रविवार, 31 जनवरी 2010

कामुकता का बदलता चरित्र -1-







कामुकता आज चर्चा के केंद्र में है। इसके बारे में भारतीय समाज में तेजी से मंथन चल रहा है। कामुकता के सवालों पर खुली बहसें हो रही हैं। एक जमाना था जब कामुकता के बारे में बात करना निषिद्ध था। अपराध था। जो लोग बात करते थे उन्हें हेयदृष्टि से देखा जाता था। उनसे दूर रहने की सलाह दी जाती थी। सामंतकाल के पहले यह स्थिति नहीं थी।

प्राचीनकाल में आम लोगों की शिक्षा के सामान्य विमर्श में कामुकता और सेक्स संबंधी विषय भी शामिल थे। सामंतकाल के आने के बाद कामुकता के प्रति खुलापन गायब हो गया। अब अन्य अनेक विषयों की तरह कामुकता संबंधी विमर्श भी चंद लोगों की बपौती हो गया। सामंती दौर में निर्मित निषिध्द तत्वों में सेक्स और कामुकता संबंधी तत्वों को भी शामिल कर लिया गया। यह सिलसिला लंबे समय तक चलता रहा।

सामंती मानसिकता शर्म या पर्दा डालने पर जोर देती है। शर्म और पर्दे
की ओट में सबकुछ लागू कर सकते हैं। यहां तक कि कामुकता और सेक्स पर भी विमर्श कर सकते हैं। कामुकता और सेक्स के इन दिनों विमर्श के केंद्र में आने से सामंती विचारधारा को जबर्दस्त धक्का लगा है। यह आधुनिकता की जीत है। आज पर्दा, झिझक और शर्म को प्रतिगामिता और पिछड़ेपन का प्रतीक माना जाता है। लगातार ऐसे संस्कारों, मूल्य और रवैए पर जोर दिया जा रहा है जो 'बोल्ड और ब्यूटीफुल' की मानसिकता निर्मित करें।

शर्म, लज्जा और आवरण के बिना चीजों, वस्तुओं और घटनाओं को देखना, पारदर्शी रूप में देखना, बेझिझक बातें करना आधुनिकता की निशानी है। इसके विपरीत लज्जालु, शर्मीलापन, पर्दादारी, प्रच्छन्न ढंग से बातें करना, जी हुजूरी की भाषा में बोलना या किसी अन्य के माध्यम से बातें करना सामंती मानसिकता की निशानी है। इस तरह की मानसिकता के खिलाफ साधारण लोगों में प्रतिक्रिया तेज हुई है। आज कामुकता, सेक्स, एकल परिवार, स्त्राी के अधिकारों और अस्मिता के सवालों पर समाज पूरी तरह विभाजित है। आम तौर पर इन विषयों पर धार्मिक तत्ववादी और प्रतिगामी संगठन सामंती रवैया अपनाए हुए हैं।
सच्चाई यह है कि स्त्री, कामुकता और सेक्स समाज की वास्तविकता है। इनसे बचकर कोई भी नहीं रह सकता। इन तीनों के प्रति पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण आज भी वैचारिक स्तर पर वर्चस्व बनाए हुए है। राजनीति में इसका धार्मिक तत्ववादियों, फासीवादियों और प्रतिक्रियावादी राजनीति से संबंध है। स्त्री, कामुकता और सेक्स संबंधी विषयों पर जितनी ज्यादा बहस होगी उतना ही वे ताकतें कमजोर होंगी जो पितृसत्तात्मकता के
पक्ष में खड़ी हैं। खुली बहस से वर्जना और अछूतभाव से मुक्ति मिलेगी। स्त्री, कामुकता और सेक्स को दमित भावबोध से मुक्त करके वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने के लिए आवश्यक है इनके बारे में प्रश्नाकुलता पैदा की जाए और परिवार और समाज में खुलकर बातें की जाएं।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो पाएंगे कि आधुनिकता और पूंजीवादी दृष्टिकोण ने ऐसे संस्थानों और नियमों, कानूनों का निर्माण किया जिसमें सामंती दमनात्मक रवैए को समाहित कर लिया गया। सोवियत संघ में समाजवादी सत्ता की स्थापना और स्त्रीवादी आंदोलन के प्रभाववश स्त्री, कामुकता और सेक्स के प्रति लोकतांत्रिक भावबोध पैदा हुआ। इन तीनों तत्वों के प्रति पुराने विचारों और मान्यताओं और दमनात्मक रवैए से मुक्ति की दिशा में समाज तेजी से आगे बढ़ा।

पूंजीवादी और सामंती दृष्टिकोण कामुकता और सेक्स के प्रति बुनियादी तौर पर अनुदार और अराजक है। जो लोग कामुकता और सेक्स के बारे में प्रचलित और पुराने विचारों को नहीं मानते तो उन्हें दंडित करता है। पूंजीपति वर्ग सभ्यता के निर्माण पर जोर देता है। पूंजीपति वर्ग के लिए सभ्यता (सिविलाइजेशन) का मतलब है अनुशासनपूर्ण जीवन। अनुशासन का मतलब है इच्छाओं पर आंतरिक नियंत्रण।

इस विचार पर बल दिया गया कि अनुशासन के द्वारा ही बलिष्ठ और शक्तिशाली समाज, संस्थानों और संगठनों का निर्माण हो सकता है। बलिष्ठ शरीर के माध्यम से स्वत:स्फूर्त इच्छाओं को काबू में रखने में सफलता मिलती है। अनुशासित और शक्तिशाली शरीर 'पावर' को जन्म देता है। जिसके पास 'पावर' है वही समर्थ है। 'पावर' का दारोमदार अनुशासन पर टिका है। इसका यदि कामुकता और सेक्स के क्षेत्र में प्रयोग करेंगे तो समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध्द और बीसवीं शताब्दी में सेक्स के विभिन्न रूपों को लेकर विकसित औद्योगिक देशों और सोवियत संघ में चिकित्सा क्षेत्र में विशेष अनुसंधान कार्य हुए। इनके परिणामस्वरूप कामुकता को गुप्त रखने पर जोर दिया गया। इसे गुप्त रखने के उपायों पर अमल किया गया। इसके खिलाफ तरह-तरह के कानूनी प्रावधान बनाए गए। इस तरह के प्रयासों का लक्ष्य था व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक क्षमताओं को विकसित करना। किंतु दूसरी ओर स्त्री आंदोलन और मजदूर आंदोलन के विकास के कारण पितृसत्तात्मकता कमजोर हुई। कामुकता का विज्ञान के रूप में विकास हुआ। अब कामुकता का केस हिस्ट्री के तौर पर अध्ययन किया जाने लगा, वहीं दूसरी ओर चर्च में जाकर आत्मस्वीकृतियों के जरिए ज्यादा से ज्यादा आम लोग अपनी सेक्स संबंधी गलतियों के प्रायश्चित के लिए जाने लगे इस सबके कारण सेक्स को गुप्त रखने पर जोर दिया गया। इसे 'निजी जीवन का रहस्य' कहा गया। बाद में कामुकता को जानने के बजाय कामुकता के 'सत्य' की खोज पर ध्यान दिया गया। इसके कारण आधुनिकता के साथ 'सत्य' की खोज की मुहिम चल निकली। कालांतर में सामान्य कामुकता और असामान्य कामुकता के बीच फर्क किया गया।

4 टिप्‍पणियां:

  1. कहाँ सोच और चिंतन में बदलाव है? -आज भी लोग सेक्स को लेकर अनेक कुंठाओं से ग्रस्त हैं .अब यही देखिये आप के इस बोल्ड लेखन पर कोई टिप्पणी तक करने को हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है -कोस दुनिया में है आप! कहीं पश्चिम में तो नहीं ?

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  2. लीजिए मैं आ गया। एक प्रश्न है:
    जिस खजुराहो के मूर्तिशिल्प का फोटो यहाँ लगा है, वह भी सामंतकाल में ही बना था। क्या उस अभिव्यक्ति को उस दौर का अंतर्विरोध माना जाय?
    एक तरफ तो छुपा छिपी और दूसरी तरफ इतनी बोल्ड अभिव्यक्ति ?

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  3. राव जी,खजुराहो हमारी कला का बचपन है, बचपन हमेशा अपील करता है,बचपना नहीं।

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  4. प्रोफेसर सर,
    हमारी कला के बचपन, बचपने और उनके कामुकता से सम्बन्ध को जरा स्पष्ट करेंगे?
    मुख्य धारा से नई विकसित होती ब्लॉगरी पर कोई विभूति आती है तो सुखद आश्चर्य होता है और प्रश्न उमड़ते हैं।
    इस विषय पर लेख आए तो अच्छा हो।

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