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गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक प.बंगाल से सीखें


       दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ ने दो दिन पहले एक दिन की हड़ताल की। बतर्ज दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (DUTA ) यह हड़ताल सेमिस्टर प्रणाली और उच्च संचार तकनीक वाली बायोमेट्रीक अंगूठा छाप अनिवार्य हाजिरी प्रणाली लागू किए जाने के खिलाफ थी। DUTA ने अपनी इन मांगों के बारे में लंबी जंग का एलान भी किया है।
      DUTA ने जो मसला उठाया है वह गंभीर है। विश्वविद्यालय प्रशासन के अपने क्या तर्क हैं अभी तक साफ नहीं है। लेकिन इन दोनों नियमों को अंशतः प्रशासन लागू कर चुका। कर्मचारियों में बायोमेट्रिक अंगूठा छाप हाजिरी प्रणाली लागू हो चुकी है। कर्मचारियों ने इसका विरोध नहीं किया। इसी तरह एमए में सेमिस्टर प्रणाली लागू हो चुकी है। एमफिल् में भी अधिकांश विभाग सेमिस्टर प्रणाली लागू कर चुके हैं। कहीं पर भी विभागों ने प्रतिवाद नही किया। अब अचानक शिक्षक और कर्मचारी संगठन संघर्ष के मैदान में कूद पड़े हैं।  दबाव की राजनीति के द्वारा सारे मसले  को गैर अकादमिक रास्ते से पंक्चर करने की कोशिश की जा रही है।
    इस प्रसंग में पश्चिम बंगाल का अनुभव DUTA की मदद कर सकता है। पहली बात यह कि शिक्षक सुनिश्चित समय पर आएं और जाएं , इसे पांच साल पहले प.बंगाल ने लागू किया गया। उसी अनुभव की सफलता के बाद यूजीसी अब सारे देश में इसे लागू करने के लिए कह चुकी है। राज्य के सभी वि.वि. और कालेज शिक्षकों को प्रतिदिन पांच घंटे रहना होता है। जो शिक्षक तय समय पर नहीं आता -जाता उसे कारण बताना होता है ,अवकाश लेना होता है।

    इस नियम को लागू कराने में देश के विश्वविद्यालय-कालेज शिक्षकों के एकमात्र संगठन  आइफुकटो , वाममोर्चा,कांग्रेस,भाजपा आदि सभी दलों के साथ सभी विचारधारा के शिक्षक संगठनों की सक्रिय भूमिका रही है। शिक्षकों पर समय की पाबंदी लगाने का सुपरिणाम निकला है। इस नियम को लागू करने के पहले 60 प्रतिशत से ज्यादा शिक्षक कक्षाओं से गायब रहते थे। हराम की खाते थे। माकपा और आइफुकटो ने खासतौर पर इसे लागू करने में केन्द्रीय भूमिका अदा की और आज 95 प्रतिशत से ज्यादा शिक्षक नियमित आते हैं। यह नियम सख्ती से इसलिए लागू हो पाए क्योंकि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी चाहती थी।

   आज प. बंगाल में सभी विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर कक्षाओं में सेमिस्टर प्रणाली लागू हो चुकी है। स्नातक कक्षाओं यानी बीए बगैरह में सेमिस्टर प्रणाली लागू करने की प्रक्रिया चल रही है और इसमें सभी सहयोग कर रहे हैं। कहीं से भी प्रतिवाद की खबर नहीं है।
  उल्लेखनीय है 11वीं पंचवर्षीय योजना को राष्ट्रीय स्तर लागू करते समय शिक्षा में सेमीस्टर प्रणाली को 2011 तक राष्ट्रीय स्तर पर लागू करना अनिवार्य है। जो इसे लागू नहीं करेंगे उनकी यूजीसी ग्राण्ट बंद हो जाएगी। 11वीं पंचवर्षीय .योजना के इस फैसले का सभी राजनीतिक दलों ने समर्थन किया है। राष्ट्रीय विकास परिषद में सभी मुख्य राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त है। ऐसी अवस्था में DUTA का प्रतिवाद गले नहीं उतरता, क्योंकि जिन राजनीतिक दलों के शिक्षक नेता ( इनमें कम्युनिस्ट ,कांग्रेस,भाजपा और नक्सल आदि सभी शामिल हैं ) विरोध कर रहे हैं उनके बिरादराना संगठनों ने पश्चिम बंगाल में सेमिस्टर प्रणाली लागू की है। शिक्षकों में एक ही दल के सदस्यों में इस तरह का दुरंगापन विरल घटना है।
     मजेदार बात यह है कि संसाधनों की कमी प.बंगाल में भी है लेकिन वहां पर इसे समस्या ही नहीं माना गया ,जबकि तुलनात्मक तौर पर प.बंगाल की तुलना में दिल्ली वि.वि. की स्थिति हजार गुना बेहतर है।

प.बंगाल में न्यूनतम सुविधाओं के अभाव में सेमिस्टर प्रणाली और प्रतिदिन पांच घंटे की अनिवार्य उपस्थिति को DUTA के वैचारिक बिरादराना दोस्त संगठनों ने लागू किया है। एक शिक्षक और नागरिक के नाते हम अपने दायित्व को पूरा नहीं करते तो भारत के शिक्षा तंत्र को हम अधिनायकवादी ,व्यापारी और अपराधी तत्वों के हाथों सौंप देंगे।




शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

यूपी के शि‍क्षक महायोद्धा रामपाल सिंह नहीं रहे

                     

       रामपाल जी यूपी के शि‍क्षा आंदोलन के सैलीबरेटी थे।  यूपी की माध्‍यमि‍क शि‍क्षा को बनाने में उनकी बड़ी भूमि‍का थी। वे चालीस सालों तक नजीबावाद(बि‍जनौर) के दो कॉलेजों में प्रि‍सिंपि‍ल रहे। संभवत: चंद शिक्षकों को ही इतने लंबे समय तक प्रधानाचार्य पद और शि‍क्षक आंदोलन पर काम एक साथ करने का सौभाग्‍य प्राप्‍त हुआ है। वे सबके प्‍यारे 'प्रिंसि‍पल साहब' थे। कल अचानक मनमोहन ने उनके बारे में खबर दी रामपाल सिंह जी नहीं रहे तो दि‍ल को वि‍श्‍वास नहीं हुआ। जिंदादि‍ली और शि‍क्षा अधि‍कार की भावनाओं से ओतप्रोत रामपालजी की मौत की खबर सदमे की तरह थी। दो दि‍न तक सोचता रहा आखि‍रकार ऐसा क्‍या हुआ है कि‍ उनकी मौत हुई और कि‍सी भी राष्‍ट्रीय मीडि‍या ने नोटि‍स तक नहीं लि‍या। नजीबावाद में उनकी मौत 2 अक्‍टूबर 2009 को हुई। हजारों लोगों ने उनकी अंति‍म यात्रा में शिरकत की,इसके बावजूद राष्‍ट्रीय मीडि‍या ने कवरेज नहीं दि‍या।
  रामपाल सिंह नि‍ष्‍ठावान शि‍क्षक,प्राचार्य,शि‍क्षक आंदोलन के योद्धा,वामपंथी और आर्यसमाजी वि‍चारों के पोषक थे। उनके परि‍वार में दो बेटे हैं। एक बेटा नजीबावाद में वकील है, दूसरा बेटा देहरादून के डीएवी कॉलेज में प्रोफेसर है। रामपालजी की पत्‍नी श्रीमती लीलावती अभी जिंदा हैं। रामपालजी अपने सार्वजनि‍क जीवन में जो कुछ कर पाए उसमें उनकी पत्‍नी की महत्‍वपूर्ण भूमि‍का थी। रामपालजी ने आरबीएस इंटर कॉलेज,नांगल और आदर्श ग्रामीण इंटर कॉलेज ,चंदक में 40 सालों तक प्रधानाचार्य पद पर काम कि‍या था। सन् 1954 से 1994 तक वे प्रधानाचार्य रहे। उन्‍होंने शि‍क्षक के रूप में मात्र एक साल नौकरी की थी। उनके पि‍ता उम्‍मेद सिंह  चाहते थे कि‍ उनका बेटा नजीबावाद आकर अपने इलाके में शि‍क्षा का प्रसार करे। इसके लि‍ए रामपालजी ने शि‍क्षक की नौकरी छोडकर आरबीएस कॉलेज के प्रधानाचार्य की नौकरी ग्रहण की, इस कॉलेज को बनाने में उनकी केन्‍द्रीय भूमि‍का थी। वे वि‍गत चालीस सालों से उत्‍तरप्रदेश माध्‍यमि‍क शि‍क्षक सं घ के नेता थे। शि‍क्षक आंदोलन में अनेकबार जेल भी गए। अनेक बार उसके राज्‍य पदाधि‍कारी भी रहे। शि‍क्षकों के अधि‍कारों की रक्षा में रामपालजी अग्रणी कतारों में रहे। उन्‍होंने कैंसर की अवस्‍था में एक अक्‍टूबर 2009 तक आरबीएस कॉलेज के प्रबंधक का काम कि‍या,शि‍क्षकों के सैलरी बि‍ल पर साइन कि‍ए और प्रबंधन के बाकी काम सम्‍पन्‍न कि‍ए। उनकी सक्रि‍यता साधारण लोगों ,खासकर, शिक्षकों को प्रभावि‍त करती थी। वे नजीबावाद के पांच-छह कॉलेजों की प्रबंध समि‍ति‍ के सदस्‍य भी थे। नजीबावाद की राजनीति‍ में उनकी जबर्दस्‍त साख थी। सारी जिंदगी ईमानदारी और सादगी की कमाई पर जीने वाले रामपालजी के नि‍धन से यूपी का शि‍क्षा जगत मर्माहत है। मृत्‍यु के समय उनकी उम्र  78 साल की थी। पि‍छले कुछ समय से वे कैंसर से जूझ रहे थे और अपनी सक्रि‍यता बनाए हुए थे।     
    नजीबावाद के शि‍क्षा जगत का आज जो व्‍यापक परि‍दृश्‍य नजर आता है उसकी परि‍कल्‍पना रामपालजी के योगदान की अनदेखी करके नहीं की जा सकती है। उत्‍तरप्रदेश की सामंती जमीन में लोकतंत्र और शि‍क्षा का हराभरा वृक्ष लगाने में रामपाल जी की केन्‍द्रीय भूमि‍का थी। वे उत्‍तर प्रदेश के शि‍क्षक आंदोलन के प्रधानकर्त्‍ताओं में से एक थे। खासकर बि‍जनौर जि‍ले में उनकी व्‍यापक जनता और खासकर शि‍क्षा जगत में जबर्दस्‍त साख थी, इतनी व्‍यापक जनप्रि‍यता रामपाल जी ने वंश परंपरा से प्राप्‍त नहीं की थी, बल्‍कि‍ अपने कर्मशील जीवन से अर्जि‍त की थी। मुझे व्‍यक्‍ति‍गत तौर पर उनसे अप्रैल 1982 में उनसे साक्षात मि‍लने का मौका मि‍ला था। उस समय उनका बड़ा बेटा दि‍नेश प्रताप सिंह मेरे साथ जेएनयू में पढ़ता था। इन दि‍नों देहरादून के डीएवी कॉलेत में प्रोफेसर है। दि‍नेश की शादी जेएनयू की ही आराधना से तय हुई थी। दोनों का प्रेम था। लेकि‍न पिता की मांग थी कि‍ दि‍नेश -आराधना आर्यसमाजी पद्धति‍ से नजीबावाद (बि‍जनौर) आकर शादी करें। दोनों ने उनकी बात रखी। मुझे पहलीबार रामपाल जी को देखने और उनसे बातें करने का वहीं पर मौका मि‍ला था। रामपाल जी वि‍चारों की दुनि‍या में आर्यसमाजी और वामपंथी वि‍चारों के कायल थे। नजीबावाद की लोकतांत्रि‍क राजनीति‍ में वि‍गत चालीस साल से उनका दखल था। सभी दलों के लोग उन्‍हें सम्‍मान देते थे। सभी शि‍क्षकों के लि‍ए वे 'प्रिंसि‍प‍ल साहब' थे। हम सबने एक बेहतरीन शि‍क्षक और शि‍क्षकों के अधि‍कारों का संरक्षक खो दि‍या है। मेरे लि‍ए तो यह व्‍यक्‍ति‍गत क्षति‍ भी है।





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