रविवार, 31 जनवरी 2010

कामुकता का बदलता चरित्र -2-






19वीं शताब्दी में सेक्स विमर्श के दौरान तीन तरह के दृष्टिकोण सामने आए। पहला, विमर्श स्त्रr की कामुकता को 'हिस्टीरिया' के चिकित्साशास्त्र से जोड़ता है।
दूसरा, बच्चों के संदर्भ में कामुकता की व्याख्या प्रस्तुत करता है। इन लोगों ने बताया गया कि बच्चे सेक्स की दृष्टि से सक्रिय होते हैं अत: बच्चों को सेक्स से दूर रखना चाहिए।
तीसरा, विमर्श पिता के संदर्भ में कामुकता पर विचार करता है और कामुकता को परिवार और शादी से जोड़कर देखता है। शादी में सेक्स को आवश्यक और स्व-नियामक मान लिया गया।

आरंभ में परिवार नियोजन की पध्दतियों को गैर-जरूरी माना गया। आरंभ के वर्षों में यह तर्क दिया गया कि जो परिवार नियोजन करना चाहता है तो उसे अपनी कामेच्छा पर नियंत्राण लगाना चाहिए इससे परिवार स्वत: छोटा हो जाएगा। यही वह दौर है जब तेजी से संयुक्त परिवार के टूटने की प्रक्रिया शुरू हुई। दूसरी ओर मूलत: सभी धर्मों की ओर से संयुक्त या बड़े परिवार की वकालत शुरू हुई।

फूको के अनुसार कामुकता की धारणा का उदय विभिन्न किस्म के आधुनिक सामाजिक संस्थानों के उदय के साथ हुआ। आधुनिक समाज और आधुनिक राष्ट्र को सक्षम बनाने में अन्य बातों के अलावा जनसंख्या नियंत्रण के उपायों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। मूलत: इस बात पर जोर दिया गया कि शारीरिक स्वास्थ्य कैसा हो। सामाजिक विकास की सारी तकनीकी इसी उद्देश्य से निर्मित की गई। इसके माध्यम से व्यक्ति की शारीरिक क्षमता के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल पर जोर दिया गया। इसके कारण 'कामुकता के सांस्थानिक' रूपों का जन्म हुआ। इसे शरीर और आनंद का अर्थशास्त्रा भी कह सकते हैं। प्राचीनकाल में वात्स्यायन का कामसूत्र मूलत: 'निजी' या 'सेल्फ' की देखभाल, कामेच्छा, इच्छापूर्ति आदि पर जोर देता है। कालांतर में दार्शनिकों ने इसका निषेध किया और नैतिकता और सौंदर्यशास्त्र का अंग बना दिया। यह भी बताया गया कि जीवन के लिए सेक्स से ज्यादा जरूरी है भोजन और भजन। अध्यात्मवादियों की यह सबसे बड़ी जीत थी। इसके चलते 'आत्म' की उपेक्षा हुई। 'सत्य' की खोज पर जोर दिया गया। अब 'आत्म' (सेल्फ) से बड़ा 'सत्य' हो गया।

कामुकता (सेक्सुएलिटी) पदबंध का सबसे पहले 19वीं शताब्दी में प्रयोग मिलता है। बायोलॉजी और ज्यूलॉजी में यह पदबंध 1800 ई. में मिलता है। किंतु आज जिस अर्थ में इस पदबंध का प्रयोग होता है उसकी शुरुआत 19वीं के अंत में हुई। यह पता चला कि स्त्रियों को ऐसी अनेक बीमारियां होती हैं जो मर्दों को नहीं होतीं। इनका संबंध स्त्री की सेक्सुएलिटी से है। इसके बाद सारे प्रयास इस दिशा पर केंद्रित हो गए कि स्त्री की कामुकता को कैसे नियंत्रित किया जाए। यह भी बताया गया कि जो स्त्राी कामुक आनंद के बारे में महसूस करती है वह अस्वाभाविक है।

भारतीय परंपरा में कामुकता सामाजिक निर्मिति है। यह पावर का खेल है। इसे मात्र शारीरिक उत्तेजनाओं के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। शारीरिक उत्तेजना से आनंद मिल सकता है और नहीं भी मिल सकता। कामुकता को सक्रिय बनाने वाली एकमात्र शक्ति है पावर।

कामुकता का शास्त्र दरबारी संस्कृति के तहत रचा गया। इसके बाद ही इसके विविध रूपों को समाज जान पाया। श्रृंगार रस केंद्रित रचनाएं कामुकता पर ही रोशनी डालती हैं। इसके कारण स्त्री की भूमिका और स्त्री की स्थिति के प्रति उदासीनता और उसे मातहत बनाने की प्रवृत्ति का विकास हुआ। स्त्री की भूमिका को कम करके देखा गया। इसके दो महत्वपूर्ण दुष्परिणाम हुए, पहला, स्त्री सामाजिक विमर्श से गायब हो गई और दूसरा, कामुकता विमर्श सत्ता का विमर्श बन गया। साथ ही, स्त्री और कामुकता दोनों को रहस्यमय और गुप्त बना दिया गया।
 सामंती दौर में कामुकता और स्त्री पर्याय बनाए गए। आधुनिक काल की शुरुआत के साथ सामंतवाद की जिस गति से विदाई हुई उसी गति से कामुकता और स्त्री के प्रश्न सामने आते गए। उन्नीसवीं शताब्दी में चिकित्सा के क्षेत्र में नए-नए आविष्कार हुए। इनके बारे में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के द्वारा जो सामग्री प्रकाशित हुई उसने स्त्री, सेक्स और कामुकता के पुराने मिथों को तोड़ा। किंतु इस क्षेत्र की जानकारियां चंद हाथों तक सीमित थीं। अधिकांश जनता अशिक्षित थी। कामुकता और सेक्स से संबंधित साहित्य साधारण जनता की पहुंच के बाहर था। यहां तक कि शिक्षित जनता के पास तक इस साहित्य की पहुंच नहीं थी। इस क्षेत्र की तमाम जानकारियां सिर्फ पेशेवर लोगों के पास तक ही बमुश्किल पहुंच पाई थीं। स्त्रिायों तक ऐसे साहित्य की पहुंच शून्य के बराबर थी।
यही वजह थी कि अधिकांश औरतें आज भी कामुकता, स्त्री और सेक्स के बारे में अज्ञानी की तरह पेश आती हैं। अधिकांश औरतों को शादी के समय सेक्स का ज्ञान नहीं होता। शादी के बाद स्त्री को पुरुष की इच्छाओं की अनिच्छित भाव से पूर्ति करनी होती है। यही वजह है कि आम तौर पर माताएं कहती हैं कि 'बेटी शादी के बाद तुम्हें अनेक ऐसी बातें माननी पड़ सकती हैं जिन्हें तुम पसंद न करो। तुम उनकी उपेक्षा करना क्योंकि मैंने भी ऐसा ही किया था।'
आधुनिक समाज के आने के बाद पति-पत्नी के बीच में भावात्मक एकता और संतान के प्रति जिम्मेदारी पर जोर दिया गया। संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार का जन्म हुआ। पुराने घर की सामुदायिक भावना को ध्वस्त करते हुए घर की नई धारणा और परिवेश ने जन्म लिया।

 'घर' के परिवेश और कार्य क्षेत्र के परिवेश को अलग करके देखा जाने लगा। घरेलू और सामाजिक, निजी और सामाजिक में फर्क पैदा हुआ। अब निजी जिंदगी और निजता पर जोर दिया जाने लगा। व्यक्ति की निजी जिंदगी, एकल परिवार, प्राइवेसी आदि की धारणा के विकास के कारण स्त्री की अस्मिता, भावों, इच्छाओं और आकांक्षाओं को तरजीह दी गई। इसके अलावा परिवार नियोजन के आधुनिक उपायों ने कामुकता और सेक्स को स्वायत्त बनाया। परिवार नियोजन के आधुनिक उपायों के इस्तेमाल से स्त्री को गर्भधारण करने और बच्चे पैदा करने के जंजाल से मुक्ति मिली।

ध्यान रहे, छोटे परिवार के निर्माण में आधुनिक गर्भ-निरोधक उपायों की महत्वपूर्ण भूमिका है। परिवार नियोजन के बारे में लंबे समय से प्रचार अभियान चलता रहा है किंतु कायदे से प्रथम विश्वयुध्द के बाद से ही परिवार नियोजन के प्रयासों को बल मिला है। पश्चिमी जगत में ईसाइयत ने बड़े पैमाने पर परिवार नियोजन का विरोध किया इसके बावजूद परिवार नियोजन को सफलता मिली।
भारत में यदि परिवार नियोजन के उपायों को स्वेच्छा से जनप्रिय बना दिया गया होता और धार्मिक और फासीवादी संगठनों ने इसके खिलाफ जहरीला प्रचार न किया होता तो हमारे समाज की तस्वीर कभी की बदल चुकी होती। आज सच्चाई यह है कि हिंदू, मुस्लिम और ईसाई धर्म के हितों और विचारों के प्रचारक संगठन अपने-अपने तरीके से परिवार नियोजन, गर्भपात, एकल परिवार आदि का जमकर विरोध कर रहे हैं। यही वजह है कि इन तबकों के वोट हासिल करने के लिए प्रमुख राजनीतिक दल इन सवालों पर खुलकर प्रचार अभियान नहीं चलाते।

प्रभावी ढंग से परिवार नियोजन के उपायों को लागू करने का मतलब है कामुकता और सेक्स को स्वायत्ता बनाना। आज वैज्ञानिक खोजों के कारण स्त्री को सेक्स और कामुकता के बहाने मिलने वाली यातनाओं और मृत्यु से मुक्ति मिली है। स्त्री के निजी जीवन में बुनियादी बदलाव पैदा किया है। आज स्त्री के लिए कामुकता (कुछ हद तक मर्द के लिए भी) वैविध्यपूर्ण आनंद का रूप ग्रहण कर चुकी है।



1 टिप्पणी:

  1. बहुत अच्छा आलेख -सेक्स का समाज- जैवकीय पहलू यह है की यह जोड़े के बंधन में फेविकोल का काम करता है -बिना गहन काम सम्बन्ध के गैर रक्त संबंधी नर नारी गहन आत्मीय रूप से नहीं जुड़ सकते .उनमें परस्पर विश्वास, एक दूसरे के प्रति समर्पण भाव इसी सम्बन्ध के सातत्य पर बहुत निर्भर है -यह आजमूदा नुस्खा है ! बिना इसके अगर कोई आत्मीयता का दावा करता है तो वह पाखंडी है -झूठ बोल रहा है !

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