मंगलवार, 26 जनवरी 2010

टेलीविजन ज्योतिष और सामाजिक विभाजन-2-

ज्योतिषी फलादेश करते समय हमेशा देश,काल और पात्र का ख्याल रखता है।इसके आधार पर वह सामान्य फार्मूलों के जरिए समाधान देने की कोशिश करता है।ज्योतिषी के लिए भ्रम बनाए रखना जरूरी होता है।साथ ही व्यक्ति की स्वायत्तता का भी ख्याल करता है।


भ्रमों को बनाए रखकर यह आभास देता है कि फलां-फलां आकांक्षाएं हैं जो अभी पूरी होनी बाकी हैं।यदि इन्हें हासिल करना है तो किसी अन्य की मदद लेनी होगी।अन्य में अपने से बड़े की मदद हो सकती है ,ज्योतिषी के द्वारा किया गया अनुष्ठान या उपाय हो सकता है या स्वयं के द्वारा किया गया मंत्र,पूजा आदि हो सकती है।इस सबमें मूल में है अन्य।यह बड़ा होगा या अदृश्य होगा।


ज्योतिषी अन्य की सलाह देते समय प्रश्र्नकर्त्ता के अहं का ख्याल रखता है।वह ऐसा कोई समाधान नहीं देता जो अहं को ठेस पहुँचाए अथवा नीचा दिखाए।यही वजह है वह ज्यादातर व्यक्तिगत उपाय सुझाता है।


दूसरी बात यह ध्यान में रखता है कि समाज की हायरार्की को व्यक्ति माने।मसलन् किसी व्यक्ति ने पूछा कि मेरा अपने ऑफिस में काम सही ढ़ंग से नहीं चल रहा या मेरा प्रमोशन होगा या नहीं तो ज्योतिषी का सीधा उत्तर होता है कि अपने से बड़े अधिकारी से सामंजस्य बनाकर रखो।
   
    फलादेश की संरचना हमेशा जिज्ञासु की सामाजिक हैसियत और अवस्था को ध्यान रखकर तैयार की जाती है।इसमें सामाजिक और मानसिक तौर पर कमजोर और परनिर्भर व्यक्ति की इमेज होती है।किन्तु यह व्यक्ति कभी अपनी कमजोरी स्वीकार नहीं करता और न ज्योतिषी कभी इसे सीधे इस रूप में पेश भी नहीं करता।बल्कि संरचना इस तरह तैयार की जाती है जिसमें साफ तौर पर दिखाई देता है कि व्यक्ति सामाजिक ढ़ांचे में कमजोर है।फलादेश में उसकी सामाजिक कमजोरियों के चारित्रिक गुणों को समाहित कर लिया जाता है।फलादेश के ढ़ांचे में इन कमजोरियों को शामिल करने से व्यक्ति अपने को मजबूत महसूस करता है।यहां सब कुछ भाषा के खेल में व्यक्त होता है।मसलन् जब कोई व्यक्ति यह पूछता है कि मेरा मुकदमा चल रहा है।मैं जीतूँगा या हारूँगा।ज्योतिषी बड़े कौशल के साथ जबाव देता है कि समय थोड़ा खराब चल रहा है।कुण्डली में फलां-फलां ग्रह कमजोर है।इसके लिए फलां मंत्र जप करो, फलां रत्न पहनो,फलां देवता की किसी दिन विशेष को पूजा करो।इससे स्थिति में सुधार होगा।इस तरह के उत्तर आम हैं।


असल में ग्रह की कमजोर या खराब स्थिति के बहाने व्यक्ति की कमजोर और परनिर्भर अवस्था की ओर ही ध्यान खींचा जाता है।इससे उबरने का वास्तव तरीका सुझाने की बजाय ज्योतिषी 'छद्म भूमिका' के लिए मजबूर करता है।मंत्र,तंत्र,रत्न आदि 'छद्म भूमिकाएं' हैं।इस क्रम में व्यक्ति के अहं और बौध्दिक कमजोरी को छिपाने में मदद मिलती है। सामाजिक अहं को संतुष्टि मिलती है। ज्यादातर समय हम छद्म गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं।ज्योतिषी इस छद्म वातावरण का बड़े कौशल के साथ इस्तेमाल करता है।साथ ही छद्म गतिविधियों के लिए माहौल तैयार करता है।
     
फलादेश में जितनी कमजोरियां बतायी जाती हैं ।वे व्यक्ति की स्वभावगत कमजोरियां हैं। असल में ये बुध्दि या विवेक या व्यक्तित्व की कमियां हैं।इनको सुधारा जा सकता है।फलादेश में आमतौर पर मध्यवर्ग की मनोदशा को ध्यान में रखा जाता है।


मध्यवर्गीय चरित्र की विशेषता है कि यह सर्वसंग्रही होता है।किन्तु फलादेश में उसके सर्वसंग्रही भाव के अनेक मुख्य तत्वों की अनदेखी की जाती है।जैसे परपीडक आनंद,कृपणता आदि को छिपाया जाता है। पण्डित नियमों के पालन पर जोर देता है।ये नियम ही हैं जिनके माध्यम से वह सवालों के जबाव देता है।यह 'अंधभक्ति' है,आज्ञापालन है।इसी के जरिए ज्योतिषी अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है।अथवा अदृश्य शक्ति के ऊपर अपना नियंत्रण दर्शाता है। वह बताता है कि यह करो और यह न करो।यह एक तरह से बाध्यकारी व्यवस्था को आरोपित करना हुआ।


ज्योतिषियों के द्वारा ग्रहों के बहाने दी गई सलाह जातक के अंदर अविवेकवादी अधिनायकवादी परनिर्भरता और समर्पण के भावबोध की सृष्टि करती है।इस भावबोध को निर्मित करने में जातक की बाध्यतामूलक संभावनाओं को उभारा जाता है।ज्योतिषी इस प्रसंग में अनेक ऐसी सलाह और उपचार बताता है जिनका जातक के जीवन के यथार्थ और भविष्य से कोई संबंध नहीं होता।


मसलन् किसी आदमी का अपनी नौकरी में मन नहीं लगता अथवा मालिक परेशान करता है या किसी लड़की की शादी में बिलंव हो रहा है या किसी का कारोबार मंदा चल रहा है आदि सवालों के जबाव और समाधान इस तरह दिए जाते हैं जिससे जातक विपरीत परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बनाने की कोशिश कर और आत्महीनता से मुक्त हो जाए।ऐसा करते समय ज्योतिषी जातक को और भी ज्यादा आज्ञाकारी बनाता है।


आज्ञाकारी बनाने का तरीका यह है ,ज्योतिषी कहता है तुम्हारा शादी में सूर्य के कारण बिलंव हो रहा है अत: सूर्य की पूजा करो और मंत्र जाप करो।जातक मजबूर होता है और आज्ञापालन करता है।यह एक तरह से अविवेकवादी ढ़ंग से आज्ञाकारी बनाने का तरीका है।


जातक से कहा जाता है वह उपाय करे और कष्ट मुक्त हो वरना दु:ख भोगे।जब इस तरह के परनिर्भरता को उभारने वाले उपाय बताए जाते हैं तो यथार्थवादी तत्वों का पूरा तरह लोप नहीं होता।बल्कि ज्योतिषी यही समझाने की कोशिश करता है कि जातक आत्मनिर्भर है।


 ज्योतिषी हमेशा जातक की परनिर्भर अवस्था का इस्तेमाल करता है।प्रस्तुति में ज्योतिष इस तरह के मुहावरों और भाषायी रूपों का इस्तेमाल करता है जिससे ज्योतिष में निहित अविवेक छिप जाता है।वह ज्योतिष के बारे में सोचना बंद कर देता है।वह जातक की यथार्थ जिन्दगी और ज्योतिष के बीच इस तरह संबंध बनाता है जिससे बाध्यतामूलक भावबोध छिप जाता है।
       
 ज्योतिषी की कोशिश यह होती है कि लोगों में परंपरागत,यथास्थितिवादी और अड़ियल रवैयया बना रहे।इससे यथार्थ के नकारात्मक पक्ष को नियंत्रण में रखने और यह समझाने में मदद मिलती है कि जो भी कुछ होगा वह व्यक्ति के नियंत्रण में है न कि वस्तुगत परिस्थितियों के नियंत्रण में है।इस क्रम में व्यक्ति से वायदा किया जाता है कि यदि वह फलां-फलां उपाय करे और फलां-फलां चीजों से परहेज करे तो उसकी समस्या का समाधान हो जाएगा।व्यक्ति को इस तरह उन परिस्थितियों के ज्ञान से दूर रखने की कोशिश की जाती है जिनके कारण वह ज्योतिषी की शरण में जाता है।ज्योतिषी जानता है कि जीवन की वास्तव परिस्थितियां इस कदर कठिन और चुनौतीपूर्ण हैं कि उनकी पूरी तरह उपेक्षा संभव नहीं है।यही वजह है कि ज्योतिषी अंतर्विरोधपूर्ण स्थितियों और संभावनाओं की ओर ध्यान देता है।

1 टिप्पणी:

  1. सही लिखा आपने वस्तुतः आज कल के टी वी के तथाकथित ज्योतिषाचार्य अपनी दूकान चलने के लिए केवल भयजन्य मानसिकता फैला कर उस की आड़ में अपनी कमियों को छिपाने का हुनर खूब जानते है भला १ मिनट में आप किसी का भविष्य कैसे बता सकते है हाँ उसे भयभीत अवश्य कर सकते है
    यही सब कुछ धार्मिक चैनलों में बाबा लोग भी बताते रहते है ताकि ऐसा लगे की दर्शको से बड़ा कोई पापी और अधम नहीं है

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