रविवार, 21 नवंबर 2010

मनमोहन सिंह फेसबुक पर कब आओगे ?


भारत में इन दिनों मीडिया में भ्रष्टाचार को लेकर कोहराम मचा हुआ है। इस कोहराम के कारण संसद ठप्प है। लेकिन फेसबुक पर वैसी सरगर्मी नहीं है जैसी होनी चाहिए। ब्लॉग जगत में भी वह उत्तेजना नहीं है जो होनी चाहिए।
   फेसबुक को अमेरिका में आम जनता को सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर गोलबंद करने,जनता को प्रतिवाद जुलूसों के लिए इकट्ठा करने का औजार बना लिया गया है। लेकिन भारत में अभी तक यह नहीं हो पाया है। हमें इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि आखिरकार वे कौन से कारण हैं जिनके कारण भारत में संचारक्रांति के जरिए धन तो कमाया जा सकता है,संचार किया जा सकता है लेकिन राजनीतिक तौर पर जनता को सड़कों पर नहीं उतारा जा सकता है ? हो सकता है यह स्थिति ज्यादा दिन न रहे। उम्मीद करें कि जल्द ही इसमें बदलाव आए।
    इसके बावजूद आज की वास्तविकता यह है कि संचार क्रांति का वाहक मध्यवर्ग है और जिस दौर में यह क्रांति हमारे बीच में दाखिल हुई है उस समय मध्यवर्ग सक्रिय सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेप करने वाले समुदाय के रूप में गायब हो चुका था।
     भारत का मध्यवर्ग मूलतः राजनीतिक तौर पर अपाहिज है। इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप की क्षमता नहीं है। यह वर्ग व्यवहारवाद और अर्थवाद की गिरफ्त में है और इसने अराजनीति का मार्ग पकड़ लिया है। इसने सचेत ढ़ंग से सत्ता के साथ अपने को बांध लिया है।
     दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने संचार क्रांति के साथ नागरिक के नाते संबंध अभी तक विकसित ही नहीं किया है। उसने उपभोक्ता के रूप में संबंध बनाया है। आजादी के पहले मध्यवर्ग की राजनीतिक आवाज थी,राजनीतिक सक्रियता थी।लेकिन आजादी के बाद उसने राजनीति को त्याग दिया है और निजी धंधे में लगा दिया है। मध्यवर्ग के लोग अखबार पढ़ते हैं,टीवी देखते हैं, बड़े-बड़े विषयों पर विवाद करते हैं,चर्चा करते हैं। लेकिन राजनीतिक तौर सक्रिय नजर नहीं आते। राजनीति को उसने जिह्वासुख और सत्तासुख का हिस्सा बना दिया है।
    संचार क्रांति के बाद अमेरिका,ब्रिटेन,फ्रांस,चीन,इण्डोनेशिया,ईरान आदि अनेक देशों में मध्यवर्ग की सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता और हस्तक्षेप में इजाफा हुआ है लेकिन भारत में उल्टा हुआ है।
      संचार क्रांति के बाद मध्यवर्ग की सामाजिक -राजनीतिक निष्क्रियता बढ़ी है। संचार क्रांति ने भारत के मध्यवर्ग में उपभोग के क्षेत्र में क्रांति की है। मध्यवर्ग की बतकही को बढ़ावा दिया है लेकिन मध्यवर्ग को सामाजिक-राजनीतिक तौर पर अपाहिज बनाया है।
    भारत में संचार क्रांति खासकर फेसबुक ,ब्लॉगिंग,सामाजिक मीडिया आदि के क्षेत्र में एक खास किस्म का ठंड़ापन है। राजनीतिक सक्रियता का अभाव है। हमारे यहां ये मंच प्रतिक्रिया के मंच हैं। इनमें किसी भी किस्म की नयी राजनीतिक खोज या सरकारी गुप्त दस्तावेजों का रहस्योदघाटन अभी तक नहीं हुआ है। ये दैनन्दिन संचार के माध्यम बनकर रहे गए हैं। इसके विपरीत अमेरिका आदि देशों में मध्यवर्ग के बीच में राजनीतिक गोलबंदी के मंच के रूप में फेसबुक-ब्लॉगिंग आदि की महत्वपूर्ण भूमिका सामने आयी है।
     भारत में संचारक्रांति में शामिल मध्यवर्ग की वास्तविकता यह है कि इसके पास मानवाधिकारों की चेतना नहीं है । इसके विपरीत अधिकांश मध्यवर्गीय लोग मानवाधिकार हनन के इस या उस रूप का इस्तेमाल करते रहे हैं। साथ ही भारत में सिविल सोसायटी आंदोलन बेहद कमजोर अवस्था में है। इसके कारण मध्यवर्ग अभी तक संचार क्रांति को लोकतांत्रिक राजनीति से जोड़ ही नहीं पाया है। अमेरिका आदि देशों में संचारक्रांति और सिविल सोसायटी आंदोलन के बीच में गहरा गठबंधन है। भारत में सिर्फ बाजार और उपभोग के साथ गठबंधन है।
    फेसबुक वगैरह सामाजिक नेटवर्क साइटों की सबसे बड़ी बात यह है कि ये हायरार्की और अनुशासन को नहीं मानतीं। किसी भी राजनीतिक संगठन के लिए ये दो जरूरी चीजें हैं। यही वजह है कि राजनीतिक दलों में फेसबुक आदि के इस्तेमाल के प्रति जागरूकता नजर नहीं आती और संचार क्रांति के दायरे में खासकर फेसबुक,ब्लॉगिंग आदि के दायरे में जो लोग आते जा रहे हैं उनमें हायरार्की और अनुशासन नहीं होता और फलतः वे किसी दल विशेष से नहीं बंध पाते। इससे भारत जैसे देश में संगठनहीनता की भावना बढ़ी है।
     कुछ लोग यह मानते हैं कि फेसबुक के जरिए बनाया गया सामाजिक बंधन मजबूत होता है तो दूसरे लोग कह रहे हैं फेसबुक ने कमजोर सामाजिकता को जन्म दिया है। फेसबुक आदि सामाजिक मीडिया ने भारत में जीवन व्यवहार पर प्रभाव डालना आरंभ कर दिया है। सामाजिक बंधन भले ही कमजोर हों लेकिन दैनन्दिन व्यवहार को प्रभावित करना आरंभ कर दिया है। सामाजिक मीडिया के यूजरों में व्यवहार के नार्मलाइजेशन की प्रक्रिया के कारण अनेक नए किस्म की संचार संभावनाएं जन्म ले रही हैं। मसलन भारत में मध्ययुगीन मानसिकता और मूल्यबोध का अभी भी दबदबा है अतः फेसबुक आदि सामाजिक मीडिया में धर्म,ज्योतिष बढ़ी है।
      इसके अलावा डिशकशन ,गपशप,हलो-हाय,दुआ-सलाम,नमस्कार-प्रणाम आदि की बाढ़ आ गयी है। विचारों का आदान-प्रदान बढ़ा है। सामाजिक संबंध भले ही कमजोर रहें लेकिन संचार बढ़ा है।
    भारत में सामाजिक मीडिया के राजनीतिक इस्तेमाल में इजाफा न हो पाने का प्रधान कारण है विभिन्न राजनीतिक दलों में ईसाक्षरता का अभाव। आज भी राजनीतिक प्रचार के लिए मीडिया की मदद पर ही राजनीतिक दल निर्भर करते हैं। वे ईमेल से लेकर फेसबुक तक किसी भी मीडियम को अपने संगठन की गतिविधि के साथ नत्थी नहीं कर पाए हैं।
     यहां तक कि कांग्रेस जैसा दल भी अभी तक संचार क्रांति के माध्यमों के साथ अपने को नीचे तक जोड़ नहीं पाया है। जबकि देश में संचार क्रांति का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है। हम नहीं जानते सोनिया गांधी,राहुल गांधी,प्रकाशकारात,सीताराम येचुरी,लालकृष्ण आडवाणी आदि के फेसबुक पर कितने मित्र हैं,इन नेताओं ने अभी तक फेसबुक में दर्ज तक नहीं कराया है। लेकिन वे चाहते हैं अमेरिका के साथ प्रतिस्पर्धा करना।
     जैसाकि हम सब जानते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के फेसबुक पर 15.7 मिलियन दोस्त हैं।ट्विटर पर उनका 5.9 मिलियन लोग अनुसरण करते हैं। ओबामा अपने अनेक नीतिगत फैसलों पर आम राय बनाने के लिए संवाद करते हैं। लेकिन भारत में अभीतक मनमोहन-आडवाणी फेसबुक पर नहीं आए हैं। ऐसे में संचार क्रांति को राजनीति से कैसे जोड़ सकते हैं ?
     मजेदार बात है कि हमारे नेता चीन के साथ प्रतिस्पर्धा का सपना देखते हैं लेकिन वे जानते हैं कि प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते। चीन में अधिकांश मंत्रियों और पार्टीनेताओं के ब्लॉग हैं। वे नियमित लिखते हैं और सैंकड़ो-हजारों की तादाद में प्रतिक्रिया प्रतिदिन पाते हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति से लेकर महान क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो तक सभी को संचार क्रांति के किसी न किसी मीडियम में सक्रिय रूप में देख सकते हैं लेकिन भारत में राजनेताओं में सामाजिक मीडिया के प्रति कोई उत्साह ही नजर नहीं आता। यहां तक कि युवानेता राहुल गांधी भी अभी फेसबुक और ब्लॉगिंग तक नहीं पहुँच पाए हैं। ऐसे में संचार क्रांति को राजनीतिकचेतना के परिवर्तन का अस्त्र बनाने का सपना भारत में पूरा होने में अभी और देर लगेगी।
     अभी भारत की वास्तविकता यह है यहां का मध्यवर्ग पूरी तरह संचारक्रांति के सक्रिय मोबाइल उपभोक्ता में रूपान्तरित हुआ है। वह इसके आगे बहुत धीमी गति से जा रहा है। कारपोरेट घरानों में सामाजिक मीडिया को समृद्ध करने कीओर रूझान नजर नहीं आ रहे हैं। भारत का कारपोरेट जगत इंटरनेट को लेकर सिर्फ व्यापार तक ही सक्रिय है। व्यापार के अलावा अन्य गतिविधियों में उसकी कोई खास दिलचस्पी नहीं है। सरकारी वेबसाइट ठंडी पड़ी रहती हैं। हमारे यहां केन्द्र और राज्य सरकारों ने कभी भी नीतिगत सवालों ,सरकारी कार्यक्रमों और नीतियों के पक्ष में मीडिया का सुनियोजित इस्तेमाल नहीं किया। मीडिया के इस्तेमाल का अर्थ उनके लिए है सरकारी विज्ञापन दे देना। आज भी केन्द्र सरकार या राज्य सरकारें अपनी किसी भी नीति या कार्यक्रम पर इंटरनेट पर बहस नहीं चला रहे हैं। हमें सोचना चाहिए कि सरकारों की निष्क्रियता क्यों है ?
     कम्प्यूटर कोई खिलौना नहीं है। इंटरनेट कोई कनेक्शन मात्र नहीं है। जिसे बेच दिया जाए और बाजार से पैसा उठा लिया जाए। हमें राहुल गांधी और सैम पित्रोदा से आज सवाल करना चाहिए कि कम्प्यूटर क्रांति का क्या यही अर्थ है कि घरों और दफ्तरों में कम्प्यूटर-लेपटॉप पहुँचा दिए जाएं। दुकानों को संचार उपकरणों से भर दिया जाए ?  सत्ता पर बैठे लोग जबाब दें खासकर राहुल गांधी-सोनिया गांधी जबाब दें कि केन्द्र सरकार अपनी नीतियों पर इंटरनेट पर बहस क्यों नहीं चलाती ? क्यों नहीं प्रत्येक मंत्री इंटरनेट पर अपने मंत्रालय के कामकाज के बारे में बहस करता ? सांसदों को हम इंटरनेट और फेसबुक पर देख क्यों नहीं पाते ? जबकि उन्हें संचार की सारी सुविधाएं भारत सरकार देती है।
      जो सासद.मंत्री,प्रधानमंत्री इंटरनेट पर विभिन्न मसलों पर अपने वोटरों और नागरिकों से संवाद ही न करे तो उसकी सभी संचार सुविधाएं ले ली जानी चाहिए। संचार सुविधाएं जनता की सेवा के लिए हैं। उससे संवाद बनाने के लिए हैं। हमारे नेताओं को खासकर प्रधानमंत्री को इस मामले में पहल करके नए इंटरनेट युग का आरंभ करना चाहिए।  सभी मंत्रियों और सांसदों को फेसबुक-ब्लॉगिग आदि के जरिए संवाद करने की हिदायत दी जानी चाहिए तब ही संचार क्रांति और राजनीति में भारत में पैदा हुए महा-अंतराल को हम कम कर पाएंगे।        







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