गुरुवार, 7 जुलाई 2016

बिजली,किताब और आधुनिकता-

सामाजिक विकास के लिए बिजली महत्वपूर्ण है। बिजली नहीं तो आधुनिकता नहीं। जो लोग सोचते हैं बिजली के बिना रैनैसां कर लेंगे वे देखें देश में बिजली जहां पहुँची है वहीं पर रैनेसां हुआ है। बिजली महत्वपूर्ण तत्व है आधुनिकता को समझने के लिए। काश ,हमारे लेखकों-राजनेताओं और रेनैसां नायकों ने बिजली की सत्ता-महत्ता को समझा होता। आज बिन बिजली सब सून।

इसी तरह भारत की सबसे बड़ी बाधा है पुरानी मुर्दा आदतों में जीना। आधुनिक भारत के निर्माण के लिए हमें बाधामुक्त जीवनशैली को अपनाना चाहिए। हमारे विचार नए हैं, संविधान नया है, तनख्बाह नई है, नए माल खाते हैं, लेकिन आदतें और सोचने का ढ़ंग सदियों साल पुराना है और इसके कारण भारत के अंदर एक विलक्षण नस्ल तैयार हुई है जिसके कपड़े नए हैं,दिमाग पुराना है। जिसकी चाहतें नई हैं, उन्हें पाने के उपकरण और आदतें पुरानी हैं। पुरानेपन से भारत को मुक्त करने के लिए शॉक थैरेपी की सख्त जरूरत है।पुराने को पूरी तरह त्यागे आधुनिक नागरिक नहीं बन सकते।इस प्रसंग में किताबें हमारी मदद कर सकती हैं,समाज को बदल सकती है।इस संदर्भ में वाल्टर बेंजामिन की कुछ बातों से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।

वाल्टर बेंजामिन ने लिखा हैः "किताबों और रंडियों को देखकर कोई नहीं कह सकता कि समय उनके लिए मूल्यवान होगा। लेकिन उनके करीब जाने पर ही पता लग सकता है कि वे किस कदर जल्दबाजी में होती हैं।जैसे ही आपकी दिलचस्पी उनमें खत्म होती है,वे चलने की तैयारी करने लगती हैं। "

"किताबें और रंडिया बिस्तर पर ले जाई जा सकती हैं।"

" किताबें और रंडियां समय को बदल देती हैं।वे रात को दिन और दिन को रात में बदल देने की कूबत रखती हैं।"

वाल्टर बेंजामिन के अनुसार यह समाज ,जिसका हर सदस्य अपने निजी कल्याण में लगा है,पाशविक असंवेदनशीलता और जड़ पूर्वाभास का शिकार है।मशीनों द्वारा कलाकृति का पुनरूत्पादन कला के प्रति जनता के रूख को भी बदल देता है।पिकासो के चित्र के प्रति प्रतिक्रियावादी रूख चार्ली चैप्लिन के फिल्मों के प्रति प्रगतिशील होजाता है।प्रगतिशील रूख का मतलब है कि आस्वादन और आलोचना दोनों मिलकर एक हो जाते हैं।

वाल्टर बेंजामिन का मानना है -" यूं तो कच्ची चीजें पेट के लिए स्वास्थ्यप्रद होती हैं।उसी तरह कुछ कच्चा ,और खासकर , स्वयं का भोगा हुआ अनुभव लाभकारी होता है।"

बेंजामिन ने लिखा है - "प्रशंसा की बौछार सबसे अधिक रचनाकार को ही संदिग्ध बना देती है

नास्तिकता की रचना प्रक्रिया



मनुष्य जब यह महसूस करने लगे या मानने लगे कि वह आत्मनिर्भर है।वह अपने तन-मन-धन का जब मालिक है तो ईश्वर की गिरफ्त से निकल जाता है। यानी जब वह स्वयं को नियंता मानने लगता है तो नास्तिक हो जाता है। अन्य पर निर्भरता का अभाव,अन्य के ऊपर आश्रित न होना,अन्य की कृपा पर आश्रित न होना वस्तुतःनास्तिक हो जाना है। मनुष्य के अस्तित्व का सर्जक और नियंता मनुष्य को मानना वस्तुतः नास्तिक हो जाना है।इस प्रक्रिया में ईश्वर के संदर्भ की कोई जरूरत ही नहीं पड़ती।

नास्तिकता का आमतौर पर एक ही अर्थ जानते हैं। ईश्वर के अस्तित्व का निषेध। लेकिन नास्तिकता का असल अर्थ है स्वयं को जानना।आत्मबोध को प्राप्त करना।मैं कोई रत्न या पत्थर धारण नहीं करता,सोने की अंगूठी भी नहीं है।सारी अंगुलियां बिना रत्नों के हैं। इसके बाबजूद अनेक सुख-दुख आए और गए। कभी पत्थर या रत्न की जरूरत नहीं पड़ी। रत्नधारण करना एक कु-संस्कार है।
उल्लेखनीय है ईश्वर के प्रति अविश्वास का भाव क्रांतिकारी दल में भी नहीं था। काकोरी के प्रसिद्ध सभी चार शहीदों ने अपने अंतिम दिन भजन प्रार्थना में गुजारे थे। रामप्रसाद बिस्मिल एक रूढ़िवादी आर्यसमाजी थे। समाजवाद तथा साम्यवाद में अपने बृहद अध्ययन के बावजूद, राजेंद्र लाहिड़ी उपनिषद् एवं गीता के श्लोकों के उच्चारण की अपनी अभिलाषा को दबा न सके। मैंने उन सबमें सिर्फ एक ही व्य क्ति को देखा जो कभी प्रार्थना नहीं करता था और कहता था, "दर्शनशास्त्र मनुष्य् की दुर्बलता अथवा ज्ञान के सीमित होने के कारण उत्पन्न होता है।" वह भी आजीवन निर्वासन की सजा भोग रहा है। परंतु उसने भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने की कभी हिम्मत नहीं की ।

चार्वाक मानते हैं- "यदि संसार में कोई स्वर्ग आदि के रूप में अलौकिक सुख मान्य नहीं है तो विद्वान लोग पर्याप्त धन एवं प्रयास से साध्य, यज्ञादि कर्मों के अनुष्ठान में सोत्साह प्रवृत्त क्यों होते हैं? लोग अत्यन्त श्रद्धा एवं उत्साह से इन भव्य आयोजनों में तत्पर देखे जाते हैं। फलत: अलौकिक सुख स्वर्ग आदि के रूप में अवश्य मानना चाहिए यह तर्क युक्त नहीं है। इन वैदिक अनुष्ठानों को; झूठा, परस्पर विरोधी एवं पुनरुक्ति दोष से दूषित होने के कारण प्रामाणिक किसी भी प्रकार से नहीं माना जा सकता है। अपने को वैदिक मानने वाले धूर्त्त आपस में ही एक दूसरे को खण्डन करते देखे जा सकते हैं। कर्म काण्ड को प्रमाण मानने वाले विद्वान ज्ञान काण्ड की, तथा ज्ञान काण्ड को प्रमाण स्वीकार करने वाले वैदिक विद्वान कर्मकाण्ड की परस्पर निन्दा करते देखे जाते हैं। इस प्रकार इन वैदिकों के व्यवहार से ही इन दोनों वैदिक मतों की नि:सारता स्वत: सिद्ध हो जाती है।"
चार्वाक यह भी मानते हैं- "संसार में कभी भी यह नहीं देखा गया है कि खेतों में किसान धान के बीज इसलिए नहीं बोता है कि धान को हरिण भविष्य में खाकर नष्ट कर देंगे। देश में भिक्षुक हैं इसलिए भोजन निर्माण के लिए कोई बटलोई चूल्हे पर न रखता हो ऐसा भी कभी नहीं देखा जाता है। इसी प्रकार यदि कोई दु:ख से अत्यन्त डरने वाला व्यक्ति सुख को छोड़ देता है तो वह पशु से भी बड़ा मूर्ख ही माना जायेगा। वास्तव में यह मूर्खता से भरा ही विचार होगा कि सुख दु:ख के साथ उत्पन्न होता है अत: सुख का सर्वथा परित्याग कर देना श्रेयस्कर है। क्या अपना हित चाहने वाला कोई मनुष्य कभी भी सफ़ेद एवं अच्छे धान के दानों को केवल इसलिए छोड़ता है कि वह धान भूसी एवं अनपेक्षित धूल से युक्त है। कभी नहीं। परिणामस्वरूप सुख पुरुषार्थ है यह सिद्ध होता है।"

महात्मा बुद्ध का मानना है मनुष्य जिन दु:खों से पीड़ित है, उनमें बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे दु:खों का है, जिन्हें मनुष्य ने अपने अज्ञान, ग़लत ज्ञान या मिथ्या दृष्टियों से पैदा कर लिया हैं उन दु:खों का समापन अपने सही ज्ञान द्वारा ही सम्भव है, किसी के आशीर्वाद या वरदान से उन्हें दूर नहीं किया जा सकता। सत्य या यथार्थता का ज्ञान ही सम्यक ज्ञान है।

बुद्ध यह भी मानते थे कि सत्य की खोज दु:खमोक्ष के लिए परमावश्यक है। खोज अज्ञात सत्य की ही की जा सकती है। यदि सत्य किसी शास्त्र, आगम या उपदेशक द्वारा ज्ञात हो गया है तो उसकी खोज नहीं। अत: बुद्ध ने अपने पूर्ववर्ती लोगों द्वारा या परम्परा द्वारा बताए सत्य को नकार दिया और अपने लिए नए सिरे से उसकी खोज की।

बुद्ध स्वयं कहीं प्रतिबद्ध नहीं हुए और न तो अपने शिष्यों को उन्होंने कहीं बांधा। उन्होंने कहा कि मेरी बात को भी इसलिए चुपचाप न मान लो कि उसे बुद्ध ने कहा है। उस पर भी सन्देह करो और विविध परीक्षाओं द्वारा उसकी परीक्षा करो। जीवन की कसौटी पर उन्हें परखो, अपने अनुभवों से मिलान करो, यदि तुम्हें सही जान पड़े तो स्वीकार करो, अन्यथा छोड़ दो।

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बुधवार, 6 जुलाई 2016

मंत्रीमंडल परिवर्तन नहीं यह करप्शन प्रबंधन है-

         मोदीजी के मंत्रीमंडल में नए फेरबदल में खुश होने लायक कुछ नहीं है,सारे मंत्री स्मृति ईरानी जैसी औसत बुद्धि के ही हैं,सबकी बौद्धिकता और निकम्मेपन का स्तर ईरानी के बराबर है।हावर्ड से लेकर गुजरात वि वि तक के जो भी स्नातक भाजपा में सांसद हैं वे सब "न्यूनतम बौद्धिक -अधिकतम संघी" के साँचे में ढले हैं।
मंत्री पद के लिए जिस बुद्धि-विवेक और साहस की दरकार होती है वह भाजपा सांसदों में दूर-दूर तक नहीं है।बुद्धि-विवेक और साहस में यदि भाजपा अग्रणी दल होता तो वह अपना नेता नरेन्द्र मोदी को नहीं चुनता।इसलिए स्मृति ईरानी के हटने से खुश न हों।दूसरी बात यह कि मोदीजी सांसद की क्षमता के हिसाब से मंत्री पद पर नहीं चुनते ,वे निजी वफादारी के आधार पर मंत्री चुन रहे हैं।जो सांसद निजी तौर पर मोदी के प्रति वफादार है,उसे वे सब कुछ देने को तैयार हैं।
कल मैं मोदीजी के परम मित्र और उद्योगपति सुनील अलग और भाजपा प्रवक्ता को टाइम्स नाउ पर सुन रहा था,सुनकर हंसी आ रही थी।किस तरह भांडों की तरह मोदीजी के हर चयन को महान चयन बताने में ये दोनों प्रतिस्पर्धा कर रहे थे।दिलचस्प बात यह है कि स्मृति ईरानी ने नई शिक्षा नीति का मसौदा जारी किया मोदीजी ने उनको मंत्रालय से हटाकर अन्यत्र भेज दिया,सदानंद देवगौडा के मंत्रालय का सुप्रीमकोर्ट के साथ विगत कई महिनों से टसल चल रहा है,नया टसल सिविल कोड है। बेचारे मंत्री का मंत्रालय बदल दिया। यही हाल कमोबेश हर मंत्रालय का है।जो नम्बर एक घूसखोर है संसद में घूस के नोट के साथ मिला उसे मंत्री बना दिया।
हालात यह है अरूण जेटली का वित्तमंत्रालय सबसे खराब काम कर रहा है लेकिन उनको मंत्रीमंडल से बाहर करने की क्षमता मोदीजी में नहीं है। इसका प्रधान कारण है कि भाजपा में शामिल प्रत्येक भ्रष्ट सांसद ताकतवर है ,मोदीजी को इन भ्रष्ट सांसदों में से ही चुनना है ,जो मंत्रीमंडल में आ जाता है वह सहज ही जाता नहीं है।जिन मंत्रियों पर अदालत में संगीन जुर्म में केस चल रहे हैं उनको मंत्रीमंडल से विदा करने में मोदी जैसे शक्तिशाली पीएम को दो साल लगे हैं,इससे मोदीजी की कमजोरी जाहिर होती है,इसी तरह यदि वैंकेय्या नायडू यदि संसदीय मंत्री के रूप में बेहतर काम नहीं कर पाए तो उनको मंत्रीमंडल से निकालने का साहस मोदी में नहीं है,स्मृति ईरानी ने सबसे घटिया ढ़ंग से मंत्री के रूप में काम किया लेकिन उनको मंत्रीमंडल से निकालने की ताकत आरएसएस में नहीं है।जिस मंत्री का 2साल बाद विभाग बदला गया है वह निश्चित तौर पर काम की कसौटी पर खरा नहीं उतरा ,फलतःउसे मंत्रीमंडल के बाहर होना चाहिए,लेकिन वे ऐसा करने की स्थिति में नहीं हैं।

डाक्टर,वकील,पीएचडी धारी मोदीजी के मंत्रीमंडल में हैं इससे क्या बताना चाहते हैं मीडियावाले।यदि कहना चाहते हो कि मोदीजी के मंत्रीमंडल में पढ़े लिखे लोग हैं तो यह कौन सी बड़ी बात है।यह कोई देश पर एहसान नहीं है,सवाल यह है क्या कोई मंत्री स्वतंत्र रूप से काम करने की क्षमता रखता है,किसी को आजादी है,जान लो मोदी के मंत्रीमंडल में सिर्फ मोदी को ही काम करने की आजादी है और मोदीजी तो इतने शर्मीले हैं कि अपनी बीए,एमए, की डिग्री तक नहीं दिखा रहे।
पूरा देश इस समय एक ऐसा व्यक्ति चला रहा है जिसके पास कोई डिग्री नहीं है और डिग्री दिखाने में उसे शर्म आती है,यही वजह है गुणी लोग उसके मंत्रीमंडल में बंधकमंत्री की तरह काम कर रहे हैं।जो मंत्री बंधक हैं वे डिग्रीधारी नहीं हो सकते,संविधान की सबसे डिग्री है स्वतंत्र और स्वायत्त मंत्री की और यह डिग्री मोदीजी के अलावा आरएसएस ने किसी को नहीं दी है।

एक अन्य चीज जो नजर आई वह यह कि मोदीजी अपने सहयोगी सांसदों की योग्यता से वाकिफ नहीं हैं या अतिरिक्त प्रेम होने के कारण उनको मंत्री बनाकर लेकर आए थे,मसलन् ,वीके सिंह और अकबर का क्या काम है विदेश मंत्रालय में,विगत दो साल में वीके सिंह की कोई भूमिका नहीं रही,फिर भी बने हुए हैं।
सिर्फ भाजपा संसदीय दल में आंतरिक असंतोष को दबाए रखने के लिए मौजूदा परिवर्तन किया गया है।इस समय स्थिति यह है कि भाजपा के सांसदों में हर दूसरा सांसद मंत्री है या मंत्री पद की सुविधा का विभिन्न तरीकों से लाभ ले रहा है।इस तरह लाभ बांटकर मोदीजी भ्रष्ट भाजपा को टूटने से बचाए हुए हैं।



सोमवार, 4 जुलाई 2016

प्रमोशन और साहित्य का संकट

       कोलकाता में एक दशक से हिन्दी सेमीनार के प्रमाणपत्र जुटाने की संक्रामक बीमारी कॉलेज शिक्षकों में फैल गयी है। सेमीनार में वे इसलिए सुनने जाते हैं जिससे उन्हें सेमीनार में भाग लेने का सर्टीफिकेट मिल जाए। यह साहित्य के चरम पतन की सूचना है। ये वे लोग हैं जो हिन्दी साहित्य से रोटी-रोजी कमा रहे हैं। ये लोग सेमीनार में बोले बिना सेमीनार में भाग लेने का प्रमाणपत्र पाकर अपने को धन्य कर रहे हैं। आयोजक यह कहकर शिक्षकों को बुलाते हैं कि प्रमोशन कराना है तो सेमीनार सर्टीफिकेट लगेगा, आ जाओ सुनने, सर्टीफिकेट मिल जाएगा। फलतः ज्यादातर शिक्षक सेमीनार को सुनने आते हैं। सेमीनार का सर्टीफिकेट पाने के लिए वे डेलीगेट फीस भी देते हैं। इस प्रक्रिया में दो किस्म का साहित्यिक भ्रष्टाचार हो रहा है. पहला नौकरी में प्रमोशन के स्तर पर हो रहा है। श्रोता के सर्टीफिकेट को वक्ता के सर्टीफिकेट के रूप में पेश करके तरक्की के पॉइण्ट प्राप्त किए जा रहे हैं। दूसरा , साहित्य विमर्श के नाम पर कूपमंडूकता बढ़ रही है। सेमीनारों में वक्ताओं के भाषण साधारण पाठक की चेतना से भी निचले स्तर के होते हैं और सेमीनार के बाद सभी लोग एक-दूसरे की पीठ ठोंकते हैं, गैर शिक्षक श्रोता फ्रस्टेट होते हैं,वे मन ही मन धिक्कारते हैं और कहते हैं और कहते हैं कि वे सुनने क्यों आए। वक्तागण आशीर्वाद देते हैं,पैर छुआते हैं। इस समूची प्रक्रिया में कई लोग तो इस कदर नशे में आ गए हैं कि उन्हें यह बीमारी हो गयी है कि शहर में कोई भी साहित्यिक कार्यक्रम हो उनको अध्यक्षता के लिए बुलाओ,ये लोग अध्यक्ष न बनाए जाने पर कार्यक्रम में जाते नहीं है। नहीं बुलाने पर नाराज हो जाते हैं। इन पंडितों का मानना है वे जिस सेमीनार में जाते हैं उस सेमीनार को सार्थक करके आते हैं। इस प्रसंग में मुझे कई लेखकों की रचनाएं याद आ रही हैं। इनमें सबसे पहले में मुक्तिबोध को उद्धृत करना चाहूँगा। बहुत पहले मुक्तिबोध ने हिन्दी के प्रोफेसरों के बारे में लिखा, ''बटनहोल में प्रति‍नि‍धि पुष्‍प लगाए एक प्रोफ़ेसर साहि‍त्‍यि‍क से रास्‍ते में मुलाकात होने पर पता चला कि हि‍न्‍दी का हर प्रोफेसर साहि‍त्‍यि‍क होता है। अपने इस अनुसन्‍धान पर मैं मन ही मन बड़ा खुश हुआ। खुश होने का पहला कारण था अध्‍यापक महोदय का पेशेवर सैद्धान्‍ति‍क आत्‍मवि‍श्‍वास। ऐसा आत्‍मवि‍श्‍वास महान् बुद्धि‍मानों का तेजस्‍वी लक्षण है या महान् मूर्खों का दैदीप्‍यमान प्रतीक ! मैं नि‍श्‍चय नहीं कर सका कि वे सज्‍जन बुद्धि‍मान हैं या मूर्ख ! अनुमान है कि वे बुद्धि‍मान तो नहीं, धूर्त और मूर्ख दोनों एक साथ हैं।''
मुक्‍ति‍बोध ने यह भी लि‍खा है '' चूँकि प्रोफेसर महोदय साहि‍त्‍यि‍क हैं इसलि‍ए शायद वे यह कुरबानी नहीं कर सकते। नाम- कमाई के काम में चुस्‍त होने के सबब वे उन सभी जगहों में जाएंगे जहॉं उन्‍हें फायदा हो-चाहे वह नरक ही क्‍यों न हो।''
कोलकाता के शिक्षकों की अवस्था इससे बेहतर नहीं बन पायी है। हिन्दी के इस तरह के आयोजनों में किस तरह के भाषण होते हैं और चेले-चेलियां किस तरह प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं इस पर कवि -कहानीकार उदयप्रकाश की बड़ी शानदार कविता है 'पाँडेजी' उसका अंश देखें-
"छोटी-सी काया पाँडेजी की/छोटी-छोटी इच्छाएँ/ छोटे-छोटे क्रोध/और छोटा दिमाग।
गोष्ठी में दिया भाषण,कहा- 'नागार्जुन हिन्दी का जनकवि है '/फिर हँसे कि ' मैंने देखो
कितनी गोपनीय/चीज को खोल दिया यों।यह तीखी मेधा और/वैज्ञानिक आलोचना का कमाल है। '/एक स-गोत्र शिष्य ने कहा-' भाषण लाजबाब था /अत्यन्त धीर-गंभीर/
तथ्यपरक और विश्लेषणात्मक/हिन्दी आलोचना के खच्चर/ अस्तबल में/आप ही हैं /एकमात्र/काबुली बछेड़े/ 'तो गोल हुए पाँडे जी/मंदिर के ढ़ोल जैसे/ठुनुक -ठुनुक हँसे और/फिर बुलबुल हो गए/फूलकर मगन !"
मैं 20 सालों से कोलकाता में रह रहा हूँ और आए दिन हिन्दी सेमीनारों की दुर्दशापूर्ण अवस्था के किस्से अपने दोस्तों और विद्यार्थियों से सुनता रहा हूँ। मैं आमतौर पर इन सेमीनारों से दूर रहता हूँ। इसके कारण लोग यह मानने लगे हैं कि मैं साहित्य के बारे में नहीं जानता। कई मित्र हैं जो सेमीनार के कार्ड में वक्ता के रूप में मेरा नाम न देखकर दुखी होकर फोन करते हैं कि यहां तो आपको होना ही चाहिए था। मेरी स्थिति इस कदर खराब है कि एकबार कोलकाता की सबसे समर्थ साहित्यिक संस्था की कर्ताधर्ता साहित्यकार नेत्री ने चाय पर अपने घर बुलाया और कहा कि हम इतने कार्यक्रम करते हैं और आपस में बातें भी करते हैं कि स्थानीय स्तर पर कौन विद्वान हैं जिन्हें बुलाया जाए तो लोग आपका नाम कभी नहीं बताते, मैं स्वयं भी नहीं जानती कि आप विद्वान हैं। मैंने कहा मैं विद्वान नहीं हूँ। इसी प्रसंग में मैंने उन्हें त्रिलोचन की एक कविता ' प्रगतिशील कवियों की नयी लिस्ट निकली है' सुनायी, कविवर त्रिलोचन ने लिखा- " प्रगतिशील कवियों की नयी लिस्ट निकली है/उसमें कहीं त्रिलोचन का नाम नहीं था/आँख फाड़कर देखा/दोष नहीं था/पर आँखों का/सब कहते हैं कि प्रेस छली है/शुद्धिपत्र देखा ,उसमें नामों की माला छोटी न थी/ यहाँ भी देखा ,कहीं त्रिलोचन नहीं/तुम्हारा सुन सुनकर सपक्ष आलोचन कान पक गए थे/मैं ऐसा बैठा ठाला नहीं,तुम्हारी बकबक सुना करूँ/किसी जगह उल्लेख नहीं है,तुम्हीं एक हो,क्या अन्यत्र विवेक नहीं है/ तुम सागर लाँघोगे ? -डरते हो चहले से/बड़े-बड़े जो बात कहेंगे-सुनी जायगी/व्याख्याओं में उनकी व्याख्या चुनी जाएगी/"
कोलकाता हिन्दी के क्षयिष्णु वातावरण का एक अन्य पक्ष है हिन्दी के पठन-पाठन की ह्रासशील अवस्था। यह स्थिति कमोबेश पूरे राज्य में है। मसलन जो आज छात्र है वह कल शिक्षक होगा।जो विद्यार्थी एम.ए. में आते हैं उनमें अधिकांश ठीक से हिन्दी लिखना तक नहीं जानते । अब आप ही सोचिए कि जो विद्यार्थी एम.ए. तक आ गया वह हिन्दी लिखना नहीं जानता। इस तरह के विद्यार्थियों की संख्या हर साल बढ़ रही है। उच्च शिक्षाकी सुविधाओं का निचलेस्तर पर विस्तार हुआ है। बड़े पैमाने पर छात्र हिन्दी ऑनर्स कर रहे हैं , वे जब ठीक से हिन्दी लिखना नहीं जानते,ठीक से प्रश्नों का उत्तर तक नहीं देते तब वे कैसे एम.ए. तक अच्छे अंक प्राप्त करके आ जाते हैं, इसका रहस्य कोई भी आसानी से समझ सकता है कि कोलकाता में हिन्दी में अंक कैसे दिए जाते होंगे। हिन्दी प्रमोशन के नाम पर बड़े पैमाने पर ऐसे छात्रों की पीढ़ी तैयारहुई है जो येन-केन प्रकारेण अंक हासिल करके पास हुए हैं। पढ़ने,समझने और सीखने की आदत बहुत कम विद्यार्थियों में है। जिनमें यह आदत है उन्हें पग-पग पर छींटाकशी, अपमान और अकल्पनीय असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। कोलकाता में सारे विद्यार्थी जानते हैं कि हिन्दी में नौकरी पाने के नियम क्या हैं ? किसके हाथ में नौकरियां हैं ? किस नेता और प्रोफेसर को पटाना है और कैसे पटाना है । इस समस्या की जड़ें गहरी हैं,गहराई में जाकर देखें तो हिन्दी के शिक्षक नए से डरते हैं,विचारों का जोखिम उठाने से डरते हैं। अन्य से सीखने और स्वयं को उससे समृध्द करने मेंअपनी हेटी समझते हैं। साहित्य को अनुशासन के रूप में पढ़ने पढ़ाने में इनकी एकदम दिलचस्पी नहीं है।
आज वास्तविकता यह है कि ज्यादातर शिक्षक और समीक्षक आजीविका और थोथी प्रशंसा पाने लिए अपनेपेशे में हैं।वे किसी भी चीज को लेकर बेचैन नहीं होते। उनके अंदर कोई सवाल पैदा नहीं होते। एक नागरिक के नातेउनके अंदर वर्तमान की विभीषिकाओं को देखकर उन्हें गहराई में जाकर जानने की इच्छा पैदा नहीं होती।वे पूरी तरहअतीत के रेतीले टीले में सिर गडाए बैठे हैं।
हिन्दी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शिक्षक और आलोचक अपने नियमित अभ्यास और ज्ञान विनिमय को अनुसंधान का जरिया नहीं बना पाए है। विद्यार्थियों में मासूमियत और अज्ञानता बनाए रखने में इस तरह के शिक्षकोंकी बड़ी भूमिका है।ये ऐसे शिक्षक हैं जो ज्ञान के आदान-प्रदान में एकदम विश्वास नहीं करते। कायदे से शिक्षक कोपारदर्शी, निर्भीक और ज्ञानपिपासु होना चाहिए।किन्तु हिन्दी विभागों में मामला एकदम उल्टा है।हिन्दी के शिक्षक कम ज्ञान में संतुष्ट,आरामतलब,और दैनन्दिन जीवन की जोड़तोड़ में मशगूल रहते हैं।
इसके विपरीत यदि कोई शिक्षक निरंतर शोध करतााहै या निरंतर लिख रहा है तो उसका उपहास उडाने और केरीकेचर बनाने में हमारे शिक्षकगण सबसे आगे होते हैं। और कहते हैं कि बड़ा कचरा लिख रहे हैं।हल्का लिख रहे हैं। यानी हमारे शिक्षकों को निरंतर लिखने वाले से खास तरह की एलर्जी है।वे यह भी कहते हैं कि फलां का लिखा अभीतक इसलिए नहीं पढ़ा गया या विवेचित नहीं हुआ क्योंकि जब तक उनकी एक किताब पढकर खत्म भी नहीं हो पातीहै तब तक दूसरी आ जाती है।इस तरह के अनपढों के तर्क उसी समाज में स्वीकार किए जाते हैं जहां लिखना अच्छानहीं माना जाता। कहीं न कहीं गंभीर लेखन के प्रति एक खास तरह की एलर्जी या उपेक्षा जिस समाज में होती है वहींपर ऐसी प्रतिक्रियाएं आती हैं। इस तरह की मनोदशा के प्रतिवादस्वरूप त्रिलोचन ने लिखा है- "शब्द/ मालूम है/व्यर्थ नहीं जाते हैं/पहले मैं सोचता था/उत्तर यदि नहीं मिले /तो फिर क्या लिखा जाय/किन्तु मेरे अन्तरनिवासी ने मुझसे कहा- लिखाकर/तेरा आत्म-विश्लेषण क्या जाने कभी तुझे/एक साथ सत्य शिव और सुंदर को दिखा जाय/अब मैं लिखा करता हूँ/अपने अन्तर की अनुभूति बिना रँगे चुने/कागज पर बस उतार देता हूँ/"
हिन्दी से जुड़े अधिकांश जटिल सवालों की हमारी समीक्षा ने उपेक्षा की है। वे किसी भी साहित्यिक और सांस्कृतिकबहस को मुकम्मल नहीं बना पाए हैं। हिन्दी में साहित्यिक बहसें विमर्श एवं संवाद के लिए नहीं होतीं,बल्कि यह तोएक तरह का दंगल है,जिसमें डब्ल्यू डब्ल्यू फाइट चलती रहती है।हमने संवाद,विवाद और आलोचना के भी इच्छितमानक बना लिए हैं। इसे भी हम अनुशासन के रूप में नहीं चलाते।
परंपरा का मूल्यांकन करते हुए हमने सरलीकरण से काम लिया है।परंपरा की इच्छित इमेज बनाई है परंपरा की जटिलताओं को खोलने की बजाय परंपरा के वकील की तरह आलोचना का विकास किया है। परंपरा का मूल्यांकनकरते हुए जो लेखक-शिक्षक परंपरा के पास गया वह परंपरा का ही होकर रह गया। परंपरा के बारे में हमारे यहां तीनतरह के नजरिए प्रचलन में हैं। पहला नजरिया परंपरावादियों का है जो परंपरा की पूजा करते हैं।परंपरा में सब कुछ कोस्वीकार करते हैं। दूसरा नजरिया प्रगतिशील आलोचकों का है जो परंपरा में अपने अनुकूल की खोज करते हैं और बाकीपर पर्दा डालते हैं।तीसरा नजरिया आधुनिकतावादियों का है जो परंपरा को एकसिरे से खारिज करते हैं। इन तीनों हीदृष्टियों में अधूरापन है और स्टीरियोटाईप है।
परंपरा को इकहरे,एकरेखीय क्रम में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।परंपरा का समग्रता में जटिलता के साथ मूल्यांकन कियाजाना चाहिए।परंपरा में त्यागने और चुनने का भाव उत्तर आधुनिक भाव है। यह भाव प्रगतिशील आलोचकों में खूबपाया जाता है। परंपरा में किसी चीज को चुनकर आधुनिक नहीं बनाया जा सकता। नया नहीं बनाया जा सकता। परंपराके पास हम इसलिए जाते हैं कि अपने वर्तमान को समझ सकें वर्तमान की पृष्ठभूमि को जान सकें।हम यहां तक कैसेपहुँचे यह जान सकें।परंपरा के पास हम परंपरा को जिन्दा करने के लिए नहीं जाते। परंपरा को यदि हम प्रासंगिकबनाएंगे तो परंपरा को जिन्दा कर रहे होंगे। परंपरा को प्रासंगिक नहीं बनाया जा सकता।परंपरा के जो लक्षण हमें आजकिसी भी चीज में दिखाई दे रहे हैं तो वे मूलत: आधुनिक के लक्षण हैं, नए के लक्षण हैं।नया तब ही पैदा होता है जबपुराना नष्ट हो जाता है। परंपरा में निरंतरता होती है जो वर्तमान में समाहित होकर प्रवाहित होती है वह आधुनिक काअंग है।
हिन्दी में सबसे ज्यादा अनुसंधान होते हैं।आजादी के बाद से लेकर अब तक कई लाख शोध प्रबंध हिन्दी मेंलिखे जा चुके हैं।सालाना 7 हजार से ज्यादा शोध प्रबंध हिन्दी में जमा होते हैं। लेकिन इनमें एक फीसद शोध प्रबंधों में भी सामयिक समाज की धड़कन सुनाई नहीं देगी। हमें विचार करना चाहिए कि रामविलास शर्मा, नगेन्द्र,नामवरसिंह, विद्यानिवास मिश्र, मैनेजर पांडेय, शिवकुमार मिश्र, कुंवरपाल सिंह , चन्द्रबलीसिंह , परमानन्द श्रीवास्तव, नन्दकिशोरनवल आदि आलोचकों ने कितना वर्तमान पर लिखा और कितना अतीत पर लिखा है ? इसका यदि हिसाब फैलायाजाएगा तो अतीत का पलड़ा ही भारी नजर आएगा। ऐसे में हिन्दी के वर्तमान जगत की समस्याओं पर कौन गौर करेगा? खासकर स्वातंत्र्योत्तर भारत की जटिलताओं का मूल्यांकन तो हमने कभी किया ही नहीं है।

मुसलमानों से प्यार करो

         यह पहलीबार हुआ है मुसलमानों के पवित्र माह के दौरान बटुकसंघ के भोंपुओं ने टीवी से लेकर फेसबुक तक जमकर मुसलमान विरोधी घृणित प्रचार किया है।टीवी पर बटुक संघ के दलीय प्रवक्ता तो सभ्यता की सारी हदें पार कर गए हैं।घटना बांग्लादेश में हुई है और भारत में ज़बर्दस्ती मुसलमानों के खिलाफ नफ़रत फैलायी जा रही है।हैदराबाद में जिन युवाओं को आईएस से संपर्क के आरोप में पकड़ा गया है , उसके बहाने सभ्यता और संविधान की सीमाओं को तोड़कर , बिना आरोप सिद्ध किए समूचे मुसलिम समाज, ओवैसी,धर्मनिरपेक्ष लोगों के खिलाफ टीवी से लेकर फेसबुक तक ज़हरीला प्रचार किया जा रहा है।

मुसलमान हमारे देश के संविधान , क़ानून और लोकतंत्र का सम्मान करते हैं और मानते हैं। मुसलमानों की भारत की आज़ादी के पहले और बाद के सामाजिक विकास में सकारात्मक भूमिका रही है।आजाद भारत में मुसलमानों ने कभी अन्य धर्म के लोगों के खिलाफ कभी कोई मुहिम नहीं चलायी।मुसलमानों ने एक स्वर से आतंकवाद, साम्प्रदायिकता और पृथकतावादी के खिलाफ हमेशा भारत सरकार के फ़ैसलों को माना और राष्ट्रीय एकता के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। मुसलमान कभी आक्रामक नहीं रहे ऐसी स्थिति में मुसलमानों के ऊपर हमले करना ग़लत है ,संविधानविरोधी है।

क्लोन नामवर और रीयल नामवर!



हिन्दी में इनदिनों नामवर सिंह का स्थान लेने की जंग चल रही है। लंबे समय से लोग कोशिश कर रहे हैं कि उनको साहित्य में वह स्थान मिले जो नामवर को मिला है। मुश्किल यह है कि वह जगह कोई ले नहीं सकता।लेकिन इस चक्कर में इलाके -दर -इलाके नामवरसिंह के क्लोनरूप में लोकल क्लोन नामवरों की बाढ़ आ गयी है। गुरूवर नामवरजी इन क्लोन नामवरों से बेहद परेशान हैं। लोक प्रचलन में क्लोन नामवरों के नाम देखें-टॉलीगंज के नामवर,जेएनयू के नामवर,बॉलीवुड के नामवर,सागरवाले नामवर,जोधपुरवाले नामवर,डीयू के नामवर आदि। मजेदार बात है इन सभी क्लोनरूपों को नामवर सिंह हंसकर विनोदी नामवर कहते हैं।


क्लोन नामवर ने गुरूवर नामवरजी से पूछा कि आप किसके लिए लिखते हैं ,बोले मैं अदृश्य पाठक के लिए लिखता हूँ,फिर पूछा आप किसके लिए बोलते हैं,कहा दृश्य जनता के लिए।
क्लोन नामवरों में से एक ने कहा हम तो छात्रों के लिए लिखते हैं,नामवरजी ने कहा कि यह लेखन नहीं गैसपेपर राईटिंग हुई। दूसरे क्लोन ने नामवरजी से कहा मैंतो सर, जब बोलता हूँ पाठ्यक्रम केन्द्रित होकर ही बोलता हूँ,नामवरजी ने कहा मूर्ख यह क्लास नोट्स तैयार कराने की स्कूल मास्टरी है।
तीसरा क्लोननामवर बोला हमने तो सारा जीवन इसी तरह पढ़ाया है ,इस पर नामवरजी बोले इसीलिए तो क्लोन हो, नामवर नहीं हो।

नामवर सिंह हमेशा हंसकर और अनौपचारिक ढ़ंग से बात करते हैं,बार बार व्यंग्य भी करते हैं। लेकिन क्लोननामवर हमेशा गंभीर रहते हैं। इस पर नामवरजी ने चुटकी ली और कहा कि बुरा हो परवर्ती पूंजीवाद का जिसने क्लोन सभ्यता को जन्मदिया है,मैंने कहा इसमें बुरा क्या है क्लोननामवर तो ज्ञान गंभीर हैं,नामवरजी ने कहा ये ज्ञानराक्षस हैं.

नामवर सिंह और क्लोन नामवरों की 4साल पहले एकबार दिल्ली में मुलाकात हुई ,क्लोन नामवरों के कहा हम आप पर कुछ करना चाहते हैं। नामवरजी बोले आपलोग मेरे ऊपर कुछ न करें तो अच्छा है।
संयोग से ये बंदा भी वहां था, मैंने कहा ये लोग कुछ करना चाहते हैं तो कुछ करने दीजिए,बोले ,मैं इन क्लोनों के नकलीपन से आजि़ज़ आ चुका हूँ। तपाक से उनमें से एक क्लोन बोला मैं तो आपके आशीर्वाद से ही पैरों पर खड़ा हूँ। नामवरजी ने कहा नहीं भाई ,आप अपने दम पर पैरों पर खड़े हैं। दूसरा क्लोन बोला हम ही तो दूसरी परंपरा बनाते हैं। नामवरजी ने कहा अरे भाई, दूसरी परंपरा क्लोन परंपरा नहीं है। इसके बाद सब ठहाकर मारकर हंस पड़े।

नामवरसिंह और क्लोन नामवरों के बीच कलकत्ते में एकबार मुलाकात हुई थी,संभवतःराहुल सांकृत्यायन शताब्दी समारोह का मौका था। भारतीय भाषा परिषद में लोग टिके थे ,उनका ही कार्यक्रम था। वहां पर क्लोन नामवर भी मौजूद थे। मैंने मजाक में कहा आपका जैसा बनने की बड़ी इच्छा है इन क्लोन नामवरों में। वे बोले-मेरी जैसी मेधा कहां से लाएंगे ?मैं मुस्करा रहा था,लेकिन पटनावाले क्लोननामवर झेल नहीं पाए, बोले हमने आपसे कम काम नहीं किया है। गुरूवर बोले क्लोन अहर्निश काम करते हैं। वे आदमी थोड़े ही हैं।भीष्मसाहनी ठहाकर मारकर हंसे ।



क्लोन नामवरों की अनुभूतियां देखें- टालीगंज नामवर कहते हैं गोष्ठी में जाएंगे तो अध्यक्षता कराओगे तब ही जाएंगे, एक भक्त ने पूछा ऐसा क्यों तो बोले देखते नहीं हो नामवरजी को वो कहीं जाते हैं बिना अध्यक्षता के ?
डीयू नामवर के नक्शे ही कुछ और हैं जमीन पर पैर नहीं पड़ते ,उनके एक भक्त ने पूछा, सर, आपके जमीन पर पैर क्यों पड़ रहे ? बोले देखो ,नामवरजी को देखो, उनसे सीखो, हमने तो उनसे ही सीखा है।दिल्ली के पंडारा रोड वाले नामवर तो सब समय नामवरमय ही रहते हैं,हर बात के बीच में कोई न कोई नामवर स्मृति कहजाते हैं।
भोपालवाले नामवर मिले थे मैंने पूछा कैसे हैं बोले मैं नामवरजी की तरह ही ठीकठाक हूँ।
हे भगवान यह क्या हो रहा है !!

बलि नहीं न्याय दो-

       यह बहुत खतरनाक खेल है भाजपावालो,इस खेल में फिलहाल कुछ कवरेज ले सकते हो,लेकिन इस खेल में हमेशा फासिस्ट पिटे हैं और तुम भी पिटोगे। अजीब स्थिति है कुछ लड़कों को कहीं से पकड़ा जाता है और तुरंत ही भाजपा-संघ और भोंपू मीडिया आंखें बंद करके देशद्रोही,आईएस एजेंट आदि कहकर अहर्निश निंदा अभियान शुरू कर देता है,यह कौन सा न्याय है,पुराने हिन्दूसमाज में भी ऐसा न्याय नहीं था,इस तरह का न्याय तो तालिबान,अलकायदा,आईएस के यहां होता है,वे लोग जिसे पकड़ते हैं उसे सीधे ऊपर पहुँचाते हैं,कोई दलील,अपील,न्याय नहीं।जिसे पकड़ लिया उसे दोषी करार देने की कला तो तालिबानी कला है,अफसोस है कि भाजपा जैसा राजनीतिक दल जो संविधान और कानून में आस्था रखने के वायदे करता है,संविधान को काम तक नहीं करने दे रहा,भारतीय न्याय प्रणाली को एकदम सरकने नहीं दे रहा। हैदराबाद में कुछ युवाओं की गिरफ्तारी के तत्काल बाद ही मीडिया में हमले शुरू,फेसबुक आदि सोशलमीडिया पर अंधाधुंध मोदीभक्तों की पोस्ट आ रही हैं,इनमें कुछ जेएनयू के पुराने मित्रों की भी पोस्ट हैं,भाजपा-आरएसएस का ऐसा वैचारिक पतन तो आपातकाल में भी नहीं हुआ था जैसा मोदीकाल में हुआ है।अभी भी समय है ठहर जाओ,पुलिस को अपना काम करने दो,कानून की राह में यमराज बनकर मत खड़े हो.कानून को यमराज के मार्ग का पथिक बनाना आईएस का हथकंडा है,हम भाजपा-संघ से कहना चाहते हैं यह भारत है,यह अफगानिस्तान-यमन और सीरिया नहीं है,जहां आईएस की चलती हो। भारत में कानून का शासन है,कानून के अनुसार किसी को पकड़ा जाता है तो अदालतें देखेंगी,पुलिस का काम है अदालतों में आरोपियों को ले जाना,वहां सजा दिलवाना,आरोपिियों को पूरा हक है कि वे अपना बचाब करें,कोई चाहे तो उनकी मदद करे,इसका अर्थ यह नहीं है कि आरोप लगाने मात्र से ही दोषी हो गया।एनआईए के हाथों पकड़े गए हैं तो इंतजार करो सच आ जाएगा,लेकिन संघियो आपलोग तो गिरफ्तार होते ही नाचने लगते हो,बलि दो बलि दो,का नारा लगाने लगते हो,बलि दो,का नारा आईएस का नारा है भारतीय का नारा नहीं है,भारत में यदि रहना है तो कहना होगा बलि नहीं न्याय दो।

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