सोमवार, 12 अप्रैल 2010

पी. सी. जोशी के अनुभवों की रोमांचक यात्रा- 1- सरला माहेश्वरी(भू.पू.सांसद,राज्यसभा)


(ब्ला.इ. लेनिन के साथ सलाह करते जोजेफ स्टालिन))
                        ( प्रसिद्ध इतिहासकार ई.एच.कार)

         पूरन चंद्र जोशी की पुस्तक ‘यादों से रची यात्रा एक विकल्प की तलाश‘ किसी तपती गर्मी, उमस और बेचैनी के समय में ठंडी फुहार की तरह सचमुच एकबारगी मन को हरा कर गयी। विचारों और चिंताओं से भरी इस किताब को दो दिन में पूरी पढ़ गयी। बहुत दिनों बाद मुक्तिबोध की कविता की पंक्तियां फिर कानों में गूंज उठी–
जड़ीभूत ढ़ांचों से जरूर लड़ेगें हम
चाहे प्रतिनिधि तुम
चाहे प्रतिनिधि हम
     यह एक ईमानदार समाजशास्त्री और एक न्यायपूर्ण समाज को धरती पर देखने को आतुर संवेदनशील बुद्धिजीवी का अपने अतीत, वर्तमान और आनेवाले कल से वाद–विवाद और संवाद है। जनता के संघर्षों और उसकी जिजीविषा में अटूट आस्था रखने वाला व्यक्ति जिस तरह हमेशा एक नयी सुबह का सपना संजोए रखता है और यह विश्वास करता है–‘ऐसा जमाना हमेशा नहीं रहेगा। एक समय आयेगा, जब हम फिर अपनी जमीन से जुड़ेगें, और फिर से हमारे जीवन में वसंत आयेगा (इसी पुस्तक से) , जोशी जी न सिर्फ‍ अपने समय से ही साक्षात्कार करते हैं बल्कि उससे दो–दो हाथ करते हुए चरैवेति–चरैवेति के संकल्प के साथ , ‘वैंक्विश्ड टुडे बट नाट फारएवर, टुमारो वी शैल राइज विद ग्रेटर विजडम एडं डिसिप्लिन‘ (लेखक की पुस्तक से उद्धृत) के विश्वास के साथ यह कहते हैं कि आम आदमी के लिये कोई पैराडाइस लॉस्ट , स्वर्ग का लोप नहीं है और नहीं उसके लिये कोई ‘दॅ एण्ड ऑफ सिविलाइजेशन‘, सभ्यता का अंत है।

जोशी जी की यह पुस्तक हमेशा बेहतर की तलाश की मनुष्य की सतत चेष्टा और इस चेष्टा के तहत उसकी निर्मितियों, उनकी कमियों, कमजोरियों और उनसे उबरकर एक नये विकल्प की खोज की यात्रा है।

         उनकी यह यात्रा वैकल्पिक सभ्यता की जन्मभूमि रूस से शुरू होती है। जोशी जी लिखते हैं–‘‘ रूसी क्रांति की सबसे महत भूमिका यही थी कि उसने व्यापक जनसाधारण को इतिहास के हाशिए से इतिहास की मुख्य प्रेरक शक्ति, मुख्यकर्ता के रूप में इतिहास के केंद्र में प्रतिष्ठित किया। रूसी क्रांति मुख्य रूप से हमेशा इसीलिये याद की जायेगी, अमर रहेगी कि उसने श्रमिक जनता में आत्मसम्मान जगाया और अदम्य आत्मविश्वास पैदा किया और उसकी सर्जनात्मक ऊर्जा, उसमें निहित रचनात्मक अंत:शक्ति को नये समाज, नए अर्थतंत्र, नई राजव्यवस्था, नई संस्कृति के निर्माण का माध्यम बनाया।’’ जोशी जी रूसी क्रांति की इस महान भूमिका के बारे में गांधी, रवींद्रनाथ और जवाहरलाल नेहरू की स्वीकारोक्तियों का स्मरण करते हैं और यह सवाल उठाते हैं कि आज अभिजात वर्गों द्वारा उस महान स्मृति को मिटाने का जो अभियान चलाया जा रहा है, उसके पीछे वाशिंगटन समझौते के तहत चलायी जा रही नवउदारवादी संस्कृति की तो भूमिका है ही, इसके साथ ही क्या स्वयं रूस के अंदर की सोवियत व्यवस्था के विघटन के बाद की घटनाएं इसका प्रमाण नहीं है कि श्रमिक और जनसाधारण आज फिर से अपनी मानवीय स्थिति और नियति के मूक निष्क्रिय दर्शक बना दिये गये हैं और आज रूस में भी ‘एक देश दो राष्ट्र‘ वाला अमीर गरीब का विभाजन और अलगाव पैदा हो गया है।
      अपने लेख ‘स्तालिन के आखिरी मुलाकाती‘ में जोशीजी भारत के भूतपूर्व विदेश सचिव तथा बाद में मास्को में भारत सरकार के राजदूत श्री के.पी.एस. मेनन और भारतीय पुलिस के एक बड़े अधिकारी तथा रूस के इतिहास में विशेष दिलचस्पी रखने वाले श्री निगमेंद्र सेन के अध्ययन तथा जवाहरलाल नेहरू की यात्रा के हवाले से सोवियत संध के पूरे घटनाचक, स्तालिन की भूमिका को समझने की कोशिश करते हैं। 
     वे सोवियत संघ, यानी विश्व का पहला समाजवादी देश जिसके सामने अभूतपूर्व चुनौतियां थी, जहां बाहर और भीतर समाजवाद के दुश्मन इस नवनिर्मित देश को मिटाने पर तुले हुए थे, उस समय मार्क्स की धारणा के विपरीत एक अंत्यंत पिछड़े हुए राष्ट्र में संपन्न हुई समाजवादी क्रांति को बचाने और देश को विकसित करने का गुरु दायित्व किस तरह संभाला गया, इस पर गंभीरता से विचार करते हैं। वे फ्रांसीसी इतिहासकार मार्क ब्लाक की इस बात को याद करते हैं कि ‘‘जहां तक महान ऐतिहासिक विभूतियों का सवाल है उनके बारे में तुरंत फैसला देना आसान है। लेकिन उन्हें समझना और उनके साथ न्याय करना अत्यंत कठिन।‘‘

जोशी जी का कहना है कि स्तालिन के व्यक्तित्व का मूल्यांकन भी एक इतिहासकार के लिये गंभीर चुनौती भरा काम है। वे स्तालिन के बारे में लेनिन की एक टिप्पणी का हवाला भी देते हैं जिसमें लेनिन यह कहते हैं कि जनरल सेक्रटरी बनने के बाद स्तालिन ने अपने हाथ में अपार शक्ति केंद्रित कर ली है और मुझे इस बात का विश्वास नहीं होता कि वे इस शक्ति का प्रयोग एहतियात के साथ करना जानते हैं। इसके साथ ही वे स्तालिन को सनकी और स्वेच्छाचारी भी बताते हैं।
    जोशी जी एक समाज वैज्ञानिक के नाते जहां पूरी निष्ठा के साथ उस पूरे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समझने की कोशिश करते हैं जिसने स्तालिन की इन सब कमजोरियों के बावजूद उन्हें देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचा दिया, वहीं वे गंभीरता के साथ यह भी संधान करते हैं कि क्या स्तालिनवाद के बीज रूस की विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज नहीं थे?
    जोशी जी इतिहासकार ई.एच. कार की पुस्तक, ‘द बोल्शेविक रिवोल्यूशन‘ तथा पत्रकार मौरिस हिंडस की चर्चित पुस्तक ‘मदर रशा‘ के हवाले से बताते हैं कि रूस के इतिहास में दो तरह की प्रवृतियां रही है, एक यूरोप के साथ जुड़ने और खुलेपन की प्रवृति थी जिसका प्रतिनिधित्व पीटर द ग्रेट ने किया था और लेनिन भी इसी परंपरा को जीवित रखने के लिये प्रयत्नशील थे और दूसरी परंपरा रूस के गैर यूरोपीय चरित्र को प्राथमिकता देने की और उसे यूरोप के मुकाबले एक महाशक्ति के रूप में सुदृढ़ करने की प्रवृति थी।
    ई.एच. कार के अनुसार रूस के बुद्धिजीवी भी दो खेमों में बंटे हुए थे। स्तालिन इसी दूसरी धारा का प्रतिनिधित्व करते थे। जोशी जी का कहना है कि स्तालिन लेनिन की तरह मार्क्सवाद के मूल प्रेरणास्रोत, विवेकवाद और प्रबुद्धवाद के कठिन रास्ते से मार्क्सवाद तक नहीं पहुंचे थे। वे एक छलांग में धार्मिक ‘प्रीस्ट‘ से मार्क्सवादी ‘प्रीस्ट‘ में तब्दील हो गये थे और उन्होंने मार्क्सवाद को भी एक धार्मिक पंथ या संप्रदाय के रूप में ढ़ाल दिया। इसके चलते रूस अपने इतिहास की विवेकवाद और प्रबुद्धवाद की परंपरा से कट गया और रूस की आयरन कर्टेन से घेराबंदी कर स्तालिन का रूस पीटर द ग्रेट के रूस की मानसिक खिड़कियां और दरवाजे खोलने की परंपरा से भी कट गया।
       आश्चर्य होता है कि जब श्री मेनन स्तालिन को रूसी इतिहास में ‘इवान द टेरिबल‘ के समकक्ष रखते हैं तो जोशी जी ही उनकी बात का खंडन करते हुए यह कहते हैं कि रूस के आधुनिकीकरण में स्तालिन की महत भूमिका को देखते हुए उनका स्थान रूसी आधुनिकीकरण के प्रथम महानायक ‘पीटर द ग्रेट’ के समकक्ष क्यों नहीं !
     मार्क्सवाद हमें बताता है कि ‘‘मानव–जन अपना इतिहास स्वयं बनाते हैं, पर अपने मनचाहे ढ़ग से नहीं। वे उसे अपनी मनचाही परिस्थितियों में नहीं, अपितु ऐसी परिस्थितियों में बनाते हैं, जो उन्हें अतीत से प्राप्त और अतीत द्वारा सम्प्रेषित होती है और जिनका उन्हें सीधे–सीधे सामना करना पड़ता है।‘‘ स्तालिन के गुण–दोष को भी हमें उस काल–विशेष के संदर्भ में ही देखना पड़ेगा। लेकिन फिर भी प्रश्न तो स्वाभाविक रूप में मनुष्य के विवेक के सामने खड़े होते ही हैं। रवीन्द्रनाथ ने कहा था–लेकिन सभ्यता का एक बुद्धिरूप भी होता है जो अन्न रूप से बड़ा है। जो सभ्यता जनता के मनरूपी खेत का कर्षण करके उसमें फल उत्पन्न कर पाती है वही महान होती है। इस कर्षण का अभाव जरूर कहीं तो रहा होगा।


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