार हम क्या करें ? हमें इन सब सवालों पर सोचना चाहिए।

रविवार, 3 जनवरी 2010

मेरा जीवन - रास सुंदरी दासी की भूमिका का अंश

(हाल ही में सुधा सिंह द्वारा अनूदित राससुंदरी दासी की आत्मकथा आयी है। इसे स्वराज प्रकाशन ने छापा है, इस किताब के साथ इसकी भूमिका भी महत्वपूर्ण है।यहां उसका एक अंश प्रस्तुत है।)   




इसी तरह से पुरुष आत्मकथा के शीर्षक को लें। शीर्षक से ही इतिहास में अपनी अवस्थिति, परंपरा से जुड़ाव, ऐसे अतीत के निर्माण में हिस्सेदारी जिसका वर्तमान के संदर्भ में आकलन किया जा सके, के निर्माण का दंभ छिपा होता है। उदाहरण के लिए 'अपनी धरती अपने लोग', 'सत्य के साथ प्रयोग', 'मुड़ मुड़ कर देखता हूँ', 'गरबीली गरीबी वह' आदि। इनमें से कोई भी शीर्षक स्त्री आत्मकथा के लिए मुफीद नहीं हो सकता। स्त्री के लिए 'घर की बात' और अपनी धरती, अपने लोग में फर्क करना मुश्किल है। जो घर की बात है, वही उसकी धरती है, वही उसके लोग भी हैं। जहाँ वह जन्मी-बढ़ी, वह धरती और वहाँ के लोग उसके होने को ग्लोरिफाई नहीं करते। न ही पृष्ठभूमि का काम करते हैं। वहाँ वह थी और वहाँ से उखड़े हुए पौधे की तरह वह और कहीं चली गई। विवाह करके जाए या विवाह के बिना अपने अस्तित्व की तलाश में कहीं जाए, या अन्य किसी कारण से अपने परिवेश से उसका विछोह हो; विछोह होता है। ऐसे में वह उन परिस्थितियों पर गर्व नहीं कर सकती जिन से लड़ते हुए उसका अस्तित्व विकसित हुआ है। इन पर विजय उसके किसी भी तरह के विजेता भाव को जन्म देने में असमर्थ होता है। यह तो एक लीलनेवाले परिवेश में अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है। इसलिए प्राय: स्त्री अपने जन्मस्थान और अतीत को बहुत जल्दी वर्तमान में अनुकूलित कर लेती है। ऐसे ही सत्य के साथ किसी भी तरह के प्रयोग के दावे में 'सत्य' की जो सत्ता है वह स्त्री के किसी काम की नहीं है। कारण दर्शन जिस वास्तविकता की बात करता है और वास्तविकता के आधार के रूप में सत्य की बात करता है, वह सत्य कितना सत्य है, यह देखने की जरुरत है। जैसा कि उत्तरआधुनिक विचारक ल्योतार ने माना है कि सत्य किसी समाज में मौजूद विश्वासों, तर्कों और सांस्कृतिक आधारों की समरूपता में होता है। दार्शनिकों का यह दावा कि सत्य अखण्ड है और 'एब्सोल्यूट' है; और चूँकि दर्शन का आधार इसी सत्य की खोज है इसलिए दर्शन को प्रत्येक अनुशासनात्मक ज्ञान का आधार होना चाहिए; ग़लत है।

सत्य के साथ प्रयोग के क्रम में जिस आत्मोप्लब्धि की बात की जाती है, वह आत्म 'मैं' होता है। इस मैं से अलग बाकी सब 'अन्य' होते हैं। सच तो यह है कि प्रत्येक दार्शनिक व्याख्या के पीछे दुनिया को मुट्ठी में कर लेने का भाव छिपा होता है। विचारों की लड़ाई जीत लेने का भाव होता है। इस आत्मकेन्द्रित दर्शन के लिए स्त्री, भाषा, समाज, देश आदि अन्य की कोटि में होते हैं। ऐसे में सत्य की खोज स्त्री के लिए क्या मायने रखता है, इसे समझा जा सकता है।

  स्त्री की आत्मकथा या आत्मकथात्मक लेखन का आरंभ 'स्व' (सेल्फ) के चित्रण के जरिए व्यक्तिमत्ता या अस्मिता को हासिल करने का प्रयास है। वह आत्मकथा के जरिए अपनी पहचान तलाश रही होती है। यह स्त्री की सामाजिक अवस्थिति का भी सवाल है। स्त्री का एक सामाजिक राजनीतिक परिघटना है; उसका बोलना भी एक बड़ी घटना है। स्त्री की आत्मकथा में उसके अनुभव का संसार बोलता है।

  आत्मकथा स्त्री के 'स्व' की होती है। निजी होती है। स्त्री की आत्मकथा इस स्व के निर्माण की सामाजिक संरचना का बयान करते हुए संपर्क और अर्थ की नई संभावनाओं की तलाश होती है। विधा के नजरिए से देखें तो 'आत्मकथा' एक न्यूट्रल विधा के रूप में दिखाई देती है। इसमें विषय स्वयं नैरेटर होता है। अन्य विधाओं की तुलना में इसमें लेखक को अनुशासनात्मक तौर पर थोड़ी छूट होती है। फिर भी यदि विशिष्टताओं की परख करनी हो तो पुरुष आत्मकथा में स्त्री का संदर्भ किस रूप में आता है और स्त्री की आत्मकथा में पुरुष का संदर्भ कैसे आता है, इस पर विचार किया जाना चाहिए।

 पुरुष आत्मकथा - स्त्री अनुपस्थित, पत्नी की औपचारिक भूमिका जिसमें गृहस्थी का जिक्र, दायित्व, बोझ, जिम्मेदारी आदि के रूप में आता है या फिर मर्दानगी के प्रदर्शन के रूप में एकाधिक प्रेमिकाओं का जिक्र, कामुक संबंधों की मुखर अभिव्यक्ति का रूप मिलता है।

 स्त्री आत्मकथा - केन्द्र में पुरुष, स्त्री के पूरे व्यक्तित्व को आच्छादित करनेवाली पति और पिता की मुख्य भूमिका, घरेलू श्रम कार् कत्ताव्य के रूप में उल्लेख, स्त्री का समर्पणकारी/आज्ञाकारी की भूमिका, पति के अलावा अन्य प्रेम का उल्लेख नहीं, कामुकता का न के बराबर या संकेत रूप में जिक्र, प्राय: इन्हें बचा लेना या संकेत से काम लेना।

 स्त्री के लिए आत्मकथा संपर्क बनाने का जरिया है। दुनिया और अपने परिवेश की व्याख्या का जरिया है। उससे जुड़ने और उसकी आलोचना का जरिया है। अपनी स्थिति पहचानने का जरिया है। बदलाव की अभिव्यक्ति का जरिया है। यह महान स्मृतियों और परिवेश से शुरु नहीं होता न किसी महानता में खत्म होता है। स्त्री आत्मकथा दुनिया पर नियंत्रण के लिए नहीं बदलाव और परिवर्तन के लिए सचेष्ट होती है।

 स्त्री आत्मकथा में अमूमन देखा गया है कि पिता और पति केन्द्रीय भूमिकाओं में होते हैं। कई बार तो यह भ्रम भी होता है कि स्त्री आत्मकथा पढ़ रहे हैं या पुरुष कथा! लेकिन ऐसा कहने या निर्णय देने के पहले कारणों की पड़ताल करनी चाहिए। क्या यह सचेत तौर पर हो रहा है या अभ्यासवश। मन्नू भण्डारी की आत्मकथा 'एक कहानी यह भी' , प्रभा खेतान की आत्मकथा 'अन्या से अनन्या तक' इसका आदर्श उदाहरण हैं। स्त्री के व्यक्तित्व के लिए बाधक भी पिता है और उसके किसी भी तरह की सामाजिक उपलब्धि की अभिपुष्टि का साधन भी पिता ही है। माँ को स्त्री आत्मकथाकारों ने कैसे देखा है, यह देखना-परखना हो तो मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा 'गुड़िया भीतर गुड़िया' और 'कस्तूरी कुण्डल बसै' में देख सकते हैं। माँ, अन्य है। प्रतिद्वन्द्वी है। अंग्रेज़ी के 'मदर' का विखण्डन कीजिए तो वह 'माई अदर' बनता है। कोई लड़की अपनी माँ से सहानुभूति रखते हुए भी अपनी माँ का जीवन नहीं जीना चाहती। उसके जैसी नहीं बनना चाहती।

 इसका विश्लेषण ब्राजीलियन लेखिका क्लेरिस लिस्पेक्टर की एक कहानी 'सण्डे बिफ़ोर फॉलिंग एस्लिप' के जरिए करना चाहूँगी। इस कहानी में लिस्पेक्टर ने पिता का चित्र कुछ इस प्रकार खींचा है कि पिता अपने अकेले उदास बच्चे को एक शब्द उपहार में देता है। वह शब्द है 'ओवोमाल्टीन'  यह शब्द बच्चे के लिए किसी 'जादुई दरवाजे' की तरह काम करता है। कुछ कुछ 'खुल जा सिम सिम' की तरह। यह जादुई दरवाजा दूसरी दुनिया पर खुलता है। यह 'ओवोमाल्टीन' एक रहस्यमय शब्द है। इसका नाम थोड़ा सा अजीब है, टेढ़ा विदेशी नाम है। लेकिन यह आनंद की ओर जानेवाला रास्ता खोलता है। पिता को खुश करने के लिए बच्चा अनजानी जगहों की तरफ जाता है, पता चलता है कि वह इस शब्द के सहारे अमेरिका पहुँच गया। वह असाधारण शब्दों का इस्तेमाल करता है। 'ओवोमाल्टीन' जैसे गुप्त शब्द की चाबी जिसका अर्थ है 'द टॉप ऑफ द वर्ल्ड' बच्चे के कब्जे में है। इस शब्दों की दुनिया में जिसकी चाबी बच्चे को पिता थमाता है, माँ भी रहती है लेकिन वह शब्दों की दुनिया में संगीत या लय की तरह रहती है। वह माई अदर है। सब में समाई हुई लेकिन अलग से कुछ भी नहीं। वह अत्यंत परिचित है, पर पहले से ही 'अन्य' है। उससे जुदा होकर ही बच्चा अस्तित्व में आया है। गर्भ से बाहर आने के बाद नाल कटने पर ही बच्चा माँ से अलग हो पाता है। यह उसके जिंदा रहने की शर्त है।
   
 बच्चे के लिए माँ की दुनिया छोड़कर आना, उससे अलग होकर उसे अन्य के रूप में देखना एक असुरक्षा और नुकसान का भाव पैदा कर सकता है, पर शब्दों की दुनिया के जरिए वह उस नुकसान/अभाव की पूर्ति करता है। इस अर्थ में भाषा एक क्षतिपूर्ति (कम्पेन्सेशन) भी है और जिंदा रहने का साधन भी। लिस्पेक्टर की कहानी पर गौर करें तो बच्चे के लिए सब कुछ खो जाता है शब्दों के अलावा। यह बच्चे का अनुभव है कि शब्द दूसरी दुनिया जो जादू से भरी है की तरफ खुलनेवाला रास्ता है। रहस्य-रोमांच की यह दुनिया का रास्ता पिता बतलाता है। लेखिकाओं की आत्मकथात्मक रचनाओं में पिता और पति का केन्द्र में होना इस कहानी के जरिए समझा जा सकता है। शब्दों की दुनिया मूलत: पिता की दुनिया है।

 लेखन का एक बड़ा सरोकार है कि वह जिंदगियों को बचाता है। जीवन के प्रति आशा का संचार करता है। स्त्री लेखन की खूबी है कि यह न केवल आशा का संचार करता है बल्कि जीवन का अनुसरण करते हुए जीवन का विस्तार भी करता है। विशेष तौर पर स्त्री आत्मकथा की खूबी है कि यह जीवन का अनुसरण करती है। यह जीवन को विस्तार देनेवाला है। स्त्री जब आत्मकथा लिखती है तो वह अपनी निजी हानियों से उबरने के लिए आत्मकथा लिखती है। वह दया, करुणा आदि भाव को जगाने के लिए नहीं लिखती है। समाज में स्त्रियों की जो नारकीय अवस्था है वह किसी भी चेतनासंपन्न स्त्री को परेशान कर सकता है। ऐसे में स्त्री आत्मकथा कोई ट्रेन्ड सेट करने, वाद चलाने या इतिहास में अमर होने के लिए नहीं होता बल्कि इस नारकीय अवस्था के मूल्यांकन और पड़ताल के लिए होता है। इसमें वह आत्म (सेल्फ) को परिभाषित करने के संघर्ष से गुजरती है।

 स्त्री आत्मकथा के इतिहास, भूगोल या परंपरा से मुक्त होने के पीछे कारण यह कि स्त्री वर्त्तमान में रहना चाहती है। इतिहास उसके वश में नहीं, उसकी शक्तियाँ उसके वश में नहीं, वह कभी किसी भी तरह के इतिहास लेखन के केन्द्र में नहीं रही। ऐसे में स्त्री आत्मकथा में जो कुछ आएगा वह वर्तमानकेन्द्रिक होगा। वर्तमान से लड़ना, संघर्ष करना, उसे बदलने के लिए स्थितियाँ तैयार करना उसके वश में है। इतिहास के धुंधलके की तुलना में वह ज्यादा साफ है और इसमें स्त्री की कुछ उपलब्धियाँ भी नजर आती हैं। इसलिए स्त्री का स्वर्ग-नरक वर्तमान ही हो सकता है अतीत नहीं। अतीत के प्रति आग्रह पुरुष लेखन में दंभपूर्ण ढंग से मिलता है, स्त्री की आत्मकथात्मक लेखन में अतीत का आग्रह नहीं के बराबर है। उदाहरण के लिए महादेवी की कविता। छायावादी कविता में अतीत का आग्रह इसकी विशेषता मानी जाती है लेकिन महादेवी के लेखन में अतीत का आग्रह नहीं है।

 यह ध्यान रखना चाहिए कि स्त्री आत्मकथा दूरी बनाने के लिए नहीं अन्य प्रमुख दुनिया से संबंध बनाने के लिखी जाती हैं। साथ ही स्त्री आत्मकथा को खास नियमों या साहित्यिक विधानों में नहीं बाँटा जा सकता। स्त्री के दुख-दर्द और अनुभव का संसार अभिव्यक्ति का कोई भी फॉर्म ले सकता है। लोकगीतों से लेकर मीरा, महादेवी, ललदद्य की कविता में स्त्री आत्मकथा व्यक्त हो सकती है। मुश्किल यह है कि पाश्चात्य साहित्य में आत्मकथा का आरंभ ही तब माना गया, जब सब्जेक्ट के रूप में 'मैं' केन्द्र में आया। इस 'मैं' की कहानी, इसका अता-पता, इतिहास, भूगोल बताकर, 'मैं' के जिए संसार का बयान करने की शैली को आत्मकथा का नाम देते हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रथम पुरुष के लिए प्रयुक्त 'मैं' का स्त्री द्वारा प्रयोग जरुरी तौर पर स्त्रीत्व की पहचान करानेवाला नहीं होता। अत: स्त्री आत्मकथा में आए इस 'मैं' की चौकन्नी पड़ताल करनी चाहिए। कबीर, तुलसी आदि ने जितना अपने देखे-जिए संसार के बारे में बताया है, अण्डाल जिस भाषा में अपनी इच्छाओं की दुनिया को रचती है, मीरा अपने साथ पूरे कुनबे और समाज के दुर्व्यवहार का जिस तरह वर्णन करती है वह 'आत्मकथा' नहीं बन पाया। महादेवी की कविता और आत्मपरक गद्य भी आत्मकथा नहीं कहला सके। स्त्रियों के दुख-दर्द की अभिव्यक्ति करनेवाला लोकगीत और लोकनाटय (शादी में बारातवाले दिन घर की स्त्रियाँ तरह तरह से वेश बनाकर नाटक करती हैं, इसमें मर्द शामिल नहीं होते) स्त्री के अनुभव संसार का हिस्सा होते हुए भी 'आत्मकथा' नहीं कहलाए यानि 'आत्मकथा' की पुंसवादी आलोचना में स्वीकृति तभी है जब 'मैं' इसका नायक बन जाता है। उसके पहले नहीं। स्त्री तो 'सब्जेक्ट' भी नहीं बन पाई है तो आत्मकथा लेखन उनके द्वारा संभव ही नहीं माना गया।


मंगलवार, 10 नवंबर 2009

फैशन पत्रि‍काओं के खेल और स्‍त्री

         फैशन पत्रिकाओं और स्त्री पत्रिकाओं की भाषा इस तरह की होती है कि स्त्री अपनी व्यक्तिगत छवि को निखरे रूप में पेश कर सके। सच यह है कि कॉस्मेटिक का स्टाइल हर दस साल बाद बदल जाता है।इसके कारण मेकअप में भी कुछ न कुछ नये परिवर्तन आ जाते हैं।खासकर चेहरा सजाना बड़ी स्टाईलाइज गतिविधि है। इसमें सेल्फ एक्सप्रेशन की बहुत कम गुंजाइश है।
     चेहरे की पेण्टिंग की किसी पिक्चर की पेण्टिंग से तुलना करना सही नहीं होगा बल्कि इसे एक ही पिक्चर की छोटे मोटे फेरबदल के साथ बार-बार की गई पेण्टिंग कह सकते हैं।हम यह भी कह सकते हैं कि ऑफिस जाते समय जो मेकअप होगा वह शादी में शामिल होते समय किए गए मेकअप से थोड़ा हटकर होगा। जो औरत कॉस्मेटिक्स का एकदम ही इस्तेमाल नहीं करना चाहती उसकी सामाजिक और पेशेवर जगत में स्वीकृति बनना असंभव है।उसे खास तरह के प्रतिबंध का सामना करना पड़ता है।इसका अर्थ यह भी है कि यह उन औरतों के लिए चेतावनी है जो बगैर कॉस्मेटिक्स के रहना चाहती हैं। इन सब बातों को रखने का अर्थ सिर्फ यह बताना है कि स्त्री-पुरूष में सेक्सुअल डिफरेंस होता है। उसी के आधार पर शारीरिक अनुशासन के नियमों को लागू किया जाता है।त्वचा स्त्री के आदर्श शरीर का एक हिस्सा है।
      स्त्री के शरीर या वॉडी को कैसे रखा जाए इसमें भी विचारधारा सक्रिय है।स्त्री के शरीर के सन्दर्भ मे वे ऐसे शरीर की तरफ ध्यान खींचते हैं जो अभ्यास में है,उत्प्रेरक है।जिसे देखकर शरीर के इनफियर रूप की व्याख्या की जा सके। स्त्री का चेहरा सजा होना चाहिए।इसी तरह उसका शरीर भी सजा हो।स्त्री चाहे मोटी हो किन्तु उसके होंठ इस कदर सजे हों कि चूमने का मन करे।उसका रंग चमक मारे,उसकी आंखों में रहस्यात्मकता हो,सजाने की कला मूलत: रूप बदलने की कला है।इसका अर्थ यह है कि स्त्री का चेहरा,साज-सिंगारविहीन चेहरा, डिफेक्टिव या दोषयुक्त होता है।साबुन और पानी, शेव,और नियमित साफ सफाई ही उसके लिए पर्याप्त नहीं है। सौन्दर्य संबंधित विज्ञापनों की यह रणनीति है कि वे औरत को बार-बार यह बताते रहते हैं कि उसका शरीर दोषयुक्त है,अभाव से भरा है।इसी तरह मीडिया के द्वारा स्त्री के शरीर की जो परफेक्ट इमेज प्रसारित की जा रही है उसमें स्त्री के शरीर की कमियों,सुंदरता की कमियों की ओर ही ध्यान खींचा जाता है। इससे मुक्त होने का एक ही रास्ता सुझाया जाता है कि स्त्री के शरीर की कमियों को दूर करने के जो तकनीकी रूप और प्रसाधन वस्तुएं बाजार में हैं उनका इस्तेमाल करो। इस तरह स्त्री के ऊपर नए किस्म का अनुशासन थोपा जा रहा है जिसे स्त्री मानने के लिए मजबूर है।
स्त्रीत्व का अनुशासन प्रकल्प स्त्री की जरूरतें तय करता है जिससे उसके शरीर में परिवर्तन किए जा सकें। कमोबेश सभी औरतों को इसके आगे समर्पण करना होता है।ये एक तरह से अपमान के उपाय हैं। स्त्री के मन में यह बात बिठायी जाती है कि उसका शरीर आरंभ से ही कमियों या दोषों से भरा है अत: उसका स्वयं को बेहतर ढ़ंग से ख्याल रखना चाहिए। अनेक औरतें ऐसी भी हैं जो इन सब सलाहों पर ध्यान नहीं देतीं और बेहतर खुराक के जरिए अपना शरीर दुरूस्त रखती हैं। इसी संदर्भ में गरीब औरत के लिए एक और शर्मनाक पहलू सामने आता है वह गरीबी से शर्मसार रहती है। गरीब औरत के ऊपर सिर्फ मनोवैज्ञानिक दबाव ही नहीं होता बल्कि उसे तो शरीर के लिए न्यूनतम खुराक तक नसीब नहीं होती।
      स्त्रीत्व के बृहत्तर परिप्रेश्य में देखें तो स्त्री का शरीर नस्ल और वर्ग की सीमाओं से भी बड़ा है। खाते पीते घरों की औरतें,अमीर औरतें जिस तरह सजने और शरीर के सौन्दर्य पर ध्यान देती हैं,वैसे ही मजदूर औरतें भी ध्यान देती हैं सिर्फ मात्रा,उपकरण और सामग्री का फर्क है।
    संस्थानगत हैट्रोसैक्सुएलिटी के युग में स्त्री को अपने को पुरूष के लिए वस्तु के रूप में आकर्षक बनाना अनिवार्य है। समसामयिक पितृसत्ताक संस्कृति के युग में अधिकतर औरतों के अंदर यह बात रहती है कि मर्द किस रूप में देखना चाहता है , वे निरंतर पुरूष की आंखों और निर्णय से अपने शरीर को देखती रहती हैं ,स्त्री ऐसे माहौल में रहती है जहां अन्य उसके शरीर को देखते रहते हैं। यह अन्य और कोई नहीं पितृसत्ता ही है। हमसे बार-बार यह कहा जाता है कि 'औरत औरत के लिए सजती है'। किन्तु इसमें एक अंश तक ही सच्चाई है। किन्तु औरत जानती है कि वह किसके लिए यह खेल खेल रही है।  स्त्री का शरीर के प्रति अति सचेत होना स्वाभाविक परिघटना नहीं है।
        स्त्री को यह समझना होगा कि उसके जीवन में उम्र के साथ कुछ बदलाव आते हैं।ये उम्रगत परिवर्तन अनेक बार औरतें समझ नहीं पातीं। जिसके कारण अनेक उलझनें पैदा होती हैं।साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत जैसे समाज में जहां स्त्री अधिकारहीन और पराश्रित है,वे औरतें भी जो आत्मनिर्भर हैं, अनेक मामलों में पुरूष को रिझाने वाले मीडिया प्रक्षेपित उपायों का इस्तेमाल करती हैं।इससे उनके व्यक्तित्व के निर्माण में शायद ही कोई मदद मिलती हो। हां, उनकी जेब जरूर ढीली हो जाती है। मजेदार बात यह है कि स्त्री- पुरूष दोनों एक-दूसरे को लेकर विलक्षण खेल खेलते रहते हैं। औरत अपनी सारी शक्ति पुरूष को जीतने में लगा देती है और पुरूष अपनी सारी शक्ति उसे पाने में लगा देता है। ये दोनों ही मार्ग अंतत: व्यक्तित्वहीनता और पितृसत्तात्मक वर्चस्व की ओर ले जाते हैं।नीत्शे ने कहा है कि योध्दा हमेशा खेल और संकट को पसंद करता है। नारी उसे इसीलिए पसंद है।क्योंकि नारी सबसे खतरनाक खेल है।वह चाहता है कि उसका संघर्ष उसके लिए खिलवाड़ रहे,पर नारी के लिए भाग्य परीक्षा रहे।सीमोन द बोउवार ने लिखा है कि पुरूष उध्दारक के रूप में हो या विजेता के, वह अपनी सच्ची विजय तभी समझता है,जब स्त्री उसे अपना सौभाग्य मानकर स्वीकार करे।
सीमोन द बोउवार ने लिखा है , '' नारीत्व की निष्क्रियताजन्य मौलिक विशेषताएं उसके बचपन में ही विकसित हो जाती हैं। यह कहना गलत होगा कि उसकी निष्क्रियता केवल जैविक तथ्य होती है।सच तो यह है कि उसकी यह नियति उसके ऊपर उसके अभिभावक,शिक्षक और समाज द्वारा आरोपित होती है।लड़के को सबसे बड़ी सुविधा दूसरों के संदर्भ में अपनी वैयक्तिक स्वतंत्रता को स्थापित कर पाना है। उसका जीवन उसकी स्वतंत्र गतिशीलता में निहित है। ...  मौलिक रूप से उसकी वैयक्तिकता और ठोस वस्तुपरकता में कोई आधारभूत विरोध नहीं होता। कुछ करने के माध्यम से वह अपने अस्तित्व का सृजन करता है।''
'' इसके विपरीत औरत में शुरू से ही उसकी स्वायत्तता और वस्तुपरकता में एक अंत:संघर्ष तथा अंतर्विरोध बना रहता है। उसने बचपन से दूसरे को खुश करने के लिए अपने आपको एक वस्तु के रूप में प्रतिपादित करना सीखा है।इसके लिए उसे अपनी स्वायत्तता का त्याग करना पड़ता है।बचपन से ही वह स्वतंत्रता से वंचित रहती है और गुड़िया की तरह व्यवहृत। अत: उसकी जिन्दगी में दुष्चक्र जारी रहता है।स्थितियों और वस्तुओं पर अपनी कमजोर पकड़ और उपकरणों की कमी के कारण वह अपनी वैयक्तिकता को स्थापित करने से घबराती है।यदि एकबार उसको सही ढ़ंग से प्रोत्साहित किया जाए, तो वह भी लड़कों की तरह उत्सुकता,संघर्ष,प्राचुर्य और बाहुल्य प्राप्त कर सकेगी। यहां यह ध्यान देने योग्य है कि ऐसी शिक्षा एक पिता ही अपनी पुत्री को दे सकता है और जो औरतें पुरूष की देखरेख में बड़ी होती हैं ,उनमें स्त्री के दोष कम पाए जाते हैं।किन्तु परंपरा लड़की को लड़के की तरह बर्ताव करने का विरोध करती है।''  जबकि '' माँ एक ही साथ अपनी लड़की के प्रति स्नेहशील और विरोधी दोनों ही होती है। वह अपनी बेटी को अपनी नियति के साथ बांध लेती है। उसमें वह अपना नारीत्व फिर स्थापित करना चाहती है। यह एक प्रकार का स्वयं से प्रतिशोध है।'' लड़की से अब मॉँ बनने की आशा की जाती है पिता बनने की नहीं।लड़की भी बचपन से माँ के सम्पर्क में रहने के कारण माँ की सत्ता को ही श्रेष्ठ मानती है। वह माँ की नकल करती है। किन्तु जिन्दगी की वास्तविता के अनुभव उसके इस भावबोध को विचलित करते हैं।वह ज्यों-ज्यों बड़ी होती जाती है लड़कों की जीवंतता और ताकत से उसे ईर्ष्या होने लगती है। अब वह सोचने लगती है कि काश वह लड़का होती !
      

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