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October, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हेकड़ी,अहंकार और फेसबुक

इस दौर में हेकड़ी बढ़ी है। भ्रष्टनेता से लेकर ईमानदार नौकरशाह तक सबमें हेकड़ी का विकास हुआ है। सामान्य कारिंदे से लेकर भिखारी तक सब हेकड़ी में बातें करते हैं। हेकड़ी को नव्यआर्थिक उदारीकरण ने नई बुलंदियों पर पहुँचाया है। पहले हम कभी इतने हेकड़ीबाज तो न थे। 

यहां हेकड़ी और अहंकार के नए रूप के फेसबुक के संदर्भ में नौ लक्षण नजर आ रहे हैं-

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चूंकि मुझे फोन आया या ईमेल अतः मैं हूँ। यानी मोबाइल फोन या ईमेल आपको मैं का एहसास कराते हैं। व्यक्तिवाद में इजाफा करते हैं।

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सुनियोजित आत्मप्रेम में वृद्धि हुई है। यह स्वाभाविक और सही दिशा है।

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फेसबुक-ब्लॉगिंग के आने के बाद सामान्यजन और लेखक के बीच जो अहं का अंतर था वह खत्म हो गया है। फेसबुक ने सभी में लेखकीय अहं पैदा किया है।

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इंटरनेट के पहले लेखकीय गरिमा थी,फेसबुक के साथ लेखकीय समर्पण का भावबोध प्रबल हुआ है। इसके कारण प्रतिवादी कम और सरेण्डर करने वाले विचार और प्रचार का वर्चस्व दिखाई देता है।

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फेसबुक ने लेखकीय अहंकार और अनुभूति द…

सिंगूरग्रंथि और ममता की चौदह घंटे की चुप्पी

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सिंगूर–माकपा-मीडिया-पूंजीपतिग्रंथि ने पश्चिम बंगाल को पंगु बना दिया है। कमोबेश सभी दल इसकी गिरफ्त में हैं। राज्य के विकास और सांस्कृतिक उन्नयन के लिए जरूरी है कि इन चारों ग्रंथियों से राज्य को निकाला जाय। दुर्भाग्य की बात यह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इनमें कैद हैं। ममता के मार्ग में पग-पग पर ये ग्रंथियां बाधा बनकर खड़ी हुई हैं। राज्य के मुखिया के नाते उनका इन चारों ग्रंथियों से मुक्त होकर प्रशासन चलाना बेहद जरूरी है। 
पश्चिम बंगाल का दुर्भाग्य है कि पहले वामशासन बुर्जुआग्रंथि से ग्रस्त था और उन तमाम चीजों को रोक रहा था जिनका पूंजीपतिवर्ग से संबंध है। ममता के शासन में आने पर यह लग रहा था कि राज्य प्रशासन को राजनीतिक ग्रंथियों से मुक्ति मिलेगी। लेकिन अब तक का अनुभव बताता है कि राज्य प्रशासन पहले से चली आ रही बुर्जुआग्रंथि से अभी तक मुक्त नहीं हुआ है,उलटे प्रशासन में सिंगूर-माकपा-मीडियाग्रंथि ने वायरस की तरह प्रसार कर लिया है।

प्रशासन में ग्रंथियां पूर्वाग्रह पैदा करती हैं और सहज-त्वरित फैसले से रोकती हैं। ममता को यदि सही मायने में राज्य के प्रभावशाली मुखिया की भूमिका अदा करनी …

अरविन्द केजरीवाल एंड कंपनी का न्यूज रियलिटी शो और फेसबुक

मजेदार मीडियागेम चल रहा है अरविन्द केजरीवाल एंड कंपनी के आरोपों पर खुर्शीद जांच को तैयार हैं,आज गडकरी भी तैयार हैं। असल में परंपरागत दलों में इतनी समझदारी विकसित हो गयी है कि जांच से उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। 

केजरीवाल भी जानते हैं आरोपों से इन नेताओं का कुछ नहीं बिगड़ेगा। क्योंकि मीडिया-मीडियागेम हो रहा है। जनता में इन आरोपों पर लामबंदी नहीं हो रही । नेता मीडिया से नहीं जनता से डरते हैं केजरीवालजी। केजरीवाल तो समाचार चैनलों के रीयलिटी शो हो गए हैं।

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टीवी न्यूज चैनलों के रियलिटी टीवी शो का अन्ना हजारे पहला गेम शो थे। बाबा रामदेव दूसरा रियलिटी शो थे। अरविन्द केजरीवाल एंड कम्पनी अन्नाटीम के भंग होने के बाद तीसरा रियलिटी टीवी शो चला रहे हैं। ऐसे अभी कम से कम 100 शो आने वाले हैं। समाचार चैनलों को प्राइमटाइम शो का मुफ्त में किरदार मिल गया है। यह ऐसा नेता है जो आमिरखान की तरह ही शो करेगा, कभी कभी जनता में और अधिकतर टीवी स्टूडियो में या प्रेस कॉफ्रेस में मिलेगा।

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मीडिया रियलिटी शो वालों ने अन्ना की हाइप पैदा की,वे गायब हो गए.जैसे रामायण स…

जंगीपुर की जीत एफ.डी.आई के लिए हरी झंडी--जगदीश्वर चतुर्वेदी

जंगीपुर लोकसभा उपचुनाव में कॉग्रेस प्रत्याशी अभिजीत मुखर्जी की 2536 वोटों से जीत हुई है।यह जीत कई मायनों में महत्वपूर्ण है।पहली चीज़ यह कि यहां लेफ्ट,टीएमसी और बीजेपी तीनों ही एफडीआई का विरोध कर रहे हैं,ऐसे में अभिजीत मुखर्जी का जीतना सामान्य घटना नहीं है।कॉग्रेस जिस तरह के अलगाव की स्थिति में थी इस जीत ने जनता के साथ उसके अलगाव को तोड़ने का काम किया है।अभिजीत मुखर्जी का यह कहना सही है कि कॉग्रेस के 60-70 हजार के करीब वोटर उनकी कॉन्स्टीट्यूनसी से माइग्रेट होकर बाहर जा चुके थे और लौटकर वापस नहीं आए,इस कारण कॉग्रेस की जीत का मार्जिन घटा है।इस जीत का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि कॉग्रेस स्वतंत्र रुप से अपनी पहचान को पुनः अर्जित करने में सफल हुई है।तीसरी महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि टीएमसी का यह मिथ टूटा है कि उसके समर्थन के बिना कॉग्रेस की जीत नहीं हो सकती।यह सच है कि लेफ्ट के वोटों के प्रतिशत में इजाफा हुआ है,लेकिन सच यही है कि वाम उम्मीदवार की हार हुई है।चौथा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि इस चुनाव में टीएमसी ने अप्रत्यक्ष तौर पर बीजेपी को अपने वोट ट्रांसफर किये हैं और बीजेपी ने जंगीपुर इल…

10 अक्टूबर रामविलास शर्मा के जन्मदिन पर विशेष - अस्मिता,आत्मकथा , हिन्दी जाति और रामविलास शर्मा (3 ) समापन किश्त

जीवनी –“ निराला की साहित्य साधना” तीन खण्डों में है। पहले खंड़ में व्यक्तित्व विवेचन है। दूसरे में उनकी विचारधारा और कला का विवेचन है और तीसरे खंड में उनके जीवन और साहित्य से संबंधित सामग्री और पत्र हैं। प्रकाशन वर्ष है सन् 1969। रामविलास शर्मा ने पहले खंड में लिखा है, “ यह पुस्तक मुख्यतः उनके साहित्य की आलोचना नहीं है। निराला के पारिवारिक,सामाजिक परिवेश से ,उस युग की सांस्कृतिक परिस्थितियों से, उनके जीवन के बाह्य रूपों के साथ उनके अन्तर्जगत् से पाठकों को परिचित कराना मेरा उद्देश्य है।”

समूची जीवनी धारावाहिक रूप में विकसित होती है और रामविलास शर्मा ने बड़े ही कौशल के साथ व्यक्तिगत को सामाजिक और सामाजिक को व्यक्तिगत में रूपान्तरित होते हुए दिखाया है। लेखक के अंतर्मन और सामाजिक अभिव्यक्ति के रूपों में सामंजस्य बिठाने की कोशिश की है। इस क्रम वे निराला को निज जगत से बाहर निकालते हैं। देसी ठाट, अनुभूतियां, गुण-अवगुण, मनोदशा,वातावरण,जनसमुदाय के बीच में रखकर निराला के व्यक्तित्व का वर्णन करते हैं।



निराला की जीवनी को पाठक आराम से नहीं पढ़ सकता। यह जीवनी विचलित, उद्वेलित और उत्तेजित कर…

10 अक्टूबर रामविलास शर्मा के जन्मदिन पर विशेष - अस्मिता,आत्मकथा , हिन्दी जाति और रामविलास शर्मा (2)

आत्मकथा का पद्धतिशास्त्र- 

इन दिनों अस्मिता साहित्य के कई रूप प्रचलन में इन तमाम प्रवृत्तियों का बहुराष्ट्रीय बुर्जुआ विचारधारा से गहरा संबंध है। नई अस्मिता संस्कृति आमलोगों में 'निजी संतुष्टि' की भावना पैदा कर रही है। आम लोगों से कहा जा रहा है 'निजी संतुष्टि' पर ध्यान दें। 'निजी संतुष्टि' की भावना ने नागरिकबोध और नागरिकचेतना को कमजोर बनाया है।' निजी संतुष्टि' के नाम पर उपभोक्ता की स्वतंत्रता की बातें कही जा रही हैं। 

'निजी संतुष्टि' पर आधारित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर साहित्य में इनदिनों आत्मकथाओं की बाढ़ आ गयी है। 'निजी संतुष्टि' का सामाजिक मूल्यों के तानेबाने के साथ गहरा अन्तर्विरोध है। अनेक मामलों में आत्मकथाओं के विवरण और ब्यौरे नैतिक तौर पर अपमानजनक चीजों को पेश करते हैं। खासकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजी संतुष्टि की धारणा की आड़ में व्यक्ति के एकाकी भावबोध को खूब बढ़ावा दिया जा रहा है। यह ग्लोबलाइजेशन का ग्लोबल फिनोमिना है। यह ऐसे व्यक्ति की आत्मकथा है जो निजी तौर पर किसी विचार या विचारधारा से बंधा नहीं है। इस…

10 अक्टूबर रामविलास शर्मा के जन्मदिन पर विशेष - अस्मिता,आत्मकथा , हिन्दी जाति और रामविलास शर्मा (1)

हिन्दी साहित्य में रामविलास शर्मा अस्मिता विमर्श के सबसे बड़े आलोचक हैं। हिन्दी में अस्मिता विमर्श स्त्रीसाहित्य और दलित साहित्य से आरंभ नहीं होता बल्कि रामविलास शर्मा के हिन्दी जाति विमर्श से आरंभ होता है। हिन्दी जाति की अवधारणा अस्मिता विमर्श का हिस्सा है और इस पर कोई बहस अस्मिता साहित्य के परिप्रेक्ष्य में ही की जानी चाहिए। एक अन्य चीज समाजवादी पहचान की खोज का क्षेत्र भी इसके दायरे में आता है। रामविलास शर्मा ने समाजवाद के पक्ष में जो कुछ भी लिखा है वह भी मूलतःअस्मिता विमर्श के परिप्रेक्ष्य में लिखा है। वे वर्ग की अवधारणा के आधार सोचते हैं इससे यह समझ बनती है कि वे मार्क्सवादी हैं ,लेकिन इस प्रसंग में हम याद रखें कि वे वर्ग को अस्मिता के रूप में ही पेश करते हैं।कायदे से अस्मिता पर नहीं “अस्मिता साहित्य” की अवधारणा पर विचार करना चाहिए। इससे अस्मिता विमर्श पर समग्रता में विचार करने में सुविधा होगी। इससे नए पैदा हुए निजी और सार्वजनिक स्पेस को परिभाषित करने में मदद मिलेगी। 

आत्मकथा- 

 आत्मकथा इन दिनों फैशन में है। इसने पाठकों में 'अन्य 'के जीवन को जानने का आब्शेसन भी पैदा किया …

सिनेमाभाषा के नायक हैं अमिताभ

अमूमन अभिताभ बच्चन की अभिनयकला पर कम उनके संवाद शैली पर ज्यादा बातें होती हैं। इसी तरह कंटेंट में एंग्री यंगमैन प्रमुख है। एंग्री यंगमैन से लेकर कौन बनेगा करोड़पति तक अमिताभ की साझा इमेज की धुरी है रीयल हिन्दी भाषा। एंग्री यंगमैन की इमेज को उन्होंने विगत 20 सालों में सचेत रूप से बदला है और कन्वेंशनल पात्रों की भूमिका निभायी है। कन्वेंशनल चरित्रों वे संरक्षक-अभिभावक के रूप में सामने आए।यह एंग्रीयंग मैन की बागी इमेज से एकदम उलट इमेज है। वहीं पर कौन बनेगा करोड़पति में उनका व्यक्तित्व इन दोनों से भिन्न नजर आता। इसमें अमिताभ बच्चन उदार मित्र के रूप में सामने आते हैं यह ऐसा उदार व्यक्ति है जिसके लिबरल विचारों और हाव-भाव को सहजता के साथ महसूस कर सकते हैं।एंग्री यंगमैन को पीड़ितजन,कन्वेंशनल को परंपरागत लोग और कौन बनेगा करोड़पति की इमेज को युवा और औरतें बेहद पसंद करते हैं।कौन बनेगा करोड़पति में वे एंग्रीमैन एवं कन्वेंशनल चरित्र की इमेजों से भिन्न नजर आते हैं। 

असल में इन तीनों में साझा तत्व है उनकी बेहतर संवादशैली और हिन्दी भाषा पर अद्भुत मास्टरी।हिन्दी भाषा और संवादशैली के बिना अमिताभ बच्च…

फेसबुक और नवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के अनुत्तरित सवाल

नौवां विश्व हिन्दी सम्मेलन को समग्रता में देखें तो यह हिन्दी का 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला है। इससे हिन्दीसेवा कम हुई। नौकरशाही,कांग्रेस और संघ परिवार के कारिंदालेखकों -हिन्दीसैनिकों एवं सांसदों की मौजमस्ती ज्यादा हुई। 

कायदे से राजभाषा संसदीय समिति को इस सम्मेलन की गहराई में जाकर जांच करनी चाहिए और खोजी पत्रकारों को इस सम्मेलन की अंदरूनी अपव्यय गाथा को खोलना चाहिए।

हिन्दी के नाम पर यह अब तक का सबसे बड़ा घोटाला है। औसतन प्रत्येक प्रतिभागी पर 3-5लाख रूपये का खर्चा आया है ।इसके आयोजन पर करोड़ों रूपये पानी की तरह बहाए गए हैं। वह भी एक ऐसे देश में जिसमें हिन्दी का व्यवहार कुछ हजारलोग करते हैं।

हिन्दी का यह 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला है।इस घोटाले में शामिल लोग बार बार और जल्दी जल्दी इस तरह के सम्मेलन(घोटाले) की मांग कर रहे हैं। साहित्य में प्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक फ्रेडरिक जेम्सन के शब्दों में यह सांस्थानिक भ्रष्टाचार है। इसका नव्य आर्थिक उदारीकरण से गहरा संबंध है।

डीडी न्यूज पर अभी ( 7अक्टूबर 12) रिपोर्ट दिखाई गई उसमें विचार विमर्श के सत्रों और विभिन्न विद्वानों के विचारों की झलकियां तक दिखाना जरू…