सोमवार, 30 अप्रैल 2012

हिटलर की पराजय का महाकाव्य



आज के दिन सोवियत कम्युनिस्टों ,लाल सेना और सोवियत जनता की कुर्बानियों के कारण हिटलर को पराजित करने सफलता मिली। हिटलर और उसकी बर्बर सेना को परास्त करके कम्युनिस्टों ने दुनिया की महान सेवा की । आज के दिन का संदेश है कि कम्युनिस्ट विश्व मानवता के सच्चे सेवक और संरक्षक हैं।
बर्लिन आपरेशन के दौरान सोवियत सेनाओं ने शत्रु की 70 इंफेंट्री 12टैंक और 11मोटराइज्ड डिविजनों को नष्ट किया। 16 अप्रैल से 7 मई के बीच शत्रु के 4लाख 80 हजार सैनिकों और अफसरों को युद्धबंदी बनाया और डेढ़ हजार से अधिक टैंकों ,साढ़े 4 हजार विमानों और कोई 11हजार तोपों और मॉर्टरों पर कब्जा किया।
सोवियत लोगों को भी फासिस्ट जर्मनी पर इस अंतिम विजय की भारी कीमत चुकानी पड़ी। 18 अप्रैल से 8 मई 1945 के बीच दूसरे बेलोरूसी मोर्चों और पहले उक्रइनी मोर्चे पर 3लाख आदमी हताहत हुए। इसके विपरीत आंग्ल-अमरीकी फौजों ने पश्चिमी यूरोप में 1945 की सारी अवधि में केवल 2लाख 60 हजार आदमी गंवाये थे।
लालसेना के बर्लिन आपरेशन का सबसे मुख्य परिणाम था फासिस्ट जर्मनी का बिनाशर्त आत्मसमर्पण और यूरोप से युद्ध का अंत।बर्लिन आपरेशन की सफल परिणति का अर्थ था हिटलरी "नयी व्यवस्था" का विध्वंस,गुलाम बनाए गए यूरोप के सभी राष्ट्रों की मुक्ति और नाजीवाद,फासीवाद से विश्व सभ्यता का उद्धार।
आमतौर पर सेनाएं दुश्मन के शहरों पर कब्जे करती हैं, लूटमार करती हैं, औरतों के साथ बलात्कार करती हैं और विध्वंसलीला करती हैं। लेकिन बर्लिन को हिटलर से आजाद कराने के बाद सोवियत सेनाओं ने एक नयी मिसाल कायम की। उस समय बर्लिन शहर पूरी तरह तबाह हो गया था, आम बर्लिनवासी हिटलर के जुल्मोसितम से पूरी तरह बर्बाद हो चुका था, लोगों के पास खाने के लिए कुछ नहीं था,दवाएं नहीं थीं,ऐसी अवस्था में सोवियत सैनिकों ने अपना राशन-पानी बर्लिन की आम जनता के बीच में बांटकर खाया। इसके अलावा बर्लिन शहर को संवारने और संभालने में मदद की।
सोवियत सरकार ने बर्लिनवासियों को 96हजार टन अनाज,60हजार टन आलू,कोई 50 हजार मवेशी, और बड़ी मात्रा में चीनी,बसा और अन्य खाद्य सामग्रियां मुहैय्या करायी गयीं। महामारियों की रोकथाम के लिए तात्कालिक कदम उठाए गए और 96 अस्पताल (जिनमें 4 शिशु अस्पताल) ,10 जच्चाघर,146 दवाईयों की दुकानें और 6 प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र खोले गए। सोवियत सैनिकों ने किसी भी नागरिक के साथ दुर्व्यवहार नहीं किया।
इस तरह सोवियत सेना ने सैन्य व्यवहार की आदर्श मिसाल कायम की। सोवियत सेना के इस व्यवहार की रोशनी में अमेरिका और नाटो सेनाओं के हाल ही में इराक और अफगानिस्तान में किए गए दुराचरण और अत्याचारों को देखें तो समाजवादी सेना और पूंजीवादी सेना के आचरण के अंतर को आसानी से समझा जा सकता है।
सोवियत सेनाओं के हिटलर को परास्त करके सारी दुनिया को अचम्भित ही नहीं किया साम्राज्याद की समूची मंशा को ही ध्वस्त कर दिया। कुछ तथ्य हमें हमेशा ध्यान रखने चाहिए।द्वितीय विश्व युद्ध 2हजार194 दिन यानी 6 वर्ष चला। उसकी चपेट में 61 राष्ट्र आए। जिनकी कुल आबादी 1 अरब 70 करोड़ थी। यानी विश्व की आबादी का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा।  सामरिक कार्रवाइयां यूरोप,एशिया तथा अफ्रीका के 40 देशों के भूक्षेत्र में और अटलांटिक,उत्तरी,प्रशांत तथा हिंद महासागरों के व्यापक भागों में हुईं। कुल मिलाकर 11 करोड़ से अधिक लोगों को सेनाओं में भरती किया गया।इस दौरान बेशुमार सैन्य सामग्री का उत्पादन किया गया। 1सितम्बर 1939 से लेकर 1945 तक की अवधि के दौरान अकेले हिटलर विरोधी गठबंधन के सदस्य-देशों में 5 लाख 88हजार विमानों( इनमें से 4 लाख 25 हजार नागरिक विमान थे) , 2 लाख 36 हजार टैंकों, 14 लाख 76 हजार तोपों तथा 6 लाख 16 हजार मॉर्टरों का उत्पादन किया गया।इसी अवधि में जर्मनी ने कोई 1 लाख 9 हजार विमानों ,46 हजार टैंकों और एसॉल्ट गनों, 4 लाख 34 हजार से अधिक तोपों तथा मॉर्टरों तथा अन्य शस्त्रास्त्र का उत्पादन किया।
विश्वयुद्ध में सन् 1938 के दाम के अनुसार 260 अरब डालर की संपत्ति का नुकसान हुआ। 5करोड़ से ज्यादा लोग मारे गए।सबसे ज्यादा क्षति सोवियत संघ की हुई। सोवियत संघ के 2 करोड़ से ज्यादा नागरिक मारे गए।एक हजार नगर और 70 हजार गांव नष्ट हुए। 32 हजार औद्योगिक उत्पादन केन्द्र नष्ट हुए। पोलैंड के 60 लाख,यूगोस्लाविया के 17 लाख, अमेरिका के 4 लाख,ब्रिटेन के 3 लाख 70 हजार,जर्मनी के 1 करोड़ 36 लाख आदमी मारे गए या बंदी बनाए गए। इसके अलावा यूरोप के सहयोगी राष्ट्रों के 16 लाख से अधिक लोग मारे गए ।

रविवार, 29 अप्रैल 2012

बंगारू लक्ष्मण की सजा से उठे सवाल



        भाजपा के पूर्व अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को सीबीआई की अदालत ने हथियार खरीद फेक सौदे में घूस लेने के आरोप में 4साल के सश्रम कारावास की 28 अप्रैल 2012 को सजा सुनाकर कई महत्वपूर्ण परिवर्तनों के संकेत दिए हैं। पहली बात यह कि इस मामले ने न्याय का आधार बदल दिया है। हथियारों की वास्तविक खरीद में घूसखोरी में आज तक कोई पकड़ा नहीं गया और न किसी को सजा हुई है ,लेकिन हथियार खरीद के फेक मामले में घूसखोरी पकड़ी गयी और सजा भी हो गई।
     बोफोर्स में दलाली और घूस दोनों दी गयीं,25साल से ज्यादा समय यह मुकदमा देश-विदेश के अनेक अदालतों में खाक छान चुका है ,और अंत में दोषी लोग अभी तक सीना फुलाए घूम रहे हैं। इसका अर्थ यह है न्यायालयों में सच के लिए न्याय की संभावनाएं घट गयी हैं।
     बोफोर्स के मामले में सभी प्रामाणिक सबूत होने के बावजूद दोषी व्यक्ति को सारी दुनिया की पुलिस नहीं पकड़ पायी। यहां तक कि सीबीआई स्वयं यह मामला हार गयी,आयरनी देखिए बंगारू के मामले में सीबीआई अदालत में जजमेंट आता है और बंगारू दोषी पाए जाते हैं।
       सवाल उठता है कि बंगारू लक्ष्मण ने यदि सच में किसी हथियार बनाने वाली कंपनी के लिए घूस ली होती और हथियारों की सप्लाई हुई होती तो क्या वे दोषी पाए जाते ? चूंकि बंगारू के मौजूदा मामले में कोई भी हथियार निर्माता कंपनी शामिल नहीं है तो न्याय अपना सीना फुलाए खड़ा है लेकिन यही भारत के न्यायालय बोफोर्स मामले में निकम्मे साबित हो चुके हैं। यूनियन कारबाइड के मामले में पीडितों को न्याय दिलाने में असफल साबित हुए हैं।
       न्याय भी वर्गीय होता है। बंगारू लक्ष्मण की निजी तौर पर कोई सामाजिक हैसियत नहीं है,वे एक मध्यवर्गीय नेता से ज्यादा हैसियत नहीं रखते।इसलिए आसानी से दोषी सिद्ध कर दिए गए। यदि वे भी किसी बहुराष्ट्रीय हथियार कंपनी के दलाल होते तो संभवतः कुछ नहीं होता। उल्लेखनीय है बिना अपराधी पकड़े बोफोर्स के मामले को सर्वोच्च न्यायालय ने हमेशा के लिए दफन कर दिया है। इसे कहते हैं असली और नकली हथियार निर्माता कंपनी की ताकत का अंतर।
    विचारणीय सवाल यह है कि वास्तव हथियार निर्माता कंपनी के अपराध के मामले में न्यायालय असहाय क्यों महसूस करते हैं ? कांग्रेस और सीबीआई जितना बंगारू लक्ष्मण को सजा मिलने पर हंगामा कर रहे हैं , ये दोनों ही बोफोर्स के मामले में दोषी को पकडवाने में सफल क्यों नहीं हुए ? इस असफलता के लिए उन्होंने देश की जनता से माफी क्यों नहीं मांगी ?
   ध्यान रहे बोफोर्स दलालीकांड सच्चाई है । और बंगारू घूसकांड निर्मित सच्चाई है। निर्मित सच को सच मानकर विभ्रम पैदा किया जा सकता है। लेकिन यथार्थ में नहीं बदला जा सकता। यथार्थ यह है कि बहुराष्ट्रीय हथियार निर्माता कंपनियों के सामने हमारे जज, वकील और तर्कशास्त्र बौने साबित हुए हैं।
      बंगारू लक्ष्मण को सजा मिली, वे ऊपरी अदालत में जाएंगे और होसकता है सजा बहाल रहे, हो सकता वे बरी हो जाएं,भविष्य के बारे में कोई कुछ नहीं कह सकता। लेकिन एक सवाल बार-बार मन में उठ रहा है कि तहलका की टीम आज तक किसी सच्ची हथियार निर्माता कंपनी की दलाली की पोल खोलने में सफल क्यों नहीं हो पायी ? किसी वास्तव घूसखोर को क्यों नहीं पकड़ पायी ?
    सारा देश जानता है कि भारत सरकार विगत 5 सालों में अब तक 60हजार करोड रूपये से ज्यादा के हथियार खरीद चुकी है। इनकी खरीद में 3 से 10 फीसदी कमीशन भी लोकल एजेंट को मिलता है। कौन किस कंपनी का एजेंट है यह भी सब जानते हैं। यह भी जानते हैं कि कमीशनखोरी भारत के कानून में अपराध है लेकिन विदेशी कंपनियों के विदेशी कानून में यह पारिश्रमिक है। कहने का अर्थ यह है कि हथियारों की खरीद के सौदों में तहलका आदि कोई भी संस्था या मीडिया  ग्रुप ने कभी स्टिंग ऑपरेशन क्यों नहीं किया ? क्यों वे आजतक असली हथियार कंपनी के सौदे में दी गयी घूसखोरी के किसी भी घूसखोर को नहीं पकड़ पाए ?
    दूसरा सवाल यह है कि कल्पित स्टोरी,कल्पित कंपनी, असली घूस और असली घूसघोर के आधार पर क्या हम हथियारों की खरीद-फरोख्त में चल रही व्यापक घूसखोरी को नंगा करके जागरण पैदा कर रहे हैं या घूसखोरी को वैध बनाने का काम कर रहे हैं ?  बंगारू टाइप ऑपरेशन वास्तव में घूसखोरी को वैधता प्रदान करते हैं, नॉर्मल बनाते हैं। बंगारू की सजा या अपराध को मीडिया जितना बताएगा,घूसखोरी-कमीशनखोरी को और भी वैधता प्राप्त होगी।
भाजपा के पूर्व अध्यक्ष बंगारु लक्ष्मण को दोषी करार देते हुए सीबीआई अदालत ने कहा, हो सकता है कि न्यूज पोर्टेल का स्टिंग करने का तरीका गलत हो लेकिन उद्देश्य गलत नहीं था। ऐसे में स्टिंग की सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है। न्यायाधीश ने स्टिंग की सच्चाई को माना है। लेकिन क्या स्टिंग ऑपरेशन पत्रकारिता है ?एक वर्ग मानता है कि यह पत्रकारिता है,खोजी पत्रकारिता है। हम यह मानते हैं कि स्टिंग ऑपरेशन जासूसी है, इसे पत्रकारिता नहीं कह सकते। यह मूलतः पीत पत्रकारिता के उपकरणों से बना विधा रूप है। स्टिंग ऑपरेशन और जासूसी के आधार पर पत्रकारिता करने के कारण रूपक मडरॉक और उनके बेटे को ब्रिटेन और अमेरिका में तमाम किस्म के आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। पत्रकारिता में लक्ष्य जितना पवित्र और महत्वपूर्ण है उसके तरीके भी उतने ही पवित्र और महत्वपूर्ण माने गए हैं। कम से कम तहलका का स्टिंग ऑपरेशन इस आधार पर खरा नहीं उतरता। वह स्टिंग ऑपरेशन है पत्रकारिता नहीं है।
   इसके बावजूद कायदे से भाजपा को बंगारू लक्ष्मण को लेकर अभी तक व्यक्त नजरिए के लिए तहलका की खोजी टीम से सार्वजनिक तौर पर माफी मांगनी चाहिए,क्योंकि भाजपा समर्थित मीडियातंत्र और नेताओं ने तहलका टीम के चरित्र और उत्पीड़न में कोई कमी नहीं की ।
     बंगारू के खिलाफ आया फैसला मीडिया,खासकर खोजी पत्रकारों की बहुत बड़ी जीत है।आज तक मीडिया और स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर  किसी बड़े नेता को सजा नहीं हुई है ,यह पहली घटना है और यह खोजी पत्रकारों की बड़ी विजय है।यह जीत ऐसे समय में आई है जब पत्रकारों की साख पर बार बार अंगुली उठाई जा रही थी।इस फैसले से ईमानदार पत्रकारों को जोखिम उठाने की प्रेरणा मिलेगी।
चिंता की बात यह है कि भाजपा और संघ परिवार  अभी भी बंगारू लक्ष्मण की घूसखोरी को अपराध नहीं मान रहा है,यही वजह है कि उनकी भाजपा की सदस्यता अभी तक खत्म नहीं की गयी है। बंगारू ने अध्यक्ष के नाते घूस ली थी ,व्यक्तिगत रूप में नहीं । वे उस समय भाजपा अध्यक्ष थे।अतः यह उनका व्यक्तिगत मामला नहीं है।
उल्लेखनीय है यह मामला 2001 में तहलकाटीम ने उन्हें 1लाख रूपये घूस लेते हुए कैमरे में पकड़ा था।वे लंदन की एक फर्म से घूस लेते स्टिंग ऑपरेशन में पकड़े गए थे।इस पूरे प्रकरण में तहलका के अनुसार- "बंगारू लक्ष्मण अकेले नहीं हैं. समता पार्टी की तत्कालीन अध्यक्षा जया जेटली भी बिल्कुल उन्हीं परिस्थितियों में रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिज के सरकारी आवास में घूस लेते हुए कैमरे की जद में आईं, उनकी पार्टी के कोषाध्यक्ष आरके जैन भी पैसा लेते हुए पकड़े गए. घूस का दलदल सिर्फ राजनीति महकमे तक ही सीमित नहीं था. सेना और नौकरशाही के तमाम आला अधिकारी भी पैसे लेते हुए नजर आए. लेफ्टिनेंट जनरल मंजीत सिंह अहलूवालिया, मेजर जनरल पीएसके चौधरी, मेजर जनरल मुर्गई, ब्रिगेडियर अनिल सहगल उनमें से कुछेक नाम हैं. रक्षा मंत्रालय के दूसरे सबसे बड़े अधिकारी आईएएस एलएम मेहता भी उसी सूची में हैं।"
तहलका टीम के अनुसार- "स‌रकार ने हम पर सीधा हमला तो नहीं किया लेकिन हमें कानूनी कार्रवाई के एक ऎसे जाल में उलझा दिया जिससे हमारा सांस लेना मुश्किल हो जाए.तहलका में पैसा निवेश करने वाले शंकर शर्मा को बगैर कसूर जेल में डाल दिया गया और कानूनी कार्रवाई की आड़ में उनका धंधा चौपट करने की हर मुमकिन कोशिश की गई. हमने कई बार खुद से पूछा कि तहलका और उसके अंजाम को कौन सी चीज खास बनाती है. जवाब बहुत सीधा है- शायद इसका असाधारण साहस. भ्रष्टाचार को इस कदर निडरता से उजागर करने की कोशिश ने ही शायद तहलका को तहलका जैसा बना दिया.तहलका लोगों के जेहन में रच बस गया।"


अमेरिकी पूंजी ,अशोक वाजपेयी और आलोचना का अवमूल्यन



            भारत में जब से फोर्ड फाउंडेशन जैसी अमेरिकी संस्थाओं का कला,साहित्य,संस्कृति,सिक्षा आदि में पैसा आना आरंभ हुआ है उसके बाद तेजी से आलोचना और अकादमिक अवमूल्यन आरंभ हुआ है। हिन्दी आलोचना और साहित्य में अमेरिकी हस्तक्षेप कोई नयी चीज नहीं है। कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के हिन्दी में आगमन के साथ यह सिलसिला 1951-52 के आसपास से आरंभ होता है।भारत भवन में फोर्ड फाउंडेशन के सहयोग से अशोक वाजपेयी एंड कंपनी का वैभव नई बुलंदियों को प्राप्त करता है।
   कांग्रेस का और खासकर स्व.अर्जुनसिंह का अक्षम्य सांस्कृतिक अपराध यह है कि इन लोगों ने भारत के शिक्षा संस्थानों और संस्कृति केन्द्रों के द्वार अमेरिकी संस्थाओं और फाउण्डेशनों के लिए खोल दिए।आज संस्कृति और शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में अमेरिकी दानदाता संस्थाओं की पूंजी का कृषि से लेकर संस्कृति तक व्यापक नेटवर्क फैला हुआ है। खासकर कृषि विश्वविद्यालयों से लेकर स्पीकमैके जैसी संस्थाओं, अकादमिक फैलोशिप से लेकर लाइब्रेरी तक यह नेटवर्क काम कर रहा है। अमेरिकी दानदाता संस्थाओं की व्यापक भूमिका को विस्तार देने में स्वयंसेवी संस्थाओं की भी बड़ी भूमिका रही है। इन संस्थाओं में अमेरिकी दौलत का खेल कई हजार करोड़ रूपये सालाना तक फैला हुआ है।शोध संस्थानों से लेकर विश्वविद्यालयों तक इस पैसे की नेटवर्किंग काम करती रही है।
      अमेरिकी बहुराष्ट्रीय सांस्कृतिकनिगमों की दान राशि के आने के बाद से ज्ञान,विज्ञान, कृषि,साहित्य,संस्कृति आदि के क्षेत्र में अवमूल्यन की प्रक्रिया ने तेज गति पकड़ी है। संयोग की बात है कि कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के साथ जुड़ने में जयप्रकाश नारायण,अज्ञेय,रामवृक्ष बेनीपुरी,पीलू मोदी आदि की भूमिका के बारे में कभी बहस ही नहीं हुई। इसी तरह एक जमाने में भारत भवन और फोर्ड फाउंडेशन के अंन्तस्संबंधों को लेकर थोड़ी बहुत बहस भी हुई ,लेकिन इस संबंध का हिन्दी आलोचना और साहित्य पर क्या असर हो सकता है इसकी ओर कभी ध्यान ही नहीं गया। प्रगतिशील लेखकों को राजनीतिरहित लेखक ते रूप में पेश करने में अशोक वाजपेयी के जमाने में भारत भवन से छपने वाली पत्रिकाओं की बड़ी भूमिका रही है और इस काम को प्रोत्साहन देने में प्रगतिशील लेखक संघ की पूरी लेखकमंडली का सक्रिय सहयोग रहा है।नामवर सिंह जैसे बड़े आलोचक ने भी अमेरिकी पूंजी के सांस्कृतिक प्रभाव को लेकर कभी एक शब्द भी नहीं बोला। यह आश्चर्य की बात है कि वे भारतभवन के सभी कार्यक्रमों में पूरी टीम के साथ हमेशा उपलब्ध रहते थे।
    साहित्य में अमेरिकी प्रभाव का सबसे प्रभावशाली मंत्र है साहित्य और साहित्यकार को राजनीति से मुक्त करके विश्लेषित करो। साहित्य को ग्लैमर बनाओ। इवेंट बनाओ। इस परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर साक्षात्कार और पूर्वाग्रह पत्रिकाओं ने हिन्दी के तमाम प्रगतिशील लेखकों पर अमेरिकी साहित्यवादी नजरिए से मोटे-मोटे अंक निकाले और इन अंकों में लिखने वाले लेखकों में हिन्दी के जाने-माने लेखकों की बड़ी भूमिका थी और इस भूमिका को नियोजित करने में अशोक वाजपेयी का मूल्यवान योगदान रहा है।        
    यह तथ्य रेखांकित किया जाना चाहिए तकि फोर्ड फाउंडेशन ,कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम आदि संस्थाओं के फंड के जरिए और अमेरिकी लक्ष्यों के अनुरूप लेखकों-साहित्यकारों –चित्रकारों-संगीतकारों और बुद्धिजीवियों को गोलबंद करने में भारत भवन ,अशोक वाजपेयी,अज्ञेय आदि की बड़ी भूमिका रही है।
    भारत भवन ,अमेरिकी नजरिए, प्रगतिशीलता की जुगलबंदी का यह दुष्परिणाम निकला कि प्रगतिशील लेखकों का एक बड़ा धड़ा भारतभवन और उसके 'सुकार्यों' का खुशी खुशी हिस्सा बन गया।  ये 'भोले लेखक' यह भूल ही गए कि सत्ता और अमेरिकी कारपोरेट पूंजी के सहमेल से महान समीक्षा और महान साहित्य नहीं रचा जाता। इतिहास ने यह सच साबित किया है कि भारतभवन से न तो कोई साहित्य आंदोलन पैदा हुआ और न नया साहित्य ही सामने आया। बल्कि साहित्य के आयोजनों के जरिए लेखकों के वैचारिक पंख कतर दिए गए। इस काम को अशोक वाजपेयी ने बड़ी दक्षता के साथ अंजाम तक पहुँचाया।
     संक्षेप में कहें तो भारतभवन और उनके प्रकाशनों के जरिए प्रगतिशील लेखकों के राजनीतिविहीन-विचारधाराविहीन मूल्यांकन करते हुए जो विशेष अंक आए उन्होंने आलोचना के अवमूल्यन का मार्ग प्रशस्त किया। इस समूची प्रक्रिया के सूत्रधार बने अशोक वाजपेयी।इस अर्थ में आलोचना के अवमूल्यन के भी वे ही प्रमुख सूत्रधार हैं। हिन्दी आलोचना की यह त्रासदी है वह इस प्रवृत्ति को पहचानने से भागती रही है और तकरीबन सभी समर्थ आलोचक इन दिनों अशोक वाजपेयी की मित्रमंडली का हिस्सा हैं और अब वे लोग मित्र-संवाद करते हैं, आलोचना नहीं करते।अशोक वाजपेयी के नजरिए में निहित आलोचना के अवमूल्यन का ताजा नमूना है 'जनसत्ता'( 23अप्रैल 2012) में एंड्रीन रीच पर लिखी छोटी सी टिप्पणी। इस टिप्पणी में अनेक बातें हैं जो रीच के आलोचक व्यक्तित्व पर रोशनी डालती हैं। इस सामान्य सी टिप्पणी में भी अशोक वाजपेयी अपने विचारधारात्मक खेल को खेलने से बाज नहीं आए हैं। अशोक वाजपेयी ने लिखा है " रीच का मत था कि सच्ची कविता विचारधारात्मक आज्ञापालक वृत्ति से बिलकुल अलग होती है।वह अज्ञात, अपरिचित,अनचीन्हे के बोझ को सहती है। उसे मनुष्य का भविष्य याद रहता है।" रीच के समग्र नजरिए के संदर्भ में देखें तो मामला कुछ और ही है।
रीच की चर्चित किताब है ," What is Found There: Notes on Poetry and Politics" , इसमें उन्होंने लिखा है कि 'कविता पढ़ना नजारे देखना नहीं है और कविता ठंड़ेपन के साथ ग्रहण भी नहीं की जाती। कविता का अस्तित्व तब है जब वो पढ़ी जाए। कविता का अस्तित्व पाठक से है और कविता में पाठक को होना चाहिए।'
 रीच असल में लेखक और पाठक दोनों की भूमिका को देखती हैं। उनका मानना है ' तुम जरूर लिखो और पढो, क्योंकि आपकी जिंदगी इस पर निर्भर है।... लिखो इसलिए क्योंकि जीवन निर्भर है अपने विश्वासों और पढ़ने पर।  लेखन में स्नप्निल संसार की तरंगे और सामान्य जीवन की कायिक संवेदनाएं व्यक्त होती हैं। '
     रीच ने सवाल उठाया है लेखक जो लिखता है क्या उस पर विश्वास किया जाय ? क्या लेखन भाषा का दुरूपयोग है ? होसकता है लेखक की कोई अप्रत्यक्ष मंशा हो ,जिसमें वह पाठक को कारण की तरह शामिल कर रहा हो, पाठक को गलियों में भेज रहा हो और आपकी संवेदनाओं की जानी-परखी प्राथमिकताओं की क्षमता को भाषा के जरिए अस्थिर करने की कोशिश कर रहा हो ?
    रीच की कविता की विशेषता है कि वे अपने ही लिखे पाठ के साथ निरंतर संवाद करती हैं , उनकी कोई अप्रत्यक्ष मंशा नहीं होती। अशोक वाजपेयी ने लिखा है कि 'एड्रीन रिच कविता के महत्त्व को अतिरंजित करने से गुरेज करती रहीं, हालांकि वे मानती थीं कि हमारे कठिन समय में कविता की अनिवार्य भूमिका है। पर वे स्पष्ट थीं कि कविता राहत देने वाला कोई मरहम, कोई भावात्मक मालिश, एक तरह की भाषिक एरोमाथेरापी नहीं होती। न ही वह कोई ब्लूप्रिंट, कोई निर्देश-संहिता, न ही बिलबोर्ड होती है। कोई सार्वभौम कविता नहीं है- कई तरह की कविता और कई काव्यशास्त्र हैं।'
   'रिच यह लक्ष्य करने से नहीं चूकी थीं कि कविता के बारे में आलोचना-विमर्श में हमारे भौतिक अस्तित्व, वर्तमान और अतीत के बारे में बहुत कम कहा जाता है। वह इन छोटी सच्चाइयों को हिसाब में नहीं लेता कि कैसे हमारे भावात्मक जीवन पर यही छोटी चीजें अपनी छाप छोड़ती हैं: हम कैसे देखते हैं हवा में धुएं का एक धब्बा, दुकान की शो-विंडो में जूतों की एक जोड़ी, अपनी कार में सोई एक स्त्री, सड़क के मोड़ पर जमा लोगों का एक समूह, कैसे हम सुनते हैं एक हेलीकॉप्टर की मंडराती आवाज, छत पर बारिश, ऊपर की मंजिल पर रेडियो से आता संगीत, कैसे हम पड़ोसी की आंखों में या कि किसी अजनबी की आंखों में ताकते हैं या उन्हें बरकाते हैं। ये सभी दबाव हमारे देखने को प्रभावित करते हैं। अच्छी कविता इन्हें हिसाब में लेती है, इन्हीं से अपनी काया गढ़ती है।रिच का मत था कि सच्ची कविता विचारात्मक आज्ञापालक वृत्ति से बिलकुल अलग होती है। वह अज्ञात, अपरिचित, अनचीन्हे के बोझ को सहती है। उसे मनुष्य का भविष्य याद रहता है।'
सवाल यह है कि कविता की विचारधारा होती है या नहीं ? अशोक वाजपेयी अच्छी तरह जानते हैं कि एंड्रीन रीच की विचारधारा क्या है और वे कविता को किस रूप में देखती हैं और किस तरह अमेरिका के प्रगतिशील साहित्य,स्त्रीवादी आंदोलन,स्त्री साहित्य आदि के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वाजपेयी की रीच की आलोचना में जो चीज गायब है वह है अन्तर्विरोध का सवाल। एंड्रीनी रीच ने इस तथ्य की ओर ध्यान खींचा है कि कुछ लेखक  आत्म-सेंसरशिप का इस्तेमाल करते हैं,इसका गहरा संबंध उनके मूल्यबोध से है। इससे उनके सौंदर्यबोध का निर्माण भी होता है। खासकर राजनीतिक कविता के संदर्भ में रीच ने लिखा है कि राजनीतिक कविता के जल्द ही नारेबाजी में तब्दील हो जाने का खतरा रहता है। फलतः वह एकायामी,सरल,दैनंदिन आंदोलनवाली हो जाती है और उसे ही हम 'प्रतिवादी साहित्य' कहते हैं। इस तरह की कविता पुंस,गौरवर्ण,हैट्रोसेक्सुअल या मध्यवर्गीय परिप्रेक्ष्य की नहीं होती बल्कि हम उसमें सार्वभौम की कुर्बानी देते हैं। सिर्फ अन्याय पर कविताएं लिखकर हम कविता का दायरा सीमित करते हैं।
      अशोक वाजपेयी जानते हैं कि रीच की कविता राजनीतिक कविता है। रीच ने लिखा है राजनीतिक कविता में अन्तर्विरोध का केन्द्रीय महत्व है। राजनीतिक कविता को अनेक लोग बुरी कविता मानते हैं। उसमें सब-वर्सिब शक्ति मानते हैं। रीच ने इस तरह की आलोचना का खंडन करते हुए लिखा है कि "बुरे लेखन" में शक्ति कैसे आ सकती है ? इस प्रसंग में एंड्रीन रीच ने "सिएटल टाइम्स "(फरवरी,1999) को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि राजनीतिक कविता पदबंध का आलोचकों के द्वारा प्रयोग होस्टाइल मनोभाव से हुआ है।वे यह मानते हैं कि प्रौपेगैण्डा के लिए काव्य- सौंदर्य की बलि चढ़ा दी गयी है। लेकिन कविता की दुनिया बहुत बड़ी होती है। कविता में सार्वभौम क्षमता होती है,वह अपने अंदर विभिन्न विमर्श समेटे होती है ,फलतः सौंदर्य और राजनीति दोनों की अभिव्यक्ति करती है। रीच के अनुसार 'कविता को कवि के दैनंदिन जीवन से अलग नहीं किया जा सकता।सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन कवि के भावों को पुष्ट करते हैं।वह उनके साथ दीर्घकालिक तौर पर बंधा और व्यस्त होता है। फलतः कवि की कविता में ऐतिहासिक निरंतरता होती है इसके कारण वह न तो ऐतिहासिक निरंतरता से ऊपर होता है और न इतिहास के बाहर होता है।'


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बुधवार, 25 अप्रैल 2012

स्त्री संस्कृति का जादुई संसार


                                                   
        हजारों सालों बाद आज भी   औरत एक पहेली बनी हुई है। उसका शरीर,आचार, विचार, संभोग,जादू-टोना,प्रेम आदि सभी के बारे में पंडितों में भयानक भ्रम बना हुआ है। हमारे भक्ति आंदोलन के विचारकों में एक हैं पुरूषोत्तम अग्रवाल उन्होंने अपनी किताब में कबीर के साहित्य में ‘शाश्वत स्त्रीत्व’ की खोज की है। सच यह है शाश्वत स्त्रीत्व जैसी कोई चीज नहीं होती। वे शाश्वत स्त्री की धारणा के आधार पर पुंसवादी तर्कों का पहाड़ खड़ा कर रहे हैं। इसी तरह हमारे और भी अनेक विद्वान दोस्त हैं जो आए दिन औरतों के धार्मिक व्रत ,उपवास,पूजा-उपासना आदि को लेकर फब्तियां कसते रहते हैं कि औरतें तो स्वभावतः धार्मिक होती हैं,पिछड़ी होती हैं।
     ऐतिहासिक तौर पर देखे तो स्त्री उत्पादक शक्ति है। वह कृषि की जनक है। मानव सभ्यता के इतिहास में उसे कृषि उत्पादक के रूप में जाना जाता है। पुरानी मान्यता है कृषि कार्यों की पुरूष के पौरूष पर निर्भरता कम है ईश्वर पर निर्भरता ज्यादा है। कृषि के लिए वेदों में जितने मंत्र हैं उतने किसी अन्य कार्य के लिए नहीं हैं। भारत में जनजातियों के अनेक तीज-त्यौहारों का कृषि जीवन से गहरा संबंध है।
    यह एक ऐतिहासिक वास्तविकता है कि कृषि की धुरी औरत है और कृषि की निर्भरता मंत्र-तंत्र और पूजा पर है,जिसके कारण औरतों में जादुई संस्कार सहज ही चले आए हैं।  जो लोग कहते हैं जादू-टोने का आधार अज्ञान है उन्हें देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय का कथन याद रखना चाहिए। उन्होने लिखा है ‘‘ इसे केवल अज्ञान मानना भी गलत होगा, क्योंकि यह कर्म को निर्देशित करता है यद्यपि यह मनोवैज्ञानिक दिशानिर्देश होता है।कृषि के प्रारंभिक चरण में जब इस मनोवैज्ञानिक निर्देशक की सबसे अधिक आवश्यकता होती है,हम सहज ही देखते हैं कि जादू-टोने में विश्वास और इससे संबद्ध क्रियाओं में विचित्र तीव्रता आ जाती है।’’
     उन्होंने यह भी लिखा है कि ‘‘ कृषि की खोज स्त्रियों ने की थी तो यह तर्कसंगत ही है कि अपने मूलरूप में जादू-टोना स्त्रियों के कार्य-क्षेत्र में आना चाहिए।’’यही वजह है कि समस्त धार्मिक उत्सव पूरी तरह स्त्रियों पर निर्भर हैं।
    औरतों का कृषि पर ही प्रभाव नहीं पड़ा बल्कि उन्होंने चिन्तन के विभिन्न क्षेत्रों को भी प्रभावित किया। इनमें तंत्र प्रमुख है। भारत में स्त्रियों से प्रभावित वामाचार का पूरा सम्प्रदाय रहा है जिसने समूचे जीवन पर गहरा असर डाला है। वामाचार का आम तौर पर संस्कृत के विद्वानों ने गलत अर्थ लगाया है। शब्द है वामा और आचार। आचार का अर्थ है क्रिया या धार्मिक क्रिया। वामा का अर्थ है स्त्री या काम।  इस प्रकार वामाचार का अर्थ है स्त्री और काम के अनुष्ठान।
     भारत में जो लोग स्त्री की स्वायत्त पहचान बनाना चाहते हैं। स्त्री की परंपरा और स्त्री संस्कृति का अध्ययन करना चाहते हैं उन्हें तंत्र और वामाचार का गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए। तंत्र में स्त्री को काफी महत्व दिया गया है। वामाचारी स्त्री को प्रसन्न रखने की कोशिश करते थे और इसके लिए स्त्री का रूप भी धारण करते थे। तंत्र में ऐसे अनेक अनुष्ठान हैं जिनका सीधे संबंध स्त्री से है।
       कबीर के अंदर पुरूषोत्तम अग्रवाल ने नारी के भाव को खोजा है। उन्होंने लिखा है ‘‘कबीर की महत्ता इस बात में है कि वे कम से कम कविता के क्षणों में तो शाश्वत स्त्रीत्व को अपने आपमें व्यापने देते हैं।’’ इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि कबीर पर योगियों-नाथों-सिद्धों और तांत्रिकों का गहरा असर था। उन्होंने बड़ी मात्रा में तंत्र की धारणाओं का अपनी कविता में इस्तेमाल भी किया है। तंत्र की योगसाधना मूलतःमनोदैहिक क्रियाएं हैं। देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ने इस पहलू की ओर ध्यान खींचा है। उन्होंने लिखा है कि योग क्रियाएं ‘‘ अपने अंदर नारीत्व का बोध कराने के उग्र प्रयत्न के अतिरिक्त और कुछ नहीं । अन्य शब्दों में यह मूल व्यक्तित्व और चेतना को एक स्त्री के व्यक्तित्व और चेतना में परिवर्तित करने के लिए एक तरह का प्रशिक्षण है। हमारे विद्वान इस बात को अभी तक नहीं पकड़ पाए हैं।’’
         बौद्धों से लेकर संस्कृत विद्वानों तक और देशज भाषाओं के रक्षक हिन्दी के पण्डितों तक योग में वर्णित नाडियों को लेकर जबर्दस्त भ्रम बना हुआ है। बाबा रामदेव जैसे लोग इसे स्नायुजाल बनाकर कसरत की दुकानदारी चला रहे हैं। सिर्फ एक ही उदाहरण काफी है। बौद्धों का एक मंत्र है ‘‘ ओम मणि पद्मे हुम’’ अर्थात ओम वह मणि जो पद्म में विराजमान है। इस मंत्र का बौद्ध प्रतिदिन जप करते हैं। लेकिन इसका असली अर्थ नहीं जानते। पद्म या कमल को तंत्रवाद में भग या योनि के अर्थ में लिया जाता है। पद्म इसका साहित्यिक नाम है। इसी तरह मणि का अर्थ बौद्धों में नाम है वज्र ,लेकिन तंत्र में कहते हैं पुरूष का लिंग। मणि इसका साहित्यिक नाम है। इसी तरह सुषुम्ना नाडी पर सात कमल नारीत्व के सात स्थान हैं।
   इसी तरह तंत्रवाद में त्रिकोण भग या योनि का प्रतीक है। इसके अलावा तंत्रों में सात शक्तियों जैसे कुलकुंडलिनी,वाणिनी,लाकिनी इत्यादि का उल्लेख किया है। प्रत्येक शक्ति एक-एक पद्म पर विराजमान है। मजेदार बात यह है कि वैष्णवों के सहजिया सम्प्रदाय में कुल कुंडलिनी शक्ति को राधा माना गया है यानी वह वैष्णवों का स्त्री सिद्धांत है। किंतु तंत्रवाद के निश्चित संदर्भ में ये सब अर्थ स्वीकार्य नहीं हैं। कायदे से सुषुम्ना आदि नाडियां स्त्री शक्ति और स्त्री संस्कृति की प्रतीक है। इसके अलावा वे किसी और रूप में स्वीकार्य नहीं हैं। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से स्त्री संस्कृति आरंभ होती है।
   हमारा यहां पर लक्ष्य योग के मंत्रों का विवेचन करना नहीं है। बल्कि उस बात की ओर ध्यान दिलाना है जिससे ये सारी चीजें परिचालित हैं। पुराना मंत्र है ,‘‘ वामा भूत्वा यजेत् परम ’’ अर्थात् स्वयं स्त्री बनकर प्रसन्न करो। यही वह आदि स्त्री सिद्धांत है जिससे कबीर प्रभावित हैं। इस प्रसंग में भंडारकर का मानना है कि ‘‘ तंत्रवाद के प्रत्येक निष्ठावान अनुयायी की महत्वाकांक्षा है कि वह त्रिपुरसुंदरी (तंत्रवाद में स्त्री सिद्धांत का एक ना) बन जाए । उसकी धार्मिक साधनाओं में से एक यह है कि वह स्वयं को एक स्त्री के रूप में समझने लगे। इस प्रकार शक्तिमत के अनुयायी अपने नाम को इस विश्वास के साथ उचित बताते हैं कि भगवान एक स्त्री रूप है और सभी का लक्ष्य एक स्त्री बनना होना चाहिए।’’
     कबीर के शाश्वत स्त्रीत्व बोध का एक और आयांम है जिसे मनोवैज्ञानिक आयाम कह सकते हैं। तंत्रवाद में योगसाधना का लक्ष्य कामोन्माद समाप्त करना नहीं है। यह कोई नपुंसकता की अवस्था भी नहीं है। बल्कि सच यह है कि योगसाधना के जरिए आंतरिक उन्माद,स्त्री उन्माद पैदा करना इसका लक्ष्य रहा है। वे पुरूषों में स्त्रीत्व जाग्रत करना चाहते थे। जो प्रत्येक पुरूष में होता है। नारीत्व को जाग्रत करके वे अपने अंदर के पुरूष को समाप्त कर देना चाहते थे। कामोन्माद को समाप्त करना उनका ध्येय नहीं था।बल्कि  आनंद उठाना लक्ष्य था।
     देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने लिखा है ‘‘ स्वयं को स्त्री रूप में परिवर्तित करने का सतत प्रयत्न या अपने अंदर सुप्त नारीत्व को जाग्रत करने का युक्तिसंगत उद्देश्य (चाहे वह कितना ही विचित्र हो) यह था कि प्रकृति की उत्पादन संबंधी गतिविधि को क्रियाशील बनाने के लिए सर्वोच्च महत्व के इन कामों को पूरा किया जाए।’’  











सोमवार, 23 अप्रैल 2012

विचारधारा का कम्युनिकेशन में अवमूल्यन है फेसबुक


                   
       फेसबुक के 85 करोड़ यूजर हैं और इसने पिछले साल 3.7 बिलियन डॉलर का मुनाफा कमाया है। कंपनी का मानना है कि वह आगामी दिनों में बाजार से 5बिलियन डॉलर शेयर बेचकर उठाएगी। इस कंपनी की हैसियत 100 बिलियन से ऊपर आंकी जा रही है।
फेसबुक महज एक कंपनी नहीं है वह नए युग की कम्युनिकेशन, सभ्यता-संस्कृति की रचयिता भी है। यह बेवदुनिया की पहली कंपनी है जिसके एक माह में 1 ट्रिलियन पन्ने पढ़े जाते हैं। प्रतिदिन फेसबुक पर 2.7बिलियन लाइक कमेंटस आते हैं। किसी भी कम्युनिकेशन कंपनी को इस तरह सफलता नहीं मिली ,यही वजह है कि फेसबुक परवर्ती पूंजीवाद की संस्कृति निर्माता है। वह महज कंपनी नहीं है।
गूगल के सह-संस्थापक सिर्गेयी ब्रीन ने इंटरनेट के भविष्य को लेकर गहरी चिन्ता व्यक्त की है। इंटरनेट की अभिव्यक्ति की आजादी को अमेरिका और दूसरे देशों में जिस तरह कानूनी बंदिशों में बांधा जा रहा है उससे मुक्त अभिव्यक्ति के इस माध्यम का मूल स्वरूप ही नष्ट हो जाएगा।
फेसबुक पर यदि कोई यूजर कहीं से सामग्री ले रहा है और उसे पुनः प्रस्तुत करता है और अपने स्रोत को नहीं बताता तो इससे नाराज नहीं होना चाहिए। यूजर ने जो लिखा है वह उसके विचारधारात्मक नजरिए का भी प्रमाण हो जरूरी नहीं है।
फेसबुक तो नकल की सामग्री या अनौपचारिक अभिव्यक्ति का मीडियम है। यह अभिव्यक्ति की अभिव्यक्ति  या कम्युनिकेशन का कम्युनिकेशन है। यहां विचारधारा, व्यक्ति, उम्र,हैसियत,पद. जाति, वंश, धर्म आदि के आधार पर कम्युनिकेशन नहीं होता। फेसबुक में संदर्भ और नाम नहीं कम्युनिकेशन महत्वपूर्ण है। फेसबुक की वॉल पर लिखी इबारत महज लेखन है। इसकी कोई विचारधारा नहीं है। फेसबुक पर लोग विचारधारारहित होकर कम्युनिकेट करते हैं। विचारधारा के आधार पर कम्युनिकेट करने वालों का यह मीडियम " ई" यूजरों से अलगाव पैदा करता है।
फेसबुक विचारधारात्मक संघर्ष की जगह नहीं है। यह मात्र कम्युनिकेशन की जगह है। इस क्रम में मूड खराब करने या गुस्सा करने या सूची से निकालने की कोई जरूरत नहीं है। हम कम्युनिकेशन को कम्युनिकेशन रहने दें। कु-कम्युनिकेशन न बनाएं। फेसबुक कम्युनिकेशन क्षणिक कम्युनिकेशन है। अनेक बार फेसबुक में गलत को सही करने के लिए लिखें ,लेकिन इसमें व्यक्तिगत आत्मगत चीजों को न लाएं। दूसरी बात यह कि फेसबुक मित्र तो विचारधारा और पहचानरहित वायवीय मित्र हैं। आभासी मित्रों से आभासी बहस हो।यानी मजे मजे में कम्युनिकेट करें। असल में ,विचारधारा का कम्युनिकेशन में अवमूल्यन है फेसबुक।
        एक अन्य सवाल उठा है कि  क्या फेसबुक और ट्विटर ने अकेलेपन को कम किया है या अकेलेपन में इजाफा किया है ? यह अकेले व्यक्ति को और भी एकांत में धकेलता है। संपर्क तो रहता है ,लेकिन संबंधों का बंधन नहीं बंधने देता। दोस्त तो होते हैं लेकिन कभी मिलते नहीं हैं।
     फेसबुक ने मनुष्य की मूलभूत विशेषताओं को कम्युनिकेशन का आधार बनाकर समूची प्रोग्रामिंग की है। मनुष्य की मूलभूत विशेषता है शेयर करने की और लाइक करने की। इन दो सहजजात संवृत्तियों को फेसबुक ने कम्युनिकेशन का महामंत्र बना डाला। इसमें भी फोटो शेयरिंग एक बड़ी छलांग है। यूजर जितने फोटो शेयर करता है वह नेट पर उतना ही ज्यादा समय खर्च करता है। आप जितना समय खर्च करते हैं उतना ही खुश होते हैं और फेसबुक को उससे बेशुमार विज्ञापन मिलते हैं । विगत वर्ष फेसबुक को विज्ञापनों से 1 बिलियन डॉलर की कमाई हुई है। असल में फेसबुक सामुदायिक साझेदारी का माध्यम है।यदि कोई इसे घृणा का माध्यम बनाना चाहे तो उसे असफलता हाथ लगेगी। फेसबुक में धर्म,धार्मिक प्रचार, राजनीतिक प्रचार आदि सब सतह पर विचारधारात्मक लगते हैं लेकिन प्रचारित होते ही क्षणिक कम्युनिकेशन में रूपान्तरित हो जाते हैं। विचारधारा और विचार का महज कम्युनिकेशन में रूपान्तरण एक बड़ा फिनोमिना है। जिनकी तरीके से देखने की आदत है वे इस तथ्य को अभी भी पकड़ नहीं पा रहे हैं।
     इंटरनेट के समानान्तर सैटेलाइट टीवी और मोबाइल कम्युनिकेशन का भी तेजी से विस्तार हुआ है। नई पूंजीवादी संचार क्रांति समाज को स्मार्ट मोबाइल क्रांति की ओर धकेल रही है। स्मार्ट मोबाइल के उपभोग के मामले में चीन ने सारी दुनिया को पीछे छोड़ दिया है। भारत में बिजली की कमी के अभाव में रूकी संचार क्रांति निकट भविष्य में स्मार्ट मोबाइल फोन से गति पकड़ेगी ।  स्मार्ट फोन के जरिए हम पीसी-लैपटॉप को भी जल्द ही पीछे छोड़ जाएंगे ।  

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

नव्यउदार पूंजीवाद के नए ढिंढोरची अशोक वाजपेयी



         
हिन्दी आलोचना में नव्यउदार पूंजीवादी चारणों के बारे में जब भी सोचता हूँ तो रह-रहकर अशोक वाजपेयी याद आते हैं। इन जनाव की भजनमंडली में ऐसे 2 दर्जन लेखक हैं। अशोक वाजपेयी की शिक्षा-दीक्षा अव्वल दर्जे की रही है,सरकारी पद भी अव्वल रहे हैं ,उनके पास चमचे भी अव्वलदर्जे के रहे हैं , हिन्दी के अव्वल अखबार में वे नियमित कॉलम भी लिखते हैं। देश के अव्वल कांग्रेसी नेताओं का उन पर वरदहस्त रहा है। पूंजीवादी विनयपत्रिका भी वे अव्वल लिखते हैं।
    अशोक वाजपेयी की खूबी है कि वे अपने पूंजीवादी नजरिए से एकदम टस से मस होने को तैयार नहीं हैं। इन जनाव की खूबी है कि ये हर विषय के ज्ञानी हैं और जब भी जैसे मौका मिलता है सुंदर-असुंदर दोनों किस्म का लिखते हैं। इधर उन्होंने जनसत्ता में अपने कॉलम में मार्क्सवाद पर एक अज्ञान से भरी टिप्पणी लिखी है,जिसे पढ़कर सिर्फ एक ही बात कहने की इच्छा होती है कि इस तरह की बेसिर-पैर की बातें हिन्दी में ही छप सकती हैं और जनसत्ता जैसा अखबार ही छाप सकता है। इस अखबार का संपादकीय स्तर कितना गिर चुका है इससे यह भी पता चलता है।
     अशोक वाजपेयी और उनके जैसे लोग और जनसत्ता जैसे प्रतिष्ठानी अखबार आए दिन तथ्यहीन ढ़ंग से अमेरिकी ढिंढोरची की तरह मार्क्सवादी दर्शन पर हमले करते रहे हैं। दूसरी ओर मार्क्सवादी लोग चुपचाप पढ़ते रहते हैं और प्रतिवाद नहीं करते। पहले मार्क्सवाद के खिलाफ बोलने वाले के खिलाफ मार्क्सवादी जबाव दिया करते  थे। लेकिन इन दिनों हिन्दी में सर्वधर्म सदभाव की तरह सर्व विचारधारा मित्रमंडली का दौर चल रहा  है। यह अंतर करना मुश्किल होता है कि मार्क्सवादी कौन है और मार्क्सवाद विरोधी कौन है? मार्क्सवादी लोग इन दिनों अशोक वाजपेयी के लेखन की आलोचना तक नहीं करते,जबकि ये जनाव मार्क्सवाद विरोधी ढिंढोरची की तरह आए दिन मार्क्सवाद के बारे में कु-प्रचार करते रहते हैं।
      साहित्य और संस्कृति में अमेरिकी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का झंड़ा बुलंद करने वाले अशोक वाजपेयी के लेखन और साहित्य-प्रशासनिक कर्मकांड को अभी लोग भूले नहीं हैं। इन जनाव ने साहित्य में आधुनिकता के पतनशील मूल्यों की हमेशा हिमायत की है पूंजीवादी संसार और अमेरिकी संस्कृति के पैरोकार और एजेण्ट की तरह हिन्दी में भारत भवन की स्थापना के समय जमकर काम भी किया है।
     अशोक वाजपेयी को अचानक इलहाम हुआ है कि "इन दिनों अकसर यह लगता है कि हमने दुनिया बदलने या विकल्प खोजने का सपना देखना बंद कर दिया है: हम जो सपने देखते हैं वे अगर टुच्ची आकांक्षाओं के नहीं तो बहुत छोटी चीजों के लिए हो गए हैं।" सवाल यह है कि आखिरकार ऐसे हालत पैदा क्यों हुए कि लोगों ने बड़े सपने देखने बंद कर दिए ? समाजवादी या मार्क्सवादी विचारक इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं ,बल्कि पूंजीवादी व्यवस्था और उसका आक्रामक रूख इसके लिए जिम्मेदार है। लेकिन अशोक वाजपेयी ने कभी विस्तार से पूंजीवाद के आक्रामक रवैय्ये की आलोचना नहीं की । उलटे भारत में अमेरिका के पहरूए की तरह काम करते रहे हैं।
     सपनों के मरने में पूंजीवाद की भूमिका को न देखना स्वयं पूंजीवाद की भूमिका पर पर्दा डालना है। अशोक वाजपेयी को गलतफहमी है कि भारत में बाहर भी लोगों ने सामाजिक परिवर्तन के सपने देखना बंद कर दिया है। सामाजिक परिवर्तन के सपने या दुनिया को बदलने के सपने लैटिन अमेरिका के क्रांतिकारियों ने देखने बंद नहीं किए हैं ,वहां पर वे विभिन्न देशों में सामाजिक परिवर्तन के नए विकल्पों की खोज और निर्माण में लगे हैं। लैटिन के साहित्यकारों ने भी बुनियादी परिवर्तन के सपने देखना बंद नहीं किया है। समाजवाद के पराभव के बाद वहां एक विशाल जनउभार आया है।लोकतंत्र और क्रांति में नए किस्म के अंतस्संबंध के निर्माण के प्रयास हो रहे हैं।
    समाजवादी यथार्थवाद और आलोचनात्मक यथार्थवाद से आगे की मंजिल के साहित्य के नए-नए प्रयोग वे ही लेखक कर रहे हैं जो लैटिन अमेरिका में किसी न किसी किस्म के सामाजिक परिवर्तन के वामपंथी आंदोलन से जुड़े हैं या उसके समर्थक हैं,मजदूरों और किसानों के संगठनों की जुझारू क्षमता भी इन देशों में जगजाहिर है ।और इसका सुपरिणाम है कि समूचे लैटिन अमेरिका में आज अमेरिकी साम्राज्यवाद हाशिए पर है और लैटिन अमेरिकी देशों में एकजुटता पैदा करने और संघर्ष करके समाज बदलने की भावना को निर्मित करने में मार्क्सवादी अग्रणी कतारों में हैं। यह सारा परिवर्तन सोवियत संघ और समाजवादी समूह के पूर्वी यूरोपीय देशो में समाजवादी व्यवस्था के पतन के बाद का है।
    अशोक वाजपेयी ने तारिक अली को उद्धृत करते हुए लिखा है- "मार्क्सवाद को धर्म बनाना गलत था और है तथा मार्क्स या अन्य चिंतकों के अंतर्विरोधों को नजरअंदाज करना भी गलत था और है।" यह धारणा भी गलत है। मार्क्सवाद कभी भी धर्म नहीं रहा है कम्युनिस्टों के यहां। कम्युनिस्ट पार्टी का अंधानुकरण और समाजवादी लोकतंत्र के अभाव के कारण समाजवादी व्यवस्था का पराभव हुआ और जनता को बड़े पैमाने पर कष्ट उठाने पड़े और इस तथ्य को रूस से लेकर अन्य देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों ने माना और फिर से लोकतंत्र की ओर देश को धकेला है। दूसरी बड़ी बात यह कि मार्क्सवादी चिन्तकों ने चाहे भारत हो या रूस हो,जर्मनी हो चीन हो, कहीं पर भी मार्क्स के अंतर्विरोधों  की अनदेखी नहीं की गयी है। अनेक मामलों में भारत के मार्क्सवादी अपने लेखन में एशियाई उत्पादन संबंधों के सवाल से लेकर जातिप्रथा तक, अंग्रेजों की भूमिका से लेकर सामंतवाद के चरित्र के सवालों पर मार्क्स से भिन्न नजरिए का प्रतिपादन करते रहे हैं।
    अशोक वाजपेयी ने अपने टिपिकल मार्क्सवाद विरोधी अंदाज में लिखा है - "यह सवाल उठता है कि मार्क्सवाद पर आधारित तानाशाहियों ने जो किया और उनका जो हश्र हुआ उनसे क्या सबक लिया जाए। जाहिर है कि मरणोत्तर आलोचना एक तरह का सुविधापरक लगभग अवसरवादी काम है, हालांकि इस वजह से आलोचना से बचना या उसे स्थगित नहीं करना चाहिए। मनुष्य की मुक्ति और समानता का सपना दृश्य पर फिर से आए यह जरूरी है, लेकिन अब क्या यह सपना फिर से मार्क्सवादी पदावली में देखा-समझा जा सकता है? एक तरह से सोवियत और चीनी साम्यवादियों और उनकी राजव्यवस्थाओं को इसके लिए माफ नहीं किया जा सकता कि उन्होंने एक महान मुक्ति-दर्शन को संहार और दमन का, मुक्ति के हनन का, अन्याय की व्यवस्था बनाकर उसे हमेशा के लिए लांछित-दूषित, विकृत करने का पाप किया है। पर दूसरी ओर इस सचाई को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि अगर एक दर्शन का इतने दशकों तक ऐसा दुर्विनियोजन संभव हुआ तो उस दर्शन के मूल में कहीं कोई खोट होगी, जिसने इतनी सारी सामाजिक-सांस्कृतिक विकृतियों को जन्मा और पोसा। अकेले लेनिन, स्टालिन और माओ भर दोषी नहीं हैं- मार्क्स की भी जिम्मेदारी बनती है।"
       इन जनाब को मार्क्सवादी दर्शन में खोट नजर आ रहा है और मार्क्स में भी खोट नजर आ रहा है। सवाल यह है कि मार्क्स में कौन सा खोट है जो इन जनाव को तकलीफ दे रहा है ? समाजवादी व्यवस्था में जो गड़बड़ियां हुईं उनके बारे में इन जनाब के पास कोई एक-दो बड़ी मिसाल नहीं हैं जो कही जाए। स्वयं कम्युनिस्ट पार्टियों और कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित थिंकरों के द्वारा जो बातें आलोचना में कही गयी है वे ही समाजवादी व्यवस्था की गड़बड़ियों को समझने के लिए काफी है। इनमें सबसे खतरनाक है उदार बुर्जुआ मूल्यों का समाज में विकास किए बगैर सीधे सामंतवाद से समाजवाद में छलांग लगाना समाजवादी व्यवस्था को काफी महंगा साबित हुआ है। दूसरे बड़ी समस्या राज्यतंत्र के पर्याय के रूप में पार्टीतंत्र का उभरना था। इससे समाजवादी जनतंत्र का सपना नष्ट हुआ। सर्वहारा के अधिनायकवाद की जगह पार्टी के नेताओं का अधिनायकवादी तंत्र पैदा हुआ। लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक, साहित्यिक,वैज्ञानिक क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति हुई। समूची दुनिया में पूंजीवाद को अपना रास्ता बदलने के लिए समाजवादी देशों ने दबाब पैदा किया और कल्याणकारी राज्य के पूंजीवादी सपने और कार्यक्रम का जन्म हुआ। मनुष्यों के लिए जिन अधिकारों की स्थापना समाजवाद ने की उनमें से अनेक अधिकारों को कालान्तर में पूंजीवादी देशों को अपने यहां भी लागू करना पड़ा।
    इससे भी बड़ा सवाल यह है कि समाजवाद को तानाशाही के रूप में नहीं देखा जा सकता। समाजवाद यदि तानाशाही है तो उसके बिखरने के बाद तो दुनिया में खुशहाली आनी चाहिए थी ? ऐसा क्यों हुआ कि अमेरिका और भी आक्रामक हो गया ? युद्ध दैनंदिन संस्कृति बन गए हैं ? परवर्ती पूंजीवाद की नई विश्व व्यवस्था सामने आई जो समाजवादी व्यवस्था के देशों के अभाव में और भी ज्यादा बर्बर ढ़ंग से विभिन्न देशों के साथ व्यवहार करती रही है।
    समाजवादी व्यवस्था का जन्म पूंजीवाद विरोधी व्यवस्था के रूप में हुआ था। अशोक वाजपेयी ने बड़ी ही चालाकी के साथ अमेरिकी बर्बरता पर कुछ भी नहीं कहा है। सवाल है कि  क्या पूंजीवाद पुण्यात्माओं की व्यवस्था है ? इस संसार पर दो-दो विश्वयुद्ध किसने थोपे ? इन युद्धों में करोड़ों लोग मारे गए हैं। इराक-अफगानिस्तान में अमेरिकी नेतृत्व में काम कर रही नाटो सेनाओं के अत्याचारों के खून के धब्बे अभी तक धुले नहीं हैं। अशोक वाजपेयी साहब अपने टिपिकल मार्क्सवाद विरोधी और पूंजीवाद के चारणों की पदावली का इस्तेमाल करते हुए पूंजीवाद को धर्म बताने का काम कर रहे हैं। पूंजीवाद के जरिए इस दुनिया की मुक्ति संभव नहीं है। यह बात सबसे पहले मार्क्स ने ही कही थी और उनकी यही भविष्यवाणी बार बार सही साबित हुई है। अशोक वाजपेयी भूल गए है कि चीन ने बहुत ही कम समय में अपने देश की अर्थव्यवस्था में जो लंबी छलांग लगाई है वैसी छलांग पहले किसी भी पूंजीवादी मुल्क ने नहीं लगाई है।  पूंजीवाद से मुक्ति का आज भी एक ही विज्ञान है और वह है मार्क्सवाद। मार्क्स ने कभी नहीं कहा कि वे जो लिख रहे हैं वह पत्थर की लकीर है और उनके अनुयायियों को उनकी बातों को आँखें बंद करके मानना चाहिए. मार्क्सवाद का नाम अनुकरण नहीं है। यह जीवन का विज्ञान है, विश्व दृष्टिकोण है। दुनिया के परिवर्तन का सबसे प्रभावशाली दर्शन है ,और करोड़ों लोग आज भी अपनी मुक्ति के संघर्ष में मार्क्सवाद से प्रेरणा ले रहे हैं। 

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

पूंजीवादी अंधविश्वास और प्रौपेगैण्डा का संगम हैं निर्मल बाबा



निर्मल बाबा के टीवी विज्ञापनों और बेशुमार सालाना आमदनी की लेकर हठात मीडिया ने ध्यान खींचा है। मीडिया में चल रही बहस के दो आयाम हैं, पहला, मीडिया का एक वर्ग निर्मल बाबा के धर्म के धंधे की आलोचना कर रहा है और उन्होंने जो दौलत कमाई है उसके अन्य कामों में इस्तेमाल करने पर आपत्ति कर रहा है।  धर्म के धंधे में आमदनी है,साथ ही धर्म की आय का अन्य कामों में इस्तेमाल होना भी आम बात है।
   मीडिया में चल रही बहस का एक दूसरा आयाम है बाबा के चमत्कारों की आलोचना का। बाबा का इन दोनों के संदर्भ में कहना है कि वे वैध ढ़ंग से कमाई कर रहे हैं, वे करदाता है ,उनके यहां दौलत के आय-व्यय को लेकर पारदर्शिता है, और जो कुछ भी वे खरीदते हैं उसका पेमेण्ट चैक से करते हैं।
      बाबा का यह भी कहना है उन्होंने कभी चमत्कार की बात नहीं की। उन्होंने  कभी अंधविश्वासों का प्रचार नहीं किया, वे तो मात्र भगवान की कृपा बांट रहे हैं।
  धर्म की अमीरी -
       निर्मल बाबा की अमीरी की झलक लेने के पहले कुछ बातें दौलत के तर्कशास्त्र पर कहना चाहेंगे। लोकतंत्र में सबको धन कमाने का हक है यहां तक कि भगवान को भी धन कमाने का हक है। दौलत कमाना और सुख से रहना पूंजीवाद का आम लक्षण है। पूंजीवाद में दौलत कैसे कमाते हैं ,यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है दौलत।
    दौलत कभी ईमानदारी से नहीं कमा सकते। ईमानदारी से पेट भर सकते हैं। सुख से सामान्य जीवन जी सकते हैं। लेकिन अकूत संपत्ति अर्जन के लिए अन्य का सरप्लस हजम करने की कला में पारंगत होना चाहिए। जो परजीवी लोग है वे बिना परिश्रम किए सरप्लस कमाते हैं और धर्म उनके विचरण का प्रधान क्षेत्र है। निर्मल बाबा इस धर्म के क्षेत्र के बड़े सरप्लस कमाने वाले व्यक्ति हैं।
     सतह पर बाबा हो सकता है वैध ढ़ंग से ही कमा रहे हों,कानून का पालन करके कमा रहे हों,इसके आधार पर वे यह दावा कर रहे हैं कि उन्होंने कोई भी पैसा अवैध ढ़ंग से नहीं कमाया। सवाल यहां सवाल वैध-अवैध ढ़ंग से कमाई का नहीं है।पैसा वैध है या अवैध है यह देखने का काम आयकर विभाग और अन्य सरकारी संस्थान करेंगे।हमारे लिए महत्वपूर्ण  सवाल है विचारधारा का। किस नजरिए से निर्मल बाबा अपने कामों के जरिए और किसकी वैचारिक सेवा कर रहे हैं? क्या वे जनता की सेवा कर रहे हैं ? या फिर अमीरों या पूंजीवादी व्यवस्था और पूंजीपतिवर्ग की सेवा कर रहे हैं ?
     निर्मल बाबा के समूचे तंत्र का भगवान की कृपा और जनता की सेवा से कोई संबंध नहीं है।बल्कि निर्मल बाबा परवर्ती पूंजीवाद के अंधविश्वास उद्योग के बड़े प्रोडक्ट हैं। वे बड़े ही कौशल के साथ अंघविश्वास का प्रचार करके दौलत कमा रहे हैं और आम जनता की अति पिछड़ी भावनाओं का शोषण कर रहे हैं। पहले उन तथ्यों और खबरों को देखें जो उनके अर्थतंत्र के संबंध में अखबारों में आई हैं।   
   दैनिक भास्कर के अनुसार बाबा ने 'आज तक' को दिए गए इंटरव्यू में कहा कि उनका सालाना टर्न ओवर 235-240 करोड़ रुपये का है और वह पूरी रकम पर इनक्मटैक्स देते हैं। लेकिन शनिवार को 'प्रभात खबर' ने उनके खातों से जुड़ी जो जानकारी सार्वजनिक की है, उससे बाबा की बात पूरी तरह सच नहीं लगती। इसके मुताबिक निर्मल बाबा के दो खाते हैं। एक निर्मल दरबार के नाम से (जिसका नंबर टीवी पर चलता रहता है) और दूसरा निर्मलजीत सिंह नरूला के नाम से। इस खाते का नंबर है 1546000102129694। यह खाता नंबर टीवी पर नहीं दिखाया जाता। इस खाते में चार जनवरी 2012 से 13 अप्रैल 2012 के बीच 123 करोड़ (कुल 1,23,02,43,974) रुपये जमा हुए। इस राशि में से 105.56 करोड़ की निकासी भी हुई। 13 अप्रैल को इस खाते में 17.47 करोड़ रुपए बचे थे।
  निर्मल बाबा को विभिन्न प्रकार के जमा पर 13 मई 2011 से 31 मार्च 2012 तक के बीच ब्याज के रुप में 85.77 लाख रुपये मिले।  यह खबर है कि उन्होंने अपने पैसों का विदेशी खातों में ट्रांसफर किया है । बाबा ने 25 करोड़ की एफडी भी करा रखी है।
प्रभात खबर' की रिपोर्ट के मुताबिक निर्मल दरबार के नाम से आईसीआईसीआई बैंक में खुले खाते (संख्या 002-905-010-576) में शुक्रवार को सिर्फ 34 लाख रुपये जमा किये गये। पहले इस खाते में प्रतिदिन औसतन एक करोड़ रुपये जमा किये जा रहे थे। पहले औसतन चार से साढ़े चार हजार लोग प्रतिदिन निर्मल बाबा के खाते में राशि जमा कर रहे थे, लेकिन शुक्रवार शाम पांच बजे तक देश भर के 1800 लोगों ने ही बाबा के आईसीआईसीआई बैंक खाते में राशि जमा की थी। यानी 40 फीसदी कम।
     हिन्दी के दैनिक अखबारों में यह भी छपा है कि बाबा अपने भक्तों से दो किस्म का शुल्क लेते हैं पहला है ,निबंधन शुल्क ,यह एक प्रकार से समागम में आने की एंट्री फीस है, जिसमें 2 साल से ऊपर के बच्चे से भी दो हजार रुपए लिए जाते हैं।दूसरा है दसबंद शुल्क , जिसमें बाबा के भक्तों को पूर्णिमा से पहले अपनी आय का 10वां हिस्सा निर्मल दरबार को देना होता है।
     मीडिया अनुमान के अनुसार बाबा के खाते में विगत तीन महीनों में 109 करोड़ जमा हुए हैं। ए‌क हिंदी अखबार ने बाबा के तीन बैंक अकाउंटों का खुलासा किया है। अखबार के मुता‌बिक पंजाब नेशनल बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और यस बैंकों में बाबा के खाते हैं, जिनमें से दो खातों को रिकॉर्ड हाथ लगा है। इनमें से एक खाते में केवल जनवरी 2012 से अप्रैल 2012 के पहले सप्ताह तक 109 करोड़ रुपए जमा किए गए हैं। यानि 1.11 करोड़ रुपए प्रतिदिन जमा किए गए।
वहीं दूसरे बैंक खाते में 12 अप्रैल 2012 को 14.93 करोड़ रुपए जमा हुए हैं। यह रकम सुबह 9.30 बजे से दोपहर 1 बजे तक जमा की गई। शाम तक इस खाते में करीब 16 करोड़ रुपए जमा किए गए। इसके अलावा एक बैंक में बाबा के नाम से 25 करोड़ रुपए का फिक्‍स्ड डिपोजिट भी है। बाबा का एक खाता निर्मलजीत सिंह नरूला और दूसरा खाता निर्मल दरबार के नाम से है। निर्मल दरबार में भक्तों द्वारा जमा की रकम को बाद में बाबा अपने अकाउंट में ट्रांसर कर लेते हैं।

एक अखबार ने यह भी लिखा है कि हाल के वर्षों में लोगों का झुकाव अध्यात्म व धार्मिक कार्यों की ओर पहले की अपेक्षा बढ़ा है। जिसके कारण चारों ओर धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जा रहा है। विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजन में सहभागिता करने की लोगों में होड़ सी मची हुई है। वहीं लोग धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता देकर अपनी किस्मत की रेखाओं को दुरूस्त करने में लगे हुए हैं। इस मामले में गिरिडीह के लोग भी पीछे नहीं है। टोटकों और पूजा बाजार में मिलने वाले आधुनिक यंत्रों की खरीदारी से लेकर धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजन में ये दो कदम आगे हैं।

इस प्रतिस्पर्धा के युग में जीवन के प्रति असुरक्षा की भावना को देखते हुए लोगों का रुझान आध्यात्मिकता ही नहीं, बल्कि नए किस्म के धार्मिक अनुष्ठानों पर भी है।
अखबारों में छपे विवरण के अनुसार निर्मल बाबा उर्फ निर्मल जीत सिंह नरूला एक आध्यात्मिक गुरू है, जो दिल्ली की कैलाश कालोनी में रहते हैं। इससे पूर्व ये झारखंड के डाल्टनगंज में ठेकेदारी का काम करते थे। निर्मल बाबा के अधिकारिक वेबसाइट के अनुसार निर्मल बाबा के पास छठी इंद्रिय (सिक्स्थ सेंस) है। कहते हैं कि इस रहस्यमयी छठी इंद्रिय के विकसित होने से मनुष्य को भविष्य में होने वाली घटना के बारे में पहले से ही पता चल जाता है।
    बाबा का दावा है छठी इंद्री का कुंडलिनी से गहरा ताल्लुक है।कुंडलिनी जागृत करने के पश्चात मनुष्य त्रिकालदर्शी बन जाता है। लेकिन कुंडलिनी जागृत करने के लिये कठिन साधना की जरूरत होती है। ये एक सतत प्रक्रिया है, जब दैहिक शुद्धि के पश्चात, मानसिक शुद्धि अनिवार्य होती है। शास्त्रों में इस क्रिया में गुरू की असीम भागीदारी को भी जरूरी बताया गया है। इसका इस्तेमाल शास्त्रों में सिर्फ मानवीय हितों को साधने के निहित किया गया है। इन तंत्र-मंत्रों के बल पर मनुष्य अतीत, वर्तमान और भविष्य को आसानी से देख, सुन और समझ सकता है।
 बाबा की वेबसाइट के अनुसार निर्मल बाबा 10 साल पहले साधारण व्यक्ति थे, लेकिन बाद में उन्होंने ईश्वर के प्रति समर्पण से अपने भीतर अद्वितीय शक्तियों का विकास किया। ध्यान के बल पर वह ट्रांस (भौतिक संसार से परे किसी और दुनिया में) में चले जाते हैं। ऐसा करने पर वह ईश्वर से मार्गदर्शन ग्रहण करते हैं, जिससे उन्हें लोगों के दुख दूर करने में मदद मिलती है। निर्मल बाबा के पास मुश्किलों का इलाज करने की शक्ति है। वे किसी भी मनुष्य के बारे में टेलीफोन पर बात करके पूरी जानकारी दे सकते हैं। यहां तक कि सिर्फ फोन पर बात करके वह किसी भी व्यक्ति की आलमारी में क्या रखा है, बता सकते हैं। उनकी रहस्मय शक्ति ने कई लोगों को कष्ट से मुक्ति दिलाई है।
ये सारी बातें निर्मल बाबा की ईश्वरीय इमेज बनाने और  अंधविश्वासी इमेज बनाने वाली हैं।
निर्मल बाबा के अंधविश्वास-
        निर्मल बाबा के प्रचार अभियान के जो टीवी कार्यक्रम बनाए गए हैं वे काफी मेहनत और कानूनी दांव-पेंच से बचने और तर्कवादियों के हमलों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। बाबा का यह कहना गलत है कि वह अंधविश्वास और चमत्कार का इस्तेमाल नहीं करते।
   इस प्रसंग में पहली बात यह है कि बाबा की इमेज के पक्ष में जो तर्क दिए गए हैं वे सबके सब अवैज्ञानिक और काल्पनिक हैं। बाबा के पास दिव्यशक्ति जैसी कोई चीज नहीं है। संसार में दिव्यशक्ति जैसी कोई चीज अभी तक किसी ने नहीं देखी है ।बाबा के पास दिव्यशक्ति होने का दावा करना ही अपने आपमें अंधविश्वास फैलाना है और इसका प्रत्येक स्तर पर विरोध किया जाना चाहिए।
   दूसरा अंधविश्वास यह कि बाबा के ऊपर ईश्वर कृपा है और वे अपने प्रवचनों से लेकर विज्ञापनों तक सिर्फ ईश्वरकृपा ही बांटते हैं। असल में , ईश्वरकृपा के नाम पर अंधविश्वासों का प्रचार किया जा रहा है। ये अंधविश्वास पुराने किस्म के अंधविश्वासों से भिन्न नए किस्म के हैं।
     मसलन् ,एक व्यक्ति ने कहा मेरे बिजनेस में घाटा हो गया तो बाबा ने पूछा आपने कल दही खाया था तो उस व्यक्ति ने कहा नहीं ,तो बाबा बोले आज रात को दही खाकर सोना सब ठीक हो जाएगा।
   एक अन्य व्यक्ति ने कहा मेरे पैरों में दर्द हो रहा है किसी दवा से ठीक नहीं होता। बाबा ने कहा तेरे पास अलमारी में दस के नोटों की गड्डी है ,उसने कहा नहीं ,तो बाबा बोले जा अलमारी में एक दस के नोटों की गड्डी रख दे दर्द ठीक हो जाएगा।
समूचा प्रचार इस तरह के नॉनसेंस उपायों के आधार पर नए किस्म के अंधविश्वासों को संप्रेषित करता है। अंधविश्वास की खूबी है कि उसका कोई वैज्ञानिक और तार्किक आधार नहीं होता , वह संबंधित समस्या से हमेशा डिसकनेक्ट होता है। मसलन् किसी के पैर में दर्द है तो उसका दस के नोट की गड्डी से क्या संबंध है ? इसी तरह बाबा कहने के लिए सतह पर ढोंगियों की भाषा और इमेज का इस्तेमाल नहीं करते। वे जिस चीज का दोहन करते हैं वह है लोगों का विश्वास।
     बाबा के भक्त मानते हैं कि बाबा की बात पर विश्वास करेंगे तो समस्या हल हो जाएगी। आम लोगों के विश्वास का अंधविश्वास और धंधे के लिए इस्तेमाल सीधे ठगई है। इस ठगई को 40 टीवी चैनलों से अहर्निश विज्ञापन चलाकर वैधता प्रदान की जा रही है। यह काम वैसे ही किया जा रहा है जैसे कोई कंपनी अपने माल की बिक्री बढ़ाने के लिए झूठ का प्रचार करती है। मसलन क्रीम बनाने वाली कंपनी का यह दावा असत्य है कि उसकी क्रीम का प्रयोग करने से रंग गोरा हो जाएगा। सच यह है कि क्रीम लगाने से रंग गोरा नहीं हो सकता।  रंग को किसी भी कॉस्मेटिक के जरिए बुनियादी तौर पर बदला नहीं जा सकता। हां,मेकअप के जरिए कुछ देर के लिए बदल सकते हैं लेकिन इससे बुनियादी रंग खत्म नहीं होगा।
     निर्मल बाबा ने जिस कदर दौलत कमाई है उससे यह भी पता चलता है कि हमारे मध्यवर्ग-निम्न मध्यवर्ग में आज भी एक बड़ा तबका है जिसके मन के अंदर अंधविश्वासों की जड़ें गहरी हैं। जो मीडिया अहर्निश उपभोक्ता वस्तुएं के बारे में तरह तरह के अंधविश्वास फैलाता रहता है वह मीडिया कैसे निर्मल बाबा को चुनौती दे सकता है ?
   निर्मल बाबा के अंधविश्वासों का फ्लो वस्तुतः मीडिया विज्ञापनों में प्रतिदिन छप रहे अंधविश्वासों के वैचारिक फ्लो में  आ रहा है। ऐसी अवस्था में मीडिया में निर्मल बाबा के बारे में आप कुछ भी कहें वे और ताकतवर बनेंगे। निर्मल बाबा नए युग के उपभोक्ता मालों की दुनिया के अंधविश्वास उद्योग के बड़े ब्रॉँड हैं। इनकी जड़ें पूंजीवादी विज्ञापन कला के वैचारिक ताने-बाने से बनी हैं। इस वैचारिक तानेबाने को जब तक समग्रता में वैचारिक चुनौती नहीं मिलती,निर्मल बाबा जैसे लोग मसलन बाबा रामदेव,श्रीश्री रविशंकर,मुरारी बापू आदि फलते-फूलते रहेंगे। निर्मल बाबा का सवाल वैध संपत्ति का सवाल नहीं है बल्कि अंधविश्वास उद्योग से कैसे लड़ें, इसके परिप्रेक्ष्य से जुड़ा है।
       निर्मल बाबा पूंजीवादी मालों के संसार में एक माल है। इसकी धुरी है विज्ञापन और आधुनिक अंधविश्वास। इसमें सिरों की गिनती का महत्व वैसे ही जैसे फ्रिज की बिक्री में सिरों की गिनती का महत्व है,बालों के रंग की बिक्री में जिस तरह सिरों की गिनती का महत्व है वैसे ही बाबा भी कह रहे हैं मेरे लाखों अनुयायी हैं। यानी महत्वपूर्ण है सिरों की गिनती। सिरों की गिनती के आधार पर नए पूंजीवादी युग का अंधविश्वासों से भरा तंत्र और उसकी विचारधारा काम कर रही है। आप जब तक इसकी विचारधारात्मक जड़ों पर हमले नहीं करेंगे इसका कुछ भी बाल बांका नहीं कर सकते।
    इसकी विचारधारा का आधार है जो कहा जा रहा है उस पर विश्वास करो और मानो। सवाल न करो। उपभोग करो। अनुकरण करो। यह मूलतः विवेकहीन उपभोक्ता संस्कृति के निकृष्टतम तर्कों से रची विचारधारा है। इसका धर्म से कोई संबंध नहीं है।इसका पूंजी के उत्पादन और पुनर्रूत्पादन से संबंध है। यह स्व-निर्मित विचारधारात्मक वातावरण में रमण करती है।
    आप देखेंगे कि सभी रंगत के बाबा इन दिनों विज्ञापनों,टी चैनलों और इलैक्ट्रोनिक कम्युनिकेशन के रूपों से लेकर प्रिंट मीडिया के विज्ञापनों और जन-संपर्क एजेंसियों की मदद ले रहे हैं। यह स्व-निर्मित वातावरण है और कालान्तर में वे इसे समाज निर्मित वातावरण के नाम से प्रचारित करने लगते हैं।
     वे इनदिनों फेसबुक और इंटरनेट आदि का भी इस्तेमाल कर रहे हैं।एक अखबार ने लिखा है- निर्मल बाबा ट्विटर और गूगल पर ट्रेंडिंग टॉपिक बन गए हैं। गूगल पर 'निर्मल बाबा फ्रॉड' खूब सर्च किया जा रहा है। मीडिया में नकारात्‍मक खबरें आने के बाद लगता है बाबा ने भी इंटरनेट को हथियार के रूप में इस्‍तेमाल करने की ठोस पहल की है। उनके फेसबुक पेज से साढ़े तीन लाख से अधिक लोग जुड़े हैं और रोजाना हजारों नए लोग जुड़ रहे हैं। देश के सबसे बड़े फेसबुक पेज 'इंडिया' जिससे करीब 39 लाख लोग जुड़े हैं, पर हुई पोस्ट पर भी इतनी प्रतिक्रियाएं या 'लाइक' नहीं आते जितने बाबा के पेज पर आ रहे हैं।
 हजारों भक्त बाबा के फेसबुक पेज पर कोटि-कोटि प्रणाम कर रहे हैं। कोई निर्मल बाबा में आपनी आस्था का वर्णन कर रहा है तो कोई उनसे बंगला और गाड़ी मांग रहा है। लेकिन dainikbhaskar.com ने तीन दिन तक निर्मल बाबा के फेसबुक पेज का गहन अध्ययन किया तो संदेह बढ़ाने वाली कुछ अलग ही कहानी समझ में आई।
 बाबा के पेज पर मीडिया के खिलाफ भी खूब भड़ास निकाली जा रही है। शुक्रवार को 'स्टार न्यूज' पर जब निर्मल बाबा पर कार्यक्रम चल रहा था तब मात्र दो घंटे के भीतर करीब पांच हजार प्रतिक्रियाएं बाबा के फेसबुक पेज पर आईं। इनमें अधिकतर में बाबा की शक्तियों का गुणगान किया गया। ये अलग बात है कि बाबा के विरोध में पोस्ट हो रही प्रतिक्रियाओं को तुरंत हटाया भी जा रहा था। 'आजतक' पर जब निर्मल बाबा 'प्रकट' हुए तब भी उनके भक्त फेसबुक पेज पर सक्रिय हो गए और बाबा का जमकर गुणगान करने लगे।
   अखबार ने लिखा है बाबा का गुणगान कर रहे सैंकड़ों प्रोफाइल ऐसे थे जो देखते ही फर्जी प्रतीत हो रहे थे। जब हमने और गहन पड़ताल की तो पता चला कि इनमें से अधिकतर प्रोफाइल मार्च के अंत में या अप्रैल के पहले सप्ताह (ध्यान दें, इसी दौरान बाबा ब्लॉगों की चर्चा से निकलकर मेनस्ट्रीम मीडिया की सुर्खी बने थे) में बनाए गए हैं। इन फर्जी लग रहे प्रोफाइलों से बाबा के फेसबुक पेज पर नियमित टिप्पणियां की जा रही हैं। उनकी कृपा बरसने से जुड़े के किस्से भी बारी-बारी से सुनाए जा रहे हैं। हमने ऐसे ही पचास से ज्यादा प्रोफाइलों की आईडी सेव भी की है। अधिकतर लड़कियों के नाम से बनाए गए इन प्रोफाइल में लोकेशन भी अलग-अलग शहरों की बताई गई है, ताकि ये संदिग्‍ध नहीं लगें। पर इनमें से किसी पर भी प्रोफाइल पिक्‍चर पोस्ट नहीं है।हमने इनमें से कुछ प्रोफाइलों को संदेश भेजकर इनके अनुभव मांगे। लेकिन एक ने भी अपना अनुभव साझा नहीं किया। एक से जवाब आया भी तो उसने फोन पर बात करने से इनकार कर दिया।
 बाबा के फेसबुक पेज से 3 लाख 57 हजार से अधिक लोग जुड़े हैं और इस पेज पर विजिट करने वाले प्रोफाइल में करीब 60 प्रतिशत महिलाएं हैं जिनमें से ज्यातार युवा और पढ़ी लिखी पेशेवर हैं। बाबा के पेज से छात्र भी भारी संख्या में जुड़े हैं। एक छात्र ने बाबा के पेज पर अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि कॉलेज उसे परीक्षा नहीं देने दे रहा था लेकिन उसने बाबा से प्रार्थना की तो उसे इम्तिहान में बैठने की अनुमति मिल गई।
  एक अन्य अखबार ने लिखा फेसबुक पर बाबा के 32 लाख प्रशंसक हैं। टीवी और इंटरनेट के जरिए निर्मल बाबा पूरे भारत ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों में भी रोज लोगों तक पहुंचते हैं। निर्मल बाबा के समागम का प्रसारण देश-विदेश के तकरीबन 39 टीवी चैनलों पर सुबह से लेकर शाम तक रोजाना करीब 25 घंटे अलग-अलग समय पर किया जा रहा है। भारत में विभिन्न समाचार, मनोरंजन और आध्यात्मिक चैनलों के अलावा विदेशों में टीवी एशिया, एएक्सएन जैसे चैनलों पर मध्य पूर्व, यूरोप से लेकर अमेरिका तक उनके समागम का प्रसारण हो रहा है। फेसबुक पर निर्मल बाबा के प्रशंसकों का पेज है, जिसे करीब 32 लाख लोग पसंद करते हैं। इस पेज पर निर्मल बाबा के टीवी कार्यक्रमों का समय और उनकी तारीफ से जुड़ी टिप्पणियां हैं। ट्विटर पर उन्हें 50 हजार लोग फॉलो कर रहे हैं।

मीडिया ने सवाल  उठाया  है कि आखिरकार निर्मल बाबा ने पिछले दस सालों में ऐसा क्या किया कि वे आज एक असाधारण रहस्यमय शक्ति के माल‌िक बन बैठे है? इस रहस्यमय शक्ति की बदौलत करोड़ों रुपये प्रतिदिन की आमदनी अर्जित करने वाले निर्मल बाबा देश के उन गरीबों और लाचारों को अपना आशीर्वाद क्यों नहीं देते जिन्हें दो जून की रोटी के लिए रोज मशक्कत करनी पड़ती है।