मंगलवार, 2 नवंबर 2010

मियाँ कबीर,तुम क्यों रोने लगे ?

मेरे एक दोस्त हैं सीताराम सिंह वे हमारे साथ जेएनयू में पढ़ते थे,वे रूसी भाषा में थे और मैं हिन्दी में था। वे स्वभाव से मधुर, बागी और बेहद क्रिएटिव हैं। अभी फेसबुक पर मिले और बोले कि पुरूषोत्तम अग्रवाल की किताब पढ़ रहा हूँ कबीर पर। मुझे उनकी बात पढ़कर एक सवाल सूझा कि लोग जिस बात को मानते नहीं है उसकी हिमायत में लिखते क्यूँ हैं ? इस प्रसंग में मुझे सआदत हसन मंटो याद आए और उनका कबीर पर लिखा एक वाकया याद आ रहा है। वाकया यूं है-
   ‘‘छपी हुई किताब के फ़रमे थे,जिनके छोटे-बड़े लिफ़ाफ़े बनाए जा रहे थे।
    कबीर का उधर से गुजर हुआ- उसने दो-तीन लिफ़ाफे उठाए और उन पर छपी हुई तहरीर पढ़कर उसकी आंखों में आंसू आ गए।
    लिफ़ाफ़े बनानेवाले ने हैरत से पूछाः ‘‘ मियाँ कबीर,तुम क्यों रोने लगे ? ’’
  कबीर ने जबाब दियाः ‘‘ इन कागजों पर भगत सूरदास की कविता छपी हुई है... लिफ़ाफ़े बनाकर इसकी बेइज़्ज़ती न करो।’’
लिफ़ाफ़े बनानेवाले ने हैरत से कहाः ‘‘जिसका नाम सूरदास है,वह भगत कभी नहीं हो सकता।’’
   कबीर ने ज़ारो-क़तार(फूट-फूटकर) रोना शुरू कर दिया। ’’
मैं सोचता हूँ कि पुरूषोत्तम अग्रवाल की कबीर पर किताब और उनकी लोकसेवा को देखकर कबीर फूट-फूटकर रो रहे होंगे।  जीवन और कर्म में इतनी बड़ी फांक कबीर झेल नहीं सकते।   




2 टिप्‍पणियां:

  1. sir, kabir ko to rona hi padega. par mujhe yah bateye ki aaj ki dunia mein koi aisa hai jiske jivan aur karma mein bada phank na ho. jab sabhi ek hi nauka par swar hain to ek dusre ko laat markar keyo giraya ja raha hai?

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  2. बौद्धिक जुगाली और शारीरिक-कर्म में जुगलबंदी का फर्क अकेले पुरुषोत्तम अग्रवाल पर लागू नहीं होता सर! इसलिए कबीर आजकल रोते ही रहते होंगे..

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