शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

साम्प्रदायिक असहिष्णुता के खतरे- गिरीश मिश्रा

            इधर लगातार कुछ ऐसी घटनाएं घटी हैं जिनसे जनतंत्र के पक्षधरों का चिंतित होना स्वाभाविक है। अभी हाल में नई दिल्ली स्थित एक टीवी चैनल पर कतिपय लोगों ने इसलिए हमले किए हैं कि उसके द्वारा रिपोर्ट-विशेष का प्रसारण पसंद न था। इसके पूर्व केरल के एक प्रोफेसर पर आक्रमण किया गया क्योंकि उसके द्वारा तैयार प्रश्न पत्र पर आपत्ति थी क्योंकि वह हमलावरों की आस्था को ठेस पहुंचाता था। कुछ साल पहले मैंगलोर में नवयुवकों और नवयुवतियों के साथ-साथ रेस्तरां में जाने पर आपत्ति जताने वालों ने उन्हें मारा-पीटा था। आज से आठ साल पहले अयोध्या स्थित लगभग पांच सौ साल पुरानी मस्जिद को एक संप्रदाय विशेष की तथाकथित भावनाओं का अपमान मानकर ध्वस्त कर दिया गया। ऐसा करने वालों ने इस बात पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया कि इससे देश की एकता और जनतंत्र का कितना नुकसान होगा। इतना ही नहीं बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को धत्ता बताया गया । कहना न होगा कि ये सब घटनाएं एक खतरनाक प्रवृत्ति को इंगित करती हैं। 
सर्वविदित है कि सहनशीलता एक अत्यंत महत्वपूर्ण मानवोचित गुण है। इसका अर्थ है कि हर व्यक्ति को अन्य लोगों के साथ विचार-विभिन्नता के बावजूद सहिष्णु होना चाहिए। अगर हम मानते हैं कि उनके दृष्टिकोणों और विचारों में खामियां हैं तो शालीनता के साथ बतलाएं और बदलाव लाने का विनम्र आग्रह करें। यहां जोर-जबरदस्ती के लिए कोई जगह नहीं हो सकती। धौंस दिखाकर लाया गया बदलाव टिकाऊ नहीं होता और न ही हम दूसरों का हृदय जीत सकते हैं।
यदि शास्त्रार्थ द्वारा हम अपने प्रतिपक्षी को अपने विचारों का कायल बनाने में असमर्थ हैं तो इस बात के लिए तैयार हों कि हम अपने-अपने विचारों पर कायम रहें मगर भविष्य में शास्त्रार्थ का द्वार खुला रखें।
असहनशीलता प्राय: सबसे अधिक धार्मिक मामलों में देखी जाती है क्योंकि वहां तर्क और खुलापन का अभाव होता है। प्रचलित विचारों और मान्यताओं को ईश्वर प्रदत्त कहकर तार्किक कसौटी से परे रखा जाता है। बर्ट्रेड रसेल ने अपनी पुस्तक 'व्हाई आई एम नॉट ए क्रिश्चियन?' में बतलाया है कि हर धर्मावलंबी ईश्वर की सत्ता को स्वीकारने के साथ ही यह मानता है कि उसका धर्म अन्य से श्रेष्ठतर है तभी तो वह अपना धर्म नहीं छोडता और दूसरों को धर्मांतरण करा अपनी जमात में लाना चाहता है।
कमोबेश यही बात गीता में मिलती है जहां श्रीकृष्ण अर्जुन को बतलाते हैं: 'श्रेयान सर्वधर्मो विगुण: परधर्मा त्स्वनुष्ठितात्। सर्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:॥' अपना धर्म बेहतर है और उसी में जीना-मरना चाहिए क्योंकि दूसरों का धर्म भयावह होता है। इस मान्यता से धर्मों के बीच टकराव की संभावना पैदा होती है।
अगर ईश्वर में विश्वास और उसे जगत्-नियंता मानकर चलें तो तर्कशास्त्र, विज्ञान और डार्विन का क्रमिक विकास का सिध्दांत कूडेदान में चले जाएंगे। अगर कोई इस धार्मिक रुढिवादिता को नकारता है तो धर्मांध लोगों के गुस्से का शिकार बनता है क्योंकि उनके लिए तथाकथित आस्था सर्वोपरि है।
इसी प्रकार यदि आप सामाजिक भेदभाव को चुनौती देते हैं तो आप पर ईश्वर और धर्मविरोधी होने का इल्जाम लग सकता है क्योंकि आप इस मान्यता को नकारते हैं कि वर्ण-व्यवस्था ईश्वर-सृजित है और इसे गीता में रेखांकित किया गया है। श्री कृष्ण कहते हैं : 'चातुरर््वण्यं मया सृज्या गुण कर्म विभागश:। तस्य कतरिमपि मां विध्दयकर्तारम व्ययम्॥'
तथाकथित धर्मनिष्ठ यह मानकर चलते हैं
कि गीता सहित अन्य धर्मग्रंथों में व्यक्त
विचार शाश्वत सत्य हैं और वे
कालनिरपेक्ष हैं। उनको चुनौती देने वाला ईश्वरद्रोही होने के कारण दंड का अधिकारी है। यहां प्रश्न उठता है कि क्या तर्कबुध्दि निरर्थक है। कहना न होगा कि यह मान्यता गलत है कि धर्मग्रंथ कालनिरपेक्ष हैं और उनमें वयक्त विचार हर समय समाज की परिस्थितियों को नजरअंदाज कर लागू किए जाने चाहिए। यह मान्यता सही नहीं है। उदाहरण के लिए गीता को लें। उसकी रचना एक युग विशेष में हुई थी जब उत्पादकता का स्तर बहुत निम्न था। अधिशेष उत्पादन नाम मात्र का था जिस कारण युध्दबंदी की अवधारणा नहीं थी तभी तो श्रीकृष्ण गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 37 में अर्जुन से कहते हैं कि यदि तुम जीत गए तो राज्य पाओगे और युध्द में मर गए तो स्वर्ग जाओगे। इस प्रकार लडाई घाटे का सौदा नही है। अगर हम बांग्लादेश की मुक्ति की लडाई को देखें तो पाएंगे कि पाकिस्तानी जनरल नियाजी उसमें न जीते, न मरे बल्कि युध्दबंदी होकर झारखंड के जंगलों में रहने को मजबूर हुए। गीता का काल होता तो उन्हें पकडे ज़ाने पर मार दिया जाता क्योंकि तब पर्याप्त अधिशेष उत्पादन के अभाव में युध्दबंदियों को खिलाना-पिलाना कठिन था और उत्पादन की प्रौद्योगिकी इतनी विकसित न थी कि उनसे गुलाम बतौर काम लिया जाता।
उपर्युक्त बातों को देखते हुए अगर कोई गीता की चिरंतता पर प्रश्न उठाता है तो उसे आस्था के ठेकेदारों का शिकार बनना होगा। क्या एक विवेकशील व्यक्ति को चुप रहना चाहिए? अगर नहीं तो उसे तय करना होगा कि वह सत्य और छद्म सत्य के बीच किसका साथ दे।
छद्म सत्य की बिना पर सांप्रदायिकता का जहर फैलाया जाता है, दंगे कराए जाते हैं, मंदिर-मस्जिद और गिरजाघर ढहाए जाते हैं। अगडी-पिछडी ज़ातियों और सवर्णों एवं दलितों को परस्पर लडाया जाता है।
इस संदर्भ में विवेक का क्या तकाजा है? चुपचाप सहिष्णुता दिखाएं या प्रतिरोध करें? वर्षों पहले अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ क्योंकि एक गुट के लोगों ने वोट बटोरने के लिए आस्था की दुहाई देते हुए कहा कि राम का जन्म वहीं हुआ था जहां बाबरी मस्जिद खडी थी। किसी ने भी तथ्यों और प्रमाणों की फिक्र नहीं की। यह नहीं जांचा कि क्या राम पौराणिक पुरुष नहीं बल्कि वास्तविक व्यक्ति थे। अगर राम सचमुच हुए थे तो क्या वर्तमान अयोध्या उनकी जन्मस्थली थी जबकि कपितय विद्वान मानते हैं कि पौराणिक अयोध्या अफगानिस्तान में थी वहां की हरयू नदी ही सरयू थी। हमारी बहुत सारी पौराणिक गाथाएं यूनानी गाथाओं से मिलती हैं जिससे कई प्रश्न पैदा होते हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि आर्य हमारी पवित्र भारत भूमि की पैदावार हैं जबकि ताजातरीन वैज्ञानिक शोध इसे नहीं मानता। नयन चंदा की पुस्तक 'बाउंड टूगेदर' में इसी के हवाले से मनुष्य की उत्पति अफ्रीका में बतलाई गई है जहां से लाखों वर्षों के क्रम में उसकी संतति झुंडों में जीविका की खोज में सारे विश्व में फैली। इस तरह मानव-मानव में फर्क करना गलत है और अवमानव की अवधारणा मिथ्या। हिटलर ने यहुदियों को अवमानव माना था जैसे हमारे संप्रदायवादी इतर धर्मावलंबियों को अवमानव मानकर प्रताडित करने में कोई संकोच नहीं दिखलाते।
इस स्थिति में कोई विवेकशील व्यक्ति प्रतिरोध करे या मूक बनकर रहे? जहां तक धर्मांधों का प्रश्न है वे सहनशीलता नहीं दिखाते। गुजरात की घटनाएं हों या कंधमाल की या फिर पादरी ग्राहम स्टेंस को बच्चों सहित जलाने की, संकेत इसी ओर है। मध्यकाल में रोमन कैथोलिक चर्च ने गैलीलियो, कोपरनिकस आदि अनेक वैज्ञानिकों को इसलिए सताया कि जिन धारणाओं को वह सत्य कहकर प्रचारित कर रहा था उन्हें उन्होंने गलत बतलाया। हमारे यहां इसका उदाहरण याज्ञवलक्य-गार्गी संवाद के क्रम में मिलता है। जब ऋषि शास्त्रार्थ के क्रम में गार्गी के प्रश्नों के उत्तर देने में लाचार हो गए तब उन्होंने उसे यह कहकर चुप करा दिया कि अगर वह प्रश्नों का क्रम जारी रखेगी तो उसका सिर धड से अलग होकर जमीन पर गिर जाएगा।
एक बडे चिंतक ला रोशे फुको के शब्दों में कहें तो : 'सत्य से दुनिया का उतना भला नहीं होता जितना छद्म सत्य से उसका नुकसान होता है।' अत: छद्म सत्य या झूठे सच के प्रति कोई सहिष्णुता नहीं दिखाते हुए उसका डटकर मुकाबला करना चाहिए। हो सकता है कि इस प्रतिरोध के क्रम में उत्पीडन और यंत्रणा का शिकार होना पडे। रास्ता कठिन मगर विकल्पहीन है।
वर्ष 1994 में छपी लिज नोवेल की पुस्तक 'इंटोलेरेंस : ए जनरल सर्वे' में रेखांकित किया गया है कि सोलहवीं सदी से ही जब मानवतावादियों ने विचार और कर्म की स्वतंत्रता को बढावा देना शुरू किया जिससे वे अपनी धार्मिक सहिष्णुता की भावना की रक्षा कर सकें, असहिष्णुता को मूलत: किसी मत या आचरण की अनुचित भर्त्सना के रूप में परिभाषित किया गया है। पुस्तक में स्पष्ट किया गया है कि उत्पीडित लोगों की वर्तमान अवस्था में कोई भी परिवर्तन नहीं आने देने के उद्देश्य से उत्पीडक़ की हर कोशिश उसकी याददास्त को धुंधला बनाने की होती है। उसको इतना निर्जीव बनाया जाता है कि वह अपनी पहचान और अपनी जडों को भूल जाए। उत्पीडित को इतिहास से निर्वासित कर दिया जाता है। ऐसी स्थिति में अगर वह सहिष्णु बन सब कुछ झेलता जाए तो उसकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हो सकता। प्रसिध्द राजनीतिक शास्त्री हरबर्ट मार्क्यूस ने एक लेख में यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया  है कि सहिष्णुता के उद्देश्य को पाने के लिए अधिकतर प्रचलित नीतियों, रूझानों, दृष्टिकोणों और विचारों तथा कार्य-व्यापारों के प्रति असहनशीलता दिखानी होगी। इसी तरह सहनशीलता और असहनशीलता साथ-साथ चलती है। जो सब तर्कशास्त्र के नियमों और विवेकबुध्दि की कसौटी पर खरा नहीं उतरता उसको नकारना चाहिए और उसके प्रति सहिष्णुता नहीं दिखाई जा सकती। मगर उसकी अभिव्यक्ति तर्कों द्वारा ही होनी चाहिए, हिंसा के रास्ते से नहीं। निरंतर प्रयास से लोगों को तर्क संगत विचारों का कायल निश्चित रूप से बनाया जा सकता है।

 ( गिरीश मिश्रा जाने-माने समाजविज्ञानी )

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

संस्कृत ,उर्दू और हिन्दी काव्य के तुलनात्मक अध्ययन की समस्याएं-3-

           कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के रिफ्रेशर कोर्स में हिस्सा ले रही संध्या सिंह ( सीनियर लेक्चरर,प्रेसीडेंसी कॉलेज,कोलकाता) ने मेरी एक पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए सही कहा है कि हिन्दी के कवि उर्दू कवियों से कम लोकप्रिय नहीं हैं, इस प्रसंग में मैं सिर्फ यही कहना चाहता हूँ कि मासमीडिया खासकर फिल्म माध्यम के जरिए उर्दू कवियों को जो लोकप्रियता मिली है वह अतुलनीय है। उर्दू कवियों का एक बड़ा हिस्सा फिल्म जैसे माध्यम की शक्ति का इस्तेमाल करने में सफल रहा है। जबकि हिन्दी के कवियों ने फिल्म जैसे माध्यम के प्रति उपेक्षाभाव व्यक्त किया है। अपनी कविता को आधुनिक माध्यमों के जरिए प्रचारित-प्रसारित करने की कोशिश ही नहीं की।
     हिन्दी कवि ने परंपरागत प्रेस, किताब, पत्रिका आदि के जरिए ही अभिव्यक्त किया। इससे उसकी अभिव्यक्ति की सीमा तय हो गयी। वह न तो मंच पर गया, न माइक्रोफोन पर गया, न सिनेमा में गया,न वीडियो में गया, न ऑडियो की ही महत्ता को उसने समझा। दूसरी बात यह कि नए संचार के तकनीकी माध्यमों का इस्तेमाल करने वालों के साथ भी उसका संवाद, संपर्क नहीं था। मसलन् फिल्म वालों से कैफी आजमी आदि मित्रता और संपर्क कर सकते हैं, नागार्जुन-केदारनाथ अग्रवाल नहीं, ऐसा क्यों हुआ ? क्योंकि उनके मन में कहीं इन माध्यमों के प्रति उपेक्षा भाव था।
      तुलनात्मक साहित्य के नजरिए से देखें तो संस्कृत,उर्दू और हिन्दी में कुछ चीजें साझा हैं। इन तीनों भाषाओं के साहित्य पर दरबारी संस्कृति और सभ्यता का गहरा असर है। इनमें संस्कृत और उर्दू पर दरबारी संस्कृति का ज्यादा असर है। हिन्दी पर कम असर है। हिन्दी में वीरगाथाकाल और रीतिकाल पर दरबारी संस्कृति का व्यापक असर देखा जा सकता है। इसके अलावा हिन्दी की मध्यकालीन कविता जन-जीवन से जुड़ी कविता है। इसमें राम-कृष्ण के आख्यान की आंधी चली है। राम-कृष्ण के बहाने दरबारी संस्कृति का विकल्प निर्मित किया गया। राजा के सामने सिर झुकाने से बेहतर भगवान के सामने सिर झुकाने का भाव प्रतिवादी भाव है।
    इसके विपरीत संस्कृत काव्य परंपरा में राजा को अपदस्थ नहीं किया जा सका। संस्कृत काव्य का बड़ा हिस्सा राजा केन्द्रित आख्यानों से भरा है। इसमें जनता के भावों और सुख-दुख के लिए कोई जगह नहीं है। इसमें पशु हैं,पक्षी हैं,उपदेश हैं.काव्यमानक हैं और सबसे बड़ी बात यह कि इसमें सामाजिक यथार्थ का प्रतिबिम्बन नहीं है।
    हजारीप्रसाद द्विवेदी ने रेखांकित किया है कि संस्कृत की कविता जीवन से कटी हुई है। जबकि हिन्दी कविता सामाजिक जीवन से जुड़ी है। संस्कृत कविता जन्म से नियमों से बंधी रही है। काव्य नियमों का यथोचित निर्वाह करना कवि का लक्ष्य रहा है। इसके विपरीत हिन्दी के जनकवियों ने कभी भी काव्य नियमों का पालन नहीं किया। काव्य निर्माण के उपकरणों को उन्होंने जन प्रचलित काव्य रूपों से ग्रहण किया।
      काव्य नियमों के प्रति हिन्दी के जनकवियों का उपेक्षाभाव वह प्रस्थान बिंदु है जहां से हमें प्रतिवादी काव्य के आरंभ को देखना चाहिए। नियमों की उपेक्षा से पैदा हुआ प्रतिवादी काव्यरूप अपने साथ राजतंत्र का विकल्प भी लेकर आया। रामाश्रयी-कृष्णाश्रयी, सगुण- निर्गुण काव्य परंपरा से उसने अंतर्वस्तु ली। इन कवियों ने क्या लिखा और किस नजरिए से लिखा इसका उनकी मंशा से गहरा संबंध है।  
     मूल सवाल है मध्यकालीन हिन्दी कवियों की मंशा का। कवि की मंशा का कविता के उपकरणों और काव्य क्षेत्र चयन के साथ गहरा संबंध है। मध्यकालीन जनकवियों ने राम-कृष्ण,सगुण-निर्गुण आदि व्यापक अभिव्यक्ति का क्षेत्र चुना। उसमें धारावाहिकता बनाए रखी।यह मूलतः उनके दरबारी संस्कृति के प्रति विरोधभाव की अभिव्यक्ति है। इस प्रतिवाद के केन्द्र में काव्य के रूप और अंतर्वस्तु दोनों हैं।
    कवि की मंशा लक्ष्यीभूत श्रोता की प्रकृति के साथ नाभिनालबद्ध होती है। संस्कृत के कवि का लक्ष्यीभूत श्रोता और हिन्दी के जनकवियों का लक्ष्यीभूत श्रोता भिन्न है। यह भिन्न ही नहीं बल्कि इनके हितों में गहरा अंतर्विरोध है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो संस्कृत-हिन्दी कवियों के काव्यजगत में गहरी विचारधारात्मक टकराहट नजर आएगी। संस्कृत -हिन्दी के कवियों के सामाजिक सरोकारों में गहरा अंतर नजर आएगा। यही वजह है कि हिन्दी के मध्यकालीन जनकवि संस्कृत काव्य परंपरा से अपने को पूरी तरह अलग करते हैं।
    संस्कृत कवि दरबार के लिए लिखता है। हिन्दी का जनकवि भक्त के लिए लिखता है, सबके लिए लिखता है। संस्कृत कवि अपनी निजता को सार्वजनिक नहीं करता इसके विपरीत हिन्दी कवि अपनी निजता को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करता है। संस्कृत कवि अपने निजी जीवन के दुखों को छिपाता है,हिन्दी कवि उन्हें सार्वजनिक करता है। व्यक्तिगत को सामाजिक बनाता है और व्यक्तिगत और सार्वजनिक के सामंतीभेद को नष्ट करते हुए व्यक्तिगत को सार्वजनिक बनाता है। यहां से वह सचेत रूप से आधुनिकभावबोध के लक्षणों की नींव ड़ालता है।
      उल्लेखनीय है मध्यकालीन कवियों ने अपने सारे उपकरण व्यापारिक पूंजीवाद से लिए हैं। ये कवि नई उदीयमान सामाजिक शक्तियों कारीगर-दस्तकार और उदीयमान व्यापारीवर्ग के भावबोध से संसार को देखते हैं। उपेक्षित शूद्रों और स्त्रियों को समानता और अभिव्यक्ति का मंच देते हैं। उनके यहां सब कुछ पर्सनल है,व्यक्तिगत है। भक्ति का रूप भी व्यक्तिगत है। व्यक्तिगत सत्ता का ऐसा महाराग इसके पहले कभी नहीं सुना गया। व्यक्तिगत भावों की अभिव्यक्ति के बहाने राजतंत्र की समूची सत्ता और उसके सांस्कृतिकबोध और मूल्य संरचना को सर्जनात्मक चुनौती दी गयी।        

     

बुधवार, 28 जुलाई 2010

कम्प्यूटर क्रांति में हाशिए पर स्त्री

   विगत पच्चीस वर्षों में जिस तरह कम्प्यूटर नेटवर्क का प्रसार हुआ है  उसके कारण कम्प्यूटर और स्त्री के अन्तस्संबंध से जुड़े सवालों ध्यान गया है। इस प्रसंग में मुख्य सवाल यह है कि कम्प्यूटर साइंस और नेटवर्किंग में औरतों की हिस्सेदारी का स्वरूप क्या है ? सामाजिक संपर्क में स्त्री की क्या भूमिका है ? पोर्नोग्राफी में स्त्री की क्या भूमिका है ? 
    सामान्यत: कम्प्यूटर साइंस के नेटवर्क से औरतों का अच्छा-खासा हिस्सा जुड़ा है। किन्तु शिक्षा के क्षेत्र में अभी भी कम लड़कियां कम्प्यूटर साइंस पढ़ रही हैं। कम्प्यूटर नेटवर्क के कामकाज में लगी औरतों को आए दिन अनेक किस्म के शारीरिक उत्पीड़न और परेशानियों से गुजरना पड़ता है। खासकर सेक्सुअल उत्पीडन उसमें प्रमुख है। 
     इंटरनेट ने सामाजिक संपर्क और संबंध की एक नई दुनिया का उद्धाटन किया है। इससे कम्प्यूटिंग में भी मूलगामी बदलाव पैदा किया है , शिक्षा और सामाजिक संपर्क में मूलगामी परिवर्तनों की शुरूआत की है।
   अमेरिका में जहां सूचना क्रांति का श्रीगणेश हुआ,वहां पर कम्प्यूटर साइंस पढ़ने वालों में लड़कियों की संख्या नगण्य है। जेनेट कॉटरेल के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में 97 फीसदी फैकल्टी सदस्य (कम्प्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग) मर्द हैं। दो-तिहाई विभाग ऐसे हैं जहां एक भी औरत काम नहीं करती। अमेरिकी समाज में इस तरह के आंकड़े चौंकाने वाली बात नहीं है। बल्कि यह स्वाभाविक लगता है खासकर बच्चों में खिलौनों के प्रयोग के पीछे छिपे लिंगभेद को देखें तो बात समझ में आ जाएगी।
     अमेरिका में लड़कों में गणित के खिलौने और लड़कियों में बारवी डॉल का चलन है। इसके कारण बच्चों की मानसिकता बनाने में बड़े पैमाने पर मदद मिली है। वीडियोगेम और शिक्षा संबंधी सॉफ्टवेयर में आक्रामक खिलौनों जैसे बंदूक, मशीनगन, सैटेलाइट,मिसाइल,स्पेशशिप आदि को लड़कियां पसंद नहीं करतीं। 
      लड़कियां कम्प्यूटर के एयरकंडिशंन लॉकरनुमा बंद कमरे का माहौल देखकर भी इस पेशे को नहीं अपनातीं। क्योंकि लॉकरनुमा बंद कमरा मूलत: मर्दवादी प्रकृति को व्यक्त करता है। यही वजह है कि कम्प्यूटर साइंस के माहौल को औरतों के स्वागतयोग्य बनाने,अनुकूल बनाने, स्त्री के लिए शारीरिक तौर पर सुरक्षित बनाने, कम्प्यूटर वाले कमरे में या स्क्रीन पर पोर्न के दृश्यों को न लगाने,औरतों के प्रशिक्षण की अलग से व्यवस्था करने पर खास तौर पर ध्यान देने की जरूरत है।
      कम्प्यूटराइज संपर्क खासकर चित्रमय संपर्क बेहद खतरनाक है। इसका कभी भी दुरूपयोग हो सकता है। शिक्षा के मकसद से किया गया संपर्क जिसमें पाठ की भूमिका हो वह उपयोगी है। किन्तु चित्र के माध्यम से किया गया संपर्क कभी भी खतरा पैदा कर सकता है। 
      कम्प्यूटर और इंटरनेट में पोर्न का इस्तेमाल नैतिक रूप से सही है या गलत है,यह सवाल अभी तक हल नहीं हो पाया है। पोर्न का अबाध प्रसारण जारी है। यह जानते हुए भी कि पोर्न सामाजिक तौर पर और खासकर स्त्री के लिए घातक है,सारी दुनिया के देश इसका प्रसारण कर रहे हैं। पोर्न क्या है ? क्या पोर्न समाज के लिए घातक है ? पोर्न के संदर्भ में अभिव्यक्ति की आजादी और सेंसरशिप का अर्थ क्या है ? कम्प्यूटर पोर्नोग्राफी,कामुक उत्पीडन, कामुक हिंसाचार के बीच किस तरह का संबंध होता है ? इत्यादि सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं।
      औरतों के संदर्भ में इतनी परेशानियों के बावजूद औरतें बड़ी तादाद में कम्प्यूटर और इंटरनेट का प्रयोग कर रही हैं। क्योंकि यह तकनीक मूलत: औरतों के अनुकूल माहौल बनाती है। आज औरतों के लिए सबसे अच्छे संसाधन नेट पर उपलब्ध हैं। औरतों की समस्याओं पर काम करने वाले संगठनों की सामग्री और संपर्क उपलब्ध हैं। इसके कारण महिला सशक्तिकरण की दिशा में समाज आगे गया है। जरूरत इस बात की है कि औरतों को ज्यादा से ज्यादा नेट का उपयोग करना सिखाया जाए। यह सच है कि अभी भी नेट का पूरा माहौल मर्दवादी है,किन्तु यह स्थिति बदलनी चाहिए,इसके लिए स्त्रियों को आगे आना होगा, समाज के बाकी हिस्सों को उनमें साहस का संचार करना होगा।

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...