बुधवार, 24 नवंबर 2010

पश्चिम बंगाल के आर्थिक कुप्रबंधन से बेखबर क्यों हैं वामनेता

        पश्चिम बंगाल में तीन संकट है पहला संकट है अर्थव्यवस्था का। दूसरा संकट है ममता की राजनीतिक बढ़त का और तीसरा संकट है माकपा की आंतरिक बदइंतजामी का। वाममोर्चा सरकार को इन तीनों संकटों का एक ही साथ सामना करना पड़ रहा है। इनमें सबसे भयानक संकट है राज्य की अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन का। वाममोर्चा सरकार साढ़े तीन दशक से शासन में है लेकिन राज्य का आर्थिक प्रबंधन अभी तक अपनी बेढ़ब चाल से चलना बंद नहीं हुआ है। आर्थिक कुप्रबंधन की इतनी बुरी मिसाल अन्यत्र किसी भी राज्य में देखने को नहीं मिलेगी।
   पश्चिम बंगाल के आर्थिक कुप्रबंधन का आलम यह है कि राज्य का कर्जा लगातार बढ रहा है। 35 सालों में कोई भी वैकल्पिक रास्ता राज्य सरकार खोज नहीं पायी है। वाम शासन के आर्थिक कुप्रबंधन के कारण ही राज्य कर वसूली के मामले में आशानुरूप परिणाम हासिल नहीं कर पाया है। कम से कम अर्थव्यवस्था की दुर्दशा के लिए वाममोर्चा शासन ममता बनर्जी के ‘बाधा डालो’ मोर्चा को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता है।
     वाम मोर्चा के शासन के दौरान अर्थव्यवस्था का संकट किस ऊँचाई पर पहुँच गया है इसका अंदाजा राज्य कर्मचारियों को समय पर मिलने वाली तनख्बाह से नहीं लगाया जा सकता। यह सच है राज्य कर्मचारियों को मासिक पगार समय पर मिल जाती है। लेकिन यह आर्थिक सुप्रबंधन का परिणाम नहीं है। इतने लंबे समय तक शासन करने के बाद भी वाममोर्चा वैकल्पिक आर्थिक मॉडल पश्चिम बंगाल में विकसित नहीं कर पाया। इस असफलता के पीछे कौन से कारण हैं ?  
    आर्थिक सुप्रबंधन इससे पता चलेगा कि राज्य किस तरह अपने लिए धन जुटाता है ? कर वसूली की दशा क्या है ? पश्चिम बंगाल का अधिकांश कामकाज रिजर्व बैंक के कर्जे से चल रहा है। रिजर्व बैंक की ताजा रिपोर्ट के अनुसार कर्जगीर 17 राज्यों में पश्चिम बंगाल सबसे ऊपर है। उल्लेखनीय है 1977 में जब वाममोर्चा शासन में आया था तब राज्य पर रिजर्व बैंक का मात्र 11,403 करोड़ का कर्जा था। आज यह कर्जा बढ़कर 1,92,000 करोड़ रूपये हो गया है। यानी बंगाल के प्रति व्यक्ति के ऊपर वामशासन के दौरान 22 हजार रूपये का कर्जा लद चुका है।
    वामशासन में आमदनी और खर्चे के बीच में अंतराल बढ़ा है। अर्थशास्त्र की भाषा में पश्चिम बंगाल में प्रति व्यक्ति 39,656 रूपये कमाता है,इसमें से मात्र 17,132 रूपयेघर ले जा पाता है। ताजा आंकड़ों के अनुसार राज्य की आर्थिक अवस्था खस्ता है और इस खस्ता हाल अर्थव्यवस्था से निकलने का कोई सहज मार्ग नजर नहीं आ रहा है। इस संकट को कम करने के लिए वित्तमंत्री असीमदास गुप्ता ने हाल ही में कुछ वस्तुओं पर एक प्रतिशत वैट बढ़ाने का प्रशासनिक फैसला किया है। अब उपभोक्ताओं से 13.5 प्रतिशत वैट लिया जाएगा। यह वैट माइक्रोवेब कुकिंग रेंज से लेकर म्यूजिक सिस्टम तक लगेगा। इससे राज्य को 200 करोड़ रूपयों की आय होने की उम्मीद है।
    इसके अलावा राज्य सरकार अपने खर्चों में 10 प्रतिशत की विभिन्न मदों में कटौती करके 1000 करोड़ रूपये बचाने की कोशिश करेगी। वित्तमंत्री का यह भी तर्क है कि राज्य सरकार ने छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर नए वेतनमान लागू किए हैं। इसके कारण राज्य के वेतन आदि पर होने वाले खर्चे में 35-40 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा महंगाई भत्ते की दूसरी किश्त का भुगतान भी करना है,दूसरी ओर केन्द्र सरकार ने केन्द्रीय फंड से मिलने वाले सात हजार करोड़ रूपये का अब तक भुगतान नहीं किया है ।  वित्तमंत्री का कहना  है कि पश्चिम बंगाल ही कर्ज पर नहीं चल रहा केन्द्र सरकार भी कर्ज पर चल रही है और उस पर 35 लाख करोड़ रूपये का कर्जा है।    
    मजेदार बात यह है वाम सरकार प्रशासनिक आदेश से एक प्रतिशत वैट बढ़ा रहा है जबकि यही वामपंथी दल दिल्ली में केन्द्र सरकार को प्रशासनिक आदेश से कर लगाने, दाम बढ़ाने आदि का विरोध करते रहे हैं। राज्य के वित्तमंत्री ने माना है राज्य आर्थिक ‘समस्या’ से गुजर रहा है। लेकिन वे इसे आर्थिक ‘संकट’ मानने को तैयार नहीं हैं।
   आर्थिक कुप्रबंधन को सुप्रबंधन के नाम से प्रसारित करने वाले वामनेताओं को यह जानकर आश्चर्य होगा कि सन् 2008-09 के दौरान बिहार ने राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में  3.0 प्रतिशत अतिरिक्त की कर वसूली की,मध्यप्रदेश ने 2.0 प्रतिशत,छत्तीसगढ़ 1.3 प्रतिशत,उत्तरप्रदेश 1.1 प्रतिशत अतिरिक्त कर वसूली की।
   इसके विपरीत पश्चिम बंगाल में बजट करघाटा 3.7 प्रतिशत दर्ज किया गया। हम जानना चाहते हैं वाम शासित राज्य सरकार भाजपा ,जद(यू) और बसपा के द्वारा संचालित राज्य सरकारों से भी खराब आर्थिक प्रबंधन क्यों कर रहे है ? ये आंकड़े रिजर्व बैंक के हैं। किसी दल के नहीं हैं।
    वित्तमंत्री का यह कहना गलत है कि बढ़े हुए नए वेतनमानों के कारण कर्ज बढ़ा है। यह बात एकदम गलत है। कर्ज लेकर सरकार चलाने का सिलसिला नए वेतनमान लागू होने के पहले से चला आ रहा है। मसलन् राज्य पर सन् 1977 में 11,403 करोड़ रूपये कर्ज था जो ,सन् 2008-09 में बढ़कर 1,48,110 करोड़ रूपये हो गया। सन् 2010-11 में यह बढ़कर 1,92,000 करोड़ रूपये हो गया है। जबकि नए वेतनमान एकसाल पहले ही लागू किए गए हैं। राज्य लंबे समय से कर्ज लेकर खर्चा चलाता रहा है। इसके अलावा राज्य ने विभिन्न उपायों के जरिए बाजार से भी पैसा उठाया है।      
पश्चिम बंगाल में आर्थिक कुप्रबंधन का आलम यह है कि  97.5 प्रतिशत आंगनबाड़ी का काम ठेकेदारों के जरिए हो रहा है। 97 प्रतिशत उचित मूल्य की दुकानें निजी स्वामित्व में चल रही हैं। 75 प्रतिशत आंगनबाड़ी संस्थाओं के पास निजी बिल्डिंग नहीं है। 66 प्रतिशत आंगनबाड़ी के पास पीने के पानी की सुविधा नहीं है। राज्य में 41.2 लाख बच्चे हैं जो अभी तक इंटीग्रेटेड चाइल्ड डवलपमेंट सर्विस स्कीम के बाहर हैं। 
     पश्चिम बंगाल में बच्चों में कुपोषण चरम पर है। कुपोषण के शिकार मात्र 41 प्रतिशत बच्चों तक ही अतिरिक्त भोजन पहुँच पाया है। कुपोषण के शिकार मात्र 24 प्रतिशत बच्चों को स्वास्थ्य केन्द्रों  के पास भेजा गया है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली की अवस्था और भी खराब है । राज्य में 3 लाख नकली राशनकार्ड हैं। 31 लाख बच्चे ऐसे हैं जिन्हें स्कूल में खाना नहीं मिलता।  अपर प्राइमरी के 43 प्रतिशत बच्चे हैं जिन्हें स्कूल में दोपहर का भोजन नहीं मिलता। 11 प्रतिशत प्राइमरी स्कूल के बच्चे हैं जिन्हें दोपहर का भोजन नहीं मिलता। आश्चर्य की बात यह है कि यह सब जानने के बाबजूद राज्य वामनेताओं को आर्थिक कुप्रबंधन नजर क्यों नहीं आता ? 

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