शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

हिन्दीभाषी पूंजीपति का हिन्दीभाषा से अलगाव क्यों ?





     हमारे मित्र विमलेश त्रिपाठी युवा कवि हैं और मेरे छात्र भी रहे हैं। वे आए दिन मेरी खबर सुध ले लेते हैं। उनसे चैट के जरिए आज जो बात हुई उसमें अचानक कई विचारणीय समस्याएं अचानक सामने आ खड़ी हुईं। मैं यहां वह बातचीत रख रहा हूँ आप लोग भी इन समस्याओं पर सोचें।- विमलेश ने रोमन हिन्दी में कहा है और मैंने देवनागरी में। 
- good morning sir
- कहिए
कैसे हैं

 kaise hain sir?
main thik hun....thora busy tha idhar kuchh kaamon men....

 एकदम ठीक,
क्या कर रहे हो इन दिनों ,
खूब लिख रहे हो यह अच्छी बात है

nahin sir khub kahan likh raha hun....
aapne ko bachana hai to likhna padega...bas utna hi likh raha hun

 कुछ सामयिक विषयों पर आसपास के हिन्दी-अहिन्दीभाषियों की समस्याओं और जिंदगी पर भी लिखो
पश्चिम बंगाल के बारे में लोग कम जानते हैं
jee 
कम से कम सप्ताह में एक पन्ना जरूर लिखो
jee aapka sujhav dhyan me rakhunga 
मुझे बेहद तकलीफ होती है, यहां के हिन्दीभाषियों को देखकर
jee, ye to hai... ajib log hain....

 मैंने अभिव्यक्तिविहीन हिन्दीभाषी ,वह भी शिक्षित यहीं पर देखे हैं । तुम लोगों की जिम्मेदारी है जो अभिव्यक्त करना नहीं जानते हैं,उनको वाणी दो ।
   jee, sahi kah rahe hain aap
देखो मैंने मीडिया और आलोचना में वह क्षेत्र चुना जिसे हिन्दी वाले नहीं जानते थे,कोलकाता को गंभीर किताबों के लिए नहीं जानते थे। मैंने यहीं रहकर काम किया और हिन्दी वालों की सेवा की। यह हमारी-तुम्हारी जिम्मेदारी है।
jee, aapne to aapne field me bahut kaam kiya hai, aur achha kaam kiya hai 

 एकबार तुम अपना समय गद्य को दो, यहां के यथार्थ पर लिखो, समस्याओं पर लिखो,बेहद जरूरी है। यहां के हिन्दी लेखकों ने पश्चिम बंगाल पर बहुत ही कम लिखा है। 
jee

  यहां के हिन्दी वाले बुद्धिजीवी 1857,भारतेन्दु,नवजागरण,छायावाद पर निरर्थक लिखते रहे हैं। बंगाल पर न लिखना कायरता है। स्थानीय यथार्थ से बेरूखी के कारण हिन्दी के लोगों को यहां और बाहर गंभीरता से नहीं लिया जाता।
ye bhi sahi hai.... aaj ki samsyaon per bhi likhna chhayvad aur anya cheejon se jyada jaroori hai

अर्थहीन प्रायोजनों और लेखन ने बंगाल के हिन्दी वालों को हाशिए पर पहुँचा दिया है।डेढ़ करोड़ के रीब हिन्दीभाषी हैं यहां लेकिन .... पहचान नहीं है । वे पढ़े लिखे हैं, लेकिन उनमें बुद्धिजीवी के गुण नहीं हैं।
hmm, aapas me khincha-tani hai, kamane-khane wali pravriti jyada hai...

सेठ हैं हिन्दीभाषी ,लेकिन सभ्यता के विकास की बजाय पूंजीभोगी का काम कर कर रहे हैं। खाना कमाना सबके लिए जरूरी है लेकिन बुद्धिजीवियों ,शिक्षितों का जो काम है वह भी तो करना चाहिए।

विमलेश त्रिपाठी- अवश्य। 
जगदीश्वर- हिन्दी भाषी बुद्धिजीवियों ने पश्चिम बंगाल पर कभी गंभीरता से काम क्यों नहीं किया, जबकि हिन्दी का उदय यहीं पर हुआ था
विमलेश- सही

जगदीश्वर- मजेदार बात यह है कि वे यहां के मजदूरों में 75 प्रतिशत से ज्यादा हैं लेकिन एक भी मजदूरनेता हिन्दीभाषी नहीं हुआ जिसे दुनिया जानती हो।
कोलकाता में 50 फीसदी हिन्दीभाषी हैं लेकिन उनकी कोई राजनीतिक पहचान नहीं है। वे मात्र इसके या उसके दुमछल्ले होकर रह गए हैं।इसके कारण छोटे किस्म के दलालों ने समूचा माहौल कब्जे में ले लिया है।
sachmuch ye to bahut badi chinta ka vishay hai....

यहां के व्यापार जगत में हिन्दीभाषियों का वर्चस्व है लेकिन उनका कोई राजनीतिक महत्व नहीं है।हिन्दीभाषी पूंजीपति ने कभी हिन्दी से अपने को नहीं जोडा।
aapne kaafi chintan kiya hai is vishay per....
हिन्दीभाषी पूंजीपति का हिन्दीभाषा के साथ जिस तरह अलगाव है वैसे अंग्रेज पूंजीपति का अंग्रेजी से नहीं है।

यहूदी जाति के पूंजीपति अपनी भाषा और संस्कृति के बुद्धिजीवियों का सम्मान करते हैं और बढ़ावा देते हैं लेकिन हिन्दीभाषी पूंजीपति नहीं देता।बंगाली बुर्जुआ ने बांघ्ला के बुद्धिजीवियों को मान-सम्मान दिया है।
ye bhi ek sach hai...

 हिन्दी भाषी पूंजीपति का अपनी भाषा से अलगाव और हिन्दी भाषी बुद्धिजीवी का उसका क्रीतदास बने रहना चिन्ता की चीज है।
hmm ,sachmuch ye chinta ka vishay hai, lekin samadhan kya hai....hum kis trah aage badhen?

पहला कदम है-सामयिक यथार्थ की निर्मम समीक्षा और गहरी समझ पैदा की जाए,उसका ज्यादा से ज्यादा प्रचार किया जाए।
jee

दूसरा कदम है राजनीति से साहित्य तक उन तमाम चीजों के खिलाफ लिखा जाए जो हिन्दी की पहचान नहीं बनने देते। जैसे चाटुकारिता की बजाय सम्मान से बोलना और क्रिटिकली लिखना।
jee
तीसरा कदम-हिन्दी भाषी पूंजीपतिवर्ग ,उच्चमध्यवर्ग-मध्यवर्ग का हिन्दी से अलगाव कम करने के लिए चौतरफा प्रयास किया जाए। स्वार्थहीन मित्रता पर जोर दिया जाए। दबाब बनाने के लिए संगठन भी बनाए जाएं जो आधुनिक क्लब संस्कृति ,मंच जैसे हों।

3 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे बेहद तकलीफ होती है, यहां के हिन्दीभाषियों को देखकर
    Yeh tho ham par zulum hai Sir



    मैंने आपके शिष्य के मन की बात लिखी है सर :)

    उत्तर देंहटाएं
  2. बातों बातों मै इतनी सुन्दर जानकारी हम इस बात पर अमल करने की पूरी कोशिश करेंगे की हम हिंदी भाषा की जानकारी को आगे बढ़ाने मै आपके साथ चल सकें !

    शुक्रिया दोस्त ! सुन्दर वार्ता !

    उत्तर देंहटाएं
  3. sir aapne poori baat yahan rakh di... achha laga.. yeh baat cheet samsyaon ke prati aapki bechaini ko darshai hai aur pathkon ko bechain karti hai... aapka abhar....

    उत्तर देंहटाएं

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...