शनिवार, 3 अप्रैल 2010

मुक्तिकामी भाषा होती है ब्लॉग की

       आज ब्लॉग नए चरण में दाखिल हो गया है। ब्लॉग पर पाठकों के समूह बन रहे हैं,लेखकों के समूह बन रहे हैं। ये समूह साझा मुद्दों पर साझाभाव से बहस कर रहे हैं। किस तरह की साझा बहस चल रही है इसे आसानी से खोजा जा सकता है। साझा मंचों के जरिए आने वाली सूचनाओं को कैसे व्यवस्थित किया जाए ,उसके टूल की खोज करना आज सबसे बड़ी समस्या है।
     ब्लॉग में ऐसी सामग्री भी आ रही है जिसका सामाजिक दृष्टि से दीर्घकालिक महत्व है। यह भी खोज की जानी चाहिए कि जो सामाजिक समूह बन रहे हैं उनमें व्यवसायिक दृष्टि से कितने समूह बन रहे हैं और गैर-व्यवसायिक समूह कितने हैं। हिन्दी में खासकर संचार कंपनियों को इस ओर ध्यान देना होगा कि वे यह वर्गीकृत करें कि आखिरकार हिन्दी में किस विषय पर क्या लिखा जा रहा है और कौन से ब्लॉग पर किस तरह की सामग्री आ रही है। अभी चिट्ठाजगत अथवा ब्लॉगवाणी में जो वर्गीकरण आ रहा है जिसे यूजर टैग के रुप में देख सकते हैं, यह वर्गीकरण ज्यादा उपयोगी नहीं है।
      ब्लॉग की क्षमता के व्यापारिक प्रमोशन के लिए हो रहे दुरुपयोग की ओर भी कानून निर्माताओं का ध्यान गया है। अनेक रिसर्च संगठन हैं जो अप्रत्यक्ष ढ़ंग से किसी न किसी वस्तु के व्यापार के प्रमोशन के लिए ब्लॉग का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस पर अमेरिकी प्रशासन ने ध्यान देना शुरु किया है और ब्लॉग कानून में बदलाव भी किए हैं। इस दिशा में फेडरल ट्रेड कमीशन ने तात्कालिक कदम उठाए हैं, इसके तहत ब्लॉगिंग से संबंधित कानून में 30 साल बाद 2009 में परिवर्तन किया गया है। जिसके तहत कानून का उल्लंघन करने पर 11 हजार डॉलर तक जुर्माना हो सकता है। अभी तक फेडरल ट्रेड कमीशन के दिशा-निर्देशों को ब्लॉगरों पर लागू नहीं किया जाता था। लेकिन संशोधनों के बाद ब्लॉगर भी इसके दायरे में आ गया है। वस्तुओं की खरीद-फरोख्त में धीरे-धीरे ब्लॉगर राय बनाने का काम करने लगे हैं। ब्लॉगर चाहे तो किसी भी प्रोडक्ट के बारे में राय बना सकता है और उस वस्तु के प्रचारक का प्रच्छन्न ढ़ंग से काम कर सकता है। हिन्दी के कई ब्लॉग लेखक और वेबसाइट पर भी यह धंधा चल निकला है।
       नए अमेरिकी कानून के अनुसार ब्लॉगर को प्रचारित वस्तु के साथ अपने संबंध का खुलासा करना होगा। नई नीति और कानून ट्विटर ,फेसबुक और नेट विज्ञापनों पर भी लागू होंगे। क्योंकि इनका व्यापारिक प्रचार के लिए ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है।
       ब्लॉग की तकनीक सेल्फ यानी आत्म तकनीक है। यूजर का आत्म विभिन्न रुपों में वेब सामग्री के उत्पादन में अभिव्यक्त होता है। यहां हम कुछ क्षण के लिए ब्लॉग के निजी अनुभवों पर विचार करें। खासकर हिन्दी में ब्लॉग का व्यक्तिगत अभिव्यक्ति मंच के रुप में विकास हो रहा है। दूसरा क्षेत्र है अकादमिक ,जिसके तहत साहित्य, तकनीकी ज्ञान आदि पर लिखा जा रहा है। निजी भावों ,विचारों,कष्ट,बीमारी आदि का ब्लॉग में आना एकदम नए किस्म के मनुष्य का सार्वजनिक जीवन में आना है। इस प्रक्रिया में इंटरनेट ने अभिव्यक्ति का सशक्तिकरण किया है।
     ब्लॉग मूलतः आत्म स्वीकारोक्ति की नेट विधा है। आत्म स्वीकारोक्ति में सत्य का महत्व होता है। सत्यकथन का विज्ञान और धर्म से गहरा संबंध है। मिशेल फूको के शब्दों में आत्म की तकनीकी अपने उत्पादन के साधनों के जरिए व्यक्ति पर निजी असर ड़ालती है अथवा खास किस्म के कार्यों के जरिए निज के शरीर, आत्मा,विचार आदि को प्रभावित करती है। ऐसा करते हुए हम आनंद,खुशी, पवित्रता, प्रजनन, विज़डम,परफेक्शन आदि को प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।
     इसी प्रसंग में इंटरनेट अस्मिता के सवाल भी उठे हैं। इंटरनेट अस्मिता में  सर्जनात्मकता पर जोर है। यह प्रतिवादी सर्जनात्मकता है। ब्लॉगरों के द्वारा विभिन्न तरीकों से प्रतिवाद की भाषा में निरंतर लिखा जा रहा है। प्रतिवादी नेटभाषा ज्यादा लचीली, सामंजस्यपूर्ण ,धारदार और संप्रेषणीय है। इसका अपना निजी भाषिक मुहावरा और तेवर है।
    ब्लॉग की मुक्तिकामी भाषा होती है इसमें लिखते ही खुशी मिलती है,भूमिका को अंजाम देने का सुख मिलता है,साथ ही ऑनलाइन उत्पादन क्षमता की अनुभूति पैदा होती है। ब्लॉग ऐसी तकनीक है जो आत्म को रुपान्तरित करती है। आप ज्योंही नेट पर लिखना खत्म करते हैं गैर-समस्यामूलक वास्तव और वर्चुअल के विभाजन के दायरे में आ जाते हैं। ब्लॉग लेखन हमेशा राहत देता है। यह ऐसा लेखन है जो छोटे-बड़े,महान और सामान्य लेखन के ऊँच-नीच के भेद को नहीं मानता। नेट के आने के बाद खासकर ब्लॉग के आने के बाद ऑनलाइन और ऑफलाइन लेखन का संबंध पूरी तरह रुपान्तरित हो जाता है।
    ब्लॉग वस्तुतः उपलब्ध तकनीक का व्यक्तिगत होमपेज तक विस्तार है। इसका 1990 के दशक में विस्तार इसलिए हुआ क्योंकि इसे टेमप्लेटस और वेब प्रकाशन के उपकरण मिल गए। वह निजी अभिव्यक्ति का निर्णायक क्षण था। यह मानवीय अभिव्यक्ति और मीडिया के लोकतांत्रिकीकरण की दिशा में लगाई लंबी छलांग है।यह एक तरह से सार्वजनिक डायरी है। यह ऐसी डायरी है जिसमें सार्वजनिक और निजी के उत्पादक अन्तर्विरोध को सहज ही देखा जा सकता है।
         डायरी को निजी गुप्त अभिव्यक्ति के लिए लिखा जाता था। लेकिन ब्लॉग में आंतरिक आत्मीय अनुभवों और विचारों की अभिव्यक्ति पर जोर है। यह कार्य भिन्न संचार प्रक्रिया के संदर्भ में सम्पन्न होता है। रिसर्च से पता चला है कि अधिकतर ब्लॉगर स्वयं के लिए लिखते हैं। इसका अर्थ यह भी है कि वे सुचिंतित ढ़ंग से अपने लिए बृहत्तर पाठकवर्ग बनाना नहीं चाहते। ब्लॉग के जरिए विचार और अनुभवों के इतने व्यापक फलक पर रखने के सवाल को सिर्फ ब्लागर की इच्छा, सरोकार तक सीमित नहीं किया जा सकता।
      ब्लॉग में जो लिखते हैं वह तत्काल प्रकाशित हो जाता है, इसके कारण उसे आसानी से पत्रिका और डायरी से अलगाया जा सकता है। यह सच है ब्लॉगर अपने लिए लिखता है लेकिन पोस्ट के छपते ही तुरंत ही देख सकते हैं कि कौन पढ़ रहा है और क्या प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है। ब्लॉगर नहीं जानता कि उसका पाठक कौन है लेकिन पाठक का प्रेम और लगाव उसे लिखने के लिए प्रेरित करता है। पाठक का ऐसा लगाव पहले कभी महसूस नहीं हुआ।
       ब्लॉग में जिस तरह के अनुभव, विचार,भावनाएं देखने को मिलती हैं वैसी नेट की अन्य विधाओं जैसे डिश्कशन फोरम,ईमेल आदि में नजर नहीं आतीं। ब्लॉग का चरित्र तात्कालिक और विकासशील है। फलतः इसमें विचारों के परिवर्तन की ज्यादा संभावनाएं होती हैं।
       ब्लॉग ने निजी और सार्वजनिक के सवाल को एकदम नयी दिशा दी है। खासकर इंटरनेट संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में निजी और सार्वजनिक को नयी फरिभाषा दी है। इंटरनेट संस्कृति में व्यक्तिगत अस्मिता नए सामाजिक उत्पादक वातावरण में स्थित है। इसका एक रुप रियलिटी टीवी में भी देख सकते हैं जहां पर प्राइवेट जिंदगी को हम सार्वजनिक वातावरण में देखते हैं। यह एक तरह से निजी,आंतरिक, प्राइवेसी के सार्वजनिक होने और नार्मल होने की प्रक्रिया है।
        नेट अभिव्यक्ति के अधिकांश रुप सार्वजनिक हैं। यह सच है कि आप नेट पर किसी को पढ़ने के लिए निमंत्रण देने नहीं जाते लेकिन पढ़ने वाले बिना बुलाए आते हैं, बगैर पूछे राय देते हैं। बिना बुलाए पाठक का यहां स्वागत है। ब्लॉग निजी अभिव्यक्ति का वैध मुक्त स्थान है।



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