रविवार, 25 अप्रैल 2010

प्रोफेसर मोहम्मद हसन नहीं रहे

          उर्दू के महान आलोचक मोहम्मद हसन अब हमारे बीच नहीं रहे। मुझे व्यक्तिगत तौर पर उनसे जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में एम.ए.करते समय सन् 1979 -80 में उर्दू पढ़ने का मौका मिला था। दो सेमिस्टर उन्होंने पढ़ाया था। सरल स्वभाव और सादगी पसंद हसन साहब जेएनयू में नामवर सिंह से भी बेहतर शिक्षक थे। 
   हसन साहब ने अपनी आलोचना के द्वारा उर्दू साहित्य में प्रगतिशील आलोचना के नए मानकों का निर्माण किया। खासकर उर्दू में आधुनिकतावाद और अमेरिकीपंथी साहित्यिक रुझानों के खिलाफ  सारी जिंदगी संघर्ष किया। उन्होंने जेएनयू में दो दशक से ज्यादा समय अध्यापन कार्य किया।
    उर्दू  में हसन साहब ने समीक्षा की एक दर्जन से ज्यादा महत्वपूर्ण किताबें लिखी हैं। हसन साहब पहले प्रगतिशील लेखक संघ में थे बाद में जब जनवादी लेखक संघ बना तो उसके राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने। उर्दू साहित्य ,मीडिया और सर्जना के क्षेत्र में सैंकड़ों प्रतिभाशाली लेखकों, साहित्यकारों और शिक्षकों को उन्होंने तैयार किया। 
   जेएनयू के भारतीय भाषा केन्द्र के निर्माण में भी प्रो.हसन की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उनकी मौत से उर्दू हिन्दी की सांस्कृतिक एकता का प्रबल हिमायती हमारे बीच से चला गया है।   

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