शनिवार, 9 जनवरी 2010

मध्यपूर्व और एडवर्ड सईद की संगीतदृष्टि -4-



सईद के अनुसार ऐसा व्यक्ति ज्यादा महत्वपूर्ण होता है जो किसी न किसी रूप में यथास्थितिवाद को चुनौती दे। जब मैंने अपने संस्मरण लिखने का फैसला किया तो अनेक लोगों ने सुझाव दिया कि तुम पहले दूसरों के संस्मरण पढ़ लो इससे लिखने में आसानी रहेगी। मैंने भी सोचा कि महारत हासिल करने के लिए यह अच्छा सुझाव है। स्मृति के सहारे मुझे अपनी कहानी लिखनी थी। यह काफी कुछ हजम कर जाने वाली थी। उसे लिखते समय आप और कुछ नहीं सोच सकते। 


संस्मरण लिखते समय आप अपने लिए जगह भी महसूस करते हैं। कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जिन्हें आप ज्यादा जगह देना चाहते हैं। रूपकीय नजरिए से यह एक तरह से अपने पाठक के दिमाग में छवि बनाने की कोशिश भी है। अंतत: तो वे कागज पर लिखे शब्द ही हैं। शब्द का कागज और कागज से इमेज में रूपान्तरण असल में शब्दों का 'कायिक' शक्ल अख्तियार करना है। यह सब कुछ स्थान पर निर्भर करता है। आप कैसे कहते हैं ,क्या कहते हैं,उसको किस चुस्त-दुरूस्त ढ़ंग से कहते हैं।


 पैराग्राफ की संरचना कैसी बनाते हैं आदि  चीजों को देखना चाहिए। इन सब चीजों को हासिल करना बेहद मुश्किल है यदि आप पूरी तरह अपने पर केन्द्रित होकर न रहें। किंतु मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि अन्य आवाजें भी हैं जो लगातार बमबारी करती रहती हैं। इसके बाद सवाल आता है कि आपकी ऑडिएंस कौन है, आप कहां तक उनका ख्याल रख सकते हैं। इसी अर्थ में आप उन्हें सम्बोधित करते हैं।
      


एडवर्ड सईद ने ''पेरेलल्स एंड पैराडॉक्स'' कृति में प्रामाणिकता के सवाल पर गंभीरता के साथ विचार किया है। कृति में प्रामाणिकता कैसे रूपान्तरित होती है। इस सवाल पर डेनियल और सईद के विचार उल्लेखनीय हैं।  डेनियल ने कहा लिखित पाठ से संगीत भिन्न है। 


संगीत तब ही अवस्थित होता है जब ध्वनि पैदा की जाए। जब बीथोवन की पांचवी सिंफनी लिखी गयी तो वह उसकी कल्पना में ,दिमाग में स्थित थी, कायिक नियमों का विषय थी। इसके बाद उसे स्वरलिपि की व्यवस्था के रूप में जाना । यह सादा कागज पर काले निशान की तरह है। सादा कागज पर लिखे काले शब्दों में लिखी स्वरलिपि को पांचवी सिंफनी नहीं कहा जा सकता और इसे लेकर मुझे कोई संतुष्ट भी नहीं कर सकता।


 पांचवी सिंफनी अस्तित्व में तब आयी जब उसका वाद्ययंत्रों के द्वारा निर्माण किया गया। उसे बजाया गया।कहने का अर्थ यह है कि संगीत की विलक्षणता  यह है कि वह जब बजता है , जब उसकी ध्वनि सुनाई देती है तो अलग-अलग लोगों के लिए उसका भिन्न-भिन्न अर्थ होता है। वह काव्यात्मक, गणितीय, संवेदनात्मक कुछ भी हो सकता है। यही उसका अन्त है।  संगीत सिर्फ ध्वनि के जरिए ही अपने को व्यक्त करता है।
       
इसी प्रसंग में सईद ने मंशा का सवाल उठाया और कहा कि कागज पर लिखी चीज में जो आंतरिक तत्व है अथवा जीवनहीनता है। किंतु इन दोनों बातों को व्याख्याकार के नजरिए से देखिए तो बात कुछ और ही नजर आएगी। जिसने प्रस्तुत किया उसको आप कोई भी नाम दें मौलिक कहें अथवा कुछ भी कहें। क्या कहा जाएगा इसके भी रिवाज हैं। अथवा तयशुदा रिवाजों पर हम सहमत हो सकते हैं। वह आपको बदले में कुछ न कुछ देता है। आप उसे अभी प्राप्त करें अथवा फिर कभी प्राप्त नहीं कर सकेंगे। वह जो कच्ची सामग्री कम्पोजर ने लिखी है उसे आप पुन: दोबारा हासिल नहीं कर सकते। 


अब मैं पाठ के बारे में कुछ कहना चाहता हूँ, पाठ के बारे में जब बात की जाती है तो स्थापित पाठ के बारे में बात की जाती है। हम सब उसी पर निर्भर होते हैं। किंतु संपादक का काम है कि वह पाण्डुलिपि को एकत्रित करे।नोटबुक को एकत्रित करे।अथवा वह उसे ऐसी  शक्ल प्रदान करे जिससे पाठ अथवा व्याख्याकार उसे पलटकर देख सके। यह काम सबसे मुश्किल है। मेरा इशारा बुनियादी काम की ओर है। 


मैं यह जानना चाहता हूँ कि मोजार्ट के विशेषज्ञ एलन टायसन ने जो विवरण प्रदान किए वे कैसे आए ? क्या उसके खास अंश सामयिक हैं,अथवा पुराने जमाने के हैं। प्रामाणिकता के संदर्भ में यही बुनियादी चीज है। यह सच है  जब आप पेश करेंगे अथवा संगीत बजाएंगे तो इन सबका कोई महत्व नहीं है किंतु यह जानना तो जरूरी है कि पाठ को स्थापित करने में किस तरह का संपादन किया गया। ऐसी अवस्था में आप पाठ के साथ क्या करते हैं


पाठ को आप संभवत: दो तरह से देखते हैं ? पहला तरीका यह है कि पाठ में सब कुछ है। मेरा सामान्य काम है उसे ईमानदारी से पेश कर देना। सईद ने कहा यह पूरी तरह मूर्खता है,नानसेंस है। क्योंकि पाठ को ईमानदारी से पेश कर देने वाली जैसी कोई चीज नहीं होती।
      
जब आप 18वीं शताब्दी का पाठ देखते हैं तो आप 18वीं शताब्दी के आदमी होते हैं। वैसा होना असंभव है। जब कोई लेखक अथवा कम्पोजर पाठ तैयार कर लेता है तो लिखने के बाद उससे अपनी दूरी बना लेता है। वह स्वयं ही एक वस्तु बन जाता है। यह काम वह लेखक के संरक्षण के बिना करता है। एक व्याख्याकार अथवा पाठक के नाते हम सब महसूस करते हैं , अथवा संगीत के प्रिफार्मर के नाते  प्रिफार्मेंस की प्रस्तुति अथवा रीडिंग में पाठ में आप अनंत किस्म की चीजें समायोजित नहीं कर सकते। 


यानी व्याख्याकार के मनमानेपन के खिलाफ प्रतिरोध व्यक्त होता है। यह प्रतिरोध अनेक किस्म के निर्देशों के जरिए आता है। मैं यहां यह कहना चाहता हूँ  पाठ कभी भी पूरी तरह व्याख्या के लिए खुला नहीं होता। हम जानते हैं कि इसके पीछे क्या नाटकीयता है।
     
हमें यह जानना चाहिए शब्द अथवा स्वरलिपि को किस प्रक्रिया में उपस्थित किया गया। व्याख्या अथवा प्रिफॉर्मेंस स्वयं बोरियत पैदा करने लगती हैं जब आप अन्य लोगों की बातों को दोहराने लगें। उन्हें नयी शक्ल और नयी संवेदना के साथ पेश करना चाहिए। व्याख्याकार और कम्पोजर काम पाठ को उसे पुराने संदर्भ में पेश करने का नहीं है बल्कि उसका काम है वर्तमान के संदर्भ में पेश करना । इसीलिए यह कहा जाता है  कुछ रिवाज होते हैं जो हमारी सीमाएं भी बनाते हैं जिसके कारण हम खास किस्म के नियमों के परे नहीं जा सकते। अंतत: ये नियम सामाजिक और बौध्दिक तौर पर निर्धारित होते हैं।  


इसके अलावा प्रिफार्मर ,व्याख्याकार और व्यक्तिगत तौर पर पाठक के बीच में अन्तर्क्रिया चलती रहती है। दूसरी ओर पाठ के बारे में समूचे इतिहास में निर्णय,आम सहमति, संचारण को लेकर प्रक्रिया चलती रहती है। इसी अर्थ में व्याख्या की प्रक्रिया गतिशील होती है। इसके लिए हमेशा विवेकवादी परीक्षण की जरूरत होती है। इसका निर्धारण सिर्फ अनुभूति के आधार पर ही हो सकता है। अनुभूति बहुत ही महत्वपूर्ण है ,जिस चीज से आप घृणा करें उसकी आप व्याख्या नहीं कर सकते। जिसके साथ आपका प्रेम हो और जिसका ख्याल रखते हों अथवा जिसे महत्वपूर्ण मानते हों उसकी ही व्याख्या कर सकते हैं। किंतु यह बहुत ही अनुशासित प्रक्रिया है जो हमें अंधा बना देती है। एक खास किस्म का रिवाज भी है जिसमें समझौता भी रहता है कि क्या आप सहमत हैं ?
  
डेनियल ने जब संगीत और साहित्य के पाठ के बीच तुलना करते हुए विस्तार से रोशनी डाली तो प्रतिक्रिया में सईद ने कहा तुम्हारी यह तुलना अद्भुत है। खासकर पाठ की व्याख्या के संदर्भ में। कीट्स की कविता का उदाहरण देकर सईद ने कहा कविता की भाषा आम दैनन्दिन बोलचाल की भाषा अथवा लॉण्ड्री की भाषा नहीं होती। अथवा यह बाजार की भाषा नहीं होती। ऐसे में हमें भाषा की शक्ल बनानी होती है। यह साधारण गद्य भी नहीं है। इसके कुछ नुकसान भी हैं। क्योंकि साहित्य में आदान-प्रदान चलता रहता है। दैनन्दिन प्रयोग की भाषा और साहित्यिक भाषा एक-दूसरे के साथ आदान-प्रदान करती है। जबकि संगीत में इस तरह का आदान-प्रदान नहीं होता। 


बीथोवन की सिंफनी की सामग्री को आप अन्यत्र कहीं पर भी नहीं पाएंगे। किंतु आप कीट्स की कविता की सामग्री को मौखिक रूप में प्राप्त कर सकते हैं। आम लोगों की बातचीत में प्राप्त कर सकते हैं। इस अर्थ में साहित्य तुलनात्मक तौर पर ज्यादा जनतांत्रिक होता है। क्योंकि उसका प्रत्येक इस्तेमाल कर सकता है। ये शब्द ही हैं जिनके साथ हम जिंदा रहते हैं। एक तरह से साहित्य में हम उनका अतिसामान्य इस्तेमाल करते हैं।
     
सईद ने कहा काव्यभाषा कायिक भाषा होती है। इस अर्थ में यह संगीत के कुछ आयामों के करीब भी आती है। शब्दों का व्यवहारिक मकसद होता है उनका वस्तुगत अर्थ होता है। मसलन् जब हम कहते हैं
'' यह गिलास है।'' तो हम किसी बाहरी वस्तु की ओर संकेत कर रहे होते हैं। किंतु यदि आप काव्यात्मक पाठ के बारे में संगीत के अर्थ में सोच रहे हैं तो आपको शब्दों के साथ स्वर के आंतरिक संबंध के बारे में सोचना होगा। इस संदर्भ में प्रत्येक चीज का तुलनात्मक उपयोग है। जबकि काव्यात्मक वस्तु में श्रृंखलाबध्द संबंध के रूप में चीजें आती हैं। ये कविता में आंतरिक तौर पर छिपी होती हैं। इन्हें आपको कविता पढने के पहले समझना होता है। वह भी तब जब आप ऐसा करना चाहें।


 कविता पढ़ने के लिए उस भाषा को जानना जरूरी है जिसमें कविता लिखी गयी है। किंतु संगीत सुनने के लिए उस भाषा को जानना जरूरी नहीं है जिसमें संगीत है। क्योंकि संगीत की शैली और संगीत की भाषा ध्वनिबोध पर आधारित है।


 जैसा कि आप जानते हैं बच्चे बगैर भाषा समझे संगीत समझते हैं। इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण चीज है उपलब्धता। तत्काल प्रभाव के लिहाज से संगीत बहुत शक्तिशाली होता है। यह बात अनेक दार्शनिकों ने भी रेखांकित की है। यह देखा गया है कुछ खास किस्म के अविवेकवाद को संगीत अपने अंदर संजोए रखता है जिसके कारण वह खतरनाक भी होता है। इसके बावजूद संगीत कला है और इसके लिए खास किस्म के अनुशासन की जरूरत है। इसी कारण इस तक पहुँचना भी मुश्किल होता है।
 (लेखक- जगदीश्वर चतुर्वेदी,सुधा सिंह)        

1 टिप्पणी:

  1. मैं ने पाया है कि आप हमेशा पाठ को प्रस्तुत करने में ईमानदारी बरतने में ज़रा कोताही नहीं बरतते!

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