सोमवार, 18 जुलाई 2011

हिन्दी में संवाद का अंत

                हिन्दी के इस देश में दो रूप हैं एक संवैधानिक है जिसके तहत हिन्दी कुछ राज्यों में प्रधानभाषा है तो कुछ राज्यों में अल्पसंख्यक भाषा है। जहां वह अल्पसंख्यकों की भाषा है वहां हिन्दीभाषी सांस्कृतिक अल्पसंख्यक हैं। इससे हमारे राष्ट्र-राज्य के ढ़ांचे को कोई चुनौती नहीं है। इस परिधि के बाहर दूसरी ओर हिन्दी और दूसरी भाषाओं का सर्जनात्मक संघर्ष भाषायी शक्ति अर्जित करने के लिए चल रहा है। इसमें तकनीकी- जगत आता है। इसमें कम्प्यूटर, व्यापार,डाटा बैंक,कम्प्यूटरीकरण,सॉफ्टवेयर, दूरसंचार,उद्योग, मासमीडिया आदि क्षेत्र आते हैं।  इस संघर्ष के परिणामों के बारे में अभी हमारे पास कोई सुचिंतित मूल्यांकन नहीं हैं। इसका प्रधान कारण है हिन्दी शिक्षकों की इस क्षेत्र में दिलचस्पी और जानकारी का अभाव।

    हिन्दी समीक्षक -शोधार्थी-प्रोफेसर आदि जब हिन्दी पर शोध करते हैं अथवा बातें करते हैं तो उनके विमर्श का मनवांछित विषय है 'राष्ट्रभाषा हिन्दी' ,' हिन्दी बनाम अंग्रेजी' , ' हिन्दी की उपेक्षा या दुर्दशा' ,' जातीय भाषा के रूप में हिन्दी ' ,' हिन्दी जाति ', ' हिन्दी संस्कृति' आदि। अधिकांश विमर्श इन विषयों पर है। इसी तरह साहित्य में उत्सवधर्मी विमर्श है।बमुश्किल एक दर्जन लेखक और विषय हैं जिन पर घूम-फिरकर गोष्ठियां ,लेखन और विमर्श होता रहा है।
       मसलन् किसी लेखक का जन्मदिन या शताब्दी वर्ष आ गया तो उस पर चर्चाएं कर लीं,कुछ नहीं मिला तो फैशन की तरह स्त्री साहित्य,दलित साहित्य,उत्तर आधुनिकतावाद, जनवादी साहित्य,प्रगतिशील साहित्य आदि पर गोष्ठी कर ली,विमर्श कर लिया अथवा किसी न्यूसेंस पर बहस कर ली। थोड़ा आगे गए तो हिन्दी भाषा और ब्रिटिशराज, नवजागरण और हिन्दी आदि पर विमर्श कर लिया। इस समूचे विमर्श की प्रकृति है "मैं यह सोचता हूँ"। हिन्दी  लेखक के यहां 'हम ' में भी 'मैं' की अभिव्यक्ति होती है। 'हम' में अनेक लेखकों-वक्ताओं के विमर्श में एक खास किस्म का अहं और अ-विनयी भाव है। वक्ता या लेखक संबंधित विषय पर जो सोचता है उसी को लिखता-बोलता रहा है। वह इस क्रम में प्रभुत्वशाली विचारों से टकराता है ।उनसे विवाद करता है। अनेकबार प्रभुत्वशाली विचारों के प्रति समर्पणभाव से पेश आता है। हिन्दी विमर्श में वह अपनी बुद्धि के कौशल तो दिखाता है लेकिन विषय के मर्म में प्रवेश नहीं कर पाता। विषय के अन्तःकरण का उदघाटन नहीं कर पाता।
        जो राष्ट्रभाषा बनाने में लगे हैं वे सत्ता के भाषायी कानूनों के सख्ती से पालन किए जाने की मांग कर रहे हैं। जो हिन्दी संस्कृति की खोज कर रहे हैं या हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते हैं वे मूलतः हिन्दीभाषा के संदर्भ क्षेत्र के बाहर नहीं देखते। वे भाषिक संदर्भ के बाहर हिन्दीराज्यों में घट रहे सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक-मीडिया परिवर्तनों के संदर्भ को नहीं देखते। भाषिक परिवर्तन भाषा के बाहर समाज,संस्कृति,मीडिया आदि में चल रही प्रक्रियाओं से गहरे जुड़े हैं। इन प्रक्रियाओं के प्रति गंभीर अध्ययन-अध्यापन का भाव अभी तक पैदा नहीं हुआ है।
     हिन्दी विमर्श की मूल समस्या है धारणाओं-विचारों की पुनरावृत्ति की। आलोचना और विमर्श के नाम पर पुनरावृत्ति के नाम जो लिखा गया है उसमें नए नजरिए का अभाव है। अधिकांश हिन्दी विचारक दोहराते हैं ,वे नए दृष्टिकोण को अभिव्यक्त नहीं करते।
    इसी तरह हिन्दी में बड़े पैमाने पर अनुवाद हो रहा है। इससे हिन्दी में किस तरह के बदलाव आ रहे हैं ? किस तरह के नए शब्द आ रहे हैं ? नए शब्दों का अपना रोमांस होता है। हिन्दी में यह रोमांस किस रूप में चल रहा है और हिन्दी आलोचक किस तरह नए शब्दों के साथ खेल रहे हैं। इस प्रसंग में हमें उत्तर आधुनिकतावाद और आधुनिकतावाद पर चले विमर्शों को देखना चाहिए। साहित्य और आलोचना में नए शब्दों का रोमांस हमें आनंदित करता है। इस रोमांस में एक खास किस्म की घृणा भी विकसित हुई है शब्दों के प्रति।
      मसलन् ,हिन्दी में 'मनोविज्ञान' और 'मनोवैज्ञानिक ' 'साहित्य का समाजशास्त्र' , 'विमर्श ' ,'उत्तर आधुनिकतावाद' आदि को हिन्दी आलोचकों का व्यापक समूह हेयदृष्टि से देखता है। उल्लेखनीय है  आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पर जब रामविलास शर्मा की आलोचना कृति 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना' आई तो उसकी आलोचना करते हुए शिवदानसिंह चौहान ने उसे 'समाजशास्त्रीय आलोचना' कहा था और साहित्य के समाजशास्त्र को गाली की तरह इस्तेमाल किया था,हिन्दी में यही दशा आधुनिकतावादियों,मनोवादियों और उत्तर आधुनिकतावादियों की भी हुई है। इन सब पर तिरस्कार और घृणा के नजरिए से बहस हुई है।
   हिन्दी में नए शब्दों को लेकर किस तरह का नॉनसेंस भाव है ,इसका एक अनुभव बताना चाहूँगा। कुछ अर्सा पहले भारतीय भाषा परिषद में हजारीप्रसाद द्विवेदी शताब्दी समारोह के मौके पर एक विशाल सेमीनार हुआ जिसमें मैंने हजारीप्रसाद द्विवेदी और हाइपरटेक्स्ट के बारे में एक पर्चा पढ़ा। इस सेमीनार में प्रतिभा अग्रवाल ने नामवरसिंह से पूछाकि हाइपरटेक्स्ट क्या है ?इस पर नामवरसिंह ने कहा यह 'हाइपरटेंशन' है। हिन्दी के प्रमुख आलोचक के इस विनोदप्रिय उत्तर में वे तमाम बीमारियां छिपी हैं जो नए शब्दों और नए साहित्य सिद्धांतों के प्रति हिन्दी में दिखती हैं। कहने का अर्थ यह है कि हिन्दी का आलोचक खासतौर पर नए शब्दों और धारणाओं के साथ रोमांस नहीं करता। वह उनसे घृणा करता है,उसके अर्थ को विकृत करता है।
      आप जब किसी भाषा का अनुवाद करते हैं तो उसकी प्रस्तुति और रूख के आधार पर उसमें अतिरिक्त अर्थ की सृष्टि करते हैं। साथ ही उस शब्द की नए सिरे से कोडिंग करते हैं ,संहिता बनाते हैं।
        हिन्दी आलोचकों में बड़ा हिस्सा प्रगतिशील है,कुछ हैं जो प्रगतिशीलता के दायरे में नहीं आते। ये सभी लोग किसी न किसी रूप में हिन्दी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं। उनकी इस प्रतिबद्धता का हिन्दी के प्रति उनके आचरण के साथ गहरा संबंध है। वे मानते हैं  उनकी सामाजिक परिवर्तन में भूमिका है। लेकिन इस रूपान्तरण का संबंध उनके आचरण से जुड़ा है। यह परिवर्तनकामी रूप तब ही प्रभावित करेगा जब उन संरचनाओं के बारे में सवाल करें जो उत्पीड़न का औजार हैं। उस यथार्थ का रूपान्तरण करें जो जनता को उत्पीडित करता है। हिन्दी आलोचक महज चिंतक हो और उत्पीडित लोग महज कार्यकर्ता हों,इससे दुनिया बदलने वाली नहीं है।
     हिन्दी आलोचना संवाद नहीं करती ,वहां उपदेशक के विचार होते हैं और वे अपने पाठक से अनुसरण करने की मांग करते हैं। उपदेशक और अनुसरणकर्ता का संबंध मूलतः मालिक-दास संबंध है।इस संबंध के आधार पर हिन्दी को सामाजिक परिवर्तन की भाषा नहीं बनाया जा सकता।साहित्य सामाजिक परिवर्तन का औजार बने इसके लिए जरूरी है कि लेखक-आलोचक-प्रोफेसर प्रभुत्वशाली अभिजनों के खिलाफ खड़े हों। उनके आचरण का विरोध करे।
     पाओलो फ्रेरे ने लिखा है चालबाजी करने,नारेबाजी करने,'जमा'करने ,निर्देश देने, और कठोर अनुशासन लागू करने से क्रांतिकारी आचरण नहीं बनता,क्योंकि इनसे तो प्रभु का आचरण बनता है। प्रभु वर्ग जनता पर शासन करने के लिए सच्चा आचरण नहीं करने देता। यह उसकी विशेषता होती है कि वह जनता को अपना शब्द न बोलने दे,उसे अपना चिंतन न करने दे।वह संवादात्मक ढ़ंग से काम नहीं कर सकता। इसका मतलब होगा कि या तो उसने शासन-सत्ता को त्याग दिया है और उत्पीडितों के उद्देश्य को उचित मानकर उनके साथ आ गया है।
    इन दिनों साहित्य और भाषा में वस्तुकरण की प्रक्रिया चरम पर है। भाषा के शब्द बिक चुके हैं,वे ट्रेडमार्क बनाए जा चुके हैं। नाम बिक चुके हैं। शब्दों के चीजों में बदले जाने के खिलाफ हमारी आलोचना ने कभी ध्यान नहीं दिया। दूसरी ओर हिन्दी में संवाद का माहौल खत्म हो गया है। शिक्षक-छात्र में संवाद नहीं है।पूंजीपति-मजदूर में संवाद नहीं है। नेता और जनता में संवाद नहीं है। संवाद के वातावरण के अंत से सत्ताधारी वर्गों को मदद मिली है।  सवाल उठता है हिन्दी आलोचना संवाद से क्यों भाग रही है ? क्या यह हिन्दी आलोचना के पराभव की सूचना है ? दूसरी ओर  कम्युनिस्टों और जनता में संवाद टूट चुका है।ऐसे में सामाजिक परिवर्तन कैसे होगा ?  
    संवाद टूटने से हम और भी अकेले हो गए हैं। घनिष्ठता खत्म हुई है। साहित्य, साहित्यकार, क्रांतिकारी ,जनता ,शिक्षक और छात्र आदि के बीच में संवाद हो ,इससे शासकवर्ग कमजोर बनेंगे। समस्या यथार्थ को बताने के साथ उसको बदलने की है। हमारे साहित्यकार यथार्थ बता रहे हैं लेकिन इस यथार्थ को कैसे मूलगामी तौर पर बदलें इस पर उनका ध्यान नहीं है। यथार्थ के रूपान्तरण के सवाल जब तक नहीं उठाए जाते तब तक साहित्य की परिवर्तनकामी भूमिका की ओर ध्यान नहीं जाएगा।
   हम टेलीविजन,रेडियो और दैनिक अखबारों में जो तथाकथित संवाद देखते हैं यह मूलतः उन्हीं विषयों पर होते हैं जिसे शासकों ने तय किया है।टीवी या मीडिया संवाद के विषय हैं- भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता,नव्य उदारतावाद,भूमंडलीकरण,पृथकतावाद, मासकल्चर के रूप, कामुकता आदि। ये आम जनता के नहीं शासकवर्गों के विषय हैं। ऊपर से यही लगता है ये जनता के विषय हैं लेकिन वास्तव में ये जनता के नहीं शासकवर्ग के विषय हैं। इन विषयों पर संवाद चलाकर मीडिया हमें सामाजिक परिवर्तन के सवालों से विमुख रखता है। इन पर चलने वाला संवाद मूलतः जनता की अंतर्वस्तु को पालतू बनाने की साजिश का हिस्सा है।
     पहले लेखक जब भाषा का इस्तेमाल करता था तो व्यक्तिगत आजादी और आत्मगतता को व्यक्त करते हुए स्पेस और टाइम का अतिक्रमण कर जाता था। आपातकाल के बाद लेखक ने 'स्व' और 'वर्तमानकेन्द्रित' भाषा पर व्यापक जोर दिया है। दैनन्दिन जीवन के अनुभव,दैनन्दिन विवाद, रोजमर्रा के राजनीतिक सवालों को वर्तमान की भाषा में रचा है। फलत: रचना की काल की सीमा के अतिक्रमण की क्षमता खत्म हो गयी है। अब जितनी जल्दी रचना जनप्रिय बनती है उतनी ही जल्दी लोग उसे भूल जाते हैं। रचना की जनप्रियता रचना से पैदा नहीं हो रही बल्कि उसे प्रायोजित करके पैदा किया जा रहा है। यह कृत्रिम जनप्रियता है। जन-संपर्क के फार्मूले से उपजी जनप्रियता है इसका साहित्य की गुणवत्ता से कोई संबंध नहीं है।
  आजादी के दौरान पैदा हुई प्रामाणिक अनुभूति ने 'स्व' की खोज, 'स्व' के साथ संवाद को जन्म दिया। उस दौर में लेखक मनुष्य के अलावा किसी भी विकल्प को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। लिंग,जाति,धर्म,अस्मिता आदि न जाने कितने विकल्प उसके सामने आए उन्हें 'स्व' के सामने खारिज करता चला गया। 'स्व' के सामने उसने सबको 'नकार' दिया। यही नकार का भाव उसकी सबसे बड़ी संपदा है। उसने यह जानने की कोशिश की कि नकार क्या है ? इस क्रम में लेखक अपने को चीजों के बाहर रखकर देखता था। फलत: मुक्त था। यही उसकी आजादी का आधार था। लेखक जब अपने को बाहर रखकर चीजों को चित्रित करता है तो उसकी चेतना स्वयं से भी आजाद होती है।











1 टिप्पणी:

  1. हिन्दी के शोधकर्ता जिन विषयों पर कहते हैं, उन्हें अमल में लाना होगा वरना वह भी ऐसे ही होगा जैसे जंगल में फूल। आपकी कुछ बातों से सहमत लेकिन हिन्दी वालों के विषय पर आदि पर असहमत।

    ये सही कहा है आपने कि लोग बस दिवस मनाते हैं।

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