शनिवार, 2 अप्रैल 2011

फेसबुक और मीडिया का सांस्कृतिक परिवेश- समापन किश्त-





मीडिया और संचार की तकनीक पर विचार करते समय इसके मिथों के प्रति आलोचनात्मक बोध का होना बेहद जरूरी है। तकनीक कैसे सामाजिक जीवन में व्यवहार करेगी यह बात इस तथ्य से तय होगी कि लोकतंत्र की क्या दशा है ? इसके अलावा कम्प्यूटर रोमैंटिशिज्म ने भी हमारी चेतना को घेर लिया है। इसके कारण हम संचार और मीडिया तकनीक के बारे में सटीक समझ नहीं बना पाते। संचार तकनीक के द्वारा निर्मित सामाजिक जीवन की सही तस्वीर नहीं देख पाते। 

कम्प्यूटर और मीडिया के बारे में समाज में अंधश्रद्धा बढ़ी है। अंधविश्वास बढ़ा है। इससे आम जनता के विवेक,विजडम और ज्ञान में कम आई है। यह मिथ है कि संचार तकनीक के आने से लोकतंत्र मजबूत होता है। सामाजिक शिरकत में इजाफा होता है। समानता पैदा होती है। इन तीनों मिथों की कभी गंभीरता से छानबीन नहीं की गई है। असल में यह सब संचार तकनीक को मिथ बनाने की कला के हथकंडे हैं।

यह मिथ है कि सूचना के संचार से ज्ञान बढ़ता है। सामाजिकशक्ति में इजाफा होता है। सच इसके एकदम विपरीत है। लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संरचनाओं के विकास और उनमें आम लोगों की हिस्सेदारी से समाज में लोकतंत्र का विकास होता है। तकनीक के विकास और प्रसार से लोकतंत्र नहीं फैलता। लोकतंत्र के विकास से तकवीक के लोकतांत्रिक उपयोग की संभावनाएं पैदा होती हैं। लोकतंत्र के लिए साझा मांग,साझा, लक्ष्य,साझा समझ,साझा शिरकत ,साझा विचारधारा और साझाचेतना का होना जरूरी है। साझा चेतना प्रत्यक्ष शिरकत,संवाद और कुर्बानी से पैदा होती है। लोकतंत्र को बगैर त्याग और शिरकत के अर्जित नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र के संवैधानिक संस्थानों की लोकतांत्रिक और नियमानुसार नियमित कार्यप्रणाली ही है जो लोकतंत्र को संभव बनाती है। तकनीक के प्रसार मात्र से लोकतंत्र नहीं आता। मशीनी रेस्पांस को जनता का रेस्पांस नहीं समझना चाहिए।

कम्प्यूटर तकनीक के आने के साथ ही कागजरहित ऑफिस का वायदा किया गया था लेकिन हुआ उल्टा। ऑफिसों में कागज की खपत घटने की बजाय बढ़ी है। यह कहा गया कि कम्प्यूटर तकनीक से समय की बचत होगी लेकिन इसने समय का खर्चा बढ़ा दिया है। आज मनुष्य समय के दबाब में जितना है उतना पहले कभी नहीं था। आज आप कुछ ही क्षणों में घर बैठे बैठे बाजार की खरीददारी कर सकते हैं।बाजार में तत्काल खरीददारी कर लेते हैं। घर बैठे हुए तत्काल बातें कर लेते हैं।जल्दी से कहीं पर भी कार आदि से चले जाते हैं। इसके बाबजूद हमारे पास एक-दूसरे के लिए समय का अभाव बना रहता है। बातचीत के लिए समय नहीं निकाल पाते। निजी बातचीत,प्रेम,सामाजिकता आदि के लिए समय घट गया है। कायदे से यह समय बढ़ना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।

कम्प्यूटर तकनीक ने श्रम की बचत का वायदा किया है। श्रम की बचत का अर्थ है स्वयं को अर्थहीन बनाना। ज्यादा से ज्यादा मजदूरों को उनके काम से वंचित करना। एक ही वाक्य में कहें तो तकनीक के आने से शिरकत घटती है। जिम्मेदारी कम हो जाती है।

फेसबुक के बारे में मिशेल अल्बर्ट ने लिखा है कि इससे सभ्यता के अंत की शुरूआत हुई है। फेसबुक और वर्ल्ड वाइड वेब की तत्क्षण संदेश की पद्धति के कारण सभ्यता के अंत का संकट पैदा हो गया है। जो युवा और प्रौढ इंटरनेट और उससे जुड़े यंत्रों के आदी हैं उन्हें इंटरनेट यंत्रों मोबाइल,लेपटॉप,आईपेड ,कम्प्यूटर आदि से दूर रखना असंभव हो गया है। सामान्य तौर पर जो लोग टीवी देखने में समय गुजारते थे उनमें से अधिकांश युवा अब इंटरनेट और मोबाइल पर समय गुजारते हैं।

कुछ साल पहले तक टीवी में व्यस्त रहने वालों को असामाजिक तक कहा गया । आज इन युवाओं के परिवारीजन मांग कर रहे हैं कि उनका बच्चा इंटरनेट से दूर रहे और पास में बैठकर टीवी देखे। टीवी देखते समय कम से कम युवा लोग साथ में बैठते थे लेकिन मोबाइल और नेट पर तो वे नितांत एकांत में व्यस्त रहते हैं। वे अपने लिए नितांत वैयक्तिक एकांत वातावरण निर्मित कर लेते हैं। बार-बार मोबाइल पर जाते हैं। इंटरनेट पर भी फेसबुक पर व्यस्त रहते हैं और यह लत की तरह मर्ज बढ़ रहा है। युवाओं के नेट पर चले जाने को टीवी कंपनियां भांप गयी हैं और अब वे भी नेट पर टीवी चैनल ले आयी हैं। वे संदेश दे रहे हैं कि युवा लोग उनके चैनलों को नेट पर देख सकते हैं। नेट पर जाने वाले युवाओं की खास विशेषता है कि वे किसी भी चीज को एकाग्रभाव से नहीं देखते। उनके चंचल भावबोध की ही अभिव्यंजना है कि वे लगातार बटन दबाते रहते हैं और एक वेब से दूसरी वेब,एक संदेश से दूसरे संदेश की ओर भागते रहते हैं।

नेट पर नया चंचल पथ है ट्विटर का। युवाओं में ट्विटर का उन्माद देखने लायक है। अब बौद्धिक विकास का प्रमाण है ट्विटर पर सक्रियता। सब कुछ तीव्रतम गति से संप्रेषित करने के चक्कर में हम इतने व्यस्त हैं कि समझ नहीं पा रहे हैं कि तीव्रतम गति से किया गया संप्रेषण दिशाहीन होता है। वह संचार को ही नष्ट कर देता है। संदेश को शून्य ,प्रभावहीन और स्मृतिविहीन बना देता है। कम से कम शब्द और तीव्रतम गति का संदेश अंततःशून्य में बदल जाता है। इसके कारण नए किस्म की आदतें पैदा हो रही हैं।

फेसबुक पर 60 करोड़ लोगों के डाटा उपलब्ध हैं। इस तरह के डाटा के अनेक किस्म के उपयोग की ओर संचार कंपनियों ने ध्यान दिया है। इंटरनेट और फेसबुक के डाटा का विज्ञापन कंपनियों से लेकर जासूसी कंपनियों तक जमकर दुरूपयोग हो रहा है। इंटरनेट यूजरों पर व्यापक पैमाने पर निगरानी चल रही है। यह तथ्य वाल स्ट्रीट जरनल और दूसरी कई प्रसिद्ध पत्रिकाओं के कराए सर्वेक्षणों में सामने आया है। सर्वेक्षणों से पता चला है कि कई हजार वेबसाइट हैं जिन्होंने इस तरह के तकनीकी उपकरण लगाए हुए हैं जो यूजरों के बारे में अधिकांश महत्वपूर्ण बातें जान जाती हैं और बाद में उनका अन्यत्र इस्तेमाल कर रही हैं। यूजर की गतिविधि पर निगरानी रखने वाली इस तकनीक के बारे में इन वेबसाइट पर कोई जानकारी पहले से नहीं दी हुई है। यह काम गुप्त ढ़ंग से हो रहा है। इन वेबसाइट पर ऐसा सॉफ्टवेयर लगाया हुआ है जो यह बताता है कि यूजर रीयल टाइम में क्या कर रहा है। किस जगह है। उसकी आय क्या है। वह किस तरह की चीजें खरीदना पसंद करता है। किस तरह का स्वास्थ्य है। किस तरह की आदतें हैं। इस तरह के डाटा विकीपीडिया से लेकर माइक्रोसॉफ्ट,याहू से लेकर गूगल तक सब एकत्रित कर रहे हैं और इसके अलावा सीआईए,पेंटागन,अमेरिकन लाइब्रेरी नेटवर्क आदि भी अपने तरीके से वेब पर नजरदारी कर रहे हैं और विभिन्न नेट सर्वर कंपनियों की डाटा संकलन में मदद ले रहे हैं। यहां तक ट्विटर के संदेशों की एक विशाल संग्रहशाला अमेरिकन लाइब्रेरी ने भी तैयार की है। इसके अलावा गूगल आदि कई कंपनियों के साथ सीआईए की सहयोगी संचार कंपनी ने कई अनुबंध भी किए हैं। ये अनुबंध मूलतः यूजरों पर निगरानी से संबंधित हैं। इसके अलावा बीमा,स्वास्थ्य,विज्ञापन,पर्यटन,बैंक,वित्त आदि क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों ने अपने व्यापारिक विस्तार के लिए इनका इस्तेमाल आरंभ कर दिया है। इसका यह परिणाम निकला है कि पिछले साल 23 बिलियन डॉलर के ऑनलाइन विज्ञापन आए। तुलनात्मक रूप में देखें तो ऑनलाइन विज्ञापन ज्यादा लोगों तक पहुँचता है और फायदे का सौदा है।मसलन् एक हजार लक्ष्यीभूत श्रोता के पास मात्र 4.12 डालर में विज्ञापन पहुँचता है जबकि एक हजार गैर-लक्ष्यीभूत श्रोता के पास 1.98 डॉलर में विज्ञापन पहुँचता है।

जनवरी 2010 में किए गए इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर के सर्वे में पाया कि कुल मिलाकर 10.2 बिलियन बार वेब सर्च किया गया और इसमें गूगल के जरिए 6.8 बिलियन बार सर्च किया गया। यानी गूगल के सर्च इंजन से कुल नेट सर्च करने वालों का 66.3प्रतिशत रहा।जबकि याहू से सर्च करने वालों का प्रतिशत 14.5प्रतिशत, एमएसएन- विंडो लाइव-बिंग सर्च के जरिए 10.9प्रतिशत सर्च किया।

आने वाले समय में सोशल नेटकर्क साइट के इस्तेमाल से मीडिया का उपभोग बुरी तरह प्रभावित होगा। जिस तरह सोशल नेटवर्क के यूजरों की संख्या में जबर्दस्त उछाल आया है उसने मीडिया के सभी माध्यमों एवं विधाओं के विकास की दिशा और गति को पीछे छोड़ दिया है। भविष्य में बच्चे और युवा किस तरह की मनोदशा,संस्कार और आदतों के आदी होंगे इसका बहुत कुछ संबंध सोशल नेटवर्क के साथ जुड़ा है।

सोशल नेटवर्क के प्रभाव के बारे में हम जितना जानेंगे उतना ही बच्चों और युवाओं को भी बेहतर ढ़ंग से जान पाएंगे। क्योंकि बच्चों और युवाओं का बहुत बड़ा हिस्सा सोशल नेटवर्क पर विभिन्न किस्म के संचार और संपर्क का काम कर रहा है। मसलन अमेरिका में 75 प्रतिशत युवा (18-24 साल की आयु के) सोशल नेटवर्क पर जाते हैं। 65 साल से ऊपर की आयु के मात्र 7 प्रतिशत लोग ही सोशल नेटवर्क पर जाते हैं। कहने काअर्थ यह है कि सोशल नेटवर्क युवाओं का माध्यम है। जबकि 25-34साल आयु के 57 प्रतिशत,35-44 साल के 30 प्रतिशत,45-54 साल के 19 प्रतिशत,55-64 साल के 10 प्रतिशत लोग सोशल नेटवर्क पर जाते हैं।

विभिन्न सामाजिक नेटवर्क में माइस्पेश पर 50 प्रतिशत,फेसबुक पर 22 प्रतिशत और लिनकेदिन पर 6 फीसदी का प्रोफाइल है। ज्यादातर तरूण अपने परिचितों के साथ ही जुड़ते हैं। 51 फीसदी सोशल नेटवर्क यूजर की दो या उससे ज्यादा ऑनलाइन प्रोफाइल हैं। जबकि 43 प्रतिशत का एक ही प्रोफाइल है।ज्यादातर सोशल नेटवर्क यूजर प्राइवेसी सचेतन हैं। इसके बावजूद यूजरों की वेब पर प्रच्छन्नतःजासूसी जारी है। लेकिन फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्क जैसे मंच ऑफिसों समग्र ऑफिस समय का 1.5 फीसदी समय बचाते हैं। यह बात ' नुक्लिस रिसर्च' के पिछले साल कराए सर्वे में सामने आयी है। एक अन्य संस्था मोर्से के सर्वे में यह तथ्य सामने आया है कि ब्रिटिश कंपनियों को फेसबुक जैसे मंचों के जरिए काम करने से सालाना 2.2 बिलियन डॉलर का खर्चे में लाभ हुआ है। यह भी पाया गया है कि छोटे स्तर पर ब्लॉगिंग में खर्च होने वाला समय वस्तुतः समय की बर्बादी है। इसके विपरीत फेसबुक में आप निरंतर संपर्क,संवाद और उच्चकोटि की सर्जनात्मकता बनाए रख सकते हैं। फेसबुक में सर्जनात्मक निरंतरता बनाए रखने की क्षमता है।

फेसबुक को इंटरनेट की सभी विधाओं का निर्धारक कह सकते हैं। इंटरनेट में क्या होगा ,ऑनलाइन समूह क्या करेंगे,यूजर कैसे रहे ,उसकी प्राइवेसी क्या है,सार्वजनिक क्या है और यूजर को कैसे बोलना चाहिए,कैसे व्यक्त करना चाहिए,भावों-संवेदनाओं और अनुभूतियों को कैसे व्यक्त करें आदि बातों का निर्धारक फेसबुक है। फेसबुक में सभी पूर्ववर्ती मीडिया और नेट विधाओं का समाहार कर लिया गया है। इसने सभी किस्म कीअभिव्यक्ति के रूपों को सार्वजनिक कर दिया है। फेसबुक के कारण यूजर को वह लोग भी जानते हैं जिनसे उसका कोई लेना-देना नहीं है।

दुनिया तेजी से बदल रही है और बदलती दुनिया में नयी भाषा,नयी शब्दावली जरूरीहै। जगत के साथ संबंध उलट गया है। नयी हाइपर रियलिटी की अवस्था में कभी यथार्थऊपर आ जाता है तो कभी यथार्थ एकदम गायब हो जाता है।हाइपर रीयल समाज सतह पर खंड-खंड, सक्रिय और तर्क का विखंडन करता नजर आता है और यही वह अवस्था है जिसे उत्तर आधुनिकता कहते हैं।

अब किसी भी घटना की पुलिसिया नाकेबंदी सूचना के जरिए की जाती है। सूचना इतिहास के विस्मरण की सबसे प्रभावी मशीन है। सूचना का समग्र सिस्टम घटना को प्रतीक के रूप में पेश करता है। इसका सार्वभौम बाजार में विनिमय मूल्य होता है। इस दौर में अघटित घटना की प्रस्तुतियां खूब आ रही हैं। सूचना का विकृतिकरण हो रहा है। सूचना का विकृतिकरण अर्थव्यवस्था का भी विकृतिकरण कर रहा है। उसके सभी मालों का विकृतीकरण हो रहा है। मूल्य का भी विकृतिकरण हो रहा है। घटनाओं की एकायामी प्रस्तुतियों की बाढ़ आ गयी है। घटना का इकहरापन उसे संहिताबध्द नहीं होने देता, फलत: वह घटना गुम हो जाती है। अब हम ऐसे जगत में हैं जहां सच में घटनाएं घटती नहीं हैं। उनका रीयल टाइम में जन्म होता है और उन्हें समाचार और सूचना में पेश कर दिया जाता है। असल में यह अ-घटित घटना की खबरों का दौर है।

अघटित घटना का अर्थ यह नहीं है कि कुछ भी नहीं हो रहा, बल्कि चीजें तेजी से घटित हो रही हैं। उनमें निरंतर परिवर्तन आ रहा है। अंतहीन अपडेटिंग हो रही है। यह सब कुछ रीयल टाइम में हो रहा है। निरंतर विस्तार या विकास फैशन की तरह है। ये ऐसे परिवर्तन हैं जो मजबूरी में आए हैं और मजबूर करते हैं। इनमें अप्रासंगिकता अन्तर्निहित है। अब ऐसी भाषा और इमेजें आ रही हैं जिनके सामने हम निरस्त्र और अधिकारहीन हैं। अब कु-समाचार को दावे के साथ पेश किया जाता है।बार-बार दोहराते हैं, इससे निरंतर खोखला मैदान तैयार होता है। अब ऐसा स्पेस है जिसमें प्रत्येक चीज पहले से ही तटस्थ है।





2 टिप्‍पणियां:

  1. सुचिन्तित लेख...गहन समीक्षा दृष्टि...बढ़िया लगा लेख पढ़कर...

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  2. प्रौद्योगिकी के बढ़ते प्रभाव से आतंकित बौद्धिकता ? सहज ही है !

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