रविवार, 24 जून 2012

सीमेंट के कार्टेल कारोबारियों पर 6,300 करोड़ का जुर्माना


भारत में नव्य आर्थिक उदार नीतियों के गंभीर दुष्परिणाम आने लगे हैं। बाजार की चालक शक्तियों के कामकाज में सरकार की हस्तक्षेप न करने की नीति का यह परिणाम निकला है कि अब एक ही क्षेत्र में व्यापार करने वाली बड़ी कंपनियां आपस मिलकर समूह या कार्टेल बनाकर कारोबार कर रही हैं। इस तरह का कारोबार एकाधिकार विरोधी भारतीय कानूनों की नजर में अवैध है। लेकिन बड़े पूंजीपतियों का कार्टेल बनाकर कारोबार करना जारी है। इसके जरिए वे अवैध ढ़ंग से आम उपभोक्ता से मनमाने दाम वसूल रहे हैं। कायदे से कार्टेल बनाकर काम करने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना ठोंकने के साथ दंड़ स्वरूप उनके कारोबार को बंद कर दिए जाने का कानूनी प्रावधान होना चाहिए।

भारत की यह ठोस वास्तविकता है कि यहां इजारेदारी एवं एकाधिकार विरोधी कानून हैं इन पर निगरानी और दंड देने वाली न्यायिक व्यवस्था भी है इसके बावजूद एकाधिकार के विस्तार को रोकने में सरकार और कानून असफल रहे हैं। हाल ही में सीमेंट कंपनियों का कार्टेल बनाकर व्यापार करने का मामला सामने आया है।जिसके तहत कम्पटीशन कमीशन ऑफ इण्डिया ने 11 सीमेंट कंपनियों के ऊपर 6,300 करोड़ रूपये का जुर्माना किया है। इनमें प्रमुख हैं-एसीसी,अंबुजा सीमेंट,अल्ट्राटेक सीमेंट और श्री आदि ।

उल्लेखनीय है मई-जून में पिछले साल जितनी सीमेंट बिकी थी उससे 14 फीसदी ज्यादा सीमेंट इस साल बिकी है। इस साल 16.26 मिलियन टन सीमेंट की खपत दर्ज की गयी है। जबकि विगत वर्ष इस अवधि में 14.20 मिलियन टन सीमेंट की बिक्री हुई थी। यह भी देखा गया है कि राष्ट्रीयस्तर पर सीमेंट के उपभोग की प्रकृति में बुनियादी तौर पर परिवर्तन आया है। सीमेंट के सकल उत्पादन का मई महिने में 79फीसद उपभोग किया गया जबकि इसी अवधि में पिछले साल मात्र 76 फीसदी अंश का ही उपभोग हो पाया था। सीमेंट की सबसे ज्यादा खपत आंध्र, कर्नाटक,केरल ,तमिलनाडु ,दिल्ली,उत्तराखंड,हरियाणा,पंजाब,राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में दर्ज की गयी।

जिन 11 सीमेंट कंपनियों पर कम्पटीशन कमीशन ऑफ इण्डिया ने जुर्माना ठोका है वे कई सालों से निर्बाध ढ़ंग से कार्टेल बनाकर काम करती रही हैं। कम्पटीशन कमीशन ऑफ इण्डिया ने इन कंपनियों को विगत 3 सालों में कमाए मुनाफे में से आठ फीसद अंश जुर्माने के तौर पर तुरंत जमा करने का आदेश दिया है। कमीशन ने अपने फैसले में कहा है ये सीमेंट कंपनियां कार्टेल बनाकर काम करती रही हैं जोकि कानूनन जुर्म है। साथ ही इन कंपनियों ने सीमेंट का उत्पादन घटाया है और मनमाने दाम बढ़ाए हैं। फैसले में कहा गया है कि इस अवधि के दौरान सीमेंट की मांग घटी है। मांग घटने की स्थिति में सीमेंट के दाम में गिरावट आनी चाहिए लेकिन हुआ है उलटा। बाजार में सीमेंट की मांग घटने बावजूद सीमेंट के दाम बढ़ाए गए।

कमीशन ने सन् 2011 में की गयी जांच के दौरान पाया कि सन् 2008-10 के दौरान एसीसी सीमेंट ने 8,150करोड़ रूपये का कारोबार किया ,इस पर आठ फीसद जुर्माना 652करोड़ रूपये बैठता है। अंबुजा सीमेंट ने 6,896 करोड़ रूपये का कारोबार किया जिसके आधार पर 552 करोड़ रूपये जुर्माना देने और इसी तरह अल्ट्राटेक सीमेंट ने 9,142करोड़ रूपये का कारोबार किया है और उसे 731करोड़ रूपये का जुर्माना देने आदेश दिया है। उल्लेखनीय है आदित्य बिड़ला ग्रुप ने सन् 2010 में अपने सीमेंट व्यापार को अल्टाटेक में समाहित कर दिया था। इसके अलावा लघु सीमेंट उत्पादक कंपनियों पर कम जुर्माना लगाया गया है। कमीशन ने अपनी जांच में पाया कि 39प्रतिशत सीमेंट निर्माताओं ने मिलकर कार्टेल बनाया है।

भारत में सीमेंट के 183 बड़े और 360 छोटे प्लांट हैं। इनमें तकरीबन 40 प्लांट की उत्पादन क्षमता 330 मिलियन टन है। यह सकल सीमेंट उत्पादन का 97 प्रतिशत है। कमीशन के अनुसार सीमेंट उद्योग का सकल राष्ट्रीय कारोबार 37,500 करोड़ रूपये का है।

उल्लेखनीय है सन् 1989 में सीमेंट को वि-नियंत्रित किया गया और सन् 1991 में इन कंपनियों ने कार्टेल बनाकर काम आरंभ किया । सन् 2007 में सबसे पहले मोनोपॉली एंड रिस्ट्रक्टिव ट्रेड प्रैक्टिस कमीशन (एमआरटीपीसी) ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि सीमेंट कंपनियां कार्टेल बनाकर कारोबार कर रही हैं और अपने एक फैसले में उस समय उसने सभी सीमेंट निर्माता कंपनियों को कार्टेल बनाकर काम करने के लिए दोषी करार दिया था। इस फैसले के आने के आने के बाद से केन्द्र सरकार ने कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाया जिससे सीमेंट कंपनियों को कार्टेल बनाकर काम करने से रोका जाए।

हाल ही में कम्पटीशन कमीशन ऑफ इण्डिया ने 11सीमेंट कंपनियों के खिलाफ जो फैसला दिया है उसके खिलाफ ये कंपनियां कंपटीशन एप्लीटेड ट्रिब्यूनल में जल्द ही अपील करेंगी।

उल्लेखनीय है इन कंपनियों के खिलाफ विगत एक साल से जांच चल रही थी। एक विश्लेषक के अनुसार जिन 11कंपनियों पर तीन साल के कारोबार के आधार जुर्माना लगाया गया है वह इन कंपनियों के कुल मुनाफे का 40 प्रतिशत बैठता है। इससे सीमेंट क्षेत्र में नकारात्मक संकेत जाने का खतरा भी है और ऐसी स्थिति में सीमेंट उद्योग में मंदी के आने की संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं ,जबसे सीमेंट कंपनियों पर भारी जुर्माना ठोका गया है तब से सीमेंट कंपनियों के शेयरों में 15 प्रतिशत तक की गिरावट आयी है।





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रविवार, 17 जून 2012

साहित्य में घिसापिटापन और अशोक वाजपेयी की नकली चिन्ताएं

आलोचक अशोक वाजपेयी को यह इलहाम हुआ है कि हिन्दी की गोष्ठियों में घिसापिटापन होता है। सवाल यह है कि उस घिसेपिटेपन से बचने के लिए हिन्दी के प्रायोजकों और गुटबाज लेखकों ने क्या किया ?पहले अशोक वाजपेयी की महान खोज पर ध्यान दें। उन्होंने लिखा है-

"हम सभी इसके दोषी हैं। हिंदी जगत में हर महीने गोष्ठियां, परिसंवाद आदि होते हैं। हम ही उन्हें आयोजित करते हैं, हम ही उनमें कष्ट उठाकर यात्रा की दिक्कतें झेलते हुए भाग लेते हैं। हम ही उनसे खीझते-ऊबते हैं। हम ही उनकी निरर्थकता या अप्रासंगिकता को हर बार खासे तीखेपन से महसूस करते हैं। इस सबके बावजूद हम ही उनकी प्रतीक्षा करते हैं; उनके लिए सलाह देते हैं; फिर उनमें हिस्सेदारी करते हैं। बहुत सारे शहरों या संस्थाओं में ऐसे सेमिनार वहां होने वाली एकमात्र सार्वजनिक गतिविधियां, साहित्य को लेकर, होती हैं। वे भी न हों तो वहां साहित्यिक माहौल में सन्नाटा छाया रहे। इसलिए उनका कुछ औचित्य, कुछ आधार बनता है।"

साहब ,आप महान हैं ,पहले घिसेपिटे कार्यक्रम में जाते हैं, उनसे ऊबते हैं।उनकी प्रतीक्षा करते हैं और फिर उसका श्राद्ध करते हैं और अंत में औचित्य भी समझा रहे हैं ! घिसेपिटेपन का साहित्य और जीवन में कोई औचित्य नहीं है और न प्रासंगिकता ही है। घिसेपिटेपन की प्रासंगिकता उनके लिए है जो साहित्य में अप्रासंगिक हो चुके हैं। वे ही इन कार्यक्रमों की शोभा भी बढ़ते हैं। वैसे जंगल में जिस तरह घास बिना किसी प्रयास के पैदा होती है। साहित्य में घिसापिटापन भी वैसे ही पैदा होता है।

अशोकजी विद्वानलेखक हैं तो जानते भी हैं कि साहित्य में चुक जाने की अवस्था में घिसापिटापन पैदा होता है। अशोकजी ने लिखा है " दरअसल, हिंदी में बहस की इतनी कम जगह है और इतनी कमी है कि ऐसे आयोजन वाद-विवाद-संवाद के मंच बनते हैं।" जी नहीं जनाब, आप जैसे सुधीजन मंचों से लेकर पत्रिकाओं तक इस कदर छाए हैं कि गंभीर बहस संभव ही नहीं है। आपकी पूरी भक्तमंडली है और वह साहित्य में "साहित्य की जय जय हो "का कीर्तन करती रहती है।

अशोकजी आप जानते हैं कि "साहित्य की जय जय हो " से साहित्य में नए का जन्म नहीं होता बल्कि जिस घिसेपिटेपन से आप क्षुब्ध-मुग्ध हैं वह तो इसकी ही देन है। साहित्य में नए विषयों की बहसों को किसने बाधित किया है?हिन्दी में अशोक वाजपेयी-नामवर सिंह ने नए विषयों पर अघोषित ढ़ंग से आत्म-सेंसरशिप लगायी हुई है।कौन है जो आप लोगों को रोक रहा है नए विषयों को उठाने से ? साहित्य की सत्ता को घिसापिटा बनाने में किसकी भूमिका है यह आप भी जानते हैं और आपके भक्त भी जानते हैं।

सत्ता के पदों से लेकर किताब की खरीद के फैसलों तक, गोष्ठियों से लेकर साहित्य की कॉकटेल पार्टियों तक कौन लोग हैं जो गुलछर्रे उड़ा रहे हैं ? अशोकजी का मानना है कि "ऐसे परिसंवादों में उपजने वाली ऊब का एक बड़ा कारण उसमें व्याप्त वाग्विस्तार और वाग्स्फीति हैं।" यह प्रधान नहीं गौण कारण है। प्रधान कारण है मंचस्थ हिन्दी के महान वक्ताओं में नए विषय की नई समझ,अंतर्वस्तु का अभाव और पेशेवर कौशल का अभाव।जब घटिया कारीगर से कोई वस्तु बनवाएंगे तो उसकी श्रेष्ठ कारीगर द्वारा निर्मित वस्तु से तुलना नहीं हो सकती। हमने हिंदी में पेशेवर लेखक-आलोचक कम पैदा किए हैं उसका ही दुष्परिणाम है कि आज गोष्ठियों के घिसेपिटेपन का जादू सिर पर चढ़कर बोल रहा है।

ब्रात्य बसु की कल्पनाशीलता के शिक्षा में नए रंग


रंगकर्मी-अध्यापक ब्रात्य बसु को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक साल पहले उच्चशिक्षामंत्री बनाकर शिक्षा में परिवर्तन का जो सपना देखा था उसके अभीप्सित फल पाने आरंभ हो गए हैं। ब्रात्य बसु की रंगकर्मी के नाते सर्जनात्मक मेधा धीरे धीरे रंग दिखाने लगी है। उच्चशिक्षा के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन करने में ब्रात्य बसु को सफलता मिली है इससे पश्चिम बंगाल के अकादमिक जगत में शांति और स्वायत्तता का माहौल लौटा है। अकादमिक परिवर्तनों के प्रति आम शिक्षक का विश्वास भी लौटा है।

पश्चिम बंगाल का सारे देश में बेहतरीन शिक्षा व्यवस्था के लिए सुनाम रहा है। वाममोर्चा के 34 साल के शासन में इस सुनाम में कुछ कमी आई ,लेकिन शिक्षा का माहौल मोटेतौर पर सारे देश की तुलना में बेहतर रहा है। अकादमिक नियुक्तियों में अनेकबार शिकायतें आईं ,लेकिन वाममोर्चा सरकारों ने उन शिकायतों की बार -बार अनदेखी की। यदि अनदेखी न करके समय रहते हस्तक्षेप किया जाता तो बेहतर परिणाम आने की संभावनाएं थीं। इसके बाबजूद सन् 1977 में वामशासन आने के बाद अकादमिक जगत में व्याप्त अराजकता,मनमानी और राजनीतिक हस्तक्षेप पर पाबंदी लगी। कक्षाएं और परीक्षाएं जो अराजक ढ़ंग से होती थीं. उनको नियमित किया गया। शिक्षासंस्थाओं का लोकतांत्रिकीकरण किया गया। विभिन्न स्तरों पर नियमों के अनुसार काम करने,नियमों के अनुसार नियुक्तियां करने और उच्चशिक्षा के विकास के साथ प्राइमरी शिक्षा के विकास को प्रधान एजेण्डा बनाया गया।

पश्चिम बंगाल में सन् 1990 के बाद पठन-पाठन में शिथिलता आई थी जिसे बाकायदा नियमित करके दुरूस्त किया गया लेकिन विभिन्न स्तरों पर माकपा के हस्तक्षेप को नियंत्रित करने और विभिन्न कमेटियों को सुचारू रूप से चलाने में जो दिक्कतें आ रही थीं उनके सुधार के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया।

एक साल पहले राज्य में ममता सरकार विशाल बहुमत से जीतकर सत्ता में आयी तो उसने वायदा किया कि राजनीतिक हस्तक्षेप से शिक्षाक्षेत्र की नीतियों और नियुक्तियों को मुक्त रखा जायगा। विगत एक साल में इन दो मोर्चों पर ममता सरकार और खासकर राज्य शिक्षामंत्रालय की भूमिका प्रसंशनीय रही है। ममता सरकार आने के बाद पहला बड़ा काम यह हुआ है कि शिक्षासंस्थाओं में राजनीतिक दबाब और आतंक का माहौल टूटा है। आम शिक्षक-छात्र आज पहले की तुलना में ज्यादा मुक्त वातावरण का अनुभव कर रहे हैं। जिन लोगों को पुराने माहौल का अनुभव है ,जो पुराने माहौल के अंधभक्त हैं ,उनके लिए यह परिवर्तन गले नहीं उतर रहा है।

यह सच है कि शिक्षासंस्थाओं में विभिन्न राजनीतिकदलों के लोग काम करते हैं।प्रशासनिक ईकाइयों में भी वे हैं। यह स्थिति पहले भी थी। लेकिन एक बड़ा अंतर आया है। नीतियों को लागू करते समय झंड़े के रंग पर नजर न होकर नीतियों के अनुपालन पर जोर दिया जा रहा है। नीतियों का पालन करते हुए निजीतौर पर कोई भी व्यक्ति मतभिन्नता रख सकता है। लेकिन पहले ऐसा नहीं था। शिक्षानीति या विश्वविद्यालय प्रशासन या उच्चशिक्षा परिषद के फैसलों को पार्टी फैसले के रूप में यांत्रिक तौर पर लागू करने पर जोर दिया गया और पार्टीतंत्र का हर स्तर पर दुरूपयोग किया गया।जबकि इस स्थिति से बचा जा सकता था।

वाममोर्चे के विगत शासन की सबसे बड़ी असफलता यह थी कि वहां पर पार्टीतंत्र और शिक्षा की स्वायत्त व्यवस्था का भेद ही खत्म हो गया था। ममता सरकार ने पार्टीतंत्र से स्वतंत्र होकर शिक्षानीति के अनुपालन को सुनिश्चित करने के बारे में जो नीतिगत फैसले लिए हैं वे स्वागतयोग्य हैं। इससे शिक्षा को स्वायत्त और आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिलेगी।

पश्चिम बंगाल में जिस तरह का राजनीतिक ध्रुवीकरण है उसमें राजनीतिकदलों से शिक्षातंत्र में काम करने वालों की प्रतिबद्धता में कमी नहीं आएगी । लेकिन शिक्षा संबंधी फैसलों को पेशेवराना ढ़ंग से लागू करने से पार्टी और शिक्षा के बीच में जो घालमेल हुआ था वह कम होगा।

इसके अलावा पूरे राज्य में कॉलेज और विश्वविद्यालयों के स्तर पर शिक्षक –कर्मचारी और छात्रसंघों के चुनाव इक्का-दुक्का त्रासद घटनाओं को छोड़कर शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक ढ़ंग से हुए हैं।राज्य सरकार की यह बहुत बड़ी उपलब्धि है।

नई सरकार को आए एक साल हो गया है और शिक्षा के क्षेत्र में नई सरकार के नए कदमों की आहट महसूस की जा सकती है। राज्य सरकार ने शिक्षा नीति के मामले में कई सटीक नए कदम उठाए हैं जिनके सुफल कुछ अर्सा बाद दिखेंगे। आम शिक्षकों और विद्यार्थियों में यह धारणा है कि शिक्षा क्षेत्र में ममता सरकार कुछ खास नहीं कर पाएगी। लेकिन शिक्षामंत्री ब्रात्य बसु और उच्चशिक्षा परिषद की कल्पनाशील बुद्धि के कारण इस मिथ को तोड़ने में सफलता मिली है। यह सच है वामशासन में शिक्षा संस्थाओं में बना लोकतांत्रिक ढ़ांचा मुश्किलें पैदा कर रहा था।उस ढ़ांचे की जगह नए ढ़ांचे की परिकल्पना को साकार करके नई संरचनाएं बनायी गयी हैं जिनके बारे में शिक्षकों के एकवर्ग में संशय है। लेकिन शिक्षामंत्रालय और उच्चशिक्षा परिषद ने जिस कौशल और पेशेवराना ढ़ंग से राज्य की समूची शिक्षा व्यवस्था को संभालना आरंभ किया है उससे भविष्य में शिक्षा में सुधार की संभावनाएं पैदा हुई हैं।

मसलन् विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति पदों पर पेशेवर योग्यता को महत्व देकर नियुक्तियां की गयी हैं और इस मामले में राज्य सरकार ने राजनीतिक-निरपेक्षता का अपना वायदा निभाया है। कुलपतियों की नियुक्तियों में अकादमिक-प्रशासनिक क्षमताओं का ख्याल करके नियुक्तियां करके शिक्षा संस्थानों के मुखिया के पद को पेशेवर बनाकर नई दिशा दी है। इसी तरह समग्रता में देखें तो नीतिगत मसलों पर ममता सरकार ने पुरानी वाममोर्चा सरकार के द्वारा बनायी कई बुनियादी नीतियों को जारी रखा है ,जहां असहमति थी वहां नए सुधार किए गए हैं। इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण है राज्य में उच्चशिक्षा के क्षेत्र में चली आ रही दाखिला नीति में मूलभूत परिवर्तन। इस परिवर्तन के तहत 2012-13 के सत्र से ही स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं में राज्य के बाहर के विद्यार्थियों के लिए 50 फीसदी सीटें आरक्षित करने का उच्चशिक्षा परिषद का सुझाव है। उल्लेखनीय है अभी तक मात्र 5 फीसदी सीटें बाहर के छात्रों के लिए आरक्षित थीं। इस सुझाव को उच्चशिक्षा परिषद ने समस्त विश्वविद्यालयों के कुलपतिपतियों को भेजा है और अनुरोध किया है कि वे अपने यहां इसी साल से यह सुझाव लागू करने की कोशिश करें।इससे शिक्षा के क्षेत्र में चला आ रहा अंधक्षेत्रीयतावादी सोच बदलेगा।

इसके अलावा अगले साल से स्नातक-स्नातकोत्तर कक्षाओं में राज्यस्तरीय प्रवेश परीक्षा के आधार पर दाखिले लिए जाने की संभावनाओं पर विचार चल रहा है। इससे शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता और शैक्षणिक क्षमता का विकास करने में मदद मिलेगी। मेधावी विद्यार्थियों को दाखिला पाने में सुविधा होगी। विभिन्न विश्वविद्यालयों में सीसीटीवी कैमरे भी लगाए जा रहे हैं,इससे विश्वविद्यालय प्रशासन ,परीक्षा और कक्षाओं के सुचारू संचालन में मदद मिलेगी।

कायदे से शिक्षामंत्री को विश्वविद्यालयों के नियमित अकस्मात दौरे करने चाहिए और कुलपतियों और विभिन्न अधिकारियों को भी कक्षाओं के दौरे करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इससे अकादमिक वातावरण में तेजी से सुधार आएगा। राज्य सरकार ने अकादमिक गुणवत्ता में सुधार के लिए इसी सत्र से विभिन्न विश्वविद्यालयों में छात्रों के द्वारा शिक्षकों के शिक्षणकार्य का मूल्यांकन कराने का फैसला लिया है। इससे शिक्षकों की जबावदेही बढ़ेगी और पठन-पाठन के माहौल को और भी प्रभावशाली बनाने में मदद मिलेगी। पिछली वाममोर्चा सरकार के कदमों का अनुसरण करते हुए स्नातक-स्नातकोत्तर स्तर पर 10 फीसद सीटों में इजाफा किया गया है। इससे शिक्षा और भी ज्यादा लोगों तक पहुँचेगी। लेकिन मुश्किल यह है कि अनेक विभागों में बैठने की सुविधा ही नहीं है।ऐसी स्थिति में सर्जनात्मक ढ़ंग से इस फैसले को लागू किया जाय। यांत्रिक ढ़ंग से लागू करने से अनेक दिक्कतें खड़ी हो सकती हैं। इसके अलावा उच्चशिक्षा मंत्रालय को राज्य के शिक्षक-कर्मचारियों को छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार उनकी बकाया राशि का जल्द भुगतान करना चाहिए इससे शिक्षक-कर्मचारियों का राज्य सरकार के कामों के प्रति विश्वास और भी पुख्ता बनेगा।

गुरुवार, 7 जून 2012

फेसबुक सूक्तियां



कलाकार प्रशिक्षित होता है ।लेकिन फेसबुक यूजर न तो कलाकार है और न प्रशिक्षित है ,वह तो यूजर है।

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कलाओं में कुछ भी रचसकते हैं और उससे मुक्त भी हो सकते हैं। फेसबुक में यह संभव नहीं है। फेसबुक कला नहीं है।

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कलाकार और फेसबुक यूजर में यह साम्य है ,ये दोनों यथार्थ से जुड़े हैं और यथार्थ को व्यक्त करते हैं।कलाकार और फेसबुक यूजर दोनों आज सामाजिक शक्ति नहीं हैं।

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जिस तरह हर व्यक्ति कलाकार होता है, उसी तरह हर व्यक्ति नेट यूजर हो सकता है।

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जिस तरह कलाकार-लेखक और इनकी रचना के बीच में यह समझौता है कि वे एक-दूसरे से यह नहीं पूछते कि कहां जा रहे हो, इसी तरह फेसबुक यूजर और फेसबुक के बीच में यह समझौता है कि वे एक दूसरे से नहीं पूछते कि कहां जा रहे हो या क्या लिख रहे हो।

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जिस तरह लेखक-कलाकार का स्थान सामाजिक वर्ग से भिन्न होता है। उसे वर्ग से परे देखते हैं। वैसे ही फेसबुक यूजर को वर्गीय कोटि के परे रखकर देखना चाहिए।

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कला की एक ही भूमिका है कि वह मनुष्य को वैधता प्रदान करती है, उसका महिमामंडन करती है,ठीक फेसबुक या नेटलेखन की भी यह विशेषता है कि वह मनुष्य का महिमामंडन है।

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जिस तरह कलाकार के पास कई मुखौटे होते हैं वैसे ही फेसबुक या नेट यूजर के पास भी कई मुखौटे होते हैं।

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मैं जब भी फेसबुक लिखा देखता हूँ तो उसमें जीवन की खोज करता हूँ। फेसबुक ही जीवन है।

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अन्तोन चेखव के शब्दों को उधार लेकर कहें कि नेटलेखक या फेसबुक टिप्पणीकार की न तो कोई आकांक्षा है,न कोई उम्मीदें है।और वह किसी से डरता भी नहीं है।

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फेसबुक या नेट की गाडी में कोई सवारी नहीं है ,सब ड्राइवर हैं।

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फेसबुक या मीडिया के पतन की अवस्था में शिक्षा ही कवच है।

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कला हमें पुरानी संस्कृति की ओर अभिमुख रहती है।फेसबुक ताजा राय की ओर ।

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फेसबुक पर प्रयोगमूलक लेखन का एक तय अर्थ होता है।उसकी सीमा है। लेकिन फेसबुक पर घटिया या डर्टीलेखन प्लेग की तरह फैलता है। इसलिए फेसबुक पर डर्टीलेखन से बचना चाहिए।

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नयामीडिया हमसे या यथार्थ जगत से नहीं जोड़ता। वह नए जगत की इमेजों के साथ पुराने संसार को भी नई शक्ल प्रदान करता है।यही काम नए मीडिया केरूप में फेसबुक कर रहा है।

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मनुष्य पहले अपने टूल्स बनाता है फिर टूल्स मनुष्य को बनाते हैं।उसी तरह पहले आप फेसबुक खाता बनाएं ,लिखें, कम्युनिकेट करें , फिर फेसबुक आपको निर्मित करेगा।

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फेसबुक में यदि आप किसी एक विचार को मान लेते हैं या स्वीकार कर लेते हैं तो अन्य विचारों को अनलाइक नहीं करते, बल्कि जिन विचारों को नहीं मानते उनको भी लाइक करते हैं। कला-साहित्य में ऐसा नहीं होता।

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फेसबुक पर विचार और राजनीति के शिखरों के बीच में नॉनसेंस नृत्य करता रहता है।

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जिस तरह कोई व्यक्ति कागज शॉसेज के चिह्न को देखकर पिकासो के विभ्रम में रहता है। ठीक वही अवस्था फेसबुक लेखक की है।

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फेसबुक टिप्पणीकार पोस्टकार्ड लेखक की तरह है।इसका पर्सेप्शन भी पोस्टकार्डलेखक जैसा होता है।

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नेटलेखन या फेसबुक लेखन देखने में एक खासकिस्म का दुरंगापन है। यहां तर्क के पक्ष और विपक्ष दोनों ही रूप दिखते हैं। कुछलोग हैं जिन्हें फेसबुक नॉनसेंस लगता है। बेबकूफी और समय की बर्बादी लगता है। लेकिन कुछ हैं जिन्हें इसका उपयोग ज्ञान-विचार-राजनीति आदि के क्षेत्र में मददगार नजर आता है।फेसबुक असल में वाचिक चिन्तन को बढ़ावा देता है।

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फेसबुक पर आने वालों में नैतिकतावादियों और मस्ताने टिप्पणीकारों की बड़ी तादाद है। यहां भाषाज्ञानी या बुद्धिजीवी बहुत कम संख्या में हैं।इसके बावजूद फेसबुक लेखक को वाइचांस ही कोई बुद्धिजीवी के रूप में सम्मानित करे। फेसबुकलेखक क्या बुद्धिजीवी होता है ?

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जो लोग सामाजिक परिवर्तन में विश्वास करते हैं उनके लिए इंटरनेट,फेसबुक ब्लॉगिंग आदि आमलोगों में संचार का महान उपकरण या मीडियम है.इसकी उपेक्षा संभव नहीं है।

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फेसबुक से लेकर कलाओं तक नई बात,नया मुहावरा,नईभाषा, नई अभिव्यक्ति शैली और नया कंटेंट को हमेशा खतरे के रूप में देखा गया है। नए में खतरे कम और लाभ ज्यादा होते हैं।नए को अपनाओ और आगे जाओ।

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फेसबुक में सटीकबात से एक कदम आगे कही गयी बात मूर्खतापूर्ण लगती है। लेकिन बेबकूफी से एक कदम आगे बढ़ी हुई बात सटीक लगती है।

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फेसबुक की भूमिका है कि यह पर्सेप्शन को संकुचित नहीं होने देता है। नजरिए को उदार बनाता है। इस तरह के लक्षण कला और साहित्य में भी पाए जाते हैं।

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फेसबुक में व्यक्त टिपप्णियां और संवेदनाओं से पढ़नेवाले की संवेदनाएं और नजरिया समृद्ध होता है।

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रविवार, 3 जून 2012

ममता की सामंती दरियादिली में अटके एक हजार राजनीतिक बंदी


मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की दरियादिली सामंती पापुलिज्म का हिस्सा है। यह सामंती जश्न और दरबारी संस्कृति से जुड़ी है। यह एक अ-राजनीतिक फिनोमिना है। इसका लोकतांत्रिक उदारतावाद से कम सामंती उत्सवधर्मी मानसिकता से ज्यादा संबंध है। इस मानसिकता का आदर्श नमूना है कोलकाता नाइट राइडर का अभिनंदन समारोह और नजरूल अकादमी का फैसला। 

कोलकाता नाइट राइडर के सिर पर आईपीएल चैम्पियनशिप की जीत का सेहरा बंध जाने से देश में खुशी कम ममता बनर्जी और उनके प्रशासन में खुशी ज्यादा दिखाई दी। कोलकाता नाइट राइडर में कोलकाता नाम के अलावा कोलकाता का कुछ भी नहीं है।यहां तक कि इस टीम में कोई बंगाली खिलाड़ी तक नहीं है। इसके बावजूद ममता बनर्जी ने इस निजीटीम का शानदार जन-अभिनंदन किया और लाखों रूपये खर्च करके अपने उल्लास और दरियादिली का प्रदर्शन किया।राजनीतिक हलकों ने इसे अपव्यय माना।

ममता बनर्जी की सामंती दरियादिली का दूसरा उदाहरण है नजरूल अकादमी का फैसला । इसके तहत उन्होंने इंदिराभवन की बजाय राजारहाट में नजरूल अकादमी का शिलान्यास किया। उल्लेखनीय है ममता बनर्जी ने सत्ता में आते ही मनमाने ढ़ंग से यह फैसला लिया कि सॉल्टलेक स्थित इंदिरा भवन का नाम बदलकर कवि नजरूल इस्लाम के नाम पर रखा जाएगा और वहां पर नजरूल अकादमी की स्थापना की जाएगी। उनके इस फैसले के खिलाफ कांग्रेस ने जमकर प्रतिवाद किया था।फिर अचानक उन्होंने अपने फैसले को बदलकर राजारहाट में शिलान्यास किया। यह ममता बनर्जी के सामंती दरियादिल और जिद्दीपन की अभिव्यक्त है।कायदे से ममता बनर्जी को लोकतांत्रिक उदारभाव अपनाना चाहिए। इससे राज्य में उदार माहौल बनेगा।राजनीतिक फैसले लेने में सुविधा होगी और सामंती व्याधियों से राज्य प्रशासन को मुक्ति मिलेगी।

ममता प्रशासन की सामंती व्याधियां राजनीतिक फैसले लेने में बाधाएं खड़ी कर रही हैं। ये किस तरह की बाधाएं खड़ी कर रही हैं इसका आदर्श उदाहरण है राज्य के विभिन्न जेलों में बंद राजनीतिकबंदियों की रिहाई का मामला। सत्ता में आने के पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस ने सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने का वायदा किया था। लेकिन उनको शासन में आए एक साल हो गया और अभी तक राजनीतिक बंदी रिहा नहीं हुए हैं। जबकि तृणमूल कांग्रेस के सभी सदस्यों पर चल रहे मुकदमे राज्य सरकार ने वापस ले लिए हैं।सामंती फादारी और भेदभाव का यह आदर्श नमूना है।कायदे सभी राजनीतिक मुदमें वापस लिए जाने चाहिए। लेकिन ममता बनर्जी के दल के लोगों के खिलाफ चल रहे मुकदमे वापस ले लिए गए हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यह ध्यान में रखना होगा कि चुनाव घोषणापत्र में किए गए राजनीतिक वायदों को पूरा करना एक बड़ी लोकतांत्रिक उपलब्धि होती है । मुश्किल यह है कि राज्य सरकार में कुछ ऐसे लोग हैं जो राजनीतिक बंदियों की रिहाई के मामले में तरह तरह के अडंगे डाल रहे हैं। इस प्रसंग में कुछ तथ्यों पर गौर करना जरूरी है।

ममता सरकार ने 20 मई 2011 को राजनीतिकबंदियों की रिहाई के लिए एक 13 सदस्यीय रिव्यू कमेटी बनायी। इसकी अध्यक्षता कोलकाता उच्चन्यायालय के पूर्व जस्टिस प्रलयसेन गुप्ता को सौंपी गयी।इस कमेटी में 4 आईपीएस और 2 आईएएस ऑफिसर रखे गए। इसके अलावा 6 मानवाधिकार और सामाजिक कार्यकर्ता सदस्य के रूप में रखे गए। ये हैं-देवव्रत बंद्योपाध्याय,सुजातो भद्र,देवाशीष भट्टाचार्य,राजपीप मजूमदार,सुब्रत हाती और अंसार मण्डल। इसके अलावा सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस से जुड़े 3 वकीलों को भी इस कमेटी में रखा गया। असल में राजनीतिक बंदियों की रिहाई के लिए किसी रिव्यू कमेटी के गठन की जरूरत नहीं थी। अदालतों ने जिनको राजनीतिक बंदी का दर्जा दिया है उनको सरकार एक आदेश के जरिए रिहा कर सकती थी। लेकिन रिव्यू कमेटी बनाकर सरकार ने अशनि-संकेत दिए हैं और इससे मानवाधिकारकर्मी परेशानी महसूस कर रहे हैं।

प्रकारान्तर से रिव्यू कमेटी के गठन के साथ ही ममता सरकार ने राजनीतिक बंदियों को बिना शर्त्त रिहा करने की मानवाधिकारकर्मियों की मांग को अस्वीकार कर दिया। ममता बनर्जी ने चुनाव जीतने के पहले कहा था कि यदि वे चुनाव जीतती हैं तो राजनीतिकबंदियों को बिना शर्त्त रिहा किया जाएगा। लेकिन अपने वायदे को पूरा करने की बजाय उन्होंने रिव्यू कमेटी का गठन किया और इस कमेटी को तीन महिने के अंदर अपनी रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया। ममता सरकार ने सत्ता संभालते ही राजनीतिक बंदियों को रिहा करने के बजाय कमेटी के सामने ऐसी शर्तें रखीं जो किसी भी राजनीतिकबंदी के लिए अपमानजनक हैं और उसके मूलभूत संवैधानिक मानवाधिकारों का उल्लंघन भी है। ये शर्तें ममता बनर्जी के सामंती सोच को अभिव्यक्त करती हैं। सामंती मानसिकता में निजी वफादारी बुनियादी चीज है, इसके आधार पर ममता सरकार राज्य ने तृणमूलकर्मियों पर चल रहे सभी मुकदमे बिना किसी रिव्यू कमेटी की सिफारिश के वापस ले लिए हैं।जबकि अन्य राजनीतिक बंदियों के मामलों को रिव्यू कमेटी के पचड़े में फंसा दिया।

सामंती मानसिकता के चलते ममता सरकार ने बंगाल कोरेक्शनल सर्विस एक्ट 1992 के कुछ जनविरोधी प्रावधानों को राजनीतिकबंदियों की रिहाई का आधार बनाया है। इसके अनुसार कमेटी को यह देखना होगा कि जिस राजनीतिक बंदी को रिहा किया जाएगा क्या वह रिहा होने के बाद राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा लेगा ? रिहा किए गए बंदी को यह लिखित आश्वासन देना होगा कि वह रिहा होने के बाद किसी भी किस्म की राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं लेगा।

इस कानून के एक अनुच्छेद के अनुसार कमेटी को यह भी विचार करना था कि रिहा व्यक्ति बाहर जाकर क्या अन्य लोगों को राजनीति में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित कर सकता है ? उल्लेखनीय है राजनीति करना और राजनीतिक दल में शामिल होना व्यक्ति का संविधान प्रदत्त बुनियादी अधिकार है।कोई भी कानून इस अधिकार को छीन नहीं सकता। इस कमेटी का यह भी काम था कि वह राजनीतिकबंदी के जेल में किए गए व्यवहार की भी जांच करे। सच यह है कि राजनीतिकबंदी आमतौर पर जेलों में अमानवीय दुर्व्यवहार और दुर्दशापूर्ण अवस्था के खिलाफ संघर्ष करते रहे हैं ऐसे में जेल अधिकारियों से राजनीतिक बंदियों के बारे में अच्छे आचरण का प्रमाणपत्र मिलना असंभव है।

रिव्यू कमेटी को आरंभ में 3 महिने का समय दिया गया ,बाद में उसके कार्यकाल को 6 महिने और बढ़ाया गया और 3मार्च 2012 को इस कमेटी का कार्यकाल खत्म हो गया। इससमय तक कमेटी अपनी रिपोर्ट तैयार नहीं कर पायी थी और सरकार ने भी एक्सटेंशन नहीं दिया।

उल्लेखनीय है कि अभी तक कोई नहीं जानता कि पश्चिम बंगाल की जेलों में कितने राजनीतिकबंदी हैं ? और उनके ऊपर किस तरह के आरोप हैं? ममता बनर्जी का चुनाव जीतने के पहले माओवादी संगठनों,एसयूसीआई,लालगढ़ आंदोलन में शामिल संगठनों के साथ गहरा याराना था। ये संगठन ममता के सभी आंदोलनों में शामिल थे। इन संगठनों का एक भी सदस्य अभी तक रिहा नहीं हुआ है और दक्षिण बंगाल का एक भी राजनीतिक बंदी राज्य सरकार ने रिहा नहीं किया है। अभी तक जिन राजनीतिक बंदियों को रिहा किया गया है उनमें से 30 राजनीतिक बंदी उत्तरबंगाल के हैं। इनको जमानत पर रिहा किया गया है। इनमें 7 कामतापुरी आंदोलन और 27 बृहद कूचबिहार आंदोलन से जुड़े हैं।

उल्लेखनीय है रिव्यू कमेटी ने अपनी पहली सूची में 78 बंदियों के नाम दिए थे उनमें कई माओवादियों के भी नाम हैं।राज्य सरकार ने रिव्यू कमेटी के द्वारा रिहाई के लिए सिफारिश किए गए सभी नामों को स्वीकार करने से मना कर दिया।खासकर माओवादियों की रिहाई की सिफारिशों को नहीं माना। राज्य सरकार ने कामतापुरी आंदोलन के गिरफ्तार 50 राजनीतिकबंदियों में से 30 को जमानत पर रिहा किया है।कई महीना पहले ममता बनर्जी ने स्वयं घोषणा की थी कि कामतापुरी आंदोलन में गिरफ्तार किए गए बाकी 20 आंदोलनकारियों को जल्द रिहा कर दिया जाएगा लेकिन आज तक उनलोगों की रिहाई नहीं हुई है।

इसी तरह रिव्यू कमेटी ने अपनी दूसरी सूची में 100 और तीसरी सूची में 300 राजनीतिकबंदियों की रिहाई की सिफारिश की है। मजेदार बात यह है कि इन सूचियों में शामिल राजनीतिक बंदियों की जमानत की अर्जी का सरकार की ओर से अदालतों में विरोध किया जा रहा है। जिनको रिहा किया है वे जमानत पर छूटे हैं, जो रिहाई की परिभाषा में नहीं रखे जा सकते, क्योंकि उनको लगातार मुकदमों के चक्कर में अदालतों के चक्कर लगाने पड़ेंगे। राजनीतिक बंदियों में नंदीग्राम आंदोलन में गिरफ्तार किए गए लोग भी शामिल हैं इनलोगों को वामशासन ने गिरफ्तार किया था और ममता बनर्जी के आंदोलन का ये लोग हिस्सा थे ,लेकिन ये लोग ममता सरकार आने के एक साल बाद भी रिहा नहीं हुए हैं। बुद्धदेव सरकार ने नंदीग्राम आंदोलन में गिरफ्तार लोगों को माओवादी के नाम से बंद किया था,जबकि निचली अदालत ने उनको राजनीतिक बंदी के रूप में वर्गीकृत किया। आश्चर्य की बात यह है कि इन लोगों की जमानत का कोलकाता उच्चन्यायालय में ममता सरकार ने विरोध किया। नंदीग्राम आंदोलन में 7लोग बंदी बनाए गए थे। दूसरी ओर ममता सरकार ने विगत एक साल में माओवादी, माओवादी लिंकमैन,माओ कनेक्शन टैग के तहत 300से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया है।ममता सरकार आने के बाद प्रतिदिन माओवादी होने के नाम पर अंधाधुंध गिरफ्तारियां हो रही है। हाल ही में लालगढ़ आंदोलन के चर्चित नेता छत्रधर महतो ने मुर्शिदाबाद जेल से जारी एक बयान में कहा है ममता सरकार आने के बाद 500से ज्यादा राजनीतिक कार्यकर्ता जंगलमहल से गिरफ्तार किए गए हैं। कायदे से ममता सरकार सभी राजनीतिक बंदियों को बिना शर्त रिहा करे और राजनीतिक कारणों से लोगों की गिरफ्तारियां बंद की जाएं।इससे राज्य में शांति का माहौल बनाने में मदद मिलेगी।