बुधवार, 9 मार्च 2016

मकरंद परांजपे सच देखने से क्यों डरते हो ॽ


        प्रोफेसर मकरंद परांजपे ने जेएनयू में बोलते हुए जेएनयू के वामपंथियों से सारी दुनिया के साम्यवाद की गलतियों का हिसाब मांगा।कमाल की शैली और दृष्टि है परांजपे साहब की ! गलतियां करें स्टालिन लेकिन दण्ड मिलेगा भारत के कम्युनिस्टों को ! यानी नया बुर्जुआशास्त्र है करे कोई और भरे कोई ! , असल में परांजपे सच जानना ही नहीं चाहते।सच जानोगे नहीं तो मानोगे कैसे ! शीतयुद्धीय बौद्धिक तरीका है झूठ बोलो, लांछित करो ! खासकर कम्युनिस्टों के बारे में कभी सच मत बोलो।

परांजपे साहब ने जेएनयू में भाषण देते हुए फरमाया है कि कम्युनिस्टों ने स्वाधीनता संग्राम में भाग नहीं लिया,जनसत्ता (9मार्च 2016) में छपी रिपोर्ट के अनुसार परांजपे ने कहा ´‘भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ने अंग्रेजों को लिखा कि वे प्रदर्शन नहीं करेंगे। जब आप लोग लडेंगे तो हम आपका साथ देंगे। जब हम यह कहते हैं कि हमने भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी तो मैं सबूत देखना चाहता हूं।’ इसके अलावा भी उन्होंने बहुत कुछ कहा है।लेकिन हम यहां सिर्फ कम्युनिस्टों की स्वाधीनता आंदोलन में भूमिका तक ही सीमित रखना चाहते हैं और कम्युनिस्टों ने क्या कहा उसको प्रमाण के रूप में देना नहीं चाहते बल्कि ब्रिटिश शासक क्या कहते हैं उसका जिक्र करना चाहते हैं।

स्वाधीनता आंदोलन में भारत के कम्युनिस्टों की शानदार भूमिका रही है और वे संघर्ष और कुर्बानी की अग्रणी कतारों में रहे हैं,जबकि उन दिनों सारे देश मे बहुत कम संख्या में कम्युनिस्ट हुआ करते थे।कम्युनिस्ट देशभक्त संग्रामी थे यह बताने के लिए महाकाव्य लिखा जा सकता है,महाख्यान रचा जा सकता है।लेकिन यहां तथ्य ही रखना समीचीन होगा।

परांजपेजी आपने ´पेशावर षडयंत्र´केस का नाम तो सुना ही होगा।उस केस में अनेक कम्युनिस्टों को ब्रिटिश न्यायपालिका ने दण्डित किया,’ पेशावर षडयंत्र केस ´में 12-13 कम्युनिस्टों को बर्बर यातनाएं दी गयीं। जबकि इन्होंने कोई अपराध नहीं किया था।इनका एकमात्र लक्ष्य था भारत को ब्रिटिश गुलामी से मुक्त कराना।यह वाकया है 1922 के आसपास का।तकरीबन 40 के आसपास मुहाजिर अफगानिस्तान के रास्ते होते हुए ताशकंद और मास्को गए थे।वहां पर उनमें से 26 लोगों ने सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया। ये लोग अक्टूबर1920 से अप्रैल 1921 तक ताशकंद और मास्को में रहे।वहां उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के राजनीतिक-सैनिक स्कूल में प्रशिक्षण प्राप्त किया।इन कॉमरेडों का पहला ग्रुप 3जून1921 को पेशावर लौटा।इस ग्रुप से भारत सरकार के गुप्तचर विभाग के ऑफीसर इंचार्ज मि.इबर्ट ने गहरी पूछताछ की।उस पूछताछ में पता चला कि पेशावर से मास्को 40 या उससे ज्यादा कॉमरेड गए थे।इनको उन दिनों मुहाजिर कहा जाता था।मास्को में इन लोगों ने कम्युनिस्ट वि.वि. में प्रशिक्षण प्राप्त किया।इस पूछताछ के बाद ब्रिटिश पुलिस की मास्को से आने वालों पर कड़ी नजरदारी आरंभ कर दी और1922 के मध्य में कम्युनिस्टों के खिलाफ ´पेशावर षडयंत्र केस´दायर किया गया जिसमें 12-13 कॉमरेडों को दण्डस्वरूप भयानक यातनाएं दी गयीं।यह समूचा वाकया सन् 1927 में बंगला साप्ताहिक अखबार ´कॉम्पस´में ´पेशावर टु मास्को´शीर्षक से धारावाहिक रूप में छपा,इसको लिखा था शौकत उस्मानी ने। इस प्रसंग में दूसरा विवरण रफीक अहमद ने लिखा जिसका मुजफ्फर अहमद की किताब ´दि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया एंड इटस फॉर्मेशन´(1962) में जिक्र है।

मकरंद परांजपे आप प्रोफेसर हैं लेकिन झूठ बोल रहे हैं कि कम्युनिस्टों ने स्वाधीनता आंदोलन में भाग नहीं लिया,आप जरा समय निकालकर ´पेशावर षडयंत्र केस´के जजमेंट को ही पढ़ लेते तो पता चल जाता कि उस समय कम्युनिस्ट क्या कर रहे थे। ´पेशावर षडयंत्र केस´पराधीन भारत में पहला कम्युनिस्टों के खिलाफ गढ़ा गया एकदम झूठा केस था जिसमें कम्युनिस्टों को सजा सुनाई गयी थी,उन लोगों को सजा सुनाई गई जिन लोगों ने कोई हिंसा नहीं की,किसी की हत्या नहीं की।निर्दोष कम्युनिस्टों को दोषी करार करके देशद्रोह में सजाएं सुनाई गयीं।इन कॉमरेडों ने क्या किया था ॽ ये अफगानिस्तान से सीमा पार करके सोवियत संघ गए थे सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त करने।जिससे ये लोग आजादी के लिए संघर्ष करने वालों की मदद कर सकें।इसके लिए इन लोगों ने ताशकंद के सैन्य स्कूल और मास्को स्थित कम्युनिस्ट विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की।

´पेशावर षडयंत्र केस´के नाम से कम्युनिस्टों के खिलाफ पहला जजमेंट 31मई1922 को घोषित किया गया।इस जजमेंट में कॉमरेड मोहम्मद अकबर को तीन साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गयी।यह सजा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 121-ए के तहत सुनाई गयी।इसी धारा में दूसरे कॉमरेड बहादुर को एक साल की सजा सुनाई गयी।जबकि हफीजुल्ला को बरी कर दिया गया। अकबर और बहादुर के खिलाफ ’अपराध´ को किस तरह सिद्ध किया गया ॽ सेशन जज जे.एच.आर. फ्रेशर ने अपने फैसले में संक्षेप में उसके बारे में लिखा ´इस ( मोहम्मद अकबर) को षडयंत्र में गिरफ्तार किया गया,यह षडयंत्र ब्रिटिश सरकार के खिलाफ ताशकंद,काबुल और समरकंद में रचा गया।´इसके लिए कोई प्रमाण पेश नहीं किए गए,सीधे बिना प्रमाण के षडयंत्र के बहाने सजाएं सुना दी गयीं।जिस धारा (121 ए)में केस लगाए गए उसी धारा में बाद में कम्युनिस्टों के खिलाफ कानपुर षडयंत्र केस(1924),मेरठ षडयंत्र केस(1929-33) में मुकदमे चलाए गए और उनको दण्डित किया गया ।इसके बावजूद परांजपे आप कह रहे हैं कि प्रमाण दो कि स्वाधीनता संग्राम में कम्युनिस्टो ने कौन सी लड़ाई लड़ी,किस तरह की कुर्बानी दी।

परांजपेजी आपके लिए हम पेशावर षडयंत्र केस के जजमेंट का अंश उद्धृत कर रहे हैं आप पढें और तय करें कि आपने सच बोला या झूठ बोला,जजमेंट में जज ने लिखा “The attitude of the Bolsheviks towards all settled governments is a matter of common knowledge .so also their hostility and desire to overthrow the governments of all civilized powers as at present constituted. This general knowledge is a matter of which judicial notice can be taken.” इसी जजमेंट में आगे कहा गया कि ताशकंद को भारत की ब्रिटिश सरकार के खिलाफ प्रचार अभियान का केन्द्र के रूप में इस्तेमाल किया गया। इनके ग्रुप में अब्दुल रब,राय,मुखर्जी और अन्य शामिल थे,इन लोगों ने मिलकर वहां अस्थायी भारत सरकार बनायी।वहां भारतीयों को सैन्य प्रशिक्षण देने के लिए स्कूल खोला।वहां से भारतीय लोग प् प्रशिक्षण लेकर आते थे और फिर भारत में देशद्रोही गतिविधियां संचालित करते थे।यह एक तरह से भारत पर बोल्शेविक हमला है।

परांजपेजी आपने जेएनयू में साम्यवाद के बारे में जो कुछ कहा उसका जेएनयू के मौजूदा आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है। भारत में कम्युनिस्ट हमेशा से लोकतंत्र के लिए संघर्ष करते रहे हैं अतः इनके संघर्ष के साथ अन्य देशों के कम्युनिस्टों की तुलना करना गलत है।जेएनयू का मौजूदा आंदोलन छात्रों के जनतांत्रिक हकों की रक्षा के लिए चल रहा है,यह आंदोलन कन्हैया कुमार सहित 5छात्रनेताओं पर चलाए जा रहे राष्ट्रद्रोह के झूठे मुकदमे को वापस लेने के लिए चल रहा है। इसलिए इस आंदोलन की सोवियत संघ से तुलना करना गलत है।

परांजपे साहब आपकी जानकारी के लिए बता दें जेएनयू में कई छात्रों ने सोवियत संघ में स्टालिन युग में मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ बेहतरीन शोध की है,ये सभी वाम छात्र हैं।जेएनयू के वाम छात्रों ने चीन में माओ के जमाने के मानवाधिकार हनन के खिलाफ भी काम किया है,यह इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि आप जेएनयू की परंपरा से अनभिज्ञ हैं। आप इन दिनों शीतयुद्धीय नजरिए से परिचालित होकर देख रहे हैं।जबकि जेएनयू तो शीतयुद्धीय नजरिए के खिलाफ भी जमकर वैचारिक संघर्ष करता रहा है।

मंगलवार, 8 मार्च 2016

वे कम्युनिस्टों से क्यों डरते हैं


 ’ WHY  IS  THERE   SO   MUCH    FEAR   OF   THE   COMMUNISTS ’ यह शीर्षक है मराठी में ’क्रांति´ नामक पत्रिका  के 10 सितम्बर 1927 के अंक में प्रकाशित लेख का। जेएनयू के प्रो.मकरंद परांजपे ने जेएनयू में अपनी साम्यवाद विरोधी मनोभावनाओं का  तरह परिचय दिया है,उसके प्रसंग में इस लेख में जो चीजें बयां की गयी हैं उनका जिक्र करना समीचीन होगा।इससे यह भी पता चलेगा कि कम्युनिस्टों की क्या दशा थी इस लेख मे कॉमरेड सकलातवाला का विशेष रूप से जिक्र किया गया और पूरा लेख उन पर ही है।सकलातवाला कम्युनिस्ट थे और वे यह मानते थे ब्रिटेन का यूनियन जैक झंडा गुलामी का प्रतीक है।इस बयान के कारण उन पर संसद में ब्रिटिश सत्ताधारियों ने जमकर हमले किए थे।उनका दण्डस्वरूप पासपोर्ट जब्त कर लिया था। इसके कारण वे अमेरिका नहीं जा पाए।बाद में वे किसी तरह जुगाड़ करके ब्रिटिश सत्ता को चकमा देकर पासपोर्ट बनवाकर भारत चले आए। भारत में उनके आने पर ब्रिटिश शासक सोच रहे थे कि सकलातवाला महात्मा गांधी की आंधी देखकर भौचक रह जाएंगे और यहां साम्यवाद भूल जाएंगे। अथवा यदि वे ब्रिटिश शासकों के खिलाफ कुछ बोलेंगे तो उनको जेल में ठूंस दिया जाएगा। ब्रिटिश शासक यह भी सोच रहे थे कि सकलातवाला को किसी तरह भारत से विदेश नहीं जाने दिया जाएगा लेकिन सकलातवाला चकमा देकर भारत आए अपना काम किया और फिर चकमा देकर भारत से चले भी गए।
    सकलातवाला असल में मद्रास कॉग्रेस में शामिल होने  आए थे ,वे यह कहकर गए कि दोबारा भारत आना चाहते हैं। उनके आने से उस समय के कम्युनिस्टों को बड़ा बल मिला। सकलातवाला का मानना था  कम्युनिस्ट आंदोलन को परंपरागत आंदोलन के दायरे के बाहर निकाला जाए।ब्रिटिश सरकार सकलातवाला के भारत आने के खिलाफ थी,उसने उनको पासपोर्ट नहीं दिया,वे किसी तरह चालाकी  से पासपोर्ट बनाने  में सफल रहे।ब्रिटिश पुलिस उनको भारत में उस समय पकड़ नहीं पायी। उस समय ब्रिटिश सरकार कम्युनिस्टों से वैसे ही नफरत करती थी जिस तरह परांजपे नफरत करते हैं या संघी नफरत करते हैं। सकलातवाला जिस समय बॉम्बे आए थे उस  समय उस शहर में 25 कम्युनिस्ट भी नहीं थे लेकिन ब्रिटिश शासन डरा हुआ था,यदि कम्युनिस्टों की  उनसे मित्रता होती तो सकलातवाला का पासपोर्ट रद्द नहीं किया जाता,कम्युनिस्टों की दिन-रात निगरानी नहीं होती।

     ´क्रांति´पत्रिका ने लिखा है उस समय कम्युनिस्टों के ठिकानों पर तीन बार पुलिस के छापे पड़े। ब्रिटिश शासकों ने उस समय डाक विभाग को कड़े आदेश दिए थे  कम्युनिस्टों की कोई भी डाक खासकर किताब आदि की पार्सल की सप्लाई न दी जाए।उनकी सभी डाक जब्त कर ली जाए।परांजपेजी यह वाकया काल्पनिक नहीं है।यह मित्र सरकार का आदेश नहीं है,यह वह लेख है जो मेरठ षडयंत्र केस में कम्युनिस्टों के खिलाफ  देशद्रोह के सबूत के तौर पर पेश किया गया था।सब लोग जानते हैं कि उन दिनों कम्युनिस्ट छिपकर गुप्त संघर्ष नहीं करते थे बल्कि खुलेआम सारी गतिविधियां और आंदोलन करते थे।इसके बावजूद ब्रिटिश सरकार उनके खिलाफ इतनी सख्त क्यों थी परांजपेजी कारण आप बेहतर ढ़ंग से समझ सकते हैं कि ब्रिटिश शासकों ने कम्युनिस्टों का विरोध किया,उनकी डाक तक पर पाबंदी क्यों लगायी यह वह जमाना था जब भारत के अखबारों में कम्युनिस्टों की खबरें और लेख आदि छापने पर अघोषित पाबंदी लगी हुई थी।परांजपेजी यह क्या स्वाधीनता संग्राम में कम्युनिस्टों का ब्रिटिश शासकों से मित्रता का प्रतीक है परांजपेजी बेहतर है आप अपने साम्यवाद ज्ञान को दुरूस्त कर ले।

शनिवार, 5 मार्च 2016

हमारे समय में जयशंकर प्रसाद



समय –

फ्रांसिस फुकुयामा ने ´इतिहास का अंत´की जब बात कही थी तो उन्होंने ´एंड ऑफ दि स्पेस´की बात कही थी,लेकिन हिंदी आलोचकों ने उसे गलत अर्थ में व्याख्यायित किया।सवाल यह है भूमंडलीकरण के कारण सारी दुनिया में ´स्पेस´का अंत हुआ या नहीं ॽ यही वह परिदृश्य है जिसमें आप भूमंडलीकरण को समझ सकते हैं। ´एंड ऑफ दि स्पेस´ का अर्थ यह भी है मुक्त बाजार ने सर्वसत्तावादी सामूहिकता को हटा दिया,इस प्रक्रिया में ´इंटरवल´या ´अंतराल´का भी अंत हो गया,अब निरंतर फीडबैक है,औद्योगिक या पोस्ट औद्योगिक गतिविधियों के टेलीस्कोपिंग मैसेज हैं।पहले हर चीज के साथ भू-राजनय और भौगोलिक अंतराल हुआ करते थे लेकिन अब यह सब नहीं हो रहा।आज हम पृथ्वी को जानते हैं लेकिन उसके अंतरालों को नहीं जानते।देशज भौगोलिक अंतरों को नहीं जानते।अब हम इतिहास के अंतरालों में प्रवेश ही नहीं करते सीधे यथार्थ में प्रवेश करते हैं। आज हम ´लोकल समय´में नहीं ´रीयल टाइम´में रह रहे हैं,इसने यलिटी´से हमारी दूरी खत्म कर दी है।अंतर खत्म कर दिया है।

पहले दूरी थी,इतिहास-भूगोल का अंतर था,लेकिन अब तो सिर्फ ´दूरी´ही रह गयी है,लेकिन इसको भी अतिक्रमित करके हम ´टेलीप्रिजेंश´में आ चुके हैं।यही भूमंडलीकरण की धुरी है।यही ग्लोबलाइजेशन का ´एक्सचेंज´है,इसके जरिए दूरी को देख सकते हैं।यह ´दूरी´वस्तुतः दूसरी ओर झुकी हुई है।आज हम कम्प्यूटरीकरण के वैचारिक दृष्टिकोण से बंधे हैं।आज हम जल्द ही विश्व के किसी भी अंश पर पहुँच सकते हैं,विश्व के किसी भी अंश पर पहले भी जाते थे लेकिन इस समय भिन्न तरीके से जाते हैं।पहले इतिहास और भूगोल के जरिए प्रवेश करते थे लेकिन अब सीधे यथार्थ के जरिए प्रवेश करते हैं।पहले समृद्ध होते थे अब नहीं।अब क्षण में ही यथार्थ में प्रवेश करने के कारण जल्द ही पहुँच जाते हैं,इसके कारण यथार्थ को पूरी तरह देख-समझ नहीं पाते।´दूरी´का अंतराल महसूस नहीं होता।आज टेली कम्युनिकेशन और स्वचालितीकरण ने ग्लोबल कम्युनिकेशन सिस्टम से जोड़ दिया है।सभी किस्म की प्रस्तुतियां वस्तुतःदूरी की प्रस्तुतियां हैं।टेलीकम्युनिकेशन ने कहने के लिए दूरी कम करने का वायदा किया है लेकिन दूरिया बढ़ी हैं।इस दूरी ने ´महा भौगोलिक यथार्थ´ का रूप ले लिया है जो ´वर्चुअल रियलिटी´ के जरिए नियमित हो रहा है।आज ´वर्चुअल रियलिटी´ ने ´टेली कंटेंट´ पर एकाधिकार जमा लिया है।यह राष्ट्रों का आर्थिक गतिविधि का बहुत बड़ा हिस्सा बन गया है।इसक कारण संस्कृति का क्षय हो रहा है।संस्कृति वस्तुतःभौगोलिक स्पेस में रहती है,लेकिन वर्चुअल रियलिटी उसे अपदस्थ कर रही है।फलतःआज हम ´इतिहास का अंत´नहीं ´भूगोल का अंत´देख रहे हैं।कल तक19वीं शताब्दी के ´ट्रांसपोर्ट रिवोल्यूशन´के दौर में जब अंतराल आता था तो विभिन्न समाजों के बीच की खाईयां या अंतराल नजर आते थे।लेकिन मौजूदा ´ट्रांसमीशन रिवोल्यूशन´में अहर्निश फीडबैक आ रही हैं और इसमें सामान्यीकृत इंटररेक्टिविटी हो रही है।इसके कारण हमें अंतर पता ही नहीं चलता।सिर्फ स्टॉक मार्केट में जब तबाही मचती है तो अंदाजा लगता है। भूमंडलीकरण के दौर में जो बाहरी था या ग्लोबल था वह आंतरिक हो गया और जो लोकल था वह बाहरी हो गया है।वह हाशिए पर चला गया है।भूमंडलीकरण के बारे में अनेक मिथ्या बातें कही जा रही हैं।भूमंडलीकरण ने सबको रूपान्तरित कर दिया है।अब वे ´व्यक्ति´ को स्थानांतरित नहीं करते,या जनता को स्थानांतरित नहीं करते बल्कि उन्होंने ´रहने´की जगह ही छीन ली है।फलतः ´स्थानीय´का भूमंडलीय अ-स्थानीकरण´किया है। इसने ´राष्ट्रीय´स्तर पर ही नहीं सामाजिक स्तर पर भी प्रभावित किया है।इसने राष्ट्र–राज्य के सवाल ही खड़े नहीं किए हैं बल्कि शहर एवं राष्ट्र एवं राजनय के सवाल भी खड़े किए हैं।विदेश नीति और गृहनीति में अंतर खत्म हो गया है।बाहर और भीतर अब कोई अंतर नहीं रह गया है। ´लाइव´एवं ´डायरेक्ट ट्रांसमीशन´के कारण ´बेव´के प्रभाव को कम कर दिया है।´पुराने टेली-विजन´से निकलकर ´भू-विजन´ में दाखिल हो गए हैं।सुरक्षा के नाम पर ’ टेली-निगरानी´में आ गए हैं।´ऑडियो विजुअल´निरंतरता ने ´क्षेत्रीय निरंतरता´पर बढ़त हासिल कर ली है।अब ´राष्ट्र´की क्षेत्रीय पहचान को ´रीयल टाइम´ इमेज और साउण्ड ने टेकओवर कर लिया है। ग्लोबलाइजेशन के दो प्रमुख पहलु हैं,पहला,एक तरफ इसने दूरी को एकसिरे से खत्म कर दिया है, इस क्रम में ट्रांसपोर्ट और ट्रांसमीशन दोनों को ´कम्प्रेस´करके रख दिया है।दूसरा है टेली-निगरानी।यह विश्व का नया विजन है।´टेली प्रजेंट´पर बार-बार जोर दिया जा रहा है।यानी टेली प्रजेंट के जरिए 24घंटा,पूरे सप्ताह सक्रियता।अब हर इमेज ´इनलार्ज´ होकर आ रही है। ´टेक्नो-साइंस´ ने ´इमेज´के भविष्य को अपने हाथ में ले लिया है।अतीत में उसने ´टेलीस्कोप´एवं माइक्रोस्कोप´के जरिए यह काम।भविष्य में यह ´टेवी निगरानी´के रूप में काम करेगी और यही इसका सैन्य आयाम है। ऑडियो-विजुअल दृश्य की निरंतरता ने राष्र की क्षेत्रीय निरंतरता के ऊपर बढ़त बना ली है।आज ´क्षेत्र´ का महत्वपूर्ण नहीं है।आज क्षेत्रीय राजनीति रीयल स्पेस से शिफ्ट होकर ´रीयल टाइम´में दाखिल हो गयी है.यह एक तरह से इमेज और साउण्ड की राजनीति है।यह भूमंडलीकरण की पूरक इमेज है।´ट्रांसपोर्ट´और ´ट्रांसमीशन´के सामयिक दबाव ने ´दूरी´ कम कर दी है।दूसरी ओर ´टेली-निगरानी´बढ़ी है।अब नया विज़न है ´टेली प्रिजेंट´,यानी 24घंटे उपस्थिति।अब ये स्थानान्तरित नयी आंखें हैं। प्रत्येक इमेज का भविष्य ´इनलार्जमेंट´पर टिका है।´इनलार्जमेंट´वस्तुतः ´टेक्नो साइंस´है,इसने साइंस को भी पीछे छोड़ दिया है।अब तो टेक्नोसाइंस के पास ही इमेज की जिम्मेदारी है।यह ´टेली निगरानी´का हिस्सा है।पहले किसी भी चीज को भू-राजनय परिप्रेक्ष्य या परिप्रेक्ष्य में देखते थे लेकिन अब कृत्रिम परिप्रेक्ष्य में स्क्रीन और मॉनीटर के जरिए देखते हैं।अब मीडिया परिप्रेक्ष्य में देखते हैं।मीडिया परिप्रेक्ष्य ने ´स्पेसके तात्कालिक परिप्रेक्ष्य´पर बढ़त बना ली है।यही वो परिप्रेक्ष्य है जिसमें हमारा मौजूदा ´समय´कैद है। जयशंकर प्रसाद के बारे में विचार करते समय कई और बातों पर गौर करने की जरूरत है।मसलन्,उनका दौर वही है जो महात्मा गांधी के युग के नाम से जानते हैं।इस प्रसंग में एक घटना का जिक्र करना समीचीन होगा। काशी में मैथिलीशरण गुप्तजी के अभिनंदन की तैयारी के अवसर पर इसका विरोध करने वालों की एक सभा हुई,इसमें जयशंकर प्रसाद भी शामिल हुए थे।इसमें प्रसाद ने कहा, ´इस युग के तीन व्यक्तियों को महापुरूष मानता हूँ,गांधीजी,रवीन्द्र बाहू और मालवीयजी।और मैं अपने को इन तीनों में से किसी एक का अनुयायी नहीं मानता।´ प्रसादजी के इस बयान के बाद यह सवाल नए सिरे से उठा है कि आखिरकार प्रसादजी किससे प्रभावित थे ॽ छायावादी कवियों में प्रसाद और निराला पर गांधी का कोई प्रभाव नहीं था ,लेकिन पंतजी पर 1934 के बाद प्रभाव देखा जा सकता है।रामविलास शर्मा के अनुसार प्रसाद पर समाजवादी विचारधारा का धुंधला सा प्रभाव जरूर है।इस धुंधले प्रभाव का अर्थ है-किसानों के संगठन और उनके सामन्तविरोधी संघर्ष का बोध।रामविलास शर्मा के अनुसार प्रसाद और गांधीजी के नजरिए में तीखा अंतर्विरोध देखना हो तो यह भी देखें कि गांधीवाद जहां प्राचीन भारतीयसमाज में वर्ग संघर्ष अस्वीकार करता है,वहीं प्रसादजी ने राजा-प्रजा के रक्तमय संघर्ष का चित्रण पेश करके उसे स्वीकार किया है।गांधीवाद निष्क्रिय प्रतिरोध की बात करता है स्वयं कष्ट सहकर अन्यायी के हृदय-परिवर्तन की बात करता है,वहीं प्रसादजी ने सक्रिय प्रतिरोध के आदर्श को पेश किया है।शस्त्र उठाकर आतततायियों का विरोध करने का चित्र खींचा है।प्रसाद के पात्र सामाजिक संघर्ष में तटस्थ नहीं रहते।वे देश और जनता के प्रति सहानुभूति ही नहीं रखते अपितु संघर्ष में हिस्ला लेते हैं। रामविलास शर्मा के अनुसार प्रसाद के ´ध्रुवस्वामिनी´नाटक में यह नीति सूत्र है कि क्रूर,नृशंस ,देश की रक्षा करने में असमर्थ राजा वध्य है।वहीं नंद दुलारे वाजपेयी के अनुसार प्रसादजी का मूल दृष्टिकोण है ´नारी पुरूष की उद्धारक है।´यदि इस बुनियादी नजरिए को ध्यान में रखें तो प्रसादजी का नया पाठ निर्मित होगा। सवाल यह है क्या नारी संबंधी यह दृष्टिकोण आज के समय में समाज में मददगार होगा ॽ हमारा मानना है कि नारी को समाज की धुरी मानना,उसके जरिए ही परिवर्तन के तमाम कार्य संपन्न करना,प्रसादजी के साहित्य स्त्री पात्र बदलाव और उत्प्रेरणा के कारक बनकर सामने आते हैं।प्रसादजी को मन्दिर,फुलवारी और अखाड़ा ये तीन चीजें निजी तौर पर बहुत प्रिय थीं।इसके अलावा उनकी रचनाओं में व्यक्ति और राष्ट्र के अंतर्विरोधों के कई रूप नजर आते हैं।हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार ´उनकी आरंभिक रचनाओं में अतीत के प्रति एक प्रकार की मोहकता और मादकता भरी आसक्ति मिलती है।उनके कई परवर्त्ती नाटकों में यह भाव स्पष्ट हुआ है।´ मुक्तिबोध का मानना है कि प्रसाद की खूबी है कि ´कवि कुछ कहना चाहता है,पर कह नहीं पाता´,´´अन्य कवियों ने अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों को स्वच्छन्दता के साथ प्रकट किया,जबकि प्रसाद ने उन पर अंकुश रखा।एक प्रकार की झिझक और संकोच का भाव उनकी आंसू तक की सभी कविताओं में मिलता है।ऐसा लगता है कि कवि को भय है कि उसके मन में जो भाव उमड़ रहे हैं,जो वेदना संचित है वह यदि एकाएक अपने अनावृत्त रूप में प्रकट हो जाएगी तो पाठक उसकी कद्र नहीं कर सकेंगे।कवि की धारणा है कि उसका पाठक अभी इस परिस्थिति में नहीं है कि उलके भावों को ठीक-ठीक समझ सके और सहानुभूति के साथ देख सके।´ मुक्तिबोध के अनुसार ´कामायनी में प्रधान हैं लेखक के जीवन निष्कर्ष और जीवन अनुभव, न कि कथावस्तु और पात्र।साधारणतः,कथावस्तु के भीतर पात्र अपने व्यक्तित्व-चरित्र का स्वतंत्र रूप से विकास किया करते हैं,किंतु कामायनी में पात्र और घटनाएँ लेखक की भावना के अधीन हैं।कथानक,घटनाएँ,पात्र आदि तो वे सुविधा रूप हैं,कि जो सुविधा रूप लेखक को अपने भाव प्रकट करने के लिए चाहिए।इसीलिए कामायनी में कथावस्तु फैण्टेसी के रूप में उपस्थित हुई है,और उस फैण्टेसी के माध्यम से लेखक आत्म-जीवन को और उस आत्म-जीवन में प्रतिबिम्बित जीवन-जगत् के बिम्बों को,और तत्संबंध में अपने चिन्तन को,अपने जीवन-निष्कर्षों को प्रकट कर रहा है।´मुक्तिबोध के अनुसार´यह सर्वसम्मत तथ्य है कि कामायनी में जीवन समस्या है।वह जीवन समस्या है व्यक्तिवाद की समस्या है।जो एक विशेष समाज एवं काल में विशेष प्रकार से उपस्थित हो सकती है।इसके साथ प्रसाद के व्यक्तित्व को मिलाकर देखना होगा।´मुक्तिबोध के अनुसार प्रसाद का दर्शन ´एक उदार पूंजीवादी-व्यक्तिवादी दर्शन है,जो यदि एक मुँह से वर्ग-विषमता की निन्दा करता है; तो दूसरे मुँह से वर्गातीत,समाजातीत व्यक्तिमूलक चेतना के आधार पर,समाज के वास्तविक द्वन्द्वों का वायवीय तथा काल्पनिक प्रत्याहार करते हुए ´अभेदानुभूति´के आनंद का ही संदेश देता है।´ मुक्तिबोध के अनुसार प्रसादजी की कामायनी में चित्रित सभ्यता समीक्षा के प्रधान तत्व हैं, ´(1) वर्ग-भेद का विरोध और उसकी भर्त्सना,अहंकार की निन्दा-यह प्रसादजी की प्रगतिशील प्रवृत्ति है।(2)शाससकवर्ग की जनविरोधी,आतंकवादी नीतियों की तीव्र भर्त्सना- यह भी प्रगतिशील प्रवृत्ति है।(3)वर्ग-भेद का विरोध करते हुए भी मेहनतकशों के वर्गसंघर्ष का तिरस्कार –यह एक प्रतिक्रियावादी तत्व है।(4)वर्गहीन सामंजस्य और सामरस्य का वायवीय अमूर्त्त आदरअसवादषयह तत्व अपने अन्तिम अर्थों में इसलिए प्रतिक्रियावादी है कि (क)वर्ग-वैषम्य से वर्गहीनता तक पहुँचने के लिए उसके पास कोई उपाय नहीं,इस उपायहीनता का आदर्शीकरण है आदर्शवादी-रहस्यवादी विचारधारा;(ख)इस उपायहीनता का एक अनिवार्य निष्कर्ष यह भी है कि वर्तमान वर्ग –वैषमयपूर्ण स्थिति चिरंजीवी है;(ग)अगर इस यथार्थ की भीषणता में कुछ कमी की जा सकती है तो वह शासक की अच्छाई और उसके उदार दृष्टिकोण द्वारा ही सम्पन्न हो सकती है-(घ)इस विचारदारा के कारण आदर्श और यथार्थ के बीच अनुल्लंघ्य,अवांछनीय खाई पड़ जाती है।´ ,´प्रसाजी की सभ्यता -समीक्षा के दो दोष रह गयेः(1) सभ्यता-समीक्षा एकांगी है,उसने केवल ह्रास को देका,जनता की विकासमान उन्मेषशाली शक्तियों को नहीं देखा।(2)उनकी आलोचना अवैज्ञानिक है,वह समाज के मूल द्वंद्वों को नहीं पहचानती,मूल विरोधों को नहीं देखती।वह उन मूल कारणों और उसकी प्रक्रिया से उत्पन्न लक्षणों को एक साथ ही रखती है।´


विमर्श- जयशंकर प्रसाद पर विचार करते समय बार-बार साहित्यिक रूढ़िवाद हमारे आड़े आता है। साहित्यिक रूढ़िवाद से आधुनिक आलोचना को कैसे मुक्त किया जाए यह आज की सबसे बड़ी चुनौती है। साहित्यकार और कृतियों के मूल्यंकन के क्रम में सबसे पहल समस्या है आलोचना को कृति की पुनरावृत्ति से मुक्त किया जाय।इन दिनों आलोचना के नाम पर वह बताया जा रहा है जो कृति में लिखाहोता है। कृति में व्यक्त भावबोध को बताना आलोचना नहीं है।कृतिकार ने जो लिखा है वही यदि बता दिया जाएगा तो यह आलोचना नहीं होगी,बल्कि कृतिकार के विचारों या कृति में व्यक्त विचारों की जीरोक्स कॉपी होगी।लेखक या कृति के विचारों की जीरोक्स कॉपी नहीं है आलोचना। यहां से हमें आलोचना के साथ मुठभेड़ करनी चाहिए। आलोचना में रूढ़िवाद का दूसरा रूप है अवधारणाहीन लेखन।इस तरह का लेखन आलोचना के नाम पर खूब आ रहा है।मसलन्, “विमर्श” पदबंध को ही लें, इस पदबंध के प्रयोग को लेकर नामवर सिंह से लेकर उनके अनेक अनुयायी आलोचकों ने इस पदबंध पर विगत दो दशकों में जमकर हमले किए हैं और इस पदबंध को उत्त-आधुनिकतावाद पर हमले के बहाने निशाना बनाया है।इस प्रसंग में उनके सभी तर्क शास्त्रहीन और अवधारणाहीन रूप में व्यक्त हुए हैं।सवाल यह है “डिसकोर्स” (विमर्श) किसे कहते हैं ?क्या विमर्श से इन दौर में बचा जा सकता है ? विमर्श के दो प्रमुख नजरिए प्रचलन में हैं।समग्रता में “विमर्श” के ढाँचे का विचारधारात्मक अवधारणा के विभिन्न आयामों से गहरा संबंध है।प्रसिद्ध मार्क्सवादी सिद्धांतकार सुदीप्त कविराज ने “दि इमेजरी इंस्टीट्यूशन ऑफ इण्डिया”(2010)में इस पहलू पर रोशनी डालते हुए इसके विभिन्न अंगों का खुलासा किया है।कविराज के अनुसार “विमर्श” में शब्द,विचार,अवधारणा,भाषण की प्रस्तुति, कार्यक्रम,रेहटोरिक, आधिकारिक कार्यक्रम आदि सभी आते हैं।ये सब “विमर्श” की आंतरिक व्यवस्था के अंग हैं।“विमर्श”इन सबको बांधने वाली संरचना है। कविराज ने “विमर्श” के दो स्कूलों की चर्चा की है,इनमें पहला वर्ग है संरचनावादियों का है।इसमें अनेक रंगत के संरचनावादी हैं। दूसरा ,बाख्तियन स्कूल है।संरचनावादियों की मुश्किल यह है कि वेभाषण,लेखन,चिंतन आदि को विमर्श में शामिल तो करते हैं लेकिन एक-दूसरे के बीच में विनिमय नहीं देखते। उनके यहां भाषा ही “विमर्श” का मूलाधार है।इस क्रम मे वे यह भूल जाते हैं कि भाषा के रूप इकसार नहीं होते,मृतभाषा और जीवंतभाषा में अंतर होता है।असरहीन भाषा और प्रभावशाली भाषा में अंतर होता है।वे यह भी नहीं देखते कि वक्तृता के समय वक्ता की भाषा भाषिक नियमों में बंधी नहीं होती बल्कि नेचुरल फ्लो में होती है।कईबार वक्तृता में निहित साइलेंस बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।बल्कि यों कहें कि जो छिपाया जा रहा है वह बताए जा रहे यथार्थ से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।प्रत्येक विधा और मीडियम की भाषा अलग होती है।सबको इकसार भाषिक रूप में नहीं देखना चाहिए।भाषा में नेचुरल या स्वाभाविक भाषा भी आती है और किताब भाषा या विधा विशेष की भाषा भी आती है। वह भाषा भी आती है जो अवधारणा में निहित होती है।यानी विमर्श का दायरा भाषा से शुरू तो होता है लेकिन भाषा तक सीमित नहीं है।वह अवधारणा और सैद्धांतिकी तक फैला है। दूसरी ओर बाख्तियन (वोलोशिनोव)आलोचकों ने सवाल उठाया है “विमर्श”में भाषा के उपयोग का मकसद क्या है ?यानी भाषा से हम क्या करना चाहते हैं?राजनेताओं के भाषण की भाषा में राजनीति प्रच्छन्न रूप में रहती है।राजनीति के बिना भाषा नहीं होती। “विमर्श” का मतलब है जीवित भाषा का अध्ययन करना। उसकी प्रस्तुतियों का अध्ययन करना।उन परिस्थितियों का अध्ययन करना जिसमें भाषा का संचार हो रहा है।साथ ही उन पहलुओं का भी अध्ययन करना जो भाषा के संदर्भ में निषेध में शामिल हैं।वोलोशिनोव कहते हैं भाषण में भाषायी फिनोमिना को पकड़ने की कोशिश करनी चाहिए।इसमें वक्तृता में निहित व्यक्तिवादिता,अनुभव की अभिव्यक्ति और जीवन की व्यापकता का अध्ययन किया जाना चाहिए।इसी क्रम में सुदीप्त कविराज ने “विमर्श” में विचार और उसके आंतरिक कोहरेंस,बाह्य और आंतरिक चीजों के भाषायी अर्थ और संबंध,खासकर राजनीतिक घटना के साथ संबंध को जोड़कर देखने पर जोर दिया।इससे वक्तृता के आंतरिक और बाह्य रूप को समझने में मदद मिलेगी।साथ ही ‘थीम’ और ‘अर्थ’के बीच अंतर किया।इसी क्रम में “यूज मीनिंग” और “एक्ट मीनिंग” को मिलाकर ऐतिहासिक विश्लेषणबनता है।यह विचारधारा का हिस्सा है। सवाल यह है “विमर्श” में “सेल्फ”(स्व) की क्या परिभाषा है ? किस तरह का स्व व्यक्त हो रहा है ?”स्व” को परिभाषित किए वगैर विमर्श नहीं बनता।“स्व” को स्थिर या जड़ तत्व नहीं है।खासकर राजनीतिक व्यक्ति जब विमर्श में दाखिल होता है तो वह महज व्यक्ति नहीं होता,उसकी राजनीतिक विचारधारा होती है,समस्या यह है कि वह उस राजनीतिक विचारधारा को कितना जानता है ?उस पर उसका कितना नियंत्रण है ?वह किस तरह के माध्यमों के जरिए संप्रेषित कर रहा है ? राष्ट्र ,राष्ट्रवाद और विचारधारा- आजकल ´राष्ट्रवाद´के सवाल पुनः केन्द्र में आ गए हैं। इस बहस के प्रसंग में पहली बात यह कि ´राष्ट्रवाद´का कोई एक रूप कभी प्रचलन में नहीं रहा।आम जनता में उसके कई रूप प्रचलन में रहे हैं। स्वाधीनता संग्राम के दौरान ´राष्ट्रवाद´के वैविध्यपूर्ण रूपों को समाज में सक्रिय देखते हैं।यही स्थिति स्वतंत्र भारत में भी रही है।लोकतंत्र के विकास की प्रक्रिया में राष्ट्रवाद सामान्यतौर पर एक समानान्तर विचारधारा के रूप में हमेशा सक्रिय रहा है।मुश्किल उनकी है जो राष्ट्रवाद को लोकतंत्र की स्थापना के साथ हाशिए की विचारधारा मानकर चल रहे थे। राष्ट्रवाद स्वभावतःनिजी अंतर्वस्तु पर निर्भर नहीं होता अपितु हमेशा अन्य विचारधारा के कंधों पर सवार रहता है।राष्ट्रवाद के अपने पैर नहीं होते।यह आत्मनिर्भर विचारधारा नहीं है। आधुनिककाल आने के साथ ही ´राष्ट्रवाद´के विभिन्न रूप दिखाई देते हैं,उनमें यह समाजवाद, उदारतावाद, अनुदारवाद यहां तक कि अराजकतावादी विचारधारा के कंधों पर सवार होकर आया है।राष्ट्रवाद के लिए कोई भी अछूत नहीं है,वह साम्प्रदायिक,पृथकतावादी ,आतंकी विचारधाराओं के साथ भी सामंजस्य बिठाकर चलता रहा है।इसलिए ´राष्ट्रवाद´पर विचार करते समय उसका ´संदर्भ´और ´सांगठनिक-वैचारिक आधार´जरूर देखा जाना चाहिए,क्योंकि वही उसकी भूमिका का निर्धारक तत्व है। मार्क्सवादी आलोचक ´राष्ट्रवाद´को ´छद्मचेतना´ कहकर खारिज करते रहे हैं,जो कि सही नहीं है।जैसाकि हम सब जानते हैं कि प्रत्येक विचारधारा में ´छद्म´या ´असत्य´भी होता है और ´संभावनाएं´ भी होती हैं। यही स्थिति ´राष्ट्रवाद´की भी है।हमें देखना चाहिए कि ´राष्ट्रवाद´की जब बातें हो रही हैं तो किस तरह के इतिहास और आख्यान के संदर्भ में हो रही हैं। क्योंकि ´राष्ट्रवाद´कोई ´तथ्य´या ´यथार्थ´का अंश नहीं है,वह तो विचारधारा है,उसका इतिहास और आख्यान भी है।जिस तरह प्रत्येक विचारधारा ´स्व´या सेल्फ के चित्रण या प्रस्तुति के जरिए अपना इतिहास बनाती है,वही काम ´राष्ट्रवाद´भी करता है।इसलिए ´राष्ट्रवाद´की कोई भी इकसार या एक परिभाषा संभव नहीं है। ´राष्ट्रवाद´पर विचार करते समय हम यह देखें कि देश को कैसे देखते हैं ॽ कहाँ से देखते हैंॽ और कौन देख रहा है ॽहिटलर के लिए ´राष्ट्रवाद´ का जो मतलब है वही गांधी के लिए नहीं है। समाजवाद में ´राष्ट्रवाद´का जो अर्थ है वही अर्थ पूंजीवाद के लिए नहीं है।´राष्ट्रवाद´ के नाम पर इन दिनों वैचारिक मतभेद मिटाने की कोशिश की जा रही है,´राष्ट्र´ की आड़ में व्यक्ति ,वर्ग और समुदाय के भेदों को नजरअंदाज करने की कोशिश की जा रही है।असल में ´राष्ट्रवाद´तो भेद की विचारधारा है।फिलहाल देश में जो चल रहा है उसमें इसका तात्कालिकता,विदेशनीति और खासकर पाककेन्द्रत विदेश नीति, मुस्लिम विद्वेष,हिन्दुत्ववादी श्रेष्ठत्व से गहरा संबंध है। ´राष्ट्रवाद´में तात्कालिकता इस कदर हावी रहती है कि आपकी सूचनाओं का वैचारिक उन्माद की आड़ में अपहरण कर लिया जाता है। सूचनाओं के अभाव को उन्माद से भरने की कोशिश की जाती है।स्वाधीनता संग्राम के दौरान राष्ट्रवाद की साम्राज्यवादविरोधी धारा आम जनता को सचेत करने,दिमाग खोलने का काम करती थी,लेकिन इन दिनों तो ´राष्ट्रवाद´आम जनता के दिमाग को बंद करने का काम कर रहा है,सूचना विपन्न बनाने का काम कर रहा है। पहले वाला ´राष्ट्रवाद´आम जनता की ´स्मृति´को जगाने ,समृद्ध करने का काम करता था,लेकिन सामयिक हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद ´स्मृति´ पर हमला करने का काम कर रहा है।बुद्धि और विवेक के अपहरण का काम कर रहा है। पहले ´राष्ट्रवाद´ने कुर्बानी और त्याग की भावना पैदा की लेकिन हिन्दुत्ववादी ´राष्ट्रवाद´तो पूरी तरह अवसरवादी और बर्बर है।इसकी सामाजिक धुरी है मुस्लिम विरोध और अंत्यज विरोध।इसका लक्ष्य है अबाध कारपोरेट लूट का शासन स्थापित करना। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान ´राष्ट्रवाद´के आंदोलन ´अन्य´को आलोकित करने,प्रकाशित करने का काम करता था,लेकिन मौजूदा हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद तो ´अन्य´का शत्रु है।यह सिर्फ ´तात्कालिक राजनीति´केन्द्रित है।जबकि पुराना राष्ट्रवाद अतीत,वर्तमान और भविष्य इन तीनों को सम्बोधित था। साम्राज्यवाद विरोध ´राष्ट्रवाद´ का आख्यान ´रीजन´यानी तर्क के साथ आया लेकिन नया राष्ट्रवाद सभी किस्म के ´रीजन´का निषेध करते हुए आया,इसका मानना है कि आरएसएस जो कह रहा है उसे मानो,वरना ´देशद्रोही´ कहलाओगे।पुराने ´राष्ट्रवाद´के पास साम्राज्यवाद विरोध का महाख्यान था,लेकिन नए राष्ट्रवाद के पास तो कोई आख्यान नहीं है,बिना आख्यान के,सिर्फ रद्दी किस्म के नारों और डिजिटल मेनीपुलेशन के आधार पर यह अपना विस्तार करना चाहता है।जो उससे असहमत हैं उनको कानूनी आतंक के जरिए नियंत्रित करना चाहता है या फिर मीडिया आतंकवाद के जरिए मुँह बंद करना चाहता है। पुराने वाले राष्ट्रवाद के सामने मुकाबले के लिए यूरोपीय राष्ट्रवाद था,लेकिन हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद के सामने तो आम जनता ही है।यह आम जनता के शत्रु के रूप में सामने आया है। राष्ट्र की पहचान क्षेत्र से जुड़ी है।इसके आधार पर अस्मिता बनती है।इसी तरह राष्ट्र की अस्मिता में क्षेत्र के अलावा भाषा का भी योगदान है ,यही कारण है कि आधुनिककाल आने के बाद भाषा के आधार पर जातीयता या नेशनेलिटी का जन्म होता है।पहले भारत में कई किस्म की सांस्कृतिक-भाषायी संरचनाएं मिलती हैं जो अस्मिता बनाती हैं,इनमें पहली संरचना है संस्कृत भाषा और साहित्य की,दूसरी संरचना है अरबी-परशियन भाषा और साहित्य की,तीसरी संरचना हैजनपदीय भाषाओं की और पांचवीं संरचना है बोलियों की।इसके अलावा ´जाति´या कास्ट की संरचना भी है जो राष्ट्र की पहचान से जुड़ी है।इसके अलावा ´राष्ट्र´ और ´क्षेत्रीय´का अंतर्विरोध भी है।ये सभी तत्व किसी न किसी रूप में ´राष्ट्र´ के साथ अंतर्क्रियाएं करते हैं।पुराने ´राष्ट्रवाद´को प्रभावित करते रहे हैं। ´राष्ट्रवाद´का आख्यान लिखते समय यह बात हमेशा ध्यान में रखें कि उसका बौद्धिक विमर्श ,देश निर्माण की प्रक्रिया और नीतियों और बौद्धिक प्रक्रियाओं से गहरा संबंध रहा है।इसलिए हमें उन पक्षों को खोलना चाहिए।राष्ट्र का विमर्श मूलतः रूपों का विमर्श है। सुदीप्त कविराज ने इस प्रसंग में बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही है।उनका मानना है कि राष्ट्रवाद अपने बारे में क्या कहता है उसकी उपेक्षा करें। आत्मकथा की उपेक्षा करें।इससे भिन्न उसके इर्द-गिर्द के सांस्कृतिक रूपों की व्याख्या करें।इनसे ´राष्ट्रवाद´के ऐतिहासिक विकास क्रम को सही रूप में देख सकेंगे। जयशंकर प्रसाद के नाटकों से लेकर कविता तक राष्ट्र बनाम व्यक्ति का द्वंद्व केन्द्र में है और इसमें वे राष्ट्र की शक्ति के सामने व्यक्ति की सत्ता,महत्ता और असीमित दायरे का विकास करते हैं। वे राष्ट्र की सीमाओं से व्यक्ति के अधिकारों के दायरे को तय नहीं करते बल्कि मानवाधिकार के दायरे से व्यक्ति के अधिकारों को देखते हैं।वेव्यक्ति के सहज-स्वाभाविक विकास को महत्वपूर्ण मानते हैं।समाज के हित में विद्रोह करना,व्यक्ति के अधिकारों का विकास करना,समाज की कैद से मुक्त करके नए व्यक्तिवाद के आलोक में वे मनुष्य के विकास को महत्वपूर्ण मानते हैं। वे व्यक्ति की पहचान का आधार धर्म को नहीं मानते।वे समाज की पहचान भी धर्म के आधार पर तय नहीं करते बल्कि उनकी रचनाओं के केन्द्र में मनुष्य है और उसके असीम व्यक्तिवाद के विकास को वे बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं। आधुनिक समाज में व्यक्तिवाद के विकासके बिना नए आधुनिक भारत का निर्माण संभव नहीं है साथ ही व्यक्तिवाद के विभिन्न रूपों की जितनी सुंदर व्याख्या उन्होंने की है,वह बहुत ही महत्वपूर्ण सकारात्मक पक्ष है।

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

जेएनयू छात्र आंदोलन, आतंकवाद और राष्ट्रवाद


जेएनयू छात्र आंदोलन में विभिन्न रंगत की विचारधाराएं सक्रिय रही हैं।इनमें मार्क्सवादी,उग्र वामपंथी, लिबरल,समाजवादी,मुक्त चिंतक,माओवादी आदि शामिल हैं। इन सभी रंगत के विचारों को छात्रसंघ की साधारणसभा में वाद-विवाद करते सहज ही देखा जा सकता है।जेएनयू छात्र आंदोलन की सबसे अच्छी बात है अहिंसा ।इस अर्थ में जेएनयूवाले पक्के बौद्ध हैं।वे वाम नहीं है। किसी भी संस्थान या संगठन की विचारधारा उसके आचरण से तय होती है,विचारों से नहीं।जेएनयू के छात्रों का आचरण बौद्ध परंपरा के करीब है,वाम के नहीं।बौद्ध परंपरा का निर्वाह करते हुए जेएनयू छात्र आंदोलन ने कभी हिंसा नहीं की और न कभी हिंसा का समर्थन किया। असहमति और संवाद को छात्र जीवन की धुरी बनाया। यह भी उल्लेखनीय है कि जेएनयू छात्रसंघ में कभी कोई क्रिमिनल चुनकर नहीं आया।

जेएनयू छात्रसंघ देश में अकेला छात्रसंघ है जो पूरी तरह स्वायत्त है, वि.वि. प्रशासन से उसका कोई संबंध नहीं है।छात्रसंघ अपने फैसले खुद लेता है और अपनी सारी गतिविधियों की सभी जानकारी छात्रों को पर्चे आदि के माध्यम से मुहैय्या कराता है। छात्रों को वहां चुने गए नेताओं से ज्यादा अधिकार प्राप्त हैं, छात्र चाहें तो छात्रसंघ के द्वारा तय लिए गए फैसले रद्द कर सकते हैं।इस तरह की व्यवस्था दुनिया में कहीं पर भी नहीं है। जेएनयू छात्रों ने अनेक आंदोलन किए हैं लेकिन हिंसा का कभी सहारा नहीं लिया।इस अर्थ में वे पक्के बौद्ध हैं।

जेएनयूछात्रसंघ की परंपरा मेें कभी किसी भी आतंकी या पृथकतावादी संगठन के पक्ष में कोई प्रस्ताव पास नहीं हुआ है।हमेशा समय-समय पर आतंकवाद और उससे जुड़े आंदोलनों की जेएनयू छात्रसंघ ने निंदा की है और उसके खिलाफ छात्रों को एकजुट किया है।मैं स्वयं 7साल तक जेएनयू की छात्र राजनति में सक्रिय रहा हूँ और यह वह दौर था जब पंजाब से लेकर असम तक,उत्तर-पूर्व से लेकर कश्मीर तक आंदोलन और हिंसाचार जारी था।इसलिए यह कहना कि जेएनयू के छात्र आतंकवाद के समर्थक हैं,कश्मीर की आजादी के समर्थक हैं,अफजल के समर्थक हैं,एकसिरे से गलत है। जेएनयू के छात्र किस ओर हैं यह बात छात्रसंघ के प्रस्तावों के जरिए,पदाधिकारियों के बयानों के जरिए समझी जानी चाहिए,न कि नारों या पोस्टरों के जरिए।

आरएसएस के लोग झूठा प्रचार कर रहे हैं कि जेएनयू के छात्र आतंकियों को समर्थन दे रहे हैं,वे प्रमाण पेश करें कि छात्रसंघ ने क्या कभी कोई प्रस्ताव आतंकियों के समर्थन में पास किया है ? मीडियावाले प्रमाण पेश करें।

आतंकियों के पक्ष में जेएनयू की दीवारों पर लिखे नारों या किसी संगठन के द्वारा बांटे गए पर्चों या नारेबाजी के लिए जेएनयू छात्रसंघ जिम्मेदार नहीं है। यदि कोई छात्र संगठन जेएनयू में आतंकियों का समर्थन करता है तो यह उस संगठन की राय है जेएनयू छात्रसंघ की राय नहीं है,जेएनयू के छात्रों की राय नहीं है।जेएनयूके छात्रों की राय का प्रतिनिधित्व जेएनयूछात्रसंघ करता है।वही एकमात्र आवाज है उनकी।

जेएनयू छात्र आंदोलन राष्ट्रवाद और आरएसएस


    जेएनयू छात्र आंदोलन के लिए 'अन्य' ( 'अदर' 'हाशिए के लोग') बहुत ही महत्वपूर्ण है। संयोग है कि जेएनयू के अकादमिक वातावरण,पाठ्यक्रम और अकादमिक संस्कृति का मूलाधार भी यही है। जेएनयूछात्र संघ के बिना जेएनयू की परिकल्पना असंभव है,छात्रसंघ जेएनयू आत्मा है। आज यही मूलाधार संकटग्रस्त है, उस पर केन्द्र सरकार के जरिए हमले संगठित किए जा रहे हैं। जेएनयू में अन्य या अदर के हकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। जेएनयू में छात्रों की हर स्तर पर भागीदारी है,जेएनयू में छात्रों की सलाह को तरजीह दी जाती रही है,उनको स्वतंत्र और स्वायत्त माहौल दिया गया है।

        जेएनयू के लिए राष्ट्रवाद का मतलब वह नहीं है जो संघियों या बुर्जुआ कांग्रेस के लिए है।जेएनयू छात्र आंदोलन की साझा समझ रही है कि भारत सांस्कृतिक-जातीय और धार्मिक विविधतावाला देश है।जेएनयू के जन्म के बाद से इस थीम पर हजारों पर्चे और अनेकों प्रस्ताव इस समझ के आधार पर छात्रसंघ ने प्रकाशित किए हैं।जेेएनयू के छात्रों की नजर में भारत के राष्ट्र की धुरी धर्म नहीं नागरिक हैं।राष्ट्रचेतना की धुरी धार्मिक चेतना नहीं,नागरिकचेतना है।जेएनयू में ताकतवर की पूजा नहीं होती,लोकतंत्र की पूजा होती है, उसका सम्मान होता है।वहां जनता यानी छात्रों के सहयोग से लोकतांत्रिक शक्ति पैदा हुई है।जेएनयू के छात्र आंदोलन की प्रेरणा के स्रोत अन्य या अदर या हाशिए के लोगों के आंदोलन हैं।जेएनयू में छात्रचेतना की धुरी है- छात्रों को शिक्षित करो, लोकतांत्रिक बनाओ और संगठन की कला सिखाओ।

इसके विपरीत आरएसएस की विचारधारा में अन्य के लिए कोई जगह नहीं है,लोकतंत्र के लिए कोई जगह नहीं है,आरएसएस की विचारधारा का आधार जनता नहीं हिन्दुत्व है,गोलवलकर की विचारधारा है।यही वजह है कि जेएनयू के आम वातावरण में आरएसएस का कभी कोई बहुत बड़ा आधार नहीं बन पाया।आरएसएस देश में जिन छात्रसंघों को नियंत्रित करता है वहां किसी भी संगठन में लोकतंत्र और संवाद की परंपरा नहीं है,ऐसी स्थिति में जेएनयू छात्र आंदोलन और आरएसएस में यदि सीधे टकराव नजर आ रहा है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

ईमानदार पेशेवर शिक्षण और विचारधारा

          मुझे निजी तौर पर जिन शिक्षकों से पढ़ने का मौका मिला वे सभी पेशेवर ईमानदार शिक्षक थे।मथुरा में नगरपालिका के प्राइमरी स्कूल जवाहर लाल स्कूल, माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय और अंत में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जिन शिक्षकों से पढ़ने का मौका मिला वे अध्ययन-अध्यापन के प्रति एकदम पेशेवर नजरिया रखते थे,विद्यार्थियों के साथ बेहद मानवीय व्यवहार करते थे।फलतः मेरे मन में पेशेवर शिक्षक बनने की भावना पैदा हुई,एक ऐसा शिक्षक बनने की भावना पैदा हुई जो शिक्षा के प्रति ईमानदार रहे,पेशेवर तैयारी के साथ कक्षा में जाए,शिक्षा को धंधा न बनाए,मेरा कोई भी शिक्षक धंधेबाज नहीं था।दिलचस्प बात यह कि जितने भी शिक्षक मिले वे किसी न किसी विचारधारा को मानते और जानते थे,उनके पास राजनीतिक नजरिया था।एकमात्र आचार्य सवलकिशोर पाठक ऐसे थे जो कभी राजनीति पर नहीं बोलते थे, वे दर्शनशास्त्र के बहुत ही बेहतरीन विद्वान थे, व्यवहार में वे कांग्रेसी विचारधारा से प्रभावित थे,लेकिन आम बातचीत में छात्रों से राजनीति की कभी बातें नहीं करते थे।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि किसी भी शिक्षक ने राजनीति करने के लिए मेरे या अन्य के साथ बुरा व्यवहार नहीं किया।जेएनयू में पढ़ते समय तो अनेक मर्तबा गुरूजनों के खिलाफ ही आंदोलन करना पड़ा लेकिन कभी भी यह महसूस नहीं हुआ कि विचारधारा जहर है,विचारधारा के कारण शिक्षक परेशान कर रहे हैं।शिक्षकों से वैचारिक मतभेद सामान्य चीज थी,इससे शिक्षकों के साथ कभी टकराव पैदा नहीं हुआ,यह जमा पूंजी थी मेरे छात्र जीवन की जिसको लेकर मैं अध्यापकीय जीवन में दाखिल हुआ।मैंने निजी तौर पर अनेक शिक्षकों को जेएनयू ,डीयू आदि में देखा था जो छात्रों से राजनीतिक मतभेद के कारण दुर्व्यवहार करते थे।जेएनयू में कभी-कभी यह प्रवृत्ति नामवरजी के अंदर अभिव्यक्त होती थी,जिसके कारण छात्रों के साथ उनका टकराव होता था।इस पूरे अनुभव का निचोड़ यह कि शिक्षक को कभी विचारधारा के डंडे से अपने विद्यार्थियों को नहीं हांकना चाहिए।जो शिक्षक राजनीतिक विचारधारा के डंडे से हांकेगा वह छात्रों का अहित ही करेगा।

शिक्षा में राजनीति होगी,राजनीति होनी भी चाहिए,लेकिन श्रेष्ठ राजनीति करो,लेकिन पठन-पाठन को गौण न बनाओ। निकृष्ट राजनीति मत करो।छात्रों को राजनीति करने,अपनी विचारधारा,अपने मन का छात्र संगठन चुनने की आजादी हो,हर मसले पर उनकी राय लो,हर स्तर उनकी शिरकत को सुनिश्चित करो,शिक्षा को पेशेवर और ईमानदार आचरण का आईना बनाओ।यही मनोदशा थी जिसे लेकर मैंने 1989 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में लेक्चरर के रूप में नौकरी ली,जब कोलकाता आया था तो बड़े सपने थे मन में,लेकिन कलकत्ता विश्वविद्यालय में काम करने के साथ ही चंद दिनों में सारे सपने दफ्न करने पड़े,इसका एकमात्र कारण वाम राजनीति थी, आयरनी यह कि वाम ने ही सपने पैदा किए,वाम ने ही सपने दफ्न किए।इसलिए मेरे अंदर सपनों के दफ्न हो जाने का दुख नहीं था।

कोलकाता में पढ़ाते हुए 27साल हो गए,इन वर्षों में जो कुछ देखा है वह त्रासद ज्यादा है, सुखद कम है। सुखद यह है कि मैंने सीमित संसाधनों और तमाम किस्म की प्रतिकूल अमानवीय परिस्थितियों के बावजूद कभी शिक्षक के रूप में कक्षा को कम करके नहीं लिया,कक्षा मेरे लिए आज भी सर्वोच्चसुख है,समय पर कक्षा में जाना और पूरा समय कक्षा में रहना यह मेरी आदत है।मेरे लिए कक्षा बहुत बड़ी प्रयोगशाला है,जिसमें मुझे सबसे ज्यादा सीखने को मिला।मैंने अपने विद्यार्थियों को पढ़ाते हुए जो सीखा वह बेहद मूल्यवान है और उसका मैंने अपने जीवन में तो लाभ उठाया ही अपनी किताबों के लेखन में भी लाभ उठाया। मेरी अधिकांश किताबें सबसे पहले बीज रूप में कक्षाओं में ही पैदा हुईं,पढ़ाते हुए नए विचारों की हवा कक्षा में ही मिली,मेरे लिए छात्र एक तरह से ईंधन का काम करते रहे हैं, मैं पढ़ाता नहीं तो संभवतः किताबें नहीं लिख पाता।मेरे अधिकतर विद्यार्थी नहीं जानते कि वे मुझे क्या दे रहे हैं,लेकिन मैं सचेत रूप से उनसे लेता रहा हूँ।पेशेवर ईमानदारी से जितना बन पड़ा कक्षा में किया,जो कक्षा में नहीं कर पाया वह किताबें लिखकर किया।जिससे भविष्य में ज्ञान का सही इस्तेमाल हो।दिलचस्प बात यह कि मैंने कभी किताबी ढ़ंग से नहीं पढ़ाया,इसका बड़ा कारण था कि मैं जिन शिक्षकों से पढ़कर आया था वे किताबी ढ़ंग से नहीं पढ़ाते थे। मेरा मानना है कि एक बेहतरीन शिक्षक वह जो कक्षा में पढ़ते समय घुल-मिल जाए,विषय में रमकर पढ़ाए,पढ़ाते समय दिमाग की बंद खिड़कियों को खोले,आलोचनात्मक विवेक पैदा करे।मेरे लिए कक्षा का मतलब क्लास नोटस लिखाना नहीं था।मैंने कभी नोटस नहीं लिखाए।मेरे लिए पढ़ाने का मतलब है विद्यार्थी में पढ़ने की दिलचस्पी पैदा करना,पढ़ने की ललक पैदा करना,ज्ञान के लिए बेचैनी पैदा करना,यह काम जिस तरह हो पेशेवर ढ़ंग से किया जाय।मैं नहीं जानता इसमें कहां तक सफल हुआ, कहां तक असफल हुआ,लेकिन मेरे पढ़ाने का रास्ता यही रहा है।



मैंने जब नौकरी आरंभ की तो कलकत्ता विश्वविद्यालय में आधुनिक आलोचना तकरीबन नहीं पढ़ाई जाती थी, परंपरागत पाश्चात्य समीक्षा और संस्कृत काव्यशास्त्र एक अतिथि अध्यापक पढ़ाते थे नाम था सदानंद सिंह,वे प्रेसीडेंसी में शिक्षक थे।मैंने उनसे एकदिन पूछा कि आप किस तरह पढ़ाते हैं,उन्होंने ईमानदारी से कहा रटकर आता हूँ कक्षा में जाकर उगल देता हूँ।मेरे लिए यह चौंकाने वाली चीज थी। इससे मुझे अंदाजा लगा कि रट्टूभाव से यदि शिक्षक पढ़ा रहा है तो वह आखिर किस तरह का वातावरण बना रहा है,रट्टूभाव से पढ़ाने का अर्थ है शिक्षा को सुला देना।कक्षा में जब गया तो और भी चौंकानेवाला अनुभव हुआ,हिन्दी साहित्य का इतिहास कोर्स में था, लेकिन विद्यार्थियों ने रामचन्द्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी का नाम तक नहीं सुना था। पूछा कि किसका लिखा इतिहास पढ़ते हो तो पता चला किसी शिवकुमार शर्मा नामक व्यक्ति का लिखा इतिहास पढ़ते हैं,खोजबीन की तो पता चला सारा कलकत्ता उनका इतिहास पढ़ता है,यानी पूरे शहर से रामचन्द्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी गायब थे,जबकि वे स्वयं मेरे विभाग में आ चुके थे,कोलकाता शहर तो वे और उनकी दूसरी परंपरा वाले लोग साल में कई बार आते थे,लेकिन साहित्य के विद्यार्थियों में उनका कोई असर नहीं था।पता चला यह शिवकुमार शर्मा नामक व्यक्ति कुंजीलेखक है,मैं मार्क्सवादी आलोचक शिवकुमार मिश्र समझ रहा था.इससे यह भ्रम भी टूटा कि किसी शहर में बड़े प्रगतिशील साहित्यकार भाषण देने आते-जाते हैं तो उनसे साहित्य के विद्यार्थी प्रभावित नहीं होते, बल्कि वे कक्षा में पठन-पाठन से प्रभावित होते हैं।मुझे खुशी है कि मेरे आने के बाद पहलीबार कलकत्ते के छात्रों को रामचन्द्र शुक्ल-हजारीप्रसाद द्विवेदी के इतिहासग्रंथ पढ़ने की जरूरत महसूस हुई।पहलीबार इतिहास के कुंजीलेखक से छात्रों का संबंध टूटा।इसी तरह कलकत्ता वि.वि. में जयशंकर प्रसाद पर विशेषपत्र दसियों साल से पढ़ाया जा रहा था,लेकिन किसी ने मुक्तिबोध की किताब का जिक्र तक नहीं किया था, मुक्तिबोध की प्रसिद्ध किताब है ‘कामायनी एक पुनर्विचार’,इसका कोई जिक्र नहीं था, छात्र मुक्तिबोध का नाम तक नहीं जानते थे।क्योंकि वे पाठ्यक्रम में नहीं थे।पाठ्यक्रम में कोई सामयिक चीज,सामयिकलेखक नहीं पढ़ाया जाता था।मैंने पहलीबार जब पाठ्यक्रम बदलने पर जोर दिया , जिंदालेखकों को पढ़ाने पर जोर दिया तो इस पर बड़ी तीखी बहस हुई,कलकत्ता वि.वि. में उस समय जिंदा लेखक नहीं पढ़ाया जाता था और जिंदा लेखक पर शोध नहीं होता था।मैंने सबसे पहले अपने साथ पीएचडी करने के लिए जिंदालेखक चुनने में शोधार्थियों को मदद की तो बहुत तीखी बहस हुई,उसके बाद जिंदालेखक का प्रवेश हुआ।मेरे साथ रामविलाश शर्मा और नामवर सिंह ये दो जिंदा लेखक थे जिन पर शोध सबसे पहले हुए।इसके पहले कलकत्ता वि.वि. में जिंदालेखक को पढ़ाना और उस पर शोध कराना बंद था।आज पाठ्यक्रम में अनेक जिंदा लेखक पढाए जाते हैं,जिंदालेखकों पर शोध हो रहा है।यही तो सुख है।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

कलकत्ते के खट्टे-मीठे अनुभव-


मैं सन्1989 में कोलकाता आया,जिस समय मेरी नियुक्ति कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में हुई उस समय हिन्दी एम.ए. में तकरीबन 45 छात्र पढ़ते थे।आज प्रत्येक सेमिस्टर में 125 छात्र पढते हैं।एम.फिल् भी है।मेरी नियुक्ति के पहले तक कलकत्ता वि.वि. में एससी,एसटी, आरक्षण नहीं था।कॉलेज सर्विस कमीशन में भी आरक्षण के आधार पर पद नहीं भरे जाते थे। यह समस्या जब मेरी नजरों में पहलीबार सामने आई तो मैंने इसे माकपा के शीर्ष नेतृत्व के सामने रखा और अंतमें काफी जद्दोजहद के बाद आरक्षण लागू हुआ। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि हिन्दी एमए का पाठ्यक्रम तकरीबन30सालों से नहीं बदला गया था,उसमें निरंतर अपडेटिंग की प्रक्रिया आंरंभ हुई। इस काम में विभाग के अन्य शिक्षकों ने सहयोग किया,लेकिन पहल मैंने की। आज पश्चिम बंगाल हिन्दी के पठन-पाठन के लिहाज से बहुत विकास कर गया है,इसमें वाम सरकारों की बड़ी भूमिका रही है।अनेक विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ायी जाती है।

कलकत्ते का सारा माहौल पुराने पैटर्न,आदतों,संस्कारों पर टिका है।नई दुनिया का उसमें प्रवेश बेहद धीमी गति से हो रहा है।चीजें बदल रही हैं लेकिन बेहद धीमी गति से। विद्यार्थियों के सामने सबसे बड़ी समस्या है पुस्तकों की।जरूरत की पुस्तकों को पढ़ने-पढ़ाने का यहां रिवाज कम है।अधिकतर शिक्षक भी उससे अपरिचित हैं।इसके कारण विद्यार्थियों तक सही सूचनाएं ,पुस्तकों के नाम नहीं पहुँच पाते। स्थिति की गंभीरता समझने के लिए मैं अपना एक अनुभव साझा करना चाहता हूँ।हमलोगों ने एमफिल् का पाठ्यक्रम आरंभ किया। पहला बैच था,उसमें मुझे साहित्य का समाजशास्त्र पढ़ाना था,किताबें नहीं मिल रही थीं, मैंने स्व.विष्णुकांत शास्त्री,जो विभाग के वरिष्ठतम प्रोफेसर थे,बेहतरीन शिक्षक थे, से पूछा कि मुझे मिखाइल बाख्तिन पढ़ाना है,क्या आपके पास उनकी कोई किताब है,वे बोले मैंने तो नाम ही पहलीबार सुना है,मैं सुनकर चौंक गया।दूसरे दिन मैंने भाषाविज्ञान विभाग के एक प्रोफेसर से पूछा कि क्या उनके पास बाख्तिन की कोई किताब है तो वे बोले, हां,वे बोले मेरे पास सब किताबें हैं,मैंने शास्त्रीजी से कहा कि देखिए कितना अंतर है ,हिन्दी के प्रोफेसर को नाम तक नहीं मालूम और भाषाविज्ञान के प्रोफेसर के पास किताबें तक हैं।इस एक घटना ने मेरी आंखें खोल दी साथ में यह भी मैसेज दिया कि हिन्दी के शिक्षक आधुनिक विचारकों के लेखन से परिचित होना तो दूर,उनका नाम तक नहीं जानते। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से मैंने काम आरंभ किया।

मैं जेएनयू से पढ़कर आया था,नए विषय,नए विचारक,सिद्धान्तकार आदि के बारे में गुरूमुख पढ़कर आया था अतःमेरे सामने वह संकट नहीं था जो यहां के शिक्षकों के सामने संकट था। कहने का आशय यह कि विद्यार्थी ज्ञान के नए स्रोतों से बाकिफ तब होगा जब शिक्षक बाकिफ होगा।कोलकाता जैसे महानगर में रहते हुए दुनिया के ज्ञान के बेखबर रहने वाला शिक्षक निश्चित रूप से तेजगति से अपना विकास नहीं कर सकता। पहले ज्ञान-विज्ञान के नए क्षितिज शिक्षक स्पर्श करे,बाद में वह अपने विद्यार्थियों को मौका दे,सारी समस्या की जड़ यहां पर है।



मैं जब कोलकाता आया तो मैंने पता किया कि यहां विदेशी किताबें कहां मिलती हैं ? पता चला कि विदेशी पुस्तक भंडार नाम से एक किताबों की दुकान है,मैं दुकानदार से मिला,उसने नई-नई किताबें दिखायीं,बात करने पर पता चला कि नामवरजी जब भी कलकत्ता आते हैं उस किताब वाले के यहां जरूर आते हैं, मैं नामवरजी से उस किताबवाले के बारे में जेएनयू में छात्रजीवन में सुन चुका था, नामवरजी जब भी कोलकाता आते सेमीनार आदि से जो भी रूपये मिलते उससे उस पुस्तक बिक्रेता से किताबें खरीदकर ले जाते।साल में कम से कम 3-4बार उनका कोलकाता आना होता था, मैंने किताब वाले से पूछा क्या कोई और हिन्दी का शिक्षक भी उससे किताबें खरीदने आता है तो उसने कहा कि हिन्दी का कोई शिक्षक कभी किताब खरीदने नहीं आया।यह वाकया इसलिए बताना जरूरी है कि हिन्दी शिक्षकों के दुनिया से संपर्क-संबंध को हम पहचान सकें।कलकत्ता वि.वि.की लाइब्रेरी से कभी किसी हिन्दी शिक्षक ने 1989 तक पश्चिमी समीक्षा की किताबें, आलोचना की नई किताबें निकलवाकर नहीं पढ़ीं,मैं पहला शिक्षक था जो किताबें निकालकर लाता और पढ़ता था।मेरे लिए यह सारी चीजें बेहद निराशा पैदा करने वाली थीं,जब आप नई किताबें नहीं पढ़ेंगे तो नई बहसों में शामिल कैसे होंगे, ज्ञान के समुद्र में दुनिया के साथ हिन्दीवालों को कैसे जोड़ेंगे? यह काम आशीर्वाद मात्र से नहीं हो सकता।

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