रविवार, 17 जनवरी 2010

ज्योति बसु की मृत्यु - भारतीय साम्यवाद के स्वर्णयुग का अंत




    ज्योति बाबू ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में जो काम किए वैसे मुश्किल काम सिर्फ समाजवाद में संभव माने जाते थे। मसलन् पश्चिम बंगाल में व्यापक स्तर पर भूमिसुधार कार्यक्रम लागू किया गया। पश्चिम बंगाल के अलावा जम्मू-कश्मीर में शेख अब्दुल्ला और केरल में ईएमएस नम्बूदिरीपाद को भूमिसुधार राज्यस्तर पर लागू करने का श्रेय जाता है।
   ज्योति बाबू के व्यक्तित्व में बंगाली अभिजन और मार्क्सवादी संस्कारों का विलक्षण मिश्रण था। उनका व्यक्तित्व जन और अभिजन के साझा रसायन से बना था। इसके कारण उनकी जन-अभिजन दोनों के प्रति लोचदार और सामंजस्यवादी समझ थी। अपने इसी लचीले स्वभाव को उन्होंने राजनीति के नए संसदीय मार्क्सवाद में रुपान्तरित कर लिया था। उन्हें संसदीय मार्क्सवाद का दादागुरु माना जाता था। संभवत: सारी दुनिया में ज्योति बाबू अकेले कम्युनिस्ट थे जिनसे संकट की घड़ी में सभी रंगत के पूंजीवादी नेता सलाह लेते थे।
   ज्योति बाबू की इमेज के निर्माण में उनकी सादगीपूर्ण जीवनशैली की केन्द्रीय भूमिका थी। अमीर खानदान में पैदा होने और शानदार अभिजन सुलभ उच्च शिक्षा पाने के बावजूद उन्होंने अमीरों के भवनों में रहने और अमीरों की राजनीतिक सेवा करने की बजाय कम्युनिस्ट पार्टी का होल टाइमर होना पसंद किया। संपत्ति और पूंजी के सभी प्रपंचों से दूर रखा। दूसरों के दुख और खासकर गरीबों के दुखों को अपने जीवन संघर्ष का अभिन्न हिस्सा बना लिया। इस प्रक्रिया में ज्योति बाबू का व्यक्तित्वान्तरण हुआ साथ ही कम्युनिस्ट पार्टी का भी चरित्र बदला, खासकर पश्चिम बंगाल में पार्टी का चरित्र बदलने में सफलता मिली। उन्होंने किसान की मुक्ति को प्रधान राजनीतिक एजेण्डा बनाया। 
     ज्योति बाबू ने सन् 1977 में पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री पद की जब कमान संभाली तो पार्टी पूरी तरह पूंजी और उद्योग के प्रति नफरत से भरी थी। इस मनोदशा को बदलने में उन्हें कठिन विचारधारात्मक संघर्ष से गुजरना पड़ा और आज समूची माकपा तमाम राजनीतिक दबाबों के बावजूद उद्योग के एजेण्डे पर सक्रिय है।
  ज्योति बाबू ने भारत के कम्युनिस्टों को लोकतंत्र के दो प्रमुख मंत्र सिखाए किसान और उद्योग की सेवा करो। देशहित और जनहित को पार्टी हितों के ऊपर रखो। पार्टी अनुशासन को मानो और मार्क्सवाद और लोकतंत्र के विकास के लिए विकल्पों पर नजर रखो, कभी विकल्पहीनता में मत रहो, विकल्प जहां से भी मिलें उन्हें सामूहिक फैसले के जरिए लागू करो।          
   
               

7 टिप्‍पणियां:

  1. आप के शीर्षक का क्या यह अर्थ है कि साम्यवाद हमेशा हमेशा के लिए भारत से विदा हो गया?
    मेरी समझ में तो साम्यवाद का अभी आरंभ ही नहीं हुआ। केवल उस के लिए सफल असफल प्रयास मात्र हुए हैं। सोवियत संघ और अन्य समाजवादी देशों समेत।
    ज्योति बसु को हार्दिक श्रद्धांजली।

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  2. आपने सही लिखा है। वह भारतीय संसदीय मार्क्सवाद के दादा थे। और येचुरी टाइप उनके पोते हैं। जो ना संसदीय हैं ना गैर संसदीय। पता नहीं क्या हैं।
    मगर आपने गलत लिखा है कि उनके वक्त में भूमि सुधार हुआ। अगर ऐसा होता तो नक्सलबाड़ी क्यों होता।

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  3. आपने सही लिखा है। वह भारतीय संसदीय मार्क्सवाद के दादा थे। और येचुरी टाइप उनके पोते हैं। जो ना संसदीय हैं ना गैर संसदीय। पता नहीं क्या हैं।
    मगर आपने गलत लिखा है कि उनके वक्त में भूमि सुधार हुआ। अगर ऐसा होता तो नक्सलबाड़ी क्यों होता।

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  4. कामरेड़ ज्योति बसु को लाल सलाम

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  5. दुखद समाचार।

    श्री ज्योति बसु जी को श्रृद्धांजलि एवं उनकी आत्म की शांति के लिए प्रार्थना।

    उनके अवसान से एक युग की समाप्ति हुई।

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  6. बाप रे ! 'भारतीय साम्यवाद का स्वर्णयुग' ऐसा था तो इसका 'अंधकार युग' कैसा होगा? मुझे लगता है कि ज्योति दा के पहले पश्चिम बंगाल देश का अग्रणी राज्य था और उनके जाने के बाद देश के सबसे पिछड़े राज्यों में शामिल।

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  7. ये अनुनाद सिंह को नमस्कार है ।बेचारा जग.चतु ब्लागर होलटाईमरी कर रहे हैं । और आप हैं कि एक्के बार मे पुचाडा मार देते हैं। कच्ची उमर से वाम का पहाडा पढा ,अब वो लोग क्या करें ।आंखो पर यकीन करना ही पडता है,लेकिन दिल है के मानता नहीं ...
    या कि 'आखिरी वक्त में क्या खाक मुसलमां होंगे..

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