बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

"आप" की जीत का सच



   दिल्ली विधानसभा चुनाव हो गए, चौदह फ़रवरी 2015 को नए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण करेंगे । वे रोड शो करते हुए सभा स्थल तक जाएँगे। यह नए क़िस्म का शक्ति प्रदर्शन और मीडिया इवेंट है । यह असल में मोदी के जलसेबाज फिनोमिना का जलसेबाजी से खोजा जा रहा विकल्प है । यह दुनिया के सामने लोकतंत्र को मजमे में तब्दील करने का शो भी है। अन्ना हज़ारे के सुझाव को केजरीवाल ने मान लिया होता तो बेहतर होता।   यह लोकतंत्र के नायक की पहली चूक गिनी जाएगी। सादगी से शपथग्रहण समारोह करने से केजरीवाल का क़द छोटा नहीं होता , जलसेबाजी से क़द बड़ा भी नहीं होता ! केजरीवाल का जलसा प्रेम अंततः मोदी के छंद में बँधने की शुरुआत है । मोदी को बेनक़ाब करने के लिए मोदी का छंद चुनाव तक प्रासंगिक है , सत्तारुढ़ होने के बाद जलसेबाजी करना लोकतंत्र और नेता की ताक़त कम और कमज़ोरी ज्यादा दिखाता है। बेहतर होता शपथग्रहण की जलसेबाजी न होती ! 
         केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को दिल्ली में अभूतपूर्व विजय हासिल हुई है । यह जीत क्यों और कैसे मिली ? किन शक्तियों की इस जीत में भूमिका थी ? कारपोरेट घरानों की प्रतिस्पर्धा की क्या भूमिका थी ? संघ और कांग्रेस की क्या भूमिका थी ? देश की भावी राजनीति का स्वरुप क्या होगा ? इत्यादि सवालों पर आने वाले समय में विस्तार से सूचनाएँ और विश्लेषण आएँगे । लेकिन एक बात तय है कि यह जीत अभूतपूर्व है। 
         ' आप' की जीत के बारे में जनमत सर्वेक्षण दूसरी बार एकसिरे से ग़लत साबित हुए हैं , इससे जनमत सर्वेक्षण की वैज्ञानिकता के सभी दावों पर सवालिया निशान लगा है । जनमत सर्वेक्षण लगातार दो बार ग़लत साबित होना, यहाँ तक तक कि 'आप' का सर्वे भी ग़लत साबित होना दर्शाता है कि आम जनता अॉंकड़ा नहीं है। आम जनता की राय को मीडिया इच्छित दिशा में नहीं मोड़ सकता ! मीडिया प्रचार की सीमाएँ हैं , लेकिन ज़मीनी प्रचार की कोई सीमा नहीं है,वह आज भी सबसे ज्यादा प्रभावशाली है। 
       दूसरा संदेश यह निकलता है कि धर्मनिरपेक्ष संगठन के निकास के आम जनता में व्यापक आसार हैं । धर्मनिरपेक्ष राजनीति को किसी भी तरह हाशिए पर रखकर लोकतंत्र का अपहरण नहीं किया जा सकता।  ' आप' किस वर्ग के विचारों का दल है इसके बारे में वे भी नहीं छिपाते। लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है कि ' आप' धर्मनिरपेक्ष - लोकतांत्रिक  दल है और उसके पास लोकतंत्र का वैकल्पिक नजरिया है और संविधान में वर्णित मूल्यों के प्रति उसकी गहरी आस्थाएँ हैं। यही चीज उसे अन्य बुर्जुआदलों ( कांग्रेस-भाजपा-सपा-बसपा आदि) से भिन्न बनाती है । 
                       भारत में स्वस्थ बुर्जुआ राजनीति के लिए पर्याप्त स्थान है और यही चीज " आप" की प्रासंगिकता के साथ बुर्जुआ राजनीति की प्रासंगिकता को भी पुष्ट करती है । 
           केजरीवाल की 2015 की दिल्ली जीत का प्रधान कारण है दैनंदिन जन समस्याओं का समाधान न कर पाने में केन्द्र सरकार की असफलता । केन्द्र सरकार ने यदि जन समस्याओं के समाधान का प्रयास किया होता तो भाजपा को इतनी बुरी हार का सामना न करना पड़ता। कहने को दिल्ली राजधानी है लेकिन अराजक और जनविरोधी विकास के कांग्रेसी मॉडल का आदर्श नमूना है। मोदी सरकार ने विगत आठ महिनों में इस मॉडल में कोई बदलाव नहीं किया। बिजली के बिल, बिजली की सप्लाई , पानी की सप्लाई और क़ानून और व्यवस्था , प्रदूषण आदि समस्याओं के साथ झुग्गी- झोंपड़ियों के अबाधित प्रसार और नागरिक सुविधाविहीन संसार ने आम जनता को भयानक क्रोध से भर दिया है ।
   " आप" ने आमजनता को उपरोक्त सवालों पर परंपरागत कम्युनिकेशन के आधार पर संगठित किया । जन समर्थन जुटाने के परंपरागत तरीक़ों के जरिए ताक़तवर संगठन का निर्माण किया ।साथ ही आम जनता को मतदान पेटियों तक पहुँचाया। इस प्रक्रिया में "आप" का जनाधार क्रमश: बढा और उसका प्रचार भी सबसे ज्यादा प्रभावशाली रहा। 
         यह कहना ग़लत है कि संघ की फूट का या कांग्रेस के मतों की "आप" की जीत में कोई निर्णायक भूमिका है। कांग्रेस और संघ ने यथाशक्ति संघर्ष किया लेकिन आम जनता के व्यापकतम तबक़ों को अपने साथ जोड़ने में ये दोनों ही दल असफल रहे हैं। जो दल चुनाव लड़ते हैं वे हारने के लिए नहीं लड़ते । संघ-भाजपा - कांग्रेस ने चुनाव ताक़त के साथ लड़ा अत: उनके वोट "आप" को नहीं मिले । 
    भाजपा को एक साल पहले विधानसभा चुनाव में जितने मत मिले थे तक़रीबन उतने ही वोट उसे इसबार भी मिले हैं। यह बात दीगर है कि लोकसभा चुनाव की तुलना में उसे कम वोट मिले हैं। लेकिन लोकसभा चुनावों के वोटों के साथ तुलना करना सही नहीं होगा। 
       केजरीवाल की जीत में "आप" की मीडिया और प्रौपेगैण्डा रणनीति बेहद आकर्षक और प्रभावशाली रही है। उसके सभी शीर्ष नेताओं का सोशल मीडिया से लेकर जनसभाओं और रोड शो तक सक्रिय रहना, टीवी से लेकर नुक्कड़ सभाओं तक बोलना बेहद प्रभावशाली रहा है। इस समूची प्रक्रिया में " आप" ने लोकतंत्र का राजनीतिक चरित्र निखारा है और राजनीति के प्रति आम लोगों की आस्था को पुख़्ता बनाया है। 
                  भाजपा आरंभ से मोदी और टीवी उन्माद पर केन्द्रित रही और ये दोनों ही पहलू ज़मीनीस्तर पर आम जनता को प्रभावित करने में असमर्थ रहे। आश्चर्यजनक बात यह रही कि विकास की बातें करने वाले मोदी ने निजी हमले किए, निम्नस्तरीय राजनीतिक जुमलेबाजी और नारेबाज़ी की भाषा का प्रचार में इस्तेमाल किया। वे एक भी सकारात्मक बात आम जनता के सामने नहीं रख पाए । किरनबेदी को भाजपा ने आख़िरी समय में केजरीवाल के दबाव में मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रुप में पेश किया । 
    असल में  किरनबेदी की टीवी इमेज से प्रभावित होकर ही मोदी ने उनको मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाया। सच यह है कि किरन बेदी की टीवी इमेज का संबंध अन्ना के आंदोलन से था , उस इमेज का भाजपा की राजनीति से कोई संबंध नहीं था । अत: भाजपा की राजनीति में किरनबेदी की इमेज एकदम मिसफ़िट लग रही थी और इसने भाजपा की समूची व्यूह रचना को पंगु बनाकर रख दिया । भाजपा की सबसे बड़ी असफलता यह रही कि उसके पास कोई भाजपाई इमेज मैदान में पेश करने लायक नहीं थी। वैसी स्थिति में भाजपा को कम से कम इमेज संकट का सामना नहीं करना पड़ता । लेकिन परिणाम में कोई गुणात्मक अंतर नहीं पड़ता । इमेज की प्रचार में भूमिका होती है, वोट लाने में संगठन की भूमिका होती है। दिल्ली में भाजपा का संगठन लोकसभा विजय के बाद सत्तादास होकर रह गया । 
      कांग्रेस की स्थिति यह है कि वह लोकसभा और दिल्ली विधानसभा की चुनावी हार से अभी तक बाहर नहीं निकल पायी है। यही वो अनुकूल परिवेश था जिसमें केजरीवाल के नेतृत्व में "आप" को 67 सीटों पर जीत मिली और तीन सीटों पर भाजपा विजयी रही।  
            
                

1 टिप्पणी:

  1. जब गांधी जी का 'भारत छोड़ो' आंदोलन हिंसक हो गया , नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अंडमान पर कब्जा कर लिया तथा नेवी व एयर फोर्स में विद्रोह हो गया तब स्पष्ट हो गया था कि अब ब्रिटिश साम्राज्य को ज्यों का त्यों कायम नहीं रखा जा सकता है। अतः भारत -विभाजन का अमेरिकी प्रस्ताव अमल में लाया गया और पाकिस्तान सीधे-सीधे अमेरिकी प्रभाव में शुरू से ही चला गया जबकि भारत को प्रभावित करने की कोशिशें जारी रहीं और 1980 में RSS के समर्थन से इन्दिरा जी की सत्ता वापिसी से यह कार्य सुगम हो गया। 1991 में मनमोहन सिंह जी के वित्तमंत्री बनने के साथ-साथ भारत में अमेरिकी प्रभाव बढ़ता चला गया और आज केंद्र में RSS नियंत्रित अमेरिका समर्थक सरकार सत्तासीन है जिसका प्रमाण गणतन्त्र दिवस पर अमेरिकी राष्ट्रपति को आमंत्रित्त करके सार्वजनिक रूप से दे भी दिया गया था। अब इसका विकल्प भी अमेरिका समर्थक ही हो इसकी तैयारियां ज़ोर-शोर से चल रही हैं जिसके अंतर्गत केजरीवाल को रोपा और सींचा जा रहा है। केंद्र सरकार ने एक पूर्व 'रा' अधिकारी से केजरीवाल को 'नक्सलवादी' होने का प्रमाणपत्र दिला दिया है जिससे अभिभूत होकर विभिन्न कम्युनिस्ट गुटों ने केजरीवाल को सिर-माथे पर बैठा लिया है और और अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं। जागरूक कम्युनिस्ट नेता व कार्यकर्ता इस ओर इंगित कर रहे हैं। किन्तु जिम्मेदार कम्युनिस्ट पदाधिकारी गैर जिम्मेदाराना व्यवहार करके केजरीवाल की जीत का जश्न मना कर कम्यूनिज़्म को भारत में दफन करने की कोशिशों को बल प्रदान कर रहे हैं।http://communistvijai.blogspot.in/2015/02/blog-post_12.html

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