रविवार, 17 जुलाई 2016

आतंकी टीपू सुल्तान की मौत और हमारी सेना

         यह वाकया 1992-93 का जब कश्मीर में संकट गहरा था।आतंकी-पृथकतावादी संगठनों का उभार चरम पर था,घर –घर तलाशी हो रही थी।हर आदमी पर पुलिस नजर रखे हुए थी,ऐसे हालात में पाक स्थित आतंकियों ने कश्मीर के क इलाके के सरगना के तौर पर टीपू सुल्तान का नाम मीडिया में उछाल दिया,टीपू सुल्तान ने भी खुशी-खुशी इलाके के कमांडर की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। यह वाकया कश्मीर के किसी छोटे इलाके का है, आतंकी कमांडर बनाए जाने की घोषणा के बाद टीपू सुल्तान बड़े अहंकारी भाव में रहने लगा,दिन में एक-दोबार बाजार में एके47 लेकर घूम आता था।इलाके के लोग घरे रहते लेकिन जानते थे कि वह आतंकी नहीं है गरीबी का मारा चिरकुट किस्म का आदमी है।

टीपू सुल्तान खुश था कि उसको आतंकियों ने इलाके का कमांडर बना दिया, वास्तविकता यह थी कि टीपू सुल्तान ढाई पसली का आदमी था,एकदम सूखा हुआ शरीर, लेकिन साढ़े छह फुट लंबा। खाने और सोने का कोई ठिकाना नहीं ,उसके परिवार में कोई नहीं था,वह एक छोटे से कमरे के घर में रहता था। मीडिया में ज्योंही टीपू सुल्तान का नाम आतंकियों ने उछाला उस मुहल्ले को पुलिस ने कुछ ही दिन बाद आकर उसे घेर लिया।उसके नाम की घोषणा के बाद उस पर इनाम भी घोषित कर दिया गया।लेकिन मुश्किल यह थी पुलिस और सेना के पास उसका कोई फोटो नहीं था,यहां तक कि आतंकियों के पास भी फोटो नहीं था। दस-पन्द्रह दिन बाद कश्मीर के डाउन टाउन इलाके को तकरीबन 11सौ सैनिकों ने घेर लिया,मुहल्ले के सारे लोगों को कहा गया कि वे टीपू सुल्तान को सेना को सौंप दें,दिल्लगी यह कि टीपू सुल्तान की सेना में फोटो किसी ने देखी नहीं थी,मुहल्ले के लोगों के अलावा उसे कोई जानता नहीं था,सेना के पास उसकी कोई फोटो नहीं थी, ऊपर के अफसरों का आदेश था जाओ और टीपू को पकड़कर लाओ, लेकिन 1500सैनिकों में से कोई भी उसे पहचानता नहीं था।



टीपू आतंकियों का इलाका कमांडर था इसलिए मुहल्ले के लोग उससे डरने लगे थे,मजेदार बात यह कि कमांडर घोषित होने के पहले टीपू सुल्तान को किसी ने किसी भी किस्म की बदमाशी,शरारत,गुंडागर्दी आदि करते नहीं देखा,लेकिन अचानक एक रात वह कमांडर बन गया,उसके हाथ में एके 47 बंदूक आ गयी और उसने भी बंदूक के साथ मुहल्ले में प्रदर्शन करके सूचना देदी कि वह आतंकी संगठन का इलाके का कमांडर है। लेकिन ज्योंही सेना ने मुहल्ले को घेरा तो बाहर जीप से लाउडस्पीकर लगाकर सेना का कमांडर टीपू सुल्तान को समर्पण करने की अपील कर रहा था, घरों में तलाशी शुरू हो गयी,लेकिन टीपू सुल्तान तो अपने कमरे से निकलकर सीधे कमांडर के पास कर खड़ा हो गया,कमांडर को उसकी कद-काठी देखकर नहीं लगा कि यह कोई आतंकी है।वह कमांडर के पास सहज भाव से खड़ा,घरों में दहशत थी,कई घंटे तलाशी अभियान चला ,सेना को टीपू नहीं मिला,जबकि टीपू तो बाहर सेना के कमांडर के पास ही खड़ा था। सेना के जाने के बाद टीपू ने मुहल्ले के लोगों में बढ़-चढ़कर बातें कहीं और अपनी वीरता के किस्से सुनाए,लोगों को आश्चर्य था कि टीपू तो सेना के कमांडर के पास ही खड़ा था फिर सेना ने उसको पकड़ा क्यों नहीं। कुछ दिन तक टीपू के किस्से चलते रहे, अंत में एक दिन टीपू को अपनी बंदूक से पुलिस पर गोली चलाने का शौक चर्राया और उसने सीधे बंदूक करके फायरिंग शुरू कर दी,वह जानता नहीं था कि एक47 गन से फायरिंग के साथ ही पीछे तेजी से झटका लगता है,वह बेहद दुबला-पतला था, उसने ज्योंही फायरिंग शुरू की बंदूक की दिशा पलटकर उसकी ओर हो गयी और वह अपनी ही गोली से ढेर हो गया,बाद में आतंकियों ने खबर फैला दी कि एरिया कमांडर टीपू सुल्तान सेना से मुठभेड़ करते मारा गया।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

कश्मीर को यहां से देखो-

                  आतंकवादी वहां की जनता की आवाज नहीं हैं, वहां की लोकतांत्रिक ताकतें हैं जो सही आवाज हैं।मुश्किल यह है पीडीपी को महत्ता देकर सिरबिठा दिया है मोदी ने,वे ही उनको महत्व दे रहे हैं।राज्य और केन्द्र सरकार तुरंत निचले स्तर पर सर्वदलीय बैठक क्यों नहीं बुला रहे,किसने रोका है।पीडीपी चाहती है आतंकी विपक्ष में रहें।जबकि सब जानते हैं नेशनल कांफ्रेस के बिना कश्मीर में लोकतंत्र बचाने वाला और कोई दल नहीं है। उल्लेखनीय है विधानसभा –लोकसभा चुनाव में भाजपा- पीडीपी ने प्रति वोट एक हजार रूपया नीचे सप्लाई देकर बड़े पैमाने पर पैसा खर्च किया है,पता करो यह पैसा किसने दिया। करोडों रूपया बांटा गया था,हर वोट पर एक हजार रूपया दिया गया है, लेकिन मीडिया में खबर तक नहीं है।हमारा अनुमान है भाजपा को यह पैसा बहुराष्ट्रीय शस्त्र निर्माता कंपनियों ने दिया था उसके बाद मोदीजी ने बड़े पैमाने शस्त्र समझौते ही किए हैं।

कश्मीर की जनता आजादी नहीं विकास और शांति चाहती है,आजादी तो आतंकी चाहते हैं।भाजपा वाले उसे हवा दे रहे हैं।मोदीजी के साथ पीडीपी ने विकास पर चुनाव लडा है वे जीते हैं विकास पर,हुर्रियत चुनाव नहीं जीती है।इसलिए हुर्रियत को न उछालें।विधानसभा चुनाव कौन जीता है इस पर सोचो,जीतने वाले ने क्या वायदे किए हैं,हुर्रियत ने चुनाव नहीं लड़ा,इसके अलावा आम जनता और आतंकियों में अंतर करो, जनता का एजेण्डा वह नहीं है जो आतंकियों का है। जनता ने कभी वोट का बहिष्कार नहीं किया,इससे समझ लो कि जनता लोकतंत्र और भारत चाहती है।

पृथकतावाद अपने एक्शन से खुद को तो नंगा करता है अन्य को भी खासकर साम्प्रदायिक ताकतों को भी नंगा कर देता है।कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बनाने के दिन से हम भाजपा की आलोचना कर रहे हैं।भाजपा का मानना है कि वे अपनी साम्प्रदायिक नीतियों के प्रभाव से पीडीपी को बदल देंगे, लेकिन हो उलटा रहा है,भाजपा लगातार पीडीपी के प्रभाव में काम कर रही है,उसके इशारों पर मोदी नाच रहे हैं।साम्प्रदायिकता और पृथकतावाद के इस संयुक्त मोर्चे का कुफल कश्मीर की जनता भोग रही है।36निर्दोष मारे गए हैं,1500से ज्यादा घायल पड़े हैं।150 से ज्यादा की आँखें खतरे में हैं।समूचा पर्यटन का धंधा चौपट हो गया है।

मीडिया में लंबे समय से सेना को लेकर परम पवित्र भाव की आंधी चलायी जा रही है,यह बेहद खतरनाक चीज है। लोकतंत्र में सेना की भी समीक्षा होती है,आलोचना होती है,सेना को भी दण्डित किया जा सकता है। संघी मीडिया आंधी के बहाने सेना को विचारधारा विशेष की सेवा करने के लिए मानसिक तौर पर तैयार किया जा रहा है।

सेना की लोकतंत्र में राजनीतिक भूमिका जीरो होती है।सेना की भूमिका देश की सरहदों पर है या विशेष अशांति की स्थिति में है,लेकिन इन सभी हालातों में सेना को राजनीतिक विचारधारा से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।यह दुखद है कि सेना का किसी न किसी रूप में राजनीतिक असफलताओं को छिपाने या राजनीतिक समाधानों को स्थगित करने के लिए सत्ताधारीदलों ने निहित स्वार्थी ढ़ंग से हमेशा इस्तेमाल किया है।

इधर मीडिया में सेना को हिन्दू राष्ट्रवाद से जोड़कर पेश करने की प्रतिस्पर्धा छिड़ी हुई है।सेना पूर्व अधिकारी और इन दिनों संघ के संघी फाउंडेशन से जुडे बड़े पूर्व सैन्य अधिकारी सबसे घटिया ढ़ंग से राष्ट्रोन्माद पैदा कर रहे हैं,सेना को राष्ट्रवाद से जोड़कर पेश कर रहे हैं और यह बेहद खतरनाक काम है,खासकर टीवी टॉक शो में सेना के पूर्व अफसरों के जरिए सेना को वैचारिक कवच पहनाने की ये गंदी हरकतें बंद होनी चाहिए।

सेना के पूर्व अधिकारियों का इराक-अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप को वैध ठहराने के लिए मीडिया के जरिए अमेरिका-ब्रिटेन और नाटो ने जमकर दुरूपयोग किया,ये पूर्व सैन्य अधिकारी अमूमन सफेद झूठ बोलते रहते हैं जिनको इन सैन्य अधिकारियों में सत्य दिखता है उनको इराक हमले पर हाल ही में आई ब्रिटिश जांच रिपोर्ट को पढ़ना चाहिए।पूर्व संघी सैन्य अधिकारी आमतौर पर मीडिया में उत्तेजक भाषा बोलते हैं,अशांति और झूठ के वक्ता के रूप में पेश आते हैं।इन सबको कायदे से बेनकाब करने की जरूरत है।

कश्मीर के सच को आतंकियों ,संघियों और बहुराष्ट्रीय शस्त्र निर्माता कंपनियों और कारपोरेट मीडिया की नजर से देखना बंद करें।ये चारों तत्व मिलकर इस इलाके में अशांति बनाए रखना चाहते हैं।आतंकियों की सबसे ज्यादा मदद कौन कर रहा है ? पाक तो बहाना है ,असल में शस्त्र निर्माता कंपनियां कश्मीर को सुलगाए रखना चाहती हैं जिससे भारत में हथियारों की अबाध सप्लाई बनी रहे।इन कंपनियों के साथ भाजपा और कांग्रेस दोनों के गहरे संबंध हैं।इन दोनों दलों को इन कंपनियों से गुपचुप पैसा मिलता रहा है।कश्मीर में विगत विधानसभा-लोकसभा चुनाव में इन दोनों दलों ने वोटरों को खरीदने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया था,यह पैसा कंपनियों ने शांति स्थापित करने के लिए नहीं दिया है।कश्मीर पर हो रही सारी बहस शस्त्र निर्माता कंपनियों की भूमिका की अनदेखी करके चल रही है,दिलचस्प बात है इन कंपनियों का पैसा अनेक स्तरों पर बंट रहा है।





बुधवार, 13 जुलाई 2016

मथुरा के दूधवालों की रौनक और ईमानदारी-

        मथुरा पर जब भी बात होती है आमतौर पर जीवनशैली में रचे-बसे पहलुओं पर बातें नहीं होतीं,मथुरा की जीवनशैली में दूध और दूधवाले गहरे तक रचे बसे थे।इधर 35साल में बहुत कुछ बदला, उसकी चर्चा मैं कभी फुर्सत से करूँगा।लेकिन मैं 1979 के पहले के समय को आज याद करता हूँ तो पाता हूँ शहर के विभिन्न गली-मुहल्लों के नुक्कड़ ,गली या मुख्य बाजार में कई दूधवालों की दुकानें थीं इनके ग्राहक बंधे हुए थे,इनमें हरेक के दूध का स्वाद भी अलग हुआ करता था।ऐसी भी दुकाने थीं जो मिलावटी दूध बेचती थीं ,इनकी गिनती कम थी।लेकिन असली दूध बेचने वालों की दुकानें बहुत ज्यादा हुआ करती थीं।

मथुरा के सांस्कृतिक और व्यापारिक विकास को समझने के लिए इन दूध वालों का कायदे से अध्ययन किया जाना चाहिए।यह देखें कि इनमें से कितने व्यापार में आगे गए और कितने पीछे खिसकते चले गए या शहर छोड़कर चले गए। इन दूधवाले दुकानदारों द्वारा सृजित व्यापारिक संस्कृति का अध्ययन जरूर किया जाना चाहिए।इन दूधवालों की शहर में व्यापारिक ईमानदारी और निष्ठा ने ईमानदार संस्कृति को बनाने में बहुत मदद की।ऐसा नहीं है कि ये दूधवाले व्यापार करके मुनाफा नहीं कमाते थे,मुनाफा कमाते थे,लेकिन ईमानदारी के साथ।दूध के व्यापार में मुनाफे और ईमानदारी में संतुलन की कला के दर्शन मैंने इन दूधवालों के यहां किए।

दिलचस्प बात है कि हमारे मंदिर (चर्चिका देवी) पर तकरीबन सभी दूधवाले दर्शन करने आते थे।इनमें से सभी लोग बेइंतहा शरीफ और मधुरभाषी थे।इस तरह के जनप्रिय दुकानदारों में चौक में भरतपुरिया,द्वराकाधीश की गली में गोपाल पारूआ.छत्ता बाजार में भानु पहलवान आदि कुछ नाम ही फिलहाल याद आ रहे हैं।इन दूध वालों के यहाँ दूध का मजा असल में रात को आता था।जब आप गरम-गरम दूध कुल्हड़ में ऊपर से मलाई डालकर बाजार में खड़े होकर पीते थे।यह मथुरा के लोगों की खानपान की रात्रि संस्कृति का एक जरूर हिस्सा था। इधर वर्षों से यह दृश्य में उपभोग करने से वंचित रहा हूँ।जितनीबार में चौक या द्वारकाधीश की गली या छत्ता बाजार से निकला हूँ,दूध की पुरानी बड़ी कडाही नजर नहीं आतीं,रात की वह रौनक नजर नहीं आती।

मथुरा के मायने-

     आपकी दशा मैं नहीं जानता,लेकिन अपनी तकलीफ का एहसास मुझे है और यह एहसास ही मुझे बार-बार मथुरा की ओर खींचता है।आमतौर पर शिक्षा के बाद आदत है कि जहां पैदा हुए,पले-बड़े हुए वहां पर नौकरी करना नहीं चाहते,बाहर जाना चाहते हैं।लेकिन मेरा मन हमेशा इस बात से परेशान रहा कि मुझे मथुरा में उपयुक्त काम ही नहीं मिला वरना मैं जेएनयू से पढ़कर मथुरा लौट आता। मुझसे पूछें तो यही कहूँगा कि नौकरी दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी है।नौकरी की तलाश में जब शहर छूटता है तो आपसे बहुत कुछ छूट जाता है।अपने लोग, परिवेश, भाषा,चिर-परिचित संस्कृति आदि आपके हाथ से एक ही झटके में निकल जाते हैं।अधिकतर नौकरीपेशा लोग अपने काम-धंधे में इस कदर मशगूल हो जाते हैं कि इस सांस्कृतिक जमा पूँजी के हाथ से निकल जाने से होने वाली सांस्कृतिक क्षति से अनभिज्ञ रहते हैं।लेकिन आजीविका की तलाश में इस सांस्कृतिक क्षति को हम सबको उठाना पड़ता है।हमारे पास कोई शॉर्टकट नहीं है कि इस क्षति से बच सकें।जन्मस्थान से पलायन एक स्थायी नियति है जिससे आधुनिककाल में पूरा समाज गुजरता है।

मैं मथुरा से जेएनयू पढ़ने के लिए 1979 में निकला तो जानता ही नहीं था कि कभी वापस नहीं लौट पाऊंगा।पढ़ते हुए मन में यही आशा थी कि कहीं मथुरा के आसपास ही नौकरी लग जाएगी और मथुरा से संपर्क-संबंध बना रहेगा।लेकिन बिडम्बना यह कि जैसा चाहा वैसा नहीं घटा।नौकरी की तलाश में ढाई साल तक इधर-उधर दसियों विश्वविद्यालयों में इंटरव्यू दिए।जेएनयू से पढाई खत्म करके निकलने के बाद दि.वि.वि. के दो कॉलेजों में इंटरव्यू देने के बाद तय किया कि कॉलेज में इंटरव्यू नहीं दूँगा और न नौकरी करूँगा।यही वजह थी कि विश्वविद्यालय में ही नौकरी के आवेदन करता रहा,परिचितों से खारिज होता रहा और अंत में कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में नौकरी मिल गयी।

कोलकाता अप्रैल1989 में आया और तबसे यहीं पर हूँ।यहां आने के पहले दिल्ली में था तो मथुरा जल्दी-जल्दी जाता था लेकिन कोलकाता आने के बाद मथुरा आने-जाने का सिलसिला टूट गया।अब साल-छह महिने में आना जाना होता है।इसके कारण मथुरा में नए दोस्त नहीं बने।पुराने दोस्त लगातार उम्रदराज होते गए और उनमें से अनेक थक भी गए हैं।मथुरा से दूर हुआ तो सबसे बड़ा अभाव मुझे का. सव्यसाची का महसूस हुआ।सव्यसाची सही मायने में मथुरा में रचे-बसे थे,वहां के लोगों से घुले-मिले थे,उनसे मिलकर हमेशा मजा आता था,उनकी अनौपचारिक बोलने की शैली और तीखी भाषा हमेशा अपील करती थी,वे मुझे कभी कॉमरेड नहीं कहते ”पंडितजी´´ कहकर बुलाते थे।पता नहीं क्यों उन्होंने मेरे लिए पंडितजी सम्बोधन चुन लिया,मैं नहीं जानता,जबकि मुझे कोई और पंडितजी नहीं कहता था।सव्यसाची के पंडितजी कहने का असर अन्य लोगों पर भी हुआ,इसके कारण और भी कई मित्र पंडितजी कहने लगे। लेकिन इन चंद मित्रों को अलावा सब नाम से ही बुलाते रहे हैं।मेरे मित्रों का सीधे नाम से पुकारना और सव्यसाची जी का पंडितजी कहकर पुकारना अपने आपमें मेरे व्यक्तित्व के उन पहलुओं को अभिव्यंजित करता है जो मुझे सामाजिक विकास के क्रम में मिले हैं,मेरे व्यक्तित्व में दो किस्म के व्यक्ति हैं।एक वह व्यक्ति है जो पिता और संस्कृत पाठशाला ने बनाया,दूसरा वह व्यक्ति जिसे मथुरा –जेएनयू के मित्रों और जेएनयू की शिक्षा ने बनाया।मजेदार बात है कि मैं इन दोनों को आज भी जीता हूँ।मुझे अपने बचपन के संस्कृत के सहपाठी और अग्रज जितने अच्छे लगते हैं उतने ही जेएनयू के मित्र और कॉमरेड भी अच्छे लगते हैं।



मुझे मथुरा का अतीत बार-बार अपनी ओर खींचता है,लेकिन जेएनयू नहीं खींच पाता।जेएनयू से पढ़कर निकलने के बाद 1989 से लेकर आज तक में मात्र 4बार ही जेएनयू गया हूँ।लेकिन इस बीच मथुरा बार-बार गया,उन पुराने स्थानों पर बार- बार जाता हूँ जो मेरी बचपन की स्मृति का अंग हैं,या मेरी फैंटेसी का अंग हैं।अपने जीवन के तजुर्बे से यही सीखा है कि जन्मस्थान का मतलब कुछ और ही होता है,जन्मस्थान आपके रगों में,इच्छाओं और आस्थाओं में रचा-बसा होता है,वह आपके व्यक्तित्व के निर्माण में बुनियादी रूप से भूमिका निभाता है।वह कभी पीछा नहीं छोड़ता।

मथुरा का रस-

        मथुरा से निकले तकरीबन 35साल से ऊपर गुजर गए,इस बीच मथुरा में बहुत कुछ बदला है,जिसका कायदे से अध्ययन करना मेरा लक्ष्य है,मैं इस बीच मथुरा आता-जाता रहा हूँ,लेकिन मात्र पर्यटक की तरह,मथुरा को नए सिरे से पाने,समझने और महसूस करने के लिए वहां कुछ समय गुजारना बेहद जरूरी है,निकट भविष्य में यह काम कर पाऊँ तो बेहतर होगा।

मथुरा के मंदिर,बंदर,घाट,यमुना का किनारा,गलियां,वहां के लोगों की बेबाक भाषा,गालियां, अनौपचारिकता, औरतों का बिंदास भाव मुझे बहुत अच्छा लगता है।चलते -फिरते मथुरा को जितना मैं देखकर समझ पाया हूँ उसमें मुझे एक नए किस्म की मानुषगंध मिलती है।

मथुरा पहले की तुलना में स्मार्ट हो गया है।वहां के लोग पहले की तुलना में ज्यादा आधुनिक बने हैं,बदले हैं,खासकर स्त्रियां तो पहचानने में ही नहीं आतीं।इन दिनों आधुनिकता के परिवर्तनों ने मथुरा की युवा लड़कियों को बहुत ही आकर्षित किया हुआ है।

पुराने शहर के बाहर विशाल नया मथुरा,नयी रिहाइश वाला मथुरा बस गया है। दिलचस्प बात है मथुरा की गंध, पुराने शहर के अंदर ही महसूस कर सकते हैं।पुरानी गलियों में ही पुराने शहर की भाषा ,गंदी नालियों,बंदरों आदि को देखकर महसूस कर सकते हो।

मेरी दिली ख्बाहिश है मथुरा की गलियों और उनकी जीवंतता के वैविध्य पर जमकर लिखूँ।हर गली की अपनी विशेषता है,वहां के रहने वाले लोगों की अपनी निजी विशेषताएं भी हैं।मथुरा के बाहर रहते हुए मथुरा का मर्म धीरे धीरे मन से खिसक गया है।ब्रजभाषा बोल नहीं पाता,वहां जाने पर दो-तीन दिन रहने पर ब्रजभाषा बोल पाता हूँ।

ब्रजभाषा का सुख मथुरा का सबसे बड़ा सुख है।बाहर रहते हुए मुझे रोज एक-दो ब्रजभाषा कविता पढ़ने की आदत पड़ गयी,इस आदत को मैंने सचेत रूप से विकसित किया,जिससे मैं मथुरा से जुड़ा रहूँ।मथुरा में बड़ी संख्या में पुराने मित्र भी हैं जो बार-बार याद आते हैं।लेकिन मथुरा को हमेशा भाषा में ही पाता हूँ,वहां जाता हूँ तो भाषा सुनने में मजा लेता हूँ।

मैंने अपने अनुभव से यही सीखा है कि यदि किसी शहर को पाना है तो वहां के लोगों को देखो और आत्मीयता से वहां की भाषा सुनो,शहर आपके मन में उतरता चला जाएगा।



कोलकाता में 27साल से रह रहा हूँ और यहां पर मैंने बोलचाल की बंगला भाषा के जरिए बंगाल को महसूस किया है, घर से जब पढाने जाता हूँ तो रास्ते में बंगला में लोगों की बातें सुनते हुए बंगाल को पाता हूँ,उसी क्रम में बंगला का आस्वाद विकसित हुआ,बंगला समझने की क्षमता पैदा हुई।यहां तक कि नए बंगला शब्दों को भी मैंने बोलचाल की बंगला के जरिए ही अर्जित किया,सीखा।असल में जीवन तो भाषा से ही व्यक्त होता है।

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

कश्मीर में बुरहान वानी कैसे बनता है !

            कश्मीर पर ठंडे दिमाग से सोचने की जरूरत है,उग्रभाषा,मैं-तुम में विभाजित करके देखने से बचें। इकतरफा प्रचार ,निहितस्वार्थ और झूठ से बचें। इससे तनाव में इजाफा हुआ है। समस्या यह है कि पुलिसबल या खुफियातंत्र किसी भी झूठी खबर पर कार्रवाई करके जब किसी निर्दोष को मार दे तब जनता क्या करे ॽ मारे गए निर्दोष व्यक्ति के रिश्तेदार क्या करें ॽ राज्य में इस तरह की प्रशासनिक संरचनाएं नहीं हैं जो इन शिकायतों पर ध्यान दें। आज भी कश्मीर में सैंकड़ों निर्दोष नौजवानों की मौत को लेकर संदेह है जिनको पुलिस ने आतंकवादी होने के संदेह में मार दिया। राज्य सरकार से लेकर केन्द्र सरकार तक,यहां तक कि अदालतों तक से इस तरह के लोगों को न तो न्याय मिला और न मुआवजा। मसलन्,हाल की हिंसा में मारे गए 31लोग कम से कम आतंकवादी नहीं हैं।इस तरह के कश्मीर में बड़ी संख्या में और भी लोग मारे गए हैं।

कश्मीर पर जब भी बात हो तो कश्मीर के नजरिए से हो,मानवीय नजरिए से हो।उस तरह की प्रशासनिक संरचनाओं का निर्माण किया जाय जहां पीड़ित लोग निर्भय होकर अपनी तकलीफों को कह सकें और उस पर राज्य प्रशासन गंभीरता से कार्रवाई करे।पिछले दिनों राज्य सरकार ने पत्थरबाजी की घटनाओं में शामिल युवाओं के ऊपर चल रहे मुकदमों के बारे में फैसला लिया था,यह एक सही फैसला था।इसी तरह अन्य केसों पर भी सहानुभूति के साथ विचार करके युवाओं पर चल रहे मुकदमे तुरंत खत्म करने की दिशा में कदम उठाने की जरूरत है।वहां के युवा तेजी से सामाजिक विकास में सक्रिय भूमिका निभाएं और आतंकी समूहों से अलग रहें इसके लिए जरूरी है कि युवाओं को विभिन्न किस्म की विकास योजनाओं में शामिल करने के बारे में पहल की जाय ,सस्ते ब्याज पर नए कारोबार शुरू करने के लिए राष्ट्रीयकृत बैंकों से कर्ज मुहैय्या कराया जाय.

बुरहान वानी फिनोमिना से सबक लेने की जरूरत है। इन दिनों कश्मीर के युवाओं में आतंकी-पृथकतावादी संगठन हथियारों के जरिए नहीं विचारों और सामाजिकीकरण के जरिए स्वीकृति बनाने में लगे हैं।स्थानीय स्तर पर वे साइबर तकनीक और सामाजिक संबंधों के सहमेल के जरिए अपना जनाधार बना रहे हैं। दिलचस्प बात यह है पुलिस और सेना चप्पे -चप्पे पर लगी है लेकिन युवाओं में काम कर रहे आतंकी उनको नजर नहीं आ रहे। बुरहान वानी के चरित्र का चिन्ताजनक पहलू यह है कि वह हथियार से नहीं साइबर संपर्क के जरिए युवाओं को बांधे था। कश्मीर के युवाओं में लोकतांत्रिक आकांक्षाएं हैं और वे बड़े पैमाने पर उसे सोशलमीडिया आदि के जरिए व्यक्त कर रहे हैं,उनके स्थानीय स्तर पर समूह बने हुए हैं जो एक-दूसरे से जोड़ते हैं।कश्मीर के इन युवाओं का दिल जीतने के लिए आरएसएस मार्का साइबर प्रचार अपील नहीं कर सकता।उलटे उनके मन में भय-आशंका और अनास्था पैदा करता है। आरएसएस के लोग साइबर जगत में अपने साम्प्रदायिक लेखन के दूरगामी प्रभावों से अनजान हैं यह तो नहीं कह सकते।लेकिन उनके साइबर प्रचार अल्पसंख्यक,आदिवासी युवक आतंकित और चिन्तित हैं।मोदीजी कश्मीर को लेकर कितने फिक्रमंद हैं इसका अंदाजा उनके कश्मीर प्रचार से कर सकते हैं। मोदीजी के साइबर समूह की ओर से विगत दो सालों में कश्मीर के संदर्भ में कोई भी सकारात्मक प्रचार अभियान साइबर जगत में नहीं चलाया गया। इसके विपरीत आरएसएस के लोग बेगानों की तरह कश्मीर पर अ-यथार्थपरक टिप्पणियां करते रहते हैं,भाजपा और आरएसएस के जो लोग मीडिया से लेकर साइबर तक लिख रहे हैं वे जरा गंभीरता से सोचें कि बुरहान जैसा नौजवान स्थानीय स्तर पर साइबर के जरिए अपील बना लेता लेकिन मोदीजी या आरएसएस के किसी नेता की कश्मीर के युवाओं में कोई साइबर अपील नहीं है।जबकि सच यह है आरएसएस सबसे संगठित साइबर संगठन है।उसके प्रचार में कश्मीर कहीं पर भी नहीं है यदि चुनाव के मौके पर साइबर प्रचार नजर भी आया तो वह सिर्फ वोटों तक सीमित था।

इसके विपरीत बुरहान वानी ने मात्र साइबर प्रचार के जरिए अपने को युवाओं में जनप्रिय बना लिया,उसने स्थानीय स्तर पर इस तरह का संगठन खड़ा कर लिया जो उसके विचारों से सहमत युवाओं से भरा है ,यानी बिना बंदूक चलाए विचारों के जरिए उसने युवाओं को आतंकी संगठन के पीछे अपने सामान्य कम्युनिकेशन के जरिए जोड़ लिया। यह सच है बुरहान का आतंकी संगठन से संबंध था,मीडिया रिपोर्ट और स्थानीय पुलिस के बयान बताते हैं कि उसने कभी कोई एक्शन में भाग नहीं लिया,उसका नाम था,इसी बिना पर उसके ऊपर दस लाख का इनाम पुलिस ने घोषित कर दिया।



पहलीबार एक ऐसा आतंकी सामने आया है जिसने गोली नहीं चलाई लेकिन इलाके के लोगों का दिल जीत लिया,उसने बंदूक के भय के बिना,मात्र विचारों और संचार के जरिए अपने लिए स्थानीय जनता के दिलों में जगह बना ली।इससे हम साफ समझें कि विचारों की ताकत बंदूक की ताकत से ज्यादा प्रभावशाली होती है।यही वह बिंदु है जिसे समझने की जरूरत है। कश्मीर बदलने के लिए जरूरी है कश्मीर के बारे में पहले विचार बदलो।

सोमवार, 11 जुलाई 2016

मध्यवर्गीय सामाजिक संकीर्णतावाद और उग्रवाद

         भारतीय मध्यवर्ग में सामाजिक संकीर्णतावाद इन दिनों चरम पर है। हर रंगत,जातीयता और धर्म के लोगों में इसे सहज ही देख सकते हैं। मध्यवर्ग में यह संकीर्णतावाद सबसे पहले सामाजिक आचार-व्यवहार में दाखिल हुआ,बाद में उसने राजनीति में अपने को अभिव्यक्त किया।मध्यवर्ग के जो लोग सामाजिक संकीर्णतावाद को पालते-पोसते रहे हैं,वे ही राजनीति में साम्प्रदायिक-उग्रवादी-आतंकी-पृथकतावादी भावों –विचारों की ओर मुखातिब हुए। यही वह मध्यवर्ग है जिसने बडे पैमाने पर विभिन्न रंगत के उग्रवादी राजनीतिक रूझानों को सामाजिक आधार प्रदान किया। जो लोग यह सवाल कर रहे हैं कि शिक्षित परिवारों के बच्चे आईएस में कैसे जा रहे हैं ॽ वे जरा गौर करें सभी किस्म के उग्रवादी राजनीतिक विचारों को इसी वर्ग के युवाओं ने अपनाया।उग्रवादी विचारों की ओर मध्यवर्ग के युवाओं का रूझान सामाजिक संकीर्णतावाद की स्वाभाविक राजनीतिक प्रतिक्रिया है।इसी वर्ग के युवाओं को हमने देश के विभिन्न पृथकतावादी ,साम्प्रदायिक और आतंकी संगठनों में बड़ी संख्या में उत्तर- पूर्व के राज्यों से लेकर पंजाब तक,कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक देखा है।मिलिटेंसी वस्तुतःमध्यवर्गीय सामाजिक संकीर्णतावाद की राजनीतिक अभिव्यक्ति है।आज वही सबसे बड़ा हिन्दुत्ववादी है जो सामाजिक संकीर्णतावादी है।

आजाद भारत में मध्यवर्ग में सामाजिक संकीर्णतावाद सबसे पहले बंगाली जाति में दाखिल हुआ और यही वजह है कि सबसे पहले नक्सलवाडी आंदोलन में उसने अपने को अभिव्यक्त किया,बंगाली जाति विचारों और सामाजिक संस्कारों में उदार थी,इस उदारता को सबसे गहरी चुनौती नक्सलवाड़ी ने दी,बंगाल के नवोदित आजाद मध्यवर्ग के युवाओं के एक बड़े वर्ग ने सभी किस्म के उदारतावादी विचारों और राजनीति को ठुकराते हुए नक्सलवाड़ी का रास्ता चुना इसके कारण बड़े पैमाने पर बंगाली युवा तबाह हुआ,सैंकड़ों युवाओं को एनकाउंटर और राजनीतिक मुठभेड़ों के जरिए मौत के घाट उतार दिया गया।अफसोस की बात है कि हमने मध्यवर्ग के अंदर पनप रहे सामाजिक संकीर्णतावाद को कभी प्रमुख मुद्दा ही नहीं बनाया।

      आज स्थिति यह है कि बंगाली मध्यवर्ग पूरी तरह क्षत-विक्षत अवस्था में है।उसने अपराधीदलों के सामने पूरी तरह समर्पण कर दिया है।जिन इलाकों में क्रांति थी वहां माफिया वर्चस्व है।नक्सलवाडी तस्करी का केन्द्र है। तमाम किस्म के दो नम्बरी कामों में मध्यवर्ग का बहुत बड़ा हिस्सा फंसा पड़ा है। चिटफंड का धंधा,जबरिया पैसा वसूली, राजनीतिक आतंक, बाल विवाह,स्त्री शिक्षा का अभाव,औरतों की बिक्री, मध्यवर्ग का पलायन,सलासी खाप पंचायतों के उत्पीडन, नवोदित मध्यवर्गीय नेपाली जाति में उग्रवादी रूझान,तमाम किस्म अंधविश्वासों और संतों की बाढ़ आदि इसके व्यापक फलक को समेटे हैं। इन सबका ग्राफ क्रमशःबढ़ा है।बंगाली जाति की समूची भद्र अस्मिता का अब लंपट –उग्रवादी अस्मिता में रूपान्तरण हो चुका है।अफसोस की बात है बंगाल में इस सबको कभी चुनौती नहीं दी गयी।इसका दुष्परिणाम यह निकला है कि बंगाली जाति को आज कोई पहचान ही नहीं सकता।उसकी अस्मिता को संकीर्णतावाद के दुर्गुणों ने हजम कर लिया है। इन दुर्गुणों को बंगाली मध्यवर्ग के बुद्धिजीवियों ने कभी चुनौती नहीं दी,यहां तक कि अखबारों में कभी इन समस्याओं पर गंभीरता से लेख तक नहीं लिखे गए।

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