गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

बचपन और कबूतरों का साथ

      इन दिनों मैं कलकत्ते में जहां रहता हूँ वहां पर अनेक पक्षी रहते हैं,उनमें कोयल,गौरेय्या और कौव्वा प्रमुख हैं। कोयल तो कभी -कभी सारे दिन शब्दध्वनि से माहौल को गुंजार किए रखती है।सन्नाटे को तोड़ती रहती है। इस कोयल के कारण  मुझे रह-रहकर बचपन में मथुरा के कबूतर खूब य़ाद आते हैं।
     मथुरा में गोलपाड़ा मोहल्ले के मोहल्लेदार चंदू चौबे के यहां कबूतरों का बहुत बड़ा बसेरा था. उनको कबूतरबाजी का शौक था,उनका बेटा नरेश मेरे साथ पढ़ता था और हमदोनों गर्मी में दोपहरभर कबूतरों को खिलाने-पिलाने और उड़ाने का जमकर आनंद लेते थे।चौबेजी के घर की छत काफी लंबी-चौड़ी हुआ करती थी। हमने अपने अनुभव से महसूस किया कि कबूतर बेइंतहा संवेदनशील,अक्लमंद और अनुयायी किस्म का पक्षी होता है।
      दिलचस्प बात थी कि उन दिनों मथुरा में कबूतरों की उड़ान की प्रतियोगिताएं होती थीं। हमारे अनेक मुस्लिम दोस्त थे जिनको कबूतर पालने का शौक था और दोपहर में कबूतरों की उड़ान आयोजित करते थे, कौन कबूतर कितनी दूर और कितनी देर तक उड़ सकता है इसकी हिसाब रखा जाता था, कबूतरों में अनेक तरह की नश्ल होती हैं, फिलहाल नाम याद नहीं हैं,ध्यान रहे सारे कबूतर एक जैसे नहीं होते।
      कबूतरों में लक्खा कबूतर का नाम मन में रह गया है वह देखने मे बहुत ही सुंदर और स्वस्थ होता था और लंबी से लंबी उडान जीतने की क्षमता रखता था, कबूतर लंबी उडान तब जीतता है जब उसको निरंतर अभ्यास कराया जाय। कबूतर कभी -कभी राह भी भटक जाता है ,किसी कबूतरी के चक्कर में घर भूल जाता था,अथवा दिशाभ्रम के कारण अन्य के दड़बे पर उतर जाता था, हमलोग खोज करते थे कि कहां गया होगा, उन लोगों से संपर्क करते थे जो कबूतर पालते थे ,एकबार इसी तरह का एक वाकया हुआ और कबूतर एक अन्य की कबूतरी के साथ भाग गया ,शाम हो गयी, हम परेशान थे कि कहीं किसी चील या गिद्ध ने मारकर खा तो नहीं लिया, हमने बड़ी मुश्किल से कई घंटे गुजारे,काफी खोजबीन की तो रात को दस बजे जाकर पता चला कि आर्यसमाज रोड़ पर एक मुस्लिम की कबूतरी के साथ वह उनके घर चला गया। कबूतर आकाश में स्वच्छंद भाव से उड़ता है लेकिन वापस ठीक अपने ही ठिकाने पर लौटता है। स्थान,मालिक और परिवेश का जितना बारीक ज्ञान उसे होता है वह हमें मुग्ध करता है।   

     कबूतर का यह आख्यान लिखने का मन इसलिए भी हुआ कि मेरी खिड़की पर एक जोड़ा कबूतर रहता है ,इस जोड़े में पता नहीं किसी बात पर अनबन हो गयी और कबूतर-कबूतरी दोनों एक दूसरे से नाराज हो गए ,कई दिन तक दोनों भूखे प्यासे एक-दूसरे की ओर पीठ करके बैठे रहे, एक दिन बाद कबूतर ने अहंकार त्यागा उड़कर गया कहीं से कुछ दाने अपनी चोंच में लेकर आया और कबूतरी को चोंच से खिलाने की कोशिश की ,लेकिन कबूतरी नहीं मानी, उसने नहीं खाया, इसके बाद कबूतर ने अपने मुँह में रखे सभी दाने फेंक दिए और वह भी मन मारकर बैठ गया, दो दिन बाद कबूतरी उड़ी और कहीं से कुछ दाने मुँह में लेकर आई और उसने अपनी चोंच से वे दाने कबूतर को खिलाने की कोशिश की तो कबूतर ने खा लिया,दाने खाते ही दोनों ने एक-दूसरे को कसकर प्यार किया ,एक-दूसरे के  गर्दन पर गर्दन घिसकर प्रेम का इजहार किया और अचानक दोनों मिलकर आकाश में उड़  गए और कई घंटे तक उड़ान भरने के बाद फिर खिड़की पर आराम से आकर बैठ गए और गुटरगूँ गुटरगूँ करने लगे।   

3 टिप्‍पणियां:

  1. जगदीश्वर जी, इन कासिदों के संग-साथ ने आपको लिटरेचर के आसमां में उड़ने वाला नायाब परिंदा बना दिया।
    खुदा का शुक्र है कि सैकड़ों उड़ानों के बाद भी आप हिन्दी के अपने ठीये को भूले नहीं (इस पूरे रूपक में मुसलमान की कबूतरी...तौबा तौबा)।





    

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  2. जगदीश्वर जी, इन कासिदों के संग-साथ ने आपको लिटरेचर के आसमां में उड़ने वाला नायाब परिंदा बना दिया।
    खुदा का शुक्र है कि सैकड़ों उड़ानों के बाद भी आप हिन्दी के अपने ठीये को भूले नहीं (इस पूरे रूपक में मुसलमान की कबूतरी...तौबा तौबा)।





    

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  3. दादा आपने इन कबूतरों के माध्यम से बखूबी तरीके से प्रेम को का प्रतिबिंब खींचा |

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