शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

डा.नामवर सिंह का माधवराव सप्रे जयन्ती 2008 के अवसर पर दिया भाषण और उससे उठे बड़े सवाल



        डा. नामवर सिंह ने माधवराव सप्रे की जयन्ती के अवसर पर दिए भाषण में एक महत्वपूर्ण बात उठायी है। उनका मानना है लेखक-साहित्यकार और पत्रकार में भेद नहीं किया जाना चाहिए। जैसाकि सर्वविदित है नामवरजी बगैर सोचे नहीं बोलते। उनकी इस धारणा का हिन्दी साहित्येतिहास लेखन के लिहाज से बड़ा महत्व है।
      जब पत्रकार और साहित्यकार में भेद को आलोचना अस्वीकार कर देगी तो हिन्दी में साहित्य और पत्रकारिता के बीच में भेद नहीं माना जाएगा। मासमीडिया और साहित्य में भेद नहीं माना जाएगा। मीडिया के गीतकार फिर साहित्य के गीतकार माने जाएंगे। प्रभाषजोशी फिर हिन्दी पत्रकारिता के ही नहीं हिन्दी गद्य के और आलोचना के भी लेखक माने जाएंगे।
     मैंने मीडिया और साहित्य,मासमीडिया और साहित्य, पापुलर साहित्य और साहित्य में भेद की बहुत पहले 1994-95 में 'जनमाध्यम और मासकल्चर' नामक ग्रंथ में आलोचना की थी,सुनकर अच्छा लगा कि नामवरजी के विचार भी इस बीच में बदले हैं। हम उम्मीद करते हैं कि हिन्दी के पाठ्यक्रमों में महादेवी वर्मा के साथ पाकीजा फिल्म की नायिका मीनाकुमारी की कविताएं भी पढ़ाई जाएंगी। नागार्जुन के साथ हिन्दी वालों ने जो सम्मानजनक व्यवहार किया है वैसा ही साहित्यिक सम्मान अब वे फिल्मी गीतकार शंकर शैलेन्द्र को भी देंगे। वे इस सवाल पर भी विचार करेंगे कि जावेद अख्तर और गुलजार के गाने भी साहित्यिक पाठ्यक्रमों में वही दर्जा पाएं जो शमशेर और मुक्तिबोध को मिला हुआ है। नामवरजी का माधवराव सप्रे जयन्ती पर दिया गया भाषण साहित्य और पापुलर साहित्य,पत्रकारिता और साहित्य के भेद को अस्वीकार करता है और हमें इस नजरिए से भावी पीढ़ी को साहित्येतिहास का नजरिया बनाने में मदद करनी चाहिए।

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