रविवार, 22 मई 2016

चुनावी हिंसा का मतलब


        पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव खत्म हुए हैं लेकिन दो राज्य ऐसे हैं जहां चुनाव के बाद हिंसा अभी जारी  है।ये हैं पश्चिम बंगाल और केरल। संयोग की बात है दोनों ही राज्यों में वाम निशाने पर है या निशाना लगा रहा है।सवाल यह है वाम जहां रहता है वहां पर चुनावी हिंसा क्यों होती रही है ॽ बिहार में कुछ महिना पहले चुनाव हुए उसके पहले दिल्ली में चुनाव हुए,हाल ही में तमिलनाडु,असम और पांडुचेरी में भी चुनाव हुए लेकिन कहीं पर चुनावी हिंसा नहीं हुई।संयोग की बात है इन सब राज्यों में वाम नहीं के बराबर है।
    पश्चिम बंगाल में विगत पाँच सालों में वामदलों खासकर माकपा पर असंख्य हमले हुए हैं।इसबार भी  चुनाव के पहले और बाद में असंख्य हमले हुए हैं।वाम पर हमले ऐसे समय में हो रहे हैं जब टीएमसी को अपार बहुमत मिला है।टीएमसी वाले जीत के बाद भी उदार बनने को तैयार नहीं हैं।लगातार हिंसक हमले कर रहे हैं।
    सवाल उठता है इस हिंसा की जड़ कहां है ॽ हिंसा वे लोग करते हैं जिनका जनता पर विश्वास नहीं होता।जो जनता के दिलो-दिमाग पर हिंसा के जरिए कब्जा या वर्चस्व रखना चाहते हैं।जिस दल का जनता में असर होगा वह हिंसा का सहारा नहीं लेगा लेकिन जो दल हिंसा का सहारा लेता है वह सतह पर कहता है कि आत्मरक्षा के लिए हिंसा कर रहा है या बदले की भावना से कर रहा है।
    असल में, हिंसा का असल मकसद है वर्चस्व स्थापित करना।वर्चस्व स्थापित करने वाली मनोदशा राजनीतिक कमजोरी से पैदा होती है। हिंसा जिस इलाके में होती है वहां पर वह तो असर छोड़ती ही है,इसके अलावा उन इलाकों में भी असर छोड़ती है जो दूर पड़ते हैं।लेकिन हिंसा हमेशा एक वृत्त में केन्द्रित रहती है।मसलन्,केरल के जिस जिले में माकपा-आरएसएस के बीच हिंसा हो रही है वह अधिक से अधिक केरल तक या सबंधित जिले तक सीमित रहेगी,उसके बाहर नहीं जाएगी।इस अर्थ में हिंसा स्थानीय और प्रांतीय होती है।

     मौजूदा हिंसा की जड़ें राजनीतिक असहिष्णुता में छिपी हैं।फिलहाल सभी राजनीतिकदलों में असहिष्णुता चरम पर है।कोई असहिष्णुता छोड़ने को तैयार नहीं है।मौजूदा हिंसा को पहल करके रोकने के लिए कोई दल तैयार नहीं है,उलटे गरम-गरम बयान आ रहे हैं या फिर उपेक्षा करके चुपचाप हिंसा देख रहे हैं।यह मनोदशा अ-लोकतांत्रिक और हिंसक है।हिंसा का जबाव हिंसा नहीं है,हिंसा का जबाव पुलिस भी नहीं है।हिंसा जबाव है शांति और वह संवाद-सहयोग के बिना स्थापित नहीं हो सकती।लोकतंत्र के ये दोनों महत्वपूर्ण तत्व हैं।जो दल लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए कल तक वोट मांग रहा था वही दल आज मुँह फुलाए,गुस्से में ऑफिस में बैठा है या हिंसा में मशगूल है।हिंसा को हिंसा या घृणा या निंदा से खत्म नहीं कर सकते। हिंसा को खत्म करने के लिए शांति,सहयोग और संवाद की जरूरत है।

विवेकहीनता विकल्प नहीं है फेसबुक मित्रो!


हमारे फेसबुक मित्र उन्मादियों की तरह ,भाजपा के प्रचारक की तरह जीत गए जीत गए हल्ला मचाए हुए हैं ! उनकी इन हरकतों को देखकर हंसी भी आ रही है ,गुस्सा भी आ रहा है,मित्रो,फेसबुक कम्युनिकेशन है, कम्युनिकेशन की शर्त है कि दिमाग की खिड़कियां खुली रहें,दिमाग की खिड़कियां बन्द करके लोकतंत्र नहीं बचता।लोकतंत्र बचता है विवेकपूर्ण कम्युनिकेशन से,असहमतियों की गंभीर मीमांसा करने से। आपलोग पढ़े-लिखे हो,आप लोग किसी के कार्यकर्ता के तौर पर फेसबुक में दाखिल नहीं होते।आप निजी व्यक्ति के नाते यहां संवाद करते हो।यह भी जानते हो कि यह संवाद वोटरों में नहीं हो रहा,फिर इस तरह की विवेकहीनता क्यों ॽ
    विवेकहीनता सबसे बड़ी पूंजी है फासिज्म की।लोकतंत्र बचे और समृद्ध बने,यह आप-हम सबको देखना होगा।लेकिन आपलोग तो अपने कम्युनिकेशन से उलटी दिशा में दौड़ रहे हैं।मसलन्, हाल के विधानसभा चुनावों को ही लें तो अनेक नई चीजें देख पाएंगे,इन पर हमें खुलकर बातें करनी चाहिए।मसलन्,नीतियों के सवाल को प्रमुख सवाल बनाया जाना चाहिए,लेकिन आपलोग नीतियों पर तो बात नहीं करना चाहते। नीतिहीनता और अवसरवाद को लोकतंत्र के लिए कैंसर माना जाता है। कमोबेश सभी दल इसकी गिरफ्त में हैं।
    दूसरी बड़ी समस्या यह है भारत को उदार पूंजीवाद के मार्ग पर चलना है या अनुदार पूंजीवाद के मार्ग पर चलना है।हमारे मोदीभक्त मित्र कांग्रेस विरोध की विवेकहीन पगडंडी पर चलकर यदि उदारवाद का मार्ग ग्रहण करते तो हमें कोई आपत्ति नहीं थी लेकिन वे तो भाजपा के अनुदार पूंजीवादी मार्ग पर बढ़ चले हैं,वे भाजपा की हर जीत पर इस तरह खुश हो रहे हैं गोया वे उदारतावाद के मार्ग पर एक और कदम आगे बढ़े हों ! लेकिन मित्रो,भारत में पहले से ही सामंती दौर की संकीर्णताएं,अनुदार भावनाएं,मूल्य आदि मौजूद हैं इनमें भाजपा का अनुदारवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र इजाफा कर रहा है।
    मोदीजी अनुदारवाद की हर स्तर नग्नतम रूप में वकालत कर रहे हैं,अनुदारवाद के स्थानीय दलों को एकजुट कर रहे हैं,इससे भारत कभी आगे नहीं जाएगा।दुर्भाग्य की बात है कारपोरेट मीडिया इस काम में उनकी मदद कर रहा है,बहुराष्ट्रीय कंपनियां मदद कर रही हैं,क्योंकि वे भारत को अनुदार देश के रूप में देखना चाहते हैं।मेरी निजी तौर पर कांग्रेस के साथ कोई मोहब्बत नहीं है।लेकिन कम से कम कांग्रेस घोषित तौर पर,नीति के तौर पर अनुदारवाद की पक्षधर नहीं है,इसलिए तुलनात्मक तौर पर भाजपा से बेहतर है।कांग्रेस की उदारवादी नीतियों ने धीमी गति से ही सही लेकिन देश में उदार मूल्यों,संरचनाओं और संस्कारों के निर्माण में केन्द्रीय भूमिका अदा की है,इसको स्वीकार करने में झिझक नहीं होनी चाहिए।कांग्रेस का हारना उदारतावाद की पराजय है।अब आपलोग तय करें भारत को उदारतावाद के मार्ग पर बढ़ते देखना चाहते हैं या फिर अनुदार मार्ग आगे बढ़ते देखना चाहते हैं।

     फेसबुक पर तथ्य और सत्य के आधारपर बातें होनीं चाहिए।मसलन्,मोदी की नीतियों पर खुलकर बातें हों,जमीनी हकीकत बड़ी भयावह है सरकारी बैंकों से केन्द्र सरकार के इशारे पर जनता के धन की खुली लूट मची हुई है।यह लूट बताती है  मोदीजी किन वर्गों की सेवा कर रहे हैं।मोदी प्रशासन का आलम यह है कि प्रचार के अलावा कोई काम नहीं हो रहा।तमाम किस्म के संवैधानिक संस्थानों पर नियोजित हमले किए जा रहे हैं और यह काम और कोई नहीं संघ परिवार कर रहा है जो सत्ता चला रहा है। आपातकाल को छोड़कर संवैधानिक संस्थाओं पर हमले कभी किसी शासकदल ने नहीं किए लेकिन मोदीजी मजे में हमले कर रहे हैं और इसके लिए ´कांग्रेस नष्ट करो ´का नारा लगाकर ध्यान हटा रहे हैं। मोदी सरकार के अगले निशाने पर बैंकिग सिस्टम है।हमलोग यदि सावधान नहीं हुए तो बाद में बहुत पछताएंगे। 

मोदी की जीत पर मुग्ध क्यों हो मित्रवर!

     इसे कहते हैं मोदी के प्रचार की जीत ! आप कुछ भी कहें फेसबुक मोदी भक्त सोचने को तैयार नहीं हैं ! वे पूरी तरह माने बैठे हैं,वे राजनीति को सरकार के गठन के आर-पार देखने को तैयार नहीं हैं।वे यह भी भूल गए कि इंदिरा गांधी जैसी दिग्विजयी नेत्री को क्षेत्रीय दल मिलकर धूल चटा चुके हैं,उसके पराभव में उनकी बड़ी भूमिका थी,आज कांग्रेस यदि हाशिए पर है तो क्षेत्रीय दलों के कारण,न कि भाजपा के कारण।भाजपा का उदय तो हाल के वर्षों में हुआ है।केन्द्र सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ असल मोर्चा तो क्षेत्रीय दलों ने लिया था,निकट भविष्य में भी वही होगा।कम से कम कांग्रेस को कभी -कभार किसी क्षेत्रीय दल का राजनीतिक सहयोग मिल भी जाता था लेकिन भाजपा के साथ तो कोई क्षेत्रीय दल भरोसे के साथ जाना नहीं चाहता।
भाजपा के लिए विधानसभा चुनाव के आंकड़े उतने संतोषजनक नहीं हैं जितने बताए जा रहे हैं।यह सच है भाजपा की सरकार असम में बन गयी है,लेकिन यह स्थिति तो विगत दो साल से साफ है।कांग्रेस निकम्मेपन, गुटबाजी और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी है।सोचने वाली बात यह है कि कांग्रेस के अलावा किस दल को भाजपा ने हराया है,क्या किसी क्षेत्रीयदल को हराने में भाजपा सफल रही है।भाजपा की सरकारें वहीं बनी हैं जहां कांग्रेस का शासन था।इससे पता चलता है कि आम जनता ने कांग्रेस के विकल्प के अभाव में भाजपा को चुना है।भाजपा को जनता अपना स्वाभाविक विकल्प नहीं मानती।यदि ऐसा ही होता तो भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर वैसी सफलता क्यों नहीं मिली जैसी इंदिरा या राजीव के दौर में कांग्रेस को मिली थी।
दूसरी बात यह कि भाजपा ने नीतिहीन ढ़ंग से जम्मू-कश्मीर और असम में जिस तरह पृथकतावादियों से समझौता करके चुनाव लड़ा है वह तो और भी शर्मनाक है।इसका अर्थ है कि भाजपा ने बोडो,उल्फा,पीडीपी आदि की राजनीति को लेकर सर्वस्वीकृत राष्ट्रीय समझ से काटकर निहित स्वार्थी ढ़ंग से अवसरवादी राजनीति करने का फैसला कर लिया है।इसलिए भाजपा हर रंगत के पृथकतावादी दलों से खुलकर हाथ मिला रही है और उस पर हम सब मूक दर्शक बने बैठे हैं।
चुनाव में जीत जरूरी है लेकिन जीतकर सरकार बनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि आप सरकार क्यों बनाना चाहते हैं किन नीतियों और संगठनों की मदद से सरकार चलाना चाहते हैं ?
टीवी प्रचार ने हमारे आलोचनात्मक विवेक को छीन लिया है और हमने टीवी टॉक शो की नजरों से चीजों को देखने की,सतही ढ़ंग से देखने की आदत डाल ली है और यह भाजपा की सरकार बनाने से भी बड़ी जीत है।


शुक्रवार, 20 मई 2016

बंगाल और हिन्दी के बुद्धिजीवी-लेखक

      मुझे पश्चिम बंगाल में रहते हुए 27साल गुजर गए।इसबीच यहां बहुत कुछ बदला है लेकिन अफसोस यह है हिन्दी के बुद्धिजीवियों-लेखकों का संस्कार नहीं बदला।पश्चिम बंगाल में हिन्दी के बुद्धिजीवी देश के विभिन्न कोनों से आते रहे हैं।भाषण करते रहे हैं,सम्मान लेते रहे हैं।लेकिन कभी इन बुद्धिजीवियों ने आँखें खोलकर बंगाल के यथार्थ पर नहीं लिखा,जो कुछ लिखा वह किताबी विषयों पर लिखा,मसलन् रैनेसां पर लिखा,लेकिन उसकी जमीनी हकीकत को कभी जानने की कोशिश नहीं की।चूंकि अधिकांश बुद्धिजीवी प्रगतिशील थे अतःवे यहां के जमीनी यथार्थ से आँखें चुराकर भागते रहे हैं।यही हालत पश्चिम बंगाल के बंगाली बुद्धिजीवियों की है।वे नंदीग्राम के बहाने उठे और फिर सो गए।

सवाल यह है पश्चिम बंगाल के यथार्थ को जानने और समझने के लिए जिस जोखिम को उठाने की जरूरत है वह जोखिम लेखक उठाने से क्यों कतराते रहे हैं ॽ जो भी थोडा-बहुत लेखन है वह वाम के पक्ष और विपक्ष में है।वाम की आलोचना पर है। लेकिन वाम के अलावा बंगाल का सामाजिक यथार्थ भी है जिसकी ओर आलोचनात्मक नजरिए से देखने की जरूरत है।यह काम पहले नहीं हुआ अभी भी नहीं हो रहा।सारी समस्याएं यहीं पर हैं। हमारे सरोकार राजनीतिक हार -जीत तक आकर सिमटकर रह गए हैं, कुछ पद-पुरस्कार पाने तक सीमित रह गए हैं।इससे बंगाल के यथार्थ के साथ अलगाव और भी गहरा हुआ है।

मैं निजी तौर पर यथाशक्ति इस दिशा में लिखता रहा हूँ और इसकी मुझे राजनीतिक –सामाजिक कीमत भी चुकानी पड़ी है। एक लेखक के नाते मैंने बंगाल के यथार्थ को नहीं छोड़ा,पार्टी छूटी,पद छूटे,मित्र छूटे ,लेकिन मैंने निडर होकर लिखना नहीं छोड़ा। सवाल यह है बंगाल जब हिन्दीभाषियों को प्रभावित करता है तो यह भी तो देखें कि हिन्दीभाषी लोग और राज्य किस तरह बंगाल को प्रभावित कर रहे हैंॽ बंगाल में किन वर्गों का ह्रास हुआ ॽ किन क्षेत्रों में ह्रास हुआ ॽऔर इस ह्रास के कारण जो समाज पैदा हुआ वह कैसा है ॽ



आज का बंगाल पहले के बंगाल से भिन्न है।आज बंगाल में हिन्दीभाषी क्षेत्र की तमाम विकृतियां और अमानवीय मूल्य पैर पसार चुके हैं।बंगाली जाति पूरी तरह हिन्दीभाषियों की कु-सभ्यता के रूपों से सीख रही है,उनका अनुकरण कर रही है।यह बहुत बड़ा विपर्यय है।इसे बुद्धिजीवी देखना नहीं चाहते।

वाम- कांग्रेस गठजोड़ पराजय के सबक-


        पश्चिम बंगाल में वाम की पराजय काफी महत्व रखती है।जिन लोगों की वाम के प्रति सहानुभूति है वे वाम को पश्चिम बंगाल के सामाजिक यथार्थ के संदर्भ में बहुत कम जानते हैं,जो वाम इस राज्य में है वह विचारधारा के नशे और ३४साल सत्ता में रहने के कारण यथार्थ से एकदम कटा हुआ है।लोकल से लेकर नेशनल स्तर के वामनेता,खासकर माकपानेता जमीनी यथार्थ को देखने से भागते रहे हैं।सच्चाई यह है कि वाम के पराभव का सिलसिला थमा नहीं है ऊपर से राजनीतिक अवसरवाद ने वाम को घेर लिया है।आयरनी यह है कि माकपा पोलिट ब्यूरो सदस्य पी.विजयन( केरल) से प्रणव राय से हाल ही में केरल कवरेज के दौरान पूछा कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस से वाम ने जो गठबंधन किया है उस पर क्या कहना है ? विजयन ने कहा मैं नहीं जानता।आश्चर्य है वाम-कांग्रेस का यहां गठबंधन था सारे मीडिया में खबर है पूरी पार्टी मिलकर चुनाव लड़ रही है लेकिन पोलिट ब्यूरो सदस्य कह रहा है,मैं नहीं जानता! चुनावी सभाओं में पोलिट ब्यूरो सदस्य गठबंधन कह रहे हैं,लेकिन एक दूसरे पोलिट ब्यूरो सदस्य विमान बसु ने कहा गठबंधन कहां है ? यह राजनीतिक दोगलापन यदि माकपा नेताओं के मन में है तो जनता कैसे उन पर विश्वास करती !माकपा ने दो टूक ढंग से कभी खुलकर नहीं बताया कि वाम- कांग्रेस गठबंधन है या चुनावी तालमेल है ?इस तालमेल को किन तर्कों को लेकर किया गया उसकी कोई लिखित रूप में चर्चा नजर नहीं आई! कोई विश्वास करेगा कि केरल के माकपा नेताओं को मालूम नहीं है कि बंगाल में क्या हो रहा है!
माकपा की जिन मुद्दों को लेकर आलोचना हमने की उन पर कभी ध्यान नहीं दिया गया।इससे भी बड़ी बात यह कि जब संगठन कमजोर है और हमले हो रहे हैं ,माकपानेता अपने लोगों को सुरक्षा देने में असमर्थ हैं,पोलिंग एजेंट तक देने में असमर्थ हैं,तब फिर चुनाव लड़ने क्यों गए ? क्या संगठन के बिना चुनाव लड़ना चाहिए? बंगाल में कई बार चुनाव होते हैं और माकपा चुनाव में लड़ने लायक अवस्था में नहीं है।ऐसी स्थिति में माकपा को पश्चिम बंगाल में कुछ वर्षों के लिए चुनावी राजनीति से विरत रहकर संगठन निर्माण के काम पर ध्यान देना चाहिए,इस समय माकपा अधेड़ और बूढ़ों का दल मात्र होकर रह गया है।युवाओं का संगठन में अभाव है ,और सही नीतियों का भी अभाव है।
माकपा की सबसे बड़ी चुनौती है कि वह अपनी सांगठनिक संरचनाओं ,नियमों और नीतियों को नागरिक समाज की परिकल्पना और नीतियों की संगति में नए सिरे से बनाए,यदि वह ऐसा करता है तो भविष्य में संभावनाएं हैं।वरना लोकतंत्र में हाशिए पर रहने के लिए तैयार रहे।



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ममता की जीत को यहां से देखो-


     पश्चिम बंगाल में माकपा का जनाधार जिस तरह खत्म हो रहा है वह बताता है कि माकपा ने 34साल की वामशासन की गलतियों से कोई सबक हासिल नहीं किया ।मसलन् इसबार के चुनाव में माकपा को मात्र 19.7फीसदी वोट मिले हैं जबकि टीएमसी को 44.9फीसदी वोट मिले हैं।यानी टीएमसी अकेले अपने दम पर समाज के बृहत्तर तबकों के बीचमें अपनी स्वीकृति अर्जित करने में सफल रही है।खासकर अल्पसंख्यकों,एससी,एसटी और ग्रामीणों में उसे व्यापक जन समर्थन तो मिला है, इसके अलावा शहरीजनों में भी वह जनाधार का विस्तार करने में सफल रही है।इसबार के चुनाव से यह भी निष्कर्ष निकलता है कि टीवी चैनलों का जनता पर कोई असर नहीं होता।आज भी निजी जनसंपर्क और परंपरागत संगठन के जरिए किया गया प्रचार कार्य प्रभावी होता है।जो लोग सोचते हैं कि टीवी और सोशलमीडिया से चुनाव जीता जाता है,वे गलतफहमी में हैं।
पश्चिम बंगाल में अधिकांश टीवी चैनलों ने अहर्निश ममता के खिलाफ प्रचार किया,लेकिन आम जनता पर उसका कोई असर नहीं हुआ।इसका प्रधान कारण है ममता का कैडर आधारित संगठन।दूसरी बात यह कि ममता सरकार ने विकासमूलक योजनाओं को नीचे तक लागू करके,स्वयं निरीक्षण और निर्देशन का काम किया,हर जिले में बार-बार दौरा किया,इससे सारी योजनाएं जमीनी स्तर पर लागू करने में वह सफल रही। तीसरा प्रधान कारण है वाम और भाजपा का साखविहीन प्रचार।इन तीन कारणों ने मिलकर ममता की जीत को संभव बनाया।उल्लेखनीय है ममता सरकार के खिलाफ अपराधीकरण, घूसखोरी, पुलिस मशीनरी के दुरूपयोग आदि के सभी आरोप सच हैं,लेकिन आम जनता ने अपनेहित के सामान्य विकासमूलक कार्यों को केन्द्र में रखकर ममता को वोट दिया।वाम की इस मामले में 34 साल की नाकामियां आज भी सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ी हैं।एक छोटे से उदाहरण से समझ सकते हैं।मैं जिस मुहल्ला-गली में रहता हूँ,उसके आसपास कोई पानी की प्याऊ वाम जमाने में नहीं थी,लेकिन ममता के आने के बाद ठंड़े पानी की चार प्याऊ विभिन्न नुक्कड़ों पर इस बीच में बनायी गयीं।इससे नागरिकों को मदद मिली।सफाई के मामले में भी वाम को ममता ने मात दी है,कोलकाता पहले की तुलना में ज्यादा साफ रहता है,सड़कों और गलियों में बहुत रोशनी रहती है।यही रोशनी वाम शासन में कम नजर आती थी।यह स्थिति सारे राज्य की है।इसी तरह कन्याश्री योजना के तहत हर लड़की के बैंक खाते में 25हजार रूपये सरकार ने जमा कराए हैं,गरीबों को 50हजार रूपये तक की घर बनाने के लिए धनराशि गांवों में घर-घर जाकर बांटी है।हर लड़की को साइकिल मिली है,इन सब कार्यों के कारण राज्य का नक्शा बदला है।शिक्षा के क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े पैमाने पर निवेश हुआ है।जो कि वाम शासन में नहीं हुआ था। इन सभी पहलुओं पर मैं फेसबुक पर पहले भी लिख चुका हूँ।कहने का तात्पर्य है कि ममता को वोट सकारात्मक कारणों की वजह से मिला है और इसके कारण ममता की गड़बड़ियों को जनता ने नजरअंदाज किया है।

मंगलवार, 17 मई 2016

हिन्दी की कब्र पर खड़ा है आरएसएस


     
आरएसएस के हिन्दी बटुक अहर्निश हिन्दी-हिन्दी कहते नहीं अघाते। वे हिन्दी –हिन्दी क्यों करते हैं ॽ यह मैं आज तक नहीं समझ पाया। इन लोगों के हिन्दीप्रेम का आलम है कि ये अभी तक इंटरनेट पर रोमनलिपि में हिन्दी लिखते हैं,मेरे अनेक दोस्त हैं जो रोमनलिपि में हिन्दी लिखते हैं,मेरी उनसे कोई तकरार नहीं है,मेरी आरएसएस भक्तों के अंग्रेजी लिपि या फॉण्ट में हिन्दी लेखन को लेकर भी कोई आपत्ति नहीं है।भाषा को मैं स्वैच्छिक मानता हूँ,जिसकी जैसी रूचि हो,जिस तरह लिखना चाहे लिखे,भाषा में मन का स्वभाव या लिखने की आदत या बोलने की आदत की बहुत बड़ी भूमिका होती है।इसके अलावा मिश्रण का भी भाषा पर असर होता है।

फासिज्म के भाषाई जंजाल में जीने वाले आरएसएसवाले हिन्दी को शुद्ध करने की जब मुहिम चलाते हैं तो हंसी आती है,वे शुद्धभाषा,शुद्ध हिन्दी के प्रयोग पर बल देते हैं।लेकिन खुद कम से कम लिखते हैं। पर उपदेश का यह आदर्श नमूना है।हिन्दी को जनप्रिय बनाना है तो खूब लिखो,लेकिन ट्विटर पोस्ट से अधिक तो संघी लोग लिखते नहीं हैं ! इतने कम शब्दों से हिन्दी बचने से रही !

हिन्दी या कोई भी भाषा लेखन और शिक्षा से बचती है,नारेबाजी से नहीं।हिन्दी को जनप्रिय बनाना है तो सबसे पहले आरएसएस वालों को अपने अनुयायी दुकानदारों को बोलना होगा कि माल की बिक्री करते समय जो बिल बनाएं वह हिन्दी में बनाएं।बाजार में भाषा का प्रयोग नहीं होगा तो भाषा में ताकत नहीं आएगी।इस समय बाजार की खरीद-फरोख्त अंग्रेजी में होती है।कम से कम हिन्दीभाषी दुकानदारों और खासकर आरएसएस से जुड़े दुकानदारों को हिन्दी को बचाने के लिए इसकी पहल करनी चाहिए।

फेसबुक –ट्विटर पर हिन्दी पारायण करने से हिन्दी बचने वाली नहीं है। खड़ी बोली हिन्दी दिल्ली के खत्री व्यापारियों की भाषा थी और उसका बाजार से गहरा संबंध था जिसके कारण वह आधुनिककाल में तेजी से साझा संचार की भाषा के रूप में फैली।लेकिन इन दिनों हिन्दीभाषी दुकानदारों ने अपने बही खाते की भाषा हिन्दी नहीं रखी,वस्तु के क्रय-विक्रय की भाषा हिन्दी नहीं रखी।मात्र विज्ञापनों और मुंबईया फिल्मों के जरिए हिन्दी को नहीं बचा सकते।

भाषा मीडियम है और मीडियम से मीडियम नहीं बचता।मीडियम का प्रसार होता है।मीडियम बचता है पठन-पाठन और आचरण से। आरएसएस वालों के लिए हिन्दी कभी आचरण की भाषा नहीं रही है।बल्कि सामाजिक टकराव और वर्चस्व का औजार रही है। इससे भाषा कमजोर हुई है।हिन्दीभाषा बढ़े इसके लिए जरूरी है इसके साथ जुड़ी धर्मनिरपेक्ष भाषिक-सांस्कृतिक परंपराओं को आरएसएस वाले आचरण में लाएं।यह संभव नहीं है कि हिन्दी और उसकी विचारधारा हिन्दुत्व हो।हिन्दी की धर्मनिरपेक्ष विचारधारा परंपरा है।हिन्दी साझे सामाजिक संघर्ष का परिणाम है।हिन्दी बचानी है तो धर्मनिरपेक्ष परंपराओं और आदतों को बचाना होगा।

भाषा कोई शाब्दिक कार्य-व्यापार नहीं है,वह एक वैचारिक कार्य-व्यापार भी है।आरएसएस के लोग जब धर्मनिरपेक्षता पर हमला करते हैं तो वे देश को कमजोर करते हैं,साथ ही हिन्दी को भी असहाय बनाते हैं।यह विलक्षण सच्चाई है कि विगत तीस सालों में आरएसएस ताकतवर बना दूसरी ओर और हिन्दी कमजोर हुई। भाषा को समृद्ध करने के लिए धर्मनिपेक्षता के सामने बिना शर्त आरएसएस को समर्पण करना होगा।उसे धर्मनिरपेक्षता के साथ तदर्थवादी-अवसरवादी रवैय्या त्यागना होगा। मसलन्, आरएसएस के लोग जब भाजपा के मंच से चुनाव लड़ेंगे तो धर्मनिरपेक्षता की औपचारिक शपथ लेंगे लेकिन आचरण और विचारधारा के रूप में धर्मनिरपेक्षता की बजाय हिन्दुत्व पर जोर देंगे।यह असल में हिन्दी की कब्र खोदने वाला काम है।





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