बुधवार, 17 नवंबर 2010

नव्य उदारतावाद और विचारधारात्मक अवमूल्यन


     मार्क्सवादी के लिए साम्यवाद पूजा की चीज नहीं है। मार्क्सवादी के लिए वैज्ञानिक ढ़ंग से इस समाज को समझना और उस परिवर्तन के तर्क को समझना जरूरी होता है जिसके कारण परिवर्तन घट रहे हैं। उत्तर आधुनिक परिवर्तनों की हिन्दी के ज्ञानी-ध्यानी लोग खिल्ली उड़ाते रहे हैं। अभी भी अनेक हैं जो आंखें खोलकर समाज को देखना नहीं चाहते। हम चाहें या न चाहें। उत्तर आधुनिक परिवर्तन हो रहे हैं। इन परिवर्तनों से आंखें मूदना संभव नहीं है। आप इन परिवर्तनों की कैसे और किस नजरिए से व्याख्या करते हैं यह भिन्न समस्या है। लेकिन परिवर्तन हो रहे हैं और समाज तेजी से बदल रहा है। इस बदलाव की जितनी गहरी समझ होगी। चीजें उतनी ही साफ नजर आएंगी।
      उत्तर आधुनिकता के दूसरे चरण में नव्य उदार परिवर्तनों का केन्द्र बिंदु अमेरिका नहीं एशिया है। उत्तर आधुनिकतावाद के आरंभिक चरण में जितने भी परिवर्तन हुए हैं वे अमेरिका से निकलकर आए हैं। लेकिन 1990 के बाद से अमेरिका की जगह केन्द्र में चीन आ गया है। अमेरिकी बुद्धिजीवियों में आदत है आत्मप्रशंसा की इसलिए वे चीन के परिवर्तनों को देख नहीं रहे हैं।
     पुराने साम्राज्यवाद के दौर में पूंजीवाद का केन्द्र इंग्लैण्ड था,बाद में द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर में अमेरिका केन्द्र बना।नव्य उदारतावाद के आरंभ में अमेरिका ही पूंजीवाद का गोमुख था। लेकिन नव्य उदारतावाद के अगले चरण में यानी मौजूदा दौर में पूंजीवाद का केन्द्र चीन है,अमेरिका नहीं। कारपोरेट और लंपट पूंजीवाद की इसमें सभी खूबियां हैं। सब कुछ हजम कर जाने का इसमें भाव है। विश्व बाजार में छा जाने ,सब कुछ बनाने और सस्ता उपलब्ध कराने का नजरिया है। इस समाविष्टकारी भाव से सारी दुनिया के देशज उद्योगों के लिए गंभीर संकट पैदा हो गया है।
    एक जमाना था चीन में कम से कम चीजें पैदा होती थीं। सारा देश पांच किस्म के कपड़े पहनता था। सारा देश साइकिल पर चलता था। लेकिन विगत 30 सालों में उसने सब कुछ बदल दिया है। उत्पादन और जिन्सों के उत्पादन में तो उसने क्रांति की है। किसी वस्तु को सस्ते में बनाना,बाजार में इफ़रात में उपलब्ध कराना और बाजार को घेरे रखना। बड़ी पूंजी को आकर्षित करना,श्रम और श्रमिक को सस्ते माल में लब्दील करना। मैन्यूफेक्चरिंग की ताकत को ऐसे समय में स्थापित करना जब सारी दुनिया मैन्यूफैक्चरिंग छोड़कर सेवाक्षेत्र की ओर आंखें बंद करके भाग रही थी।अपने आप में महान उपलब्धि है।
     उत्पादन और खूब उत्पादन का नारा लगाकर चीन ने उत्पादन और उत्पादकों की महत्ता स्थापित की है। तंत्रगत संकटों को उसने अभिनव परिवर्तनों और प्रौद्योगिक क्रांति के जरिए संभाला है। विकास की तेजगति को बरकरार रखा है। साथ ही उत्पादन की गति को बनाए रखकर कारपोरेट पूंजीवाद को नए सिरे से पुनर्गठित किया है। इन परिवर्तनों को उत्तर मार्क्सवाद के आधार पर ही परखा जा सकता है। चीन और अमेरिका के नव्य उदार आर्थिक परिवर्तन पुराने मार्क्सवाद से नहीं उत्तर मार्क्सवाद से ही समझ में आ सकते हैं।
फ्रेडरिक जेम्सन ने लिखा है ‘‘तंत्रगत संकटों पर काबू पाने के लिए दूसरी आवश्यकता है अभिनव परिवर्तन और प्रौद्योगिकी में 'क्रांति' की। अर्नेस्ट मेंडेल ऊपर उल्लिखित चरणों के साथ इन परिवर्तनों का तालमेल बिठाते हैं : वाष्प तकनीकी का राष्ट्रीय पूंजीवाद के क्षण के साथ; विद्युत और दहनशील इंजन का साम्राज्यवाद के क्षण के साथ; आणविक ऊर्जा और साइबरनेटिक का हमारे अपने समय के बहुराष्ट्रीय पूंजीवाद और भूमंडलीकरण के क्षण के साथ जिसे कुछ लोगों द्वारा उत्तरआधुनिकता का भी नाम दिया जाता है। ये प्रौद्योगिकियां नई प्रकार की जिन्सों का उत्पादन तो कर ही रही हैं साथ ही नए विश्व क्षितिज को उद्धाटित करने में भी सहायक हैं। इस प्रकार ये विश्व को छोटा और पूंजीवाद को नए पैमाने पर पुनगर्ठित कर रही हैं। इसी अर्थ में उत्तरपूंजीवाद (लेट कैपिटलिज्म) की विवेचना सूचना या साइबरनेटिक्स के पदों के रूप उपयुक्त हैं (और ये पद सांस्कृतिक रूप में भी बहुत कुछ व्यक्त करते हैं) लेकिन इन्हें आर्थिक गतिकी के साथ पुनर्युग्मित करने की आवश्यकता है, जिससे इनमें सांस्कृतिक, बौध्दिक और विचारधारात्मक रूप से आसानी से अलग होने की प्रवृत्ति है।
यदि पूंजीवाद के अलग-अलग कालखंडों के रूप में इस विभाजन को स्वीकार किया जाए तो तुरंत स्पष्ट हो जाता है कि विभिन्न उत्तर-मार्क्सवादों, खासकर पिछली सदी के अंत में बर्नस्टीन का उत्तर-मार्क्सवाद 1980 के दशक का उत्तर-संरचनावाद तथा उनके द्वारा प्रतिस्थापित 'संकट' या 'मार्क्सवाद का अंत' की अवधारणा उन क्षणों की समकालीन रही है, जिन क्षणों में पूंजीवाद में पुनर्संरचना और आश्चर्यजनक रूप से व्यापक विस्तार हुआ है। और प्रकारांतर से इनके बाद अपेक्षाकृत अधिक आधुनिक या सचमुच हमारे समय के उत्तरआधुनिक मार्क्सवाद की नानाविध सैध्दांतिक परियोजनाएं आई हैं जो मार्क्सवाद के अध्ययन के पारंपरिक विषय यानी पूंजीवाद द्वारा अपनाए जा रहे अप्रत्याशित आयामों को सैध्दांतिक रूप देने का प्रयास कर रही हैं।’’
  नव्य उदार परिवर्तनों का विश्व में सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा है। लेकिन यहां पर हम वामपंथ पर जो प्रभाव पड़ा है उसकी समीक्षा तक ही फिलहाल सीमित रखेंगे। वामपंथ पर नव्य उदारतावाद के प्रभाव को हम इस रूप में देख तकते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियां अब अपने बुनियादी मसलों पर विचारधारात्मक संघर्ष नहीं कर रही हैं बल्कि उन मसलों पर संघर्ष कर रही हैं जो पूंजीवादी मसले हैं। पूंजीवादी विचारधारा के द्वारा निर्मित मसले हैं।   
   इन दिनों कम्युनिस्टों का संघर्ष समाजवाद के लिए नहीं चल रहा बल्कि कल्याणकारी राज्य को बचाने के लिए चल रहा है। भारत से लेकर अमेरिका तक सभी जगह कम्युनिस्ट पार्टियां कल्याणकारी राज्य को बचाने के एजेण्डे में फंस गयी हैं।
  नव्य उदारतावाद के आने के साथ ही अनेक समाजवादी देशों ने समाजवाद को त्यागकर कारपोरेट पूंजीवाद का मार्ग पकड़ लिया। यह काम अकारण सभी किस्म के मार्क्सवादी मूल्यों और मान्यताओं को त्यागकर किया गया। भारत में आज कम्युनिस्ट पार्टियां कल्याणकारी राज्य के एजेण्डे को लेकर ही हल्ला मचा रही हैं। जबकि पूंजीपतिवर्ग ने कल्याणकारी पूंजीवाद के मार्ग को तिलांजलि दे दी है और नव्य उदार आर्थिक कारपोरेट पूंजीवादी विकास का मार्ग ग्रहण कर लिया है। अनेक अवसरों पर कम्युनिस्टों में भी वे तमाम विकृतियां देखने को मिलती हैं जो कल तक पूंजीवादी दलों में हुआ करती थीं। वे पूंजीवादी विकृतियों को समझने और उनके खिलाफ अनवरत संघर्ष चलाने में असमर्थ रहे हैं।
   पहले लोग बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के सवालों को पसंद करते थे। उनके लिए कुर्बानी देने के लिए तैयार रहते थे। लेकिन नव्य उदार प्रचार अभियान के कारण आम आदमी बुनियादी सामाजिक परिवर्तनो से डरने लगा है। जोखिम उठाने से डरने लगा है। बहस करने से बचने लगा है। वह इस या उसकी हां में हां मिलाकर सामंजस्य बिठाकर यथास्थितिवाद के सामने समर्पण कर चुका है। अब हमारे बीच में बुनियादी मसलों पर बहसें कम हो रही हैं,कचरा विषयो पर बहसें ज्यादा हो रही हैं।
    मसलन हाल ही में उठे 2जी घोटाले को ही लें। मीडिया और संसद बहस कर रही है पूर्व संचारमंत्री ए.राजा ने 1 लाख 75 हजार करोड़ का देश को चूना लगा दिया। नियम तोड़े। घूस ली बगैरह-बगैरह। इस प्रसंग में आम लोग,मीडिया और सांसद यह बात नहीं कर रहे कि आखिरकार ये रेडियो तरंगें किसकी हैं  ? क्या इन्हें बेचा जा सकता था ? क्या रेडियो तरंगे कारपोरेट पूंजी की सेवा के लिए आवंटित की जाती हैं ? रेडियो तरंगे राष्ट्र की संपदा हैं और इन्हें हमारा देश अंतर्राष्ट्रीय संचार समझौते के तहत अंतर्राष्ट्रीय संस्था के जरिए आवंटन के माध्यम से प्राप्त करता है। इन्हें बेचा नहीं जा सकता। क्योंकि ये राष्ट्र की संपत्ति हैं। वैसे ही जैसे भारत के ऊपर का आकाश भारत का है उसे बेचा नहीं जा सकता। समुद्र को बेचा नहीं जा सकता। संसद भवन बेचा नहीं जा सकता।ताजमहल बेचा नहीं जा सकता। बजट घाटे को कम करने के नाम पर रेडियो तरंगों का कारपोरेट घरानों को आवंटन देशद्रोह है,देशभक्ति नहीं है। सवाल उठता है देशद्रोह बड़ा अपराध है या भ्रष्टाचार ?
   हमारे सांसदों ने रेडियों तरंगों को नव्य उदारीकरण के नाम पर कारपोरेट घरानों के हाथों बेचकर राष्ट्रविरोधी काम किया है। कायदे से रेडियो तरंगे बेची नहीं जानी चाहिए। यह राष्ट्रविरोधी काम है। लेकिन संसद में कभी भी किसी भी दल के सांसदों ने रेडियो तरंगों के निजी हाथों बेचे जाने का विरोध नहीं किया,आज भी वे विरोध नहीं कर रहे बल्कि यह कह रहे हैं कि नए सिरे से इनका आवंटन बाजार दर पर करवा दो और राष्ट्र को 1लाख 75 हजार करोड़ रूपये दिलवा दो। उनकी रूचि राष्ट्र को पैसा दिलवाने में हैं तरंगों को राष्ट्र के खाते में बचाने में नहीं है। यहीं पर उत्तर आधुनिक समाज की आयरनी छिपी है। हम जानते ही नही हैं कि राष्ट्र हित क्या हैं ? कारपोरेट हितों को राष्ट्रहित समझ रहे हैं और यही नव्य उदार प्रौपेगैण्डा की जीत है।बजट घाटे को कम करने देशसेवा है चाहे रेडियो तरंगें बेचनी पड़ें। धन्य हैं ये देशभक्त जो देश की संपदा (रेडियो तरंगें) बेचकर देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं।  यह नव्य उदार प्रौपेगैण्डा की जीत है । आज मीडिया में सारे राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी बहस के उन मसलों पर उलझे हैं जो बाजार के मसले हैं,सतही मसले हैं। बहस-मुबाहिसे में बाजार का लक्ष्य प्रधान हो गया है और बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के सवाल बहस से गायब हो गए हैं। यह विचारधारात्मक अवमूल्यन का है।      









कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें