बुधवार, 2 नवंबर 2011

माओवाद,आधुनिकतावाद और हिंसाचार





आधुनिकतावाद के दो प्रमुख बाईप्रोडक्ट है सामाजिकहिंसा और माओवाद। आधुनिकतावाद की खूबी है कि उसने हिंसा को सहज ,स्वाभाविक और अपरिहार्य बनाया है फलतः हिंसा के प्रति घृणा की बजाय उपेक्षा का भाव पैदा हुआ है। हिंसा के हम अभ्यस्त होते चले गए हैं। घरेलू हिसा से लेकर वर्गीय हिंसा तक के व्यापक फलक को देखें तो पाएंगे कि आधुनिकतावाद की आंधी में विकास कम और हिंसा का विस्तार ज्यादा हुआ है। इसमें मीडिया हिंसाचार से लेकर माओवादी हिंसाचार तक का बड़ा दायरा आता है।

आधुनिकतावाद महज कला की समस्या नहीं है बल्कि यह सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक हिंसा से भी जुड़ा फिनोमिना है। यह संयोग की बात है कि भारत में जिस समय आधुनिकतावाद संकटग्रस्त था ठीक उसी समय नक्सलबाड़ी आंदोलन पैदा हुआ।भारत में जिन दिनों दंगे,किसानों की कर्जों के कारण आत्महत्या,औरतों की दहेज-हत्या ,घरेलू हिंसा आदि की सबसे ज्यादा खबरें आई हैं ठीक उसी दौर में माओवादी संगठनों की हिंसाचार की खबरें भी आई हैं।

विचारधारात्मक सच यह है कि माओवादी विचारधारा बुर्जुआजी के अधूरे सपनों को दिखती है और उनको ही पूरा करने पर जोर देती है। बुर्जुआ समाज में जिस तरह अन्य प्रतिवादी विचारधाराएं सक्रिय हैं वैसे ही माओवाद भी सक्रिय है। मसलन् अविकसित आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में वे काम करते हैं और वहीं पर विकास के सवालों को बार-बार विभिन्न रूपों में उठाते हैं। कभी विस्फोट करके,कभी हथियारबंद जंग करके,कभी मुक्तांचलों का निर्माण करके और कभी हडताल करके।



माओवादियों की मांगें व्यवहार में बुर्जुआ विकास से जुड़ी हैं। क्रांति की बातें करते हुए वे अधूरे विकास के सवालों पर रोशनी डालते हैं। सामान्यतौर पर अपने को मार्क्सवाद का असली बारिस कहते हैं। उल्लेखनीय है कि आधुनिककाल में दो विचारधाराओं मार्क्सवाद और उदारतावाद का जन्म हुआ। और दोनों ही मुक्तिकामी विचारधारा का दावा करती हैं। दोनों का लक्ष्य है आधुनिक समाज और आधुनिक मनुष्य का निर्माण करना। जिन समाजों में बुर्जुआ सभ्यता,संस्कृति,आचार-व्यवहार,जीवनशैली और सामाजिक विकास नहीं हुआ है उनमें मार्क्सवाद के मानने वाले विभिन्न राजनीतिक गुटों का पहला लक्ष्य होता है असमानताओं को कम करना। अविकसित क्षेत्रों में विकास और समानता की मांग मूलतः बुर्जुआ मांग है। भूमिसुधार,शिक्षा,स्थानीय जनजातियों के हितों का संरक्षण ,सड़क,पानी,बिजली आदि मांगें मूलतः बुर्जुआ मांगें हैं।

आमतौर पर माओवादी वर्चस्व और विकास के सवालों को उठाते हैं ,खासकर गांवों में सामन्तों,जमींदारों और सूदखोरों के वर्चस्व के सवालों को उठाते हैं और उनसे मुक्ति की मांग करते हैं। वे किसानों-आदिवासियों के हितों के सवालों को उठाते हैं और शहरों में मध्यवर्ग-उच्चमध्यवर्ग से जुड़े रहते हैं। यह सच है आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में विकास नहीं हुआ है। अधूरे विकास की जगह पूर्ण विकास की मांग, अधूरी आजादी की जगह पूरी आजादी की मांग,पूंजीवादी उत्पादन संबंधों में व्याप्त असमानता की समाप्ति की मांग मूलतः बुर्जुआ फ्रेमवर्क से आगे निकलने नहीं देती।

माओवादियों की भाषा क्रांति,प्रतिवाद,समाजवाद,वर्गसंघर्ष,वर्गीय अन्तर्विरोध,आदिवासी इलाकों लोकतंत्र के हनन,पुलिस उत्पीड़न,हत्या बलात्कार आदि घटनाओं से भरी होती हैं। इस तरह की भाषा और इन घटनाओं से जुड़ी विचारधारा के प्रचार से बुर्जुआ व्यवस्था के विकास में मदद मिलती है। खासकर उन इलाकों में जहां पूंजीपति वर्ग पहुंचा ही नहीं है वहां पर मार्क्सवाद से प्रभावित विभिन्न राजनीतिक दल ,जिनमें माओवादी भी शामिल हैं, लोकतंत्र के विकास के बुनियादी कामों में दिलचस्पी लेते हैं।

जिस तरह का माओवादी संगठनों के जनाधार का विकास नव्य -उदारतावाद के दौर में हुआ है वैसा विकास पहले नहीं हुआ । सन् 1990 के बाद वे जितने आक्रामक बने हैं इतने आक्रामक वे पहले कभी नहीं थे। माओवादी हों या वामदल हों, इन सबकी शक्ति में इजाफा इस बात पर निर्भर करता है कि बुर्जुआ समाज का किस गति से विकास होता है।

कुछ लोग यह सोचते हैं कि क्रांतिकारी आंदोलन का विकास क्रांति के भावों और विचारों के कारण होता है,लेकिन वस्तुस्थिति यह नहीं है। क्रांति की विचारधारा मूलतः लोकतंत्र का बायनरी अपोजीशन है। यानी बुर्जुआजी का बायनरी अपोजीशन है। मजदूरवर्ग,बुर्जुआजी अपना विकास करेगा तो उसके अपोजीशन का भी विकास होगा। उस अपोजीशन को संगठित करने वाली ताकतों का भी विकास होगा। यही वजह है कि अभी तक मजदूरवर्ग की मांगे मूलतः बुर्जुआ मांगें ही रही हैं। वे अपनी मांगों के संघर्ष के जरिए बुर्जुआ वातावरण का विकास करते हैं।

मसलन् माओवादियों के आदिवासी और पिछड़े हुए इलाकों में सांगठनिक विस्तार को ही गंभीरता से देखें तो पाएंगे कि इनमें से अधिकांश इलाकों में वे तब ही गए हैं जब वहां किसी न किसी प्रकल्प के लिए जमीन ली गयी,बाँध बनाया गया,कारखाना लगाया गया या अन्य किसी काम के लिए आदिवासियों को बेदखल किया गया। आदिवासियों की बेदखली के पहले माओवादी इन इलाकों में नजर नहीं आते। आदिवासी इलाकों में बेदखली के खिलाफ उनकी मांगें क्या हैं ? वे सारी मांगें आदिवासी इलाकों के विकास से जुड़ी हैं। इनमें भी वे आदिवासियों को उनकी जमीन पर अधिकार दिलाने या उनका मालिकाना हक बरकरार रखने पर ज्यादा जोर देते हैं।

यानी वे "सचेतनता" की बजाय "संरचना" (जमीन)को बचाने पर ज्यादा जोर देते हैं। फलतः "सचेतनता" की बजाय "संरचना" पर ज्यादा वजन पड़ रहा है। बुर्जुआजी का जोर भी "संरचना" को हासिल करने पर है और माओवादियों का भी जमीन को बचाने पर मूल जोर है। वे आदिवासी और ग्रामीण समाज में पूर्व सामंती ,सामंती मूल्यों और सामाजिक शक्तियों के खिलाफ इसके आधार पर कोई विकल्प पैदा नहीं कर सकते। आदिवासियों और किसानों को नए मूल्यों और नई सामाजिक संरचनाओं में रूपान्तरित करने का उनके पास कोई विकल्प नहीं है। पुराने वर्गों या शोषक वर्गों से मुक्ति का उनके पास एक ही रास्ता है हत्या और हिंसा। यह शत्रु को खत्म करने का प्राचीनमार्ग है। वर्गशत्रु को जमीनी और मूल्यों की जंग में परास्त करने की बजाय हिंसा के जरिए खत्म करने की पद्धति अंततः उन्हें सामंती और पूर्व-सामंती वर्गों के खिलाफ संघर्ष से विमुख करती है। इस तरह की हिंसा से माओवादियों को तत्काल मदद तो मिलती है लेकिन दीर्घकालिक तौर पर यह पद्धति उनके लिए मददगार साबित नहीं हुई है।

जिन इलाकों में माओवादी वर्चस्व है वहां वे सभी काम माओवादी करने लगते हैं जो जमींदार-सूदखोर और लठैत किया करते थे।यानी वे अपने विरोधी वर्ग के अवगुणों को स्वयं अपना लेते हैं। सूदखोरों-जमींदारों को जान से मारना एक जमाने में उनके लिए गुरिल्ला संघर्ष का महत्वपूर्ण अस्त्र था।वे मानते थे इससे गांवों में जमींदारों-सूदखोरों का वर्चस्व खत्म होगा और आम किसान की सत्ता स्थापित होगी। माओवादियों की इस रणनीति के कारण अनेक जमींदार-सूदखोर इलाका छोड़कर चले गए,जो गांवों में रह गए वे मार दिए गए या उन्होंने माओवादियों के सामने समर्पण कर दिया।

माओवादियों की आरंभ में नक्सलवादी के रूप में पहचान थी ।वे गुरिल्ला पद्धति से संघर्ष में विश्वास करते थे,इसी आधार मुक्तांचलों का निर्माण और वर्गशत्रु की हत्या के काम को अंजाम दिया गया। उस समय किसानों और मजदूरों को संगठनबद्ध करने के काम को गौण माना गया। व्यापक शिरकत वाले जनांदोलन की पद्धति को अनुपयुक्त कहा गया। लेकिन कालान्तर में इस पद्धति में सुधार करते हुए माओवादियों ने विभिन्न इलाकों में अलग-अलग नामों से संगठन बनाए या बनवाए और उनके बहाने आदिवासियों-ग्रामीणों आदि को एकजुट करने,मीटिंग करने,रैली करने ,वर्गशत्रु की हत्या करने या बेदखल करने की पद्धति पर जोर दिया गया। गुरिल्ला युद्ध की पद्धति के नाम पर हत्याएं करने के काम को संघर्ष का सर्वोच्च रास्ता माना गया। वे मानते हैं कि इससे सामंती और सत्ता के दलालों के वर्चस्व को खत्म करने में मदद मिलती है।गांवों में किसानों को राजनीतिक शक्ति मिलती है। असल में यह अतिवामपंथ है जो वस्तुगत परिस्थितियों को आत्मगत अधीरभाव से देखता है। कुछ समाजविज्ञानी इसे 'अराजक-आतंकी सिद्धांत' और 'पेटी बुर्जुआ अराजकता' के नाम से भी पुकारते हैं। माओवादियों का मानना है कि उनके द्वारा वर्गशत्रु का सफाया करने की प्रक्रिया के गर्भ से समाज में एक नए मनुष्य का जन्म होगा। यह ऐसा मनुष्य होगा जो मौत से नहीं डरेगा और सभी किस्म के निजी स्वार्थ के विचारों से मुक्त होगा।

माओवादी राजनीति के उभार के कारण नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह के शासनकाल तक के दौरान हुए विकास की सीमाएं बड़ी तेजी से आम लोगों के सामने उजागर हुई हैं। माओवादियों ने बुर्जुआ विकास की तमाम बातों की महानरीय-मध्यवर्गीय सीमाओं को उजागर किया है। आज 136 जिलों में माओवादी सक्रिय हैं और इस सक्रियता का बड़ा कारण है सामाजिक-आर्थिक असमानता का 63 सालों के विकास के बावजूद बने रहना।

माओवादियों ने अंधाधुंध विकास की नव्य-उदारतावादी नीतियों का देश के विभिन्न इलाकों में जनांदोलन खड़ा करके प्रतिवाद किया है ।अनेक स्थानों पर उन्होंने सरकार को पीछे हटने के लिए मजबूर किया है। इस क्रम में कारपोरेट मीडिया में मीडिया उनका महिमामंडन भी हुआ है और माओवादियों ने गरीबी-असमानता और विस्थापन के सवालों पर सरलीकृत फार्मूलों का जमकर दुरूपयोग किया है। इसमें गरीबी को उन्होंने अपनी हिंसा के लिए वैध अस्त्र ठहराया है।



माओवाद के खिलाफ कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि हमें उनके खिलाफ राजनीतिक जंग लड़नी चाहिए। उन्हें जनता में अलग-थलग करना चाहिए। उनके खिलाफ जनता को गोलबंद करना चाहिए। सवाल यह है कि क्या माओवादी हिंसा के समय जनता में राजनीतिक प्रचार किया जा सकता है ? क्या माओवाद का विकल्प जनता को समझाया जा सकता है ? राजनीतिक प्रचार के लिए शांति का माहौल प्राथमिक शर्त है और माओवादी अपने एक्शन से शांति के वातावरण को ही निशाना बनाते हैं,सामान्य वातावरण को ही निशाना बनाते हैं, वे जिस वातावरण की सृष्टि करते हैं उसमें राज्य मशीनरी के सख्त हस्तक्षेप के बिना कोई और विकल्प संभव नहीं है। राज्य की मशीनरी ही माओवादी अथवा आतंकी हिंसा का दमन कर सकती है।

दूसरी बात यह है कि जब एक बार शांति का वातावरण नष्ट हो जाता है तो उसे दुरूस्त करने में बड़ा समय लगता है। माओवादी और उनके समर्थक बुद्धिजीवी माओवादियों की शांति का वातावरण नष्ट कर देने वाली हरकतों से ध्यान हटाने के लिए पुलिस दमन,आदिवासी उत्पीड़न, आदिवासियों का आर्थिक-सामाजिक पिछड़ापन,बहुराष्ट्रीय निगमों के हाथों आदिवासियों की प्राकृतिक भौतिक संपदा को राज्य के द्वारा बेचे जाने,आदिवासियों के विस्थापन आदि को बहाने के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।

माओवादी राजनीति या आतंकी राजनीति का सबसे बड़ा योगदान है सामान्य राजनीतिक वातावरण का विनाश। वे जहां पर भी जाते हैं सामान्य वातावरण को बुनियादी तौर पर नष्ट कर देते हैं। ऐसा करके वे भय और निष्क्रियता की सृष्टि करते हैं। इसके आधार पर वे यह दावा पेश करते हैं कि उनके साथ जनता है। सच यह है कि आदिवासी बहुल इलाकों से कांग्रेस, माकपा, भाजपा आदि दलों के लोग चुनाव के जरिए विशाल बहुमत के आधार पर चुनकर आते रहे हैं। माओवादियों के प्रभाव वाले इलाकों में उनकी चुनाव बहिष्कार की अपील का कोई असर नहीं पड़ता।

मीडिया के प्रचार ने कारपोरेट पूंजी निवेश का जिस तरह पारायण किया है और इसके विध्वंसात्मक आयाम पर पर्दादारी की है, उसे गायब किया है, उससे दर्शकीय नजरिया बनाने में मदद मिली है। प्रचार के जरिए हर चीज का जबाब बाजार में खोजा जा रहा है,हमसे सिर्फ देखने और भोग करने की अपील की जा रही है। बाजार,पूंजी निवेश, परवर्ती पूंजीवाद को वस्तुगत बनाने के चक्कर में मीडिया यह भूल ही गया कि वह जनता को सूचना संपन्न नहीं सूचना विपन्न बना रहा है। हमसे यह छिपाया गया है कि पूंजीवाद आखिरकार किन परिस्थितियों में काम करता है।

माओवादी संगठनों के संदर्भ में बुनियादी सवाल यह है कि क्या मौजूदा हिंसाचार जायज, तार्किक,वैध,और न्यायपूर्ण है ? क्या इस हिंसाचार से भारत के किसानों के जानो-माल की रक्षा हो रही है ? क्या माओवादी संगठनों के प्रभाव वाले इलाकों में किसान और आम आदमी चैन की नींद सो रहा है ? माओवादी संगठन अपने प्रभाव वाले इलाकों में जबरिया धन वसूली कर रहे हैं ।

दूसरा सवाल यह है कि माओवादियों के पास कई हजार सशस्त्र गुरिल्ला हैं और उनकी पचासों टुकडियां हैं, इन सबके लिए पैसा कहां से आता है ? गोला-बारूद से लेकर पार्टी होलटाइमरों और सशस्त्र गुरिल्लाओं के वेतन का भुगतान किन स्रोतों से होता है ? कौन हैं वे देशी-विदेशी संगठन और लोग जो इतने बड़े पैमाने पर माओवादी गुरिल्लाओं को पैसा भेज रहे हैं ?

माओवादियों की बात मानें तो आदिवासी अतिदरिद्र हैं। और वे कम से कम माओवादियों के लिए नियमित चंदा नहीं दे सकते। माओवादियों को कभी किसी ने शहरों में भी चंदा की रसीद काटकर या कूपन देकर चंदा वसूलते नहीं देखा। ऐसी स्थिति में वे धन कहां से प्राप्त करते हैं ? हिन्दुस्तान की गरीब जनता और खासकर आदिवासियों को यह जानने का हक है कि माओवादियों के पास धन कहां से आता है ?और किन मदों में खर्च होता है ?

माओवादियों के संदर्भ में तीसरा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या भारत की बहुलता को माओवादियों के राज्य में कोई जगह मिलेगी ? आज तक राजनीतिक,वैचारिक ,सामाजिक और धार्मिक बहुलतावाद के प्रति माओवादियों का घृणास्पद और बर्बर व्यवहार रहा है ऐसा ही व्यवहार साम्प्रदायिक,फंड़ामेंटलिस्ट और आतंकवादी संगठन भी करते हैं।

आज भारत में ऐसे दल हैं जो क्रांति लाना चाहते हैं। सर्वहारा के अधिनायकवाद के पक्षधर हैं। लेकिन वे भारत के बहुलतावादी समाज और राजनीतिक तानेबाने को मानते हैं और उसकी रक्षा के लिए समय-समय पर अपने दलीय स्वार्थ का भी उन्होंने त्याग किया है। उनकी लोकतंत्र और भारत के संविधान में आस्था है। भारत के दोनों कम्युनिस्ट दल इसके प्रमाण हैं।

समस्या यह है कि माओवादी बहुलतावाद के प्रति सहिष्णु क्यों नहीं हैं ? यदि सहिष्णु हैं तो वह सहिष्णुता व्यवहार में नजर क्यों नहीं आती ? ‘ऊपर से छह इंट छोटा कर देने से लेकर दनादन मौत के घाट उतारने तक’ का माओवादियों का राजनीतिक सफर इस बात की ओर संकेत कर रहता है कि उनके यहां बहुलतावाद के लिए कोई जगह नहीं है।

क्या हम यह कल्पना कर सकते हैं कि माओवादी शासन होगा और उसमें सभी धर्मों की आजादी बरकरार रहेगी ? सभी दलों की राजनीतिक स्वाधीनता बची रहेगी ? सभी वर्गों में भाईचारा रहेगा ? औरतों ,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की राजनीतिक-धार्मिक और भाषायी स्वाधीनता बरकरार रहेगी ? उनके राज्य में विभिन्न रंगत के मार्क्सवादी,राष्ट्रवादी,उदारवादी सुरक्षित और स्वतंत्रभाव से रहेंगे ? और उन्हें अभी जितनी आजादी बुर्जुआ संविधान के तहत मिली हुई है उससे भी ज्यादा स्वाधीनता और अधिकार प्राप्त होंगे ?

माओवाद के संदर्भ में चौथा सवाल यह है कि क्या माओवाद प्रभावित 136 जिलों में सामाजिक-राजनीतिक शक्ति संतुलन माओवादियों के पक्ष में है ? जी नहीं ,माओवादी संगठन ही नहीं सभी रंगत के क्रांतिकारी संगठन मिल जाएं तो भी सामाजिक और राजनीतिक शक्ति संतुलन उनके पक्ष में नहीं है।माकपा और वाममोर्चा लंबे समय से पश्चिम बंगाल,त्रिपुरा और केरल में प्रमुख राजनीतिक शक्ति हैं लेकिन सामाजिक वर्गीय शक्ति संतुलन आज भी उनके पक्ष में नहीं हैं जबकि उन्हें जनता में बड़ी मात्रा में जनसमर्थन प्राप्त है। इसकी तुलना में माओवादियों का किसी भी राज्य में राजनीतिक वर्चस्व नहीं है,सामाजिक वर्गीय शक्ति संतुलन उनके पक्ष में होना तो दिवा-स्वप्न है। माओवादी संगठन किसान,आदिवासी और क्रांति की कितनी ही बातें करें भारत के वैचारिक, राजनीतिक, भाषायी,धार्मिक और सांस्कृतिक बहुलतावाद को नतमस्क होकर स्वीकार करना होगा। बहुलतावाद के इन रूपों को अस्वीकार करने के कारण सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के सभी देशों में समाजवाद गिर गया और कम्युनिस्ट पार्टियों के अंदर से विभिन्न रंगत के पृथकतावादी,फासिस्ट,अंधराष्ट्रवादी,अपराधी, राज्य की संपत्ति के लुटेरे पूंजीपतियों का समूह रातों-रात पैदा हो गया था। समाजवादी व्यवस्था के पराभव के साथ ही हठात् कम्युनिस्टों के अंदर से ऐसे तत्व बाहर आए हैं जिनकी कोई कल्पना तक नहीं कर सकता। आज पूर्व समाजवादी देशों की जनता का कम्युनिस्टों पर विश्वास नहीं है। कहने का अर्थ यह है कि वैचारिक ,सामाजिक और सांस्कृतिक बहुलतावाद और लोकतंत्र वास्तविकता हैं। इनको हर कीमत पर बचाया जाना चाहिए।

माओवादी राजनीति का राजनीतिक बहुलतावाद से बैर है।राजनीतिक बहुलतावाद और लोकतंत्र एक सिक्के के ही दो पहलू हैं। माओवादियों की भारत के लोकतंत्र में आस्था नहीं है ऐसे में बहुलतावाद का क्या होगा ? क्या माओवाद के नाम पर भारत के लोग बहुआयामी बहुलतावाद की बलि देने को तैयार हैं ?

एक अन्य सवाल उठता है कि माओवादी अंधाधुंध कत्लेआम क्यों कर रहे हैं ? इस कत्लेआम का उनके प्रतिवादी संघर्षों और किसान-आदिवासियों में नव्य-उदारतावादजनित विस्थापन और भूमि अधिग्रहण के खिलाफ संघर्ष के एजेण्डे गहरा संबंध है।

आज भारत में नव्य उदारतावाद का एजेण्डा पिट चुका है। दूसरा कारण है माओवादी आंदोलन का चंद क्षेत्रों तक सीमित हो जाना। हिन्दुस्तान के अन्य वर्गों की समस्याएं उनके आंदोलन के केन्द्र में नहीं हैं। वे राजनेताओं और विभिन्न राजनीतिक दलों की नीतियों को खारिज करते हैं। कल तक माओवादियों के अंदर एक हिस्सा था जो लोकतंत्र को नहीं मानता था लेकिन अब वे चुनावों में भाग लेते हैं।

आज माओवादियों के सामने संकट यह है कि नव्य-उदारतावाद के खिलाफ उनका संघर्ष किसानों से लेकर मध्यवर्ग तक अपील खो चुका है। दूसरी ओर बुर्जुआ उदार लोकतंत्र की साख में भी बट्टा लग चुका है। समाजवाद के अधिकांश मॉडल पिट चुके हैं ऐसी अवस्था में माओवादी समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या करें ?

माओवादियों ने हाल वर्षों में नव्य-उदारतावाद के खिलाफ संघर्ष करके जो जमीन बनायी थी वह ग्लोबल एजेण्डा पूरी तरह पिट गया है। यह अमरीकी ग्लोबल एजेण्डा था आज जब अमेरिका में इस एजेण्डे का अंत हुआ है तो स्वाभाविक तौर पर सारी दुनिया में इसकी विदाई की घोषणा हो गयी है।

नव्य-उदारतावाद की विदाई की बेला में माओवादियों के पास सही एजेण्डे का अभाव है यही बुनियादी वजह है जिसके कारण वे अंधाधुंध हत्याएं कर रहे हैं। यह उनके दिशाहीन होने का संकेत है। माओवादियों का हिंसाचार 2001 के बाद से क्रमशः बढ़ा है और यह उनके एजेण्डे के पिटने का संकेत है।

माकपा और वामदलों ने नव्यउदारतावाद के बरक्स अपनी राजनीति में संतुलन पैदा किया और विकल्प का मार्ग चुना और इस दौर में नव्य उदारतावाद के संदर्भ में नए नीतिगत उपाय लागू कराने में सफलता हासिल की। नव्य-उदारतावाद के पिटते ही सोनिया-राहुल गांधी भी किसानों के हितों का ख्याल रखने की बातें करने लगे हैं। आज सोनिया और माओवादियों में किसानों की जमीन के मामले में एक ही स्वर दिखाई दे रहा है। अब वे जमीन अधिग्रहण के मामले में नया सख्त कानून लाना चाहते हैं। लेकिन अधिकांश राज्यों में किसानों की लाखों एकड़ जमीन तो कारपोरेट घराने खरीद चुके हैं। कानून ही लाना था तो 10 साल पहले क्यों नहीं लाए ?

माओवादी संगठनों के हिंसाचार का एक अन्य कारण है भारत में खासकर आदिवासी इलाकों में लोकतंत्र में जनता की व्यापक शिरकत। लोकतंत्र में व्यापक शिरकत के कारण ही वे लाख प्रचार करके भी साधारण लोगों को वोट ड़ालने से रोक नहीं पाए हैं। यही वजह है कि वे गरीबों की अंधाधुंध हत्याएं कर रहे हैं। उल्लेखनीय है नव्य-उदारतावाद के लाख दोष हों लेकिन आम आदमी की चेतना और शिरकत में कई गुना वृद्धि हुई है। संचार क्रांति ने क्रांति के सभी रूपों को फीका बना दिया है। बुर्जुआ लोकतंत्र के प्रति आकर्षण बढ़ा है।

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

सांस्कृतिक अध्ययन की राजनीति-फ्रैंसिस म्यूलहर्न

इन अनुमानतः उत्तर आधुनिक समयों की एक आश्चर्यजनक बौद्धिक परिघटना महानगरीय विद्वतपरिषद में सांस्कृतिक अध्ययनों के एक नए ‘ज्ञान क्षेत्र’ का आरंभ होना है। मैं यहां ‘नए’ शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ क्योंकि सांस्कृतिक अध्ययन सही मायनों में कभी भी महत संस्कृति का एक सुव्यवस्थित अध्ययन नहीं था। यह आरमब से ही विचारधारात्मक एवंआनुभविक गवेषणा की एकदिष्ट और आत्मज्ञात विरोधात्मक कार्ययोजना था। एक विचार,जिसने सर्वप्रथम बर्मिँघम विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में एक उपविभाग के रूप में संस्थागत आकार ग्रहण किया,आज विकसित होकर शैक्षिक गतिविधि की समस्त सूची में शामिल हो गया है। इसमें विशिष्ट डिग्री,स्नातक कार्यक्रम,पेशे से संबंधित संस्थाएं, बड़े-बड़े सम्मेलन और अंतर्महाद्वीपीय नेटवर्क ये सभी चीजें उपलब्ध हैं। निगमित प्रकाशकों ने तो सांस्कृतिक अध्ययनों से संबंधित लेखन के लिए पूरी पुस्तक सूची ही समर्पित कर दी है। जिसमें इस विषय से जुड़े न केवल शोध शामिल हैं बल्कि इसका इतिहास भी। इसमें अध्येताओं के लिए भारी भरकम पाठ्यपुस्तक हैं न कि झांसापट्टी केकुछ गाइड। अपनी प्रभावशाली संरचना का निर्माण करने के साथ-साथ सांस्कृतिक अध्ययनों ने अधिकारिक सफलता के साथ शिक्षा के अन्य क्षेत्रों विशेष रूप से साहित्य,इतिहास,समाजशास्त्र और महिलाओं से संबंधित अध्ययन के क्षेत्रों में शोध तथा शिक्षण को नए रूप में प्रस्तुत करने का सुझाव दिया है। तीस साल पूर्व आरंभ हुआ एक छोटा सा रैडिकल हस्तक्षेप अब समस्त मानवविज्ञानों के लिए व्यापक रूप से एक नए सामान्य सूत्र के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

यह घटना एक समझदार प्रेक्षक में अनिवार्य रूप से एक विसंगति या सहज अवास्तविकता का अहसास उत्पन्न करती है। यह अहसास इस कल्पना से और भी गहरा हो जाता है कि यह घटना उन ऐतिहासिक स्थितियों में हुई जिनमें इसे विफल करने की प्रवृत्ति होनी चाहिए थी। सांस्कृतिक अध्ययन रैडिकल नवपरिवर्तन तथा पुनर्संरचना की एक स्व-परिभाषित योजना है। जिन बरसों में इसका पल्लवन हुआ, वह उन शैक्षिक संस्थानों, जहां इस विषय का अध्ययन होता है, (विशेष रूप से, लेकिन केवल ब्रिटेन में ही नहीं) उसके लिए कठोर वित्तीय संयम तथा उन रैडिकल आंदोलनों के पराभव और दिशाभ्रम कासमय था, जो इसके प्रेरणा स्रोत रहे हैं। सांस्कृतिक अध्ययन की धूम एक प्रभावशाली वास्तविकता है लेकिन किसी को भी इसे विकासगाथा मानकर जश्न मनाना नहीं चाहिए। सांस्कृतिक अध्ययन के कारण जो व्यक्तिगत तथा सामूहिक उपलब्धियां संभव हुई हैं, इन्हें स्वीकार करना उचित है। लेकिन साथ ही हमें सांस्कृतिक विश्लेषण की रीति के रूप में इस योजना के आम तर्क पर और सांस्कृतिक राजनीति पर कुछ आवश्यक आलोचनात्मक विवेचना भी करनी चाहिए।

मैंने यहां यह विवेचना पांच संक्षिप्त टिप्पणियों के रूप में करने का प्रयास किया है। सबसे पहले मैंने सांस्कृतिक अध्ययन को सांस्कृतिक विश्लेषण की एक अलग स्पष्ट प्रवृत्ति के रूप में परिभाषित करने की कोशिश की है। इसके बाद इस विषय में जीवन के कुछ अंतर्विराधों तथा विचारों की चर्चा करते हुए अंत में इसमें जो संबंध दांव पर है, जैसे, संस्कृति और राजनीति के बीच के संबंध के बारे में कुछ सामान्य आलोचनात्मक अभ्युक्तियां दी हैं।

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सांस्कृतिक अध्ययन की पुराशास्त्रीय परिभाषा रेमंड विलियम्स द्वारा प्रतिपादित की गई थी। उनके अनुसार यह ऐतिहासिक भौतिक मानवीय संघटन समझे जाने वाले समाजों में बोध-निर्माण की पूरी दुनिया (व्याख्याओं, विश्लेषणों, अधिनिरूपणों, सभी प्रकार के मूल्यांकनों) में तथा 'संपूर्ण जीवन शैली' के नियामक भाग के रूप में बोध-निर्माण का अन्वेषण करेगा। यानी सांस्कृतिक अध्ययन सबसे पहले विश्लेषण के क्षेत्र में व्यापक विस्तार की मांग करता है; साहित्यिक आलोचना की सीमाओं से भी परे जिससे यह उत्पन्न हुआ है। अर्थात सभी सामाजिक अर्थों की जांच की जा सकती है। बहरहाल, सांस्कृतिक अध्ययन की परिभाषा के लिए इतना कहना काफी नहीं। सांस्कृतिक आलोचना (या कल्चुरीक्रितिक, जो कि इसका मानक जर्मन शब्द है जिसका मैं इसके बाद रोमन टाइप में उपयोग करना पसंद करूंगा क्योंकि मिलते-जुलते अंग्रेजी के शब्द इतने आम हैं कि वे मेरे तर्क के लिए आवश्यक परिभाषा को सही-सही संप्रेषित नहीं कर पाते) की पुरानी परंपरा दैनिक जीवन के अर्थ के अध्ययन को विशेष महत्व देती थी। इस परंपरा के लेखकों में इंगलैंड के साहित्यिक समालोचक एफ.आर. लेविस तथा क्यू.डी. लेविस, स्पेन के दार्शनिक जोस ओटर्ेगा वाई गैसेट, या जर्मन के युवा थॉमस मान थे। उन्होंने लोकतंत्र की नई 'जनसमूह संस्कृति' का तथा वाणिज्यीकृत साक्षरता का पूरे मनोवेग के साथ प्रत्युत्तर दिया लेकिन हमेशा उच्च विचार की भावना और परंपरावादी जुगुप्सा से। इनके विपरीत सांस्कृतिक अध्ययन अपने आंकड़ों के 'प्रतिक्रियात्मक समतुल्यीकरण' का प्रस्ताव करता है। दूसरे शब्दों में, हालांकि कविता और पॉपकॉर्न के विज्ञापन किसी भी सत्याभासी नैतिक अर्थ में समान महत्व के नहीं हो सकते लेकिन सामाजिक अर्थों के वाहक के रूप में दोनों काफीरोचक हैं और उस अर्थ में दोनों के प्रति समान विश्लेषणात्मक गंभीरता होनी चाहिए। बहरहाल यह विभेद भी, पहली परिभाषा के समान, सांस्कृतिक अध्ययन की विवेचना के लिए अपर्याप्त है। सांस्कृतिक अध्ययन महज मानवशास्त्र की एक शैली नहीं जो सांकेतिक प्रतिक्रियाओं के एक समूह के रूप में समाज का अध्ययन करता है। एक तीसरा विशिष्ट विवरण भी है जो बहुत महत्वपूर्ण है।

सांस्कृतिक अध्ययनों ने सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) की सामाजिक संवेदनशीलता और इसके रेंज का महज विस्तार नहीं किया बल्कि उन मूल्यों के संपूर्ण तंत्र को चुनौती दी जो पुरानी परंपरा और सांस्कृतिक सत्ता के पूरे तंत्र का समर्थन करता था तथा एक वैकल्पिक सत्ता के रूपों को यदि स्थापित नहीं किया, तो कम से कम उन्हें ढूंढ़ने का कार्य आरंभ किया। इसी अर्थ में सांस्कृतिक अध्ययन को 'निसर्गत: राजनीतिक' माना जाता है।

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सांस्कृतिक अध्ययन के एक विस्तारित, समतल क्षेत्र का यह प्रत्यय व्यावहारिक कम और सैध्दांतिक अधिक है। कोई पेशेवर समूह, कोई भी व्यक्ति 'सभी कुछ' के अध्ययन का दिखावा नहीं कर सकता। अध्ययन सामग्रियों के एक उदासीन चयन की धारणा भी परस्पर विरोधी है। चयन के लिए कुछ मौलिक विकल्प हैं; और ऐसा प्रतीत होता है अपनी सभी संभव अनुभूतियों की भिन्नता तथा संस्थागत परिस्थिति की विविधता के बावजूद सांस्कृतिक अध्ययन अपनी प्राथमिकताओं के अर्थ में अपेक्षाकृत स्थायी रहा है। इसके विश्लेषण का मुख्य क्षेत्र सामाजिक परिघटनाओं का वही रेंज रहा है जिसने पारंपरिक सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) को अत्यधिक चौकन्ना और प्रतिकर्षित कर दिया यानी उन्नत पूंजीवाद के प्रत्ययों तथा 'जनसमूह' सांस्कृतिक रूपों : सिनेमा, टेलीविजन, जनपत्रकारिता, विज्ञापन, शॉपिंग को। इसका प्रमुख विवादात्मक थीम, जो सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) के रूढ़ि विश्वास का सीधे-सीधे खंडन करता है, यह रहा है कि इस प्रकार की संस्कृति महज मूर्छाकारी औषधि नहीं, जिसे समाजातीय जनसमूह में उदासीनता उत्पन्न करने के लिए सफलतापूर्वक तैयार किया गया हो बल्कि इसके विपरीत इसमें सक्रिय, स्वैच्छिक, चुनिंदा और विध्वंसात्मक जनभागीदारी है।

संस्कृति के किसी भी समाजवादी सिध्दांत के लिए क्षेत्र तथा परिप्रेक्ष्य के ये परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यदि सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) की मतांध प्रस्थापनाएं वास्तव में वैध हैं, और कुछ मार्क्सवादी खासकर हर्बर्ट मारकस उस विचार से सहमत हैं, तो मेहनतकश वर्ग की आत्म मुक्ति के रूप में समाजवाद को पुराशास्त्रीय अर्थग्रहण एक सांप्रदायिक धर्मपरायणता से ज्यादा कुछ भी नहीं। जब अंतोनियो ग्राम्शी ने कहा कि सभी मनुष्य बुध्दिजीवी है, यद्यपि उनमें से केवल कुछ को ही 'प्रबुध्द' का दर्जा तथासामाजिक कार्य का दायित्व दिया जाता है तो उन्होंने यह बात इसी पुराशास्त्रीय भावना से कही थी।

हालांकि ग्राम्शी के सूत्र का निर्णायक पहलू इसका दोहरा चरित्र है : यह न केवल मुक्ति और भौतिक संभावना पर बल देता है बल्कि वर्चस्व के स्थापित तथ्य की भी पुष्टि करता है। सांस्कृतिक अध्ययन की प्रमुख प्रवृत्ति का जोर दूसरी ओर है। चूंकि सांस्कृतिक अध्ययन अपने विश्लेषण क्षेत्र में 'उच्च' सांस्कृतिक रूपों तथा आचरणों को शामिल नहीं करता है अत: यह अपनी ही विचारधारात्मक महत्वाकांक्षा से समझौता करता है जो कि 'संपूर्ण जीवन शैली' या और अधिक स्पष्ट शब्दों में कहें तो संस्कृति के समग्र विद्यमान सामाजिक संबंधों की विवेचना करना है। और चूंकि यह प्रचलित सांस्कृतिक व्यवहारों के सक्रिय तथा महत्वपूर्ण तत्व पर एकतरफा जोर देता है अत: इसमें असमानता और दमन की व्याकुल कर देने वाली ऐतिहासिक वास्तविकताओं की अनदेखी करने की प्रवृत्ति भी है। ये ऐतिहासिक वास्तविकताएं उनका निर्धारण करती हैं। ये प्रवृत्तियां संयुक्त रूप से उचित आलोचना सिध्दांत के विकास तथा विश्लेषण के विरुध्द कार्य करती है; जो सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) को प्रतिस्थापित करने का दावा करती हैं लेकिन वास्तव में इसकी प्रतिपूरक प्रतिक्रिया से ज्यादा कुछ भी प्रस्तुत नहीं करती है।

सांस्कृतिक अध्ययन में कुछ मत इन प्रवृत्तियों के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं लेकिन बिना किसी खास सफलता के। बहुसंख्यक प्रवृत्ति के विरुध्द 'जनवाद' का आरोप लगाया गया है और यह सही भी है। लेकिन अपने सभी रूपों में जनवाद अपने आपको विरोधपरक पाता है; यहां इसके विरुध्द इससे भी अधिक गंभीर आरोप लगाए जा सकते हैं। चूंकि आज अधिकांश महानगरीय लोक संस्कृति ने पण्यीकृत मनोरंजन या सौंदयीकृत जीविकोपार्जन कार्य का रूप ले लिया है; 'जीवनशैली' में सब कुछ बाजार के साथ संघटित है, अत: सांस्कृतिक अध्ययन का स्वत:स्फूर्त झुकाव वास्तव में विन्यासवादी है; और सबसे बुरे ढंग से सोचने पर यही 'सैटेलाइट टेलीविजन तथा शापिंग माल्स' की विचारधारात्मक आत्मचेतना है।

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माना कि यह विवरण स्थिति की सबसे खराब विवेचना है। इसके प्रति उल्लेखनीय ऊर्जा और प्रतिभा तथा कार्य का असाधारण रिकार्ड प्रस्तुत किया जाना चाहिए। लेकिन यह इस स्वीकृत दृढ़ विश्वास के अर्थ पर और विचार करने के लिए प्रेरित करता है कि सांस्कृतिक अध्ययन अनिवार्य रूप से वामपंथ की ओर है या जैसा कि एक जोरदार तथा खोखले पदबंध में हमसे बार-बार कहा जाता है कि यह 'निर्सगत: राजनीतिक' है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि सांस्कृतिक अध्ययनों ने समाजवादी, स्त्रीवादी, नस्लवादविरोधी, साम्राज्यवादविरोधी जैसे मुक्तिदायी सामाजिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है।इन विशिष्ट और ठोस अर्थों में इनका हस्तक्षेप राजनीतिक है। लेकिन सांस्कृतिक अध्ययन को महज 'हस्तक्षेप' समझते रहना रूमानी होगा। अब यह संस्थागत शैक्षिक गतिविधि है। और शैक्षिक गतिविधि, इसके आंतरिक गुण चाहे जो भी हो, निश्चित तौर पर राजनीतिक परियोजना नहीं हो सकती। जब कोई विरोधात्मक प्रवृत्ति एक ऐसा विषय बन जाती है जिसके लिए अलग बजट प्रावधान हो, जो प्रत्यय-पत्र, आजीविका और शोध के लिए धन मुहैया कराता हो तो क्या होता है? कमोबेश वही जो कोई यथार्थवादी उम्मीद करेगा। कोई भी शैक्षिक विषय सम्मान रूप में या यथार्थ रूप में अपने छात्रों या शिक्षकों पर राजनीतिक परीक्षण लागू नहीं कर सकता। वाकई वह दिन दूर नहीं और शायद वह आ चुका है जब इस विषय के वास्तविक प्राध्यापक, जिन्होंने इसमें प्रशिक्षण प्राप्त किया है तथा इसे विद्वतापूर्ण आजीविका के रूप में अपनाया है 'विध्वंस' या इसी प्रकार की शीर्षक वाले नेमी पाठयक्रमों पर कक्षाओं में परिचयात्मक व्याख्यान देने के लिए अपना स्थान ग्रहण करेंगे। यह केवल कटु परिकल्पना नहीं। यदि हम कोई पहले का उदाहरण देखना चाहें तो केवल एफ.आर. लेविस और उसके सहकर्मियों का स्मरण करने की आवश्यकता है जिनकी साहित्यिक आलोचना की युयुत्सु, उग्र और विद्वता-विरोधी शैली का व्यापक अनुकरण किया गया और जो अंतत: काफी पारंपरिक हो गई लेकिन इसका विरोधात्मक वैचित्र्य इसमें अभी भी था। उपदेश देना बेकार है लेकिन सांस्कृतिक अध्ययन से जुड़े वामपंथी विचारकों को उनका नया 'राजनीतिक' विषय उन्हें जितना प्रोत्साहित करने के लिए तत्पर प्रतीत होता है उससे कहीं अधिक उन्हें व्यंग्यात्मक आत्मचेतना की आवश्यकता है।

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लेविस का यह उदाहरण सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) और सांस्कृतिक अध्ययन के बीच के संबंध के बारे में और भी विचार करने के लिए प्रेरित करता है। और वो भी एक ऐसे आयाम में जहां वे एक दूसरे के गहरे विरोधी प्रतीत होते हैं, यानी राजनीतिक आयाम में।

इसके भिन्न राष्ट्रीय तथा अनुशासनिक रंग-प्रबंधों (डिसिपलिनरी कलरेशंस) के बावजूद सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) एक स्थायी बौध्दिक परिघटना थी। इसके प्रवर्तक सामान्यतया मूल्यों के एक सत्तात्मक केंद्र से बोलने का दावा करते थे जिन्हें 'मानवीय' या 'सार्वभौम' या 'पारंपरिक' जैसे पदों के रूप में अभिलक्षित किया जा सकता है और जिसके लिए सर्वाधिक स्वीकार्य संक्षिप्त शब्द 'संस्कृति' है। इस अर्थ में उनका स्व-परिभाषित कार्य आधुनिकता के बढ़ते खतरों के विरुध्द संस्कृति के हितों की रक्षा करना था, जिसका निरूपण बौध्दिक विशिष्टीकरण या औद्योगिक प्रौद्योगिकी या वाणिज्यवाद या 'साधारण समाज' के रूप में किया जा सकता है और जिसके लिए पुराशास्त्रीय संक्षिप्त शब्द 'सभ्यता' थी। सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) प्राय: संभ्रांतवर्गीय थी; यहएक अकाटय सत्य था कि संस्कृति हमेशा कुछ लोगों का ही सरोकार होना चाहिए जिसे सामान्य उदासीनता और अबोध्यता की स्थिति में जारी रखा जाना चाहिए। इसकी वकालत करने वालों के लिए खास राजनीतिक विकल्प दक्षिणपंथ से वामपंथ तक परिवर्तनीय थे। लेकिन सभी मामलों में ये विकल्प गौण थे क्योंकि सांस्कृतिक आलोचना का अंतर्निष्ठ उद्देश्य दृढ़तापूर्वक एक प्रकार की सामाजिक सत्ता प्रस्तुत करना था जो 'केवल' राजनीतिक नहीं इससे आगे हो। अत: संस्कृति, जो कि आवश्यक मूल्यों का क्षेत्र है तथा सभ्यता, जो कि सामाजिक 'मशीनरी' का क्षेत्र, के बीच मुख्य अंतर ने ही इस कल्पना को असंभव बना दिया कि राजनीति एक सार्थक सामाजिक गतिविधि है।

सांस्कृतिक अध्ययन ने सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) को विस्थापित करने का प्रयास किया है। इसने 'संस्कृति' और 'साधारण समाज' (मासेस) की एक वैकल्पिक व्याख्या प्रस्तुत की है। इसकी गतिविधि, विकल्प, और महत्व की खोज की है। वहीं सांस्कृतिक आलोचना केवल जड़ता और यंत्रवाद को ही देख सकती थी और इसने ऐसा रैडिकल सामाजिक लक्ष्यों के नाम पर किया है। फिर भी यहां कुछ कौतूहलपूर्ण है। स्वाभाविक है कि सांस्कृतिक अध्ययन ने उदारवादी और रूढ़िवादी विचारों को निरंतर चुनौती ही है लेकिन यदि यह किसी चीज से पूर्वग्रहग्रसित रहा है तो वह वामपंथ की कमियां हैं। अब यह सच है कि समझने के लिए कई चीजें हैं लेकिन सांस्कृतिक अध्ययन ने सबसे अधिक केवल एक बात पर फोकस किया है। इसका लगातार सुझाव, जो कि प्रभावी रूप में इस विषय का संकेत-धुन भी है, यह है कि लोक संस्कृति न केवल राजनीतिक समझ को बढ़ाती है, प्रत्युत कुछ अर्थों में वामपंथ को विरासत में मिली राजनीतिक परंपराओं को अवैध करार देती है तथा अतिक्रमण करती है। दूसरे शब्दों में सांस्कृतिक अध्ययन केवल राजनीति ('वर्ग', 'राज्य', 'संघर्ष', 'क्रांति' और इसी प्रकार की पुरानी अवधारणा) को लोक संस्कृति की उच्चतर सत्ता के अधीन लाना चाहता है। और ऐसा करने में यह विश्वसनीयता के साथ सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) के मूल पैटर्न को दोहराता है। यह सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) को नकारता है लेकिन ठीक वैसे ही जैसे दर्पण का बिंब आकृति को अक्षुण्ण रखते हुए इसके मूल को उलटा करता है। यहीं उन विरोधाभासों का स्रोत है जो इस हस्तक्षेपवादी विषय जिसे सांस्कृतिक अध्ययन कहते हैं के जीवन का निर्माण करता है।

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तो फिर हम सांस्कृतिक सिध्दांत तथा राजनीति के बीच संबंध के बारे में कैसे सोच सकते हैं? मैंने यह दावा किया है कि सांस्कृतिक अध्ययन इस संबंध की विशिष्ट तथा गहरी समझ को दोहराता है। ऐसा कहने का मेरा अभिप्राय यह है कि यह समझ गलत है और यह सांस्कृतिक अध्ययन से जुड़े वामपंथियों के संजीदा राजनीतिक उद्देश्यों के साथ समझौताकर सकता है। निष्कर्ष के रूप में, मैं समाजवादी सांस्कृतिक सिध्दांत की 'राजनीतिक' स्थिति के बारे में वैकल्पिक तरीके से विचार करने का साहस करूंगा।

संस्कृति और राजनीति के बीच का संबंध वामपंथ में दो प्रकार के न्यूनीकरणवाद के अध्यधीन रहा है। बिना किसी खेद के हम एक बड़े विकल्प का त्याग कर सकते हैं : यानी प्रचलित राजनीतिक न्यूनीकरणवाद, जिसकी वजह से साम्यवादी आंदोलन कुख्यात हो गया, जो सभी सांस्कृतिक पहल के एक पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के रूप में वर्गीकृत करता है और जिसके मानवीय संभावनाओं संबंधी बोध का आरंभ और अंत राजनीतिक उद्देश्य के साथ होता है। लेकिन अब हमारे पास एक वैकल्पिक न्यूनीकरणवाद है। इस बार यह संस्कृतिवादी किस्म का है जिसे अकादमी सांस्कृतिक अध्ययन के अधीन तथा बाहर की दुनिया में उत्तरआधुनिक बुध्दिमत्ता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह न्यूनीकरणवाद सांस्कृतिक विभेद की सभी अभिव्यक्तियों को राजनीतिक मानकर सम्मानित करता है और इसलिए विशेषाधिकारवाद को प्रोत्साहित करता है तथा अनिवार्य रूप से कठोर अर्थ में राजनीति का आत्मासक्ति विषयक विघटन करता है। यदि न्यूनीकरणवाद ने संस्कृति को एक राजनीतिक उपकरण के रूप में स्वीकार किया है तो विशेषाधिकारवाद ने प्रभावी रूप से राजनीति की संभावना को ही समाप्त कर दिया और कहूंगा कि सचमुच राजनीतिक संघर्ष के क्षेत्र के रूप में संस्कृति की संभावना को ही समाप्त कर दिया है।

एक समाजवादी सांस्कृतिक सिध्दांत के लिए सांस्कृतिक आचरणों की संभावनाओं तथा सीमाओं को स्वीकार करना आवश्यक है। इसके लिए यह स्वीकार करना भी जरूरी है कि इस प्रकार के आचरण राजनीति से कम भी हैं, अधिक भी। हालांकि संस्कृति एक विवादित धरातल है, राजनीतिक संघर्ष का एक क्षेत्र, लेकिन यह केवल राजनीतिक नाटयशाला नहीं हो सकती, न ही पूर्णरूपेण राजनीति को ही समाहित कर सकती है। संस्कृति के समाजवादी सिध्दांत का पहला नियम कहता है कि राजनीति और संस्कृति के बीच संबंध की प्रतीकात्मक अवस्था 'विसंगति' होगी। यह कोई बहुत आकर्षक प्रतिपादन नहीं प्रतीत हो सकता लेकिन सामाजिक अर्थों की समग्रता या 'संपूर्ण जीवन शैली' को समाहित करने के लिए 'संस्कृति' के दायरे का एक बार विस्तार कर लेने के बाद इस पर बल देना आवश्यक है। क्योंकि यह विस्तारित अर्थग्रहण समाजवादी सांस्कृतिक सिध्दांत के लिए महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ यह अपनी भी अवधारणात्मक समस्याएं खड़ी करती है।

यदि संस्कृति सामाजिक अर्थों की संपूर्णता है और यदि राजनीतिक गतिविधि का उद्देश्य एक दिए हुए स्थान के भीतर सामाजिक संबंधों की संपूर्णता है (जैसा कि एक सच्ची मुक्तिकारी राजनीति की होनी चाहिए) तो प्रथम द्रष्टया यह प्रतीत हो सकता है कि मानो संस्कृति और राजनीति दोनों एक ही चीज हैं, जैसा कि अब सांस्कृतिक अध्ययन मानने को तैयार है। सैध्दांतिक रूप में हम यह नहीं कह सकते कि एक प्रकार की सामाजिक विषय-वस्तु राजनीतिक और दूसरी प्रकार की नहीं। यदि पूरा समाज संस्कृति के अंत:क्षेत्र में है तोऐसा लगता है कि कोई भी सांस्कृतिक प्रवृत्ति वैध रूप से अपने आपको 'राजनीतिक' कह सकती है।

लेकिन यहां एक मौलिक भ्रांति है। ऐसा समझा जा सकता है कि संस्कृति और राजनीति दोनों ही सामाजिक संबंधों की समग्रता को अपने में समेटे हुए हैं, लेकिन वे ऐसा अलग-अलग रूप में करते हैं। राजनीति सामाजिक संबंधों के चरित्र के निर्धारण में अपनी भूमिका के कारण अन्य सामाजिक आचरणों से अलग है। जब यह शब्द और बिंब के रूप में पूरी तरह अर्थ के क्षेत्र में भी कार्य करती है तो राजनीतिक आचरण अपने विशिष्टीकृत प्रकार्य द्वारा विनियमित होता है। यह एक विचारात्मक आचरण (डेलिबरेटिव प्रैक्टिस) है जो सामान्यतया निर्णयोन्मुख होता है; नियंत्रण संबंधी प्रश्न हमेशा रहता है कि, 'क्या किया जाना है?' शांतिपूर्ण जनतांत्रिक स्थितियों में यह एक आदेशात्मक आचरण (इंजंक्टिव प्रैक्टिस) कार्य है, प्रभावी सहमति के लिए एक संघर्ष। और अंतत: यह उन संसाधनों की ओर मुड़ता है जिन्हें संस्कृति में परिणत नहीं किया जा सकता है यानी भौतिक अवपीड़न के साधन।

सांस्कृतिक आचरण इस प्रकार के नहीं होते जिन्हें हम अपेक्षाकृत कम अमूर्त रूप में वह समझें जिनका प्रमुख प्रकार्य अर्थ उत्पन्न करना होता है। उनके अर्थ की दुनिया भी वही है। उनमें राजनीतिक संकेत बहुत अधिक हैं लेकिन उन विशिष्टीकृत लक्षणों की कमी है, और इनकी आवश्यकता भी नहीं। विचार-विमर्श, आदेश और बलप्रयोग द्वारा सामाजिक संबंधों की प्रकृति का निर्धारण करना संस्कृति का कार्य नहीं है। इस अंतर का निहितार्थ ग्राम्शी द्वारा अनुभव किया गया। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक निर्णय और राजनीतिक निर्णय की प्रकृति अलग होती है और उनमें एक स्थान पर मिलने की प्रवृत्ति भी नहीं होती।

सांस्कृतिक आचरण किसी भी और सभी विभेदों को निरपेक्ष मान सकता है (जैसा कि एक बार जार्ज लुकास ने कहा था कि कला और प्रत्ययों के क्षेत्र में कोई भी संयुक्त मोर्चा नहीं होता)। जबकि राजनीति किसी खास वस्तु स्थिति को लाने या रोकने के लिए, जीवन के इस या उस सामान्य स्थिति को प्राप्त करने के लिए विभेदों के साथ समान रूप में व्यवहार नहीं कर सकती। इसमें उन विभेदों को पाटने की क्षमता होनी चाहिए जिन्हें सांस्कृतिक आचरण निरपेक्ष मानता है ताकि विशिष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए एकजुटता बनाई जा सके। साथ ही उन्हीं कारणों से राजनीतिक हित सांस्कृतिक एकजुटता वाले क्षेत्र में विभाजन को प्रोत्साहित करना अनिवार्य बना सकता है। उदाहरण के लिए, एक राजनीतिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए (उदाहरणस्वरूप राज्य द्वारा वित्तपोषित नर्सरी की व्यवस्था) किसी धार्मिक संप्रदाय के भीतर वर्ग तथा लिंगभेद संबंधी वैमनस्य को उजागर करना आवश्यक हो सकता है। किसी दिए हुए सांस्कृतिक हित के परिप्रेक्ष्य में देखने पर राजनीतिक मांग हमेशा ही या तो बहुत अधिक या बहुत कम होती है और संस्कृति के विरुध्द राजनीतिक शिकायत भी हमेशा इसी प्रकार की होती है। प्रत्येक एक-दूसरे के सापेक्ष, सांप्रदायिक और एकतावर्धक दोनों हैं।

सांस्कृतिक अध्ययन इसी मौलिक विभेद का लोप करता है। यहां इसके ऐतिहासिक कारणों की पड़ताल करने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं है, लेकिन इसके परिणामों के बारे में कुछ कहा जा सकता है। आरंभ से ही सांस्कृतिक अध्ययन की प्रवृत्ति राजनीति को संस्कृति में विलीन करने की रही है। रेमंड विलियम्स ने भी अनुदर्शन में स्वीकार किया कि उन्होंने सांस्कृतिक राजनीति की संभावनाओं को बढ़ा दिया था। वह सांस्कृतिक क्षेत्र से बाहर राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे और अपने सैध्दांतिक कार्य में भी इस प्रवृत्ति से कभी भी बाहर नहीं निकल पाए। फिर भी उन्होंने तथा उनके पूर्व के समाजवादी सांस्कृतिक अध्ययन करने वालों ने कम से कम दो महत्वपूर्ण कार्य किए : पहला, स्तालिनवादी रूप में संस्कृति को राजनीतिक साधन बनाने की अस्वीकृति करते हुए उन्होंने विशेष रूप से उपभोक्ता पूंजीवाद तथा 'जन' संचार के युग में संघर्ष की जमीन के रूप में इसके महत्व को स्वीकार किया। दूसरा, 'लोक' संस्कृति को संवेदनमंदक रहस्यवाद मानकर खारिज करने की संभ्रांतवर्गीय प्रवृत्ति के विरुध्द उन्होंने इसकी वैधता पर बल दिया। पूंजीवादी समाज में लोक संस्कृति वर्चस्व या वस्तुवाद (कमोडिफिकेशन) की अनिवार्यताओं के संबंधों से बाहर कभी भी नहीं रही। फिर भी उन संबंधों तथा अनिवार्यताओं के भीतर 'साधारण समाज' कभी भी केवल निष्क्रिय और दमित नहीं था। लोक संस्कृति में दमन और प्रतिरोध दोनों ही परिलक्षित होते थे।

आज सांस्कृतिक अध्ययन न केवल राजनीति का संस्कृति में विलय को आगे बढ़ा रहा है बल्कि इस प्रक्रिया में यह इसके प्रथ प्रदर्शकों की विरासत को भी बरबाद कर रहा है। यह सांस्कृतिक आचरण से परे राजनीति के लिए या सांस्कृतिक विभेद के विशेषाधिकार से परे किसी राजनीतिक एकजुटता के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ता। वास्तव में सांस्कृतिक प्रतिवाद की राजनीति के लिए भी कोई स्थान नहीं है। और यदि 'उच्च' संस्कृति तथा असमानता और वर्चस्व सभी जनसमूह संस्कृति की ऐतिहासिक वास्तविकताओं से अमूर्त रूप में पहले ही सक्रिय तथा अत्यंत महत्वपूर्ण है, यदि टेलीविजन और शॉपिंग पहले ही विध्वंस के थिएटर हैं तो संघर्ष के लिए कोई जगह नहीं और दरअसल इसकी आवश्यकता भी नहीं। लेकिन यदि इन सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों से परे कुछ भी नहीं, तो 'साधारण समाज' का दमन तथा उपभोक्ता पूंजीवाद के आगे उनका आत्मसमर्पण उतना ही संपूर्ण है जितना सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) के प्रवर्तक मानते थे। यहां पर सांस्कृतिक अध्ययन का सबसे गहरा अंतर्विराध यह है कि इसका अंत इस जनतंत्रविरोधी निर्णय की पुष्टि तथा जश्न के साथ होता है।































शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

साहित्य में भावुकता की हिमायत में



साहित्यालोचना में इन दिनों उदासी छायी हुई है। इस उदासी का प्रधान कारण है कृति-कृतिकार का जीवन से कृत्रिम संबंध।आलोचकों की इस कृत्रिम संबंध को पहचानने में असफलता। किसी भी कृतिकार की कलात्मक श्रेष्ठता उस समय ज्यादा समझ में आती है जब वह अपनी कृति में भावुकता का चित्रण करता है। इन दिनों कृतियों में विवरण-ब्यौरे तो खूब हैं लेकिन भावुकता पता नहीं कहां खो गई है। भावुकता के चित्रण के साथ यह समझ भी होनी चाहिए कि आखिर वे कौन से स्थल हैं जहां भावुकता का निर्वाह किया जाना चाहिए। कथानक के मार्मिक स्थलों की सही समझ और विषय के साथ गहरा संबंध अंततः भावुक स्थलों के चित्रण में मददगार हो सकता है। हिन्दी के प्रमुख आलोचक रामचन्द्र शुक्ल ने तुलसीदास के प्रसंग में यह सवाल काफी पहले बड़े ही सुंदर ढ़ंग से उठाया है। शुक्लजी ने लिखा है-  "प्रबन्धकार कवि की भावुकता का सबसे अधिक पता यह देखने से चल सकता है कि वह किसी आख्यान के अधिक मर्मस्पर्शी स्थलों को पहचान सका है या नहीं। राम कथा के भीतर ये स्थल अत्यन्त मर्मस्पर्शी हैं-राम का अयोध्‍या त्याग और पथिक के रूप में वनगमन; चित्रकूट में राम और भरत का मिलन; शबरी का आतिथ्य; लक्ष्मण को शक्ति लगने पर राम का विलाप; भरत की प्रतीक्षा। "इन स्थलों को गोस्वामीजी ने अच्छी तरह पहचाना है; इनका उन्होंने अधिक विस्तृत और विशद वर्णन किया है।यानी रचना में मार्मिक स्थलों का रचनाकार को ज्ञान होना चाहिए। हमारे अधिकतर उपन्यासकारों को कथानक के मार्मिक स्थलों का पता ही नहीं रहता और कथानक स्टीरियोटाइप ढ़ंग से चलता रहता है। इसके अलावा मार्मिकता में निहित भावुकता का चित्रण करते समय मूल्यों के चित्रण में निपुण होना जरूरी है।
    आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है " एक सुन्दर राजकुमार के-छोटे भाई और स्‍त्री को लेकर-घर से निकलने और वन वन फिरने से अधिक मर्मस्पर्शी दृश्य क्या हो सकता है? इस दृश्य का गोस्वामीजी ने मानस, कवितावली और गीतावली तीनों में अत्यन्त सहृदयता के साथ वर्णन किया है। गीतावली में तो इस प्रसंग के सबसे अधिक पद हैं। ऐसा दृश्य स्त्रियों को सबसे अधिक स्पर्श करनेवाला, उनकी प्रीति, दया और आत्मत्याग को सबसे अधिक उभारनेवाला होता है, यह बात समझकर मार्ग में उन्होंने ग्राम बधुओं का सन्निवेश किया है। ये स्त्रियाँ राम जानकी के अनुपम सौन्दर्य पर स्नेह शिथिल हो जाती हैं, उनका वृत्तान्त सुनकर राजा की निष्ठुरता पर पछताती हैं; कैकेयी की कुचाल पर भला बुरा कहती हैं। सौन्दर्य के साक्षात्कार से थोड़ी देर के लिए उनकी वृत्तियाँ कोमल हो जाती हैं, वे अपने को भूल जाती हैं। यह कोमलता उपकार बुद्धि की जननी है-
सीता  लषन  सहित  रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई।।
सुनि सब बालबृद्ध नर  नारी। चालहिं तुरत गृह काज बिसारी।।
राम लषन सिय रूप  निहारी। पाइ  नयन  फल  होहिं सुखारी।।
सजल विलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन  देखि दोउ बीरा।।
रामहिं देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहि सँग लागे।।
एक देखि बट छाँह भलि, डासि मृदुल तृन पात।
कहहिं 'गँवाइय छिनुक स्तम, गवनब अबहिं कि प्रात'।।
    राम जानकी के अयोध्‍या से निकलने का दृश्य वर्णन करने में गोस्वामीजी ने कुछ उठा नहीं रखा। सुशीलता के आगार रामचन्द्र प्रसन्नमुख निकलकर दास दासियों को गुरु के सुपुर्द कर रहे हैं, सबसे वही करने की प्रार्थना करते हैं जिससे राजा का दु:ख कम हो। उनकी सर्वभूतव्यापिनी सुशीलता ऐसी है कि उनके वियोग में पशु पक्षी भी विकल हैं। भरतजी जब लौटकर अयोध्‍या आए, तब उन्हें सर सरिताएँ भी श्रीहीन दिखाई पड़ीं, नगर भी भयानक लगा। भरत को यदि रामगमन का संवाद मिल गया होता तो हम इसे भरत के हृदय की छाया कहते। पर घर में जाने के पहले उन्हें कुछ भी वृत्ता ज्ञात नहीं था। इससे हम सरसरिता के श्रीहीन होने का अर्थ उनकी निर्जनता, उनका सन्नाटापन लेंगे। लोग रामवियोग में विकल पड़े हैं। सरसरिता में जाकर स्नान करने का उत्साह उन्हें कहाँ? पर यह अर्थ हमारे आपके लिए है। गोस्वामीजी ऐसे भावुक महात्मा के निकट तो राम के वियोग में अयोध्‍या की भूमि ही विषादमग्न हो रही है; आठ आठ ऑंसू रो रही है।
    चित्रकूट में राम और भरत का जो मिलन हुआ है, वह शील और शील का, स्नेह और स्नेह का, नीति और नीति का मिलन है। इस मिलन से संघटित उत्कर्ष की दिव्य प्रभा देखने योग्य है। यह झाँकी अपूर्व है? 'भायप भगति' से भरे भरत नंगे पाँव राम को मनाने जा रहे हैं। मार्ग में जहाँ सुनते हैं कि यहाँ पर राम लक्ष्मण ने विश्राम किया था, उस स्थल को देख ऑंखों में ऑंसू लेते हैं-
राम बास थल बिटप बिलोके। उर अनुराग रहत नहिं रोके।।
    मार्ग में लोगों से पूछते जाते हैं कि राम किस वन में हैं। जो कहता है कि हम उन्हें सकुशल देखे आते हैं, वह उन्हें राम लक्ष्मण के समान ही प्यारा लगता है। प्रिय सम्बन्धी आनन्द के अनुभव की आशा देनेवाला एक प्रकार के उस आनन्द को जगानेवाला है-'उद्दीपन' है। सब माताओं से पहले राम कैकेयी से प्रेमपूर्वक मिले। क्यों? क्या उसे चिढ़ाने के लिए? कदापि नहीं। कैकेयी से प्रेमपूर्वक मिलने की सबसे अधिक आवश्यकता थी। अपना महत्तव या सहिष्णुता दिखाने के लिए नहीं, उसके परितोष के लिए। अपनी करनी पर कैकेयी को जो ग्लानि थी, वह राम ही के दूर किए हो सकती थी, और किसी के किए नहीं। उन्होंने माताओं से मिलते समय स्पष्ट कहा था-
अंब! ईस आधीन जग काहु न देइय दोषु।
    कैकेयी को ग्लानि थी या नहीं, इस प्रकार के सन्देह का स्थान गोस्वामीजी ने नहीं रखा। कैकेयी की कठोरता आकस्मिक थी, स्वभावगत नहीं। स्वभागवत भी होती तो भी राम की सरलता और सुशीलता उसे कोमल करने में समर्थ थी।
लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल   रानि   पछितानी   अघाई।।
अवनि जमहि  जाचति  कैकेयी। महि न बीचु, बिधि मीचु न देई।।"
  आचार्य शुक्ल ने रामचरित मानस के संदर्भ में जिस भावुकता का जिक्र किया है क्या वह भावुकता आज भी मानस के पाठकों को अपील करती है ? क्या महाकाव्य के सुख,दुख,विषाद,प्रेम,क्रोध आदि आज भी अपील करते हैं ? क्या आम लोग आज भी रामचरित मानस के मार्मिक स्थलों के भावुक चित्रण से भावविभोर होते हैं ? तुलसीदास ने मानस में भावुकता का चित्रण करते समय एक साथ कई सामाजिक संबंधों को चित्रित किया है। एक साथ कई धर्मों को चित्रित किया है। सामाजिक और धार्मिक बहुलतावाद का इतना सुंदर मार्मिक चित्रण ही रामचरित मानस को भारत की आत्मा बना सका है। रामचरित मानस के बहुलतावादी चित्रण को रेखांकित करते हुए रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है " जिस समाज के शील सन्दर्भ की मनोहारिणी छटा को देख वन के कोल किरात मुग्ध होकर सात्‍विक वृत्ति में लीन हो गए, उसका प्रभाव उसी समाज में रहनेवाली कैकेयी पर कैसे न पड़ता?
    (क) भए सब साधु किरात किरातिनि राम दरस मिटि गई कलुषाई।
    (ख) कोलकिरात  भिल्ल   बनवासी। मधु सुचि सुन्दर स्वादु सुधा-सी।।
       भरि भरि परन पुटी रुचि रूरी। कन्द  मूल  फल  अंकुर जूरी।।
       सबहिं देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुननामा।।
       देहिं लोग बहु, मोल न लेहीं। फेरत  राम   दोहाई  देहीं।।
    और सबसे पुलकित होकर कहते हैं-
       तुम्ह प्रिय पाहुन बन पगु धारे। सेवा    जोगु  न   भाग  हमारे।।
       देब काह हम तुम्हहिं गोसाईं। ईंधन  पात  किरात  मिताई।।
       यह हमारि अति बड़ि  सेवकाई। लेहिं न   बासन   बसन  चोराई।।
       हम जड़ जीव  जीव  धन  घाती। कुटिल कुचाली कुमतिकुजाती।।
       सपनेहुँ धरम बुद्धि कस  काऊ। यह   रघुनन्दन   दरस   प्रभाऊ।।
    उस पुरुष समाज के प्रभाव से चित्रकूट की रमणीयता में पवित्रता भी मिल गई। उस समाज के भीतर नीति, स्नेह, शील, विनय, त्याग आदि के संघर्ष से जो धर्मज्योति फूटी उससे आसपास का सारा प्रदेश जगमगा उठा-उसकी मधुर स्मृति से आज भी वहाँ की वनस्थली परम पवित्र है। चित्रकूट की उस सभा की कार्रवाई क्या थी, धर्म के एक एक अंग की पूर्ण और मनोहर अभिव्यक्ति थी। रामचरितमानस में वह सभा एक अध्‍यात्मिक घटना है। धर्म के इतने स्वरूपों की एकसाथ योजना, हृदय की इतनी उदात्त वृत्तियों की एकसाथ उद्भावना तुलसी के ही विशाल 'मानस' में सम्भव थी। यह सम्भावना उस समाज के भीतर बहुत से भिन्न भिन्न वर्गों के समावेश द्वारा संघटित की गई है। राजा और प्रजा, गुरु और शिष्य, भाई और भाई, माता और पुत्र, पिता और पुत्री, श्वसुर और जामाता, सास और बहू, क्षत्रिय और ब्राह्मण, ब्राह्मण और शूद्र, सभ्य और असभ्य के परस्पर व्यवहारों का उपस्थित प्रसंग के धर्मगाम्भीर्य और भावोत्कर्ष के कारण, अत्यन्त मनोहर रूप प्रस्फुटित हुआ। धर्म के उस स्वरूप को देख सब मोहित हो गए-क्या नागरिक क्या ग्रामीण और क्या जंगली। भारतीय शिष्टता और सभ्यता का चित्र यदि देखना हो तो इस राज समाज में देखिए। कैसी परिष्कृत भाषा में, कैसी प्रवचन पटुता के साथ, प्रस्ताव उपस्थित होते हैं, किस गम्भीरता और शिष्टता के साथ बात का उत्तर दिया जाता है, छोटेबड़े की मर्यादा का किस सरसता के साथ पालन होता है। सबकी इच्छा है कि राम अयोध्‍या को लौटें; पर उनके स्थान पर भरत बन को जायँ, यह इच्छा भरत को छोड़ शायद ही और किसी के मन में हो। अपनी प्रबल इच्छाओं को लिए हुए लोग सभा में बैठते हैं; पर वहाँ बैठते ही धर्म के स्थिर और गम्भीर स्वरूप के सामने उनकी व्यक्तिगत इच्छाओं का कहीं पता नहीं रह जाता। राजा के सत्यपालन से जो गौरव राजा और प्रजा दोनों को प्राप्त होता दिखाई दे रहा है, उसे खंडित देखना वे नहीं चाहते। जनक, वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि धर्मतत्‍व के पारदर्शी जो कुछ निश्चय कर दें, उसे वे कलेजे पर पत्थर रखकर मानने को तैयार हो जाते हैं।"
तुलसी ने मानस में भावुकता के चित्रण के साथ कई सामाजिक संबंधों का भी चित्रण किया है।मसलन, राजा-प्रजा,परिवारीजनों के बीच के संबंध,ऋषियों और राजकुमारों के बीच का संबंध,माता-पुत्र, पिता-पुत्र,पति-पत्नी,आदिवासी और राजा,भाई-भाई का संबंध ,श्वसुर-दामाद का संबंध,ऋषियों और आदिवासियों का संबंध आदि संबंधों का चित्रण करते हुए लेखक ने तदनुरूप भाव की सृष्टि करने में सफलता हासिल की है।
इसी प्रसंग में रामचन्द्र शुक्ल ने एक महत्वपूर्ण बात कही है, उन्होंने लिखा है , " कवि की पूर्ण भावुकता इसमें है कि वह प्रत्येक मानवस्थिति में अपने को डालकर उसके अनुरूप भाव का अनुभव करे। इस शक्ति की परीक्षा का रामचरित से बढ़कर विस्तृत क्षेत्र और कहाँ मिल सकता है! जीवनस्थिति के इतने भेद और कहाँ दिखाई पड़ते हैं! इन क्षेत्रों में जो कवि सर्वत्र पूरा उतरता दिखाई पड़ता है, उसकी भावुकता को और कोई नहीं पहुँच सकता। जो केवल दाम्पत्य रति में ही अपनी भावुकता प्रकट कर सकें, या वीरोत्साह ही का अच्छा चित्रण कर सकें, वे पूर्ण भावुक नहीं कहे जा सकते। पूर्ण भावुक वे ही हैं जो जीवन की प्रत्येक स्थिति के मर्मस्पर्शी अंश का साक्षात्कार कर सकें और उसे श्रोता या पाठक के सम्मुख अपनी शब्दशक्ति द्वारा प्रत्यक्ष कर सकें। हिन्दी के कवियों में इस प्रकार की सर्वांगपूर्ण भावुकता हमारे गोस्वामीजी में ही है जिसके प्रभाव से रामचरितमानस उत्तरी भारत की सारी जनता के गले का हार हो रहा है।'' शुक्लजी ने सवाल उठाया है कि "गोस्वामीजी की भावात्मक सत्ता का अधिक विस्तार स्वीकार करते हुए भी यह पूछा जा सकता है कि क्या उनके भावों में पूरी गहराई या तीव्रता भी है? यदि तीव्रता न होती, भावों का पूर्ण उद्रेक उनके वचनों में न होता, तो वे इतने सर्वप्रिय कैसे होते? भावों के साधारण उदगार से ही सबकी तृप्ति नहीं हो सकती। यह बात अवश्य है कि जो भाव सबसे अधिक प्रकृतिस्थ है, उसकी व्यंजना सबसे अधिक गूढ़ और ठीक है। जो प्रेमभाव अत्यन्त उत्कर्ष पर पहुँचा हुआ उन्होंने प्रकट किया है, वह अलौकिक है, अविचल है और अनन्य है। वह घन और चातक का प्रेम है।"







मंगलवार, 20 सितंबर 2011

नरेन्द्र मोदी की वर्चुअल सदभावना



गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 3 दिन का उपवास रखा लेकिन समय से पहले ही खत्म कर दिया। कायदे से 72 घंटे का उपवास था जो आजतक टीवी चैनल के अनुसार 55 घंटे में ही खत्म हो गया। मोदी ने यह उपवास क्यों किया इस पर खूब बहस हुई है। संघ की राजनीति को मैं विगत 35 सालों से ज्यादा समय से करीब से देखता रहा हूँ और मेरी जानकारी में मोदी ने इन 35 सालों में कभी उपवास नहीं किया। हो सकता है उनके भक्त मोदी के उपवास की कोई नई  सूची लेकर आएं। लेकिन कम से कम 35 सालों में यह उनका बहुप्रचारित पहला उपवास था। जैसाकि मोदी का व्यक्तित्व है उसके अनुरूप इस उपवास की हाईटैक मीडिया तैयारियां की गयीं और इस उपवास पर 50 करोड़ से ज्यादा का खर्चा किया गया। इतने ज्यादा पैसे खर्च करके भारत में किसी ने राजनीतिक उपवास नहीं किया। सदभावना मिशन के रूप में उपवास को मीडिया में प्रचारित किया गया। उपवास में गुजरात की जनता से ज्यादा संख्या में मीडियावालों ने कवरेज करते हुए शिरकत की। मीडिया का इतना शानदार समावेश और प्रभावशाली कवरेज देखने लायक था। मजेदार बात यह हैकि किसी भी मीडिया घराने ने मोदी के सदभावना के दावे को जमीनी स्तर पर जाकर देखने और नए सिरे से तथ्यसंग्रह करके कोई रिपोर्ट फाइल नहीं की। मीडिया घराने पूरी तरह मोदी को कवरेज देने में व्यस्त रहे और अपने प्रचारक रूप पर पर्दा डालने के लिए किसी न किसी पत्रकार या एंकर के जरिए मोदी के बारे में आलोचनात्मक सवाल उठाते रहे, एंकरों की मोदी आलोचना सुनाते रहे। इससे मोदी के प्रचार में इजाफा हुआ। मोदी के प्रचार का जबाब एंकर की राय या पत्रकार विशेष की राय नहीं हो सकती बल्कि गुजरात की जमीनी हकीकत के तथ्यों से उसका जबाव खोजना चाहिए।   
इस समय सारे देश में सदभाव है ,कहीं पर भी साम्प्रदायिक तनाव नहीं है। ऐसे में सदभावना के नाम पर उपवास का अर्थ क्या है ? क्या मोदी ने आडवाणी-सुषमा स्वराज-जेटली टाइप नेताओं को कमजोर करके अपने लिए भाजपा में और ज्यादा शक्ति जुटाने के लिए यह मिशन आरंभ किया है ? क्या यह भाजपा को और भी ज्यादा हिन्दुत्ववादी एजेण्डे पर ठेलने की कोशिश है ? एनडीए के नाम पर जो मोर्चा बना हुआ है उसमें शामिल धर्मनिरपेक्ष दलों को यह आईना दिखाने की कोशिश भी हो सकती है ? मीडिया ने इसे मोदी की भावी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से जोड़ा है और भावी प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें पेश किया है। असल में भावी प्रधानमंत्री के सपने से इस उपवास का कोई संबंध नहीं है। इसका गहरा संबंध भाजपा के पीछे सक्रिय हिन्दुत्व की पुख्ता शक्तियों को और भी आक्रामक ढ़ंग से काम करने और हिन्दुत्व के कार्ड को प्रच्छन्न भाव से इस्तेमाल करने की ओर है।
मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के सदभावना मिशन का हिन्दू-मुस्लिम सदभाव से कोई संबंध नहीं है। उलटे विकास के नाम पर मुस्लिम विरोध को और भी आक्रामक बनाना इसका लक्ष्य है। मोदी ने उपवास खत्म करते हुए साफ कहा कि उनका अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के विभाजन में विश्वास नहीं है। यह बयान संघ परिवार की बुनियादी मुस्लिम विरोधी धारणाओं की ही प्रस्तुति है। मोदी जानते हैं अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक नामक केटेगरी मौजूद हैं। ये विश्व संस्थानों के द्वारा बनाई केटेगरी हैं और उनके आधार पर ही भारत में यह वर्गीकरण किया गया है। मोदी को इनको मानना होगा।सत्ता के नियम और कानूनों का ये केटेगरी अभिन्न हिस्सा हैं। अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक संवैधानिक केटेगरी हैं। इनका पालन करना सभी को अनिवार्य है। मोदी ने इन केटेगरी को अस्वीकार करके अंततः अपने अंदर बैठे लोकतंत्रविरोधी और अल्पसंख्यक विरोधी भावों की ही अभिव्यक्ति की है।
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अनशन समाप्त करतेहुए संदेश दिया है कि वे मुसलमानों से उतनी ही घृणा करते हैं जितनी कोई संघी नेता करता है। वे विकास की ओट में मुस्लिम समाज के प्रति अपनी घृणा को संकेतों में व्यक्त कर गए ,वे सदभावना के नाम पर हिन्दू एकजुटता में लगे रहे।
नभाटा के अनुसार (29सितम्बर 2011)" पिराना गांव की एक दरगाह के सैयद इमाम शाही सैयद मंच पर मोदी से मिलने पहुंचे और उन्हें शॉल तथा टोपी पहनानी चाही, तो मोदी ने शॉल तो ओढ़ ली, मगर टोपी पहनने से इनकार कर दिया। बकौल इमाम मोदी ने उनसे गुजराती में कहा 'मैं टोपी नहीं पहनता।'
इमाम ने वहां तो कुछ नहीं कहा, लेकिन वह मुख्यमंत्री के इस व्यवहार से निराश हुए। बाद में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि 'यह मेरा अपमान नहीं बल्कि सूफी परंपरा और हमारे धर्म गुरुओं का अपमान है।' उन्होंने कहा कि बतौर मुख्यमंत्री अगर वह मंच पर दूसरे तमाम समुदायों की भावनाओं का सम्मान करते हुए उनके निशान धारण कर सकते थे तो फिर हमारे निशान पर एतराज क्यों? "
अब हम मोदी के विकासपुरूष वाले पहलू पर गौर करें और उससे जुड़ी वैचारिक संरचनाओं की गंभीरता से पड़ताल करें।
    संघ परिवार के द्वारा विकासपुरूष के रूप में मोदी को अनशन  पर उतारा गया । इसबार मोदी भक्त 'जयश्री राम' का नारा लगाने की बजाय 'विकास -विकास' ,'सदभावना-सदभावना' का नारा लगा रहे थे। जिस गुजरात में पांच साल पहले तक संघी नेता घृणा से भरे भाषण देते थे अब उसी गुजरात में संघ के नेताओं का विकास और सिर्फ विकास का जाप उस बदलती इमेज की ओर ध्यान खींचता है जिसे सचेत रूप से मीडिया के जरिए निर्मित किया गया है। विकास का नारा ,कारपोरेट नारा है। यह जनता का नारा नहीं है। मोदी ने अपने प्रचार के लिए इसबार सदभावना को चुना है। यह हाइपररीयल राजनीति की विचारधारा में निर्मित नारा है।
      हाइपररीयल राजनीति की केन्द्रीय विशेषता है कि वह आयामकेन्द्रित होती है। कृत्रिम होती है। कृत्रिम स्मृति निर्मित करती है। अन्तर्निहित नियंत्रण को उभारती है। पहले वाली इमेजों को तरल, सरल और नरम बनाती है। तरल,नरम और सरल इमेजों का ताना-बाना नेता की इमेज को भी परिवर्तित करता है और आम लोगों के जेहन से नेता की पुरानी  इमेज को धो देता है। याद करें तरल,नरम और सरल का चरमोत्कर्ष था मोदी का विधायकदल की बैठक में रो पड़ना । भाजपा के साथ अपने रिश्ते को माँ-बेटे के रिश्ते के रूप में परिभाषित करना। माँ-बेटे का रिश्ता तरल,नरम और सरलता की आदर्श मिसाल माना जाता है।और इसबार सदभावना -सदभावना का जाप।
    मुसलमानों को वे तरलभाव से फासीवाद का पाठ पढ़ा रहे हैं। इसबार सदभावना की थीम है,पहले गुजरात के गौरव और अस्मिता की थीम थी। उसके बहाने मोदी ने गुजरात के जनमानस का पुनर्निर्माण किया है। उसकी चित्तवृत्तियों को पुनर्निर्मित किया है। उसमें गुजरात अस्मिता और गौरव के हाइपररीयल आख्यान को अनुकरणात्मक रणनीति के तहत पेश किया है। यह एक तरह का 'माइक्रोवेब डिसकम्युनिकेशन' है। इलैक्ट्रिक संवेदना और भावों का निर्माण है। इसमें आंकड़े चकाचौंध पैदा करने वाले होते हैं। भाषण भ्रमित करने वाले होते हैं।प्रौपेगैण्डा के जरिए 'सिंथेटिक कल्ट' पैदा किया जाता है। बौने लोग बड़े नजर आने लगते हैं। महानायक नजर आने लगते हैं। ये मूलत: वर्चुअल नायक हैं। इनके चारों ओर वर्चुअल चौकसी जारी रहती है। अदृश्य बौध्दिकता का वातावरण बनाया जाता है और प्रचार के लिए,खासकर मीडिया प्रचार के लिए पेशेवर लोगों का इस्तेमाल किया जाता है। हाइपररीयल प्रौपेगैण्डा अहर्निश संप्रेषण और संपर्क है। इसके लिए इंटरनेट,एसएमएस और इलैक्ट्रोनिक मीडिया का व्यापक इस्तेमाल किया जाता है। हाइपररीयल प्रचार रणनीति मूलत: मेगनेटिक निद्राचारी की रणनीति है।
     हाइपररीयल प्रौपेगैण्डा वातावरण बनाता है। यह निर्मित वातावरण है,स्वाभाविक वातावरण नहीं है। इसमें दाखिल होते ही इसकी भाषा बोलने के लिए मजबूर होते हैं। इसके स्पर्श में बंधे रहने के लिए अभिशप्त हैं। एक बार इस वातावरण में दाखिल हो जाने के बाद वही करते हैं जो वातावरण निर्देश देता है। आप बातें नहीं करते, बहस नहीं करते सिर्फ निर्मित वातावरण के निर्देशों के अनुसार काम करते हैं। इस क्रम में धीरे-धीरे आपकी चेतना भी बदलनी शुरू हो जाती है। इसी को चुम्बकीय प्रचार कहते हैं। चुम्बकीय प्रचार अभियान समयकेन्द्रित संपर्क पर आधारित होता है। नियमन करता है और अनुकरण के लिए उदबुद्ध करता है।। चुम्बकीय घेरे में एकबार आ जाने के बाद नियंता के जरिए जो भी संदेश,आदेश मिलते हैं व्यक्ति उनका पालन करता है। व्यक्ति में यह क्षमता नहीं होती कि उसके बाहर चला जाए। व्यक्ति बहुत ही सीमित दायरे में रखकर चीजें देखने लगता है,जिन चीजों से डर लगता है उनसे ध्यान हटा लेता है। वैविध्यपूर्ण संवेदनाओं से ध्यान हटा लेता है। वह एकदम आराम की अवस्था में होता है अथवा भय की।
     हाइपररीयल प्रौपेगैण्डा की भाषिक रणनीति वह नहीं है जो प्रिंटयुग की भाषिक रणनीति है। प्रिंटयुग की भाषा सटीक भाषा के प्रयोग और ठोस यथार्थ पर आधारित होती थी। उसके अनुरूप ही भाषा भी चुनी जाती थी। भाषा और यथार्थ में अंतर नहीं होता। इसके विपरीत हाइपरीयल भाषा ठोस यथार्थ को व्यक्त नहीं करती। बल्कि निर्मित या कृत्रिम यथार्थ को व्यक्त करती है। यह इमेजों की भाषा है। अयथार्थ भाषा है। यह ऐसी भाषा है जिसे आप पकड़ नहीं सकते। ठोस यथार्थ से जोड़ नहीं सकते । यह मूलत: पेशेवर लोगों की भाषा है जिसे धीरे-धीरे साधारणजन भी अपनाने लगते हैं। इस भाषा का वास्तव संदर्भ से कोई संबंध नहीं होता। यह संदर्भरहितभाषा है। प्रिंटयुग की भाषा में संदर्भ खुला होता था। संदर्भरहित होने के कारण ही इसकी अनेकार्थी व्याख्याएं भी होती हैं।     
  साम्प्रदायिकता को नंगा करने वाली भाषा अब मर्मस्पर्शी भाषा नहीं गयी है। वह जड़पूजावाद की शिकार हो गयी है। वह देवत्वभाव की शिकार हो गयी है।  प्रयोगकर्ता यह मानकर चलता है कि साम्प्रदायिकता के बारे में ज्योंही कुछ बोलना शुरू करेंगे लोग आशा ,उम्मीद और भरोसे के साथ जुड़ना पसंद करेंगे। किंतु साइबरयुग में ऐसा नहीं होता, साम्प्रदायिकता विरोध जड़पूजावाद का शिकार हो चुका है और जब कोई विषय और उसकी भाषा अहर्निश पुनरावृत्ति करने लगे तो समझो वह अप्रासंगिक हो गयी है अथवा अप्रासंगिकता की दिशा में जा रही है। इस मामले में हमें साम्प्रदायिक-तत्ववादियों और आतंकवादियों की भाषा के प्रयोगों को गौर से देखें। वे कभी रूढ़िगत भाषा का प्रयोग नहीं करते और अप्रासंगिक सवाल नहीं उठाते। वे भाषा की पुनरावृत्ति नहीं करते। वे लगातार मुद्दे बदलते हैं। हमेशा सामयिक मुद्दे के साथ हमला करते हैं। सामयिक व्यक्ति पर हमला करते हैं। उन्हें प्रासंगिक अथवा सामयिक पसंद है। प्रच्छन्नभाषा अथवा कृत्रिम भाषा पसंद है।
    हाइपररीयल प्रौपेगैण्डा में व्यक्ति के अवचेतन को निशाना बनाया जाता है। यथार्थ की घेराबंदी की जाती है। ऊपर से आपको यही लगता है कि आप इससे परे हैं। चुम्बकीय प्रचार अभियान सहजजात संवेदनाओं को सम्बोधित करता है। उसके जरिए ही व्यक्ति के व्यवहार और आदतों को नियंत्रित किया जाता है। धीरे-धीरे उसे इस सबका अभ्यस्त बना दिया जाता है। इस कार्य में भाषा बहुत बड़ी भूमिका अदा करती है। भाषा के स्तर पर साम्प्रदायिक और फासीवादी ताकतें 'और', 'किंतु','परंतु','मसलन्', 'क्योंकि','इसलिए', 'कब' का वैचारिक सेतु के रूप में इस्तेमाल करती हैं। 'और' आदि का इस्तेमाल अमूमन यथार्थ से ध्यान हटाने के लिए किया जाता है।
    
                   





शनिवार, 13 अगस्त 2011

'आरक्षण' फिल्म और खोखली दलित चिन्ताएं


       आरक्षण फिल्म रिलीज हो गयी। तीन राज्यों उत्तरप्रदेश,पंजाब और आंध्र ने इसके प्रदर्शन पर रोक लगायी हुई है। आंध्र में कांग्रेस ,यू.पी. में बहुजन समाज पार्टी और पंजाब में अकाली-भाजपा की राज्य सरकार है। यह संकेत है कला और राजनीति के अन्तर्विरोध का। सुप्रीम कोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट में मामला विचाराधीन है।  इस फिल्म का सारा हंगामा इसके प्रोमो को देखकर आरंभ हुआ। उसके आधार पर शिकायतें की गयीं। बाद में फिल्म देखकर एससी-एसटी कमीशन ने आपत्तियां व्यक्त कीं। इससे यह तथ्य भी सामने आया कि हमारे राजनेता अभी कलाबोध से कोसों दूर हैं। राजनीतिज्ञों को कलाविद भी होना चाहिए। कलाविहीन राजनेता फासिस्ट होते हैं।

     फिल्म के संदर्भ में संवैधानिक संस्थाओं में किसकी मानें ? मसलन फिल्मों के मामले में सेंसरबोर्ड ,मुख्यमंत्री ,एससी-एसटी कमीशन,अदालत आदि में कौन है निर्धारण करने वाली संस्था ? बॉम्बे हाईकोर्ट ने सेंसरबोर्ड को ही अंतिम फैसला लेने वाली संस्था कहा है। यदि ऐसा है तो फिर आरक्षण पर तीन राज्यों ने रोक क्यों लगायी ? क्या यह अदालत और सेंसरबोर्ड का अपमान है ?
      भारत में फिल्म और राजनीति का अन्तर्विरोध पुराना है। राजनेता किसी भी माध्यम से उतना नहीं डरते जितना फिल्म से डरते हैं। यही वजह है कि वे आए दिन किसी न किसी फिल्म पर प्रतिवाद और हंगामा करते हैं। नीतिगत मामले में पश्चिम की नकल करने वाले राजनेता और राजनीतिकदल कम से कम पश्चिमी देशों से इस मामले में बहुत कुछ सीख सकते हैं। पश्चिम में नेतागण किसी फिल्म पर इस तरह गुलगपाड़ा नहीं मचाते। राजनेता और उनके छुटभैय्ये भूल जाते हैं कि फिल्म से वोट नहीं कटते और न वोटों में इजाफा होता है। फिल्म भी अन्य कलारूपों की तरह संचार का प्रभावशाली कलारूप है। 
हैडलाइन टुडे चैनल पर एससी-एसटी कमीशन के चेयरमैन से आरक्षण फिल्म के संदर्भ में फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप ने पूछा कि आपको किसने शिकायत की ? बिना फिल्म देखे उस व्यक्ति ने कैसे शिकायत की ?आपने उस व्यक्ति को यह क्यों नहीं कहा कि फिल्म जब रिलीज ही नहीं हुई है तो उसके बारे में आपत्तियां कैसी ? बिना फिल्म देखे आपने उसकी आपत्तियों को विचारयोग्य कैसे मान लिया ?  चेयरमैन साहब अंत तक जबाब नहीं दे पाए। कायदे से बिना देखे ,जाने और समझे कलाओं के बारे में सवाल नहीं उठाने चाहिए। यदि सवाल भी उठें तो वे प्रतिबंध की शर्त के साथ नहीं।   
       इन दिनों टीवी के साथ सांठगांठ करके छुटभैय्ये नेता किसी भी मसले पर बाइटस की बमबारी आरंभ कर देते हैं। टीवी चैनल बगैर किसी नीति के चल रहे हैं और हर विवाद पर बहस चला देते हैं और अंत में टीवी कार्यक्रमों को दबाब की राजनीति के अंग के रूप में प्रशासन पर प्रभाव पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। आरक्षण फिल्म के बारे में यही हुआ है। बाइटस की बमबारी को हम आम जनता का प्रतिवाद समझने लगते हैं। इस चक्कर में टीवी वीले अपने को जनता के प्रतिबिम्ब के रूप में पेश करते हैं।यह टीवी वालों का विभ्रम है। टीवी बाइटस विभ्रम पैदा करती है। वह सत्य और तथ्य के बीच में मेनीपुलेशन है। उसे आम जनता की राय,तथ्यपूर्ण राय,सत्य आदि कहना सही नहीं है।
    सेंसरबोर्ड की चेयर पर्सन ने हैडलाइन टुडे से कहा यदि इस फिल्म का नाम आरक्षण न होता तो इतना हंगामा न होता। यह बात एक हद तक सच है।  फिल्ममेकर अनुराग कश्यप ने कहा आरक्षण फिल्म वस्तुतः आरक्षण का पक्ष लेती है। उन्होंने एससी-एसटी कमीशन के अध्यक्ष से सवाल किया फिल्म देखने के बाद क्या महसूस होता है ? क्या यह फिल्म आरक्षण विरोधी संदेश देती है ? इस सवाल का वे सीधे जबाब नहीं दे पाए।
    असल बात यह है फिल्म या कलाएं आनंद देती हैं, घृणा का प्रचार नहीं करतीं । सर्जकों के नजरिए की अभिव्यक्ति हैं। अनुराग कश्यप ने सुझाव दिया है राजनेताओं के लिए फिल्मों का एक फिल्म एप्रिशियेसन का कोर्स पढ़ाया जाना चाहिए । उनका दूसरा सुझाव है  फिल्मों के बहाने हो रही सुपरसेंसरशिप बंद होनी चाहिए और समूचे फिल्म जगत को इसका एकजुट होकर विरोध करना चाहिए। सेंसरबोर्ड ने एस-एसटी अध्यक्ष की आपत्तियों की कानूनी हैसियत जानने के लिए भारत सरकार के महाधिवक्ता की राय मांगी है।
मुश्किल यह है फिल्म कला है तो व्यापार भी है। व्यापार में व्यापारियों में एकजुटता का होना विरल घटना है। बॉम्बे फिल्म उद्योग में कलाकार हैं,कला उत्पादन होता है लेकिन कलाओं के संसार के मालिक पूंजीपति भी हैं जो बाजार की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में लगे हैं।
     फिल्मों को लेकर उठे विवाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यापार की स्वतंत्रता के विवाद हैं। इन मसलों पर प्रत्येक फिल्ममेकर को निजी जंग लड़नी होगी। सामूहिक जंग हो यह बेहतर स्थिति है, लेकिन व्यापार की प्रतिस्पर्धा कभी एकजुट नहीं रखती। वरना जावेद अख्तर को यह बयान देने की क्या जरूरत थी कि जब फना पर पाबंदी लगी तो लोग क्यों नहीं बोले ? जावेद साहब न बोलने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन उनका यह कहना कि फना पर या अन्य किसी फिल्म पर पाबंदी के समय फिल्मजगत क्यों नहीं बोला ? एक लेखक के मुँह से इस तरह के बयान शोभा नहीं देते। फना हो या आरक्षण हो ,कोई भी फिल्म हो ,फिल्ममेकर को सेंसरबोर्ड के अलावा किसी के दबाब में नहीं आना चाहिए। खासकर राजनेताओं के दबाब में आकर फिल्म में अंश निकालने का काम कभी नहीं करना चाहिए। हिन्दी सिनेमा का यह दुर्भाग्य है मणिरत्नम की फिल्म बॉम्बे से लेकर अमिताभ बच्चन की फिल्मों तक यह राजनीतिक दबाब में आकर कट करने का सिलसिला चला आ रहा है। फिल्मों के मालिक एकबार पैसा लगा देने के बाद येन-केन प्रकारेण पैसा निकलना चाहते हैं और कलाकारों पर दबाब पैदा करते है।
    फिल्मवालों को ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए कि कोई उपन्यासकार-कहानीकार किसी भी राजनीतिक दबाब के आगे झुककर अपनी कृति से विवादित अंश नहीं निकालता। इस तरह की दृढ़ता फिल्ममेकरों और फिल्म कलाकारों में क्यों नहीं है ? सलमान रूशदी ने सारी दुनिया में विवाद उठने कस बाबजूद सैटेनिक वर्शेज को वापस नहीं लिया,विवादित अंश नहीं निकाले और वे मजे में सारी धमकियों के बाबजूद जिंदा हैं। फिल्ममेकरों को अपनी कला से प्यार है तो फिल्मों की कटिंग या सुपरसेंसरशिप से बचना होगा। मकबूल फिदा हुसैन देश छोड़कर चले गए लेकिन अपनी कलाकृतियों को लेकर फंडामेंटलिस्टों के सामने घुटने नहीं टेके। जब तक यह दृढ़ता फिल्ममेकर में नहीं आती वह बार -बार मार खाएगा और कट करने के लिए बाध्य किया जाएगा।
आरक्षण फिल्म के खिलाफ समुदाय की राजनीति और कारपोरेट मीडिया फासिज्म वस एक-दूसरे के पूरक की भूमिका अदा की हैं।टीवी ने इसके पक्ष-विपक्ष में बहस आयोजित करके प्रेशर की फासिस्ट राजनीति को हवा दी है। कायदे से सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेकर सेंसरबोर्ड से पास फिल्मों के प्रदर्शन को सुनिश्चित बनाने के लिए राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार को आदेश देना चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस नहीं की जा सकती। जो लोग आरक्षण फिल्म पर बहस करा रहे हैं वे वस्तुतः फासिज्म की सेवा कर रहे हैं। आरक्षण फिल्म के प्रसारण का सवाल अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल है। यह फिल्म आरक्षण का सिद्धान्ततः विरोध नहीं है। इसके बावजूद हमारे देश में आरक्षण का विरोध करने की राजनीतिक स्वतंत्रता है। जो लोग यह सोच रहे हैं कि आरक्षण संवैधानिक है ,तो वे जानते हैं कि इस देश का एक बड़ा राजनीतिक समुदाय आरक्षण का विरोध करता रहा है। वे लोग संसद से लेकर सड़कों तक भाषण करते रहे हैं। कोई अधिकार संवैधानिक है तो उस पर बात नहीं की जा सकती,मतभिन्नता का प्रदर्शन नहीं किया जा सकता,यह मान्यता स्वयं में फासिस्ट मनोवृत्ति को व्यक्त करती है। दुर्भाग्य से हमारे कुछ अच्छे दलित नेताओं ने आरक्षण फिल्म को इसी नजरिए से देखा है ।
आरक्षण फिल्म के खिलाफ जिस तरह की 'समुदाय' की दबाब की राजनीति हो रही है यह भारत के भावी खतरनाक भविष्य का संकेत भी है।हम एक ऐसे युग में हैं जहां कलाविहीन लोग कलाओं पर फैसले सुना रहे हैं।यह वैसे ही है जैसे बीमार की चिकित्सा के लिए डाक्टर को बुलाने की बजाय झाड़-फूंकवाले ढ़ोंगी बाबा से इलाज कराया जाए।
     आरक्षण फिल्म को सेंसरबोर्ड की अनुमति मिल जाने के बाद उसे प्रदर्शन से रोकना अन्याय है। यू.पी.पंजाब , आंध्र आदि राज्य सरकारों ने कभी भी दलित और पिछड़वर्ग के लोगों के सामाजिक सवालों और दलित महापुरूषों पर कोई फिल्म नहीं बनायी। वे कभी कोशिश नहीं करते कि दलितों में अच्छे सिनेमा का प्रचार प्रसार हो,वे कभी दलितों के लिए फिल्म शो आयोजित नहीं करते। वे दलितों में राजनीतिक प्रचार करते हैं कलाओं का प्रचार नहीं करते। दलित विचारकों को यह सवाल दलितनेताओं से पूछना चाहिए कि दलितों में कलाओं के प्रचार-प्रसार के लिए राज्य सरकारों ने क्या किया ? कितने फिल्म क्लब या फिल्म सोसायटी बनायी गयीं? कितनी कला प्रदर्शनियां दलितों के इलाकों में आयोजित की गयीं ? कितने दलितलेखकों की रचनाओं को खरीदकर राज्य सरकारों ने दलितों को मुफ्त में मुहैय्या कराया ? मेरे कहने का आशय है कि राजनेताओं और उनके कलमघिस्सुओं का दलितप्रेम नकली और निहित स्वार्थी है,उसमें दलितों को कला सम्पन्न बनाने की न तो पीड़ा है और न पहलकदमी ही है।
    किसी फिल्ममेकर को घेरना आसान है लेकिन दलितों के लिए नियमित मुफ्त फिल्म प्रदर्शन आयोजित करना,साहित्य गोष्ठियां आयोजित करना,कला प्रदर्शनी आयोजित करना मुश्किल है। किसी टीवी चैनल में दलितों की हिमायत में बोलना जितना जरूरी है उतना ही दलितों के बीच में कलाओं और पापुलरकल्चर को संगठित ढ़ंग से ले जाना भी जरूरी है। यह सवाल भी उठा है कि दलितहितों की रक्षक सरकारों ने दलित महापुरूषों या सामान्य दलित जीवन के विभिन्न प्रसंगों पर केन्द्रित कितनी फिल्में और सीरियल बनाए हैं ? कितनी स्क्रिप्ट लिखीं हैं ? किसने रोका है दलितों को सिनेमा-फिल्मों में आगे आने से ? कम से कम फिल्म निर्माण में तो ये लोग अपना भाग्य आजमा सकते हैं।
   साहित्य में दलित लिख रहे हैं तो लोग उनका लोहा मान रहे हैं। यदि वे फिल्में भी बनाने लगेंगे तो हो सकता है वहां भी लोग लोहा मानने लगें। यह दुख की बात है कि दलितनेताओं को दलितों के कलात्मक उत्थान की कोई चिंता नहीं है। दलितों को कला,फिल्म,सीरियल आदि कौन देगा ? क्या दलित विचारक,एससी-एसटी कमीशन इस ओर कोई ठोस कदम उठाएंगे ? दलितों का मंदिर प्रवेश निषेध अपराध है लेकिन दलितों के बीच में कलाओं का न पहुँचना उससे भी भयानक अपराध है। दलितों को मंदिर तक पहुँचाने की चिंता करने वालों को उनके पास कलाओं को ले जाने का काम करना चाहिए। कलाओं से दलितों की दूरी खत्म की जानी चाहिए। दलितों को भगवान से ज्यादा कलाओं की जरूरत है।


गुरुवार, 11 अगस्त 2011

माओवाद-ममता -महाश्वेता की दोगली राजनीति


    माओवाद और कारपोरेट मीडिया का रोमैंटिक संबंध है। भारतीय बुर्जुआजी और माओवाद में सतह पर वर्गयुद्ध दिखाई देता है लेकिन व्यवहार में माओवादी संगठन और उनकी विचारधारा बुर्जुआजी की सेवा करते हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि माओवादी क्रांतिकारी हैं और क्रांति के बिना नहीं रह सकते , वेमुगालते में हैं। माओवादियों का क्रांति, समाजसुधार और सामाजिक परिवर्तन जैसे कामों से कोई संबंध नहीं है।
    इन दिनों कारपोरेट मीडिया के लिए माओवादी खबर नहीं हैं। माओवादी कहां चले गए ? वे इन दिनों क्या कर रहे हैं ? उनकी गतिविधियों के बारे में विगत विधानसभा चुनावों के पहले खासकर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले इतना फोकस क्यों था ? ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद अचानक माओवाद प्रभावित लालगढ़ की खबरें आनी बंद क्यों हो गयीं? क्या पश्चिम बंगाल के माओवाद प्रभावित इलाकों में अमन-चैन लौट आया है ? ये कुछ सवाल हैं जिन पर गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है।
        ममता सरकार आने के बाद माओवादियों ने लालगढ़ इलाके में अपना वर्चस्व पुनःस्थापित कर लिया है।  लालगढ़ इलाके में माओवादियों के खिलाफ सशस्त्रबलों का ऑपरेशन मूलतः ठंडा कर दिया गया है। ममता सरकार ने 100 के करीब राजनीतिक बंदियों को रिहा किया है उसमें कई माओवादी नेता भी हैं। 13 जुलाई को लालगढ़ इलाके में ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद सभा की है और अनेक लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा की है। लेकिन इन योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए जमीनी स्तर पर कोई काम राज्य सरकार ने आरंभ नहीं किया है।
  दूसरी ओर नए सिरे माओवादियों के संरक्षण में चलने वाली 'पुलिस संत्रास विरोधी कमेटी' ने लालगढ़ और आसपास के इलाकों में अपना दखल कायम कर लिया है। सभी दलों के काम करने पर अघोषित पाबंदी है। यहां तक तृणमूल काग्रेस का विधायक अपने इलाके में घुस नहीं सकता। माकपा के सैंकड़ों लोग इलाका छोड़ने के लिए मजबूर हुए हैं। लालगढ़ के 12 पुलिसथानों के तहत आने वाले इलाकों और पड़ोसी राज्यों से लगने वाले कोरीडोर पर माओवादियों ने फिर से कब्जा जमा लिया है।
मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी ने 13जुलाई 2011 को लालगढ़ में जो रैली की थी उसमें उसने एक गलत मिसाल कायम की। 3नवम्बर 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के जिंदल के कारखाने के उद्घाटन के बाद लौटते समय माओवादियों ने जो लैण्डमाइन धमाका किया था उसके बाद पुलिस ने अपराधियों की धरपकड़ के लिए जो छापे मारे थे उनमें पुलिस से कुछ ज्यादतियां भी हुई थीं  । ममता बनर्जी ने अपनी रैली में उस पुलिस छापे में परेशान किए गए लोगों के लिए आर्थिक सहायता राशि की घोषणा की। सवाल यह है कि मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री के कार काफिले पर लैण्डमाइन से हमला करने वालों की पुलिस छानबीन करेगी या नहीं ? छानबीन के दौरान जिन लोगों से कसकर पूछताछ की गई है या पुलिस ने परेशान किया है तो क्या उसके लिए राज्य सरकार कम्पसेशन देगी ? क्या मुख्यमंत्री के काफिले पर किया गया हमला माओवादी साजिश नहीं थी ? क्या माओवादियों ने लैण्डमाइन विस्फोट के लिए माफी मांगी ? मुख्यमंत्री के काफिले पर लैण्डमाइन बिछाकर किया गया हमला एक निंदनीय अपराध है और उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
   मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उस मीटिंग में एक और महत्वपूर्ण बात कही कि लालगढ़ के लोगों को पुलिस से डरने की जरूरत नहीं है। पुलिस तो उनकी मदद के लिए है। ममता का कम्पशेसन पैकेज और यह घोषणा अपने आपमें माओवादियों के खिलाफ पुलिस और अन्य प्रशासनिक ईकाइयों को संदेश है कि माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन ठंडा करो।
  उल्लेखनीय है जिंदल ग्रुप ने लालगढ़ के सालबनी इलाके में इस्पात का कारखाना लगाने के लिए राज्य वाम मोर्चा सरकार से पांच हजार एकड़ जमीन ली थी। इसमें ज्यादातर बंजर जमीन है। माओवादियों ने इसका विरोध किया था और एक जमाने में ममता बनर्जी ने उनके आंदोलन का समर्थन भी किया था। जिंदल ग्रुप को आदिवासियों की  जमीन दिए जाने पर पश्चिम बंगाल के तमाम रेडीकल कहलाने वाले बुद्धिजीवियों महाश्वेता देवी आदि को भी गंभीर आपत्ति थी। लालगढ़ की समूची समस्या इस प्रकल्प को जमीन दिए जाने के बाद आरंभ हुई और ममता ने विपक्ष में रहते हुए इसे बढ़ावा दिया जिसके कारण अंततः केन्द्र सरकार की मदद से लालगढ़ में राज्य सरकार को 25 हजार से ज्यादा सशस्त्रबल लगाने पड़े।
    मजेदार बात यह है कि ममता बनर्जी सरकार बनने के साथ ही जिंदल के कारखाने के खिलाफ माओवादियों और रेडीकल लेखकों का आंदोलन गायब हो गया है । उलटे ममता सरकार में उद्योगमंत्री पार्थ चटर्जी ने जिंदल ग्रुप के लोगों को बुलाकर बात की है और यह इच्छा व्यक्त की है कि जल्दी ही इस कारखाने के अधूरे कामों को पूरा किया जाए। सवाल यह है  सालबनी इस्पात कारखाने को लेकर ममता सरकार का आज जो नरम रूख है वह विपक्ष में रहते हुए क्यों नहीं था ?
    आज माओवादी चुप हैं ,उनकी चुप्पी संकेत है कि वे चाहते हैं कि कारखाना लगे। इसका अर्थ यह भी है कि वाममोर्चा सरकार का जिंदल के इस्पात कारखाने को लेकर लिया गया फैसला सही था। उस कारखाने को लेकर ममता बनर्जी ,माओवादियों और महाश्वेता देवी लेखकों की आपत्तियां पूर्वाग्रह से प्रेरित थीं। पहले जो अशांति और आतंक के वातावरण की सृष्टि की गई थी वो भी गलत था ।
   सालबनी के जिंदल इस्पात कारखाने को लेकर महश्वेता देवी और अन्य रेडीकल लेखकों का दोगला चरित्र भी सामने आ गया है। वे पहले लालगढ़ में आम लोगों को जिंदल ग्रुप के बारे में भड़का रहे थे,जो बुनियादी रूप से गलत था। अब ये ही लेखक-बुद्धिजीवी ममता सरकार के प्रत्येक कदम का समर्थन कर रहे हैं। चूंकि ममता सरकार जिंदल कारखाने के पक्ष में है तो महाश्वेता देवी और माओवादी भी इसके पक्ष में हैं। सवाल यह है ये ही लोग बुद्धदेव सरकार और वाममोर्चे का लालगढ़-सालबनी में फिर किस बात के लिए विरोध कर रहे थे ?

































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