मंगलवार, 29 जुलाई 2014

बत्रापंडित के पोंगापंथ के ख़तरे


     ये जनाब मुकदमेबाज हैं। संघ की नई रणनीति के तहत ये शिक्षाजगत में संघ के मुखौटे हैं । अब तक का राजनीतिक अनुभव रहा है कि संघ पहले वैचारिक हमले करता है , फिर राजनीतिक हमले ,उसके बाद शारीरिक और अंत में क़ानूनी आतंकवाद का सहारा लेता है और फिर विजय दुंदुभि बजने लगती है !
     उदार  आधुनिक लोकतांत्रिक , वैज्ञानिक और संवैधानिक वैविध्यपूर्ण  विचारों और किताबों पर प्रतिबंध लगाना फंडामेंटलिज्म है । इस फंडामेंटलिज्म को हमेशा शिक्षा की रक्षा के नाम पर सक्रिय देखा गया है । 
   सवाल यह है कि बत्रापंडित जैसे पोंगापंथियों के मुखौटे की संघ को ज़रुरत क्यों पड़ी ? संघ  और उससे जुड़ा राजनीतिक दल इस काम को अपने नाम से सीधे क्यों नहीं करता ? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि केन्द्र या राज्य में जहाँ पर बत्रापंडित को मौक़ा मिलता है वे शिक्षा पर ही मेहरबानी क्यों करते हैं ? 
        आधुनिककाल में  शिक्षा को राजनीति के बाद सबसे बड़ा विचारधारात्मक जंग का मैदान माना जाता है और यही वजह है कि संघ और उनके मुखौटे राजनीति और शिक्षा पर सबसे ज़्यादा हमले करते हैं। 
    संघ के बजरबट्टुओं की वैचारिक जंग का तीसरा बड़ा क्षेत्र है हमारा संविधान । वे आए दिन संविधान की मूल धारणाओं और भावनाओं की पिछड़े नज़रिए से आलोचनाएँ करते  हैं । 
   संविधान ,शिक्षा या राजनीति इसमें कोई चीज़ स्थायी नहीं है , इनमें निरंतर संशोधन, परिवर्द्धन और मूलगामी परिवर्तनों की ज़रुरत रहती है। इन क्षेत्रों में बदलाव यदि आगे की ओर ले जाने वाले हों तो समाज में अमनचैन स्थापित होता है लेकिन बदलाव अतीतोन्मुखी हों तो समाज , राजनीति, शिक्षा, न्यायपालिका ,  संस्कृति आदि के क्षेत्र में नए क़िस्म का रुढिवाद और फंडामेंटलिज्म पैदा होने की संभावनाएँ होती हैं। 
    संयोग की बात है कि बत्रापंडित जो सुझाव दे रहे हैं उनमें अतीतोन्मुखी जीवनशैली पर ज़ोर है। अतीतोन्मुखी जीवनशैली मूलत: भारतीय परंपरा का निषेध है और उदार सामाजिक संरचनाओं के निर्माण में बाधक है । 
    बत्रापंडित अपने को किताबों के 'सामाजिक संपादक 'के पद पर नियुक्त कर चुके हैं। ये साहब नहीं जानते कि भारतीय परंपरा में किताबों के 'सामाजिक संपादक 'की कभी किसी हिन्दू या ग़ैर हिन्दू उदार या अनुदार विचारक, दार्शनिक, संत, कवि आदि ने वकालत नहीं की । 
   भारतीय समाज को कभी ' किताबों के सामाजिक संपादक ( सोशल आॅडिटर) ' की ज़रुरत नहीं पड़ी । भारतीय परंपरा में दर्शन से लेकर जीवनशैली तक, धर्म से लेकर शिक्षा तक किताबों की दुनिया प्राचीनकाल , मध्यकाल और आधुनिककाल तक वैविध्यपूर्ण और सहिष्णु रही है ।
   ब्रिटिश शासनकाल में पहली बार किताबें ज़ब्त हुईं.विचारों पर क़ानूनी पाबंदियाँ लगायी गयीं । ब्रिटिशशासन से हमें विचारों पर पाबंदी की क़ानूनी हिदायतें देखने को मिलती हैं । 
      बत्रापंडित की अवैज्ञानिक और काल्पनिक धारणाओं के आधार पर हमने देश की एकता और अखंडता का निर्माण नहीं किया है । हमारे देश में संविधान निर्माण की प्रक्रिया से लेकर आज तक ठोस वैज्ञानिक और उदार विचारों के आधार पर विविधता को हर क्षेत्र में स्वीकृति दी गयी और विविधता को जीवनशैली, शिक्षा, अभिव्यक्ति की आज़ादी, राजनीति आदि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मानकर क़ानूनी व्यवस्थाओं और वैध संरचनाओं का निर्माण किया गया। 
   मसलन हमारे संविधान के तहत आप पोंगापंथ का प्रचार कर सकते हैं ,लेकिन कोई वैज्ञानिक नज़रिए से प्रचार करना चाहे तो उसे भी हमारा संविधान और क़ानून मान्यता देता है । 
   आप जादू - टोने के पक्ष में किताबें लिख सकते हैं और वैज्ञानिकचेतना पर भी किताबें लिख सकते हैं । लेकिन बत्रापंडित का सारा ज़ोर इस वैविध्य को नष्ट करने पर है वे वाद -विवाद में विश्वास नहीं करते ,वे जबरिया मनवाने में विश्वास करते हैं  और इसके लिए सभी गैर-ज्ञानपरक हथकंडे अपनाते हैं । 
    वे दिल जीतने में विश्वास नहीं करते वे दिल को क़ैद करने में विश्वास करते हैं । ' सामाजिक संपादक' के नाम पर उनके निशाने पर विज्ञानसम्मत शिक्षा है। वे कभी सामाजिक रुढियों , अंधविश्वास, सामाजिक कुरीतियों ,भूत-प्रेत-पिशाच-डाकिनी-पिशाचिनी आदि के ख़िलाफ़ मुहिम नहीं चलाते ।
    वे कभी उपभोक्तावाद, सभी रंगत के कठमुल्लापन, जातिप्रथा , दहेजप्रथा आदि के ख़िलाफ़ बिगुल नहीं बजाते । 
    बत्रापंडित ने ' स्वच्छंदता' के ख़िलाफ़ मुहिम के नाम पर अतीतोन्मुखी जीवनशैली और मूल्यों की हिमायत को प्रमुखता से पेश किया है यह असल में अतीतोन्मुखी फ़ंडामेंटलिस्ट स्वच्छंदता है जिसका भारत की विविधता और संविधान की मूल मान्यताओं से बैर है । वे इसके जरिए ' सांस्कृतिक आतंक' पैदा करना चाहते हैं । 
      बत्रापंडित एक गैर पेशेवर संघी कार्यकर्ता है ,जिसके जरिए संघ अपना सांस्कृतिक काम करता रहा है । यह व्यक्ति अपने गैर- पेशेवर कामों मेंकानून के चोर दरवाज़ों का बड़े ही कौशल के साथ इस्तेमाल करता रहा है । स्थिति यह हैकि वह सीधे मंत्री से लेकर प्रकाशक तक सीधे आदेश की भाषा में बोलता है । 
   बत्रापंडित की मान्यता है ' मेरी मानो वरना मुकदमे झेलो' , यह रणनीति किसी भी प्रकाशक को ठंडा करने के लिए काफ़ी है, क्योंकि कोई भी प्रकाशक मुकदमेबाजी से डरता है । इस रणनीति का बत्रापंडित को लाभ भी मिला है और कई प्रकाशक उनके दबाव में आ गए हैं , संघ नियंत्रित सरकारें उनकी किताबें ख़रीद रही हैं और अब ये जनाब राष्ट्रीय स्तर पर बड़े सांस्कृतिक संकट को पैदा करने की मुहिम में लग गए हैं  ।
  हमारी अपील है कि बत्रापंडित के पोंगापंथ के सामने केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री समर्पण न करें । यदि वे उनके दबाव में आती हैं तो इससे संविधान की मूल भावनाओं और अकादमिक स्वायत्तता का हनन होगा । 
     
       
  

सोमवार, 28 जुलाई 2014

मोदी बाबू के कमाल के ६० दिन-



एक तरफ़ हाफ़िज़ सईद से अपने दूत के ज़रिए गप्पें ! दूसरी ओर सईदभक्त आतंकियों की घुसपैठ और सीमा पर निरंतर गोलीबारी!
एक तरफ़ संसद में सर्वधर्म सद्भाव की नक़ली अपील ! दूसरी ओर मुरादाबाद में नए क़िस्म के मुज़फ़्फ़रनगर मार्का 'सद्भाव'की अथक कोशिश ! अहर्निश संविधान की मूलभावनाओं भाजपा और सहयोगी दलों के घटिया वैचारिक हमले !
एक तरफ़ देश को स्वच्छ प्रशासन का गुजरात के नाम पर भरोसा !दूसरी ओर गुजरात में नौ हज़ार करोड़ रुपयों के खर्चे का हिसाब किताब न देना !
सीएजी के अनुसार रिलायंस-अदानी आदि को सारे क़ानून तोड़कर लूट में हज़ारों करोड़ रुपयों की मदद करना ! 

एक तरफ़ संविधान के अनुसार काम करने का वायदा दूसरी ओर संवैधानिक नियमों और क़ायदों का सरेआम उल्लंघन !
एक तरफ़ देशभक्ति का नक़ली नाटक दूसरी ओर विगत ६० दिनों में पाक फ़ायरिंग में मारे गए शहीदों के घर मोदी बाबू का न जाना !
एक तरफ़ चुनाव के समय सोनिया- राहुल - वाड्रा के ख़िलाफ़ नक़ली मंचीय नाटक और इधर साठ दिनों में इनके 'अवैध 'धंधों पर हमले न करना ! 
महँगाई का बढ़ना , ख़ासकर टमाटर का १००रुपये के पार पहुँच जाना आदि बातें हैं जो मोदी को सबसे निकम्मा और ग़ैर-भरोसेमंद पीएम बना रही हैं।

दिल्ली में नार्थ -ईस्ट के लोगों पर हमलों में इज़ाफ़ा और बलात्कारों का न रुकना बताता है कि लोकतंत्र में प्रचार के नाम पर टीवी और मीडिया उन्माद के ज़रिए जनता से ठगई की गयीहै।

ब्रिक्स में मोदीजी और भोंपू नेटवर्क



नरेन्द्र मोदी का पीएम के नाते ब्रिक्स सम्मेलन पहला बड़ा कूटनीतिक सम्मेलन था । इस सम्मेलन में क्या हुआ ? भारत ने क्या खोया और क्या पाया यह बात भारत का मीडिया कम से कम जानता है । 
 मोदीजी ने अपनी ख़ामियों को छिपाने की रणनीति के तहत मीडिया के समूचे तामझाम को अपनी यात्रा से बेददखल कर दिया।
    'नियंत्रित ख़बरें और सीमित कवरेज 'की रणनीति के तहत स्थानीय स्तर पर भक्तटीवी चैनलों का भोंपू की तरह इस्तेमाल किया। यह एक तरह से भोंपू टीवी कवरेज यानी अधिनायकवादी कम्युनिकेशन माॅडल की वापसी है। दुर्भाग्यजनक है कि भारत में व्यापक मीडिया नेटवर्क के रहते हुए मोदी ने भोंपूनेटवर्क का ब्रिक्स कवरेज के लिए इस्तेमाल किया। 
       ब्रिक्स भोंपू टीवीकवरेज की ख़ूबी थी कि पीएम कम और भोंपू ज़्यादा बोल रहे थे। पहलीबार ऐसा हुआ कि जो मीडिया साथ में गया था उससे भी सम्मेलन और सामयिक विश्व घटनाक्रम पर मोदीजी ने  प्रेस काॅफ्रेंस करके अपने ज्ञान -विवेक और विश्व राजनीतिक नज़रिए का परिचय नहीं दिया। यहाँ तक कि सम्मेलन में भी मोदीजी ने सरलीकृत रुप में गोल गोल बातें कीं। 
    ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी अपने विदेशनीति विज़न को सामने नहीं रख पाए और यह बताने में असमर्थ रहे कि इनदिनों राजनीतिक तौर पर सबसे बड़ी चुनौती क्या है ? कम से कम इस मामले में मनमोहन सिंह का रिकाॅर्ड बेहतर रहा है उनके भाषण हमेशा नई रणनीतियों के परिप्रेक्ष्य से भरे रहते थे। उनके बोलने का गंभीर असर होता था और नई समस्याओं को हल करने में उनके नज़रिए से विश्व के नेताओं को मदद मिलती थी , लेकिन मोदीजी ने इस पक्ष का अभी विकास नहीं किया है।
   मोदीजी भारत की सक्रिय नीति निर्माता की भूमिका को महज़ हिन्दीवक़्ता की भूमिका तक सीमित करके देख रहे है। 
  मोदी सरकार समझना होगा कि  भारत को विश्व राजनीतिक मंचों पर महज़ हिन्दीवक्ता के रुप में नहीं सक्रिय नीति निर्माता के रुप में भूमिका निभानी है । 
    मोदीजी और उनके मंत्रीमंडल के सहयोगियों को विदेशनीति से लेकर अन्य नीतियों के संदर्भ में विश्वमंचों पर हिन्दीवक्ता के दायरे के बाहर निकलकर सोचना होगा। भाषाप्रेम और सरलीकृत भाषणों से आगे निकलकर नीतिगत तौर पर पहल करनी होगी।  विश्व की जटिलताओं को समझना होगा और उनमें हस्तक्षेप करना होगा। ब्रिक्स में वे मौक़ा चूक गए।

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

मोदी और वर्चुअल मुखौटालीला -किश्त १ -




नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री मीडिया लहर ने बनाया अब यही मीडिया लहर मुश्किलें खड़ी कर रही है । मोदी संभवत: पहले प्रधानमंत्री हैं जिनका मीडिया ने सबसे जल्दी अलोकप्रियता का भाष्य लिखना आरंभ कर दिया है।
   मोदी को मीडिया ने मुखौटों के माध्यमों से आम लोगों के बीच में जनप्रियता दिलाई इसलिए मोदी का मीडिया विवेचन कभी मुखौटों को हटाकर नहीं किया जा सकता। मोदी ने अपनी ऐसी इमेज बनाकर पेश की थी कि वह हर उस व्यक्ति में है जो उसका प्रचारक है इस तरह मोदी ने अपने नायक का निर्माण किया था। सभी निजी व्यक्तियों की इमेज और निजता को अपहृत करके मोदी 'महान' की इमेज को मीडिया ने तैयार किया था । निश्चित रुप से यह बेहद खर्चीला ,सर्जनात्मक और कलात्मक काम था ।फलत: मोदी व्यक्ति नहीं मुखौटों का संगम है। 
        मोदी को देखने का हम नज़रिया बदलें मोदी पहले भी बहुत गरजते थे ,अब भी गरज रहे हैं , पहले भी वे मुखौटों के ज़रिए गरज रहे थे ,अब भी मुखौटों के ज़रिए गरज रहे हैं ,मोदी को निजी तौर पर प्रधानमंत्री के रुप में देखना ,अंश को देखना  है, मोदी समग्रता में सिर्फ़ मुखौटों में मिलेगा,निचले स्तर पर सभी संघी सदस्यों और हमदर्दों में मिलेगा।  मोदी का मुखौटों के बिना अर्थ न पहले समझ सकते थे और न उनके पीएम बनने के बाद ही समझ सकते हैं। मोदी यदि संघ के साधारण सदस्य की मेहनत के फल के मालिक हैं तो वही मोदी निचले स्तर साधारण संघी सदस्य की दबंगई के पाप के भी मालिक हैं यह नहीं होसकता कि नेता को कार्यकर्ता के अच्छे काम फलें और बुरे असर ही न करें । 
      वर्चुअल इमेजों ने मोदी की रचना जिस रसायन से की है उस रसायन में ही उसका विलोम भी अंतर्निहित है। संयोग की बात है कि वर्चुअल इमेज में विलोम भी उसी मार्ग से बनता है उन्हीं लोगों से बनता है जो इमेज के सर्जक हैं । 
     मोदी की वर्चुअल इमेजरी के बनते विलोम को पूर्णता प्राप्त करने में कितना वक़्त लगेगा यह तय करना मुश्किल है लेकिन यह तय है कि मोदी इमेज विध्वंस की वर्चुअल प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है । न्यायपालिका के शिखर से इमेज भंजन का सूत्रपात हुआ है। सुप्रीमकोर्ट में न्यायाधीश की नियुक्ति पर सरकार ने जिस तरह हस्तक्षेप किया उसने  मोदी की इमेज पर कलंक का अमिट दाग छोड़ दिया है। 
          वर्चुअल विचारधारा हमेशा व्यक्ति को छोड़ देती है इमेज को पकड़ लेती है और इमेज के ज़र्रे ज़र्रे पर हमले करती है।  वर्चुअल इमेज में व्यक्ति गौण होता है और उसकी इमेज मूल्यवान होती है और उसके रेशे- रेशे को तोड़ना पेचीदा काम है अत : यह काम भी मीडिया उतनी ही बेरहमी से करता है जितनी एकाग्रता से वह इमेज बनाता है। रीगन से बुश तक की इमेज के विध्वंस को देखें तो यह चीज़ सहज ही समझ में आ सकती है। 
   इमेज का क्षय वस्तुत: उस आभामंडल को नष्ट करता है जो आभामंडल वर्चुअल ने निर्मित किया है । इससे व्यक्ति की सक्रियता बढ़ती है और इमेज की घटती है। 
   मनमोहन इमेज के साथ यही हुआ लेकिन बेहद धीमी गति से। क्योंकि मनमोहन सिंह की वर्चुअल इमेज अदृश्य रंगों से बनायी गयी थी फलत: उस इमेज को नष्ट करने में ज़्यादा समय लगा । 
   इसके विपरीत मोदी की इमेज मुखौटों और हाइस्पीड मीडिया के जरिए बनी है अत:इमेज विखंडन भी हाइस्पीड और मुखौटों के ज़रिए होगा। यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसमें  इनदिनों मीडिया में मुखौटालीला चल रही है। मोदी के मुखौटों की वर्चुअल धुलाई हो रही है ।
      


 

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

कोलकाता में गाली,हिंसा और बम


     कल मैं बंगला टीवी चैनल पर टीएमसी सांसद और अभिनेता तापस पाल को हिंसक भाषा में भाषण देते हुए देख रहा था तो मन में सोच रहा था कि बंगाली जाति के कितने बुरे दिन आ गए हैं कि उनके आइकॉन आम जनता में  हिंसक भाषा में बोल रहे हैं और दर्शक तालियां बजा रहे हैं।
     बंगाली जाति मधुरभाषी,सांस्कृतिकतौर पर सभ्यजाति है। इसमें हिंसकभाषा कहां से आई ? बंगाली जाति के नेता भारत में सभ्यता और राजनीति के सिरमौर रहे हैं और देश उनको बड़े ही सम्मान की नजर से देखता रहा है। लेकिन अब ऐसा नहीं है।
   सांसद तापस पाल की भाषा इतनी खराब और दबंगई से भरी थी कि ममता सरकार में शिक्षामंत्री पार्थ चटर्जी तक ने इस तरह की भाषा के इस्तेमाल पर आपत्ति प्रकट की। नेता हो या नागरिक , गाली और हिंसा की भाषा में बोलना तो अपराध है, असभ्यकर्म है।
      प.बंगाल में गाली,हिंसा और बम की राजनीति में गहरा संबंध है ।  हिंसा हमेशा गाली की भाषा के दरवाजे से ही दाखिल होती है। राजनीति में गाली की भाषा कब आती है और कब वह हिंसा में तब्दील हो जाती है इसका ठीक से अध्ययन तो हमारे समाज में नहीं हुआ लेकिन यह सच है कि गाली और हिंसा जुड़वां बहनें हैं। ये दोनों बहनें तब जन्म लेती हैं जब समाज में कर्मसंस्कृति का क्षय होता है।परजीवी और पराजित मनोदशा में गाली और हिंसा जन्म लेती है।
     पश्चिम बंगाल में जिसे नक्सलबाडी आंदोलन कहते हैं वह इस राज्य के सांस्कृतिक-राजनीतिक पतन का प्रस्थान बिंदु है। पश्चिम बंगाल में हिंसाचार का श्रीगणेश यहीं से होता है। धमकी,गाली,बम,क्रांति की गजब खिचडी इस बीच पकी है। इसमें बौद्धिकों ने सुविधानुसार क्रांति और वाम राजनीति को पॉजिटिव तत्व के रुप में छांट लिया लेकिन अन्य चीजों को छोड़ दिया।
     क्रांति या वामराजनीति में गाली,घृणा (पूंजीपति और सामंती तत्त्वों के प्रति घृणा) को इस हद तक विकसित किया गया कि उसने सामाजिक-राजनीतिक संतुलन में बदलाव की प्रक्रिया को तेज कर दिया। हमारे अनेक वामपंथी मित्र यह पढ़कर नाराज भी हो सकते हैं लेकिन सच तो यही है कि लोकतंत्र में घृणा का कोई स्थान नहीं है। आप अपने वर्गशत्रु से भी नफरत नहीं कर सकते। लोकतंत्र में सबके लिए स्थान है।अमीर के लिए भी और गरीब के लिए भी। पूंजीपति और बड़े जमींदारों के खिलाफ घृणा का सिलसिला अंततःगाली के मार्ग से गुजरते हुए हिंसा और बम के मार्ग तक गया। इसके कारण पहले निजी हिंसा को वैध बनाया गया,बाद राजनीतिक हिंसा भी वैध हो गयी,फिर पुलिस हिंसा भी वैध मान ली गयी।
    हमलोग अपनी सुविधा से हिंसा में अंतर करने लगे, तेरी हिंसा और मेरी हिंसा में पाप-पुण्य खोजने लगे। अपने दल की हिंसा को हिंसा न मानकर आत्मरक्षा में उठाया कदम मानने लगे।
    जबकि हिंसा तो हिंसा है और वह लोकतंत्र का विलोम है। इसी तरह घृणा तो घृणा है वह सभ्यता और लोकतंत्र का विलोम है। वर्गीय घृणा पैदा करके वोट जुटाए जा सकते हैं, सीटें जीती जा सकती हैं। सत्ता पा सकते हो लेकिन सभ्यता के क्षय को नहीं रोक सकते।
   वाममोर्चा निरंतर अपार बहुमत हासिल करके भी हिंसा को नहीं रोक पाया। इसका प्रधान कारण वही है जिसका मैंने जिक्र किया है। लोकतंत्र में हिंसा,गाली और घृणा की कोई जगह नहीं है। यदि लोकतंत्र के सारथी  हिंसा,गाली और घृणा के रथ पर सवार होकर आएंगे तो लोकतंत्र में सभ्यता के क्षय और हिंसा के विस्तार को रोक नहीं सकते। पश्चिम बंगाल में वस्तुतः यही हुआ है।
    हिंसा को हर दल ने वैध बनाया,हिंसा की मदद ली और राजनीतिक वैभव का विस्तार किया। यह विलक्षण संयोग है कि नक्सली हिंसा के दमन के नाम पर कांग्रेस ने कुछ साल शासन किया लेकिन हिंसा का कांग्रेस को जो चस्का लगा वह उसे आपातकाल तक ले गया और कांग्रेस में धीरे धीरे अपराधीकरण एक स्वाभाविक फिनोमिना बन गया।
    नक्सलबाड़ी आंदोलन के पहले कांग्रेस के शासकों को हिंसा की राजनीति करते नहीं देखा गया। तेलंगाना आंदोलन अपवाद है। यह भी कह सकते हैं राजनीतिक हिंसाचार की जो परंपरा कांग्रेस ने तेलंगाना आंदोलन (1946-48) ने डाली, वह नक्सलबाडी आंदोलन के दौर में तरुणाई में पहुँची और आपातकाल में पूर्ण यौवन को प्राप्त हुई। इस समूची प्रक्रिया में पश्चिम बंगाल के भद्रसमाज में हिंसा और असभ्यता की दीमक प्रवेश कर गयी और आज उससे पूरा राज्य प्रभावित है।
    दुखद बात यह है कि वामदलों ने सभ्यता के क्षय की प्रक्रियाओं की हमेशा अनदेखी की। हिंसा को हिंसा से खत्म करने की रणनीति अपनायी, गाली का जबाव गाली से देने की पद्धति इजाद की,जो साथ नहीं वह वर्गशत्रु। जो साथ छोड़ गया वह वर्गशत्रु। इस रणनीति के परिणाम सामने हैं। इसका सबसे बड़ा परिणाम है सामाजिक अलगाव।  
  वामराजनीति के विकास के दौर में हिंसा कम नहीं हुई बल्कि बढी । बंगाली समाज और ज्यादा असभ्य बना।  वाम,नक्सल,कांग्रेस, टीएमसी आदि सब भूल गए हैं कि कीचड़ से कीचड़ साफ नहीं होती। कीचड़ को साफ करने के लिए साफ-स्वच्छ जल चाहिए। हिंसा से हिंसा खत्म नहीं होती, गाली से सभ्यता विकसित नहीं होती। हिंसा को शांति से खत्म किया जा सकता है। गाली को गाली से खत्म नहीं कर सकते,बल्कि सभ्य आचरण से खत्म किया जा सकता है।
  लोकतंत्र में सभ्यता के विकास के लिए लोकतांत्रिक सभ्य पैमानों को अपनाने की जरुरत है। गाली ,हिंसा और बम तो वर्चस्व और हताशा के पैमाने हैं। ये पैमाने लोकतंत्र में अपनाए जाएंगे तो असभ्यता का विकास होगा,समाज और भी जंगलीपन की ओर भागेगा। हम तय करें कि लोकतंत्र में कैसे जीना चाहते हैं ? सभ्यता के पैमानों के आधार जीना चाहते हैं या असभ्यता के पैमानों के आधार पर जीना चाहते हैं?