सोमवार, 4 जुलाई 2011

रामगोपाल वर्मा,मारिया और रियलिटी शो


पोर्न फिल्मों में रीयल अभिनेता-अभिनेत्रियां काम करते हैं। इन लोगों को कामुकता और संभोग के वास्तव दृश्यों को फिल्माना होता है। अभी तक यह क्षेत्र हिन्दी में घासलेटी सेक्स फिल्मों तक सीमित था,इसमें काम करने वालों को बॉम्बे के नामी निर्देशक जगह नहीं देते थे। भारत में बनने वाली अधिकांश सेक्स फिल्मों का निर्माण युवा और अभावग्रस्त कलाकारों को लेकर होता रहा है और इन फिल्मों का अवैध रूप में प्रदर्शन और वितरण भी होता रहा है।

केबल संस्कृति और पोर्न संस्कृति के प्रचार ने इन फिल्मी कलाकारों की मांग बढ़ा दी है। सेक्स फिल्मों के उत्पादन और खपत में इजाफा किया है। एक जमाने में मैनस्ट्रीम सिनेमा और टीवी के लिए सेक्स फिल्मों के अभिनेता अभिनेत्रियां अछूत थे। उसी तरह जिस व्यक्ति ने वास्तव जीवन में अपराध किया है वह भी फिल्मी अभिनय के लिए नहीं चुना जाता था। लेकिन इंटरनेट के प्रसार ने पोर्न संस्कृति को नई बुलंदियों पर पहुँचाया है। पोर्न को स्वीकृति दिलायी है। उसकी निजी खपत को वैधता प्रदान की है। बीएसएनएल से लेकर टाटा-बिडला-मित्तल आदि कारपोरेट घरानों के द्वारा संचालित नेट कंपनियों ने पोर्न के प्रसारण को वैधता दी है, और ये कंपनियां सरकारी और गैर सरकारी बैंकों के जरिए पोर्न की नेट के जरिए बिक्री करके धंधा भी कर रही हैं। यानी सरकारी और गैर सरकारी तंत्र ने पोर्न संस्कृति को वैध बनाया है।

आज पोर्न देखना वैध है। यही वह पैराडाइम शिफ्ट है जिसमें रीयलिटी टीवी ने उन तमाम लोगों को चुना है जो एक जमाने में किसी न किसी अपराधकर्म में लिप्त पाए गए और मीडिया कवरेज के केन्द्र में आ गए। इसी प्रसंग में बॉम्बे फिल्म उद्योग ने सबसे पहले जम्मू-कश्मीर के चर्चित सेक्सकांड,जिसमें दर्जनों बड़े अफसर और कई मंत्री शामिल थे, उस सेक्सकांड की शिकार कश्मीर सुंदरी को शामिल करके उस कांड पर फिल्म बनायी ।

हाल ही में इसी पोर्न संस्कृति की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए फिल्म निर्माता-निर्देशक रामगोपाल वर्मा ने अपनी फिल्म के लिए मारिया को अभिनय का निमंत्रण देकर एक नए विवाद को जन्म दिया है। मारिया को सेशन अदालत ने नीरज ग्रोवर मर्डर हत्याकांड में सबूतों को मिटाने के लिए दोषी पाया था ,यह हत्याकांड 7 मई, 2008 को हुआ था। उसे तीन साल की सजा हुई थी,जिसे वह भोग चुकी है। उस केस में मारिया को मीडिया ने व्यापक कवरेज दिया।

मारिया इस हत्याकांड में पकड़े जाने के पहले तक टीवी उद्योग में पैर जमाने और काम पाने के लिए काफी प्रयास करती रही लेकिन सफल नहीं हुई। लेकिन हत्याकांड के बाद जो मीडिया कवरेज आया उसने मारिया को मीडिया का चर्चित माल बना दिया। अब मारिया के सजा भोगने के बाद मुक्त रूप में बाहर आते ही रामगोपाल वर्मा ने उसे अपनी फिल्म के लिए अनुबंधित करने का फैसला किया है।

सुना है स्टार समूह बिग बोस की अगली सीरीज के लिए मारिया को 5 करोड़ रूपये का प्रस्ताव कर चुका है। और भी कई निर्माता हैं जिनकी हठात मारिया में दिलचस्पी बढ़ गयी है। रामगोपाल वर्मा उस हत्याकांड पर फिल्म ही बनाना चाहते हैं। वे मारिया को वास्तव चरित्र के रूप में फिल्मी पर्दे पर रीयलिटी टीवी फॉरमेट में लाना चाहते हैं। हिन्दी फिल्मों में इसके पहले किसी अपराधी को मैनस्ट्रीम सिनेमा के किसी निर्माता-निर्देशक ने रीयल इवेंट फिल्माने के लिए अनुबंधित नहीं किया।

अपराध पर फिल्में बनी हैं लेकिन उसमें कोई वास्तव अपराधी ही काम करे ऐसा नहीं हुआ। कई टीवी रिय़लिटी शो में ऐसे लोगों को अभिनय करते देखा गया है जो किसी न किसी अपराधकर्म में लिप्त होने के कारण मीडिया कवरेज पा गए और उन्हें रीयलिटी टीवी वालों ने प्रदर्शन के लिए चुन लिया।

इस प्रसंग में कई विचारधारात्मक सवाल उठे हैं। इनमें पहला सवाल यह है कि क्या मीडिया कवरेज में व्यक्ति की इमेज का रूपान्तरण होता है ? किस रूप में रूपान्तरण होता है? इस तरह के चरित्र कैसे ब्रॉण्ड बनते हैं ? असल में मीडिया में प्रचार का महत्व है । यह सकारात्मक हो या नकारात्मक प्रचार होना चाहिए। इसके बाद संबंधित व्यक्ति कोई भी हो,पापी हो या पुण्यात्मा हो,वह मीडिया प्रोडक्ट होता है। मीडिया अपने बनाए खिलौनों को ही प्यार करता है। मीडिया के लिए प्रचार ही महान है।

रामगोपाल वर्मा हों या अन्य कोई निर्माता-निर्देशक,वे अपराधियों को सीधे मीडिया प्रोडक्ट के रूप में पेश करके अपराधीकरण का महिमामंडन कर रहे हैं ,ये लोग अपराध और अपराधी को महत्ता देकर अपने को फिल्म परंपरा से निकालकर रियलिटी टीवी परंपरा और पोर्न परंपरा में ले आए हैं।यह फिल्मीस्तान में पोर्नयुग के सीधे प्रभाव की अभिव्यक्ति है।

नीरज ग्रोवर हत्याकांड का केस अभी खत्म नहीं हुआ है।इस केस के आगे भी चलने के चांस हैं। आगे भी मारिया को मीडिया कवरेज मिलेगा। यही मारिया के प्रचार और कलाकर्म की सबसे बड़ी पूंजी है। मीडिया में अपराधी,भला आदमी,शरीफ और कातिल आदि केटेगरी नहीं होती। मीडिया में तो सिर्फ प्रौपेगैण्डा महत्वपूर्ण है। इमेजों का अहर्निश प्रक्षेपण ही महत्वपूर्ण है। इमेज वर्षा नया ब्रॉण्ड बनाती है। मारिया का अहर्निश कवरेज और उसके प्रतिवाद का आंदोलन मारिया को पीत पत्रकारिता का नामी व्यक्तित्व बना रहा है। इससे उसके लिए अभिनय की नई संभावनाओं के द्वार खुल सकते हैं।

3 टिप्‍पणियां:

  1. मीडिया और मनुष्य की दमित चाहतों का गठजोड़ ऐसा ही फलित होता रहेगा -आज उसके लिए टेक्नोलोजी ,माहौल सभी कुछ तो है !

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  2. हिन्दी के महत्वपूर्ण अखबार नवभारत टाइम्स में खबर है-पोर्न देखनेवाले शरीफ होते हैं, आक्रामक नहीं होते। क्या दूसरा कैप्शन होगा-सेक्स वर्करों के पास जानेवाले बलात्कारी नहीं होते।

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  3. bahut umda lekh. ramu ek achha nirdeshak hai, par pata nahi aaj kal use kya ho gaya hai

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