सोमवार, 28 मई 2012

सांस्कृतिक मालों के अपहरण का मायावीतंत्र है यू-ट्यूब



सिनेमा ने दृश्यमाध्यम के रूप में नई आधुनिकता सामाजिकता को बुलंदियों तक पहुँचाया। नए मीडियम के रूप में कैमरे ने सभी शास्त्रों के शस्त्रों को अपदस्थ कर दिया। यही कैमरा जब डिजिटल और सैटेलाइट के सहमेल से नई भूमिका में बदला तो उसने एकदम नयी कम्युनिकेशन  संस्कृति को जन्म दिया।जिसका नाम है यू-ट्यूब । इसकी दुनिया विकसित पूंजीवादी संस्कारों के चरमोत्कर्ष की पारदर्शी और नियंत्रित दुनिया है। 

यू-ट्यूब का समूचा फॉरमेट देखने में स्वतंत्र अभिव्यक्ति के मंच जैसा है। लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं है। यह फॉरमेट बुनियादी तौर पर सांस्कृतिक इजारेदारी के डिजिटल फॉरमेट की आदर्श अभिव्यक्ति है। मसलन्, इस फॉरमेट के आधार पर समूचा संगीत और सिनेमा उद्योग अरबों रूपये के व्यावसायिक लाभ से वंचित कर दिया गया है।अन्य देशों और व्यक्तियों की सांस्कृतिक संपदा और बौद्धिक-संपदा को अपहृत करके इजारेदार कंपनी के मुनाफे की मशीन बना दिया गया है। यू-ट्यूब ने अनेक विश्व कन्वेंशनों को कागजी बना दिया है। लेखकों,कलाकारों, संगीतकारों, फिल्ममेकरों के कॉपीराइट का खुला उल्लंघन करते हुए उनके सांस्कृतिक मालों को यू-ट्यूब के मालिकों की सांस्कृतिक संपदा बना दिया है।

यू-ट्यूब के अनुसार 500 वर्ष के बराबर यू-ट्यूब वीडियो प्रति दिन फेसबुक पर देखे जाते हैं, और प्रति मिनट 700 से अधिक यू-ट्यूब वीडियो ट्विटर पर शेयर किए जाते हैं। प्रत्येक सप्ताह 100 मिलियन लोग यू-ट्यूब पर सामाजिक रूप से सक्रिय रहते हैं (पसंद करते हैं, शेयर करते हैं, टिप्‍पणियां करते हैं, आदि)।

स्वचालित रूप से शेयर किए गए एक ट्वीट के परिणामस्वरूप औसतन 6 नए यू-ट्यूब सत्र होते हैं, और हम प्रति मिनट यू-ट्यूब लिंक वाले 500 से अधिक ट्वीट देखते हैं।हर दिन कई मिलियन ग्राहक बनते हैं. ग्राहकी आपको उस व्‍यक्ति से कनेक्‍ट होने देती है, जिसमें आपकी रुचि है — चाहे वह मित्र हो, या NBA — और साइट पर उनकी गतिविधि बनाए रखने की सुविधा देती है। यू-ट्यूब पर 50% से अधिक वीडियो रेट किए गए हैं या उनमें समुदाय की टिप्‍पणियां शामिल हैं।हर दिन कई मिलियन वीडियो पसंदीदा बनाए जाते हैं। यू-ट्यूब पर 50% से अधिक वीडियो रेट किए गए हैं या उनमें समुदाय की टिप्‍पणियां शामिल हैं।हर दिन कई मिलियन वीडियो पसंदीदा बनाए जाते हैं।

यू ट्यूव दृश्यमीडिया में क्रांतिकारी छलांग है। इसका कन्‍टैंट आईडी हर दिन 100 से अधिक वर्षों का वीडियो स्‍कैन करता है।प्रत्येक प्रमुख यूएस नेटवर्क प्रसारणकर्ता, फिल्‍म स्‍टूडियो और रिकॉर्ड लेबल सहित, 3,000 से अधिक सहयोगी कन्टैंट आईडी का उपयोग करते हैं।इसके कन्टैंट आईडी डेटाबेस में आठ मिलियन (500,000 घंटों से अधिक समय की सामग्री) से अधिक संदर्भ फ़ाइलें हैं; यह दुनिया में सबसे समृद्ध है. पिछले वर्ष से संख्‍या दोगुनी हो गई है।यू-ट्यूब के कुल मुद्रीकृत दृश्‍यों का एक तिहाई से अधिक भाग कन्टैंट आईडी से आता है।कन्टैंट आईडी के द्वारा 120 मिलियन से अधिक वीडियो पर दावा किया गया।

यू-ट्यूब में एक माह के भीतर 60 वर्षों में बनाए गए 3 मुख्‍य यूएस नेटवर्क की अपेक्षा अधिक वीडियो अपलोड किए गए।यू-ट्यूब का 70% ट्रैफिक यूएस के बाहर से आता है।यू-ट्यूब 39 देशों और 54 भाषाओं में स्‍थानीयकृत किया जा चुका है।सन् 2011 में, यू-ट्यूब के पास 1 ट्रिलियन से भी अधिक देखे जाने की संख्‍या या धरती के प्रत्‍येक व्‍यक्ति के लिए लगभग 140 बार देखे जाने की संख्‍या थी।

प्रति मिनट 60 घंटे के बराबर वीडियो अपलोड किए जाते हैं, या यू-ट्यूब पर प्रति सेकंड एक घंटे के वीडियो अपलोड किए जाते हैं।एक दिन में 4 बिलियन से अधिक वीडियो देखे जाते हैं.हर माह 800 मिलियन अद्वितीय प्रयोक्ता YouTube पर विज़िट करते हैं। यू-ट्यूब पर हर माह 3 बिलियन घंटे के बराबर वीडियो देखे जाते हैं।

रविवार, 27 मई 2012

राष्ट्रीयविज़न के बिना ममता बनर्जी की बौनी राजनीति

पश्चिम बंगाल में संकीर्ण राजनीतिक पांसे तेजी से फेंके जा रहे हैं। इससे सामाजिक जीवन में अनुदार भावबोध पुख्ता होगा। इसे चालू भाषा में बौनी राजनीति कहते हैं। बौनी राजनीति वे करते हैं जिनके पास राष्ट्रीय विज़न नहीं होता। ममता बनर्जी के सत्ता में आने के साथ यह उम्मीद जगी थी कि राज्य सरकार नीतिगत बौनेपन से बाहर निकलेगी।लेकिन विगत एक साल में पश्चिम बंगाल में नीतिगत संकीर्णतावाद से निकलने की बजाय और भी ज्यादा अनुदार भावों-विचारों के हमले तेज हुए हैं।

ममता सरकार की विशेषता है राष्ट्रीयविज़न का अभाव और अंध-वाम विरोध।यह वस्तुतःजनघाती नजरिया है। राजनीति विशेषज्ञ आशाए लगाए बैठे थे कि अमेरिकी विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन से मिलने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की आंतरिक कट्टरता खत्म होगी। लेकिन हुआ एकदम उलटा। अमेरिकी विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन ने ममता बनर्जी को जब राज्य में अमेरिकी पूंजी निवेश का आश्वासन दिया था तो उनके दिमाग में यह था कि राज्य में सेजनीति है और अमेरिकी धनाढ़्यों को पश्चिम बंगाल में धन लगाने के लिए प्रेरित करने में कोई खास दिक्कत नहीं होगी। लेकिन अभी ममता-हिलेरी मुलाकात की खबरों की स्याही सूखी भी नहीं थी कि ममता सरकार ने सेजनीति खत्म करने का फैसला कर लिया।

सेजनीति के खत्म होने का अर्थ है कि आने वाले समय में पश्चिम बंगाल में कोई औद्योगिक निवेश नहीं आने वाला। देशी-विदेशी इजारेदार और बहुराष्ट्रीय कंपनियां सेज के अभाव में पश्चिम बंगाल में पूंजी निवेश के लिए आने वाली नहीं हैं। वैसे भी ममता सरकार की निष्क्रियता और गिरती साख के कारण विगत अक साल में एकदम पूंजी निवेश नहीं हुआ । न कोई नया कारखाना खुला और नहीं किसी पूंजीपति ने इस राज्य में दिलचस्पी ली। सिर्फ मीडिया इवेंट के प्रचार-प्रसार में विगत एक साल खत्म हुआ है।

लोग आस लगाए बैठे थे कि ममता बनर्जी दूसरे साल के आरंभ होने पर कुछ नये कदम उठाएंगी लेकिन उनको निराशा हाथ लगी है।अपनी सरकार के एक साल पूरा होने पर सार्वजनिक तौर पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि राज्य सरकार ने 3लाख लोगों के लिए नए पद सृजित किए हैं। कई लाख लोगों को वे निजी क्षेत्र में रोजगार मिलने के चांस हैं।लेकिन व्यवहार में उन्होंने किया उलटा। राज्य की 2003 में बनी सेजनीति खत्म करने का फैसला ले लिया। इससे राज्य में औद्योगिक विकास की संभावनाएं पूरी तरह खत्म हो गई हैं। इस फैसले का दोमुंहापन जगजाहिर है। मसलन् वामशासन में सेजनीति के तहत लिए गए फैसलों को बरकरार रखा गया है। साथ ही कई कंपनियों को आगामी वर्षों के लिए एक्सटेंशन भी दिया है। खडगपुर स्थित श्रेई इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी को ममता सरकार ने सेज नीति के तहत एक्सटेंशन दिया है। पूर्व सरकार के सेज संबंधी फैसले नहीं बदले जाएंगे। यानी पूर्व फैसलों पर सेजनीति लागू रहेगी। लेकिन नए फैसले नहीं लिए जाएंगे।

दूसरी समस्या यह है कि मौजूदा सेज प्रकल्पों को किस नीति के तहत जारी रखा जाएगा ? सेजनीति जब खत्म हो गयी है तो पुराने सेज फैसलों पर किस नीति के तहत फैसले लिए जाएंगे? मुश्किल यह है कि ममता सरकार माओवादियों के विज़न के आधार पर राज्य की अर्थव्यवस्था को दुरूस्त करना चाहती है। भारत में सभी राज्यों में सेज नीति लागू है। अब सिर्फ पश्चिम बंगाल में सेज नीति नहीं होगी। कारपोरेट घराने सेज के तहत जहां बेहतर सुविधाएं मिल रही हैं वहां पर पूंजी निवेश करने जा रहे हैं। उल्लेखनीय है पश्चिम बंगाल में सेजनीति 2003 में बनाई गई थी। लेकिन 23मई 2012 को राज्य की मंत्रीमंडलीय उपसमिति ने सिफारिश की है कि राज्य की 2003 की सेजनीति को खत्म कर दिया जाए। उम्मीद है कि इस महीने के अंत में मंत्रीमंडलीय उपसमिति का फैसला मंत्रीमंडल के सामने रखा जाएगा। कायदे से ममता सरकार में शामिल अन्य मंत्रियों, खासकर कांग्रेस के मंत्रियों को इस मसले पर खुलकर बोलना चाहिए और उपसमिति के फैसले को एकसिरे से खारिज करने के लिए दबाब डालना चाहिए।

एक अन्य मुश्किल यह भी है कि केन्द्र में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में साझीदार है, और केन्द्र सरकार राष्ट्रीय सेजनीति से प्रतिबद्ध है। फलतः केन्द्र में ममता बनर्जी का दल भी सेज से बंधा है। उल्लेखनीय है पहलीबार जब सेज के बारे में बातें हुई थीं तो ममता बनर्जी ने इस नीति का समर्थन किया था। सन् 1997-2000 के बीच में आयात-निर्यात नीति हुआ करती थी, उसको ही कुछ संशोधनों के बाद सन् 2000 में विशेष आर्थिक क्षेत्र नीति (सेजनीति) के नाम से लागू किया गया। इसके तहत कंपनियों को विभिन्न किस्म के करों में रियायतें दी गयी हैं। ममता बनर्जी ने न तो कभी आयात-निर्यात नीति का विरोध किया और न कभी राष्ट्रीयसेज नीति का ही विरोध किया। सिंगूर-नंदीग्राम आंदोलन के दौरान नक्सलियों के प्रभाव के चलते ममता बनर्जी ने पहलीबार सेज का विरोध किया था और विधानसभा चुनाव घोषणापत्र में सेजनीति समाप्त करने का वायदा किया था।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का तर्क है कि उनके दल ने चूंकि चुनाव में सेजनीति रद्द करने का वायदा किया था अतः उन्होंने सेजनीति रद्द करके अपने चुनावी वायदे का पालन किया है। यह तर्क बेहद खतरनाक है और इसके आधार पर किसी भी राज्य में स्थिर आर्थिक विकास को सुनिश्चित नहीं बनाया जा सकता है। राज्यों में हर पांच साल में नई सरकारें आती हैं।यदि विगत सरकार का कोई नीतिगत फैसला राज्यनीति तक ही सीमित है तो उसे बदला जा सकता है ,लेकिन यदि कोई नीतिगत फैसला राष्ट्रीय नीति के परिप्रेक्ष्य और समर्थन में लिया गया है तो उसे नहीं बदला जा सकता।

सभी राज्य सरकारों की यह संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वे अपने यहां केन्द्र सरकार की नीतियों को लागू करें। राष्ट्रीय सेजनीति भारत की संसद से पारित नीति है , उसे लागू करना प्रत्येक राज्य की जिम्मेदारी है। एक अन्य पक्ष यह भी है कि जब एकबार केन्द्र को कोई राज्य सरकार आश्वासन देती है तो आने वाली सरकार की जिम्मेदारी है कि वह उसका पालन करे।

राष्ट्रीय नीतियों के मामले में यदि ममता बनर्जी क्षेत्रीयतावाद के हथियार का प्रयोग करती हैं तो इससे राज्य के विकास में अनेक बाधाएं आएंगी। ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई दल केन्द्र में सत्ता में रहे, और राज्य में केन्द्र की नीतियों का अनुमोदन न करे। दूसरी ओर यह कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व की भी समस्या है कि उनके यूपीए गठबंधन में एक ऐसा दल सरकार में है जो नव्य आर्थिक उदारतावाद की एक महत्वपूर्ण नीति,राष्ट्रीय सेज नीति ,को नहीं मानता तो क्या राजनीतिक तौर पर ऐसे दल को केन्द्र सरकार में रखना सही होगा ?

गुरुवार, 24 मई 2012

मनमोहन प्रेम का अंत


मनमोहन सरकार का आम जनता के साथ अन्तर्विरोध प्रखर हो गया है। जिन लोगों ने यह सपना देखा था कि नव्य आर्थिक नीतियां मध्यवर्ग के लिए फायदेमंद हैं और यह वर्ग कम से कम चैन की बंशी बजाएगा।आज वे लोग निराश हैं। मनमोहन सरकार ने मध्यवर्ग के चैन को बेचैनी में बदल दिया है। मुश्किल यह है कि 1990-91 के बाद से मध्यवर्ग में आरामतलबी के संस्कार गहरे हुए हैं। जनांदोलनों से मध्यवर्ग की दूरी बढ़ी है। बल्कि यों कहें मध्यवर्ग का एक बड़ा अंश जनांदोलनों के प्रति संशय में ठेल दिया गया है। मीडिया और उपभोक्तावाद की आक्रामक रणनीतियों ने इस वर्ग को पराश्रित बना दिया है और गहरे अवसाद में डुबो दिया है। ऐसे में मध्यवर्ग में से प्रतिवाद की जगह सिर्फ मीडियापीड़ा के स्वर सुनाई दे रहे हैं।मध्यवर्ग की मीडियापीड़ा को आम जनता के संघर्ष में रूपान्तरित करने की जरूरत है।

मध्यवर्ग के नपुंसक बनाए जाने की स्थिति का मजदूर संगठनों और कम्युनिस्ट पार्टियों पर भी असर हुआ है वे भी ठलुआदल बनकर रह गए हैं। यही वह नपुंसक परिवेश है जिसको चुनौती देने की जरूरत है। नपुंसक परिवेश नव्य आर्थिक उदारनीतियों की देन है और महंगाई का उससे गहरा संबंध है।जब तक विपक्ष इन नीतियों के खिलाफ एकजुट नहीं होता भविष्य में भी महंगाई के झटके लगते रहेंगे।

मनमोहन सिह सरकार के खिलाफ राष्ट्रीय प्रतिवाद का अभाव इस बात का संकेत है कि मध्यवर्ग परजीवी है और माहौल नपुंसक है। ऐसे में प्रतिवाद दिवा-स्वप्न ही प्रतीत हो रहा है । मनमोहन सरकार ने अपनी जनविरोधी इमेज में चार चाँद लगाते हुए जिस तरह पेट्रोल के दामों में साढ़े सात रूपये का इजाफा किया है। उससे एक बात साफ हो गयी है कि यह सरकार आम जनता के हितों के बारे में कागजीतौर पर वचनवद्ध है। आम आदमी और खासकर मध्यवर्ग इसके निशाने पर है। क्या इतने बड़ी मूल्यवृद्धि के बाद भी मनमोहन सरकार को उसके सहयोगी दल समर्थन देते रहेंगे ? कायदे से ममता-मुलायम -मायावती -करूणानिधि और लालू यादव को यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस ले लेना चाहिए।

केंद्र सरकार ने पेट्रोल बम फोड़कर आम आदमी की जेब को लहुलूहान करने की पूरी तैयारी कर ली है। एक न्यूज एजेंसी के हवाले से आई खबर के मुताबिक, पेट्रोल के दाम में प्रति लीटर 7.50 पैसे का इजाफा किया गया है। ऐसे में इस इजाफे को जोड़ते हुए पिछले 3 सालों में पेट्रोल की कीमतों में करीब 23 रुपये का इजाफा किया जा चुका है। वहीं डीजल को लेकर ये आंकड़ा 8 रुपये प्रति लीटर है। महंगाई से त्रस्त भारतीय जनता के लिए ये इजाफा कमर तोड़ने वाला है।आने वाले समय में गैस के प्रति सिलेण्डर और डीजल के दामों में भी इजाफा होने के चांस हैं।यह नव्य आर्थिक उदारीकरण का क्लाइमेक्स है ।मनमोहन सरकार ने मंदी के समय में जनता के ऊपर यह भारी बोझ डालकर अपनी हृदयहीनता का परिचय दिया है।

असल में, मीडिया -मनोरंजन और उपभोक्तावाद की अशांत भूख ने मध्यवर्ग और आम आदमी को इस कदर घेरा है कि उसके पास प्रतिवाद के लिए समय ही नहीं बचा है।हम लोग प्रतिवाद के नाम पर जैसे-तैसे वोट डाल आते हैं और फिर पांच साल तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। इससे लोकतंत्र बेजान हो गया है। वोट डालना लोकतंत्र के प्रति सामाजिक जिम्मेदारी की इतिश्री नहीं है।बल्कि वह तो शुरूआत है।

कांग्रेस की ठग नीतियों से बचने का एकमात्र रास्ता है लोकतांत्रिक हकों के लिए नियमित संघर्ष और सरकार पर आंदोलन के जरिए दबाब। आम लोगों को लोकतंत्र बचाने के लिए अपनी आरामगाह से बाहर निकलना होगा। मीडिया की नकली बहसों से आगे जाकर सड़कों-गलियों -मुहल्लों में महंगाई और अन्य सवालों पर बहसों को नियोजित करना करना होगा।संगठनवद्ध करना होगा। और स्थानीय स्तर पर दीर्घकालिक संघर्ष की तैयारी करनी होगी।

आज स्थिति यह है मनमोहन सरकार के हाथों समूची अर्थव्यवस्था कुप्रबंधन का शिकार होकर रह गयी है। डॉलर के मुकाबले रूपये की स्थिति बदतर है,निजीक्षेत्र को बेशुमार आर्थिक रियायतों के बाबजूद कोई औद्योगिक रैनेसां नहीं हुआ है। निजी क्षेत्र में मजदूरों की पगार में कोई इजाफा नहीं हुआ है। सरकारी कर्मचारियों के बढ़ाए नए वेतनमान अब सुचारू जीवन संचालन के लिए अपर्याप्त साबित हो रहे हैं।यानी आम लोगों के सामने पामाली में जीने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। ऐसे में मध्यवर्ग की चुप्पी चिंता की बात है। मध्यवर्ग को अपने हितों के बारे में सोचने के साथ आम जनता यानी मजदूरों-किसानों के बारे में भी सोचना होगा।

हमें यह भी ध्यान रखना होगा लोकतंत्र का अर्थ निरंकुश लोकतांत्रिक शासन और गूंगी- बहरी जनता नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ,आम जनता के साथ निरंकुश शासक की तरह व्यवहार कर रहे हैं और बाकी दलों के नेता अनुनय-विनय-अपील के भाव से पेश आ रहे हैं। लोकतंत्र में हमें मनमोहन सिंह जैसे निरंकुश शासक नहीं चाहिए। कायदे से विपक्षीदल मनमोहन सरकार के खिलाफ तदर्थ प्रतिवाद का रवैय्या त्यागें और ईमानदारी से दीर्घकालिक संघर्ष की घोषणा करें और सड़कों पर आएं।

महंगाई के सवाल पर वामपंथीदलों और गैर-वामपंथी विपक्षी दलों को सड़कों पर संयुक्त कार्रवाई करनी चाहिए। अन्नाहजारे - बाबा रामदेव को महंगाई के खिलाफ आवाज उठाने से किसने रोका हुआ है। अन्ना से करूणानिधि तक सबको सड़कों पर आना चाहिए। हर आदमी को विरोध करना चाहिए और पीएम को प्रतिवाद करते हुए ईमेल करना चाहिए।


मंगलवार, 22 मई 2012

पितृसत्ता को भूलो और बोलो "सत्यमेव जयते"

सत्यमेव जयते सीरियल की इन दिनों खूब चर्चा है। सामाजिक समस्याओं पर समाज का ध्यान खींचने वाले इस सीरियल को लोग विभिन्न चैनलों पर देख रहे हैं। यह पहला ऐसा सीरियल है जो अनेक चैनलों पर एक साथ दिखाया जा रहा है। जिन चैनलों पर दिखाया जा रहा है उनकी रेटिंग में इससे इजाफा हुआ है।

उल्लेखनीय है टीवी मीडियम इन दिनों गंभीर संकट में है, उसके पास विज्ञापन और धांसू कार्यक्रमों का अभाव है, इसके अलावा दर्शकों का भी मोहभंग हो रहा है।अन्ना हजारे –रामदेव के आंदोलनों ने रेटिंग में सुधार करने में मदद नहीं की है। ऊपर से आर्थिकमंदी के कारण निजी कंपनियों के विज्ञापनों का स्रोत भी सिकुड़ गया है। फलतःचैनलों में बड़ी मात्रा में सरकारी टीवी विज्ञापनों की संख्या हठात बढ़ गयी है।इससे टीवी उद्योग को थोड़ी राहत मिली है। उसे राहत पैकेज के अंग के रूप में आमीर खान का सत्यमेव जयते आया है। लेकिन आमिरखान के सत्यमेव जयते के जरिए टीवी मीडियम में जान फूंकने की यह असफल कोशिश है। टीवी का यह संकट टलने वाला नहीं है।

फिल्मी अभिनेता एक अवधि के बाद टीवी पर दर्शकों को खींच नहीं पाते। अमिताभ बच्चन का शो कौन बनेगा करोड़पति एक अवस्था के बाद अपनी चमक खो बैठा।शाहरूख खान का शो पिट गया। विचारणीय बात यह है कि ये अभिनेतागण फिल्म उद्योग में धड़ाधड़ पिट रहे हैं। फिल्म उद्योग बैठा जा रहा है। ये अभिनेता अभी तक फिल्म उद्योग को संकट से निजात नहीं दिला पाए हैं।ऐसे में इन फिल्मी नायकों से टीवी मीडियम को बहुत ज्यादा मदद नहीं मिलेगी। इसके विपरीत फिल्म उद्योग और भी संकट में फंसेगा।

आमीर खान और दूसरे अभिनेताओं की खूबी है कि वे अपने कार्यक्रम और अपनी फिल्म की रेटिंग बढ़ा सकते हैं लेकिन उनसे समूचे मीडियम को संकट मुक्त करने या समाज को संकटमुक्त करने की मांग करना ठीक नहीं होगा।

भारतीय राजनीति और समाज में इनदिनों एक भेड़चाल दिखाई दे रही है। आम आदमी किसी भी चीज को मीडिया में खासकर टीवी में देखता है तो जल्द ही प्रभावित होता है और तुरंत राय देता है,पुलिस और राजनेता भी एक्शन में आ जाते हैं। इससे यह पता चलता है कि अब समाज के संचालक संस्थान टीवी की शक्ति को महसूस करने लगे हैं। कभी कभी टीवी और समाज,टीवी और राजनीति के अंतर्विरोध भी सामने आ जाते हैं। जैसाकि सत्यमेव जयते के प्रसारण के साथ ही हुआ । उसका पहला एपीसोड़ कन्या भ्रूण –हत्या पर था।इसने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष ढ़ंग से राजनीति और कन्या भ्रूण हत्या के अंतर्विरोधों को उजागर कर दिया है। मध्यवर्गीय समाज और कन्या के अंतर्विरोध को नंगा करके सामने रखा है।यह पॉजिटिव पक्ष है। राजस्थान में आज के हालात में जो भी सरकार कन्या भ्रूण –हत्या के खिलाफ एक्टिव होगी उसे अपने वोटबैंक से हाथ धोना पड़ेगा। अन्य राज्यों में भी स्थिति इससे बेहतर नहीं है। उल्लेखनीय है वोट पाने के लिए हमारे प्रमुख गैर वाम राजनीतिदल 1986-87 में सतीप्रथा का नग्न समर्थन कर चुके हैं और आज भी हरियाणा में सरकारी संरक्षण में सर्वखार पंचायते हिटलरी फरमान जारी करती रहती हैं और संविधान की धज्जियां उड़ाती रहती हैं।

आमीर का यह सीरियल काफी महंगा है। टीवी के चंगे धंधे के लिए चर्चित सवाल ,सामाजिक सरोकारों का छोंक और सैलीब्रिटी नायक का एंकर रूप एक हिट फार्मूला है, लेकिन एक अवधि के बाद यह फार्मूला बेअसर रहता है। यह नकली नायक का नकली प्रचार है। यह रीयलिटी टीवी की कृत्रिम सामाजिकता है।

इसका एक सकारात्मक प्रचार मूल्य है कि यह भारतीय मीडिया में व्याप्त सामाजिक सरोकारों के शून्य को एक हद तक भरता है। मीडिया ने खासकर टीवी ने जिस तरह विकास और सामाजिकता के सवालों को त्यागकर सस्ते मनोरंजन का रास्ता पकड़ा है उसकी ओर से ध्यान हटाने में इस तरह के कार्यक्रम मददगार होते हैं।

दैनिक भास्कर के अनुसार " 'सत्यमेव जयते' आमिर और स्टार इंडिया का साझा प्रोजेक्ट है और बताया जाता है कि इसकी मार्केटिंग पर 20 करोड़ रुपये से भी ज्यांदा खर्च हुए हैं। किसी टीवी शो के लिए मार्केटिंग पर इतनी बड़ी रकम शायद पहली बार खर्च की जा रही है। मार्केटिंग का जिम्मा स्टार नेटवर्क को सौंपा गया है। स्टार इंडिया की वाइस प्रेसिडेंट (मार्केटिंग एंड कम्यूानिकेशंस) गायत्री यादव कहती हैं कि ‘दिल को लगेगी, तभी बात बनेगी’ का टैग लाइन इस शो के बारे में बताता है और यही कंपनी के मार्केटिंग अभियान का आधार है।"

"इस शो के प्रोमो सिनेमा हॉल में दिखाए जा रहे हैं। स्टार इंडिया ने कई ऐसे गांवों की पहचान कर, जहां पूरी आबादी के सिर्फ एक तबके के पास टीवी सेट हैं, शो की स्पेाशल स्क्री।निंग की। इन गांवों के आसपास एक सार्वजनिक स्थाचन या टाउन हॉल जैसे स्थान पर ‘सत्यटमेव जयते’ के पहले शो की खास स्क्री निंग की व्यएवस्थास की गई है। इन गांवों में से ज्या दातर की आबादी 5000 से कम है और शायद पहली बार होगा जब इन्हें टीवी की ताकत का अनुभव होगा। शो स्टा र नेटवर्क के तमाम भाषाओं के चैनलों पर प्रसारित किया जा रहा है। दूरदर्शन सहित कुल दस चैनलों के जरिए शो को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया गया। यहां तक कि स्टानर न्यू ज पर आज भी इस शो को लेकर खास कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं। स्टा र नेटवर्क के इस खबरिया चैनल पर इस शो को कैंपेन के रूप में 'कवर' किया जा रहा है। पहली बार ऐसा हो रहा है कि टीवी पर कोई शो एक साथ देशभर में दिखाने की इतने बड़े पैमाने पर व्यवस्था की गई है। इस शो में ‘भावनाओं का खुला प्रदर्शन’ हो रहा है। इसमें ऐसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं ताकि अधिक से अधिक महिलाओं को जोड़ा जा सके। गायत्री यादव कहती हैं, ‘यह शो देश की जनता के लिए हैऔर हमारी रणनीति है कि देशभर की जनता इस शो को देखे। इस शो को ऐसे इलाकों में दिखाया जा रहा है जहां सीमित संख्याक या नहीं के बराबर टीवी सेट हैं।’ शो का चर्चा में आना इसी कवायद का नतीजा है। इस कवायद का फायदा यह भी रहा कि विज्ञापनदाताओं से 10 सेकेंड के लिए 10 लाख रुपये वसूले जा रहे हैं। आईपीएल मैचों के प्रसारण के दौरान विज्ञापन के लिए इतने ही वक्त् के लिए चार लाख रुपये ही देने पड़ते हैं। विज्ञापन की दरों के बारे में स्टार इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के सीओ संजय गुप्ता कहते हैं, ‘यह बेहद खर्चीला शो है और हमें इस पर होने वाला खर्च जुटाना है।’ "

सत्यमेव जयते के प्रसारण के साथ ही राजनेताओं और खासकर कांग्रेस के नाताओं की स्थिति बड़ी हास्यास्पद रूप में सामने आई है। कांग्रेस और भाजपा में इनदिनों टीवी के प्रचार का राजनीतिक लाभ उठाने की होड़ लगी है। इस होड़ में वे तमाम किस्म की बेबकूफियां भी कर रहे हैं। इसी तरह एक बेबकूफी सत्यमेव जयते के प्रसारण के साथ राजस्थान के मुख्यमंत्री ने की। उन्होंने कन्या- भ्रूण हत्या के मामले पर एपिसोड प्रसारित होते ही तुरंत आमीर से मिलने का प्रयास किया और मुलाकात की और इस मुलाकात को मीडिया इवेंट बनाया गया। इस मुलाकात को आमीर खान ने अपनी प्रमोशन स्कीम में डाल दिया और मुख्यमंत्री ने अपनी राजनीतिक स्कीम में डाल दिया। इस प्रसंग में कई सवाल उठे हैं जिन पर विचार करने की जरूरत है।

पहला सवाल यह उठा है कि आमीरखान के सत्यमेव जयते सीरियल के कन्या भ्रूण हत्या पर बने एपीसोड पर भारत की सिर्फ एक ही राज्य सरकार ने रेस्पांस क्यों दिया ? अन्य राज्य सरकारों पर इस सीरियल का असर क्यों नहीं हुआ ? क्या यह समस्या राजस्थान की ही है ? इसी तरह दहेजप्रथा विरोधी एपीसोड के बाद क्या आने वाले कुछदिनों में होने वाली शादियों में लोग दहेज नहीं लेंगे ? क्या नौजवान अब जगह-जगह सड़कों-मंदिरों-सिनेमाघरों और आमीरखान की तस्वीर के सामने दहेज न लेने की कसम खाते दिखेंगे ?

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि हिन्दुस्तान में 30करोड़ से ज्यादा खेतमजदूर हैं और कई करोड़ आदिवासी हैं जिनके यहां दहेजप्रथा नहीं है। दहेजप्रथा मूलतः मध्यवर्गीय समस्या है । सवाल उठता है आमीर की चिन्ता में मध्यवर्ग का सामाजिक संकट ही बार बार क्यों आ रहा है ? भारत में सम्प्रति मध्यवर्ग सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया के बाहर चला गया है।वह सत्ता और उपभोग का अंग बन गया है। सामाजिक परिवर्तन पर उसने पेसिव भाव ग्रहण कर लिया है।ऐसे में सत्यमेव जैसे सीरियल इसवर्ग पर अब कोई असर नहीं छोड़ते। उसे इस तरह के कार्यक्रम अब बेचैन नहीं करते।

एक अन्य सवाल यह भी है कि क्या आमीर के इस सीरियल को स्पांसर करने वाली कंपनियां अपने विज्ञापनों और उन धारावाहिकों में लगदगजीवन शैली, लालच और ईर्ष्या का महिमामंडन करते हैं ? समाज की सूरत बदलने के लिए जरूरी है कि स्पांसर कंपनियां अपनी विज्ञापननीति बदलें। इस तरह के कार्यक्रमों को स्पांसरशिप बंद करें। इससे जीवन और टीवी दोनों बदलेंगे।

सत्यमेव जयते के सवाल समाज को बदलने के साथ टीवी को भी बदलने के सवालों से भी जुड़े हैं। क्या हम अपने टीवी मनोरंजन के फॉरमेट और नजरिए को बदलने को तैयार हैं ? क्या सारी दुनिया में टीवी संस्कृति और उपभोक्ता संस्कृति का महान सर्जक स्टार ग्रुप (न्यूज कारपोरेशन) अपना टीवी मनोरंजन फॉरमेट बदलने को तैयार है ? आज सच यह है कि जैसा टीवी होगा वैसा ही समाज होगा। टीवी संस्कृति ने लालच को महान सामाजिक मूल्य बनाया है।

हिन्दी चैनलों में सीरियलों और विज्ञापनों के फ्लो में लालच.शानो-शौकत, लगदग जिंदगी, गहने, दौलत का अहर्निश प्रदर्शन ,मध्यवर्ग में लालची मनोदशा को हवा दे रहा है,ऐसे में सत्यमेव जयते सीरियल में दहेज प्रथा के खिलाफ अपील का क्षणिक प्रचार से ज्यादा महत्व नहीं है।

आमीरखान ने रियलिटी टीवी फॉरमेट का इस सीरियल में इस्तेमाल किया है। इसमें तालियां बजाने के लिए चुटीले बयान भी हैं। जैसे,आमीर खान ने कहा "शादी को एटमबम न बनाएं बल्कि धूपबत्ती बनाएं ।" इस तरह के बयान मध्यवर्ग को सुनने में अच्छे लगते हैं ,क्योंकि वह पेसिव अवस्था में पड़ा हुआ वर्ग है। परजीवी वर्ग है। इस वर्ग में किसी भी किस्म के सामाजिक परिवर्तन के साथ खड़े होने की संभावनाएं नजर नहीं आतीं।

दहेज सामाजिक विपत्ति है ।जबकि सीरियल में दहेजविरोधी बातें व्यक्तिगत चीजें हैं। दहेज और कन्या भ्रूण हत्या जैसे सवालों पर व्यवस्थागत संरचनाओं और सामाजिक संबंधों में आमूल परिवर्तन करना होगा।इसके अलावा पितृसत्ता की विचारधारा के खिलाफ वैचारिक संघर्ष करना होगा। यह काम सीरियल नहीं कर सकता।टीवी क्रांति के बाद सीरियल संस्कृति और विज्ञापनों ने पितृसत्ता की विचारधारा को पुख्ता बनाया है। आमीरखान इस क्षेत्र को एकदम स्र्पर्श नहीं करते। कन्या भ्रूण हत्या से लेकर दहेदप्रथा तक सारी समस्याओं की जड़ है पितृसत्तात्मक संरचनाएं, कानून,सामाजिक संबंध और विचारधारा। आमीरखान इस एरिया की उपेक्षा किए हुए हैं।

सीरियल ध्यान खींच सकता है लेकिन पितृसत्ता विरोधी परिवर्तनों का वाहक नहीं बन सकता। पितृसत्ता विरोधी परिवर्तनों का अर्थ है मीडिया में और खासकर टीवी सीरियल में आधुनिक स्त्री की पहचान की स्थापना करना।

सीरियल संस्कृति ने सारी दुनिया में स्त्री को पुरूष की मातहत बनाया है,अघिकारहीन उपभोक्ता बनाया है। यही वजह है पितृसत्ता विरोधी परिवर्तन कभी सीरियल या मीडिया इवेंट के जरिए नहीं आते। उनके लिए सामाजिक आंदोलन और सामाजिक दबाब पैदा करने की जरूरत है। सीरियल के कम्युनिकेशन की यह समस्या है कि उसमें स्वयं कुछ करने की क्षमता नहीं है। सीरियल को जिस क्षण देखते हैं उसी क्षण तक याद रखते हैं। यह कम्युनिकेशन को स्मृति और समाज में सुरक्षित रखने में असमर्थ है।

सीरियल का असर तब ही होता है जब समग्र मीडिया फ्लो उसकी संगति में हो और नीचे सीरियल के मैसेज को लागू करने वाली संरचनाएं सक्रिय अवस्था में हों। दैनिक भास्कर के अनुसार इस शो के लिए आमिर खान को प्रति एपिसोड तीन करोड़ रुपये मिल रहे हैं। टीवी की दुनिया में पहली बार ऐसा हो रहा है कि बॉलीवुड की किसी हस्ती या एंकर को इतनी मोटी रकम दी जा रही है। सत्यमेव जयते के हर एपिसोड पर करीब चार करोड़ रुपये का खर्च आ रहा है। जबकि आम तौर पर हिंदी चैनलों पर प्राइम टाइम के दौरान दिखाए जाने वाले आधे घंटे के एक शो पर आठ से नौ लाख रुपये खर्च होते हैं। रियलिटी शो के एक एपिसोड पर 35 लाख से 2 करोड़ का खर्च (होस्ट पर निर्भर) आता है।अंत में यही कहना है कि फिर भी यह एक स्वस्थ मनोरंजन तो है ही।
































सोमवार, 21 मई 2012

ममता बनर्जी के पापुलिज्म का टूटता तिलिस्म


राजनीति में पापुलिज्म कैंसर है। पापुलिज्म के आधार पर सरकार गिराई जा सकती है लेकिन सरकार चलायी नहीं जा सकती। पापुलिज्म के आधार पर इमेज बना सकते हैं लेकिन इस इमेज को टिकाऊ नहीं रख सकते। आज यही पापुलिज्म मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ा है। पश्चिम बंगाल की सत्ता की कमांड संभाले उन्हें एक साल हो गया है। इस एक साल में उनकी कार्यशैली के मिथ टूटे हैं। इसके बाबजूद ममता बनर्जी की एक व्यक्ति के रूप में आम लोगों में अपील बरकरार है। उनकी सादगी और बेबाक अभिव्यक्ति में आम आदमी आज भी आनंद लेता है। 

प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने 12 मई को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात करने के बाद प्रेस से कहा कि मीडिया को ममता के सकारात्मक गुणों जैसे उनकी सादगीपूर्ण जीवनशैली और ईमानदार व्यक्तित्व के प्रचार पर जोर देना चाहिए। काटजू के इस बयान में एक अच्छे गुण के प्रति जो सम्मानभाव व्यक्त हुआ है वह महत्वपूर्ण है। वैसे कायदे से देखा जाए तो प्रेस परिषद के अध्यक्ष का यह काम नहीं है कि वह मीडिया को यह बताए कि ममता बनर्जी के बारे में मीडिया क्या करे । दुर्भाग्य से काटजू जब यह बोल रहे थे तो वे ममता के जनसंपर्क अधिकारी लग रहे थे।

जस्टिस काटजू शायद भूल गए कि मीडिया ने ममता बनर्जी की ईमानदार छवि और सादगीभरी जिंदगीशैली का जमकर प्रचार किया है। राज्य का मीडिया यह काम विगत कई सालों से यही काम कर रहा है। ममता बनर्जी ने जो कहा उसे बिना जांच- परख के बिना अकाट्य सत्य मानकर छापता रहा है। संभवतः इस तरह का अंध मीडिया समर्थन देश में हाल के वर्षौं में किसी राजनेता को नसीब नहीं हुआ।

लंबे समय से मीडिया तो ममता बनर्जी का दीवाना रहा है। दीवानगी की यह पराकाष्ठा है कि मीडिया ने खबर और प्रौपेगैण्डा के बीच के अंतर को भी खत्म कर दिया और ममता बनर्जी के प्रौपेगैण्डा को खबर बना डाला। मीडिया की अंधभक्ति ने दुतरफा संकट पैदा किया है। पहला संकट मीडिया के सामने है कि वह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को वर्चुअल इमेजों के रूप में देखे या रीयल मुख्यमंत्री की इमेजों में देखे। ममता की मीडियानिर्मित इमेजों ने ममता बनर्जी के सामने यह संकट पैदा किया है कि वे अपने बनाए सपनों में कैद होकर रह गयी हैं। आज ममता बनर्जी के लिए उनके सपने हासिल करना कठिन हो गया है।

जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने असल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के निजी गुणों पर जोर देकर प्रकारान्तर से यह भी कहा है कि ममता सरकार ने विगत एक साल में कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया। वरना काटजू साहब के बयान में ममता सरकार की किसी उपलब्धि का जिक्र जरूर होता। जब किसी राजनेता के राजनीतिक कार्यकलापों की बजाय उसके निजी गुणों पर कहा जाने लगे तो राजनीतिक भाषा में कमजोरी के रूप में देखा जाता है।

विगत एक साल के शासन में ममता बनर्जी की कार्यशैली में सबसे बड़ी बाधा वे स्वयं बनकर सामने आई हैं। यह सच है कि वाममोर्चे को पराजित करके ममता सरकार को राज्य में लोकतांत्रिक माहौल को प्रतिष्ठित करने का श्रेय जाता है। वाममोर्चे ने जिस तरह की दमघोंटू संस्कृति राज्य में पैदा की थी उससे आम नागरिकों को निजात मिली। अमूमन दमघोंटू संस्कृति में पापुलिज्म संजीवनी होता है।यही वजह है कि ममता बनर्जी जब एक साल पहले जीतकर आईं तो आमलोगों ने दिल खोलकर उनका स्वागत किया।

ममता बनर्जी ने एकसाल पहले वाममोर्चा को नकली और स्वयं को असली वामपंथी कहते हुए जीत हासिल की थी। मजेदार बात यह है कि वे पापुलिस्ट स्टायल में बोलती हैं और आमलोगों को आकर्षित करती हैं ।लेकिन मुख्यमंत्री बनने के पहले और बाद वाली इमेज में जमीन-आसमान का अंतर है। मुख्यमंत्री बनने के पहले उन्होंने मानवाधिकारहनन से जुड़ी समस्याओं को पापुलिज्म के कलेवर में पेश किया। इससे आमलोगों में यह मिथ बना कि ममता बनर्जी मानवाधिकार हनन के खिलाफ लड़ने वाली जंगजू महिलानेत्री है। राजनीतिक सवालों को पापुलिज्म की चाशनी में डुबोकर देने से उनको लाभ मिला उनके भाषणों में पापुलिज्म को आमलोग रियलिज्म समझने लगे। उवके भाषण और मीडिया उन्माद को आनेवाली सच्चाई समझने लगे और यह उम्मीद करने लगे कि ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनेंगी तो राज्य की समस्याएं तत्काल हल कर हो जाएंगी। लेकिन सारी दुनिया का तजुर्बा बताता है पापुलिज्म से जनता को सड़कों पर उतारा जा सकता है,वोट हासिल किए जा सकते हैं, युद्ध लड़े जा सकते हैं लेकिन जनहित के काम नहीं किए जा सकते।

विगत एक साल में संभवतः ममता बनर्जी बड़ी शिद्दत के साथ यह महसूस करती रही हैं कि वे जिस गति और शैली में काम कर रही हैं उसके अभीप्सित परिणाम सामने नहीं आए हैं। राजनीति विशेषज्ञों का एक वर्ग यह मानता है कि ममता बनर्जी को पापुलिज्म की गिरफ्त से बाहर आकर काम करने की जरूरत है। राज्य सरकार के मुखिया के रूप में पापुलिज्म अनेक किस्म के खतरों को जन्म दे सकता है। मसलन् पापुलिज्म में एकनेता का शासन चलता है लेकिन सरकार सामूहिक नेतृत्व से चलती है। पापुलर नेता के रूप में ममता बनर्जी अपने दल के लोगों को एक खास किस्म की राजनीतिक भाषा और मुहावरे में प्रशिक्षित करके सत्ता के शिखर तक पहुँची हैं। तृणमूल कांग्रेस ने एक खास किस्म की पापुलिस्ट भाषा विकसित की है जिसमें सामाजिक-राजनीतिक बहुलतावाद के लिए कोई जगह नहीं है। यानी वे सरकार की भाषा और दल की भाषा में पहले से चले आरहे घालमेल को अभी तक दूर नहीं कर पायी हैं। लेकिन अनेक मामलों में प्रशासन को स्वतंत्र अभिव्यक्ति और स्वतंत्र रूप से काम करने का उन्होंने मौका दिया है। लेकिन मौटे तौर पर प्रशासन और दलतंत्र में वाम मोर्चे के शासनकाल में बना गठजोड़ ज्यों का त्यों बना हुआ है। ममता बनर्जी की यह सबसे बड़ी चुनौती है कि वह राज्य प्रशासन और दलतंत्र के गठजोड़ को तोड़ें। प्रशासन को पेशेवर ढ़ंग से चलाएं। अभी तक इस संदर्भ में ममता बनर्जी की पहलकदमी एकदम नजर नहीं आ रही है। लेकिन एक अच्छा काम हुआ है कि सत्ता और विपक्ष के बीच में वाममोर्चे के जमाने में टूटा संवाद फिर से बहाल हुआ है। इस संदर्भ में ममता बनर्जी ने अपनी पहले वाली एंटी वाम इमेज को विदाई दी है। अनेक प्रमुख मसलों पर सरकार और विपक्ष में सहयोग और समर्थन का वातावरण बना है।

ममता बनर्जी को आने वाले दिनों में अपने बनाए पापुलिज्म को तोड़ना होगा और यह महसूस करना होगा कि मीडिया के अंध प्रचार ने उनकी जो इमेज बनी थी वह सत्य से कोसों दूर थी।मसलन् उदारता और अपव्यय में अंतर करना सीखना होगा। राज्य जिस तरह के आर्थिक संकट में फंसा है उसमें फिजूलखर्ची पर रोक लगाने की जरूरत है। पापुलिज्म और फिजूलखर्ची का गहरा संबंध है।आज समूचे राज्य की आर्थिक प्राथमिकताओं को नए सिरे से निर्धारित करने की जरूरत है। विगत एक साल में ममता सरकार अपनी आर्थिक प्राथमिकताएं तय नहीं कर पायी है।

ममता बनर्जी ने अपनी पापुलर इमेज बनाने के लिए सिंगूर से आंदोलन आरंभ किया था,इस आंदोलन ने ममता की इमेज के साथ पूंजीपति विरोधी की इमेज भी बनी है। टाटा के नैनो कारखाने का विरोध अंततः पुख्ता एंटी कैपिटलिस्ट इमेज बनाने में सफल रहा । इस इमेज के सहारे आंदोलन करके जनता को भड़काया जा सकता है। लेकिन सरकार में आने के बाद यही इमेज आज राज्य में औद्योगिक विकास के मामले में सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ी हो गयी है। इस इमेज से ममता की मुक्ति बेह जरूरी है।

ममता बनर्जी की रेडीकल इमेज के निर्माण की प्रक्रिया में किंगूर-नंदीग्राम आंदोलन के दौरान पश्चिम बंगाल में नए सिरे से रेडीकल मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों का उभार आया था।उल्लेखनीय है इस रेडीकल मध्यवर्ग का वामशासन में लोप हो गया था।

रेडीकल मध्यवर्ग ममता के पापुलिज्म का बाईप्रोडक्ट है। दुर्भाग्य की बात है कि रेडीकल मध्यवर्ग से ममता सरकार आने के बाद अंतर्विरोध बढ़े हैं। वामशासन के दौरान विभिन्न पद्धतियों के जरिए पश्चिम बंगाल के रेडीकल मध्यवर्ग को नपुंसक बनाया गया और अंत में उसे महज भोक्ता और पेसिव दर्शक में तब्दील करने में वाममोर्चा सफल रहा। लेकिन ममता बनर्जी की पापुलर राजनीति ने रेडीकल मध्यवर्ग के सपनों और आकांक्षाओं को जगाकर नए किस्म की संभावनाओं को पैदा किया है। कायदे से ममता सरकार को पश्चिम बंगाल के प्रगतिशील विकास के लिए रेडीकल मध्यवर्ग और पूंजीवादी आकांक्षाओं के बीच में नए संबंध सूत्र बिठाने होंगे। ।

गुरुवार, 17 मई 2012

फेसबुक का लक्ष्य है सामाजिक खुलापन ,अंतहीन साझेदारी और संपर्क

फेसबुक के सर्जक मार्क जुकेरबर्ग ने सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज कमीशन के सामने एस- 1 के तहत सन् 2012 के आरंभ में जो बयान दिया है उसमें उसने कहा है कि फेसबुक का लक्ष्य है विश्व में ज्यादा खुलापन और संपर्क पैदा करना । यानी ज्यादा खुला और कनेक्टेड संसार निर्मित करना फेसबुक का लक्ष्य है। फेसबुक ने अपने इस लक्ष्य के लिए लगातार अपनी तकनीकी और फेसबुक सुविधाओं में निरंतर सुधार करके अपडेटिंग और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को तेज किया है। फेसबुक का दूसरा बड़ा लक्ष्य है अंतहीन साझेदारी। विचार से लेकर वीडियो तक सभी चीजों की सीमाहीन साझेदारी का ऐसा सुंदर मंच मानव सभ्यता में पहले कभी नहीं दिखा । इस क्रम में अनेक मामलों में कॉपीराइट के अनेक नियम भी टूटे हैं।

फेसबुक ने मात्र 8सालों में 75करोड़ लोगों को अपने से जोड़ लिया है। किसी अकेले मीडियम का इतनी बड़ी संख्या में जुड़ना स्वयं में बहुत बड़ी बात है।इतने कम समय में टीवी ने भी यह सफलता नहीं पाई थी। आज फेसबुक पर प्रतिमाह व्यक्ति 7 घंटे खर्च करता है।सन् 2009 में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 4घंटे खर्च करता था। मनुष्यों को एक साथ जोड़ने वाला कोई और प्लेटफॉर्म नहीं है।

फेसबुक पर नाराजगी जताने या उसके यूजरों पर नाराज होने से फेसबुक कम्युनिकेशन की समस्या हल होने वाली नहीं है। इंटरनेट में आज सभी किस्म के कम्युनिकेशन समाहित हो चुके हैं। फोन से लेकर डाकूमेंटस तक,रेडियो से लेकर वीडियो तक।

पहले लोग सोच रहे थे बेव और इंटरनेट की दुनिया महान है लेकिन फेसबुक ने अब इस सबको चुनौती दे दी है। फेसबुक पर हम सब वैसे ही विचरण कर रहे हैं जैसे भाड़े की जमीन पर किसान खेती करता है।वह जितनी मेहनत करता है उतनी बेहतर फसल पैदा होती है। ठीक वैसे ही हम फेसबुक पर हम जितनी मेहनत करेंगे फेसबुक को उतना ही सुंदर बना सकते हैं। प्लेटफॉर्म किसी और का है, लेकिन हम सब उसके किराएदार हैं । कल तक फेसबुक पर विचरण करने को समय की बर्बादी कहा जाता था,लेकिन आज ऐसा नहीं है।जबकि आज कहा जा रहा है कि यह सबसे सस्ता माध्यम है। यह भी कहा जा रहा है कि फेसबुक से समाज के बुनियादी मूल्यों और प्राइवेसी को खतरा है। असल में फेसबुक आक्रामक और प्रभावशाली मीडियम है, इससे खतरे कम हैं फायदे ज्यादा हैं।

फेसबुक ने 8 साल में 75करोड़ लोगों को जोड़ा है,लेकिन इंटरनेट जिस गति से लोगों से जुड़ रहा है उसके अनुसार इतने लोग जोड़ने में उसे 30 साल लगेंगे।पूंजीवाद के इतिहास में कम्युनिकेशन और संपर्क की फेसबुक महानतम उपलब्धि है। इस उपलब्धि को हम सभी बेहतर सभ्य भाषा में इस्तेमाल करें तो ज्यादा स्थायी दोस्त बना सकते हैं।

मंगलवार, 15 मई 2012

जनसत्ता और विक्रम राव का जलेबीलेखन


जनसत्ता अपनी प्रगतिशीलता विरोधी मुहिम में एक कदम आगे बढ़ गया है. उसने के.विक्रम राव का जनसत्ता के 13मई 2012 के अंक में "न प्रगति न जनवाद, निपट अवसरवाद" शीर्षक से लेख छापा है। यह लेख प्रगतिशील लेखकों और समाजवाद के प्रति पूर्वाग्रहों से भरा है।

यह सच है राव साहब की लोकतंत्र में आस्थाएं हैं लेकिन उनके लोकतंत्र में प्रगतिशील लेखकों के लिए कोई जगह नहीं है। प्रगतिशील लेखकों की भूमिका पर राव का मानना है "आज के कथित प्रगतिवादी इसी दोयम दर्जे में आते हैं।" यही उनके लेख की आधारभूत धारणा है । यही उनके साहित्य-विवेक का पैमाना भी है।

राव साहब के लिखे को देखकर यही लगता है कि इनको प्रगतिशील साहित्य का कोई ज्ञान नहीं है अथवा ये जान-बूझकर झूठ बोल रहे हैं। विक्रमराव साहब कम से कम यह तो बताएं कि आधुनिक साहित्य के खासकर नए युग के लोकतांत्रिक प्रतिवादी लेखन के कविता, कहानी,उपन्यास आदि में जो मानक प्रगतिशील-जनवादी लेखकों ने बनाए क्या वे अन्य किसी ने बनाए हैं ?

राव साहब के इस लेख की एक बड़ी दिक्कत है कि यहां तथ्य की बजाय असत्य के आधार पर विचारों की जलेवी बनायी गयी है। प्रगतिशील साहित्य यदि अवसरवादी साहित्य होता और प्रगतिशील लेखक अवसरवादी होते तो प्रगतिशील लेखकों के घरों में घी के दीपक जल रहे होते।

साहित्य में अवसरवाद का अर्थ है प्रतिवादी साहित्य की मौत। विक्रमराव साहब आप ही बताएं कि जगदीश चन्द्र के "धरती धन न अपना" से लेकर भीष्म साहनी के "तमस" तक लेखन में कहां पर अवसरवाद है ? आप जानते हैं कि लेखक की पहचान उसके लिखे के आधार पर होनी चाहिए न कि बयानबाजी के आधार पर। आपातकाल में प्रगतिशील आंदोलन के पुरोधाओं केदारनाथ अग्रवाल,परसाई आदि ने साहित्य धरातल पर आपात्काल का प्रतिवाद भी किया था। उनकी रचनाएं उपलब्ध हैं। मंगाकर पढ़ लें।

राव साहब,जलेबी सुख के लिए काहे को प्रगतिशील विरोधी अंध प्रौपैगैण्डा के आधार पर अनर्गल लिख रहे हैं ? अनर्गल और असत्य लेखन को विचार नहीं कहते,जलेबीलेखन को कभी साहित्य या पत्रकारिता का दर्जा नहीं मिला है। राव साहब आपने जो लेख लिखा है वह पत्रकारिता नहीं है, बल्कि एक अदने से संपादक के लेख की हिमायत में लिखा भौंड़ा और आधारहीन लेखन जलेबी लेखन है। कम से कम राव जैसे प्रतिष्ठित लेखक-पत्रकार से हम यह उम्मीद तो करते हैं कि वह अपने संपादक की डिफेंस में न लिखे। संपादक की डिफेंस में असत्य लेखन पत्रकारिता का पतन है। यह दरबारी लेखन है। इसे आजकल की भाषा में पेड लेखन भी कहते हैं।

संपादक की इच्छा पर उगले गए राव साहब के विचार इस बात की सूचना भी देते हैं कि हिन्दी पत्रकारिता का आदर्श अखबार नपुंसक –जलेबी पत्रकारिता में मशगूल हो गया है और उसके संपादक को अपने विचारों की डिफेंस में आदेश पर लिखवाना पड़ रहा है। आदेश पर जलेबी हलवाई लिखते है, पत्रकार नहीं।

राव साहब की चरम आकांक्षा है कि "इन प्रगतिवादियों को सोवियत संघ की मृत्यु के बाद स्वयं गुम हो जाना चाहिए था।" राव आप साहब देख रहे हैं सारी दुनिया में कम्युनिस्ट मरे नहीं हैं। भारत में भी मरे नहीं हैं। काहे को इतनी व्यथा झेल रहे हैं अंध –कम्युनिस्ट विरोध के आधार पर।यह कम्युनिस्ट कुण्ठा है। यह अनेक की नींद ले चुकी है।आपको भी यह ग्रंथि कष्ट दे रही है लेकिन अफसोस है कि हम इस मामले में कोई मदद नहीं कर सकते। जनसत्ता के संपादक के पास में भी इसका कोई लाज नहीं है। कुण्ठाएं अनुदार नजरिए का चरम होती हैं। प्लीज जलेबी खाना बंद कर दीजिए आपको राहत मिल जाएगी।दूसरी बात यह कि कम्युनिस्ट या प्रगतिशील लेखक मरने वाले नहीं हैं। शोषण जब तक रहेगा प्रगतिशील रहेंगे,कम्युनिस्ट भी रहेंगे और सामाजिक परिवर्तन का साम्यवादी विश्ववदृष्टिकोण भी रहेगा।

विक्रम राव का मानना है, "भारतीय समाज के साथ दशकों तक धोखाधड़ी करने के प्रायश्चित के तौर पर ही सही, जनवाद का चोला पहनने वालों को इतिहास के नेपथ्य में चला जाना चाहिए था।" राव साहब आप ही बताएं कि कम्युनिस्टों ने और खासकर प्रगतिशील-जनवादी लेखकों ने आम जनता के साथ कौन सी धोखाधड़ी की है ? हिन्दी के अधिकांश प्रगतिशील लेखक (चाहे वो किसी भी दल में हों) मौटे तौर पर यथाशक्ति जनता के संघर्षों का समर्थन करते रहे हैं। प्रतिवाद की बेला में यदि कभी किसी के कदम इधर-उधर बहके भी हैं तो अंत में बहके हुए लोग भी सही दिशा में कदम उठाते नजर आए हैं।

किसी भी लेखक के बारे में या आंदोलन के बारे में समग्रता में बातें की जानी चाहिए। दूसरी बात यह कि बद-दुआएं ,लेखन नहीं है।उसी तरह दुआएं भी लेखन नहीं है।यह जलेबी लेखन है। राव साहब आपके पास प्रगतिशीलों के प्रति बद-दुआओं का वह खजाना है जिसे शीतयुद्धीय राजनीति के दौरान अमेरिकी कलमवीरों ने कमाल दिखाते हुए इजाद किया था। आप भारत में रहते हैं अमेरिका में नहीं। कम से कम भारत की हकीकत तो देखकर बातें करें। भारत की आज जो दुर्दशा है उसके लिए न तो कम्युनिस्ट जिम्मेदार हैं और न प्रगतिशील ही जिम्मेदार हैं, ये लोग भारत में शासन नहीं चलाते,इनका इस देश की नीतियों के निर्माण में भी बहुत कम योगदान है,फिर इनके ऊपर इतना गुस्सा क्यों ?

राव साहब ,जनवाद को बुर्जुआजी और उसके आप जैसे हमदर्द जलेबी लेखकों ने बंधक बनाया हुआ है। जनवादी-प्रगतिशील लेखक अपनी कलम से यथाशक्ति इसके खिलाफ संघर्ष करते रहते हैं। वे संघर्ष इसलिए नहीं करते कि उनको कोई इनाम मिले। वे इसलिए भी नहीं लिखते कि उनको शोहरत मिले। वे तो हृदय के आदेश पर लिखते हैं।

राव साहब, जरा कभी अपने हृदय के आदेश पर लिखें और सोचें तो संभवतःप्रगतिशील-जनवादी लेखकों के प्रति आपके मन में जो घृणा बैठी है वह कुछ कम हो जाए ? राव साहब बूढ़े तोते को सिखाया नहीं जा सकता, फिर भी यही कहेंगे कि लेखक और लेखन पर (चाहे वो किसी भी विचारधारा को मानते हों) पर घृणा और असत्य के आधार पर नहीं सोचना चाहिए। एक सम्मानित पत्रकार को घृणा शोभा नहीं देती। घृणा के आधार की गयी पत्रकारिता विचारों की हत्या है। आपने अपने लेख में विचारों के हत्यारे के भाव से लिखा है। प्रगतिशीलों के प्रति आपकी घृणा देखकर संपादक ओम थानवी के संपादकीय विवेक पर भी तरस आ रहा है कि बिना किसी प्रमाण के इस तरह का अनर्गल लेख उन्होंने कैसे छाप दिया।

राव साहब,आपके लेख को देखकर यही महसूस हो रहा है आपका प्रगतिशील विरोधी बुखार काफी बढ़ा हुआ है। प्रगतिशील लेखक संघ और उससे जुड़े कुछ लेखकों ने सत्ता के हित में जो किया उसके आधार समूचे प्रगतिशील लेखन का मूल्यांकन करना सही नहीं होगा। लेखकों का मूल्यांकन उनकी रचनाओं के आधार पर किया जाना चाहिए उनकी सांगठनिक सदस्यता के आधार पर नहीं। लेखक अपनी रचना और उसमें व्यक्त नजरिए से पहचाना जाता है।

राव साहब ने लिखा है- "ये कथित प्रगतिवादी, जनवादी, अंध-मार्क्सवादी असहिष्णु हैं।" इस बयान के लिए उनके पास एकाध घटिया किस्म के उदाहरण भी हैं। असल में पत्रकारिता में रहते हुए और सत्ता के संस्थानों की मलाई खाते-खाते झाडूमार विवेक पैदा हो जाता है। ये झाडूमार विवेक राव साहव की सबसे बड़ी पूंजी है।

राव साहब ने अपने अंध कम्युनिस्ट विरोध की झोंक में कुछ सवाल उठाए हैं देखें सच क्या है- "क्या प्रगतिवादी सीना ठोंक कर कह सकते हैं कि वे हमेशा भारत हितकारी भावना संजोते रहे हैं? बेचारी तसलीमा नसरीन पर कट्टरवादियों के हमले पर साजिशभरी खामोशी क्यों बनाए रहे?" पहली बात यह कि तसलीमा पर कभी खामोशी नहीं रही है। जनसत्ता अखबार में मैंने स्वयं तसलीमा की किताब पर पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा पाबंदी लगाए जाने के विरोध में तत्काल विस्तार से बड़ा लेख लिखा था ,मैंने जब लेख लिखा था मैं जनवादी लेखक संघ की कोलकाता जिला शाखा का महासचिव था। मैं माकपा में भी था। मेरी तरह और भी अनेक लेखक हैं जिन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी पर हुए हमलों के खिलाफ हमेशा आवाज बुलंद की है और हमेशा प्रगतिशील कदमों का समर्थन किया है। यदि किसी मसले पर प्रगतिशील लेखकों की राय मीडिया में नहीं दिखती तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वे प्रतिक्रियावादी विचारों का समर्थन कर रहे हैं। मीडिया में प्रगतिशीलों के विचार न दिखने का बड़ा कारण है मीडिया की प्रगतिशीलों में दिलचस्पी का अभाव। मीडिया के लोग जब भी प्रगतिशील लेखकों से साहित्य-संस्कृति के किसी भी मसले पर राय मांगते हैं वे अमूमन उदार राय जाहिर करते हैं। प्रगतिशील लेखन की बुनियादी शर्त है उदार और सहिष्णु नजरिया।

राव साहब यह आपके अंध-कम्युविस्ट विरोधी नजरिए से निकला काल्पनिक सोच है कि प्रगतिशील असहिष्णु होते हैं। असहिष्णु और अनुदार होकर प्रगतिशील-जनवादी साहित्य नहीं लिखा जा सकता। यह सच है कि प्रगतिशील लेखक संपादक के भांड नहीं होते,जबकि अंध-कम्युनिस्ट विचारधारा में नहाए पत्रकार ,संपादक के इशारों पर नाचने वाले शब्द-नर्तक और जलेबीवीर होते हैं।








परवर्ती पूंजीवाद और साहित्येतिहास- भाग 2 और अंतिम अंश-




उत्तर आधुनिकतावादी विकास का प्रधान लक्षण है व्यवस्थागत भ्रष्टाचार,नेताओं में संपदा संचय की प्रवृत्ति, अबाधित पूंजीवादी विकास,उपभोक्तावाद की लंबी छलांग और संचार क्रांति। इन लक्षणों के कारण सोवियत अर्थव्यवस्था धराशायी हो गयी। सोवियत संघ और उसके अनुयायी समाजवादी गुट का पराभव एक ही साथ हुआ। सामान्य तौर इस पराभव को मीडिया में साम्यवाद की असफलता कहा गया। वास्तव में यह साम्यवाद की असफलता नहीं है। फ्रेडरिक जेम्सन के शब्दों में यह ‘आधुनिकीकरण की छलयोजना’ है। 

उत्तर आधुनिकतावाद दौर में क्रांति पर सबसे तेज हमले हुए हैं। इन हमलों के आंतरिक और बाह्य दोनों ही किस्म के रूप रहे हैं। इस प्रसंग में पहली बात यह कि क्रांति का वास्तव अर्थ इन दिनों विकृत हुआ है। उसका अवमूल्यन हुआ है। क्रांति का अर्थ परिवर्तन मान लिया गया है और प्रत्येक परिवर्तन को क्रांति कहने का रिवाज चल निकला है। क्रांति के अर्थ का यह विकृतिकरण है। क्रांति का अर्थ है बुनियादी या आमूल-चूल परिवर्तन।

क्रांति पर बहस करते हुए आमतौर पर कुछ इमेजों,कुछ आख्यानों, कुछ देशों ,कुछ खास क्षण विशेष आदि का जिक्र किया जाता है और यह क्रांति का भ्रष्टीकरण करने में मदद करता है। क्रांति पर बात करने के लिए उसे साम्यवादी और साम्यवादविरोधी विचारकों और प्रचार सामग्री के द्वारा निर्मित इमेजों से बाहर आकर देखने की जरूरत है।

क्रांति अनंत क्षण में नहीं बल्कि समकालिक क्षण में घटित होती है। इसमें प्रत्येक चीज एक-दूसरे जुड़ी होती है। क्रांति का मतलब राजतंत्र या समाजतंत्र का ‘सुधार’ या ‘अल्प सुधार’ नहीं है क्रांति का मतलब किसी काल्पनिक मानसिक जगत में परिवर्तन से नहीं है। बल्कि इसका संबंध आमूल-चूल परिवर्तन से है। ये परिवर्तन एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हैं।

क्रांति कोई बनी-बनायी परंपरा का निर्माण नहीं है। बल्कि मूलभूत परिवर्तनों का पुनरान्वेषण है। क्रांति कोई तयशुदा तर्कसंघर्ष नहीं है । इसी प्रसंग में प्रसिद्ध मार्क्सवादी फ्रेडरिक जेम्सन ने तीसरी थीसिस में लिखा है ‘‘सामाजिक क्रांति अनंत समय का एक क्षण मात्र नहीं है। प्रत्युत समकालिक तंत्र में परिवर्तन की आवश्यकता की पुष्टि है, जिसमें हर चीज एक साथ है और एक दूसरे से अंतर्संबधित है। इस प्रकार का तंत्र संपूर्ण तंत्रगत परिवर्तन की मांग करता है, न कि अल्प 'सुधार', जिसे निंदात्मक अर्थ में 'मनोराज्य विषयक' कहा जाता है, जो भ्रामक है, व्यवहार्य नहीं। अभिप्राय यह है कि यह तंत्र वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के स्थान पर एक रैडिकल सामाजिक विकल्प की विचारधारात्मक दृष्टि की मांग करता है, ऐसा कुछ जिसे वर्तमान तर्कमूलक संघर्ष के अंतर्गत दिया हुआ या विरासत में मिला नहीं माना जाए, बल्कि जो पुनरान्वेषण की मांग करे। धार्मिक रूढ़िवाद (चाहे वह इसलामी, ईसाई, या हिंदू रूढ़िवाद हो) जो उपभोक्तावाद या 'अमरीकी जीवन शैली' का रैडिकल विकल्प देने का दावा करता है, तभी महत्वपूर्ण अस्तित्व प्राप्त करता है जब पारंपरिक वाम विकल्प खासकर मार्क्सवाद और साम्यवाद की महान क्रांतिकारी परंपराएं अचानक अनुपलब्ध प्रतीत होने लगती हैं।’’

आज क्रांति का महत्वपूर्ण एजेण्डा है राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा करना। क्रांति एक प्रक्रिया है और समकालिक परवर्ती पूंजीवादी तंत्र का अवसान भी है। लेकिन इसका प्रस्थान बिंदु राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा के सवालों से आरंभ होता है। परवर्ती पूंजीवाद के जमाने में राष्ट्रीय संप्रभुता ही दांव पर लगी है। किसी भी देश को स्वतंत्र रूप से अपनी नीतियां बनाने और विकास करने का हक नहीं है। क्रांतिकारी ताकतों का यह विश्व एजेण्डा है।

क्रातिकारी ताकतों का आंतरिक एजेण्डा है हाशिए के लोगों को उनकी जनवादी मांगों के इर्दगिर्द एकजुट करना। समाज में प्रत्येक व्यक्ति को संघर्ष की अवस्था में इस या उसके साथ खड़े होने,प्रतिबद्ध होने के लिए तैयार करना। परवर्ती पूंजीवाद ने गैर प्रतिबद्धता की हवा चला दी है,इस हवा को जनवादी प्रतिबद्धता के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है। आम लोगों को जनवादी विचारों के प्रति प्रतिबद्ध बनाना,हाशिए के लोगों की जनवादी मांगों के आधार पर एकजुट करना, उनके संगठनों और संघर्षों को आयोजित करना वास्तव अर्थों में क्रांति के मार्ग पर ही चलना है।

मार्क्सवादी आलोचक फ्रेडरिक जेम्सन ने मौजूदा दौर के संदर्भ में मार्क्सवाद की पांच थीसिस प्रतिपादित की हैं। इनमें दूसरी थीसिस में उन्होंने उन खतरों की ओर ध्यान खींचा है जो मार्क्सवाद के लिए आ सकते हैं या आए हैं और जिनसे मार्क्सवादी आंदोलन को धक्का लगा है। उत्तर आधुनिक परिस्थितियों के आने साथ मार्क्सवादी चिंतन को नव्य उदार आर्थिक नीतियों और उसके गर्भ से पैदा हुए बाजार ने सबसे बड़ा खतरा पैदा किया है। इन नीतियों के इतने व्यापक और भयावह रूपान्तरणकारी परिणाम होंगे इसका कोई भी मार्क्सवादी पूर्वानुमान नहीं लगा पाया।

नव्य उदारतावाद के खिलाफ विचारधारात्मक संघर्ष में मार्क्सवादी आम लोगों का दिल जीतने ,उन्हें इसके परिणामों के बारे में समझाने में असमर्थ रहे। इस समस्या के दो स्तर थे, पहला स्तर स्वयं मार्क्सवादियों के लिए था वे खुद समझ ही नहीं पाए कि नव्य उदार आर्थिक नीतियों का क्या परिणाम निकलेगा। उनका इन नीतियों के प्रति तदर्थ रवैय्या था। जब वे स्वयं दुविधाग्रस्त थे तो वे अन्य को कैसे समझाते ? इससे संकट और भी गहरा हो गया।

उत्तर आधुनिकतावाद के संदर्भ में मार्क्सवादियों की सफलताएं कम हैं असफलताएं ज्यादा हैं। सबसे बड़ी असफलता है नव्य उदार आर्थिक नीतियों के गर्भ से पैदा हुई असुरक्षा, अव्यवस्था,विस्थापन और भय को संगठनबद्ध न कर पाना। नव्य उदार दौर में मजदूरवर्ग के क्षय को वे रोक नहीं पाए और असंगठित मजदूरवर्ग की तबाही को अपने संगठनों के जरिए एकजुट नहीं कर पाए। आज महानगरों में लाखों असंगठित मजदूर हैं जो किसी भी वाम संगठन में संगठित नहीं हैं।

मजदूरवर्ग के अंदर नव्य उदारतावाद ने जो भय पैदा किया उसे भी प्रभावशाली ढ़ंग से मार्क्सवादी लिपिबद्ध नहीं कर पाए। इसका व्यापक दुष्परिणाम निकला है,मजदूरों की आवाज सामान्य वातावरण से गायब हो गयी है। नव्य उदारपंथी एजेण्डा वाम संगठनों में आ घुसा है। वे इससे बचने की युक्ति नहीं जानते।

इसी प्रसंग में फ्रेडरिक जेम्सन ने लिखा, ‘‘तर्कमूलक संघर्ष (जैसा कि यह सीधी वैचारिक लड़ाई के विरुध्द है) अपने विकल्पों की साख समाप्त करके और थीमैटिक प्रसंगों की एक पूरी श्रृंखला को अनुल्लेखनीय घोषित करके सफलता हासिल करता है। यह राष्ट्रीकरण, विनियमन, घाटा व्यय, कीन्सवाद, नियोजन, राष्ट्रीय उद्योगों की सुरक्षा, सुरक्षा नेट, तथा अंतत: स्वयं कल्याणकारी राज्य जैसी पूर्ववर्ती गंभीर संभावनाओं को निर्णायक रूप में अवैध घोषित करने के लिए क्षुद्रीकरण, निष्कपटता, भौतिकस्वार्थ, 'अनुभव', राजनीतिक भय ऐतिहासिक सबक को 'आधार' मानने का आग्रह करता है। कल्याणकारी राज्य को समाजवाद बताना बाजारवाद का उदारवादियों (अमरीकी प्रयोग में जैसा कि 'न्यू डील लिबरल्स' में किया गया है) तथा वामपंथियों दोनों पर दोहरी जीत दिलाता है। इस प्रकार आज वामपंथ ऐसी स्थिति में आ गया है जब उसे बड़ी सरकारों या कल्याणकारी राज्यों का समर्थन करना है। सामाजिक प्रजातंत्र की समीक्षा करने की जो वामपंथियों की विस्तृत और परिष्कृत परंपरा रही है, उसके लिए यह कार्य खासकर वामपंथियों को इतिहास की द्वंद्वात्मक समझ जितनी होनी चाहिए उतनी नहीं होने के कारण बेहद लज्जित करने वाला है। खास तौर पर, ऐतिहासिक स्थितियों में परिवर्तन तथा उनके अनुरूप उपयुक्त राजनीतिक और कार्यनीतिगत प्रतिक्रिया के बारे में पुन: कुछ बोध प्राप्त करना वांछनीय है। लेकिन यह भी तथाकथित इतिहास के अंत यानी आम तौर पर उत्तरआधुनिक की मौलिक अनैतिहासिकता के साथ बहस की मांग करता है।’’

मार्क्सवादी फ्रेडरिक जेम्सन ने आगे लिखा है, ‘‘इसी बीच मनोराज्य (यूटोपिया) से जुड़ी चिंताएं जो इस भय से उत्पन्न होती हैं कि हमारी वर्तमान पहचान, हमारी आदतें और आकांक्षा पूर्ति के तरीकों का निर्माण करने वाली चीज कतिपय नई सामाजिक व्यवस्था में समाप्त हो जाएगी तथा सामाजिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन आज कुछ समय पहले की तुलना में अधिक संभव है। स्पष्टतया दुनिया के आधे से अधिक भाग में और न केवल प्रभावशाली वर्गों में आज निस्सहाय लोगों के जीवन में परिवर्तन की आशा का स्थान 'नष्ट हो जाने के भय' ने ले लिया है। इस प्रकार की मनोराज्य-विरोधी (एंटी-यूटोपियन) चिंताओं को दूर करना अनिवार्य है जो कि सांस्कृतिक निदान और उपचार के रूप में किया जाना चाहिए न कि बाजार के सामान्य बहस और अलंकार की इस या उस विशेषता से सहमति जताकर इससे बचना चाहिए।’’

‘‘मानव-स्वभाव मूल रूप से अच्छा और सहयोगी है या फिर बुरा और आक्रामक। यदि यह सर्वसत्तात्मक राज्य (लेवियाथन) को नहीं तो कम से कम बाजार को वश में रखने की अपेक्षा करता है, ये सारे तर्क वास्तव में मानवतावादी और विचारधारात्मक हैं (जैसा कि अलथूसर ने कहा है) और इसके स्थान पर रैडिकल परिवर्तन और सामूहिक परियोजना का परिप्रेक्ष्य लाना चाहिए। साथ ही वामपंथियों को बड़ी सरकारों या फिर कल्याणकारी राज्यों का आक्रामक रूप से बचाव करना चाहिए तथा मुक्त बाजार के ऐतिहासिक ध्वंसात्मक रिकार्ड को देखते हुए बाजारवाद पर लगातार प्रहार करते रहना चाहिए ।’’

मार्क्सवादी के लिए साम्यवाद पूजा की चीज नहीं है। मार्क्सवादी के लिए वैज्ञानिक ढ़ंग से इस समाज को समझना और उस परिवर्तन के तर्क को समझना जरूरी होता है जिसके कारण परिवर्तन घट रहे हैं। उत्तर आधुनिकता के दूसरे चरण में नव्य उदार परिवर्तनों का केन्द्र बिंदु अमेरिका नहीं एशिया है। पुराने साम्राज्यवाद के दौर में पूंजीवाद का केन्द्र था इंग्लैण्ड,बाद में द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर में अमेरिका केन्द्र बना।नव्य उदारतावाद के आरंभ में अमेरिका ही पूंजीवाद का गोमुख था। लेकिन नव्य उदारतावाद के अगले चरण में यानी मौजूदा दौर में पूंजीवाद का केन्द्र चीन है,अमेरिका नहीं। कारपोरेट और लंपट पूंजीवाद की इसमें सभी खूबियां हैं। सब कुछ हजम कर जाने का इसमें भाव है। विश्व बाजार में छा जाने ,सब कुछ बनाने और सस्ता उपलब्ध कराने का नजरिया है। इस समाविष्टकारी भाव से सारी दुनिया में देशज उद्योगों के लिए गंभीर संकट पैदा हो गया है।

एक जमाना था चीन में कम से कम चीजें पैदा होती थीं। सारा देश पांच किस्म के कपड़े पहनता था। सारा देश साइकिल पर चलता था। लेकिन विगत 30 सालों में उसने सब कुछ बदल दिया है। उत्पादन और जिन्सों के उत्पादन में तो उसने क्रांति की है। किसी वस्तु को सस्ते में बनाना,बाजार में इफ़रात में उपलब्ध कराना और बाजार को घेरे रखना। बड़ी पूंजी को आकर्षित करना,श्रम और श्रमिक को सस्ते माल में लब्दील करना। मैन्यूफेक्चरिंग की ताकत को ऐसे समय में स्थापित करना जब सारी दुनिया मैन्यूफैक्चरिंग छोड़कर सेवाक्षेत्र की ओर आंखें बंद करके भाग रही थी।अपने आप में महान उपलब्धि है।

उत्पादन और खूब उत्पादन का नारा लगाकर चीन ने उत्पादन और उत्पादकों की महत्ता स्थापित की है। तंत्रगत संकटों को उसने अभिनव परिवर्तनों और प्रौद्योगिक क्रांति के जरिए संभाला है। विकास की तेजगति को बरकरार रखा है। साथ ही उत्पादन की गति को बनाए रखकर कारपोरेट पूंजीवाद को नए सिरे से पुनर्गठित किया है। इन परिवर्तनों को उत्तर मार्क्सवाद के आधार पर ही परखा जा सकता है। चीन और अमेरिका के नव्य उदार आर्थिक परिवर्तन पुराने मार्क्सवाद से नहीं उत्तर मार्क्सवाद से ही समझ में आ सकते हैं।

फ्रेडरिक जेम्सन ने लिखा है ‘‘तंत्रगत संकटों पर काबू पाने के लिए दूसरी आवश्यकता है अभिनव परिवर्तन और प्रौद्योगिकी में 'क्रांति' की। अर्नेस्ट मेंडेल ऊपर उल्लिखित चरणों के साथ इन परिवर्तनों का तालमेल बिठाते हैं : वाष्प तकनीकी का राष्ट्रीय पूंजीवाद के क्षण के साथ; विद्युत और दहनशील इंजन का साम्राज्यवाद के क्षण के साथ; आणविक ऊर्जा और साइबरनेटिक का हमारे अपने समय के बहुराष्ट्रीय पूंजीवाद और भूमंडलीकरण के क्षण के साथ जिसे कुछ लोगों द्वारा उत्तरआधुनिकता का भी नाम दिया जाता है। ये प्रौद्योगिकियां नई प्रकार की जिन्सों का उत्पादन तो कर ही रही हैं साथ ही नए विश्व क्षितिज को उद्धाटित करने में भी सहायक हैं। इस प्रकार ये विश्व को छोटा और पूंजीवाद को नए पैमाने पर पुनर्गठित कर रही हैं। इसी अर्थ में उत्तरपूंजीवाद (लेट कैपिटलिज्म) की विवेचना सूचना या साइबरनेटिक्स के पदों के रूप में उपयुक्त हैं (और ये पद सांस्कृतिक रूप में भी बहुत कुछ व्यक्त करते हैं) लेकिन इन्हें आर्थिक गतिकी के साथ पुनर्युग्मित करने की आवश्यकता है, जिससे इनमें सांस्कृतिक, बौध्दिक और विचारधारात्मक रूप से आसानी से अलग होने की प्रवृत्ति है।”

स्त्री साहित्य- हिन्दी की यह विरल परंपरा है कि स्त्रीसाहित्य है लेकिन स्त्री साहित्य इतिहास नहीं है।साहित्य के इतिहास में उसका न्यूनतम जिक्र नहीं है। लंबे समय से औरतें लिख रही हैं लेकिन उनके साहित्येतिहास का कहीं अता-पता नहीं है। स्त्री साहित्य का इतिहास न तो पुरूषों ने लिखा है और औरतों ने। इतिहास की अनुपस्थिति स्वयं में बड़ी समस्या है। स्त्री साहित्य का इतिहास क्यों नहीं लिखा गया ? इसका उत्तर आलोचकों को खोजना चाहिए।

स्त्री -साहित्येतिहास की प्रधान समस्या है स्त्री साहित्य खोजने और उसे व्यवस्थित ढ़ंग से पेश करने की। इससे स्त्री साहित्य परंपरा , शैलियों और विधाओं के मूल्यांकन में मदद मिलेगी। बड़े पैमाने पर स्त्री साहित्य लिखा गया है लेकिन वह सब इधर-उधर बिखरा पड़ा है। कभी उसका समग्रता में संकलन नहीं किया गया ,किसी ने उस पर कलम चलाने की आवश्यकता महसूस नहीं की। अतःपहली जरूरत है कि स्त्री रचनाओं को खोजा जाए।इसके बाद उनका कालक्रम और संदर्भ तय किया जाए, विश्लेषण किया जाए।

स्त्री साहित्येतिहास की दूसरी बड़ी समस्या है स्त्री -साहित्य की निरंतरता को स्थापित करने की। अनेक लेखिकाओं की रचनाएं नष्ट हो गईं हैं या अनुपलब्ध हैं। सन् 1905 से हिन्दी में स्त्री -साहित्य के संकलनों के प्रकाशन का सिलसिला चल रहा है इसके कारण अनेक लेखिकाओं की महत्वपूर्ण और दुर्लभ रचनाएं सामने आई हैं। लेकिन इतिहास अभी तक नहीं लिखा गया। इसके अलावा यह भी देखा गया है कि अनेक महिला लेखिकाओं की रचनाएं प्रकाशित ही नहीं हो पाई हैं।

प्रसिद्ध स्त्रीवादी आलोचिका और दार्शनिक हेलिनी सिकसाउस मानना है किसी भी विषय पर कोई भी बात एटीट्यूट,संस्कार,शरीर और मन के तंत्र को जाने बिना नहीं हो सकती। खासकर स्त्री साहित्य और स्त्री पर कोई भी बात करने के लिए चीजों को एकदम नग्नतम रूप में देखना और पेश करना बेहद जरूरी है। चीजों को नग्नतम रूप में देखने का अर्थ है उन्हें अवधारणाओं में बांधकर देखना।

अवधारणा में यथार्थ को जब भी देखेंगे, चीजें,घटनाएं और विचार एकदम साफ नजर आएंगे। दुनिया को जब भी देखो तो रक्षाविहीन नजरिए से देखो। इससे दुनिया बेहद सुंदर और काव्यात्मक नजर आएगी। दुनिया को देखने के लिए किसी 'ट्रिक्स' या हथकंडे का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। दुनिया को देखने के लिए हम जब किसी एपरेट्स का इस्तेमाल करने लगते हैं तो आंखें बंद हो जाती हैं।लेकिन जब आप अवधारणाओं में देखते हैं तो कोई चीज छिपायी नहीं जा सकती। जो छिपाया जा रहा है वह साफ दिखाई देने लगता है।

हेलिनी सिकसाउस के अनुसार अवधारणाओं में सोचना जरूरी है। खासकर स्त्री साहित्य के इतिहासदर्शन के प्रसंग में अवधारणाएं और भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इस क्षेत्र में पुंसवादी सैद्धांतिकी हावी है। मध्यकाल में आमतौर स्त्रियों की राजनीतिक घटनाओं और राजनीतिक कार्यक्रमों में दिलचस्पी कम होती थी। वे चीजों के साथ राजनीतिक संबंधों को नहीं देख पाती थीं। वे चीजों को राजनीति के बिना एक सामान्य औरत की तरह ही देखती थीं। यही वजह है कि अनेक मर्तबा औरतों को सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ विशालकाय पहाड़ नजर आता है।

आधुनिककाल में आकर औरतों में राजनीतिक-सामाजिक यथार्थ को लेकर आकर्षण पैदा होता है। आधुनिक शिक्षा ,आधुनिक आंदोलनों और मीडिया ने औरत को इस क्षेत्र में समझदार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

स्त्री के व्यक्तित्व की एक अन्य खूबी है कि वह अपने दायित्व और सामाजिक भूमिकाओं का पालन करने के साथ साथ अन्य की जिम्मेदारियों का पालन भी करती। समग्रता में अन्य के लिए वह ज्यादा समय देती है,स्वयं के लिए कम समय देती है। अन्य के दबाव में उसकी कल्पनाशीलता,सर्जनात्मकता और काव्यात्मकता कहीं नष्ट न हो जाए इस बात का उसे सब समय ख्याल रखना होता है। दूसरी ओर महिला आंदोलन में स्त्रीसाहित्य के लिए जरा सी भी जगह नहीं है। ऐसी अवस्था में स्त्रीसाहित्य लिखना, उसे बचाना और भावी पीढ़ी के हाथों सौंपना बहुत बड़ी चुनौती है।

स्त्रीसाहित्य में स्त्री होने मात्र से किसी लेखिका को स्वीकृति नहीं मिलती। उसे लेखिका पहले होना होगा। लेखिका होने के लिए जरूरी है कि वह पहले साहित्य रचना करे या कृति लिखे,उसके लिखे के आधार पर ही वह पाठकों में स्वीकृति प्राप्त करती है। रचना दौड़ती है उसके पीछे लेखिका दौड़ती है और फिर पाठक पीछा करते हैं। यदि किसी रचना का पाठक पीछा नहीं कर रहे हैं तो जान लो कि पाठक बैठे हुए हैं। रचना कम पढ़ी जा रही है। लेखिका को प्रसन्नचित्त रखने में उसके पाठक ही मदद करते हैं।

हिन्दी में स्त्री साहित्य की बातें करना ,उसके पक्ष में बोलना,उसके इतिहास की बातें करना,स्त्री की समस्याओं पर जनजागरण का काम करना आदि बातें अभी भी लोकप्रिय नहीं हैं। इसका प्रधान कारण स्त्री की स्वतंत्र सत्ता और चेतना को अधिकांश समाज आज भी स्वीकार नहीं करता। स्त्री है,लेकिन वो कैसी है और उसकी क्या समस्याएं ये सभी बातें आज भी पुरूष के नजरिए से ही देखी-सुनी और कही जाती हैं। हम सभी के जेहन में लिंग या जेण्डर के नाम पर एक ही लिंग का वर्चस्व है और वह पुरूषलिंग। यह स्थिति कमोबेश पूरे समाज की है। खासकर स्त्रीचेतना इससे बेहद प्रभावित है।

भारत में लोकतंत्र है और स्त्री ,स्त्री साहित्येतिहास और इतिहास दर्शन का कोई भी नजरिया इसके बिना नहीं बनता। लोकतंत्र महत्वपूर्ण संस्थान ,मूल्य और संस्कार है। लोकतंत्र में एक अस्मिता नहीं अनेक अस्मिताएं एक साथ सक्रिय रहती हैं। इसके अलावा वर्ग,समुदाय के रूप में भी अस्मिताएं सक्रिय रहती हैं। फलतःलोकतंत्र में व्यक्ति की अस्मिता के साथ कई अस्मिताएं अंन्तर्ग्रथित होती हैं।सवाल यह है लोकतंत्र में कौन सी अस्मिता कब प्राथमिक और महत्वपूर्ण है ? अस्मिता संदर्भनिर्भर होती है।

मसलन् नागरिक,लिंग,जाति, धर्म,समुदाय,राष्ट्र,राष्ट्रवाद आदि में कौन सी अस्मिता कब महत्वपूर्ण है ? खासकर स्त्री के संदर्भ में इनमें कौन सी अस्मिता बेहतरीन समझ और सामाजिक सामंजस्य पैदा कर सकती है ?

भारत क वास्तविकता यह है कि 63 साल बाद भी लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों को आत्मसात नहीं कर पाए हैं। हमें लोकतंत्र के फल खाने में अच्छे लगते हैं। उसकी सभी सुविधाओं और संस्थानों का लाभ उठाना चाहते हैं लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों को आत्मसात किए बिना। यह समस्या समूचे समाज की है। स्त्रियां भी इससे अछूती नहीं हैं। जिस तरह पुरूषों को स्त्री के परंपरागत संस्कार,रूप और स्वभाव अच्छे लगते हैं। वैसे ही स्त्रियों को भी अच्छे लगते हैं। हमारे महिला आंदोलन की यह सीमा है कि वह स्त्री के मसले उठाता है लेकिन स्त्री को लोकतांत्रिक पहचान नहीं दे पाया है। स्त्री की लोकतांत्रिक अस्मिता का निर्मित न होना स्त्री की प्रमुख समस्याओं में से एक है। आज भी अस्मिता के सवालों पर लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य की बजाय पितृसत्ता और पुंसवादी राजनीति के संदर्भ में सारा विमर्श चल रहा है।

भारतीय संविधान में सभी को नागरिक अधिकार प्राप्त हैं। लेकिन नागरिकचेतना का विकास नहीं हो पाया है। यही हाल औरतों का है वे अपने को परंपरागत स्त्री रूप में ही देखना पसंद करती हैं। नागरिकचेतना को प्राप्त करने की उनमें कोई विशेष छटपटाहट नजर नहीं आती। स्त्रियों में जब तक नागरिकचेतना और लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास नहीं होता तब तक उनकी स्त्री अस्मिता को लेकर विभ्रम की स्थिति बनी रहेगी। अस्मिता तब बनती है जब नागरिकचेतना अर्जित करते हैं। लोकतांत्रिक मूल्य हासिल करते हैं। देखना चाहिए क्या भारतीय समाज में औरतें लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिकचेतना से अपने को लैस कर पायी हैं ?

भारतीय समाज की विशेषता है कि स्त्री ,परिवार से पूरी तरह बंधी है। यह सामान्य परिवार नहीं है ,बल्कि जाति और धर्म से घिरा परिवार है। वह अपने किसी भी हक को यदि पाना चाहती है तो उसे पुंससत्ता का समर्थन लेना अनिवार्य है बिना उसके वह अपने हक प्राप्त नहीं कर सकती।

स्त्री के सामाजिक-सांस्कृतिक अधिकारों को विभिन्न किस्म के सामाजिकभेदों ने हजम कर लिया है। सामाजिकभेदों के प्रति हमारे अंदर जितनी तीव्र नफरत होगी और उनसे मुक्ति का जितना प्रयास करेंगे स्त्री मुक्ति और अस्मिता के एजेण्डे को हम उतनी ही जल्दी हासिल कर पाएंगे।

भारत में अभी तक स्त्री की जंग पितृसत्ता से रही है। लेकिन इसके अलावा पूंजी की सत्ता और राजनीतिक सत्ता के खिलाफ जंग को हम ठीक से आरंभ ही नहीं कर पाए हैं। कायदे से पितृसत्ता,पूंजी और राजनीतिक सत्ता के वर्चस्व के खिलाफ एकजुट नहीं कर पाए हैं। बिना इसके स्त्री की राजनीतिक और सामाजिक सत्ता को प्रतिष्ठित करना संभव नहीं है।

सामाजिक निर्माण की समग्र भाषा पूरी तरह संस्थानों की रणनीति और तर्कों पर आधारित होती है। यह ऐसी भाषा है जिसे आमतौर पर औरतें कभी नहीं बोलतीं। भारत में भाषायी वैविध्य और अंग्रेजी की महत्ता इसमें अतिरिक्त कारक है। हम भारत में स्वाधीन, आत्मनिर्भर और स्वायत्त स्त्री की इमेज को स्वीकृति नहीं दिला पाए हैं। इसका प्रधान कारण है स्त्री का सामाजिक वातावरण से घिरा रहना और उससे निकलकर अपनी अस्मिता बनाने में असफल होना।

इसके पीछे प्रधान कारण है महिला आंदोलन का विषम विकास। कायदे से स्त्री अधिकारों लेकर महिला आंदोलन ने कोई राष्ट्रीय आंदोलन अभी तक खड़ा नहीं किया। महिला आंदोलन ने स्त्री के मुद्दों अनेकबार उठाया है उससे स्त्री के अधिकारों में इजाफा हुआ है लेकिन ये सभी आंदोलन सीमित दायरे और सीमित अवधि में चलते रहे हैं। इन आंदोलनों से स्त्रीचेतना कम प्रभावित हुई है। इसके विपरीत स्त्रियां अपनी अस्मिता,सामाजिक इतिहास, साहित्य का इतिहास आदि को वर्तमान के आधार पर नहीं अतीत के आधार पर निर्मित करना पसंद करती हैं।

स्थिति यह है 'फेमिनिस्ट' को विलक्षण और औचक भाव से देखा जाता है। यहां तक कि अकादमिक जगत में भी उन्हें दूसरे लोक का प्राणी मानकर व्यवहार किया जाता है। साहित्य की स्नातक और उससे ऊपर की कक्षाओं में 'फेमिनिज्म' या स्त्रीवादी साहित्य सिद्धांत नहीं पढ़ाए जाते। अकादमिक जगत में हम स्त्री के बारे में बातकरते हैं लेकिन उसके शास्त्र को पढ़ाने से परहेज करते हैं। युवा लड़कियां भी फेमिनिस्ट कहलाना पसंद नहीं करतीं।

आज औरतों के पास जितने अधिकार हैं उन्हें दिलाने में फेमिनिज्म और महिला आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन अधिकतर औरतें फेमिनिज्म या महिला आंदोलन के इस कर्ज के प्रति कृतज्ञता से पेश नहीं आतीं। वे स्त्री की उन परिस्थितियों को अस्वीकार नहीं करतीं जिनमें औरतें कष्ट और अपमान में रह रही है, और अपनी वास्तव स्त्रीचेतना से वंचित है। इस क्रम में औरतें समाज में हाशिए पर चली गयी हैं। अधिकतर औरतें अदृश्य रहना चाहती हैं। वे परिवार के निर्माण में अपनी भूमिका निभाना चाहती हैं लेकिन सामाजिक वातावरण में अपनी भूमिका नहीं निभाना चाहतीं। उनके व्यक्तित्व से नागरिक आयाम एकसिरे से गायब है। यह भी कह सकते हैं घरेलू औरत की अस्मिता ने उसकी नागरिक अस्मिता का अपहरण कर लिया है।

फेमिनिज्म की खूबी है कि वह औरत के आसपास बने हुए परंपरागत माहौल को खत्म करता है।उसके अंदर नागरिक अधिकारों की चेतना पैदा करता है। खासकर लोकतंत्र में फेमिनिज्म तो स्त्रीरक्षा का प्रभावशाली हथियार है। उल्लेखनीय है विभिन्न रंगत का फेमिनिज्म प्रचलन में है स्त्री अपनी सुविधा और समझ के आधार पर चुन सकती है कि वह किस तरह के फेमिनिस्ट नजरिए का पालन करे। फेमिनिज्म के बिना स्त्री अपनी अस्मिता का निर्माण नहीं कर सकती। स्त्री के लिए फेमिनिज्म नजरिया है और उसके सामाजिक विकास की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है। हिन्दी की आयरनी है कि हमारे यहां स्त्र5 साहित्य है लेकिन फेमिनिस्ट कोई नहीं है। उलटे फेमिनिज्म से नफरत करने वाली लेखिकाएं मिल जाएंगी।

लोकतंत्र में स्त्रीअधिकार की आधारशिला है उसका स्वायत्त अस्तित्व।स्त्री का जब तक स्वायत्त अस्तित्व समाज और स्वयं स्त्री स्वीकार नहीं करती,सारी कवायद बेकार है। स्त्री का अस्तित्व और स्वायत्तता ये उसके दो बुनियादी हक हैं। अभी औरत को हम महज सेवा करने वाली और बच्चा पैदा करने वाली के रूप में ही देखते हैं।

इसके अलावा विभिन्न संस्थानों को भी लोकतंत्र का पाठ नए सिरे से पढ़ाने की आवश्यकता है। जिससे वे नागरिक अधिकारों और नागरिकचेतना के प्रति परिपक्वता से पेश आएं। नागरिक परिपक्वता पैदा करने के लिए नागरिक कानूनों की नए सिरे पड़ताल की जानी चाहिए। जजों से लेकर सांसदो-विधायकों को नागरिकता का गहन प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। वे जानें कि नागरिक अधिकारों का मतलब क्या है ? सीमाएं क्या हैं ? प्राकृतिक नियम विधान और कानूनी नियम विधान की सीमाएं क्या हैं ? इस दिशा में पहले कदम के तौर पर स्त्री की इच्छा और अधिकारों का हम सम्मान करना सीखें, उस पर थोपना बंद करें।

स्त्री-पुरूष ये दोनों समाज में स्वायत्त इकाई हैं। इस बात को बुनियादी तौर पर मानें। लोकतंत्र का आरंभ नागरिक संबंधों से होता है और नागरिक संबंधों को नागरिक अधिकारों के जरिए संरक्षण प्राप्त है। ये नागरिक अधिकार पुरूष की तरह स्त्री को भी प्राप्त हैं। स्त्री-पुरूष के बीच में प्रेम रहे। दोनों एक-दूसरे की संवेदना,अनुभूति,शरीर और मूल्यों का सम्मान करें।

हमारे देश में लोकतंत्र है, संविधान में हक भी मिले हैं। लेकिन स्त्री-पुरूष एक-दूसरे का सम्मान नहीं करते। नागरिकता का उदय तब होता है ,जब हम सम्मान करते हैं। भिन्नता को स्वीकार करते हैं। भिन्न किस्म की धार्मिक ,राजनीतिक और सांस्कृतिक भावनाओं को स्वीकार करते हैं। नागरिक भावबोध पैदा करने लिए हमें स्त्री-पुरूष के प्राकृतिक अंतर को भी मानना पड़ेगा। इन दोनों की स्वायत्तता को भी मानना पड़ेगा।

लोकतंत्र में हक मिलते नहीं हैं।उनको हासिल करना पड़ता है। यह स्त्री के विवेक पर निर्भर करता है कि वह अपने अधिकारों के प्रति कितनी सजग है। स्त्री की सजगता के आधार पर यह भी देख सकते हैं कि वह अपने को दासता से किस हद तक मुक्त करना चाहती है। इसके लिए स्त्री को लिंग के दायरे से बाहर निकलकर नागरिक के दायरे में आना होगा। लिंगबोध का नागरिकबोध में रूपान्तरण करना होगा।

लिंग का दायरा स्त्री दासता बनाए रखता है। जबकि नागरिकता का दायरा दासता से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। इससे स्त्री को अपनी प्राकृतिक पहचान को नागरिक अस्मिता में रूपान्तरित करने में मदद मिलती है। स्त्री ,प्राकृतिक स्त्री की इमेज में जब तक बंधी रहेगी उसे नागरिक समाज और नागरिक अधिकारों के साथ सामंजस्य बिठाने में असुविधा होगी। यह भी संभव है स्त्री अपनी प्राकृतिक जिंदगी को पूरी तरह त्यागे बिना नागरिक जिंदगी में प्रवेश करे। जिस तरह स्त्री के लिए वस्त्र जरूरी हैं वैसे ही नागरिक अधिकार भी जरूरी हैं। इसके लिए जरूरी है कि स्त्री-पुरूष में प्रेम हो। प्रेम के बिना सब बेकार है। यहां तक कि नागरिक अधिकार भी अर्थहीन हैं। परंपरा और धर्म भी अर्थहीन है। स्त्री की स्वायत्तता बचे इसके लिए स्त्री-पुरूष में प्रेम जरूरी है। स्त्रियों में आपसी प्रेम जरूरी है।

स्त्री के प्रति रवैय्या बदले इसके लिए जरूरी है कि हम उसे देखने का तरीका बदलें। स्त्रीचेतना का सामाजिक स्रोत हैं संस्थान। स्त्री के बारे में जब भी किसी विषय पर बात की जाए उसे संस्थान के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। स्त्रीचेतना का निर्धारण स्त्री कम और सामाजिक संस्थान ज्यादा करते हैं। मसलन् ,मध्यकाल में स्त्री पर विचार करना है तो मध्यकालीन संस्थानों से जोड़कर देखें। आधुनिक औरत पर बात करनी है तो आधुनिक संस्थानों की भूमिका के संदर्भ में विश्लेषित करें। संस्थान के चरित्र उदघाटन के बिना स्त्री अस्मिता का रहस्योदघाटन संभव नहीं है।

संस्थान किसे कहते हैं ?उनका काम क्या है ? संस्थान हमारे बीच में तयशुदा संबंध और व्यवहार जिनसे सामाजिक मूल्यों और विश्वासों को बनाए रखते हैं। सामान्यतौर पर स्त्री पर बात करते समय ,उसके लिखे पर बात करते समय हम स्त्री को लिंग की तरह नहीं देखते,उसकी राय को लिंग की राय के रूप में ग्रहण नहीं करते।बल्कि व्यक्तिगत राय के रूप में देखते हैं। इस तरह देखने का दुष्परिणाम यह निकला है कि स्त्री को,उसके विचारों को हाशिए पर डाल देते हैं। उसके स्वायत्त अस्तित्व और उसकी उपलब्धियों या सामाजिक भूमिका को सीमित करके पुंस वर्चस्व के अधीन बना देते हैं।

स्त्री साहित्य पर बात करनी हो या स्त्री के सवालों पर या खुद स्त्री से बात करनी हो, उसे लिंग के रूप में देखना और उसी रूप में उसकी राय का सम्मान करना चाहिए। स्त्री को लिंग के रूप में देखने के कारण हम सामाजिक जीवन में व्याप्त लिंबभेद को बेहतर ढ़ंग से समझ पाएंगे। स्त्री की समस्याएं,उसका सृजन,उसका मन,उसके विचार आदि ये कोई निजी या व्यक्तिगत नहीं हैं वे तो एक लिंग के विचार हैं। स्त्री कभी भी निजी नहीं होती है।वह हमेशा लिंग के रूप में बनी रहती है ,और लिंग के रूप में उसकी भूमिका तय है, और उसी रूप में उस पर वर्चस्व के रूप भी तय हैं। स्त्री के वास्तव स्वरूप को जानने के लिए उसकी लिंग की पहचान को केन्द्र में रखना चाहिए।

स्त्री को लिंग के रूप में न देखने का यह भी परिणाम निकला है कि हम स्त्री की निर्माण प्रक्रिया से भी अनभिज्ञ हैं। स्त्री -पुरूष को एक-दूसरे के सामाजिक पूरक के रूप में देखते हैं। खासकर स्त्रीको तो पुरूष की पूरक के रूप में ही देखते हैं।

कॉमनसेंस चेतना है पुरूष कर्ता है और स्त्री पूरक है। जबकि यह बात गलत है। स्त्री पूरक नहीं है। वह स्वतंत्र लिंग है। स्त्री लिंग के रूप में उसकी सत्ता,स्वायत्तता और महत्ता है।

उल्लेखनीय है लिंगरहित पहचान की जितनी भी धारणाएं या संबंध हमारे समाज में प्रचलन में हैं उनके आधार पर स्त्री की सही समझ नहीं बनती। मसलन्, स्त्री को मनुष्य, निजी,व्यक्ति, बीबी,बहू,बेटी,बहन आदि के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इस तरह के सारे पदबंध स्त्री की लिंग की पहचान को छिपाते हैं,या उसकी उपेक्षा करते हैं। स्त्री को न्यूनतम स्पेस देते हैं। साथ ही इनमें किसी न किसी रूप में पुंसवादी संदर्भ निहित है और वह निर्णायक भूमिका अदा करता है। ये सभी पदबंध पुरूष कोड में निर्मित हैं। कायदे से हमें मर्द के सॉचे में ढ़लकर आई अवधारणाओं और स्त्री के साँचे में ढलकर आई अवधारणाओं में हमें अंतर करना चाहिए।

अन्या -

हिन्दी में लेखिकाओं को स्त्री को 'अन्या ' के रूप में देखने की आदत है वे,अपने को भी अन्या के रूप में पेश करती हैं। प्रभाखेतान ने तो अपनी आत्मकथा का नाम ही "अन्या से अनन्या तक"रख दिया। "अन्य'' की धारणा बेहद जटिल है। इसमें यह तथ्य निहित है कि अन्य हमसे (स्त्रीसे) लेते हैं और स्त्री को भी कुछ देते हैं। हेलिनी सिकसाउस ने लिखा है अन्य हमारा मित्र हो सकता है और मित्र भी हो सकता है। शत्रु जरूरी नहीं है कि बुरा ही हो। शत्रु भी हमें कुछ न कुछ शिक्षा देता है। शत्रु जरूरी नहीं है कि घृणा की ही शिक्षा दे। वह हमारे रहस्यमय असुरक्षित क्षेत्रों को सामने लाता है। वह हमें निज की रक्षा करने की शिक्षा देता है। वह अनेक क्षेत्रों में विकास और परिपक्वता पैदा करने की संभावनाओं के द्वार खोलता है। अगर वह स्वयं मौत न हो ,मौत की ओर ठेलने वाला या हत्यारा न हो तो अनेक क्षेत्र ऐसे भी हो सकते हैं जिनमें शत्रु के साथ मिलकर भी काम किया जा सकता है। यानी सब समय स्त्री और पुरूष को एक-दूसरे के शत्रु के रूप में नहीं देखना चाहिए।

भारतीय समाज में औरतों में व्यापक स्तर पर हीनताबोध है। इस हीनताबोध के प्रसार का प्रधान कारण है समाज में खुलेपन का अभाव। खुलेपन के अभाव के कारण हमारे सभी किस्म के संबंध प्रभावित होते हैं। इसके बावजूद लोग प्रेम कर रहे हैं। मित्र बना रहे हैं। इसका अर्थ क्या है ? इसका अर्थ है अन्य मौजूद है और उसकी महत्वपूर्ण भूमिका भी है।

अन्य पूरी तरह अन्य है। वह हमारे अंदर नहीं है। हम सब समय यह कहने की स्थिति में होते हैं कि 'मैं आपको लाइक नहीं करता' या 'प्यार' नहीं करता। ये बातें विनिमय के रूप में होती हैं। यह कहते हुए हम अपने को नहीं देखते । अन्य को देखते हैं। जब अन्य कुछ कहता है तो हमें अपने को भी देखना चाहिए। अन्य के साथ अंतर करते हुए जब चीजें पेश की जाती हैं तो हम देखते हैं। ऐसी अवस्था में हम अन्य को ज्यादा देखते हैं। अन्य में ज्यादा चीजें देखते हैं। साथ ही कुछ बिंदु होते हैं जिन्हें हम नहीं देखते।

कुछ ऐसे बिन्दु भी होते हैं जिन्हें हम नहीं देखते या नहीं जानते और उनसे कभी -कभी अनजाना सच जन्म ले सकता है। जब अन्य की गुप्त,छिपी बातें मालूम पड़ती हैं,अन्य का व्यक्तित्व खुलता है।

अन्य वह है जिसे हम नहीं जानते। इस अन्य से संबंध में सुंदर चीज क्या है ? वह कौनसी चीज है जो हमें गतिशील बनाती है ? अन्य से प्यार करते समय वह कौनसा हिस्सा है जिसकी एक झलक को हम तरसते हैं और एक झलक पाकर धन्य हो जाते हैं। अन्य में वह क्या छिपा है जो अन्य नहीं देख सकता। वह कौन सा क्षेत्र है जिसके जरिए हम अन्य के छिपे हुए को देखते हैं,महसूस करते हैं ? इसी को हम प्यार कहते हैं।यह हृदय में निवास करता है।

कईबार हम देख नहीं पाते इसका अर्थ है कि इससे आगे जानने के तरीके नहीं जानते। ऐसी भी चीजें होती हैं जिनके बारे में हम नहीं जानते या जिनको हम पुनर्प्रस्तुत नहीं कर सकते। क्योंकि व्यवहार और फैसलों में वे हमारे लिए पराये हैं विदेशी हैं। यह वह जगह है जहां से अन्य का परायापन आरंभ होता है। इसकी समृद्धि,जरूरत,पहुँच आदि हमें आकर्षित करती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम खोज नहीं करेंगे। या हमने कोई खोज नहीं की है।

कुछ लोग मानते हैं असीमित परायापन अपने आप में विध्वंसक है,परेशानीदायक है। इसके विपरीत इसका अंत उत्साहजनक और अतिसुंदर होता है। यह अज्ञेय है लेकिन सुंदर है। यह वैसे ही है जैसे बिना जाने प्यार करना। प्यार करना और नहीं जानना। अन्य पर बिना किसी प्रमाण के विश्वास करना। विश्वास के क्षण में रहना। अन्य जब झूठ बोल रहा हो तब भी उस पर विश्वास करना। वैसे ही जैसे ईश्वर नहीं है लेकिन हम ईश्वर में विश्वास करते हैं। भगवान है इसका कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन विश्वास है कि ईश्वर है।यानी आस्था के क्षण में जीना।

अन्या की अवधारणा पर मनोवैज्ञानिकों की समझ का, खासकर फ्रॉयड की ओडिपस कॉम्प्लेक्स की धारणा का व्यापक असर है। इसकी विभिन्न किस्म की व्याख्याओं और चुनौतियों को स्त्रीवादी विमर्श में विकसित किया गया है। ये सभी व्याख्याएं एक साझा बात पर विचार करती हैं कि बाह्य हमारे अंदर कैसे आता है। अन्य हमारे अंदर कैसे आता है। नैन्सी चोदोरोव और अन्य फ्रांसीसी स्त्रीवादी मानती हैं कि जेण्डर के विकास के लिए माँ के रूप में आरंभ के 2 सालों का बच्चे के लिए बड़ा महत्व है। इन्हीं आरंभिक 2 सालों में बच्चे की अस्मिता की बुनियाद बनती है। पुराने फ्रायडपंथी मानते हैं बच्चे के स्वस्थ विकास में विभिन्न किस्म के प्रेम ऑब्जेक्ट के साथ उसके अहं का संपर्क-संबंध स्वस्थ बच्चे का विकास करते हैं।

इन दिनों जिस तरह परिवारीजनों की व्यस्तता बढ़ी है और माँ-बाप ने अपनी शक्ति बच्चों में व्यय करने की बजाय अन्यत्र व्यय करना आरंभ किया है उससे बच्चों के विकास पर सीधा असर पड़ा है। माँ और पिता की भूमिका घटी है। इसके कारण बच्चे के जीवन में अन्य लोगों की भूमिका बढ़ी है और यह उसके अंदर पुंसवादी मानसिकता के विकास का बड़ा कारण है। पश्चिमी सभ्यता का जिस तरह विकास हुआ है उसमें पुंसवाद के मूल्यों जैसे अलगाव,स्वायत्तता,आत्म-निर्भरता और व्यक्तिवाद को सब्जैक्टिविटी का आधार बनाया गया है। इसके कारण स्त्री के गुणों की उपेक्षा बढ़ी है।जैसे संपर्क,संबंध,पालन-पोषण आदि का निजी जीवन के क्षेत्र में अवमूल्यन हुआ है। स्त्रीवादी मनोवैज्ञानिक मानती हैं कि सभी लोगों में वे पुरूष हों या स्त्री। आदमी के विकास में एजेन्सियां संतुलित ढ़ंग से विनिमय करें। सेल्फ -एसर्शन और सेल्फ रिकॉगिनीसन के साथ काम करें। इससे परिपक्वता और व्यक्तिवाद का विकास होगा।

लूस इरीगरी,जूलिया कृस्त्वा और कैथरीन क्लेमेंट का नजरिया इससे भिन्न है। वे फ्रॉयड के नजरिए के आधार पर अन्य के बारे में सवाल उठाती हैं। इन लोगों ने फ्रॉयड की धारणा ड्राइव का इस्तेमाल किया है। वे इच्छाओं के भिन्न तंत्र में रूचि रखती हैं। इसमें उन्होंने ड्राइव, इम्पल्स, ऑब्जेक्ट चयन आदि पर ध्यान दिया है। मनुष्य के आत्म के विभाजनकारी रूपों का मूल्यांकन किया है।

बच्चा बड़ा होने के साथ अपनी इच्छाओं को माँ से अलग कर लेता है और अन्य के साथ जोड़कर देखता है। लाकां के अनुसार माँ से अलग होने की प्रक्रिया बच्चे के अंदर जब वो 6-18 माह का होता है तब से आरंभ होती है।इस बीच बच्चा अपनी इमेज और शारीरिक गठन को पहचानने लगता है। यही वह प्रस्थानबिंदु है जहां से अन्य का बच्चे के जेहन में प्रवेश और आकर्षण पैदा होता है।

पितृसत्ता-

पितृसत्ता की अवधारणा पर हिन्दी में आमतौर पर बहस नहीं होती। 1990 के बाद से पितृसत्ता के बारे में हिन्दी में थोड़ी बहुत हलचल नजर आती है। यहां तक कि फेमिनिज्म की बहसों में भी 1960 के बाद ही केन्द्र में आती है। हिन्दी में अधिकांश लेखन स्त्री-पुरूष संबंध की धारणा पर ही केन्द्रित रहा है।

पितृसत्ता एक व्यवस्था है जिसमें पुरूष के विशेषाधिकार,शक्ति और क्षमता को मर्दानगी के आधार पर व्याख्यायित किया जाता है। पितृसत्ता के दायरे में औरतें अधिकार और स्वायत्ततारहित होती हैं। उन्हें वही करना होता है जो पुरूष चाहता है। घर से लेकर बाहर तक सभी ,बच्चे से लेकर राजनीति तक सभी फैसले पुरूष लेता है और औरतों एवं अन्य को मानने के लिए मजबूर करता है। परिवार में पुरूष मूलतः मुखिया है और वह इसी आधार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपना वर्चस्व बनाए रखता है।

परिवार , पितृसत्ता की बुनियाद है । परिवार किस तरह का है उससे पितृसत्ता का स्वरूप समझने में मदद मिलेगी। पारिवारिक संबंधों की अभिव्यंजना समूचे सामाजिक-राजनीतिक ढ़ांचे पर भी पड़ती है। समाज में पितृसत्ता की क्या स्थिति है यह इससे तय होगा कि परिवार में पुरूष की स्थिति क्या है ? समाज की वैचारिक संरचनाओं को देखने का सही आधार परिवार है। अमूमन समाज की अन्य संरचनाओं को ज्यादा महत्व देते हैं।

सवाल यह है आप किस तरह का परिवार बनाना चाहते हैं ?लेकिन बहस इस पर होती रही है कि किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं ?यह सवाल इस बात से जुड़ा है किस तरह के उत्पादन संबंध बनाना चाहते हैं ?इन बुनियादी सवालों की उपेक्षा करते रहे हैं। सामंती समाज से लेकर समाजवादी समाज तक पितृसत्ता का बने रहना इस बात का सबूत है कि व्यवस्था परिवर्तन का पितृसत्ता पर कोई खास असर नहीं होता। पितृसत्ता पर बात करते हुए अनेक लोग ऐसे भी हैं जो सामान्यीकरण का सहारा लेते हैं और उसकी सांस्कृतिक-राजनीतिक और तकनीकी परक जटिलताओं की अनदेखी करते हैं।

पितृसत्ता महज विचार या अवधारणा नहीं है। बल्कि कम्पलीट सामाजिक व्यवस्था है उसका आर्थिक आधार है। वह जितना समाज में है उससे ज्यादा मन के अंदर है। पितृसत्ता की जितनी मन में मजबूत जड़ें है उतनी ही गहरी सामाजिक संरचनाओं ,राजनीति ,संस्कृति उद्योग और आर्थिक संबंधों में जडें हैं। पितृसत्ता को व्यक्ति केन्द्रित होकर देखने की बजाय व्यवस्था और विचारधारा के रूप में देखें तो ज्यादा बेहतर होगा। यह मूलतः वर्चस्व की विचारधारा है।

श्रम-विभाजन,परिवार,राज्य,संस्कृति,मासकल्चर,मीडिया,उपनिवेशवाद,कामुकता,स्वतंत्रता आदि क्षेत्र हैं जहां मर्दानगी को विचरण करते हुए सहज देखा जा सकता है। पितृसत्ता मूलतः वर्चस्व का पुराना रूप है जिसे कभी गंभीरता से चुनौती नहीं दी गयी । वर्चस्व के अनेक रूपों को विभिन्न समयों पर चुनौती दी गयी लेकिन पितृसत्ता को चुनौती नहीं दी गयी,विभिन्न व्यवस्था परिवर्तनों के साथ उसके सामंजस्य के बहाने खोज लिए गए।

पितृसत्ता वर्चस्व का प्रधान रूप है। हम वर्चस्व के अन्य रूपों को विश्लेषित करते रहे लेकिन इसकी ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया। पुरूष के सामाजिक वर्चस्व को स्वाभाविक मान लिया। वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष को चुनौतीपूर्ण प्रकल्प के रूप में कभी स्वीकार ही नहीं किया। फलतःइतिहास ,राजनीति,धर्म,दर्शन आदि में तमाम सद् इच्छाओं के बावजूद पितृसत्ता बनी रही। साहित्य के इतिहास और आलोचना में उसका वर्चस्व बना रहा। आज भी कौन लेखिका महान है यह फैसला मन्नू भंडारी या कृष्णा सोबती नहीं करतीं। बल्कि मर्द आलोचक ही करेगा। इतिहास में स्त्रीलेखन दर्ज हो या नहीं यह फैसला भी वही करेंगे। स्त्री चाहे तो भी समाज और साहित्य में अपना स्थान तय नहीं कर सकती।

पितृसत्ता का ही कमाल है कि स्त्री के मरने के बाद भी स्त्री के साथ क्या व्यवहार किया जाए यह पुरूष ही तय करता है। पितृसत्ता के वर्चस्व की बात जब भी होती है तो उसका अर्थ है सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक-आर्थिक वर्चस्व। यह व्यवस्था हजारों सालों से चली आ रही है और इससे स्त्री-पुरूष दोनों का ही नुकसान होता है। यह वर्चस्व सिर्फ स्त्री के तन और मन को ही प्रभावित नहीं करता बल्कि समाज के सभी संस्थानों को प्रभावित और संचालित करता है। एकतरह से इसने जीवनशैली में सहज-स्वाभाविक स्थान बना लिया है। फलतः पितृसत्ता को आम जीवन में स्वाभाविक अधिकार की भूमिका अदा करते हुए पाते हैं।

पितृसत्ता में एक अंतर्निहित नजरदारी और निर्देशन का भाव है।इसने समाज पर ऊपर से निषेधों की विशाल नियमावली थोप दी है। पूंजीवाद ने सभी किस्म के भेदों की समाप्ति का वायदा किया था।इसमें लिंगभेद भी शामिल है। लेकिन पूंजीवाद के 250 सालों के शासन में लिंगभेद खत्म नहीं हुआ। उलटे लिंगभेद संबंधी समस्याओं में इजाफा हुआ है।

हाल के वर्षों में दुनिया के विभिन्न इलाकों में नए किस्म के पुंस आंदोलनों का भी जन्म हुआ है। ये लिंगभेद के स्त्रीवादी तर्कशास्त्र का अपने पक्ष में जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं ।

वे पुरूष की लैंगिक पहचान को मर्द के ही संदर्भ में चिह्नित कर रहे हैं और उसकी समस्याओं पर रोशनी डाल रहे हैं। आज प्रत्येक देश में मर्द आंदोलन ने सामूहिक रूप ले लिया है। मर्द का मर्द से प्यार ,झगड़ा,उत्पीड़न,अवसाद,मर्द का मर्द के जरिए दमन-शोषण, मर्द-मर्द के बीच में प्यार और पुलिस उत्पीड़न,कानूनी उत्पीड़न आदि के सवाल उठाए जा रहे हैं। इस क्रम में मर्द के मिथ और आध्यात्मिकता का भी सहारा लिया जा रहा है। मर्द-मर्द के बीच के शारीरिक-भावनात्मक संबंधों को स्वाभाविक कहा जा रहा है। पिता के अधिकारों की मांग की जा रही है। एकल पिता के अधिकारों पर जोर दिया जा रहा है।खासकर बच्चे की कस्टैडी के सवाल पर काफी विवाद हो रहा है। अमेरिका- आस्ट्रेलिया में यह स्थिति ज्यादा नजर आ रही है।

विकसित पूंजीवादी मुल्कों में पिता अधिकार ग्रुप, पुंस अधिकार ग्रुप आदि ताकतवर समूह के रूप में सामने आए हैं। इससे लिंगभेद बढ़ा है। इस तरह के आंदोलन अपनी बुनियादी प्रकृति में स्त्रीविरोधी विचारधारा और पितृसत्तात्मक विचारधारा को ही व्यक्त करते हैं। इस तरह के आंदोलनों का आधार है व्यक्तिगत विकास और राहत हासिल करना। इस तरह के तर्को के आधार पुंस आंदोलनों से ज्यादा से ज्यादा मर्द जुड़ते चले जा रहे हैं। इस आधार पर वे मर्दानगी को नए फ्रेमवर्क में गठित करने की कोशिश कर रहे हैं। भारत में पति उत्पीडि़त संघ टाइप संगठन इसी मनोदशा को व्यक्त करते हैं।मर्दानगी को पुनर्गठित करने का यह प्रयास जिस तरह के सामाजिक संबंधों,संस्थानों और विचारधारा बात कह रहे हैं वह समाज के लिए अर्थहीन है। पश्चिम में जिस तरह वूमेन स्टैडीज है उसकी तर्ज पर मेन स्टैडीज भी खुल गए हैं।

स्त्री का पाठ कैसे पढें -

इन दिनों लेखक को पढ़ने की पद्धति बदल गयी है। लेकिन हिन्दी में अधिकांश आलोचक अभी भी पुरानी शैली में पढते हैं। यानी वे किताब को केन्द्र में रखकर पढ़ते हैं। रोलां बार्थ ने सन् 1977 में इस दिशा में ध्यान खींचा था कि युग बदल गया है अब हमें "वर्क" से "पाठ" की ओर जाना चाहिए। यही वह प्रस्थान बिंदु है जिसके आधार पर हमें पाठ का विश्लेषण करना चाहिए। पहले आलोचक कृति को पढ़ते थे लेकिन अब पाठ को पढें।

सैंकड़ों सालों से बड़े कौशल के साथ कृति का संरक्षण चला आ रहा था। इसके कारण कृति के मूल अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं आया। पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही अर्थ का प्रचार प्रसार होता रहा। इसके विपरीत बार्थ ने जिस पाठ के मूल्यांकन की ओर ध्यान खींचा है वह सुनिश्चित कलात्मक-साहित्यिक अभ्यासों के समृद्ध संदर्भों पर निर्भर है। अतः इसपाठ को प्रत्येक पीढ़ी को संबंधित समस्या के लिए नए सिरे से खोजना होता है। इस क्रम में पाठ के एक नहीं अनेक बल्कि अंतर्विरोधी अर्थ भी प्राप्त होते हैं। इस क्रम में मूल बात यह है कि आप अर्थ को कैसे हासिल करते हैं।

पाठ में अनेक जटिलताएं होती हैं। इसकी परिभाषा को लेकर भी व्यापक मतभेद हैं। इसके बावजूद सवाल यह है कि पाठ किसे कहते हैं ? पाठ अनेक संकेतों का समूह है। इस पहलू को अम्ब्रेतो इको ने भिन्न ढ़ंग से कहा है। इको का मानना है शब्द ही पाठ है और पाठ ही शब्द है। लेकिन इनका असुरक्षित इतिहास है।पाठ के शब्द संसार पर प्रतिक्रिया देने का अर्थ है नए अर्थ की खोज करना। सवाल यह नहीं है कि रचना को आप कृति कहते हैं या पाठ कहते हैं। सवाल यह है उसका क्या निश्चित अर्थ होता है ? क्या उसमें अनेक संभावित अर्थ होते हैं ? अथवा कोई अर्थ ही नहीं होता ?

इनदिनों पाठक के पास अपने समाज,संस्कृति,राजनीति आदि की व्यापक जानकारी है और वह इसके आधार पर विभिन्न पाठों को नए सिरे से खोलता है। पाठ के संदर्भ में बुनियादी मसला क्या है ? यहां पर स्त्री का पाठ बुनियादी मसला है। अतः पाठ को स्त्री के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। उसी संदर्भ में पाठ के अर्थ की खोज की जानी चाहिए। साथ ही यह भी देखना चाहिए कि कौन पढ़ रहा है ? स्त्री पढ़ रही है या मर्द पढ़ रहा है ? इससे यह भी पता चलेगा कि पाठ का अर्थ कौन ग्रहण कर रहा है ? कौन रोक रहा है ? कौन प्रतिवाद कर रहा है ? या कौन अर्थ को समायोजित कर रहा है। यानी पाठक की अस्मिता का पाठ के मूल्यांकन में महत्व होता है। अपनी अस्मिता के आधार पर ही वह अर्थ की खोज करता है। अनेकबार हम फिल्म देखते हुए उसे बीच में ही छोड़कर चल देते हैं हमें वह अच्छी नहीं लगती। इसके लिए कोई खास कारण हम नहीं जानते लेकिन छोड़कर चल देते हैं। असल में दर्शक यह काम अपने अनुभव के आधार पर करता है। पाठ के आधार नहीं करता। लेकिन ज्योंही पाठक को पाठ के आधार पर बात करने के लिए कहा जाएगा वह यही कहता है कि हमें कहानी अच्छी नहीं लगी, अभिनय अच्छा नहीं लगा। यानी वो कोई न कोई आधार बताता है।

पाठ का पाठक पर विखंडित असर पड़ता है जिसके आधार पर वह राय बनाता है। पाठ का पाठक पर असर ही नहीं पड़ता बल्कि मूल्यों और विचारधारा का भी असर पड़ता है। इसका भी असर पड़ेगा कि आखिरकार पाठक निजी तौर पर स्त्री,लिंग,सेक्स, कामुकता, नस्ल,रक्तसंबंध,वर्ग ,जातीयता आदि के बारे में किस तरह के मूल्यों को जानता और महसूस करता है। उसमें वह किन मूल्यों को घातक मानता है। यह भी संभव है किसी कृति या फिल्म में ऐसे मूल्यों का चित्रण किया गया हो जिनका पाठक की मूल्य संरचना के साथ अन्तर्विरोध हो, विवाद हो,पंगा हो,ऐसे में वह पाठ से असहमत भी हो सकता है। उल्लेखनीय है फिल्म का पाठ नहीं संकेत की धारणा के आधार पर मूल्यांकन किया जाना चाहिए। यह भी देखें संकेत को किन तत्वों के साथ सजाकर पेश किया है।

मसलन् आप किसी शिक्षक के पढ़ाने को ले सकते हैं। कक्षा में विभिन्न किस्म के छात्र होते हैं। इनकी मनोदशा भी भिन्न किस्म की होती है। वे पाठ और शिक्षक को एक ही तरह से ग्रहण नहीं करते। उनके ग्रहण का आधार होता है उनकी अपनी चेतना और रीडिंग आदतें होती हैं। जिस छात्र की किताब पढ़ने की आदत नहीं है और नोटस से काम चला लेता है ,उसके लिए वह शिक्षक मूल्यवान है जो नोटस लिखाता है या नोटस देता है। लेकिन जो छात्र किताब पढ़ने में दिलचस्पी रखता है उसके लिए वह शिक्षक मूल्यवान है जो किताब के सवालों को विभिन्न तरीकों से खोलकर पढ़ाता है। यानी छात्र की अस्मिता और चेतना यहां मूलतः निर्धारण का काम कर रही है।

एस .हाल ने रेखांकित किया है पाठ की रीडिंग में शरीर की अवस्थिति की बड़ी भूमिका होती है। मसलन् कब,कहां,किस समय,किस अवस्था में शरीर है। इसका पाठ की रीडिंग पर सीधा असर पड़ेगा। इसी प्रसंग में मिशेल फूको ने व्यक्ति के शरीर के नियमन और अनुशासित करने की प्रक्रियाओं को विस्तार से बताया है कि आधुनिककाल आने के बाद व्यक्ति के शरीर को किस तरह नए किस्म के अनुशासन ,आदतों,संस्कार और नियमों में बांधा गया।

एस. हाल का मानना है अस्मिता आंतरिक तत्वों से बनती है, बाह्य रिप्रजेंटेशन से नहीं। प्रत्येक व्यक्ति अपना आख्यान एवं प्रस्तुति स्वयं बनाता है। जिसमें उसका समाज झांकता है। वह समाज के सांस्कृतिक तत्वों के जरिए ही अस्मिता बनाता है फलतः व्यक्ति की अस्मिता सांस्कृतिक निर्मित होती है। उसमें बहुस्तरीय सामयिक विषय तैरते रहते हैं। जो चीज उसके सांस्कृतिक संदर्भ में आ जाती है उसका वह रूपान्तरण कर लेता है।

पाठ की व्याख्या की कई परंपराएं हैं। खासकर रैनेसां के साथ पाठ की सार्वभौम व्याख्याओं का जन्म होता है। सार्वभौम तुलनाओं का किया जाता है। सार्वभौम तुलना का अर्थ है कि प्रत्येक चीज,बात,व्यक्ति,घटना,विचार आदि अन्य से जुड़ा है। यानी अन्य तत्व उस तत्व की अभिव्यंजना है या अन्य किसी चीज की अंतर्वस्तु है। जब आप दो चीजों में तुलना करेंगे, एक-दूसरे के साथ जोड़कर देखेंगे तो व्याख्या के अनियंत्रित होने की संभावनाएं भी रहेगी।यहां अर्थ से अर्थ की ओर रूपान्तरण होगा। समानता से समानता की ओर स्थानान्तरण होगा। इस छोर का उस छोर के साथ संपर्क बनेगा। यानी एक से दूसरे की ओर स्थान्तरण होगा। यहां कोई कदम सुनिश्चित नहीं हो सकता।

हिन्दी साहित्य के आधुनिककाल के इतिहास को इस नजरिए से देखें तो विभिन्न समयों में पैदा हुई व्याख्याओं के कारणों को सहज भाव से जान सकते हैं। मसलन्, भारतेन्दुकाल में किसी लेखक ने इस युग को रैनेसां या नवजागरण नहीं कहा । सन् 1940 के बाद ही पता चला कि भारतेन्दु युग नवजागरणकाल था। यह बात सबसे पहले राहुल साकृत्यायन ने कही। यही हाल छायावाद का है इस आंदोलन के लेखक और आलोचक नहीं जानते थे कि इस आंदोलन का स्वाधीनता संग्राम से कोई संबंध है। यह तथ्य खोजकर रामविलास शर्मा ने बताया।

कहने का अर्थ है कि रैनेसांकालीन व्याख्या की पद्धति में अर्थ और तुलना दोनों के ही असीमित रूपों के उदय की संभावना निहित है। रैनेसांकालीन आलोचना की सीमा यह है कि वह किसी चीज की अनुपस्थिति या रूपान्तरणकारी अर्थ के बारे में नहीं बताते। यही वजह है हमारे यहां भारतेन्दु से लेकर छायावाद तक रैनेसांकालीन आलोचना को अपने रूपान्तरण के अर्थ का पता नहीं है। वे तो यह देखते हैं कि हर चीज एक-दूसरे से जुड़ी है और उसके आधार पर ही आलोचना के सारे मानक बने हैं।

सार्वभौम अर्थ में संकट भी पैदा हो सकता है। मसलन् स्त्रीभाषा के संदर्भ को ही लें। पश्चिम में भाषा में दो ही लिंग हैं लेकिन भारत में 3तीन लिंग हैं। पुंलिंग,स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग। इन तीन कोटियों के कारण हमें साहित्य के उस तीसरे रूप को अलग से जानने का अवसर मिल सकता है जिसे लेकर इनदिनों पश्चिम परेशान है।

इसी तरह सार्वभौम स्त्री धारणाओं का आधार भारत में वही नहीं है जो पश्चिम में है। सारी दुनिया में तीन बड़े धर्म हैं। क्रिश्चियन, इस्लाम और हिन्दू । इनमें पहले दो धर्मों के पास एकमात्र पुरूष परंपरा है और स्त्री को पुरूष संदर्भ से ही देखने का नजरिया है। लेकिन भारत में हिन्दू धर्म में शक्ति सम्प्रदाय के नाम से जो दार्शनिक-धार्मिक परंपरा है वह स्त्री को स्त्री के संदर्भ में ही देखती है। यह विशिष्टता भारत के स्त्रीवादी विमर्श को व्यापक देशज वैचारिक आधार प्रदान करती है। शक्ति परंपरा में भी सैंकड़ों विकल्प हैं। ये चीजें पश्चिम में नहीं हैं।

दिक्कत यह है कि स्त्री परंपरा को कभी फेमिनिस्ट नजरिए से देखा ही नहीं गया। शक्ति परंपरा के रूपों के साथ भारतीय स्त्री के वैविध्य को देखने से अनेक नई चीजें सामने आएंगी।

एक और चीज है जिसे ध्यान में रखना होगा। वह है भारत में असंख्य प्रतीकों और रूपकों का सर्जनात्मक संसार। खासकर शक्ति के प्रतीकों का वैविध्य नए किस्म के विमर्श को जन्म दे सकता है। प्रतीकों और संकेतों के नए अर्थ देखने का लाभ यह है कि हम निरंतर एक अर्थ से दूसरे अर्थ की ओर जाते रहते हैं। साथ ही और ज्यादा नए अर्थ की मांग करते हैं। यानी "आगे क्या हुआ " या "नया अर्थ क्या है "यह धारणा पीछा करती रहती है। अर्थ से नए अर्थ की ओर जाने की निरंतरता के कारण नए आलोचना मानकों और धारणाओं का जन्म होता है।

जब हम किसी पाठ को पढ़ते हैं तो असल में जीवन सत्य खोजना मूल लक्ष्य होता है। पुराने अर्थ के आधार पर जीवन सत्य ठीक से नजर नहीं आता, इसलिए नए अर्थ खोजने की जरूरत पड़ती है। पाठ पर से पुराने कपड़े उतारने पड़ते हैं और पाठ को नए अर्थ के कपडे पहनाने होते हैं। नए कपड़े पहनाने के लिए पुराने कपड़ों को पूरी तरह उतारना बेहद जरूरी है। यानी पाठ को पुराने अर्थ से मुक्त करना बेहद जरूरी है। नए अर्थ के आने का मतलब है एक नई प्रस्तुति का आना। नई प्रस्तुति की रोशनी में हम सत्य को देखते हैं। यहीं पर नई व्याख्या का जन्म होता है।यह व्याख्या स्थायी नहीं होती। बल्कि आगे फिर कभी बदल सकती है। क्योंकि जीवन सत्य बदलता रहता है।परिवर्तित जीवन सत्य के साथ व्याख्या का बदलना आम बात है। इस क्रम में धारणाएं भी बदलती रहती हैं।

रैनेसां जब आया तो स्थिति यह थी कि व्याख्याओं का ढ़ेर लग गया।गद्य की बाढ़ आ गयी। वस्तु,घटना,व्यक्ति,संवृत्ति,प्रवृत्ति आदि के बारे में हम ज्यादा जानने लगे। हम ज्यादा जानते हैं इसका अर्थ नहीं है कि हम सब कुछ जानते हैं। यही हाल रैनेसाकालीन लेखकों का था। वे जिन चीजों को जानते थे ,साथ में उनके कुछ आधार को भी जानते थे। वे जिस संदर्भ में लिख रहे थे उसकी क्षमता भी जानते थे। नयी आधुनिक व्यवस्था के संदर्भ में वे असीमित जान सकते थे। लेकिन प्रक्रियाएं सीमित ही थीं,उनका असीमित ज्ञान संभव नहीं था।

रैनेसां में आलोचना की जो पद्धति अपनायी गयी उसमें अर्थ की जडों को जानने का भाव है। उसके आधार पर व्याख्या करने की प्रवृत्ति मिलती है। लेकिन एक अवस्था या समय गुजर जाने के बाद लेखक और आलोचक यथास्थितिवाद में बंध जाता है,रूढ़िवाद में बंध जाता है और फिर उससे निकलने की छटपटाहट आरंभ हो जाती है। अभिव्यक्ति के फॉर्म और अंतर्वस्तु को बदलने की छटपटाहट आरंभ हो जाती है। फलतः एक ही समय में अनेक किस्म की प्रवृत्तियां और शैलियां सक्रिय नजर आती हैं। अब हर किस्म संदर्भ और हर चीज से संबंध प्रासंगिक नजर आता है। प्रत्येक वस्तु के साथ संबंध स्वीकार्य हो जाता है।

मसलन्, भारतेन्दु के साहित्य के साथ सन् 1857 का संपर्क ,संबंध और असर मान लिया गया। नयी पूंजीवादी सभ्यता के विभिन्न रूपों के साथ संपर्क-संबंध भी मान लिया गया।प्रेस से संबंध मान लिया, धार्मिक-समाजसुधार आंदोलन,पुनरूत्थानवाद,ब्रजभाषा,खड़ीबोली हिन्दी,उर्दू,पुराने भक्ति आंदोलन आदि जो भी चीज मिलती गयी उससे संबंध जोड़ते चले गए। इनमें से प्रत्येक चीज को अन्य के साथ जोड़ा,अभिव्यक्ति रूपों के साथ जोड़ा। एक अभिव्यक्ति रूप को दूसरे के साथ जोड़ा। यानी प्रत्येक अंतर्वस्तु को अन्य अंतर्वस्तु की अभिव्यक्ति माना। ग्लोबल अंतर्वस्तु का भी विकास होता रहा।

रैनेसांकाल से आरंभ हुई अनंत समीक्षा की संभावनाओं ने अवधारणा और अर्थ की अनंत संभावनाओं के द्वार खोले हैं। इसे आलोचना की भाषा में विस्थापन कहते हैं। जब आप आलोचना करते हैं तो अनुगमन करते हैं ,विस्थापन करते हैं। देरिदा ने "ऑफ ग्रामोटॉलॉजी "में लिखा ,पाठ तो मशीन है उसमें अनंत विस्थापन निहित हैं।इसकी प्रकृति वसीयत के मर्म को समेटे होती है। यानी इसमें वसीयती भाव है । यही वजह है इतिहास,परंपरा आदि की खोज का काम आधुनिककाल में ज्यादा हुआ है। लेखक अपने को भक्ति आंदोलन,रैनेसां आदि के वारिस के रूप में पेश करने लगे हैं।

यह ऐसा दौर है जिसमें पाठ का आनंद लें या कष्ट उठाएं,उससे आगे निकलें,या उसे छोड़ें।प्रत्येक क्षण का अध्ययन करें। प्रत्येक संकेत या पाठ या प्रवृत्ति के उदय की प्रक्रिया पढ़ने लायक होती है साथ ही वो एक समय के बाद खो जाती है या नष्ट हो जाती है। वह अपने समय से संबंध बनाती है और एक अवस्था के बाद संबंध विच्छिन्न कर लेती है। देरिदा के नजरिए से यही बुनियादी तौर पर विस्थापन या "ड्रिफ्ट" है।

पाठ की आलोचना में मंशा की अवधारणा की महत्वपूर्ण भूमिका है। अम्ब्रेतो इको ने इसी संदर्भ में लिखा है पाठ के पीछे निहित आत्मगत मंशा को जब अस्वीकार कर दिया जाता है तो पाठक की पाठ के प्रति वफादारी खत्म हो जाती है। फलतः उसकी भाषा बहुस्तरीय खेलों का आधार बन जाती है।यही वजह है पाठ में अंतिम अर्थ को शामिल नहीं किया जा सकता। यहां कोई रूपान्तरणकारी संकेतित अर्थ नहीं रह जाता। प्रत्येक संकेतक अन्य संकेतक के साथ युक्त नजर आता है। कोई भी चीज प्रासंगिकता के दायरे के बाहर नजर नहीं आती। आलोचना का काम है पाठ में अंतर्निहित अर्थ की खोज करना । उसे भिन्न लक्ष्य के साथ पेश करना। इस क्रम में आलोचना कॉमनसेंस का दायरा अतिक्रमित कर जाती है।

स्त्रीसाहित्य के संदर्भ में यह बात महत्वपूर्ण है कि किसी एक पद्धति के आधार पर उसका मूल्यांकन नहीं कर सकते। क्योंकि स्त्री के अनुभव ऐतिहासिक तौर पर बेहद जटिल होते हैं। विभिन्न विषयों और क्षेत्रों के अध्ययन के लिए अलग अलग सैद्धांतिक मॉडलों को आधार बनाया जाना चाहिए। इस मामले में अन्तर्विषयवर्ती पद्धतिशास्त्र की मदद लेनी चाहिए।




























































शुक्रवार, 11 मई 2012

पश्चिम बंगाल में ममता सरकार का एक साल-विशेष लेख- मिस्चीफ मिनिस्टर

(पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री पर केंद्रित ‘इकोनोमिस्ट’ पत्रिका के ताजा 21 अप्रैल 2012 के अंक में प्रकाशित टिप्पणी। कहने की जरूरत नहीं कि ‘इकोनोमिस्ट’ लंदन से प्रकाशित आज की दुनिया में वैश्वीकरण की विचारधारा की एक सबसे प्रमुख और प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्रिका है।अनुवाद- जगदीश्वर चतुर्वेदी)

कोलकाता के कूड़े से भरे बाजारों में घूमते किसी भी खरीदार को आम तौर पर यह पछतावा होता है कि एक महान ढहता हुआ लेकिन मजेदार शहर, जिसे कभी कलकत्ता के नाम से जाना जाता था और जो आज भी पश्चिम बंगाल राज्य की राजधानी है। जैसे प्लास्टिक की सस्ती चीजों और बंगाल के सांस्कृतिक नायक रवीन्द्रनाथ की प्लास्टर आफ पैरिस की आवक्ष-मूर्ति को खरीद कर किसी को अपनी जल्दबाजी के लिये अफसोस हो सकता है, वैसे ही पिछले साल के राज्य के चुनाव में वोट देने वाले अनेकों को हो रहा है। 34 सालों के अधम कम्युनिस्ट शासन से खिन्न लोगों ने ममता बनर्जी और उनकी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस को सत्ता सौंप दी। आज अपने इस चयन पर उनका अफसोस बिल्कुल साफ दिखाई देता है।

उनकी (ममता बनर्जी की . अनुवादक) भूलें साधारण किस्म की भूलें नहीं है। वे ईमानदार दिखती हैं; आज भी कोलकाता के एक गरीब इलाके में, एक बदबूदार नदी और उजड़ी हुई बेकरी के बीच फंसा हुआ दो मंजिलों का चूना पुता बक्सेनुमा घर है। उनका शौक फेरारियां नहीं, बल्कि प्रकृति का चित्रांकन और कविता है। एक प्रमुख बंगाली व्यवसायी उनकी बहुतेरी बातों की अनदेखी करते हुए, क्योंकि वे एक भयावह विरासत से जूझ रही हैं, उनकी ऊर्जा और स्पष्टवादिता की प्रशंसा करता है। यह भारत में सबसे अधिक कर्ज से लदा राज्य है, और, कम्युनिस्टों के अपेक्षाकृत सुधारवादी अंतिम सालों के मामूली प्रयत्न के बावजूद यहां कोलकाता से बाहर बहुत थोड़ा विकास हुआ जिसके चलते संपत्तियों के दामों में तेजी आयी तथा यह राज्य भारत के आउटसोर्सिंग साम्राज्य की एक चौकी बना।

बंगाली प्रतिभाशाली, हर बात पर भुनभुनानेवाले, होते हैं। उनकी शिकायत उनकी कार्य शैली से है। एक पत्रकार की राय में, स्तालिनपंथी मानस है। एक पार्टी का वरिष्ठ नेता कहता है, मंत्रीमंडल के सहयोगी जानलेवा आतंक में जीते हैं। एक नौजवान आलोचक ताना कसता है, उनका शासन ‘एक आदमी की सेना’ है। एक स्वेच्छाचारी रुझान जो विलक्षण प्रकार की भारी भूलें कराता है। उनका कहना था कि सामूहिक बलात्कार की एक पीडि़ता उनके शासन को बदनाम करने के लिये साजिश कर रही थी, और उन्होंने बलात्कारियों को पकड़ने वाली होशियार महिला पुलिस अधिकारी को दंडित कर दिया। फिर इसी महीने वे दो शिक्षाविदों की गिरफ्तारी से खुद को अलग नहीं कर पायीं, जिनमें से एक की पिटाई की गयी थी। उसने सिर्फ फेसबुक पर तथा ई-मेल से उनके बारे में एक कार्टून सांझा किया था। इससे जाहिर है कि वे मामूली आलोचना भी बर्दाश्त नहीं कर सकती। इसीप्रकार सार्वजनिक पुस्तकालयों में उन्होंने उन अखबारों पर पाबंदी लगा दी जिन्हें वह नापसंद करती है। एक मीडियाशाह, अभीक सरकार (आनंद बाजार   ग्रुप का मालिक-अनु.)जिसका मीडिया ग्रुप उसकी आलोचना कर रहा है, आशंका में है कि वह उसकी गिरफ्तारी का आदेश दे देगी: उसने ऐसे अब तक आठ संभावित मामलों के लिये ‘अग्रिम जमानत’ ले ली है।

उनके पक्षधरों का मानना है कि वह अपना काम सीख रही है, जिसके लिये उन्हें दिल्ली में कुछ वर्षों तक मंत्री रह कर रेलवे को (गंदे ढंग से) चलाने का अनुभव यथेष्ट नहीं था। उनका आंग्ल-भारतीय प्रवक्ता डेरेक ओ’ब्रायन थोड़ा हकलाते हुए दावा करता है कि आपने अभी ममता का सर्वश्रेष्ठ देखा नहीं है। अब तक उनकी कार्यशैली के बारे में शिकायतें मुख्यत: शहरी अभिजनों तक सीमित जान पड़ती हैं। बड़ी चिंता इस बात की है कि वह सत्ता के साथ क्या करती है। उन्हें एक सफलता मिली है: माओवादियों पर उनके ग्रामीण आधार में घुस कर आघात किया है। अन्यथा, चीजें विकट दिखती हैं। सबसे अधिक चिंताजनक है वाम के मामले में कम्युनिस्टों को भी पछाड़ती उसकी आर्थिक नीतियां। 

   तृणमूल का अर्थ है ग्रासरूट्स। वे भारत की सबसे बड़ी कंपनी, टाटा की उस जमीन पर गाड़ी बनाने की योजना के खिलाफ अभियान चला कर जीती थी जो उनके अनुसार किसानों से गलत ढंग से ली गयी थी। टाटा सारे रोजगारों को लेकर एक मित्रवत राज्य, गुजरात भाग गया, लेकिन मतदाता खुश हुए।

एक लोकलुभावन लेकिन सिद्धांतकार नहीं - श्रीमती बनर्जी की सफलता पूरे भारत में एक दीर्घ-कालीन रुझान का संकेत है: राष्ट्रीय पार्टियों की कीमत पर क्षेत्रीय पार्टियों का उदय। गरीब, कम-शिक्षित, ग्रामीण (अपने आरामदेह दफ्तर में गहरी सांस के साथ एक शिक्षित बंगाली कहता है - लुंपेन) जो संपन्न अल्पसंख्यकों की तुलना में कहीं ज्यादा संख्या में वोट देता है, कम से कम उत्तर भारत में अक्सर अधिक से अधिक स्थानीय दलों को ज्यादा पसंद करता दिखाई देता है। श्रीमती बनर्जी का नजरिया सरकारी नौकरियों, कल्याण को बांटने तथा छोटे किसानों को सुरक्षा देने और उन सुधारों को धता बताने का है जिनसे राज्य में निवेश आकर्षित हो सकता है। उनकी सरकार ने इधर एक कानून अवश्य पारित किया है जिससे सरकारी जमीन के छोटे टुकड़ों को व्यवसायी उपयोग के लिये लीज पर दिया जा सकता है। तथापि उनकी यह सार्वजनिक प्रतिज्ञा है कि उद्योग को जमीन खरीदने में कोई मदद नहीं करेगी। और जमीन की मिल्कियत का मसला इतना टुकड़ों में बंटा हुआ तथा उलझा हुआ है कि जमीन चाहने वाली कंपनियां उससे दूर ही रहेगी।

प्रतीकों और सजावट पर ज्यादा ऊर्जा लगायी जा रही है। राज्य का नया नाम हुआ है - पश्चिम बंग। ऐसा लगता है कि श्रीमती बनर्जी यह मानती है कि सड़क की हर रेलिंग, पटरी, सार्वजनिक शौचालयों, मोड़ों और पुलों को नीली और सफेद धारियों से रंग कर वे कोलकाता में शैलानियों को आकर्षित कर लेगी। उसने शहर के हर मुहाने पर लाउडस्पीकरों से रवीन्द्रसंगीत बजाने का भी निर्देश दिया है और स्कूलों के पाठ्यक्रम से माक्‍​र्स को निकाल दिया है। वह व्यापरिक मंचों पर नहीं जायेगी और औद्योगिक संबंधों को बढ़ाने वाले दूतों से बैठक नहीं करेगी। पिछले महीने राज्य के बजट में भारत में कहीं से भी आने वाले सामानों पर सनकी प्रवेश कर को फिर से चालू कर दिया। यह व्यापार को नुकसान पहुंचायेगा और लगभग कोई राजस्व पैदा नहीं कर पायेगा। फिर इसी हफ्ते देश की बड़ी साफ्टवेयर कंपनी इंफोसिस ने अपने एक केंद्र के निर्माण को रोक दिया जिससे दस हजार रोजगार पैदा होते। श्रीमती बनर्जी ने उसे करों में राहत देने वाले विशेष आर्थिक क्षेत्र का दर्जा देने से इंकार कर दिया।

आने वाले समय में यह सब बहुत महंगा साबित होगा। सिर्फ किसान इतना कम राजस्व पैदा करते हैं कि उससे सड़कों, बिजली, स्कूलों और अस्पतालों का खर्च भी नहीं चल पायेगा। उनकी सरकार के राजस्व का सारा तो तनख्वाहों और दो खरब रुपये के ऋण पर ब्याज के भुगतान में ही चला जाता है। इससे श्रीमती बनर्जी के पास एक ही ध्वंसात्मक रास्ता बचा रहता है: भीख मांगो और दिल्ली में केंद्रीय सरकार को धमकाओं ताकि ऋण में राहत हासिल हो सके। कांग्रेस के एक जरूरी सहयोगी के नाते आज वे मजबूत स्थिति में है। लेकिन प्रणब मुखर्जी, उनके एक प्रमुख बंगाली प्रतिद्वंद्वी हैं और वे कोई विशेष मदद देने से इंकार कर रहे हैं। इसका परिणाम पश्चिम बंगाल और भारत की पंगुता है। वे सरकार के सुधार के कामों को रोकने में मदद कर रही हैं - सुपरमार्केट में विदेशी निवेश, ईंधन पर सबसिडी को कम करने, रेल बजट, बांग्लादेश से पानी के बंटवारे की संधि, और भ्रष्टाचार-विरोधी विधेयक में टांग अड़ा रही है। लेकिन उन्हें कोई राहत नहीं मिल रही है। यह गतिरोध चलेगा। कांग्रेस जुलाई में राष्ट्रपति पद के लिये अपने उम्मीदवार का चुनाव चाहती है और इसके लिये उनकी मदद की जरूरत पड़ेगी। वे तथा कुछ और राज्यों के नेता राष्ट्रीय आतंकवाद-विरोधी निकाय संबंधी एक योजना को रोक कर केंद्र से और अधिकारों को छीनना चाहते हैं। शासक गठजोड़ की एक प्रमुख  , एक ऐसे समय में जब केंद्र का नेतृत्व कमजोर है, क्षेत्रीय ताकत का प्रतिनिधित्व करती है। उनकी पार्टी जोर-शोर से ‘क्रियाशील संघवाद’ की बात करती है जिसके मायने हैं राज्यों का जनता के धन पर ज्यादा नियंत्रण होना चाहिये। इसप्रकार कांग्रेस के साथ तनाव बढ़ेंगे। लेकिन कोई भी यह उम्मीद नहीं करता कि वह गठबंधन छोड़ देगी। उन्हें एक मिसचीफ मेकर के रूप में देखा जा सकता है; लेकिन कम से कम अब तक पूरब की दुष्ट डायन के रूप में नहीं।