बुधवार, 6 जनवरी 2010

ई लेखक " असली वारिस हैं भारतेन्दु के

                                        
         भारतेन्दु हरिश्चन्द्र                  
(जन्म 9सितम्बर 1850 - मृत्यु 6 जनवरी 1885)
       
 'ई लेखकोंऔर 'हिन्दी लेखकों ' में एक दूसरे के प्रति बेगाना भाव है। हमारे यहां कलम और कम्प्यूटर के बीच महा-अंतराल है। आज अधिकांश 'हिन्दी लेखक' 'ई लेखक' को जानते तक नहीं हैं। यह बेगानापन जितना जल्दी टूटेगा नेट की दुनिया और भी सुंदर लगेगी।
    ' ई लेखकों '  के साथ भारतेन्दु का एक बिन्दु पर मिलन होता है, दोनों में देश -दुनिया को जानने की ललक है। जबकि हिन्दी लेखकों में इसका अभाव है। आज का हिन्दी ब्लागर हिंदी का भावी संरक्षक है। उसमें हिन्दी के प्रति जो आग्रह है वह भारतेन्दु के भाषायी प्रेम का स्वाभाविक विकास है।
   भारतेन्दु जिंदादिल इंसान थे। हिन्दी रैनेसां के नहानायक थे। जिंदादिल इंसान की बेचैनी उनके नजरिए का मूलाधार है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र अंतिम समय में जब बीमार थे तब लोग उनसे हालचाल पूछने आ रहे थे 6 जनवरी 1850 को सुबह बोले , " हमारे जीवन के नाटक का प्रोग्राम नित्य नया नया छप रहा है -पहले दिन ज्वर की, दूसरे दिन दर्द की तीसरे दिन खांसी की सीन हो चुकी है,देखें लास्ट नाइट कब होती है।" अपने जीवन के अंतिम समय में भी इस तरह की जिंदादिली बनाए रखना बड़ी बात है। भारतेन्दु की माँ का नाम पार्वती देवी था और पिता का नाम गोपालचन्द्र था। 1857 के संग्राम में गोपालचन्द्र अंग्रेजों के साथ थे।
      हिन्दी में भारतेन्दु के बारे में सही नजरिए से बातें करने वाले कम हैं और उनके दृष्टिकोण का अनुसरण करने वाले और भी कम हैं। मसलन भारतेन्दु को देशाटन का शौक था, घूम घूमकर देश को जानने का शौक था, हिंदी के लेखक -शिक्षक देशाटन कम से कम करते हैं। देशाटन करके देश को जानना और फिर उसके अनुभवों से साहित्य को समृध्द करना ,देश की जनता के वैविध्य को सामने लाना। हिन्दी में यह फिनोमिना दुर्लभ होता जा रहा है।
     भारतेन्दु का दूसरा गुण था लेखकों के प्रति वफादारी और विश्वास। आज का लेखक देरिदियन बायनरी अपोजीशन में है। बेवफाई और अविश्वास में जीता है। अपनी भाषा की समृध्दि के लिए जिस निष्ठा,त्याग और कुर्बानी के भाव का भारतेन्दु ने परिचय दिया वैसी निष्ठा का रामविलास शर्मा के जाने के साथ अवसान हो चुका है। आजकल लेखकों-आलोचकों- प्रोफेसरों में लालच,धूर्तता और जोड़तोड़ का व्यापक पैमाने पर प्रसार देख सकते हैं।
      भारतेन्दु की तीसरी विशेषता थी पेशेवर लेखकीय भाव। पेशेवर का अर्थ धन कमाना नहीं है। पेशेवर का अर्थ है लेखन के प्रति निष्ठा,पूर्व तैयारी, लेखकों को संगठित करना़, ज्ञान की अपडेटिंग रखना, सत्य का आग्रह और ईमानदारी। रामविलास शर्मा ने लिखा है , " भारतेन्दु साहित्यिक होने साथ -साथ अच्छे संगठनकर्ता भी थे।  "
      भारतेन्दु की चौथी विशेषता है गरीबों और मुफलिसों के प्रति उदारभाव। रामविलास शर्मा ने लिखा है धनहीन होने पर उन्हें सबसे ज्यादा अफसोस इसी बात का था कि वह निर्धनों की सहायता न कर सकते थे। "
     भारतेन्दु की पांचवीं विशेषता थी सामाजिक सक्रियता। सार्वजनिक हित के कार्यों में हिस्सा लेना। भारतेन्दु के लेखन पर काशी की संस्कृति की गहरी छाप थी। रैनेसां में तर्क और विज्ञानसम्मत दृष्टिकोण का चलन आरंभ हुआ था,भारतेन्दु के अंदर इन दोनों के प्रति आग्रह था। भारतेन्दु तेज,बेधडक और तीखा लिखते थे। ठीक यही चीज 'ई लेखन' की धुरी है।
   भारतेन्दु ने ऐसे परिवार में जन्म लिया था जिसका अंग्रेजों के साथ गहरा संबंध था। इस संबंध को भारतेन्दु आलोचनात्मक नजरिए से देखते थे। उनका मानना था "इस धन ने मेरे पूर्वजों को खाया है, अब मैं इसे खाऊँगा।"
  
भारतेन्दु के बारे में आज हमें नए दृष्टिकोण से सोचना होगा। सामाजिक सुधार ,सामंजस्य और सामाजिक परिवर्तन को नए के आग्रह के साथ जोड़ना होगा। नए को लाए बिना पुराना जाएगा नहीं। चीजों,वस्तुओं और घटनाओं के बारे में आलोचनात्मक नजरिया अपनाना होगा।

भारतेन्दु की परंपरा के विकास के लिए अंधविश्वास,मध्ययुगीनता और रुढ़िवाद के साथ प्रत्येक स्तर पर संघर्ष चलाने की जरुरत है। स्वयं भारतेन्दु ने अपने लेखन के जरिए यही काम किया था।   
          












2 टिप्‍पणियां:

  1. ई लेखकों और हिंदी लेखकों की काई तब ही पाटी जा सकती है जब लेखक कंप्यूटर की जानकारी और प्रयोग अधिकाधिक करने लगें ॥

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