मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012

हेकड़ी,अहंकार और फेसबुक

इस दौर में हेकड़ी बढ़ी है। भ्रष्टनेता से लेकर ईमानदार नौकरशाह तक सबमें हेकड़ी का विकास हुआ है। सामान्य कारिंदे से लेकर भिखारी तक सब हेकड़ी में बातें करते हैं। हेकड़ी को नव्यआर्थिक उदारीकरण ने नई बुलंदियों पर पहुँचाया है। पहले हम कभी इतने हेकड़ीबाज तो न थे। 

यहां हेकड़ी और अहंकार के नए रूप के फेसबुक के संदर्भ में नौ लक्षण नजर आ रहे हैं-

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चूंकि मुझे फोन आया या ईमेल अतः मैं हूँ। यानी मोबाइल फोन या ईमेल आपको मैं का एहसास कराते हैं। व्यक्तिवाद में इजाफा करते हैं।

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सुनियोजित आत्मप्रेम में वृद्धि हुई है। यह स्वाभाविक और सही दिशा है।

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फेसबुक-ब्लॉगिंग के आने के बाद सामान्यजन और लेखक के बीच जो अहं का अंतर था वह खत्म हो गया है। फेसबुक ने सभी में लेखकीय अहं पैदा किया है।

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इंटरनेट के पहले लेखकीय गरिमा थी,फेसबुक के साथ लेखकीय समर्पण का भावबोध प्रबल हुआ है। इसके कारण प्रतिवादी कम और सरेण्डर करने वाले विचार और प्रचार का वर्चस्व दिखाई देता है।

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फेसबुक ने लेखकीय अहंकार और अनुभूति दोनों की विदाई कर दी है। अब आप फेसबुक पर बिना किसी अहंकारबोध के साथ लिखें,लेखन को समर्पित करें और आनंद लें।

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लेखक और फेसबुकिए में एक साम्य है दोनों जल्द ही मूल्यनिर्णय करने लगते हैं। मूल्य निर्णय से बचना चाहिए।

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फेसबुक ने अहंकाररहित कम्युनिकेशन को संभव बनाया है। बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा व्यक्ति सहजभाव से अपनी बात कहकर खिसक लेता है। अहंकारहित कम्युनिकेशन जीवन का परमानंद है।

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फेसबुकिए की अपमानजनक या गंदी टिप्पणी पर अमूमन हम नाराज होते हैं, उसे ब्लॉग कर देने का विकल्प भी है, इससे यह धारणा भी बनती है कि फेसबुकिए के अहंकार का अभी तक पूरी तरह खात्मा नहीं हुआ है बल्कि फेसबुक ने नए किस्म का अहंकारबोध पैदा किया है।

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फेसबुकिए हेकड़ीबाज की विशेषता है कि वह अर्थ का अनर्थ करने और विषयान्तर करने में सिद्धहस्त होता है और एकदम असहिष्णु होता है।

रविवार, 28 अक्तूबर 2012

सिंगूरग्रंथि और ममता की चौदह घंटे की चुप्पी


सिंगूर–माकपा-मीडिया-पूंजीपतिग्रंथि ने पश्चिम बंगाल को पंगु बना दिया है। कमोबेश सभी दल इसकी गिरफ्त में हैं। राज्य के विकास और सांस्कृतिक उन्नयन के लिए जरूरी है कि इन चारों ग्रंथियों से राज्य को निकाला जाय। दुर्भाग्य की बात यह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इनमें कैद हैं। ममता के मार्ग में पग-पग पर ये ग्रंथियां बाधा बनकर खड़ी हुई हैं। राज्य के मुखिया के नाते उनका इन चारों ग्रंथियों से मुक्त होकर प्रशासन चलाना बेहद जरूरी है। 

पश्चिम बंगाल का दुर्भाग्य है कि पहले वामशासन बुर्जुआग्रंथि से ग्रस्त था और उन तमाम चीजों को रोक रहा था जिनका पूंजीपतिवर्ग से संबंध है। ममता के शासन में आने पर यह लग रहा था कि राज्य प्रशासन को राजनीतिक ग्रंथियों से मुक्ति मिलेगी। लेकिन अब तक का अनुभव बताता है कि राज्य प्रशासन पहले से चली आ रही बुर्जुआग्रंथि से अभी तक मुक्त नहीं हुआ है,उलटे प्रशासन में सिंगूर-माकपा-मीडियाग्रंथि ने वायरस की तरह प्रसार कर लिया है।

प्रशासन में ग्रंथियां पूर्वाग्रह पैदा करती हैं और सहज-त्वरित फैसले से रोकती हैं। ममता को यदि सही मायने में राज्य के प्रभावशाली मुखिया की भूमिका अदा करनी है तो उसे इन चारों ग्रंथियों से मुक्त होना होगा। ग्रंथियां एकाकी मन और राजनीतिकदल को नकारात्मक दिशा में सक्रिय रखती हैं। ग्रंथियां हाइपर एक्टिव रखती हैं। ममता से लेकर माकपा तक सबमें यह हाइपर सक्रियता सहज ही देखी जा सकती है।

हाल ही ममता की सिंगूर -मीडियाग्रंथि का नया रूप सामने आया है जो निश्चित रूप से चिंता की बात है। बांग्ला के प्रसिद्ध साहित्यकार सुनील गंगोपाध्याय का 23 अक्टूबर को जब आकस्मिक निधन हुआ तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को शोक व्यक्त करने में चौदह घंटे से ज्यादा समय लगा। वैसे निजी तौर पर वे इसके लिए स्वतंत्र हैं कि वे कब शोक व्यक्त करें या शोक व्यक्त न करें,लेकिन एक मुख्यमंत्री के नाते उनके पास यह स्वतंत्रता नहीं है।

राजनीतिक हलकों में ममता बनर्जी को स्वतःस्फूर्त्त प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले राजनेता के रूप में जाना जाता है। लेकिन सुनील गंगोपाध्याय की मृत्यु पर मुख्यमंत्री के शोकसंदेश का चौदह घंटे तक न आना स्वयं में चिन्ता की बात है,साथ ही यह राज्य प्रशासन की मनोदशा की भी अभिव्यक्ति है। चौदह घंटे बाद अचानक फेसबुक पर ममता ने शोकसंदेश पोस्ट किया।

सवाल उठता है मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुनील गंगोपाध्याय के घर जाकर शोक व्यक्त क्यों नहीं किया ? किसी संदेशवाहक के जरिए तत्काल शोकसंदेश उनके घर क्यों नहीं भेजा ? ममता इतने समय तक क्या कर रही थीं ? वे किसी राजनीतिक काम में व्यस्त थीं ? किसी प्रशासनिक काम में घिरी हुई थीं ? उनको किसी सलाहकार ने मना किया कि शोकसंदेश मत दो या ममता ने स्वयं ही इतना समय लिया ? ममता को इन सवालों का जबाव देना होगा। सच यह है कि ममता न तो किसी राजनीतिक काम में व्यस्त थीं और न किसी उधेडबुन में घिरी थीं।बल्कि ममता अपने ही मन में सिंगूर -मीडियाग्रंथि के आधार पर सुनील गंगोपाध्याय की मौत को देख रही थीं। उनके लिए सुनील ‘अपने’ नहीं ‘उनके’ (माकपा) लेखक थे। सच यह है सुनील गंगोपाध्याय सामान्य लेखक नहीं थे,उनको बांग्ला साहित्य के साथ बांग्ला जाति की पहचान के रूप में सारे देश में प्रतिष्ठा हासिल थी। उन्होंने 200 से ज्यादा किताबें लिखी हैं। राज्य में बांग्ला भाषा आंदोलन के प्रतिष्ठाताओं में से एक थे। उनका मानना था आम बंगाली अपनी भाषा में पढ़े ,लिखे और दैनंदिन जीवन में उसका व्यवहार करे। वे बांग्ला में अंग्रेजी शब्दों के व्यवहार के विरोधी नहीं थे। उनका मानना था कि भाषा के चालू शब्द मिलते हों तो अंग्रेजी के शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए। सुनील गंगोपाध्याय ने जो सामाजिक-राजनीतिक स्वीकृति अर्जित की थी वह कम लेखकों को नसीब होती है। वे सबके चहेते थे। वे राज्य में नेताओं पर अंकुश का काम करते थे। उन्होंने सत्ता की निरंकुशता की हमेशा तीखी आलोचना की। वे ममता बनर्जी की नीतियों के कटु आलोचक भी थे,सिंगूर आंदोलन के समय उन्होंने वाम सरकार का साथ दिया था और ममता के आंदोलन की आलोचना की थी। ममता की सारी मुश्किलें इसी सिंगूर ग्रंथि से जुड़ी हैं।इस सिंगूरग्रंथि के कारण ही ममता को शोक व्यक्त करने में चौदह घंटे लगे। ममता का 14 घंटे तक चुप रहना,बाद में फेसबुक पर संदेश देना, ममता का उनके घर जाकर तत्काल दुख व्यक्त न करना और अंत में अपनी इज्जत बचाने के लिए अंतिमयात्रा में शामिल होना, बताता है कि ममता का राजनीतिक भावबोध निरंतर राज्य को पीछे ले जा रहा है।

बांग्ला टीवी चैनलों ने सुनील गंगोपाध्याय की मौत पर ममता की चुप्पी का अहर्निश प्रचार करके ममता को मजबूर किया कि वे बयान दें। वे मजबूर हुईं और उनका फेसबुक पर चौदह घंटे बाद बयान आया, कोई प्रेस रिलीज जारी न करके, शोकसंदेश को किसी के हाथों लेखक के घर न पहुँचाकर उन्होंने चुपके से फेसबुक पर पोस्ट करके अपने कर्म की इतिश्री समझ ली। लेकिन टीवी चैनल ,खासकर एबीपी आनंद टीवी चैनल शांत नहीं बैठा उसके दबाब के कारण ही ममता को सुनील गंगोपाध्याय की अंतिमयात्रा में शामिल होने के लिए मजबूर होना पड़ा।

ममता के ये सारे एक्शन एक ही तथ्य बयां करते हैं कि ममता पर बांग्ला चैनलों का तेज दबाव है और वे मजबूर होकर वे सब काम कर रही हैं जो उनको पसंद नहीं हैं। उल्लेखनीय है 21 से 24 अक्टूबर तक बांग्ला के सभी समाचारपत्र बंद थे।राज्य में ऐसा कभी नहीं हुआ। हॉकरों ने वस्तुतःहड़ताल कर दी या उनसे हड़ताल करा दी गयी। किसी भी राज्य में वेबजह 4दिन तक अखबार बंद रहने की यह विरल घटना है। इसके पीछे कौन लोग हैं उनका पर्दाफाश किया जाना चाहिए। राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह प्रेस की आजादी को सुनिश्चित बनाए। लेकिन हॉकरों की 4दिन की हड़ताल(जिसे वे पूजा की छुट्टी कह रहे हैं) ने ममता सरकार के मीडियाविरोधी रवैय्ये को एकसिरे उजागर कर दिया है। ममता सभी किस्म की हड़तालों पर बोलती रही हैं लेकिन प्रेस में जबरिया करायी गयी इस चार दिन व्यापी हड़ताल पर वे चुप रहीं। हो सकता है ममता के सलाहकार मानते हों कि कम से कम चार तक दीदी को मानसिक शांति दी जाय।लेकिन मीडियाशांत नहीं था। सुनील गंगोपाध्याय की मौत ने समूचे मीडिया को उद्वेलित रखा साथ ही ममता को भी।




















बुधवार, 17 अक्तूबर 2012

अरविन्द केजरीवाल एंड कंपनी का न्यूज रियलिटी शो और फेसबुक

मजेदार मीडियागेम चल रहा है अरविन्द केजरीवाल एंड कंपनी के आरोपों पर खुर्शीद जांच को तैयार हैं,आज गडकरी भी तैयार हैं। असल में परंपरागत दलों में इतनी समझदारी विकसित हो गयी है कि जांच से उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। 

केजरीवाल भी जानते हैं आरोपों से इन नेताओं का कुछ नहीं बिगड़ेगा। क्योंकि मीडिया-मीडियागेम हो रहा है। जनता में इन आरोपों पर लामबंदी नहीं हो रही । नेता मीडिया से नहीं जनता से डरते हैं केजरीवालजी। केजरीवाल तो समाचार चैनलों के रीयलिटी शो हो गए हैं।

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टीवी न्यूज चैनलों के रियलिटी टीवी शो का अन्ना हजारे पहला गेम शो थे। बाबा रामदेव दूसरा रियलिटी शो थे। अरविन्द केजरीवाल एंड कम्पनी अन्नाटीम के भंग होने के बाद तीसरा रियलिटी टीवी शो चला रहे हैं। ऐसे अभी कम से कम 100 शो आने वाले हैं। समाचार चैनलों को प्राइमटाइम शो का मुफ्त में किरदार मिल गया है। यह ऐसा नेता है जो आमिरखान की तरह ही शो करेगा, कभी कभी जनता में और अधिकतर टीवी स्टूडियो में या प्रेस कॉफ्रेस में मिलेगा।

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मीडिया रियलिटी शो वालों ने अन्ना की हाइप पैदा की,वे गायब हो गए.जैसे रामायण सीरियल गायब हो गया,बाबा रामदेव की हाइप पैदा की गई वे भी आंदोलन समेटकर चलते बने,अनविन्द केजरीवाल इनदिनों मीडिया हाइप के केन्द्र में हैं ये भी वैसे ही गायब होंगे जैसे आमिरखान का हाल का बहुचर्चित शो आमलोगों के बीच से गायब हुआ है। इसे मीडिया उन्माद कहते हैं और इससे मीडिया और बाजार की मंदी को तोड़ने मदद मिलती है। इस तरह की हाइप का भ्रष्टाचार पर बहुत कम असर होता है।

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कल से केजरीवाल एंड कंपनी के लोग फिर से टीवी चैनलों पर बैठे मिलेंगे और कहेंगे एक सप्ताह बाद हम फिर से फलां-फलां की पोल खोलने जा रहे हैं। गडकरी की पूर्व सूचना वे विज्ञापन की तरह वैसे ही दे रहे थे जैसे कौन बनेगा करोडपति का विज्ञापन दिखाया जाता है। कहने का अर्थ यह है कि केजरीवाल एंड कंपनी अपने प्रचार के लिए राजनीति कम और विज्ञापनकला के फार्मूलों का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। वे किसी एक मुद्दे पर टिककर जनांदोलन नहीं कर रहे वे तो सिर्फ रीयलिटी शो कर रहे हैं और हरबार नए भ्रष्टाचार पर एक एपीसोड बनाकर पेश कर रहे हैं। रियलिटी शो से करप्शन वैध बनता है।

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सार्वजनिक संपत्ति की लूट के मामले में बुर्जुआनेताओं ने भारत में बड़े-बड़े मानक बनाए हैं। केजरीवाल अच्छा कर रहे हैं कि वे आम जनता में नेताओं की संपदा का लेखा-जोखा पेश कर रहे हैं। लेकिन इस लेखा-जोखा या रहस्योदघाटन से कांग्रेस-भाजपा के जमीनी राजनीतिक समीकरण को नहीं बदल सकते। भ्रष्टाचार का बार बार उद्घाटन इस तथ्य की पुष्टि है कि नव्य-आर्थिक उदारीकरण की नीतियों की ओट में आम जनता की संपदा की खुली लूट होती रही है।

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अरविन्द केजरीवाल एंड कम्पनी के वाड्रा कवरेज से लेकर गडकरी कवरेज तक एक ही सत्य उभर रहा है कि मीडिया में विपक्ष का स्पेस हथियाने की मुहिम चल रही है और भाजपा और अन्य विपक्षीदल इस मामले में पिछड़ते जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या केजरीवाल एंड कंपनी सचमुच में जमीनी विपक्षीदल बन पाएगा या मीडियाशेर बने रहेंगे ?

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को केजरीवाल जैसे छोटे कद के नेताओं के हंगामेदार प्रचार अभियान ने बेचैन करके रख दिया है,ऊपर से वाड्रा प्रकरण पर हरियाणा सरकार के हस्तक्षेप ने नौकरशाही से लेकर आम जनता तक कांग्रेस की किरकिरी करके रख दी है। कांग्रेस आज जितनी प्रभावहीन है वैसी हाल के दशक में कभी नहीं थी। यह मनमोहन सरकार के मीडिया कु-प्रबंधन का परिणाम है।

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मनमोहन सरकार में मंत्री बेनीप्रसाद वर्मा रोचक बयानों के नेता हैं। उनका रोचक बयान आया है कि सलमान खुर्शीद के लिए 71लाख की राशि छोटी राशि है। अब मंत्री साहब की इस अक्लमंदी पर कौन बलिहारी नहीं होगा।

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अब मीडिया कवरेज से तय होगा कौन भ्रष्ट है और कौन ईमानदार है ? मीडिया मुगल मुर्गे लड़ा रहे हैं और हम सब मजे ले रहे हैं।

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टीवी चैनलों की बहसें और टॉकशो पूरी तरह पार्टी प्रवक्ताओं और वकीलों से घिरे होते हैं। इतने वकील और प्रवक्ता बीबीसी लंदन पर मैंने कभी नहीं देखे।

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इस समय एनडीटीवी पर भाजपा के नेता रविशंकर जी अपने तर्क की पुष्टि के लिए लालकृष्ण आडवाणी की डायरी में लिखे वाक्यों को प्रमाण के रूप में इस्पातकांड के संदर्भ में इस्तेमाल कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि सभी नेताओं की डायरियां राष्ट्रीय संग्रहालय के हवाले की जाएं जिससे आम लोग जान सकें कि नेता की डायरी में क्या लिखा है।

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कांग्रेस के नेता टीवी चैनल पर बोलते समय जब भाजपानेता को डियर फ्रेंड कहते हैं तो बहुत सुंदर अर्थ ध्वनि निकलती है।

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अरविंद केजरीवाल आज पहलीबार हिरासत में जेल गए हैं। यानी वे अब टीवीनेता से नेता बनने की दिशा में चल दिए हैं।

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ठंडे दिमाग से सोचें तो मनमोहन सरकार को अरविन्द केजरीवाल-अन्ना हजारे -बाबा रामदेव किसी से राजनीतिक खतरा नहीं है और न सरकार घबड़ायी हुई है। प्रधानमंत्री जितने ठंड़े पहले थे उतने ही आज हैं। यही हाल भाजपा का है। इसका प्रधान कारण है कि मीडिया उन्माद को अब राजनेता दरकिनार करना सीख गए हैं। यहां तक कि आम दर्शक भी समझ गया है कि अरविन्द केजरीवाल मीडिया हाइप पैदा कर रहे हैं।

रविवार, 14 अक्तूबर 2012

जंगीपुर की जीत एफ.डी.आई के लिए हरी झंडी--जगदीश्वर चतुर्वेदी

जंगीपुर लोकसभा उपचुनाव में कॉग्रेस प्रत्याशी अभिजीत मुखर्जी की 2536 वोटों से जीत हुई है।यह जीत कई मायनों में महत्वपूर्ण है।पहली चीज़ यह कि यहां लेफ्ट,टीएमसी और बीजेपी तीनों ही एफडीआई का विरोध कर रहे हैं,ऐसे में अभिजीत मुखर्जी का जीतना सामान्य घटना नहीं है।कॉग्रेस जिस तरह के अलगाव की स्थिति में थी इस जीत ने जनता के साथ उसके अलगाव को तोड़ने का काम किया है।अभिजीत मुखर्जी का यह कहना सही है कि कॉग्रेस के 60-70 हजार के करीब वोटर उनकी कॉन्स्टीट्यूनसी से माइग्रेट होकर बाहर जा चुके थे और लौटकर वापस नहीं आए,इस कारण कॉग्रेस की जीत का मार्जिन घटा है।इस जीत का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि कॉग्रेस स्वतंत्र रुप से अपनी पहचान को पुनः अर्जित करने में सफल हुई है।तीसरी महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि टीएमसी का यह मिथ टूटा है कि उसके समर्थन के बिना कॉग्रेस की जीत नहीं हो सकती।यह सच है कि लेफ्ट के वोटों के प्रतिशत में इजाफा हुआ है,लेकिन सच यही है कि वाम उम्मीदवार की हार हुई है।चौथा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि इस चुनाव में टीएमसी ने अप्रत्यक्ष तौर पर बीजेपी को अपने वोट ट्रांसफर किये हैं और बीजेपी ने जंगीपुर इलाके में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को जो जमीन दी गई ,उसे आधार बनाकर यह घृणित प्रचार किया कि मुसलमानों के लिए हिन्दुओं की जमीन छीनी गई और इस आधार पर हिन्दु वोटों का ध्रुवीकरण किया।इस घटना से जो बात निकल कर आ रही है वह यह है कि टीएमसी ने अपने वोट बीजेपी को ट्रांसफर कर भविष्य में पंचायत चुनाव के लिए बीजेपी को सूदूर ग्रामीण इलाकों में आधार देने का मन बना लिया है।और यह एक तरह से गाँवों में सांप्रदायिक राजनीति के विस्तार की नई योजना है।इसके खिलाफ सभी धर्मनिरपेक्ष दलों को मिलकर साझा राजनीति करनी होगी।कॉग्रेस के लिए संतोष की बात यह है कि जंगीपुर में 70% मुस्लिम वोटर हैं।पिछले चुनाव में कॉग्रेस के प्रणव मुखर्जी की जीत कॉग्रेस-टीएमसी के गठबंधन की जीत थी।हालांकि कॉग्रेस को मिले वोटों के प्रतिशत में कमी आई है,लेकिन फिर भी मिली जीत से यह पता चलता है कि कॉग्रेस ने अपने पारम्परिक वोटों को बचाये रखने में सफलता प्राप्त की है।विभिन्न पार्टियों को मिले वोट और उसके प्रतिशत निम्नलिखित हैं-

कॉग्रेस-3,32,919(39.26%)

लेफ्ट-3,30,383(38.97%)

बीजेपी-85,867(10.13%)

वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया-41,620(4.90%)

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया-2,469(2.90%)

मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012

10 अक्टूबर रामविलास शर्मा के जन्मदिन पर विशेष - अस्मिता,आत्मकथा , हिन्दी जाति और रामविलास शर्मा (3 ) समापन किश्त



जीवनी –“ निराला की साहित्य साधना” तीन खण्डों में है। पहले खंड़ में व्यक्तित्व विवेचन है। दूसरे में उनकी विचारधारा और कला का विवेचन है और तीसरे खंड में उनके जीवन और साहित्य से संबंधित सामग्री और पत्र हैं। प्रकाशन वर्ष है सन् 1969। रामविलास शर्मा ने पहले खंड में लिखा है, “ यह पुस्तक मुख्यतः उनके साहित्य की आलोचना नहीं है। निराला के पारिवारिक,सामाजिक परिवेश से ,उस युग की सांस्कृतिक परिस्थितियों से, उनके जीवन के बाह्य रूपों के साथ उनके अन्तर्जगत् से पाठकों को परिचित कराना मेरा उद्देश्य है।”

समूची जीवनी धारावाहिक रूप में विकसित होती है और रामविलास शर्मा ने बड़े ही कौशल के साथ व्यक्तिगत को सामाजिक और सामाजिक को व्यक्तिगत में रूपान्तरित होते हुए दिखाया है। लेखक के अंतर्मन और सामाजिक अभिव्यक्ति के रूपों में सामंजस्य बिठाने की कोशिश की है। इस क्रम वे निराला को निज जगत से बाहर निकालते हैं। देसी ठाट, अनुभूतियां, गुण-अवगुण, मनोदशा,वातावरण,जनसमुदाय के बीच में रखकर निराला के व्यक्तित्व का वर्णन करते हैं।



निराला की जीवनी को पाठक आराम से नहीं पढ़ सकता। यह जीवनी विचलित, उद्वेलित और उत्तेजित करती है। इसमें समाज,राजनीति,आचरण और मूल्य आदि के क्षेत्र में चल रहे संघर्षों और अन्तर्विरोधों का चित्रण है। इससे निराला का भी अन्तर्विरोधी व्यक्तित्व उभरकर सामने आया है। साथ ही स्वयं रामविलास शर्मा का व्यक्तित्व और नजरिया भी इसमें घुलमिलकर सामने आया है। इसमें “मंशा” की अवधारणा का इस्तेमाल किया गया है और “ईमानदार मंशा” पर ध्यान दिया है। इसके अलावा निराला के “प्रेरक” तत्वों को भी रेखांकित किया है।

रामविलास शर्मा ने जीवनी के प्रधान चारों तत्वों स्वायत्तता,आत्मानुभूति,प्रामाणिकता और व्यक्तित्वान्तरण का इस्तेमाल किया है। यह किताब आख्यान शैली में लिखी है। इस क्रम में निराला के बारे में प्रचलित किस्से, कहानियों और वृत्तान्तों का व्यापक रूप में इस्तेमाल किया है। इससे उनके जीवन में पाठक की दिलचस्पी बनी रहती है। असल में किसी के बहाने व्यक्तित्व को प्रस्तुत करने की कला रोमैंटिक आत्म उदघाटन की कला है। फलतःनिराला के इर्द-गिर्द का वैविध्य भी जीवनी में चला आया है।

जीवनीकार जब किसी व्यक्ति का उदघाटन किसी घटना अथवा अन्य के बहाने करता है तो जीवनीकार स्वयं को घटना से दूर कर लेता है,साथ ही लेखक की वस्तुगत भूमिका को भी सामने लाता है। इस क्रम में लेखक के व्यक्तित्व निर्माण में ‘चंद’ लोगों की भूमिका और उसके चारों ओर के वैविध्यमय संसार को पेश करते हुए विभिन्न साहित्य संबंधी अवधारणाओं,सामाजिक व्यवस्था और आंदोलनों की सटीक व्याख्या पेश करता है इससे अनेक धारणाएं बनतीं हैं। जब व्यक्तित्व विवेचन के बहाने अवधारणाओं का निर्माण किया जाता है तो जाने-अनजाने परिस्थितियों और अवधारणाओं की सीमाएं भी व्यक्त हो जाती हैं। यह भी तय हो जाता है कि आप सच बोल रहे हैं। फलतःआप कल्पना से सत्य को अलगाने में सफल हो जाते हैं।

रामविलास शर्मा ने निराला पर लिखते समय व्यक्तिवाद और मानवतावाद को कॉमनसेंस के आधार पर उभारा है। इसके कारण वे निराला की जीवनी को अन्तहीन विस्तार देते हैं। कॉमनसेंस के आधार पर जीवनी लिखी जाएगी तो उसे अंतहीन विस्तार दिया जा सकता है।

“निराला की साहित्य साधना” का आरंभ 1857 के जिक्र के साथ होता है। उस समय बैसवाड़ा के लोग कैसे थे, उस इलाके के लोगों का स्वभाव कैसा था,निराला के पूर्वज कैसे थे,कैसे ये लोग माइग्रेट करके पश्चिम बंगाल आए,निराला का जन्म कैसे हुआ और किस तरह उनके बहाने बंगाल,भारत,बैसवाड़ा,हिन्द साहित्य,समाजवादीचेतना, किसान आंदोलन, स्वाधीनता आंदोलन,गांधी, नेहरू,निराला के आसपास के लोग,रिश्तेदार-नातेदार, छायावाद, निराला के समकालीन छायावादी कवि,प्रगतिवाद,कविता का शिल्प,सौंदर्य, स्थापत्य, कहानीकला, वेदान्त,अवचेतन आदि अनेक विषयों को विस्तार के साथ व्याख्यायित किया है।

व्यक्तित्व विवेचन का यह अंतहीन रूप है। जो व्यक्तित्व विवेचन को असहज बनाता है। इस क्रम में निराला का व्यक्तित्व विवेचन कम और अन्यचीजों का विवेचन ज्यादा हुआ है। इससे यह भी पता चलता है कि जीवनीकार की निराला के व्यक्तित्व से ज्यादा अन्य चीजों के बारे में ज्यादा दिलचस्पी है। रामविलास शर्मा ने यह भी बताने की कोशिश की है वे संबंधित विषयों के प्रामाणिक जानकार हैं। उन्हें निराला के बारे में प्रामाणिक और वस्तुगत जानकारी है। इस समूची प्रक्रिया में निराला की जीवनी के अंशों पर कम और उनके वातावरण संबंधित विवादों और साहित्य संबंधी नजरिए पर ज्यादा ध्यान गया है। निराला के युग विवेचन को ज्यादा स्थान मिला है। निराला के जीवन के निजी ब्यौरे कम स्थान घेरते हैं और अन्य के ब्यौरे और विवरण ज्यादा स्थान घेरते हैं।अनेक स्थानों पर रामविलास शर्मा स्वयं की समझ को सही और निराला की समझ को गलत ठहराते हैं।

निराला पर लिखते समय वे घटनाओं का वर्णन करते जाते हैं,घटनाओं के वर्णन के दौरान उनके द्वारा जो विवरण और ब्यौरे दिए गए हैं वह लेखक के ऐतिहासिक क्षण,उससे जुड़े व्यक्तियों,विवाद,किंवदन्तियों आदि के सहारे निराला का आख्यान निर्मित करते हैं। इस क्रम में अनेक स्थानों पर रामविलास शर्मा अपने नजरिए का इजहार करने लगते हैं।वे स्वयं समस्या को किस तरह देखते हैं उसको प्रस्तुत करते हैं।

“निराला की साहित्य साधना” के बहाने रामविलास शर्मा ने निराला की खोज के साथ अपने नजरिए की खोज की है। वह जो पद्धति अपनाते हैं वह दो रूपों में सामने आती है , इसमें एक ओर निराला है और वे हैं ,तो दूसरी ओर अन्य लोग हैं। अनेक स्थानों पर निराला और अन्य एक साथ हैं और निराला दूसरी ओर हैं। आमतौर पर यह सारी प्रक्रिया किसी न किसी मसले पर विवाद के दौरान घटित होती है।

रामविलास शर्मा ने निराला के व्यक्तित्व विवेचन के दौरान उन्हें हमेशा ऐतिहासिकता के पैमाने से बांधकर रखा है। वह निराला का ऐतिहासिक पैराडाइम से विचलन नहीं होने देते। निराला के आत्म को ऐतिहासिकता के खूंटे से बांधकर रखते हैं। इसके कारण कई जगहों पर चीजों की पुनरावृत्ति हुई है।

निराला की बातों को रामविलास शर्मा जब उद्धृत करते हैं तो निराला के पक्ष को मजबूत करने के इरादे से ऐसा करते हैं साथ ही जो लोग निराला पर हमला कर रहे थे उनकी काट पेश करते हैं।इस प्रक्रिया में पुरानी घटनाओं और साहित्यिक-राजनीतिक प्रवृत्तियों की नई व्याख्याओं को जन्म देते हैं।

हिंदी संस्कृति और जाति -

रामविलास शर्मा ने रैनेसां का जो महाख्यान निर्मित किया है उसमें दो चीजें प्रमुख हैं पहला है 'अनुमानाधारित ज्ञान 'और दूसरा है 'तर्क की एकता'। अनुमानाधारित तर्कशास्त्र के आधार पर निर्मित हिन्दी जाति का सारा तर्कशास्त्र रचा है।यह उत्तर आधुनिक तर्कप्रणाली है। उत्तर आधुनिक तर्कप्रणाली अनुमानाधारित ज्ञान पर आधारित है। वे अपने अनुमानों को स्थापित करने के लिए हिंदी जाति के महाख्यान को निर्मित करते हैं। इस चक्कर में वे उसे 'सत्य' बनाकर पेश करते हैं। हिंदी जाति का स्वायत्त विमर्श निर्मित करते हैं। इसमें 1960 के आसपास पैदा हुई भाषावार राज्यों के गठन की राजनीतिक तात्कालिकता अभिव्यंजित होती है। इसमें हिन्दी जाति की वैधता सिद्ध करने का भावबोध भी काम कर रहा है जो अनेक नए विवादास्पद संदर्भों को खोलता है। इस क्रम में रामविलास शर्मा भाषा और समाज,हिन्दीभाषा-भाषीक्षेत्र की बोलियों और भाषाओं के बारे में एक सुंदर काल्पनिक भाषायीखेल तैयार करते हैं और इस भाषाखेल के जरिए हिंदी जाति की धारणा को वैध ठहराने की कोशिश करते हैं। वे भाषा के साथ वस्तुओं,संस्कृति आदि को जोड़कर पेश करते हैं। भाषा के साथ ऑब्जेक्ट को पेश करने का यह उत्तर आधुनिक तरीका है, इसे बहुत सारे लोग मार्क्सवादी तरीका समझने की भूल करते हैं।

रामविलास शर्मा इसके बहाने राज्यों के गठन के बारे में अनेक ऐसी बातें भी उठाते हैं जो अव्यावहारिक हैं। उनके हिंदी विमर्श ने असल में हिंदी में 'स्पेकुलेटिव' आदर्शवाद की नींव रखी जिस पर खड़े होकर हिंदी के अधिकांश आलोचकों ने जो कुछ भी लिखा वो अंततः उत्तर आधुनिक विमर्श की कोटि में आता है।

मजेदार बात है कि रामविलास शर्मा और उनके अनुयायी यह मानने को तैयार नहीं है कि वे उत्तर आधुनिक हो गए हैं या हिंदी जाति का विमर्श उत्तर आधुनिक विमर्श है। उलटे रामविलास शर्मा और उनके अनुयायियों ने उत्तर आधुनिकता पर अतार्किक हमले किए हैं। असल में आलोचकों का एक समूह हिंदी जाति के विमर्श के नाम पर आलोचना में अपनी जगह बनाने का प्रयास करता रहा है। इस क्रम में रामविलास शर्मा यांत्रिक ढ़ंग से स्टालिन के भाषा पर आधारित जाति और जातीयता की अवधारणा का अनुकरण करते हैं और हिंदी जाति के प्रकल्प को एक मार्क्सवादी प्रकल्प के रूप में पेश करते हैं जो कम से कम और कुछ हो मार्क्सवादी प्रकल्प नहीं है। यह विशुद्ध भाववादी प्रकल्प है। इस क्रम में रामविलास शर्मा ने जो पद्धति अपनायी है वह बेहद खतरनाक और आकर्षक है। वे भाषा और विचार के अन्तस्संबंध को तो मानते हैं लेकिन विचार और उसके तर्कशास्त्र के विकास की ऐतिहासिकता को नहीं देखते। मसलन् जाति का विचार या चेतना बंगाल में जैसी है वैसी ही हिंदीभाषीक्षेत्र में नहीं है। अथवा यों भी कह सकते हैं कि विचार के सामाजिक आधार के साथ उसे जोड़कर ही नहीं देखते। समाजवाद का अर्थ सारे देश के लिए एक ही नहीं सारे विश्व के लिए किताबी तौर पर एक है ,लेकिन वास्तव अर्थों में विचार और यथार्थ के बीच के अन्तस्संबंध को देखना चाहिए।

मसलन कोई विचार कब आता है, किस प्रक्रिया में आता है,किन सामाजिक वर्गों और किस संदर्भ में अपना विकास करता है। एक ही विचार विभिन्न संदर्भ में अपनी सत्ता और महत्ता एक जैसी नहीं बनाए रख सकता। वे विचार के साथ जुड़े ऐतिहासिक-सांस्कृतिक भेद पैदा करने वाले कारकों को नोटिस ही नहीं लेते। वे हेगेल की तरह महज 'तर्क'(रीजन) का सहारा लेते हैं और हिंदी जाति को सिद्ध करते हैं। यहां तक कि भाषाभेद में भी ऐतिहासिक- सांस्कृतिक कारणों के कारण भेद या अंतर आता है उसे भी नहीं देखते और हर चीज 'तर्क ' से सिद्ध करते हैं। इस चक्कर में हिंदी जाति के विचार को महाविचार,महाख्यान और साहित्य की महाप्रस्तुति बना देते हैं। उसे एबसोल्युट की हद तक विकसित करते हैं और बाकी काम उनके भक्तों ने कर दिया है। यानी हिंदी जाति का विचार परमविचार बन जाता है। इसमें सभी किस्म के कल्पनाजीवी हिंदीसाधक शामिल हो सकते हैं।

हिन्दी में वाम से लेकर दक्षिण तक 'संस्कृति' एक विषय के रूप में बड़ा परिदृश्य घेरे हुए है। व्यक्ति को समग्र संस्कृति के आवयविक अंग के रूप में देखा गया है।इसी क्रम में हिन्दी संस्कृति के विशिष्ट रूपों और अधिकारों की ओर भी ध्यान खींचने की कोशिश की गयी है। फलतः वाम से लेकर हिन्दुत्व तक संस्कृति एक राजनीतिक विचारधारा की शक्ल अख्तियार कर लेती है। हिन्दुत्ववादी हिन्दू संस्कृति के श्रेष्ठत्व पर जोर दे रहे हैं तो वाम विचारक जातीय संस्कृति पर जोर दे रहे हैं और उदारवादी लेखक, सांस्कृतिक बहुलतावाद पर जोर दे रहे हैं।

सांस्कृतिक बहुलतावाद को वाम से लेकर दक्षिण तक सभी रंगत के लेखक मानते हैं और अपनी अपनी संस्कृति का जयगान करते हैं। बहुलतावादी संस्कृति के नजरिए से एकमत लोग यह भी कह रहे हैं कि जहां तक कोई भी संस्कृति अपने क्षेत्र में सक्रिय रहती है उसकी स्वायत्तता की रक्षा की जानी चाहिए। इस प्रक्रिया में जो इमिग्रेंट हैं उनसे कहा जा रहा है कि वे इलाके की संस्कृति में घुलमिल जाएं। अपनी संस्कृति को भूल जाएं। अथवा लौटकर अपनी जन्मभूमि की ओर चले जाएं। मूलबात यह है संस्कृति की इस राजनीति में किसी न किसी रूप में राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता शामिल रहती है । मजेदार बात यह है कि देशज या जातीयसंस्कृति पर जोर देने के कारण जाने-अनजाने हम संस्कृतिवाद की कैद में चले गए हैं।

संस्कृति के राजनीति के केन्द्र में आने के कारण हिन्दू संस्कृति बनाम बहुलतावादी संस्कृति, बहुलतावाद बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, इस्लामिक संस्कृति बनाम बोलने-लिखने की आजादी,मराठी बनाम हिन्दीभाषी आदि के सवाल विवाद में आते रहे हैं। मकबूल फिदा हुसैन और सलमान रूशदी के संदर्भ में चली बहसों में यह भी कहा गया है कि अभिव्यक्ति की आजादी से ज्यादा महत्वपूर्ण है हिन्दू संस्कृति और इस्लामिक संस्कृति । इस क्रम में संस्कृति और धर्म को स्थानीय और अभिव्यक्ति की आजादी को विजातीय अवधारणा कहा गया।इस तरह की धारणाओं को सत्ता का भी सहयोग मिला है। यहां तक कि उन लोगों को कानूनी संरक्षण तक दिया गया है। इसके समानान्तर वामदलों ने स्थानीयतावादी संस्कृति के पल्लवन के नाम पर सबसे पिछड़ी मान्यताओं और मूल्यों को स्थापित करने या स्वीकृत करने की मांग की है। हिन्दी संस्कृति और हिन्दी जातीयता इसी अर्थ में एक खतरनाक प्रस्थान बिंदु है।

वाम के सांस्कृतिक दबाब का आलम यह है कि कलकत्ता का नाम बदलकर कोलकाता कर दिया गया। यह मूलतः संस्कृतिवाद है इसका ही एक अन्य रूप है जिसके तहत तस्लीमा नसरीन को पश्चिम बंगाल से तत्कालीन राज्य सरकार ने निकाल दिया बाद में कांग्रेस ने उसे दिल्ली से भगा दिया।दुख की बात यह है कि सलमान रूशदी के सैटेनिक वर्शेज से लेकर तस्लीमा के निष्कासन तक मौटे तौर पर वाम और उदार दोनों ही किस्म के राजनीतिकदलों की नीति को संस्कृति हांक रही है। यह मूलतः संस्कृतिवाद है और संस्कृतिवाद सामाजिक विभाजन को और भी बढ़ाता है।

इसी तरह जब आप हिन्दी जाति की बात करते हैं और उसकी पहचान को स्थापित करने की कोशिश करते हैं तो इससे मूलतः राज्यविभाजन की वैचारिक प्रक्रियाओं को मदद मिलती है। हिन्दी में हिन्दीजाति,हिन्दी संस्कृति और हिन्दी जातीयता की बहस जितनी ज्यादा हुई उसने हिन्दीभाषी राज्यों में विभाजन को वैचारिक मदद प्रदान की है। विभाजन का आधार बनाया है। यह भी कह सकते हैं इस बहस का बाई-प्रोडक्ट है सामाजिक विभाजन और हिन्दी राज्यों का विभाजन।

हिंदीजाति की धारणा मूलतःएक प्रतिक्रियावादी अवधारणा है। हिंदी समीक्षकों का बड़ा हिस्सा इसकी प्रगतिशील व्याख्याएं करता रहा है। हिंदी में इस धारणा का सांस्कृतिक श्रेष्ठत्व को स्थापित करने के भावबोध के साथ इस्तेमाल होता रहा है। संस्कृति का आधार जब राष्ट्रीयता,राष्ट्रवाद और धर्म को बनाएंगे तो इससे विभाजन बढ़ेगा और ये तीनों एक-दूसरे के साथ अंतर्क्रियाएं करते हैं। मसलन् जो हिंदी जाति के पक्षधर हैं वे जाति(नेशनेलिटी) के श्रेष्ठत्व पर जोर देते हैं।

जातीयता का श्रेष्ठत्व सबसे खतरनाक राजनीतिक तत्व है। हिंदीजाति के विचार को रामविलास शर्मा साहित्य के सुपीरियर विचार के रूप में प्रचारित करते हैं। सतह पर हिन्दीजाति का विचार बड़ा ही हार्मलेस लगता है लेकिन बुनियादी तौर पर बेहद खतरनाक और विभाजनकारी विचार है। नेशनेलटी को आधार बनाकर जब भी बात की जाएगी उसकी वैचारिक परिणति संस्कृतिवाद और सामाजिक विभाजन की ओर ले जाएगी। यह एक खास भाषा(खड़ी बोली हिन्दी) की उन्नति, क्षमता,सामाजिक दायरे और श्रेष्ठत्व के दर्प में डूबा विचार है। यह आधुनिक राजनीति की एंटीथीसिस है। साहित्य में इस विचार में सभी को अपने अंदर समाहित कर लेने और खड़ीबोली हिंदी के मातहत कर लेने का विचार काम करता रहा है। हिंदीजाति के विचार के तहत हमारी समीक्षा के एक बड़े हिस्से ने रैनेसां से लेकर सार्वभौमवाद तक के सभी विषयों को समाहित करके आधुनिक विमर्श में एक विलक्षण अवरोध पैदा किया है जिसमें से तब ही निकल सकते हैं जब हिंदी जाति और हिंदी संस्कृति को मानें। इनको माने बिना कोई आलोचना नहीं लिखी जा रही। इससे आलोचना में लोकतंत्र खत्म हो गया है। आलोचना में हिंदीजाति और हिंदी संस्कृति की बात करने वाले श्रेष्ठ और इससे बाहर के लोग निकृष्ट मान लिए गए हैं।

हिंदीजाति और हिंदी संस्कृति की अवधारणा का मूलतः स्त्री,दलित और भाषायी वैविध्य और समानता का विरोध है। इसमें वर्चस्व का भाव है। हाशिए के लोगों और विषयों के लिए इसमें कोई जगह नहीं है। यह अचानक नहीं है कि हिंदीजाति की अवधारणा पर जिनलोगों ने सबसे ज्यादा काम किया है उन्होंने स्त्रीसाहित्य और दलित साहित्य की अवधारणाओं के प्रति दोयमदर्जे का व्यवहार किया है या उसकी उपेक्षा की है। हिन्दीजाति के पक्षधरों के द्वारा बार बार हिन्दीजाति की मुक्ति में ही सामाजिक मुक्ति को खोजने की कोशिश की गयी है। सभी सांस्कृतिक समस्याओं के समाधान उसमें खोजने की कोशिश की गई है। इस प्रक्रिया में खड़ीबोली हिंदी के साथ हिन्दीभाषी क्षेत्र की अन्य भाषाओं और बोलियों का साहित्य र इन भाषाओं के साथ समान व्यवहार के सवाल हाशिए पर भी नजर नहीं आते। हिन्दीभाषीक्षेत्र की बोलियों भाषाओं का खड़ीबोली हिंदी के साथ अन्तर्विरोध तेज हुआ है। हिन्दीभाषी प्रान्तों का विभाजन हुआ है और इसके कारण नए प्रांतों में खड़ीबोली हिंदी की जगह स्थानीय भाषा और बोलियों को प्राथमिकता दी जा रही है।नए बने राज्यों उत्तराखंड,झारखंड और छत्तीससगढ़ में प्रधान सरकारी भाषा के रूप में खड़ीबोली की जगह लोकल भाषाओं को वरीयता मिली है।

दूसरी ओर हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति के नाम पर संस्कृति के पुराने और पिछड़े रूपों को बनाए रखने की कोशिशें भी हुई हैं। इसके लिए परंपरा और पुरानी संस्कृति की प्रामाणिकता को खासतौर पर उभारा गया है। यह अजीब संयोग है वाम समीक्षकों के एक समूह ने विगत 40-45 सालों में हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति को उभारा, वहीं दूसरी ओर समाज की सबसे प्रतिक्रियावादी विचारधारा के रूप में हिन्दुत्ववादी और जातिवादी राजनीति और संस्कृति का उभार पैदा हुआ। वामपंथी हिंदीजातिधर्मी आलोचकों ने हिंदीजाति की अवधारणा से हिन्दुत्व और जातिवाद को धोने की काफी कोशिश की लेकिन वे असफल रहे। इसका प्रधान कारण है कि वे समझने में असमर्थ रहे कि हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति जिस विचारधारा के आधार पर खड़ी है वह आधार हिन्दुत्व और जातिवादी राजनीति का भी है। वे एकही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों ने अपने अपने तरीके से संस्कृति के अंधलोकवाद की हिमायत की है। दोनों ही अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा करते हैं।दोनों में लोकतंत्र और समानता के लिए कोई जगह नहीं है। दोनों ही भाषायी और सांस्कृतिक समानता के विरोधी हैं। दोनों ही अपने राजनतिक वैचारिक बंधनों में बंधे हैं और दोनों में विकास की कोई संभावना नहीं है। दोनों ने जिस तरह की राजनीति,संस्कृति,धर्म,विचारधारा आदि की हिमायत की है उसके कारण इनकी कोई प्रसंगिकता नहीं है। ये चीजें वोट की राजनीति के कारण उठती रही हैं।

हिंदीजाति और हिदी संस्कृति के सवालों को आलोचना में जिन लोगों ने प्रतिष्ठित किया है वे आलोचना में राजनीतिक विचारधारात्मक वैविध्य या यों कहें वैविध्यपूर्ण समीक्षा के विषय पेश करने में असमर्थ रहे हैं। मसलन् रैनेसां पर जितना लिखा गया है उतना अन्य किसी विषय पर नहीं लिखा गया। नवजागरण,हिन्दीजाति,हिंदी संस्कृति,हिंदी जातीयता,साम्प्रदायिकता,क्षेत्रवाद आदि एक ही विषयक्षेत्र है जिस पर अधिकांश आलोचना लिखी गयी है। इस समूची प्रक्रिया में विभिन्न किस्म की राजनीतिक अवधारणाओं और यूटोपियाओं की ओर कभी ध्यान ही नहीं गया।

हिंदीजाति और हिंदी संस्कृतिपंथी आलोचकों की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वे अन्य साहित्यरूपों और साहित्यांदोलनों के बारे में आज तक कोई नया विवेचन पेश नहीं कर पाए हैं। कुंजी और नोट्स मार्का विवेचनों के जरिए हमने अन्य प्रवृत्तियों को सिलटाने की कोशिश की है। मसलन् प्रयोगवाद से लेकर स्त्रीसाहित्य,दलित साहित्य से लेकर दलित राजनीति तक का सारा क्षेत्र अछूता पड़ा है। इन सभी क्षेत्रों के बारे में वामपंथी आलोचना चुप है।

हम अगर गंभीरता से सोचें तो आज हमारे सामने संस्कृति और साहित्य के गंभीर सवाल आ खड़े हुए हैं लेकिन हमारे पास उनका कोई संतोषजनक विश्लेषण तक नहीं है। साहित्यिक-राजनीतिक समस्याओं का समाधान हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति के फ्रेमवर्क में खोजने की कोशिशें की जा रही हैं। हिंदीजाति की अवधारणा हमारी सामयिक राजनीतिक,सांस्कृतिक समस्याओं का समाधान पेश नहीं करती बल्कि यह तो आलोचना की पलायनवादी प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति है।

हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति वस्तुतः फेक या कृत्रिम धारणा है। इसका वास्तव जगत से कोई संबंध नहीं है। यह एक ऐसे यूटोपिया पर आधारित है जिसका भौतिक आधार नहीं है। यह एक ऐसी आइडेंटिटी की हिमायत करती है जो विभाजनकारी है। यह संस्कृति को क्षेत्रविशेष से जोड़कर देखती है।

संस्कृति को राजनीतिकक्षेत्र के साथ बांधकर नहीं देखा जा सकता।इसके आधार पर हिंदीजाति और हिंदीभाषाभाषी राज्यों के बीच के अन्तस्संबंध पर अतिरिक्त जोर दिया गया। उन्हें हिंदीसंस्कृति की वायवीय अवधारणा से बांधने की असफल कोशिश की गयी है। हिंदी को एक सांस्कृतिक अस्मिता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। इस क्रम में देश के विभिन्न इलाकों में जातिवाद ,क्षेत्रवाद और धर्म के नाम सामाजिक समूहों को संगठित करने के प्रयासों की अनदेखी की गयी। संस्कृति के नाम पर संगठित हो रहे समूहों की अनदेखी की गयी।

वाम आलोचना ने बहुलतावादी संस्कृतिवाद को खूब हवा दी है और रामविलास शर्मा भी हवा देने वालों में प्रमुख हैं। ब्रिटिश दार्शनिक ब्रायन बेरी ने लिखा है कि बहुलतावादी संस्कृतिवाद ने खास सामाजिक हितों के प्रसार को हवा दी है। यह एक तरह से सामाजिक विभाजन की फूट डालो और राज करो की यथास्थितिवादी राजनीति है। यह वंचितों को और भी वंचित बनाने वाली राजनीति है। यह वंचितों की साझा समस्याओं जैसे बेकारी, गरीब,निम्नस्तरीय जीवनशैली,रोटी,कपड़ा,मकान,शिक्षा,स्वास्थ्य,चिकित्सा आदि से ध्यान हटाती है।

हम गंभीरता से विचार करें और सोचें कि राज्यों के विभाजन या पुनर्गठन की मांग क्या सचमुच में यथार्थवादी मांग है ? क्या इस तरह की मांगें समाज की बुनियादी साझा समस्याओं के समाधान की ओर ले जाती हैं ? आखिरकार इनदिनों ही राज्यों के विभाजन या पुनर्गठन की मांगों पर ध्यान क्यों दिया जा रहा है ? इसी तरह इनदिनों जातियों की दशा सुधारने या दलितों और अल्पसंख्यकों की दशा सुधारने के कार्यक्रमों पर ढिंढोरची तरह हल्ला क्यों बोला जा रहा है। यह सारा खेल बहुलतावादी संस्कृतिवाद के फ्रेमवर्क में चल रहा है। वोटरों को भी इन्हीं आधारों पर वाम से लेकर दक्षिणपंथी दलों तक भरमाने की कोशिश कर रहे हैं।

देश में इनदिनों वंचितों और अभावग्रस्तों को धर्म,संस्कृति और अस्मिता के सवालों के आधार पर संगठित किया जा रहा है। जाहिरा तौर पर इससे सामाजिक विभाजन और बढ़ेगा और ठोस राजनीतिक सवालों की अनदेखी भी बढ़ेगी।

हिंदी में संस्कृतिवाद का रूप है हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति । इसके प्रचारक खासकिस्म के सरलीकरण से काम लेते रहे हैं। पहलीबात इन दो धारणाओं के संदर्भ में यह कि ये दोनों धारणाएं सार्वभौम मानवाधिकारों को नहीं मानतीं। सार्वभौम मानवाधिकार की धारणा मानने का अर्थ है संस्कृति विशेष की हिमायत को छोड़ना होगा। क्योंकि सार्वभौम मानवाधिकार की धारणा वस्तुतःसंस्कृतिविशेष के आधार से परे ले जाती है। हिंदीवाला किंतु हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति को त्यागने के लिए तैयार नहीं है। यह अचानक नहीं है कि रामविलासशर्मा ने हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति पर खूब लिखा है कि लेकिन सार्वभौम मानवाधिकारों की धारणा को वे नहीं उठाते और यह सारी दुनिया में वामपंथी बुद्धिजीवियों की समस्या है।

हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति की अवधारणा के नाम पर प्रचलित संस्कृतिवाद और मार्क्सवाद में एक चीज साझा हैं। दोनों का मानना है वंचित-पीड़ित हमेशा सही होते हैं। इस आधार पर वे कहते हैं कि वंचित-पीड़ित को अपने दमन-उत्पीड़न से मुक्त होने का अधिकार है। अतः इनकी सांस्कृतिक मान्यताएं भी सही हैं। वे कभी ठंड़े दिमाग से यह सोचने की कोशिश नहीं करते कि वे जिन सांस्कृतिक मान्यताओं को उठा रहे हैं वे सही और न्यायपूर्ण हैं ? वे जिन सांस्कृतिक रूपों को मानते हैं वे क्या सही हैं ? इस तरह वे ‘मजदूरवर्ग’ को ‘वंचित’ , ‘उत्पीडित’ या ‘दलित’ के नाम से अपदस्थ करना चाहते हैं। मुक्ति या मूलगामी सामाजिक परिवर्तन को संस्कृतिवाद,हिंदजाति और हिंद संस्कृति के जरिए अपदस्थ करना चाहते हैं। यह असलमें मार्क्सवाद का एकदम विलोम है, यह वाम राजनीति का भी विलोम है।

हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति के प्रचारक एक ओर अधिनायकवादी राजनीति का विरोध करते हैं वहीं दूसरी ओर साम्राज्यवाद विरोध और वि-उपनिवेशीकरण की तेजी से वकालत करते हैं। यह फिनोमिना रामविलास शर्मा के लेखन में भी है। लंबे समय से इस थ्योरी के आधार पर लिखा जा रहा है। संकट उसके बाद आरंभ होता है जब फंडामेंटलिस्ट हिन्दुत्ववादी और इस्लामिस्ट भी इसी एजेण्डे पर सक्रिय होते हैं। वे भी साम्राज्यवादविरोधी वि-उपनिवेशीकरण को अपना लक्ष्य बनाते हैं। दोनों में साझा तत्व है संस्कृति। दोनों संस्कृति के आधार पर ही विरोध करते हैं। रोचक बात यह है वाम ने बहुलतावादी संस्कृतिवाद को तरजीह दी और फंडामेंटलिस्टों ने संस्कृति विशेष को तरजीह दी।

इन दोनों के नजरिए में वाम के यहां संस्कृति ज्यादा है ,जबकि फंडामेंटलिस्टों के यहां संस्कृति कम है। ये दोनों ही व्यक्ति को इस आधार पर अस्मिता प्रदान करते हैं। इसके आधार पर व्यक्ति के अधिकारों को परिभाषित करते हैं और उन अधिकारों के संरक्षण के बारे में बात करते हैं। मजेदार पहलू यह है कि फंडामेंटलिस्टों के लिए संस्कृति निर्धारक तत्व है ,जबकि वाम के लिए संस्कृति निर्धारक नहीं आर्थिक-सामाजिक कारण निर्धारक तत्व हैं। वाम के लिए संस्कृति फालतू चीज है। वाम के लिए सांस्कृतिक संगठन गौण और वर्गीय संगठन प्रधान हैं।








10 अक्टूबर रामविलास शर्मा के जन्मदिन पर विशेष - अस्मिता,आत्मकथा , हिन्दी जाति और रामविलास शर्मा (2)

आत्मकथा का पद्धतिशास्त्र- 

इन दिनों अस्मिता साहित्य के कई रूप प्रचलन में इन तमाम प्रवृत्तियों का बहुराष्ट्रीय बुर्जुआ विचारधारा से गहरा संबंध है। नई अस्मिता संस्कृति आमलोगों में 'निजी संतुष्टि' की भावना पैदा कर रही है। आम लोगों से कहा जा रहा है 'निजी संतुष्टि' पर ध्यान दें। 'निजी संतुष्टि' की भावना ने नागरिकबोध और नागरिकचेतना को कमजोर बनाया है।' निजी संतुष्टि' के नाम पर उपभोक्ता की स्वतंत्रता की बातें कही जा रही हैं। 

'निजी संतुष्टि' पर आधारित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर साहित्य में इनदिनों आत्मकथाओं की बाढ़ आ गयी है। 'निजी संतुष्टि' का सामाजिक मूल्यों के तानेबाने के साथ गहरा अन्तर्विरोध है। अनेक मामलों में आत्मकथाओं के विवरण और ब्यौरे नैतिक तौर पर अपमानजनक चीजों को पेश करते हैं। खासकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजी संतुष्टि की धारणा की आड़ में व्यक्ति के एकाकी भावबोध को खूब बढ़ावा दिया जा रहा है। यह ग्लोबलाइजेशन का ग्लोबल फिनोमिना है। यह ऐसे व्यक्ति की आत्मकथा है जो निजी तौर पर किसी विचार या विचारधारा से बंधा नहीं है। इसके पास किसी विचार या विचारधारा की परंपरा नहीं है। इसका प्रत्येक चीज और व्यक्ति के साथ बिनाशर्त संबंध है।

रामविलास शर्मा ने अपनी आत्मकथा 'अपनी धरती अपने लोग' में व्यक्ति और विचारधारा के अनतस्संबंध को उभारा है। लेखक की नागरिकचेतना और वर्गीयचेतना को उभारा है। लेकिन इन दिनों आने वाली स्त्री और दलित लेखकों की आत्मकथाओं में इसके विपरीत लक्षण देखने में आए हैं। वे ऐसे व्यक्ति का चित्रण करते हैं जो अंतर्वैयक्तिक (इंटरपर्सनल) संबंधों और नागरिक शिरकत के लिए किसी विचारधारा से जुड़ा नहीं है। उस पर उसकी मास्टरी नहीं है।

इस पूरी प्रक्रिया में सार्वजनिक मनुष्य की अवधारणा का क्षय हुआ है। इससे यह भी पता चलता है कि सार्वजनिक जीवन का क्षय हो रहा है। सार्वजनिक राजनीतिक स्पेस का क्षय हुआ है। वस्तुकरण और नौकरशाही की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसके अलावा सामाजिक बंधनों की कीमत पर आत्म-संतुष्टि, संवेदनात्मक अभिव्यक्ति और आत्म-क्षय की प्रवृत्ति बढ़ी है। यह सामाजिक नार्सीज्म है। इसमें दैनंदिन जीवन की छोटी –छोटी आपातकालीन कथाएं हैं । इसमें सामाजिक प्रतिबद्धता और निजी लगाव का अन्तस्संबंध बड़े पैमाने पर टूटा है। अनेक स्थानों पर आत्मकथाओं में निजी लगाव की बातों पर जोर है और सामाजिक वचनवद्धता की उपेक्षा की गयी है।

यह नए किस्म का व्यक्तिवाद है। जिसका लक्ष्य है भौतिक लाभ पाना और निजी सफलता पाना। इसके पास छद्म प्रतिबद्धता है। इसके अन्य के सरोकार से बेखबर है। कहीं कहीं यह व्यक्तिवाद, सांस्कृतिक परंपरा,राजनीतिक संस्कृति और सामाजिक इतिहास के रूप में भी आया है।

कई आत्मकथाओं में ऐसी भाषा का इस्तेमाल हुआ है जिससे भाषा की मानवीयक्षमता का क्षय हुआ है। भाषा का काम है मानवीयक्षमता में इजाफा करना।साहित्य और सामाजिक जीवन में गाली-गलौज की भाषा मानवीयक्षक्षमता के क्षय का संकेत है।गाली-गलौज की भाषा या भाषा के असभ्य प्रयोग अंततः मानवीय क्षमता और व्यक्ति की निजी क्षमता को विकृत करते हैं। इस तरह के भाषिक प्रयोग इस बात का संकेत है कि निजी जीवन का ह्रास हो रहा है।

अस्मिता साहित्य के तहत जो आत्मककथाएं आई हैं उनमें एक अन्य फिनोमिना भी दिखाई दे रहा है और वह है निजी जीवन के सारतत्व और उसके ताने-बाने को पूंजीवादी-सामंती व्यवस्था खाए जा रही है। यहां अनेक मामलों में वह अपने को सामाजिक प्राणी के रूप में नहीं देखता । आत्मकथाओं में सेल्फ ऑब्शेसन और अबाधित आत्ममोह मुख्य चिंता की बात है। लेखक अपने निजी आंसुओं,कर्म और कष्टों का अतिरंजित वर्णन कर रहे हैं। इससे उन्हें 'सांस्कृतिक शांति' मिलती है। इसे समीक्षा में 'कल्चरल कूलिंग' या 'सांस्कृतिक शांति ' कहते हैं।

'सांस्कृतिक शांति' के फ्रेमवर्क में जब चीजें पेश की जाती हैं तो वे दलित और स्त्री दोनों का ही अपहरण करती हैं। वे आत्मकथाओं में ऐसा समाज रच रहे हैं जो अपने ही घेरे में बंद हैं। सेल्फ ऑब्शेसन और बाजार निर्मित अस्मिता के तत्वों को अपने अंदर समेटे है। यहां एक तरह से मानवीय व्यवहार का निजीकरण मिलेगा। यह सामयिक सांस्कृतिक अवस्था का लक्षण है। यहां निजी जीवन के अ-राजनीतिक और व्यक्तिगत विवरण और ब्यौरे छाए हुए हैं। इन कथाओं में सार्वजनिक और निजी के बीच में अंतर की दीवार भी धराशायी हो गई है। आत्मककथाओं में जो राजनीति आ रही है वह बाहरी राजनीतिक मसलों के संदर्भ में आ रही है। पहले निजी मसलों और राजनीति का संबंध मिलता है। खासकर रामविलास शर्मा की आत्मकथा में यह फिनोमिना नजर आता है। लेकिन इनदिनों आने वाली आत्मकथाओं में निजी को राजनीति से अलग एक भिन्न सामाजिक केटेगरी में रख दिया गया है। इस चक्कर में संस्कृति और राजनीति के बीच में फांक पैदा हो गयी है। इसके कारण लेखक का निजी जीवन अलग और राजनीतिक प्रसंग अलग नजर आते हैं।

आत्मकथा लेखन में एक और फिनोमिना नजर आता है वह है 'सांस्थानिक व्यक्तिवाद'। इसमें व्यक्ति अपनी आत्मकथा का आख्यान रचते हुए निज के द्वारा तय की गयी परिभाषाओं को पुनर्परिभाषित कर रहे हैं। इस तरह की प्रस्तुतियां दलितलेखकों ने खूब लिखी हैं। यह आज के भूमंडलीकरण का प्रतिगामी बुनियादी लक्षण है।

इस धारणा के मानने वाले कहते हैं मौजूदा कनेक्टविटी के दौर में मनुष्य अपनी बार बार यात्रा करता है।नए सिरे से काम करता है।पुनर्पाठ करता है।व्यक्तिगत आदतों और अस्मिताओं की रोशनी में राज्य को देखता है। समाज को देखता है और बताने की कोशिश करता है कि यह विश्व किस दिशा में जा रहा है। यह पद्धति रामविलास शर्मा की आत्मकथा में भी इस्तेमाल की गयी है। इस पद्धति का प्रयोग करते हुए लेखक परंपरा से आधुनिकता की ओर प्रयाण करता नजर आता है। आत्म-निर्माण की प्रक्रिया नजर आती है लेकिन सांस्कृतिक वैविध्य या क्षेत्रीय सांस्कृतिक भिन्नताएं नजर नहीं आतीं।

पश्चिम और भारत में आत्मकथा लेखन में एक अंतर है, पश्चिम में आत्मकथा लेखक को इतिहास बहुत कम परेशान करता है। लेखक आसानी से अपने को इतिहास से मुक्त होकर लिखता है। लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। भारत में आत्मकथा या जीवनी में इतिहास आसानी से पीछा नहीं छोड़ता। पश्चिम के लेखक की अस्मिता ,इतिहास से अपने को अलग कर लेती है। भारत में लेखक की अस्मिता ,इतिहास से अपने को अलग नहीं कर पाती। परंपरागत समाज में व्यक्ति के पास न्यूनतम स्वायत्तता भी नहीं होती। जबकि आधुनिक धर्मनिरपेक्ष समाज उसे पूरी स्वायत्तता देता है।

पश्चिम में लेखक को परंपरा और सामाजिक इतिहास के ज्ञान के आधार पर समझने में मुश्किल से मदद मिलती है।जबकि भारत में उसके बिना समझना मुश्किल है। मसलन् ,रामविलास शर्मा की आत्मकथा या उनके द्वारा लिखी 'निराला की साहित्य साधना" में 1857 और परंपराएं व्यक्तित्व निर्माण के प्रमुख तत्वों में हैं। इसी तरह ओमप्रकाश बाल्मीकि की आत्मकथा में जातिप्रथा ऐतिहासिकता के साथ दाखिल होती है।

आधुनिकता के आने के साथ आधुनिकीकरण की अपार संभावनाएं पैदा होती हैं। व्यक्तिवादी ढ़ंग से विकास के अवसर पैदा होते हैं। आधुनिक संगठनों का उदय होता है। ये संगठन व्यक्ति के आत्म को नए सिरे से निर्मित करते हैं। उसके जीवन में अभिव्यंजित होते हैं। इनमें खासतौर पर शिक्षा और राजनीति के संगठनों के द्वारा व्यक्तित्व के नए रूपों के निर्माण में खाससतौर पर मदद मिलती है। इनसे विगत जीवन की अनिश्चितता और असुरक्षा से मुक्ति मिलती है।आत्मनिर्भर व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इसी क्रम में कैरियर,परिवार,मित्र,कार्यक्षेत्र,प्रेम आदि के अंतर्विरोधों को हल करने में मदद मिलती है। यानी व्यक्ति एक नए किस्म के आधुनिक व्यक्तिवाद के जरिए अपना विकास करता है। इससे आत्म संचालित संस्कृति और आत्म निर्धारित आत्मकथा के रूपों का निर्माण होता है।

एक मर्तबा फ्रांसीसी लेखक जॉन पाल सार्त्र ने कहा था कि बुर्जुआ की तरह जन्म लेना ही काफी नहीं है ,बल्कि बुर्जुआजी की तरह जीना भी आवश्यक है। इसी नजरिए को आधार बनाकर रामविलास शर्मा और ओमप्रकाश बाल्मीकि अपनी आत्मकथाओं में यह दर्शाने की कोशिश करते हैं कि उनका व्यक्तित्व सेल्फमेड है। वे यह भी दर्शाते हैं कि उन्होंने अपना ही नहीं अपने परिवार,मित्र और संबंधियों के भी निर्माण में मदद की है। साथ ही यह भी संदेश देते हैं कि व्यक्तित्व निर्माण के प्रमाण समाज और आत्मकथा में चारों ओर पारदर्शी रूप में फैले हैं। इन दोनों लेखकों की आत्मकथाओं में जीवन के बारे में पुरानी निश्चितता नष्ट होती है और ये दोनों ही लेखक नए किस्म की निश्चित जिंदगी जीने के विकल्पों की ओर मुखातिब होते हैं।

रामविलास शर्मा और ओमप्रकाश बाल्मीकि की आत्मकथा वस्तुतःआत्मनिर्माण या सेल्फमेड व्यक्ति की आत्मकथा है। इस तरह की आत्मकथा में एक जोखिम है ,इसमें जो चीजें चुनी जा रही हैं उनमें जोखिम भी है। मसलन् रामविलास शर्मा कम्युनिस्ट पार्टी के होल टाइमर थे । लेकिन भयानक असुविधाओं का सामना करना पड़ा। फलतः उन्हें होलटाइमरशिप छोड़नी पड़ी।

लेखक जो कैरियर या जीवनशैली चुनना चाहता है।वह वैसा नहीं बन पाता । अतःजिस आत्मकथा को वह सेल्फमेड रूप में पेश करना चाहता है उसी आत्मकथा में वह ब्रेकडाउन जीवनी को भी पेश करता है।ब्रेकडाउन जीवनी के अनेक पहलुओं को बड़ी खूबी के साथ रामविलास शर्मा ने 'निराला की साहित्य साधना' में भी दरशाया है। निराला के सपने किस कदर टूटते हैं और वे जो बनना चाहते हैं वह नहीं बन पाते।जैसे जीना चाहते हैं वैसे जी नहीं पाते। जीवनी लेखन की यह पद्धति पूरी तरह उत्तर आधुनिक पद्धति है।मसलन् निराला चाहते थे कि महिषादल का राजा उनको गोद ले और वे राजकुमार की तरह जिंदगी व्यतीत करें। यह नहीं हो पाता और यह उनके जीवन की बड़ी पीड़ा बनती है।

लेखकद्वय ( रामविलास शर्मा-ओमप्रकाश बाल्मीकि) की आत्मकथाओं में परिवार बना रहता है और इन दोनों के व्यक्तित्व निर्माण में परिवार की भूमिका साफ नजर आती है। आधुनिक समाज में व्यक्तित्व निर्माण में राज्य की बड़ी भूमिका होती है लेकिन इन लेखकों के व्यक्तित्व निर्माण में परिवार की बड़ी भूमिका सामने आती है। दूसरा बड़ा संस्थान है शिक्षा व्यवस्था। शिक्षा की इनके व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका नजर आती है। वहीं निराला का परिवार बिखर जाता है और परिवार उनके विकास में बहुत बड़ी बाधा बन जाता है।ठीक यही पहलू नामवरसिंह की आत्मकथा के अंशों में है। वहां परिवार नदारत है।परिवार के नाम पर विस्तारित परिवार के लोग भूमिका में नजर आते हैं। यही स्थिति अनेक लेखिकाओं की आत्मकथाओं में भी नजर आती है।

निराला-नामवरसिंह-मन्नूभंडारी आदि की जीवनी-आत्मकथाओं में सामाजिक परिस्थितियां,खासकर पारिवारिक परिस्थितियां ऐसी हैं जो इन व्यक्तियों को दंडित करती हैं। इन सभी लेखकों का व्यक्तिवाद इनको आगे ठेलता है और इसके कारण इनके सामाजिक अंतर्विरोध और भी गहराने लगते हैं।

रामविलास शर्मा,नामवरसिंह,ओमप्रकाश बाल्मीकि,मन्नू भंडारी आदि की आत्मकथाओं में व्यक्त तथ्य इस बात को पुष्ट करते हैं कि इन लेखकों के जीवन में व्यक्तिवादी दबाब इनको भविष्य की ओर ठेलते रहे हैं। व्यक्तिवादीकरण एक अपरिहार्य अवस्था है। इससे बचा नहीं जा सकता। लेखक के नाते ये लोग उसे नियोजित करके पेश करते हैं। ये अपने व्यक्तिवाद का विभिन्न बदली परिस्थितियों में इस्तेमाल करते हैं।

इन लोगों ने निजी तौर पर व्यक्तिवाद की आलोचना की लेकिन व्यक्तिवादीकरण इनकी मजबूरी है।यहीं पर इस प्रवृत्ति की बिडम्वना सामने आती है। इस क्रम में जहां एक ओर वे अपनी जीवनी बनाते हैं ,साथ ही अपने आसपास नेटवर्क भी बनाते हैं। यह नेटवर्क शिक्षा संस्थान,राजनीतिक दल,सांस्कृतिक संगठन आदि से बन रहा है। मसलन् ,रामविलास शर्मा,ओमप्रकाश बाल्मीकि, निराला आदि की आत्मकथा-जीवनी में परिवार और गांव के सामुदायिक जीवन या कॉमरेडशिप वाले दौर की अनिश्चितता सामने आती है। यह अनिश्चितता इनके आख्यान का सबसे बड़ा संसाधन है।

इन लेखकों के यहां एक चीज साझा है कि वे आधुनिक जीवन जीना चाहते हैं लेकिन आधुनिक जीवन जीना इनके लिए असंभव हो जाता है।ये रूटिन के बाहर रहकर जीना चाहते हैं लेकिन दैनंदिन रूटिन जीवन इनको अपनी ओर खींचता है। रूटिन चीजें इनके विचार और कर्म दोनों को प्रभावित करती हैं।

'रुटिन' की अमूमन आत्मकथा-जीवनी पढ़ते हुए हम उपेक्षा करते हैं। दैनंदिन रूटिन को व्यक्ति किस तरह आत्मसात करता है और आगे बढ़ता है इन सब बातों की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। 'रुटिन' के कारण व्यक्ति में सामुदायिक आदतों-संस्कारों आदि का निर्माण होता है। मसलन् प्रगतिशीलों में रहना, उनकी बातें करना,उनकी आदतों और व्यवहार को जीवन में उतारना आदि रूटिन सामूहिक आदतें हैं, इन्हें हम लेखक के प्रतिवादी कर्म के रूप में देखते हैं।

सामयिक भूमंडलीकरण के ग्लोबल फिनोमिना के अंग के रूप में आत्मकथाओं में नए किस्म का व्यक्तिवाद नजर आ रहा है। यहां लेखक नए रूप में अपनी खोज करता है। वह लिखता है अपने अतीत को बताने के लिए,लेकिन बताता है अपने व्यक्तित्व के रूपान्तरण को । वह यह भी दरशाता है कि वह ग्लोबल परिवर्तनों के साथ खुद भी बदल रहा है। लेखक अपनी जीवनी को नया रूप देने और दिशा देने में सक्षम है। यह ऐसा लेखक है जो अपने सांस्कृतिक प्रतीकों की स्वयं खोज करता है। नए भूमंडलीकरण में व्यक्ति की अस्मिता और सांस्कृतिक रूपों का वो सर्जक है।

दलितों की आत्मकथाओं में जीवनशैली का खूब चित्रण मिलता है। इसके विपरीत रामविलास शर्मा के यहां जीवनशैली के चित्रण पर जोर नहीं है। जीवनशैली वाला तत्व ग्लोबलाईजेशन का हिस्सा है। दलित की जीवनशैली के साथ एक बागी व्यक्तित्व सामने आता है। लाइफस्टाइल और रिवेल या बागी ये दोनों भूमंडलीकरण के फिनोमिना हैं। वे ऐसे व्यक्ति का चित्रण करते हैं जिसे यथास्थितिवाद पसंद नहीं है।

यथास्थितिवाद का बागी तेवरों के साथ निषेध करने वाले तत्व मासकल्चर में खूब मिलेंगे। जिस तरह मासकल्चर को बागी हीरो पसंद आते हैं. उनके संवादों को हम उद्धृत करते हैं। ठीक वैसे ही दलितसाहित्य और स्त्री साहित्य में भी बागी लेखक को पसंद किया जाता है। उनके चुभते संवाद पसंद आते हैं। उनका अविश्वास पसंद आता है। उनका इन चीजों का महिमामंडन पसंद आता है। इस तरह की प्रस्तुतियों की खूबी है कि आप उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते। चूंकि ये बदले हुए समय की तस्वीरें हैं,इनमें चीजें बदलती नजर आती हैं। वे अपनी अस्मिता को खोजते हैं,नया रूप देते हैं। ये तस्वीरें प्रेरक का काम भी करती है।

दलित आत्मकथाओं में मासकल्चर के बागी नायकों की तरह एक तरह का सांस्कृतिक अंतर्विरोध अंतर्ग्रथित है। वे सब कुछ अभी चाहते हैं। इनमें समाज,जाति,जीवनशैली आदि को तत्काल बदलने की आकांक्षा जमकर व्यक्त हुई है। वे अपने पाठक को 'ट्रांसफार्म' और 'इंप्रूब' करने की ओर ध्यान खींचते हैं।

आत्मकथाओं की हाल ही में जो बाढ़ आई है उसका एक और मकसद है सेल्फ थेरेपी करना। यह उपभोक्तावाद से जुड़ा फिनोमिना है। इसमें अस्मिता की इंस्टेंट इमेजों का खूब प्रक्षेपण हो रहा है। इस तरह की अस्मिता की एक ही मुश्किल है कि इसमें प्रभावित करने की क्षमता नहीं है। यह मीडिया में चल रहे अस्मिता के इंस्टेंट फ्लो से प्रभावित है इसमें तत्काल संप्रेषित करने और तत्काल परिणाम पाने की मंशा काम कर रही है। ये आत्मकथाएं मासकल्चर के फार्मूलों के आधार पर लिखी जा रही हैं।

मासकल्चर का फार्मूला है कि आप अपने अंदर कुछ भी इन्वेंट कर सकते हैं। इस काम से आपको कोई नहीं रोक सकता। सिर्फ तुमको चुनना है कि क्या इन्वेंट करना चाहते हो। जिस तरह माउस का बटन दबाते ही आप शिफ्ट कर जाते हैं। उसी तरह अस्मिता पर लिखी एक किताब से दूसरी किताब की ओर शिफ्ट कर जाते हैं। इसमें आपकी कोई विचारधारात्मक प्रतिबद्धता नहीं होती।

इन आत्मकथाओं में एक खास किस्म की जीवनशैली की ओर रूझान नजर आ रहा है और उसकी ब्रॉण्डिंग भी हो रही है। दलित अस्मिता का आधुनिक जीवनशैली में रूपान्तरण उसके व्यक्तित्व के छोटे –छोटे विवरण और ब्यौरों से भरा है। इन सभी आत्मकथाओं में व्यक्तित्व की लोचदार इमेज सामने आ रही है। इस इमेज का दलित की उपलब्धि और संभावनाओं के आधार पर निर्णय नहीं किया जा सकता। बल्कि इन आत्मकथाओं के बारे में हमें व्यक्तित्व के रूपान्तरण और लोच के आधार पर देखना चाहिए।

दलित आत्मकथाओं में दलित को शोषण और जाति उत्पीड़न के वैविध्यपूर्ण चित्रों के जरिए सजाने की कोशिश की जा रही है। इनमें चार फिनोमिना हैं। पहला फिनोमिना है नकारात्मक-सकारात्मक चीजों का। दूसरा है ,अलगाव और स्वाधीनता का। इसका सांस्कृतिक महत्व है। इसके अलावा इकसार सामाजिक संदर्भ बार बार सामने आया है। इसके कारण सामाजिक संदर्भ अप्रासंगिक हो गया है।सामाजिक संदर्भ को परंपरा और जातिप्रथा के इकसार या स्टीरियोटाइप संदर्भ ने अपदस्थ कर दिया है। सामाजिक संदर्भ की विभिन्न सीमारेखाओं को इनके जरिए अप्रासंगिक बनाया गया है।

दलित आत्मकथाओं में भूमंडलीकरण की तीन संवृत्तियां नजर आती हैं। प्रथम, परंपरा को कम करके देखा गया है। खासकर परंपरागत जीवनशैली की उपेक्षा की गयी है। इसी क्रम में वि-परंपरावाद का विकास हुआ है। पहले से चली आरही चीजें अब दलित आत्मकथाओं में सुरक्षाबोध पैदा नहीं करती।

दूसरी संवृत्ति है ,व्यक्ति की सामाजिकरेखाएं और परंपराएं टूट रही हैं। मसलन् ,शादी एक संस्थान है जो आत्मकथाओं में टूट रहा है या शादी पर पर्दा पड़ा है। तीसरा फिनोमिना है ,व्यक्ति के जीवन में बदलाव आ रहे हैं, उनकी व्याख्या विचारधारात्मक आधार पर होनी चाहिए।

व्यक्ति में आए बदलाव इनदिनों जितने ज्यादा आज नजर आ रहे हैं ,उतने पहले नजर नहीं आते थे। इसका प्रधान कारण है नव्य आर्थिक उदारीकरण। इसने निजीकरण की प्रक्रिया तेज की है। फलत आत्मकथाओं में निजी जीवन के दैनंदिन पहलू सामने आए हैं। निजी गुस्सा,भय,असंतोष ,संशय और अविश्वास ,सामाजिक अव्यवस्था और हिंसाचार के विवरण और ब्यौरे भी चले आए हैं।

दलित आत्मकथाओं के विवरण यह भी बताते हैं कि भारत में सामाजिक असमानता कम हो रही है। यह कम होती असमानता उनमें ज्यादा दिख रही है जो दलितवर्ग की निम्न अवस्था से रूपान्तरित होते हुए मध्यवर्ग या निम्न-मध्यवर्ग में आ गए हैं। इस क्रम में ये लोग अपने वर्ग से भिन्न वर्ग में रूपान्तरित हो गए हैं।

इन दिनों आत्मकथा विधा का दायरा लगातार विकसित हो रहा है। रामविलास शर्मा ने निराला के निजी पत्रों को शामिल करके पत्रों को साहित्य में शामिल करा दिया,लेकिन इसके दायरे में यात्रा संस्मरण,निजी डायरी और भाषण भी आते हैं। इस प्रसंग में मुख्य सवाल यह है कि हिन्दी में आत्मकथा को जनप्रिय होने में इतना समय क्यों लगा ? अंग्रेजी में आत्मकथा लंबे समय से विधा के रूप में लोकप्रिय रही है। हिंदी में यह 1990 के बाद ही लोकप्रिय हो पायी है और उस पर विभिन्न कोणों से बहसें हो रही हैं। इन बहसों में विधा और अंतर्वस्तु को जोड़कर नहीं देखा जा रहा। अधिकांश समय अंतर्वस्तु की विवेचना में ही आलोचकगण व्यस्त हैं।

यह भी देखने में आया है कि हिंदी में अनुदित होकर विदेशी लेखकों की आत्मकथाएं आ रही हैं और ये आत्मकथाएं बड़ी मात्रा में बिक रही हैं। आत्मकथा का पाठकवर्ग तैयार करने में इन अनुदित किताबों की बड़ी भूमिका है। हिंदी के साहित्यकारों की आत्मकथा और जीवनियां सिर्फ साहित्य के विद्यार्थियों के एक छोटे समूह में बिकती हैं। लेकिन अनुदित आत्मकथा की किताबें व्यापक जनसमूह में अपना पाठकवर्ग तैयार करने में सफल रही हैं।

आत्मकथा या जीवनी को हमें अस्मितासाहित्य की कोटि में रखकर विचार करना चाहिए। अभी तक हम इसे अस्मिता के दायरे में रखकर नहीं सोच रहे। किस दलितलेखक की आत्मकथा को हम अस्मिता के आधार पर देखने को तैयार हो जाते हैं लेकिन किसी गैर-दलित लेखक की आत्मकथा को अस्मिता के आधार पर देखने में असमर्थ रहे हैं। मसलन् ओमप्रकाश बाल्मीकि और रामविलास शर्मा की आत्मकथाएं अस्मिता की केटेगरी में रखकर पढ़ जानी चाहिए।

आत्मकथा या जीवनी मूलतः अस्मितासाहित्य है।इसके साथ ही जनजाति,अनुसूचित जाति,लिंग और वर्ग का साहित्य अस्मितासाहित्य है। किसी आदिवासी या स्त्री या दलितलेखकों की आत्मकथाओं में साझा सांस्कृतिक रूप,साझा सामाजिक परिस्थितियां और संघर्ष के साझा मुद्दों के दर्शन होते हैं। ये मुद्दे हैं- छूत-अछूत,शिक्षा में भेदभाव,श्रमविभाजन में भेदभाव, कृषिशोषण, जमीन के अधिकार, ऊँच-नीच के सवाल,वर्ण और जातिप्रथा, सेक्स, शारीरिक शोषण, पति-पत्नी में असमानता, स्त्री की अधिकारहीनता, मातहत भावबोध आदि। इन सभी में एक साझा तत्व है कि ये सभी स्वयं की पहचान को बनाने के लिए संघर्ष करती नजर आती हैं।

इनमें दूसरा साझा तत्व है कि लेखक जैसा महसूस करता है वैसा लिखता है। अन्य क्या महसूस करते हैं उस पर उसकी नजर नहीं है। कहानी-उपन्यास लिखते समय लेखक अन्य कैसे सोचता है इसके बारे में भी सोचता है लेकिन आत्मकथा में खासकर दलित और स्त्री की आत्मकथा में वह अपनी भाषा में ही सोचता है। निजी और सामाजिक जीवन के अछूते पक्षों को बताते समय उसकी नजर स्वयं पर होती है। वह स्वयं कैसे देखता है उसका ही चित्रण करता है। ऐसा करके लेखक दो काम करता है ,जहां वह अपनी बात कहता है वहीं पाठक के सामने यह स्थितियां पैदा करता है कि वह अन्य के साथ उसकी तुलना करे। अन्य हो सकता है समान हो ,भिन्न हो या उसके साथ अन्तर्विरोध हों।

एक और फिनोमिना है जिस पर ध्यान देना चाहिए कि आत्मकथाओं में अभी हम लेखक या लेखिकाओं की आत्मकथाओं पर ही ध्यान दे रहे हैं,लेकिन जो लेखक और लेखिका नहीं हैं,सामान्य लोग हैं उनकी आत्मकथा की ओर हम ध्यान नहीं दे रहे।

आत्मकथा मूलतः लेखक की सांस्कृतिक क्षति पूर्ति करती है। आत्मकथा के बहाने लेखक-लेखिका ने अपने सामाजिक जीवन में जो सांस्कृतिक क्षति उठायी है उसको वे हासिल करती हैं। वे उन बाधाओं की ओर ध्यान खींचते हैं जिनके कारण उनका विकास बाधित हुआ। मसलन्, दलितों या स्त्रियों या आदिवासी के जीवन में जिन बातों को छिपाया गया, जिस शोषण को छिपाया गया, जिस उत्पीड़न को छिपाया गया उससे उनकी सांस्कृतिक क्षति हुई और वे अपनी आत्मकथा लिखकर इस सांस्कृतिक नुकसान की भर पायी करते हैं।

आज जिस तरह आत्मकथा को सम्मान की नजर से देखा जाता है वह एक तरह से इन लेखकों की सांस्कृतिक क्षति की सामाजिक स्वीकृति है। उनका जो सांस्कृतिक स्थान समाज में छीना गया था उसे वे इसके जरिए हासिल करते हैं। वे अदृश्य थे और अदृश्य होना उनकी क्षति थी, आत्मकथा उनको दृश्य बनाती है, उनकी उपस्थिति का एहसास कराती है और इस तरह वे अपना खोया हुआ स्थान हासिल करते हैं। दलित या स्त्री या आदिवासी का दिखना स्वयं में बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धि है। इसके अलावा आत्मकथा से साहित्य की प्रचलित विधागत मान्यताएं भी टूटती हैं। मसलन् लिंग,भाषा,जातिवाद,धर्म आदि के पूर्वाग्रह टूटते हैं।

आत्मकथा में व्यक्ति के विवरण ही नहीं होते बल्कि उसमें इस धरती या भूगोल का भी ब्यौरा चला आता है। मसलन् एक आदिवासी या दलित जब आत्मकथा लिखता है तो उसके लेखन में निजी जीवन के साथ उसका स्थानीय संसार भी चला आता है। जमीन या कृषि संबंध भी चले आते हैं। हमें देखना चाहिए कि जमीन और घर से लेखक का क्या संबंध है ? आत्मकथा में समय (टाइम) भी चला आता है। यह भी अंदाजा लगा सकते हैं कि उसके कानूनी अधिकार क्या हैं ?

स्त्री और दलित आत्मकथाओं से यह भी पता चलता है कि ये लोग अपने अतीत से कैसे मुक्त हो रहे हैं। इनका अतीत में जाना तीन काम करता है,पहला, स्त्री और दलित के अतीत के यथार्थ को सामने लाता है ,दूसरा, इस यथार्थ से मुक्त करता है।तीसरा, वे जिन चीजों को सबसे ज्यादा प्रतीकात्मक रूप में व्यक्त करते हैं वह है श्रम,श्रम के विविध रूपों के चित्रण के जरिए वे श्रम को जीवन लाइफ लाइन के रूप में चित्रित करते हैं। साथ ही लाइफलाइन के अन्य रूप हैं खेत,कसाईघर,घरेलू काम,बच्चे पालना आदि। इनका चित्रण अंततः प्रतीकात्मक रूप में साहित्य में लाइनलाइन की अभिव्यक्ति है। इसमें जीवन के प्राचीनरूपों से लेकर मध्यकालीन रूपों को सहज ही देखा जा सकता है। इसके कारण आत्मकथा में प्रामाणिकता आती है।

आदिवासी,स्त्री और दलित की आत्मकथाओं में अनेक स्थानों पर इस तरह की लोकल भाषा मिलती है जो आमजीवन में सुनाई नहीं देती ,लेकिन आत्मकथा में है ,वह उनके जीवन में भी है। वहां ऐसे भाषिक प्रयोग मिल जाएंगे जो सामान्य भाषा में इस्तेमाल नहीं किए जाते। इनका विशिष्ट अर्थ है जो दलित या स्त्री के संदर्भ में ही इस्तेमाल किया जाता है। गिली देलुत्ज एवं फेलिक्स गुइतारी ने इसे “ मीनार लैग्वेज” यानी वर्चस्ववादी भाषा कहा है। इसकी इन दोनों आलोचकों ने काफ्का की भाषा के संदर्भ में “ काफ्काः टुवर्ड ए मीनार लिटरेचर ” (1975) में इस अवधारणा की चर्चा की है। यह ऐसी भाषा है जो इडियम की अस्मिता के वर्चस्ववादी रूप को सामने लाती है। इसके आमफहम अर्थ को सामान्य जीवन में खोजना मुश्किल है।फलतः यह मुख्यधारा के विमर्श को पटरी से उतार देती है।

स्त्री ,दलित और आदिवासी अल्पसंख्यक हैं और इसी नाते वे हाशिए पर हैं। ये लोग जब आत्मकथा लिखते हैं तो वे हाशिए की संस्कृति बनाते हैं। आमतौर पर हाशिए के लोगों को गैर-महत्वपूर्ण माना जाता है। यह बार बार कहा गया है कि हाशिए के लोगों का साहित्य मुख्यधारा के साहित्य की कोटि में नहीं आता। साहित्य की कोटि में स्त्रीसाहित्य और दलितसाहित्य नहीं आता। यह ऐसा साहित्य है जिसका अपना क्षेत्र नहीं था, साहित्य में कोई स्थान नहीं था।समाज में कोई स्थान नहीं था। लेकिन यह सीधे राजनीतिक साहित्य है। सवाल यह नहीं है कि स्त्रीसाहित्य या दलित साहित्य को साहित्य में जगह मिली या नहीं ? सवाल यह है कि यह साहित्य पाठक को साहित्य और राजनीति के बारे में सोचने के लिए मजबूर करता है या नहीं ? दलित और स्त्रीसाहित्य की भाषा इसी अर्थ में प्रचलित वर्चस्ववादी भाषा से भिन्न होती है। भिन्न भाषा में ही वे भिन्नसंसार पेश करते हैं। इसे वैकल्पिक भाषा भी कह सकते हैं इसकी समूची रणनीति इस बात से तय होगी कि लेखक, स्त्री और दलित के यथार्थ का कितनी गहराई में जाकर चित्रण करना चाहता है।

रामविलास शर्मा ने “घर की बात” किताब संपादित की है उसमें उनके परिवार के लोगों के बयान हैं। इसे आत्मकथा की कोटि में नहीं रख सकते। इसका प्रधान कारण है कि आत्मकथा वस्तुतः साझा लेखन नहीं है। आत्मकथा व्यक्तिगत लेखन है। एकल लेखन है।

आत्मकथा के अनेकरूप मिलते हैं जो भिन्न भी हैं, जैसे आत्मकथा, आत्मकथात्मक आख्यान, जीवन इतिहास,जीवनी,जीवन परिचय,आत्मकथ्य,इतिहास, स्थानीय इतिहास,वाचिक इतिहास,जनजातीय आत्मकथा और उपन्यास। ये सभी विधारूप स्वतंत्र हैं और किसी न किसी रूप में जुड़े हुए भी हैं।क्योंकि इन सबमें साझा तत्व है निजी जीवनानुभव। इनमें जो भेद है वो प्रच्छन्न और अंतर्वस्तु के स्तर पर है।

मसलन् किसी लेखक की आत्मकथा लिखने के लिए लेखन,भाषण और वाचिक संस्मरणों,जीवनानुभवों का महत्व है। इसमें जीवन के आरंभिक छोटे पक्ष से लेकर बड़े पहलुओं तक सारा संसार फैला हुआ है। एक सवर्ण लेखक की आत्मकथा में व्यक्तिगत जीवन विशिष्ट रूप में आता है,लेकिन स्त्री और दलित की आत्मकथा में निजी अनुभव विशिष्ट हैं और सामुदायिक भी हैं। इसमें वाचिक पृष्ठभूमि और तथ्यों की बड़ी भूमिका होती है।आत्मकथा को लेखक स्वयं लिखता है,जीवनी को अन्य कोई लिखता है। फलतः इनके उत्पादन और श्रवण में अंतर भी है। आत्मकथा क्या है यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी आत्मकथा की अवधारणा क्या है ? किस तरह उसे परिभाषित करते हैं ?

प्रसिद्ध समाजशास्त्री मादाम द स्तेल के शब्दों में आत्मकथा में फ्रेंगमेंटेड यथार्थ विमर्श है। लेकिन रामविलास शर्मा ने आत्मकथा लिखते समय इस नियम का पालन नहीं किया बल्कि जीवनी लेखन के नियमों और संस्मरणशैली का पालन किया है। आत्मकथा में निष्कर्षों से बचा जाता है और पाठ खुला रहता है लेकिन “अपनी धरती अपने लोग” में वे ऐसा नहीं करते। जीवनकथा में लेखक के लिए तथ्य और सत्य की क्रमबद्ध प्रस्तुति महत्वपूर्ण होती है,जबकि आत्मकथा के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है। रामविलास शर्मा अपनी आत्मकथा में कहे हुए को लेकर बेहद सजग हैं, वे समस्त चीजों को एक ही नजरिए से पेश करते हैं।चीजों को एक ही नजरिए से पेश करना आत्मकथा का तत्व है।

एक शिक्षक और एक कम्युनिस्ट के रूप में रामविलास शर्मा के जो अनुभव रहे हैं उनको आत्मकथा में बहुत कम स्थान मिला है।इसका प्रधान कारण है कि एक शिक्षक के बहुत सारे व्यक्तिगत आचरण और अनुभव को कॉलेज-विश्वविद्यालय के लोग शेयर करते हैं अतःउनको बताने की आवश्यकता नहीं पड़ती। दूसरी बात यह भी है अकादमिक जीवन में आम पाठकों की कम दिलचस्पी रहती है इसलिए भी कम लिखा है।

रामविलास शर्मा ने अपनी आत्मकथा को लिखते समय यह बताने की कोशिश की है कि उनके व्यक्तित्व का निर्माण कैसे हुआ? साथ ही प्रगतिशील साहित्य और संस्कृति का हिंदी में सृजन कैसे हुआ ? हिन्दी साहित्य और हिन्दीजाति के विकास की प्रक्रिया क्या है ? ये तीन बातें हैं जिनको वे आत्मकथा के बहाने संप्रेषित करना चाहते हैं। इसमें संस्मरण बिखरे पड़े हैं। वे संस्मरण की शैली में लिखते हैं और सजगता के साथ क्रमबद्धता को बनाए रखते हैं।

हिंदीसमाज,हिंदीजाति और रामविलास शर्मा का 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से गहरा संबंध सामने आता है। 1857 का संदर्भ प्रमुख संदर्भ है। जिसका वे व्यापक इस्तेमाल करते हैं। खासकर अवध का इलाका इन सबकी धुरी है। अवध की संस्कृति और उसका नॉस्टेल्जिया बार बार क्रांति तक के विचार और यूटोपिया को अपदस्थ कर देता है।

आत्मकथा में अनेक लोग हैं जो लेखक के जीवन की सफलताएं पढ़ना चाहते हैं। उनकी सफलताएं एक लेखक की सफलताओं के रूप में आती हैं। इसमें लेखन,साहित्य और राजनीति के व्यापक अनुभवों को पेश किया जाता है। रामविलास शर्मा ने इसी परिप्रेक्ष्य में व्यक्तित्व निर्माण में सफलताओं की कम और कला,राजनीति,दर्शन आदि की बड़ी भूमिका का व्यापक स्तर पर जिक्र किया है। साथ ही एक मार्क्सवादी के स्वप्न व्यक्त हुए हैं। लेखक के रूप में एक आंदोलनकारी लेखक,एक ऐसा लेखक जो विवाद पैदा करे।आलोचना के नए प्रश्नों को उठाए और अपनी जाति पर गर्व करे।

रामविलास शर्मा की आत्मकथा को पढ़कर यह लगता है कि वे मिलते थे सबसे लेकिन प्रभावित वे अपने मन से होते थे। वे अन्य को प्रभावित करते थे। उनकी आत्मकथा में यह तत्व उभरकर कम आया है कि वे किससे प्रभावित हुए अथवा उन पर प्रच्छन्नतः किसका प्रभाव था।

रामविलास शर्मा ने अपनी आत्मकथा को ’टाइप ’ के आधार पर लिखा है। यह इकरंगा टाइप है। रैनेसां के सद गुणों से युक्त व्यक्तित्व इसमें उभरकर सामने आता है। उन्होंने अपने लेखन के जरिए बताया कि हिंदी नवजागरण का साम्राज्यवाद के साथ अंन्तर्विरोध था। हिंदी में प्रतिवादी साहित्य का आरंभ नवजागरण से होता है। यह प्रतिवादी स्वर जितना नवजागरण में नहीं है उससे ज्यादा रामविलास शर्मा के व्यक्तित्व में है। आलोचना में उन्होंने नवजागरण को प्रतिवादी नजरिए से देखने की परंपरा डाली।

रामविलास शर्मा की आत्मकथा और नवजागरण विमर्श में गहरा संबंध है। मसलन् , हिंदी नवजागरण का आरंभ 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से होता है और आत्मकथा में भी 1857 का संदर्भ लाकर वे अपने को इसी परंपरा से जोड़ते हैं। निराला पर जीवनी लिखते समय भी वे यही पद्धति अपनाते हैं। यानी सन् 1857 का संग्राम किसी न किसी रूप में उनके आत्मकथा और जीवनी लेखन में संदर्भ के रूप में प्रस्थान बिंदु बना रहता है। इसका समग्र मॉडल पुंसवादी है।

पुंसवादी मॉडल अपनाते हुए रामविलास शर्मा ने स्वयं को निष्पाप,निष्कलंक और भूलों से रहित मर्द के रूप में पेश किया है। इसमें निजी कम है और सामाजिक ज्यादा है और सब कुछ व्यवस्थित और सुनिश्चित दिशा में पाठक को ले जाने वाला है। तकरीबन इसी शैली में नामवर सिंह ने भी लिखा है। इन दोनों में आत्म की वैधता की पुष्टि का भाव प्रबल है। इन दोनों से सवाल किया जाना चाहिए कि उनके जीवन में किसी स्त्री का प्रभाव पड़ा या नहीं ? उसके विवरण और ब्यौरे कहां हैं ? क्या मर्द लेखक के लिए स्त्री सिर्फ जन्म देने,ब्याह करने अथवा बेटी मात्र के संदर्भ के रूप में जिंदा है ? आश्चर्य की बात है इन दोनों के यहां मैँ,पत्नी और बेटी पर भी न्यूनतम लिखा गया है। औरत की आत्मकथा से एकसिरे से अनुपस्थिति सामाजिक सत्य के साथ पर्दादारी है।

आत्म की अभिव्यक्ति के लिए आत्मकथा लिखी जाती है और अंतमें आत्म पर ही सवाल खड़े करती है। इसे ही पाल दे मान ने ‘डिफेसमेंट’ की संज्ञा दी है। यह व्यक्ति विशेष के सरोकारों का ‘डिफेसमेंट’ है। लेकिन रामविलास शर्मा की आत्मकथा में ऐसा कुछ भी नहीं घटता, बल्कि सब कुछ नियोजित,तर्कपूर्ण और वैध दिशा में घटित होता है। हिंदीसमाज में ‘आत्मगोपन’ का महत्व है। ‘आत्मगोपन’ और ‘गोपन’ से समूचा समाज घिरा हुआ है। यह भाव रामविलास शर्मा और नामवर सिंह तोड़ नहीं पाए हैं।

10 अक्टूबर रामविलास शर्मा के जन्मदिन पर विशेष - अस्मिता,आत्मकथा , हिन्दी जाति और रामविलास शर्मा (1)


हिन्दी साहित्य में रामविलास शर्मा अस्मिता विमर्श के सबसे बड़े आलोचक हैं। हिन्दी में अस्मिता विमर्श स्त्रीसाहित्य और दलित साहित्य से आरंभ नहीं होता बल्कि रामविलास शर्मा के हिन्दी जाति विमर्श से आरंभ होता है। हिन्दी जाति की अवधारणा अस्मिता विमर्श का हिस्सा है और इस पर कोई बहस अस्मिता साहित्य के परिप्रेक्ष्य में ही की जानी चाहिए। एक अन्य चीज समाजवादी पहचान की खोज का क्षेत्र भी इसके दायरे में आता है। रामविलास शर्मा ने समाजवाद के पक्ष में जो कुछ भी लिखा है वह भी मूलतःअस्मिता विमर्श के परिप्रेक्ष्य में लिखा है। वे वर्ग की अवधारणा के आधार सोचते हैं इससे यह समझ बनती है कि वे मार्क्सवादी हैं ,लेकिन इस प्रसंग में हम याद रखें कि वे वर्ग को अस्मिता के रूप में ही पेश करते हैं।कायदे से अस्मिता पर नहीं “अस्मिता साहित्य” की अवधारणा पर विचार करना चाहिए। इससे अस्मिता विमर्श पर समग्रता में विचार करने में सुविधा होगी। इससे नए पैदा हुए निजी और सार्वजनिक स्पेस को परिभाषित करने में मदद मिलेगी। 

आत्मकथा- 


 आत्मकथा इन दिनों फैशन में है। इसने पाठकों में 'अन्य 'के जीवन को जानने का आब्शेसन भी पैदा किया है। यह प्रवृत्ति टीवी से आई है। यह टेलीविजन का प्रधान ‘फ्लो’ है। एक जमाना था आत्मकथा को साहित्य में महत्व नहीं देते थे। आत्मकथा के केन्द्र में आने का प्रधान कारण है आमलोगों की 'अन्य' के निजी जीवन में बढ़ती दिलचस्पी।

'अन्य' के निजी जीवन में संचारक्रांति के बाद तेजी से दिलचस्पी बढी है। संचारक्रांति प्राइवेसी को महत्वपूर्ण विषय बनाती है। प्राइवेसी जानने के लिए लोग आत्मकथाओं को खोज-खोजकर पढ़ रहे हैं। पाठकों से लेकर आलोचकों तक सबकी दिलचस्पी इसके विधारूप में नहीं है, बल्कि 'अन्य ' के निजी जीवन के गुप्त पहलुओं को जानने में है। यहां तक कि टेलीविजन पर चल रहे धारावाहिकों को रियलिटी टीवी ने काफी पीछे छोड़ दिया है। आत्मकथा की निजी आख्यानशैली पद्धति अपील कर रही है। इसके कारण कई आत्मकथा केन्द्रित धारावाहिक बेहद जनप्रिय रहे हैं।

खबरों से लेकर अन्य टीवी कार्यक्रमों में व्यक्तिगत विवरण और ब्यौरों के कार्यक्रमों में आम लोग खूब दिलचस्पी ले रहे हैं। यहां तक कि चैट शो में भी आत्मस्वीकारोक्तियां खूब आ रही हैं। ये चीजें कितनी बिखरी,सनसनीखेज और यहां तक कि क्रूरतापूर्ण है,इसमें किसी की दिलचस्पी नहीं है। ‘सच का सामना’ जैसे धारावाहिक में इसे देख सकते हैं। यहां पॉलीग्राफिक टेस्ट के जरिए व्यक्ति के सच -झूठ को खोजने की कोशिश की जाती है। इस कार्यक्रम का समूचा फॉरमेट अमेरिकी टीवी सीरियल ‘मूवमेंट ऑफ ट्रूथ’ से लिया गया है। इसमें व्यक्ति से निजी सवाल किए जाते हैं,पहले पॉलीग्राफिक टेस्ट लिया जाता है फिर दर्शकों के सामने बिठाकर वे ही सवाल किए जाते हैं और उनके उत्तर हासिल किए जाते हैं। 'अन्य' के निजी जीवन में बढ़ती दिलचस्पी बढ़ने एक अन्य कारक है ब्लॉगिंग और फेसबुक(सोशलमीडिया) ।

अस्मिता साहित्य लोकतंत्र की देन है। लोकतंत्र के विकास के साथ अस्मिता विमर्श जुड़ा है। अस्मिता की राजनीति का सबसे बड़ा उभार तब सामने आता है जब भारत में आपातकाल की समाप्ति होती है। लोकतंत्र के प्रति पहले से भी ज्यादा पुख्ता संबंध और संपर्क बनते हैं। लोकतंत्र के पुख्ता होने के साथ हाशिए पर पड़े समूह एकत्रित होते हैं, अपनी पहचान स्थापित करते हैं, अपने लिए सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक स्पेस की मांग करते हैं। पुराने किस्म का सामुदायिक या सामाजिकबोध अधूरा प्रतीत होता है। फलतः हाशिए के लोग नए किस्म की सामुदायिकता की हिमायत करते हैं। सामुदायिकता के नए पैरामीटर बनते हैं।

अस्मिता साहित्य और राजनीति में व्यक्ति का उत्पीड़न एक बड़ा विषय है। व्यक्ति के उत्पीड़न को ज्यादा से ज्यादा प्रामाणिक बनाकर पेश करने की ओर भी आम लेखकों का ध्यान गया । खासकर दलित लेखकों ने इस दिशा में काम किया।इस क्रम में अनेक दलित लेखकों और स्त्रीलेखिकाओं के निजी अनुभव सामने आए हैं। दलितों और स्त्रियों के अनुभवों में साझा तत्व है पितृसत्ता का उत्पीडन,अनुशासन और वर्चस्व।

इससे सबसे भिन्न रामविलास शर्मा के लेखन में अस्मिता विमर्श को मार्क्सवादी नजरिए से देखा गया है। वे वर्गीय नजरिए से जातिप्रथा पर विचार करते हैं। इस प्रसंग में उनकी दो किताबें खासतौर पर उल्लेखनीय हैं। पहली है 'इतिहास दर्शन' (1995) और दूसरी है 'गाँधी ,आम्बेडकर,लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएँ' ( 2000) । इन दोनों किताबों में उन्होंने अस्मिता के सवाल पर जातिप्रथा और उससे जुड़े सवालों पर वर्गीय नजरिए से विचार किया है।इसके अलावा उन्होंने कई साक्षात्कारों में भी अपनी राय व्यक्त की है।

इसके अलावा “भाषा और समाज” नामक किताब हिन्दी जाति की अवधारणा के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। साहित्य में पहले आत्मकथा पर विधा के रूप में ध्यान नहीं गया। उस पर बहुत कम लिखा गया। लेकिन हिन्दी में इस फिनोमिना को 1990 के बाद जनप्रियता मिली। इस क्रम में साहित्य के ढ़ाँचे में परिवर्तन आया। कम से कम यह कह सकते हैं रामविलास शर्मा ने आत्मकथा और जीवनी इन दोनों ही विधारूपों के निर्माण करके एक तरह सबको रास्ता दिखाया। रामविलास शर्मा ने सबसे पहले निराला की “साहित्य साधना” (1969) में जीवनकथा में निराला के निजी अनजाने पहलुओं का उदघाटन करने के साथ निजी पत्रों को भी शामिल किया। इसका दूसरा और तीसरा खंड़ 1972 में प्रकाशित किया। इसी तरह “घर की बात” ( 1983) के रूप में संपादित पुस्तक प्रकाशित की जिसमें अपने परिवार के अन्य लोगों के उनके बारे में लिखे निजी अनुभवों को शामिल किया गया है। संभवतः यह हिंदी में किस पुरूष लेखक के निजी विवरण और ब्यौरों को पेश करने का पहला प्रयास है। इसी तरह “बड़े भाई” के नाम से 1986 में संपादित किताब आई। बाद में आत्मकथा के रूप में “अपनी धरती अपने लोग” (1996) का तीन खंड़ों में प्रकाशन हुआ।

अस्मिता और जाति-

रामविलास शर्मा ने लिखा है कि जातिप्रथा सिर्फ भारत की ही विशेषता नहीं है वह दुनिया के अन्य देशों में भी है। जिस तरह वह प्राचीनकाल में भारत में थी,वैसे ही यूनान में भी थी। रामविलास शर्मा ने लिखा है 'यूनानी दार्शनिक प्लैटो की रचना रिपब्लिक (गणतंत्र) से भारतीय इतिहास के विवेचकों में गहरी दिलचस्पी होनी चाहिए। यह ऐसी किताब है जिसमें आदर्श समाजव्यवस्था कायम करने के लिए जातिप्रथा को आधार बनाया गया है।'

आमतौर पर अस्मिता साहित्य पर जब भी बात होती है तो उस पर हमें बार-बार बाबासाहेब आम्बेडकर के विचारों का स्मरण आता है। दलित लेखक अपने तरीके से दलित अस्मिता की रक्षा के नाम पर बाबा साहेब के विचारों का प्रयोग करते हैं। दलित लेखकों ने जिन सवालों को उठाया है उन पर बड़ी ही शिद्दत के साथ विचार करने की आवश्यकता है।

आम्बेडकर-ज्योतिबा फुले का महान योगदान है कि उन्होंने दलित को सामाजिक विमर्श और सामाजिक मुक्ति का प्रधान विषय बनाया।अस्मिता विमर्श का एक छोर महाराष्ट्र के दलित आंदोलन और उसकी सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से जुड़ा है ,दूसरा छोर यू.पी-बिहार की दलित राजनीति और सांस्कृतिक प्रक्रिया से जुड़ा है। अस्मिता विमर्श का तीसरा आयाम मासमीडिया और मासकल्चर के राष्ट्रव्यापी उभार से जुड़ा है। इन तीनों आयामों को मद्देनजर रखते हुए अस्मिता की राजनीति और अस्मिता साहित्य के विभिन्न पक्षों पर विचार करने की जरूरत है।

अस्मिता के सवाल आधुनिकयुग की देन हैं। आधुनिक युग के पहले अस्मिता की धारणा का जन्म नहीं होता। आधुनिककाल आने के साथ व्यक्तिगत को सामाजिक करने और अपने अतीत को जानने-खोजने का जो सिलसिला आरंभ हुआ उसने अस्मिता विमर्श को संभव बनाया।

अस्मिता राजनीति में विगत 150 सालों में व्यापक परिवर्तन हुए हैं।खासकर नव्य आर्थिक उदारीकरण और उपग्रह मीडिया प्रसारण आने बाद परिवर्तनों का सिलसिला तेज हुआ है। उत्तर आधुनिकतावाद आने के साथ सारी दुनिया में उत्तर आधुनिक अस्मिता की धारणा का तो बबंडर ही चल निकला। मसलन् अस्मिता निर्माण के उपकरणों के रूप में मोबाइल,आई पोड,मर्दानगी आदि पर जमकर चर्चाएं हो रही हैं।

उत्तर आधुनिकता के साथ आई अस्मिता ने सेल्फ (निज ) के तरल, विखंडित, विश्रृंखलित,अ-केन्द्रित, अवसादमय, वर्णशंकर और वायवीय रूपों को जन्म दिया है। उत्तर आधुनिक अस्मिता का अर्थ है तर्क,सत्य,प्रगति और सार्वभौम स्वतंत्रता वाले आधुनिक आख्यान का अंत। इन दिनों अस्मिता के छोटे छोटे आख्यान केन्द्र में आ गए हैं। स्त्री से लेकर दलित तक,भाषा से लेकर संस्कृति तक,साम्प्रदायिकता, पृथकतावाद, राष्ट्रवाद आदि तक अस्मिता के लघुप्रश्न केन्द्र में हैं।

अस्मिता का एक आयाम उपेक्षित रहा है वह है व्यक्तिवाद ।इसके कई रूप प्रचलन में हैं इनमें पहला रूप वह है जो स्वयं रामविलास शर्मा की आत्मकथा ' अपनी धरती अपने लोग' और 'निराला की साहित्य साधना' में व्यक्त हुआ है। इन दोनों किताबों में लेखक के निर्माण की सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया का विस्तार से विवेचन मिलता है। रामविलास शर्मा इन किताबों में लेखक की निजी पहचान तक सीमित रखते हैं। लेखक के निजी व्यक्तित्व की शक्ति को व्यक्तिवादी ढ़ंग से रेखांकित करते हैं।

यह ऐसा लेखकव्यक्तित्व है जो एक ओर सामाजिकता से बंधा है तो दूसरी ओर निजी व्यक्तिवादी नैतिकता से बंधा है। यह ऐसा व्यक्ति है जो सामाजिक तथ्यों की पुष्टि करता है। इन दोनों किताबों में 'निजी' और 'ऐतिहासिक' तत्वों के सहमेल से लेखकद्वय के व्यक्तित्व का निर्माण किया गया है। साथ ही इन दोनों किताबों में लेखकद्वय के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने वाले ऐतिहासिक,सांस्कृतिक,आर्थिक कारकों का व्यापक विवेचन किया है।

लेखकद्वय की आत्मकथा-जीवनी में जिस व्यक्तिवाद को विकसित किया है वह स्थानीय लेखकों-संबंधियों-मित्रों-लेखकों –राजनेताओं-शिक्षकों आदि के संपर्कों से बना है। इनमें राजनीतिक वर्चस्व के रूपों का जिक्र भी चला आया है। साथ ही इसमें जो व्यक्तिवाद दिखाई देता है वह विचारधारात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।यह ऐसा व्यक्तिवाद है जो छोटे शहरों में पला और बढ़ा है ।परंपरा की पकड़ से बाहर है।इन दोनों में रामविलास शर्मा और निराला दोनों ही गैर-परंपरागत और आधुनिक नजर आते हैं।

लेखकद्वय का व्यक्तिवाद पैसे के नियंत्रण से मुक्त है। दोनों की संचालकशक्ति पैसा और धर्म नहीं है। दोनों के यहां 'निजी' या 'आत्म' महत्वपूर्ण है। दोनों के ही 'आत्म' से जुड़े मुद्दे ही केन्द्र में हैं। यह ऐसा व्यक्ति है जो अपने व्यक्तित्व का स्वयं निर्माता है। हंसी-खुशी,सुख-दुख आदि का वह स्वयं सर्जक है। लेखकद्वय की विशेषता है कि वे अपने निजी व्यक्तित्व की विशेषताओं को नहीं खोते। दोनों में 'इगो' की समस्या है। यह ऐसा व्यक्ति है जो अपनी स्वाधीनता का भरपूर इस्तेमाल करता है। 'निराला की साहित्य साधना' में निराला की इमोशनल कमजोरियों का व्यापक जिक्र है। जबकि रामविलास शर्मा की आत्मकथा में इमोशनल कमजोरियां एकसिरे से गायब हैं।

लेखकद्वय अपने- अपने तरीके से आभामंडल बनाते हैं। रामविलास जी ने सचेत ढ़ंग से इन दोनों किताबों में मेनीपुलेशन की तकनीक का इस्तेमाल करते हुए दोनों में ही खास किस्म की साहित्यचेतना को रेखांकित किया है। खासकर रामविलास शर्मा की साहित्यचेतना को सुनियोजित ढ़ंग से प्रगतिवाद की संगति और प्रगतिशील मूल्यों की संगति में निर्मित किया है। दोनों किताबों में व्यक्तित्व निर्माण के ग्लोबल राजनीतिक तत्वों का इस्तेमाल किया है। खासकर लेखन में अंतर्राष्ट्रीय-राष्ट्रीय प्रभावों को सहज ही देखा जा सकता है।

व्यक्ति किस तरह बनता है और वह विचारों को कैसे निर्मित करता है ? उसका सामाजिक-निजी जीवन कैसा है ? इसे हम व्यक्तियों के बहाने प्राचीन ग्रीस-यूनान से लेकर भारत के हिन्दीभाषीक्षेत्र तक फैले व्यापक फलक पर रखकर देख सकते हैं। जिन लेखकों-विचारकों पर रामविलास शर्मा ने किताबें लिखी हैं , वे हैं, निराला,प्रेमचन्द्र, रामचन्द्र शुक्ल,महावीरप्रसाद द्विवेदी ,गांधी,आम्बेडकर,लोहिया,हेगेल.मार्क्स ,सुकरात, अरस्तू,प्लेटो आदि । इन सभी किताबों में रामविलास शर्मा ने जिस उपकरण का इस्तेमाल किया है वह है इन लेखकों का 'तार्किक सोच' और उसके आसपास बन रही 'सर्वसम्मति'।

'तार्किक सोच' और 'सर्वसम्मति' के आधार पर ही इन लेखकों के विचारधारात्मक संघर्ष और वैचारिक परिवेश की मीमांसा पेश की है। इस पूरे प्रसंग में जिस चीज को रामविलास शर्मा सबसे ज्यादा उभारते हैं वह है सार्वजनिक परिवेश। सार्वजनिक परिवेश के व्यापक चित्रों को पेश करके वे असल में बुर्जुआ विचारधारा के विस्तार का काम करते हैं।

बुर्जुआ विचारधारा का मूल मकसद है व्यक्ति के सार्वजनिक परिवेश का विस्तार। विगत 100 सालों में व्यक्ति के निजी और सार्वजनिक परिवेश में गुणात्मक परिवर्तन हुआ है। सार्वजनिक परिवेश का विस्तार हुआ है। रामविलास शर्मा ने सार्वजनिक परिवेश(पब्लिक स्पेयर) के विस्तार के काम को एक ऐसे समय में विस्तार से पेश किया है जबकि चारों ओर से सार्वजनिक परिवेश को संकुचित करने के लिए ग्लोबल दबाब आ रहे थे।

खासकर टेलीविजन आने के बाद निजी और सार्वजनिक परिवेश,खासकर नागरिक संपर्क-संबंध कमजोर हुए हैं। जेनुइन राजनीतिक बहसों और नागरिक गोलबंदी का ह्रास हुआ है। टेलीविजन पर आने वाले चैट शो कुल मिलाकर नियोजित बहस के रूप हैं। ये सार्वजनिक परिवेश को निर्मित नहीं करते। क्योंकि ये नियोजन और नियमन के जरिए आते हैं। जब कि व्यक्ति के निजी परिवेश का सांस्थानिक औपनिवेशिकीकरण कर दिया गया है। यही वह परिवेश है जिसमें रामविलास शर्मा ने विभिन्न व्यक्तित्वों ,लेखकों और विचारकों के बहाने नए सिरे से निजी और सार्वजनिक परिवेश को परिभाषित करने की कोशिश की है।

अस्मिता,व्यक्तिवाद और सार्वजनिक परिवेश-

अस्मिता,व्यक्तिवाद और सार्वजनिक परिवेश के अन्तस्संबंध को रामविलास शर्मा ने अपनी प्रसिद्ध कृति 'इतिहास दर्शन'(1995)में सुंदर ढ़ंग से पेश किया है। मसलन् सुकरात से आरंभ करते हैं और पहला ही उपशीर्षक देते हैं 'समाज व्यवस्था से दर्शनशास्त्र की टक्कर'। सुकरात पर आरोप था कि वह अपने विचारों से नौजवानों को गुमराह करते हैँ। इसीलिए उनको प्राणदंड दिया गया था। सुकरात को जिस समय यह सजा दी गयी वे सत्तर साल की उम्र पार कर चुके थे। उन्होंने न्यायकर्ताओं की सभा में कहा था कि अभियोग लगाने वाले कुछ दिन सब्र करते तो वह वैसे ही विदा हो जाते।पर सुकरात के रूप में उन्हें ऐसा खतरा दीख रहा था कि वे सब्र करने को तैयार नहीं थे।

सवाल उठता है वे कौन लोग थे जो सुकरात की जान लेने पर तुले हुए थे ? सुकरात ऐसा क्या कहते थे जिससे इन लोगों की समझ में नौजवान गुमराह हुए जा रहे थे ? गुमराह हुए जा रहे थे तो ऐसा कौन सा संकट पैदा हो गया था कि उनकी जान लिये बिना काम न चलता ?

सुकरात के विचारों की ओर नौजवान इसलिए आकर्षित होते थे क्योंकि वे धार्मिक रूढ़िवाद को चुनौती देते थे।सुकरात पर अभियोग था कि वह नौजवानों को भ्रष्ट करते हैं,जिन देवताओं को नगरवासी मानते हैं, उन्हें वे नहीं मानते,उनके बदले वे अन्य देवताओं पर विश्वास करते हैं। सुकरात ने इन आरोपों को निराधार बताया।

सुकरात की खूबी क्या थी ? वे देवताओं के बारे में मनुष्यों की परंपरागत धारणाओं को चुनौती दे रहे थे। ये धारणाएँ उनके लिए उपयोगी थीं जो अवकाशभोगी थे,जो दूसरों के अंधविश्वासों से लाभ उठाकर उनका श्रम हड़प जाते थे। असल में सुकरात की विशेषता थी कि वे प्रचलित विश्वासों के प्रति शंका प्रकट करते थे। यानी सुकरात के मार्ग पर चलने के लिए क्या करें ? एक ही उत्तर है प्रचलित विश्वासों के प्रति शंका प्रकट करें।

यूनान में जमींदारों और सूदखोरों का मानना था कि लोग सामाजिक नियमों को विधान मानकर उनके अनुसार काम करते रहें ,क्या न्याय है ,क्या अन्याय है,कौन –से नियम न्यायपूर्ण हैं,कौन-से अन्यायपूर्ण,इसके बारे में जांच-पड़ताल न करें। लेकिन सुकरात ने यहीं से काम आरंभ किया था। सुकरात देवकथाओं पर आँखें बंद करके विश्वास नहीं करते थे। बल्कि नए सिरे से अनुसंधान करते थे।

सुकरात हर चीज पर शंका करते थे,सवाल खड़े करते थे। इसी तरह यूनान में एक शिक्षकों का समूह भी था जिसे सोफिस्तेस या अंग्रेजी में सौफिस्ट कहते थे।ये लोग फीस लेकर धनी परिवारों के युवाओं को शिक्षा देते थे। विशेष रूप से उन्हें तर्क-विद्या सिखाते थे। सुकरात को फीस देकर शिक्षा देना पसंद न था;इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह कि तर्क-वितर्क कौशल की अपेक्षा वह मनुष्य का सदाचारी और सच्चरित्र होना अधिक महत्वपूर्ण मानते थे। सौफिस्टों की खूबी थी कि उन्होंने लोगों की तर्क-बुद्धि जगायी थी। प्रचलित मान्यताओं को परखना सिखाया था। वे व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन के सूत्रधार थे। सुकरात इन्हीं की परंपरा में आते थे। इनके प्रयासों के कारण स्वतंत्र चिंतन और व्यक्तिगत विवेक के जरिए आप्त वाक्यों को अपदस्थ किया। उल्लेखनीय है तर्क-विद्या में सुकरात ने सौफिस्टों से आगे जाकर मानक बनाए हैं।

रामविलास शर्मा ने लिखा है यूनान के दर्शनकार,सौफिस्ट और सुकरात ये तीनों एक ही सांस्कृतिक आंदोलन का अंग हैं। इन तीनों की साझा विशेषता है संसार के बारे में प्रचलित धारणाओं को चुनौती देना। सुकरात की एक अन्य विशेषता थी कि वे हर चीज की व्याख्या करते थे।सौफिस्ट की खूबी थी वे नैतिक और राजनैतिक प्रश्नों की चर्चा करके चुप हो जाते थे वहीं सुकरात का उद्देश्य था लोगों को सुधारना।

रामविलास शर्मा ने लिखा है, ' सुकरात लोगों को सुधारने पर तुले हुए थे,संपत्तिशाली लोग सुधरने को तैयार न थे। सुकरात ,जनता के बीच ,बाजार हाट में उनकी आलोचना करते थे। अब तक के तर्कशास्त्री न्याय,शासनतंत्र आदि की व्याख्या करके संतुष्ट हो जाते थे,सुकरात लोगों को सुधारना चाहते थे। व्यवस्था को बदले बिना लोगों को सुधारा न जा सकता था. सरकार बदलने से काम चलने वाला न था। जमींदारी गुट का शासन हो,लोकतंत्र हो,सुकरात की टक्कर दोनों से थी क्योंकि उनकी आलोचना का लक्ष्य संपत्तिशाली वर्गों वाली समाजव्यवस्था थी।'

रामविलास शर्मा ने लिखा है 'सुकरात धाय के पुत्र थे। वह अपनी तर्क विद्या की तुलना धाय के कौशल से करते थे।धाय स्वयं बच्चा नहीं जनती,बच्चा जनने में दूसरों की सहायता करती है ।सुकरात कहते थे,ज्ञान के मामले में मैं बाँझ हूँ,देवता मुझे धाय का काम करने को बाध्य करते हैं ,उसने मुझे कभी बच्चा जनने नहीं दिया। अर्थात् सुकरात के पास कोई विचारों का खजाना नहीं है, वह तो दूसरों के दिमाग से निकलवाते हैं। सुकरात का मानना था कि दवा खिलाकर, मंत्र पढ़कर धाय गर्भवती के पेट में दर्द पैदा करती है जिससे प्रजनन संभव होता है। सुकरात के लिए कहा जा सकता था कि वह लोगों को अज्ञान का एहसास कराके इसी तरह उनके मन में दर्द पैदा करते थे।यूनान में धाय युवकों और युवतियों में उपयुक्त जोड़े ढूँढकर उनका विवाह संबंध भी निश्चित कराती थी।सुकरात का कहना था, मैं तो आदमी को परखने के बाद उसे ज्ञानी के पास ले जाकर छोड़ देता हूँ।'

सुकरात की विशेषता थी वे सामान्य जीवन के उदाहरणों के जरिए अपनी बात समझाते थे। उनकी बातचीत में हमेशा मोचियों,लद्दू गधों,लुहारों,चमड़ा बनाने वालों आदि का जिक्र रहता था। वे ज्ञान की परख की निगाह से देखते थे।  आमतौर पर अपने बयानों में कारीगरों के अनुभवों का इस्तेमाल करते थे। यही वजह है कि उनसे जो भी बात करता था कारीगरों से स्वतः ही तादात्म्य स्थापित कर लेता था। गोर्गिअस की शब्दावली " तुम्हारे कारीगरों " में इसी तादात्म्य की झलक मिलती है।

सुकरात ने इसी झलक को उजागर करते हुए कहा, थेमिस्तोक्लेस के बारे में, हमें बताया गया है ; जहाँ तक पेरिक्लेस का संबंध है, "जब वह मध्य प्राचीर के बारे में हमें सलाह दे रहे थे ,तब मैंने स्वयं उन्हें सुना था।" सुकरात या तो कारीगरों के साथ खुद काम कर रहे थे या जहाँ काम हो रहा था,वहाँ खड़े सब कुछ देख सुन रहे थे।

सुकरात की दृष्टि में वक्तृत्व कला लोगों को प्रभावित करने की कला है। ' गोर्गिअस अपनी कला के प्रति आश्वस्त होकर कहते हैं,वक्तृत्व कला में जो व्यक्ति कुशल है,वह सभा को प्रभावित करके स्वयं को किसी भी पेशे के लिए नियुक्त करा सकता है;वह किसी भी प्रश्न पर , किसी के भी विरूद्ध ,इस ढंग से बोल सकता है कि बहुमत उसके पक्ष में हो जाये। सुकरात के लिए यह सिद्ध करना कठिन नहीं है कि वह बहुमत अज्ञानियों का होगा।इन्हें प्रभावित करने की कला मूल्यवान हो तो किसी चीज का वास्तविक ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक न होगा; लोगों को प्रभावित कर लेना काफी होगा कि तुम्हारे पास इतना ज्ञान है ? सुकरात के अनुसार वक्तृत्वकला लोगों को खुश करने की कला है। बावर्ची ऐसा खाना पका सकता है जिससे खाने वाला खुश हो जाये पर वह उसके उपयुक्त है या अनुपयुक्त,यह तो वैद्य बता सकता है,बावर्ची नहीं।'

रामविलास शर्मा ने सुकरात के बहाने आधुनिक भारत के लिए उपयुक्त सार्वजनिक जीवन की परिकल्पना को रेखांकित किया है। इसके बहाने वे हमारे देश के सार्वजनिक स्पेयर या सार्वजनिक परिवेश को पुनर्परिभाषित करते हैं। उन्होंने लिखा है , ' सुकरात यदि लोकतंत्र के शासकों से संतुष्ट नहीं थे तो वे निरंकुश शासकों से और भी क्षुब्ध थे।वक्तृत्व कला के पक्ष में एक और बात कही गयी थी कि जिसके पास यह कला होती है,वह निरंकुश शासकों जैसा शक्तिशाली होता है।इस सिलसिले में मख़दूनिया के शासक आर्खिलाऑस का उदाहरण दिया जाता था। उसने वैध उत्तराधिकारी को मारकर राज्य पर अधिकार किया था। गद्दी पर बैठने के बाद उसने एथेन्स के अनेक संभ्रांत नागरिकों को आमंत्रित किया। और लोग गये,सुकरात ने उसके यहाँ जाने से इन्कार कर दिया। सुकरात का कहना था,सदाचारी का जीवन अच्छा है,भले ही उसमें कष्ट सहना पड़े। जिस व्यक्ति में दुर्गुण हों और वह उनसे मुक्त न हो सके, उसका जीवन सबसे खराब मानना चाहिए।'

आधुनिककाल में फासिस्ट,भ्रष्ट ,अपराधकर्मी और आततायी शासकों और व्यक्तियों के पक्ष में तरह तरह के तर्क दिए जाते हैं और उनका बड़े सलीके से मीडिया से लेकर साहित्य तक प्रचार किया जाता है। इन सबकी बड़ी तीखी आलोचना सुकरात के लेखन में मिलती है।सुकरात का मानना था भला और सदाचारी आदमी सुखी होता है,दुष्ट और अन्यायी नहीं।

वंशगत श्रेष्ठता और उसके आधार पर प्रशंसा को सुकरात एकदम पसंद नहीं करते थे। अभिजात वंश के लोगों में यह बीमारी है कि वंशगत आधार पर प्रशंसा करते हैं और चाहते हैं कि इसी आधार पर लोग उनकी प्रशंसा करें। भारत में यह बीमारी जातिगत आधार पर प्रशंसा में रूपान्तरित हो गई है। जातिगत महापुरूषों या पुरखों के आधार पर प्रशंसा करते हैं। सुकरात को यह सब नापसंद था। ऐसी प्रशंसा को सुकरात संकुचित दृष्टिकोण मानते थे।

फंडामेंटलिस्ट जिस तरह इन दिनों आक्रामक हुए हैं उसके खिलाफ रामविलास शर्मा में आक्रोश रहा है। फंडामेंटलिज्म किस तरह का वातावरण बनाता है ,और हमें क्या करना चाहिए। इसकी ओर रामविलास शर्मा ने सुकरात के बहाने ध्यान खींचा है।पुराने अभिजात और नए अभिजातवर्ग का फंडामेंटलिज्म से याराना है। उन्होंने लिखा है-

' अरिस्तोफनेस की नाटिका से सुकरात के प्रति इस वर्ग के शत्रुभाव की तीव्रता का अनुमान हो सकता है।किसान सुकरात से तर्क-विद्या सीखने गया था, अंत में वह समझ गया कि इस विद्या के सहारे उसका पुत्र उसे मारेगा। सुकरात नास्तिक है ,उसे अपने अपराध का दंड मिलना चाहिए। किसान कहता है, " मैं भी कैसा पागल था।सुकरात के बहकावे में आ गया कि देवता नहीं हैं। ... इन्हें कचहरी अदालत ले जाने की बात सोचना बेकार था। मैं सीधे जाकर दुष्टों की पाठशाला में आग लगा देता हूँ। " वह छत पर चढ़कर आग लगाता है। एक छात्र कहता है; "तुम हमें जिन्दा जला दोगे !" किसान कहता हैः '' मैं ठीक यही करना चाहता हूँ यदि मेरे औजारों ने दगा न की और यदि पहले ही गिरकर मैंने अपनी गर्दन न तोड़ ली ।" सुकरात कहते हैः" तुम यहाँ छत पर क्या कर रहे हो ?" किसान कहता हैः" मैं हवा पर चल रहा हूँ और सूर्य का रहस्य भेद रहा हूँ।" उस किसान के अनुसार तत्ववादी दार्शनिक नास्तिक थे,सुकरात नास्तिक थे।इन्हें अदालत ले जाना बेकार है। सीधे इनके घर में आग लगानी चाहिए। "

" धुएँ में लोगों का दम घुटने लगता है,वे पाठशाला से भागने लगते हैं।किसान कहता है, " किये का फल ही पा रहे हो । जो लोग देवताओं को ठेंगा दिखाते हैं,तर्क करते हैं,चंद्रमा के दूसरी ओर क्या है ,वे इसकी कीमत चुकायेंगे।" इसके बाद सुकरात के लात मारता है। फिर लोगों से कहता है, "टूट पड़ो इन पर, उठाओ पत्थर !" पत्थरों की बौछार सहते हुए सुकरात और उनके साथी भागते हैं।किसान चिल्लाता है,"बदला लो ! देवताओं के अपमान का बदला लो ! इनकी करनी को याद करो ! बदला लो !"

इस पर रामविलास शर्मा ने लिखा है , 'कचहरी अदालत की जरूरत नहीं,पत्थर मारो और आग लगाओ, देवताओं के अपमान का बदला लो-अनेक युगों में अनेक प्रकार के प्रतिक्रियावादियों की ऐसी हरकतों से पाठक परिचित होंगे।विशेष रूप से नवस्वाधीन और पिछड़े हुए देशों में संप्रदायवादी नेता प्रगतिशील विचारकों के विरूद्ध ऐसा उन्माद उभारते हैं।'

रामविलास शर्मा ने लिखा है 'सुकरात तो धाय का काम करते थे ,जो दूसरे के मन में है पर जिसे वह जानता नहीं है,उसे बाहर निकलवाते थे।ज्ञानी होने का दंभ उन्हें नहीं था,जिन्हें ऐसा दंभ था,उनसे जिरह करने की बीमारी उन्हें जरूर थी।इस बीमारी को देवप्रेरित अवश्य मानते थे।अंतःकरण की भूमिका इतनी ही थी।जहाँ जितना भी सत्य वह उद्घाटित करते थे,वहाँ उसका आधार साधारणजनों का सामान्य अनुभव ही होता था,किसी व्यक्ति का विशिष्ट अनुभव नहीं।' (क्रमशः)



सोमवार, 8 अक्तूबर 2012

सिनेमाभाषा के नायक हैं अमिताभ


अमूमन अभिताभ बच्चन की अभिनयकला पर कम उनके संवाद शैली पर ज्यादा बातें होती हैं। इसी तरह कंटेंट में एंग्री यंगमैन प्रमुख है। एंग्री यंगमैन से लेकर कौन बनेगा करोड़पति तक अमिताभ की साझा इमेज की धुरी है रीयल हिन्दी भाषा। एंग्री यंगमैन की इमेज को उन्होंने विगत 20 सालों में सचेत रूप से बदला है और कन्वेंशनल पात्रों की भूमिका निभायी है। कन्वेंशनल चरित्रों वे संरक्षक-अभिभावक के रूप में सामने आए।यह एंग्रीयंग मैन की बागी इमेज से एकदम उलट इमेज है। वहीं पर कौन बनेगा करोड़पति में उनका व्यक्तित्व इन दोनों से भिन्न नजर आता। इसमें अमिताभ बच्चन उदार मित्र के रूप में सामने आते हैं यह ऐसा उदार व्यक्ति है जिसके लिबरल विचारों और हाव-भाव को सहजता के साथ महसूस कर सकते हैं।एंग्री यंगमैन को पीड़ितजन,कन्वेंशनल को परंपरागत लोग और कौन बनेगा करोड़पति की इमेज को युवा और औरतें बेहद पसंद करते हैं।कौन बनेगा करोड़पति में वे एंग्रीमैन एवं कन्वेंशनल चरित्र की इमेजों से भिन्न नजर आते हैं। 

असल में इन तीनों में साझा तत्व है उनकी बेहतर संवादशैली और हिन्दी भाषा पर अद्भुत मास्टरी।हिन्दी भाषा और संवादशैली के बिना अमिताभ बच्चन की कोई निजी पहचान नहीं बनती। अमिताभ ने अन्य भारतीय भाषाओं में भी फिल्में की हैं लेकिन पहचान हिन्दी फिल्मों से बनी है।

अमिताभ को एक आइकॉन के रूप में देखेंगे तो वे इस क्रम में वे तीन काम करते हैं प्रथम, वे एक आइकॉन के रूप में अपनी इमेज बनाते हैं,इसमें वे अपने अभिनय के जरिए श्रोता-दर्शक से एकीकरण करते हैं ,उसकी अनुभूतियों को स्पर्श करते हैं। दर्शक जब उनको देखता है तो उसके दिमाग में पहले से उनकी इमेज रहती है। दूसरा काम वे यह करते हैं कि अपने को प्रतीक या साइन बनाते हैं।

अमिताभ बच्चन आज साख के प्रतीक हैं,भरोसे के प्रतीक हैं। इमेज बनाने के क्रम में अमिताभ ने अपने शरीर को सामान्य रखा है। शरीर का खास किस्म का गठन बनाने की कभी कोशिश नहीं की। इस क्रम में यथार्थ में जैसे दिखते हैं वैसा ही शरीर वे अभिनय में भी रखते हैं। अतः उनके एक्शन,भाव-भंगिमाएं और विचार बहुत ही आसानी से दर्शक को सम्प्रेषित हो जाते हैं ।  इस प्रक्रिया वे दर्शक के लिए प्रेरक बन जाते हैं। तीसरा, इस तरह की प्रस्तुति की आंतरिक विशेषता है कि अभिनय में जो चीजें नजर आती हैं उनका निषेध भी साथ ही साथ सम्प्रेषित होता जाता है। या यों कह् वे अपना विचारधारात्मक विलोम भी बनाते हैं।इसके कारण अभिनय सुंदर लगता है।फलतः अमिताभ तो अच्छा लगता है लेकिन चरित्र नहीं।

असल में दृश्यभाषा कोड रहित होती है। इटली के प्रमुख सिनेमा आलोचक पीर पाब्लो पासोलिनी का मानना है कि सिनेमा ,यथार्थ की भाषा पर निर्भर करता है।यह मनुष्य के एक्शन की भाषा है।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो अमिताभ स्क्रीन पर जो भाषा बोलते हैं वह यथार्थ पात्र का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा है। यह भाषा सिनेमाकला के विभिन्न अंगों के जरिए व्यक्त होती है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो अमिताभ बच्चन ने अपने व्यक्तित्व में सिनेमा की भाषा को पूरी तरह आत्मसात कर लिया है। सिनेमा की भाषा यथार्थ की भाषा होती है। इसमें भाषिक कोटियों की निर्णायक भूमिका होती है। वे सिनेमा में भाषा के नायक हैं।

फेसबुक और नवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के अनुत्तरित सवाल


नौवां विश्व हिन्दी सम्मेलन को समग्रता में देखें तो यह हिन्दी का 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला है। इससे हिन्दीसेवा कम हुई। नौकरशाही,कांग्रेस और संघ परिवार के कारिंदालेखकों -हिन्दीसैनिकों एवं सांसदों की मौजमस्ती ज्यादा हुई। 

कायदे से राजभाषा संसदीय समिति को इस सम्मेलन की गहराई में जाकर जांच करनी चाहिए और खोजी पत्रकारों को इस सम्मेलन की अंदरूनी अपव्यय गाथा को खोलना चाहिए।

हिन्दी के नाम पर यह अब तक का सबसे बड़ा घोटाला है। औसतन प्रत्येक प्रतिभागी पर 3-5लाख रूपये का खर्चा आया है ।इसके आयोजन पर करोड़ों रूपये पानी की तरह बहाए गए हैं। वह भी एक ऐसे देश में जिसमें हिन्दी का व्यवहार कुछ हजारलोग करते हैं।

हिन्दी का यह 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला है।इस घोटाले में शामिल लोग बार बार और जल्दी जल्दी इस तरह के सम्मेलन(घोटाले) की मांग कर रहे हैं। साहित्य में प्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक फ्रेडरिक जेम्सन के शब्दों में यह सांस्थानिक भ्रष्टाचार है। इसका नव्य आर्थिक उदारीकरण से गहरा संबंध है।

डीडी न्यूज पर अभी ( 7अक्टूबर 12) रिपोर्ट दिखाई गई उसमें विचार विमर्श के सत्रों और विभिन्न विद्वानों के विचारों की झलकियां तक दिखाना जरूरी नहीं समझा गया। सारा जोर नेताओं और गैर-अकादमिक पहलुओं को पेश करने पर था। डीडी न्यूज ने इतनी खराब रिपोर्ट पेश करके विश्व हिन्दी सम्मेलन के लेखकों की लेखकीय हैसियत का एक तरह से ज्ञान कराया है। कहां सोए हैं जोहानसवर्ग के हिन्दी सैनिक ? रीयलटाइम के युग में इतने दिन बाद रिपोर्ट का मतलब क्या है ?

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जोहानसवर्ग में हिन्दी के नाम पर जो कुछ हुआ उसमें नया कुछ नहीं है।हिन्दीवाले जैसे हैं वैसा ही उन्होंने वहां व्यवहार किया।सरकार जैसी है और जो व्यवहार यहां हिन्दी से करती है वही वहां पर किया।

इसके बावजूद हिन्दी सम्मेलन के नाम पर जिस तरह का अहंकार वहां से लौटे हिन्दीसैनिकों के चेहरे पर दिखा ,वह हिन्दी के लिए ही नहीं सरकार के लिए भी बुरी सूचना है। मनमोहन सरकार करोड़ों रूपये खर्च करके हिन्दी के श्रेष्ठ लेखकों और उनके श्रेष्ठ विचारों को सम्मेलन की ओर खींचने में असफल रही है।किसी भी सत्र में न तो कोई नया विचार पेश किया गया और न ही कोई नया शोधपत्र ही सामने आया।

क्या हिन्दी के प्रोफेसर कुछ इतिहास-विज्ञान आदि के भारत में हो रहे सम्मेलनों से कुछ सीखेंगे ? या फिर अपने उत्सवधर्मी हिन्दीसैनिक के बाने में ही सजे-धजे रहेंगे ? मजेदार बात यह है कि सम्मेलन में पढ़े गए आलेखों के चयन का भी कोई अकादमिक आधार नहीं था। जो जैसा लिखकर ले गए उनको वैसा ही पढ़वा दिया।इस तरह के गैर-अकादमिक सेमीनार और उनमें गैर-अकादमिक स्तरहीन आलेख पाठ सिर्फ हिन्दी में ही संभव हैं।

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हाल ही में जोहानसवर्ग में नौवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में अनेक हिन्दी प्रोफेसरों-पत्रकारों और लेखकों ने हिस्सा लिया था लेकिन अभी तक किसी भी जगह इंटरनेट,ब्लॉग.अखबार आदि में समग्रता में इस सम्मेलन पर किसी भी हिन्दी सैनिक ( सम्मेलन में शामिल लेखक) की कोई विस्तृत रिपोर्ट नहीं छपी है जिससे यह जान सकें कि आखिरकार कितने सारवान सत्र हुए और किसने क्या कहा। हिन्दी के नाम पर आए दिन अखबारों में छपने वाले तथाकथित हिन्दी प्रोफेसरनुमा समीक्षकों की भी लिखी कोई विस्तृत रिपोर्ट नजर से नहीं गुजरी है।

सम्मेलन में भाग लेकर लौटे हिन्दी सैनिकों के हिन्दीप्रेम का अंदाजा इससे भी लगा सकते हैं कि विदेश मंत्रालय, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान और केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय की बेवसाइट भी इस संदर्भ में सुनी पड़ी हैं।

करोड़ों रूपये इस सम्मेलन पर खर्च करने के बावजूद भी इसके प्रामाणिक दस्तावेज,रिपोर्ट ,आलेख आदि के बारे में एक व्यापक रिपोर्ट का न होना हिन्दी के लिए क्या शुभ संकेत है ?

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जनसत्ता संपादक ओम थानवी ने फेसबुक पर लिखा-

पता चला है कि द. अफ़्रीका में हाल ही संपन्न विश्व हिंदी सम्मलेन में महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से बारह (12) लोग गए। इनमें कुलपति विभूतिनारायण राय के अलावा विश्वविद्यालय के प्रो-वीसी आदि विभिन्न ओहदेदार शामिल थे। मैंने कल अशोक वाजपेयी जी से पूछा कि आपके कार्यकाल में कितने लोग गए थे? जवाब मिला: "एक भी नहीं। यह विदेश मंत्रालय का आयोजन है। हिंदी के नाम पर पाखण्ड ऊपर से। हम

क्यों भेजें लोग, वह भी उनका अपना काम छुड़ा कर?" यह भी पता चला कि जोहानिसबर्ग में वर्धा विश्वविद्यालय के प्रो-वीसी (डॉ अरविंदाक्षन, जो अध्येता के रूप में जाने जाते हैं) को वर्धा से गए बाकी सहयोगियों के साथ महज़ चार पन्ने का सम्मलेन-बुलेटिन निकालने का काम सौंपा गया; पत्र-वाचन छोड़िए, उन्हें सम्मलेन के एक भी सत्र में शिरकत तक की मोहलत नहीं दी गयी! दिलचस्प बात यह है कि बुलेटिन का काम पहले के दोनों सम्मेलनों में (ठेके पर) अशोक चक्रधर करते थे!

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बंगला ,तमिल,मलयालम आदि में लेखकों एवं संस्कृतिकर्मियों के विश्व सम्मेलन गैर सरकारी खर्चे से होते हैं। इन भाषाओं के लेखक कभी केन्द्र या राज्य सरकार से आर्थिक मदद नहीं मांगते। लेकिन हिन्दी लेखक विश्व हिन्दी सम्मेलन करने के लिए सरकारी मदद के मोहताज हैं।

हिन्दी का यह दुर्भाग्य है कि हिन्दी को अपने सम्मेलन करने के लिए सरकारी मदद की जरूरत पड़ती है। सरकारी मदद से साहित्यसेवा नहीं हो सकती,बल्कि सरकार सेवा और मंत्रीभक्ति हो सकती है।

जोहांनसबर्ग में हिन्दी के वीरपुंगवों की हैसियत कैसी रही है इसका साक्षात प्रमाण है कि वहां पर सरकारी कांग्रेसी सांसदों और सरकारी लेखकों ने मंच घेरा हुआ था। कोई भी हिन्दी का वीरपुंगव लेखक अपने भाषण की यू-ट्यूब नेट पर नहीं दे पाया है। सरकार ने भी इसकी कार्यवाही को विस्तार के साथ ऑडियो-वीडियो रूप में इंटरनेट पर नहीं दिया है।आलेख लेखकों के लेख भी नजर नहीं आ रहे हैं। क्या आपको कोई सामग्री नेट पर नजर आई ?

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जोहांनसबर्ग में हिन्दी 9वें विश्व सम्मेलन के मौके पर 700 धुरंधर एकत्रित हुए थे, लेकिन रोचक बात यह है कि इस सम्मेलन में हरबार की तरह किसी भी मसले पर विचारोत्तेजक बहस नहीं हुई। उत्सवधर्मी ढ़ंग से सब कुछ सिलट गया।

अखबारों की रिपोर्ट बताती हैं कि सम्मेलन में भागलेने वाले अधिकांश प्रमुख वक्ता लोकल अनौपचारिक तकरीर करते रहे। आमतौर पर सम्मेलन वैचारिक विवादों को जन्म देते हैं,लेकिन विश्व हिन्दी सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह अब तक किसी भी साहित्यिक विवाद को जन्म नहीं दे पाया है।जबकि समय-समय पर सभी रंगत के नामी-गिरामी विद्वान इसमें शामिल हुए हैं। यह भी कह सकते हैं सरकारी तम्बू में विचारों की टकराहट के लिए कोई जगह नहीं होती।

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जोहांनसबर्ग में 9वां विश्व हिन्दी सम्मेलन समाप्त हो गया है एक औपचारिक प्रस्ताव पास करके कि हिन्दी को यूएनओ की भाषा बनाया जाय। सवाल यह है कि इस तरह का प्रस्ताव भारत की संसद से पास कराकर उस दिशा में सरकार को प्रयास करना चाहिए। हिन्दी सम्मेलन के बहाने हिन्दी की राजनीति और धंधेखोरी नहीं की जानी चाहिए। यदि सरकार गंभीर है तो वो यूएनओ को अनुरोध करे और तदनुरूप व्यवस्था करे। जहां तक हमें याद है यूएनओ के लोग एक मर्तबा रजामंदी भी व्यक्त कर चुके हैं उन्होंने यही कहा था कि उसके लिए सालाना 100करोड़ का खर्चा आएगा।भारत सरकार यह खर्चा करे तो यूएनओ में हिन्दी में भाषण की व्यवस्था भी हो जाएगी।

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हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को सरकारी भाषा बनाने का प्रस्ताव इस अर्थ में भी अंधभाषावादी एजेण्डा है क्योंकि इससे भाषा के कम्युनिकेशन विस्तार में कोई खास मदद नहीं मिलेगी।हमारे सभी दूतावास और संयुक्त राष्ट्र संघ के जेनेवा स्थित दूतावास में तो साल में एक-दो पत्र तक हिन्दी में नहीं लिखे जाते। यह राजनीतिक नाटक विशुद्ध रूप से भाषा की प्रतिक्रियावादी राजनीति का अभिन्न हिस्सा है।

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हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं के भारत में विश्वस्तरीय अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था न कर पाने वाली भारत सरकार और उसके संस्थानों और उनके साथ जुड़े तथाकथित हिन्दीसेवियों का पहला दायित्व यह है कि वे अपने देश में सभी भातीय भाषाओं के पठन-पाठन की विश्वस्तरीय व्वस्था का निर्माण करें। हिन्दी का उत्थान संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने से नहीं होगा।हिन्दी का उत्थान तो भारत में हिन्दी के पठन-पाठन का स्तर ऊँचा करके होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को कम्युनिकेशन की भाषा बनाने का नारा अंधभाषावाद है। सामान्यभाषा में कहें तो यह अपव्यय है।

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नौवां विश्व हिन्दी सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका में चल रहा है इसमें 700 हिन्दी विद्वान गए हैं इन विद्वानों से एक ही विनम्र अनुरोध है कि वे कम से कम अपने देश के शिक्षित युवाओं से यह पूछ लें कि क्या वे हिन्दी पढ़ना चाहते हैं?

भारत सरकार की भाषानीति का यह दुष्परिणाम है कि अधिकतर शिक्षित युवा हिन्दी पढ़ना नहीं चाहते। त्रासदी यह है कि जो विद्वान और भारत सरकार मिलकर अपने देश के युवाओं में भारतीय भाषाओं के प्रति प्रेम नहीं जगा पाए ,हिन्दी के पठन-पाठन के लिए अनुराग नहीं पैदा कर पाए वे हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने की मांग कर रहे हैं।

भारत में आज भी आधी से ज्यादा आबादी हिन्दी लिखना-पढ़ना नहीं जानती। ऐसे में हिन्दी सम्मेलन की आड़ में यह अंध हिन्दीभाषावाद है।

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नौवें विश्व हिन्दी सम्मेलन की विदेश मंत्रालय द्वारा सम्मेलन के पहले की गयी प्रेस कांफ्रेस एक नमूना है कि भारत सरकार हिन्दी को अंग्रेजी के बाद स्थान देती है। प्रेस क़ॉफ्रेंस का आरंभ अंग्रेजी से हुआ।इस तरह से क्या हिन्दी विश्वभाषा बनेगी ?

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यह एक खुला सच है कि विश्व हिन्दी सम्मेलन कांग्रेस और संघ परिवार की हिन्दीवादी राजनीति का खुला मिश्रित मंच है। यह नोट करने की बात है कि इसके संचालन में ये दोनों संगठन प्रतिस्पर्धा करते रहे हैं। दोनों ही संगठनों की हिन्दी के विकास में कम और हिन्दी की राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी रही है। आयोजन से लेकर इसमें भागलेने वाले विद्वानों के चयन या शिरकत तक में इस राजनीतिक ध्रुवीकरण की बड़ी भूमिका है। सवाल यह है कि हिन्दी के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को क्या इस तरह की प्रतिस्पर्धा से बचा सकते हैं ? क्या हिन्दी को केन्द्र सरकार के द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने से प्रचार-प्रसार का मौका मिलेगा। यदि ऐसा ही था तो केन्द्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में आज तक कोई नोट या सर्कुलर पहले हिन्दी में क्यों नहीं लिखा जाता। कायदे से पहले सर्कुलर हिन्दी में लिखा जाय बाद में अन्य भाषाओं में उसका अनुवाद हो।लेकिन हो उलटा रहा है। केन्द्र सरकार ने हिन्दी को अनुवाद की भाषा बना दिया है। भाषा का अनुवाद से विकास नहीं होता।यदि ऐसा ही था संस्कृत साहित्य और भाषा को तो सबसे समृद्ध होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र संघ में भी वह अनुवाद की ही भाषा होगी।

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नौवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के मौके पर जो लोग यह मांग करने जा रहे हैं कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्रसंघ की भाषा बनाया जाय उनमें कांग्रेस के नेता बढ़त बनाए हुए हैं कांग्रेस के नेताओं से एक ही सवाल है कि कम से कम वे एक विदेशमंत्री,वित्तमंत्री और गृहमंत्री ऐसा चुनें जो नियमित संसद में हिन्दी में भाषण देना जानता हो। हमने तो अपने मौजूदा विदेशमंत्री को कभी हिन्दी में बोलते नहीं देखा है ऐसे में विदेश मंत्रालय और विश्व हिन्दी सम्मेलन की हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने की मांग प्रतिक्रियावादी और फासिस्ट मांग है। कांग्रेस के लोग इसके बहाने घटिया भाषा राजनीति खेल रहे हैं और इसे उदघाटित किया चाहिए।

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नौवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में शामिल विद्वानों , कांग्रेस के नेताओं और हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने की मांग करने वालों से एक ही सवाल है कि उनके बच्चे किस माध्यम से और किन विषयों की शिक्षा प्राप्त रहे हैं? जहांतक मेरा अनुभव है अधिकांश के बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ते हैं।

कांग्रेसी नीतियों ने हिन्दी पढ़ने-पढ़ाने वालों के प्रति खासकिस्म की घृणादृष्टि को नव्य आर्थिक उदारीकरण के दौर में युवाओं में विकसित किया है। उनमें अत्याधुनिक माध्यमों के जरिए अंग्रेजीप्रेम पैदा किया गया । भारत में विगत 60सालों में दर्जनों भाषा और बोलियां मर गयी हैं और हमारे हिन्दी विद्वान हिन्दी के नाम पर केन्द्र सरकार की भाषाविरोधी नीतियों पर पर्दा डालने का काम कर रहे हैं।

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नौवें हिन्दी सम्मेलन में जो लोग अनुवाद के जरिए हिन्दी के विकास की बातें सोच रहे हैं। वे गलत सोच रहे हैं। मसलन् अंग्रेजी भाषा की रचनाएं हिन्दी में आएंगी तो इससे अंग्रेजी साहित्य का प्रचार-प्रसार होगा हिन्दी का नहीं।

सवाल यह है कि हिन्दी की रचनाओं और रचनाकारों की भारतीय भाषाओं से लेकर अंग्रेजी भाषा में कितनी किताबें हिन्दी के प्रकाशक छापते हैं या भारत के अंग्रेजी प्रकाशक छापते हैं ? वे साल में हिन्दी की कितनी किताबें हिन्दी से इतर भाषाओं में अनुवाद करके छाप रहे हैं। यदि इस नजरिए से देखें तो हिन्दी कहीं भी नजर नहीं आती।

जरा गौर करें अमेरिका-ब्रिटेन,फ्रांस आदि से अनुदित किताबों में विगत साठ साल में कितनी हिन्दी लेखकों की किताबें प्रकाशित हुई हैं ? इस नजरिए से विश्व हिन्दी सम्मेलन सत्य पर परदा डालने का काम कर रहा है। भाषा में असत्य प्रेम फासिज्म की कला है।

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भारत सरकार का विदेश मंत्रालय और उसके मातहत काम करने वाला संगठन आईसीसीआर जो विदेशों में शिक्षकों को पढ़ाने के लिए भेजता है। यह संगठन और इससे जुड़े विभिन्न देशों में कार्यरत दूतावास विदेशों में हिन्दी पढ़ाने वालों के प्रति दोयमदर्जे का घृणास्पद व्यवहार करते हैं।वे इन शिक्षकों को विदेशों में वे सुविधाएं तक नहीं देते जो सुविधाएं भारत में विभिन्न विश्वविद्यालयों में दी जाती हैं। ऐसी स्थिति में विदेश मंत्रालय का हिन्दी को विश्वभाषा बनाने का दावा विशुद्ध अंधभाषावाद है और भाषा के प्रति कांग्रेस सरकार के फासिस्ट नजरिए को ही व्यक्त करता है।

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नौवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के मौके पर मनमोहन सिंह की सरकार और उनके विदेश मंत्रालय का हिन्दी के प्रति विद्वेषपूर्ण रूख को देखने के लिए कुछ अर्सा पहले लिए गए एक फैसले का जिक्र करना ही काफी होगा। आईसीसीआर के तहत विदेशों में हिन्दी के 19प्रोफेसर पद थे । इनमें से 6 प्रोफेसर पद खत्म कर दिए गए हैं। उनकी जगह 6 स्कूल शिक्षक के पद बनाए गए हैं। मजेदार बात यह है कि हिन्दुस्तान में हिन्दी की राजनीति करने वाले मठाधीशों ने इस फैसले के खिलाफ एक शब्द तक नहीं बोला। कायदे से हिन्दी के प्रोफेसर पदों में इजाफा किया जाना चाहिए लेकिन मनमोहन सरकार के हिन्दी विद्वेष के कारण हुआ उलटा और 6 प्रोफेसर पद खत्म कर दिए गए। इस कटौती के खिलाफ विश्व हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने वाले 700 डेलीगेट से लेकर नामधारी आयोजकों ने एक शब्द आलोचना में नहीं बोला। कहने का अर्थ है कि कांग्रेस और उनका विदेश विभाग नियमित ढ़ंग से हिन्दी विरोधी फैसले ले रहा है और हम सब चुपचाप देख रहे हैं। आश्चर्य तो तब हुआ कि हिन्दी के समाचारपत्रों तक में इस कटौती की खबर नहीं छपी।

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जोहांनसबर्ग में हिन्दी का नौवां विश्व सम्मेलन हो रहा है। क्या दक्षिण अफ्रीका के लोकल अखबारों में कहीं आपने कवरेज देखा ?पता चले तो शेयर करें।भारत के हिन्दी के तकरीबन सभी बड़े अखबारों और अंग्रेजी के समाचारपत्रों में यह सम्मेलन गायब है। कमाल की कवरेज तैयारियां की हैं आयोजकों ने , वे यहां से हिन्दी और अन्य प्रमुखभाषाओं के संवाददाता ले गए हैं क्या ?

(फेसबुक पर लिखी टिप्पणियां)